Thursday, March 4, 2021
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राहुल गाँधी के नित्य उड़ते ‘राफ़ेल’ और देश की धूमिल होती छवि

आखिर प्रधानमंत्री पर अपने बेसिरपैर के आरोपों से राहुल गाँधी क्या सिद्ध करना चाहते हैं? यही कि देखो कॉन्ग्रेस की सरकार में एक अदद रक्षा खरीद नीति तक नहीं निर्मित हो पाई थी?

जोसेफ गोएबल्स का एक कथन है कि झूठ को इतनी बार बोलो कि वह सच बन जाए। दुर्भाग्य से कॉन्ग्रेस पार्टी आजकल यही कर रही है। राफ़ेल खरीद को लेकर कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी इतने झूठ बोल चुके हैं कि उन्हें लगता है कि उनकी कही गई किसी भी बात को अब सच मान लिया जाएगा। लेकिन अपने इन सैकड़ों झूठ के पीछे की सच्चाई या तो राहुल गाँधी समझ नहीं पा रहे हैं या समझने से जी चुरा रहे हैं।

किसी भी देश की रक्षा व्यवस्था उसके समूचे सुरक्षा ढाँचे का महत्वपूर्ण अंग होता है। आजकल पारंपरिक युद्धों का ज़माना तो रहा नहीं फिर भी जल, थल और नभ में तैनात बड़े और भारी भरकम हथियार आयुध भंडार की शोभा बढ़ाते हैं। बड़ी-बड़ी मिसाइलें, विमान वाहक युद्धपोत, परमाणु पनडुब्बियाँ, और युद्धक विमान शत्रु को पहले हमला न करने देने के मकसद से बनाए जाते हैं। इसे हम ‘deterrence’ कहते हैं। आज विश्व का पूरा हथियार उद्योग इसी ‘deterrence’ पर टिका हुआ है।

भारत को किन देशों से खतरा है यह ऐसे नहीं समझ में आता। जब हम दक्षिण एशिया का सामरिक मानचित्र देखते हैं तब समझ में आता है कि पाकिस्तान और चीन ने अपने आयुध भंडार में हमारे विरुद्ध कितने सारे हथियार जमा कर लिए हैं। इसी कारण भारत को भी दक्षिण एशिया में अपनी सुरक्षा को मज़बूत करने के लिए मिसाइलों, एयरक्राफ्ट करियर और परमाणु क्षमता वाले युद्धक विमानों की आवश्यकता है।

भारतीय वायुसेना में कम से कम 44 स्क्वाड्रन की आवश्यकता है लेकिन हमारे पास अभी केवल 32-35 स्क्वाड्रन हैं। अटल जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए वायुसेना की स्क्वाड्रन बढ़ाने के लिए राफ़ेल विमान खरीद को मंज़ूरी दी थी। रक्षा क्षेत्र में खरीद और तकनीकी हस्तांतरण की नीति भारत में एक दिन में नहीं उपजी बल्कि विगत दो दशकों में इसका क्रमिक विकास हुआ।

दरअसल सन 2001 से पहले भारत के पास कोई स्थाई रक्षा खरीद एवं प्रबंधन की लिखित प्रक्रिया नहीं थी इसीलिए बोफोर्स और अन्य घोटाले सामने आते थे या होने की आशंका बनी रहती थी। 2001 के बाद रक्षा मंत्रालय ने क्रमशः 15 वर्ष, 5 वर्ष और सालाना एक्वीजीशन प्लान के अंतर्गत नीतियाँ बनाईं और यह निर्धारित किया कि हमें क्या कब और किस मात्रा में खरीदना है।  

सन 2001 में पहली बार Defence Procurement Management Structures and Systems बनाया गया और उसके बाद 2002 में पहली बार Defence Procurement Procedure (DPP) दस्तावेज़ तैयार हुआ। इस दस्तावेज़ में तब से अब तक कई संशोधन हो चुके हैं। अंतिम DPP 2016 में जारी हुई थी। राफ़ेल की खरीद और ऑफसेट नीति इसी दस्तावेज़ की नियमावली पर आधारित है जिसके अनुसार वर्ष 2019 के अंत तक राफ़ेल युद्धक विमानों की पहली खेप भारतीय वायुसेना को मिल जाएगी।

ऑफसेट नीतियों के अनुसार रिलायंस और अन्य कंपनियों को विमान के पार्ट बनाने का ठेका और अन्य तकनीक हस्तांतरित की जाएगी। लेकिन राहुल गाँधी ने राफ़ेल की खरीद पर लगातार अनर्गल बचकाने बयान और आरोपों की झड़ी लगाते हुए 18 वर्षों में हुई इस प्रगति की छवि उसी तरह धूमिल करने का प्रयास किया जैसे उनके पिताजी ने बोफोर्स खरीद में हुए घोटाले के आरोपी क्वात्रोच्चि को भगाकर किया था।

आखिर प्रधानमंत्री पर अपने बेसिरपैर के आरोपों से राहुल गाँधी क्या सिद्ध करना चाहते हैं? यही कि उन्हें भारत का मानचित्र देखने की भी फुर्सत नहीं है? या फिर वो यह बताना चाहते हैं कि देखो कॉन्ग्रेस की सरकार में एक अदद रक्षा खरीद नीति तक नहीं निर्मित हो पाई थी? स्पष्ट है कि राहुल गाँधी को देश की सामरिक ताक़त बढ़ने से कोई मतलब नहीं है। वो केवल ढेला फेंक कर भागने वाली टुच्ची राजनीति करने में मशगूल हैं। और इस कृत्य में उन्होंने एन राम जैसे खलिहर पत्रकारों को भी मिला लिया है।

वैसे राहुल गाँधी की अधिक गलती भी नहीं है। उनके ख़ानदान में तो सेना के मनोबल को गिराने वाले प्रधानमंत्रियों का इतिहास रहा है। नेहरू के समय ही जीप घोटाला हुआ, इंदिरा गांधी के समय 1971 का युद्ध जीतने के पश्चात् वन रैंक वन पेंशन खत्म कर दी गई थी। कहते हैं कि जब जनरल सर रॉय बुचर डिफेंस मॉडर्नाइजेशन का प्लान लेकर नेहरू के पास गए थे तो नेहरू ने उनसे कहा था कि भारत को सेना की ज़रूरत ही नहीं है। यह नेहरूवियन मानसिकता ही है जिसके कारण देश में रक्षा-सुरक्षा विषयों के उत्कृष्ट जानकार पत्रकारों की कमी है। जो हैं वे लुटियन दिल्ली में बैठकर सेना की एक टुकड़ी के एक मूवमेंट को सैन्य तख्तापलट साबित करने का षड्यंत्र रचते हैं।     

2004-14 तक सोनिया गाँधी सत्ता में प्रत्यक्ष दखलंदाज़ी करती थीं, तो ऐसा क्या हुआ था कि डॉ मनमोहन सिंह ने अंतिम चरण में पहुँच चुकी (कॉन्ग्रेस के अनुसार) राफ़ेल डील पर हस्ताक्षर नहीं किए? इसका जवाब राहुल गांधी क्यों नहीं देते? डॉ मनमोहन सिंह ने अपने  कार्यकाल में किससे पूछ कर भारत-पाक के मध्य ‘सॉफ्ट बॉर्डर’ बनाने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया था? सियाचेन का विसैन्यीकरण कर नियंत्रण रेखा को स्थाई सीमा बनाने का विचार मनमोहन सिंह के दिमाग में कैसे आया था? राहुल गांधी को बचकाने सवालों के राफ़ेल उड़ाने से पहले इन सवालों के जवाब देने चाहिए।

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