Friday, April 23, 2021
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रामविलास पासवान: जातिबोध था लेकिन लोक व्यवहार की लक्ष्मण रेखा का कभी उल्लंघन नहीं किया

रामविलास पासवान का जाना एक तरह से भारतीय राजनीति में एक परम्परा का अंत है। उनका जाना एक ऐसे नेता का भी जाना है जिसने अपने राजनीतिक कौशल, चातुर्य, सरल व्यवहार और प्रशासनिक क्षमता से देश में अपने लिए एक नया स्थान बनाया।

“हमारी प्रेस रिलीज नहीं छापिएगा संपादक जी?” मैंने अपने डेस्क से ऊपर नज़र उठाई तो देखा सफ़ेद कुर्ते पजामे में आत्मविश्वास से भरपूर एक नौजवान नेता हमारे संपादक स्वर्गीय श्री शरद द्विवेदी से मुखातिब था। ये कोई 1985-86 की बात है। मैंने पीटीआई भाषा में बतौर प्रशिक्षु पत्रकार काम करना शुरू ही किया था। शरद जी ने इस नेता का परिचय करवाया। ये नौजवान सांसद थे रामविलास पासवान।

बड़े शालीन तरीके से उन्होंने खुद बताया कि ‘जो है सो है कि हम रिकार्ड बहुमत से सांसद बने हैं। इसलिए हमारे बयान की अनदेखी मत कीजिएगा।’

पासवान जी थोड़ा जल्दी-जल्दी बोलते थे। ‘जो है सो है कि’ एक तरह से उनका तकिया कलाम था जिसे वो हर एक-दो वाक्य में इस्तेमाल कर ही लेते थे। जिस समय मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई तो वे कोई नौसिखिया नेता नहीं थे। वे उस समय भी दो बार के सांसद थे और उससे पहले बिहार में विधायक रह चुके थे। लेकिन उन्होंने मीडिया की ताकत को तभी पहचान लिया था। अपनी बात पहुँचाने के लिए उसका सटीक इस्तेमाल करना वे जानते थे। इसलिए अपनी प्रेस विज्ञप्ति अक्सर वे खुद लेकर पीटीआई के दफ्तर आ जाया करते थे। इसमें उन्हें कोई झिझक या हिचक नहीं थी।

उस दौर के हमारे सम्पादकों श्री वेदप्रताप वैदिक और श्री शरद द्विवेदी के साथ उनके अच्छे सम्बन्ध थे। भाषा में हमारे वरिष्ठ पत्रकार सहयोगियों जैसे गुरु जी, योगेश माथुर, आदि से भी उनके मधुर सम्बन्ध थे। सम्बन्ध बनाना और उन्हें निभाना वैसे तो उनकी पीढ़ी की खासियत थी। पर पासवान जी तो मानो इसके महारथी थे।

मैं उन दिनों प्रशिक्षु पत्रकार ही था लेकिन ये पासवान का बड़प्पन ही था कि उन्होंने मेरे वरिष्ठ सहयोगियों के साथ-साथ मेरे जैसे नवोदित पत्रकार की भी अनदेखी नहीं की। बाद में जब मैं टीवी की दुनिया में आया तो पासवान जी टीवी, होम टीवी और बाद में जनमत टीवी में लगातार आते रहे। इस दौरान पासवान का राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। लेकिन मेरे किसी भी टीवी शो में आने के लिए उन्होंने कभी भी आनाकानी नहीं की।

कई बार उन्हें आखिरी समय पर भी बुलाया गया तो उन्होंने कभी मना नहीं किया। याद रखने की बात है कि 80 और 90 के दशक में ओबी वैन का चलन इतना नहीं था और किसी भी शो में भाग लेने के लिए नेताओं को दिल्ली से नोएडा जाना पड़ता था। एक शो में भाग लेने के लिए काफी समय देना पड़ता था। इस नाते पासवान का सहज स्वभाव और उपलब्धता हमारे जैसे जैसे पत्रकार के लिए मानो एक वरदान ही था।

एक बात यहाँ कहना ज़रूरी है। पासवान आजकल के कई नेताओं की तरह सिर्फ टीवी शो के जरिए अपना करियर खड़ा करने वाले सिर्फ एक हवाई नेता नहीं थे। वे खाँटी जमीनी नेता थे। लेकिन जमीन पर अपनी पक्की पकड़ होने के साथ ही अपनी बात कहने के लिए संचार माध्यमों के उपयोग के महत्व को वे अच्छी तरह जानते थे।

जनसंवाद के तौर तरीकों को समझना और उनका इस्तेमाल उन्हें बखूबी आता था। इसलिए पहले प्रिंट माध्यम और उसके बाद अपने राजनीतिक संवाद के लिए टीवी का प्रभावी उपयोग उन्होंने किया। 

पासवान ने दुनिया में सबसे ज़्यादा मतों से जीतने का रिकार्ड बनाया था। उन्होंने 1977 में बिहार की हाजीपुर लोकसभा सीट 4,24,545 वोटों के रिकॉर्ड अंतर से जीती थी। यह एक विश्व कीर्तिमान था और गिनीज़ बुक में इसका जिक्र आया था। बाद में 1989 में उन्होंने यही सीट 5,04,448 के अंतर से जीती। 

वैसे पासवान खगड़िया के रहने वाले थे। परन्तु उनका नाम हाजीपुर के साथ अभिन्न रूप से जुड़ गया। वे आठ बार हाजीपुर से चुनाव जीते। असल में हाजीपुर पासवान के नाम से उसी तरह प्रसिद्द हुआ जैसा वह वहाँ पैदा होने वाले केलों के लिए जाना जाता है।

पासवान को जातिबोध था। यूँ भी उत्तर भारत और खासकर बिहार में जो भी जमीनी राजनीति करता है वह जाति के अंकगणित के बिना राजनीतिक तौर पर ज़िंदा नहीं रह सकता। लेकिन उन्होंने भाषा, संबंधों और लोक मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया।

आज कतिपय जातिगत नेता जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, पासवान उससे दूर रहे। वे समाजवादी परिपाटी के नेता थे। उनकी शुरुआती राजनीति संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से ही आरम्भ हुई थी।

राजनीतिक हवा का रुख पहले से ही भाँप जाने में माहिर पासवान एक चतुर राजनीतिक खिलाड़ी थे। हवा का रुख देखकर राजनीतिक प्रतिबद्धता तय करने से उन्हें कभी गुरेज नहीं रहा। लेकिन फिर भी शालीनता, लोक व्यवहार और सामाजिकता की लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन उन्होंने नहीं किया। इस मायने में वे अनुसूचित जाति की राजनीति में बाबू जगजीवन राम की विरासत का प्रतिनिधित्व करते थे।

उन्होंने अनुसूचित जातियों की राजनीति की, परन्तु ‘तिलक, तराज़ू और तलवार’ जैसी उपमाओं का प्रयोग नहीं किया। वे शायद जानते थे कि विद्वेषात्मक भाषा में दूसरों का अपमान करना जातिजनित तिरस्कार, भेदभाव और इतिहासगत अपमान दूर करने का सही साधन नहीं है। आज जिस तरह की भाषा का प्रयोग जाति आधारित पार्टियों के कुछ नेता करते है उससे सामाजिक विद्वेष कम होने के स्थान पर और अधिक फैलता ही है। 

इस मायने में रामविलास पासवान का जाना एक तरह से भारतीय राजनीति में एक परम्परा का अंत है। उनका जाना एक ऐसे नेता का भी जाना है जिसने अपने राजनीतिक कौशल, चातुर्य, सरल व्यवहार और प्रशासनिक क्षमता से देश में अपने लिए एक नया स्थान बनाया।

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