Monday, October 26, 2020
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शादी की उम्र तय करना जरूरी, ताकि महज सेक्स की वस्तु और बच्चा पैदा करने वाली मशीन बनकर न रह जाएँ बेटियाँ

कम उम्र में विवाह और माँ बनने का इंतजार लड़कियों की सभी जिज्ञासाओं को मार देता है। उन्हें उसी में खुशी ढूँढनी पड़ती है, जिसकी ओर समाज और परिवार इशारा करते हैं। किशोरावस्था से लेकर युवावस्था तक में उसे केवल सेक्स की वस्तु और बच्चे पैदा करने की मशीन समझ लिया जाता है।

भारत में बाल विवाह को कुप्रथाओं की सूची में रखकर उसकी आलोचना करने का काम कई कथित बुद्धिजीवी समय-समय पर करते आए हैं। हालाँकि, इसके ख़िलाफ़ कोई ठोस कदम उठाने के लिए शायद ही कभी इनमें से कोई प्रयासरत हुआ हो। सबने इसे समाज की परंपरा मानकर ऐसे स्वीकारा, जैसे लकड़ी में दीमक और लोहे में जंग लगने की बात को स्वभाविक माना जाता हो।

वो दौर बिलकुल अलग था जब समाज में रहकर और समाज की ही बनाई कुरीति के ख़िलाफ़ राजाराम मोहन रॉय और केशव चंद्र सेन ने ब्रिटिश सरकार से स्पेशल मैरिज एक्ट पास करवाया था ताकि भारतीय समाज में विवाह की एक उम्र निर्धारित हो। इसमें लड़कों की शादी 18 साल से पहले और लड़कियों की शादी 14 साल से पहले प्रतिबंधित कर दी गई थी।

हाँ, ये बात और है कि समाज सुधार की ओर हुए इस प्रयास का कोई खासा फर्क देखने को नहीं मिला। लोग अपनी बनाई कुरीतियों का अपनी स्थिति के अनुसार अनुसरण करते रहे। बच्चों की शादी 2-3 साल की उम्र में हुई और किसी-किसी को तो पैदा होने के साथ ही शादी के बंधन में बाँध दिया गया।

मगर, इस एक्ट के अस्तित्व में आने का फायदा यह हुआ कि आगे चलकर इसी में सुधार किए गए व आजाद भारत में लड़कों की शादी की उम्र बढ़ाकर 21 वर्ष और लड़कियों की उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी गई। 

लड़कियों की शादी के लिए उपयुक्त उम्र क्या होनी चाहिए? यह बहस वर्तमान में भी जारी है। लेकिन, आज एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इस मुद्दे को उठा कर देश की सैंकड़ों जागरूक लड़कियों को एक आत्मसंतुष्टि और उम्मीद की किरण प्रदान की है। 

संतुष्टि इस बात की कि यदि देश के प्रधानसेवक, जिनकी बातों का प्रभाव शहर की एलिट जनता से लेकर सुदूर गाँव में बैठे किसान तक पर पड़ता है, वह इस विषय पर गंभीरता से चर्चा कर रहे हैं तो जाहिर है तो समाज में सकारात्मक बदलाव की नींव पड़ने वाली है। यह प्रक्रिया हो सकती है बहुत धीमी हो, किंतु इसका असर निस्संदेह ही प्रभावशाली होगा। उससे भी प्रमुख बात ये कि आखिरकार इस दौर में किसीने इस विषय की गंभीरता को समझा और उस पर फिरसे विचार करना आवश्यक माना है।

कुछ लोगों को लगेगा कि 18 साल की उम्र में आखिर क्या कमी है? इस विषय पर विचार क्यों किया जा रहा है? कौन सा ‘अनपढ़’ समाज अभी ही इस आयु सीमा का लिहाज करता है या कौन सा पढ़ा लिखा तबका अपनी बच्चियों को इस उम्र में विवाह योग्य मानता है? 

ये सारे सवाल किसी भी व्यक्ति विशेष के जहन में उठना बेहद लाजिमी है, वो भी तब जब उसे न समाज के हित से कुछ लेना-देना हो, और न लड़कियों के भविष्य से! मगर, ये प्रश्न उन लड़कियों के लिए किसी तीर से कम नहीं है जो आगे बढ़ने के सपने देखती हैं और उनके परिजन उन्हें 18 की होते ही विवाह सूत्र में बाँध देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ये सब आज भी आम है। वहाँ इसके अनेक उदाहरण देखने को मिलेते हैं।

शिक्षा, व्यवहार, स्वास्थ्य के लिहाज से क्यों गलत है शादी के लिए 18 साल की आयु

शिक्षा के लिहाज से देखें तो कम से कम 3 साल की उम्र में एक बच्चे को स्कूल भेजा जाना शुरू होता है। 2 साल तो वह सिर्फ़ अपने आस पास की चीजों को ग्रहण करने में लगा देता है और 5 साल की उम्र तक वह पहली कक्षा में कदम रखता है। बिन किसी रुकावट यदि निरंतर पढ़ाई चलती रहे तो 12वीं कक्षा 17 साल की उम्र तक पूरी होती है। कहीं-कहीं ये आँकड़े 1-2 साल ऊपर नीचे भी हो जाते हैं। 

ऐसे में, यदि आज के दौर में भी लड़कियों की उम्र 18 साल कम से कम शादी की है तो उन रूढ़िवादी घरों में तो वह पहले ही अपनी उच्च शिक्षा से वंचित हो जाती हैं, जहाँ कानूनी पचड़े में फँसने से अच्छा, लड़की के 18 की उम्र पूरी होने का इंतजार किया जाता है, जहाँ मंशा तो कुरीतियों से प्रभावित होती है, मगर कानून का डर उन्हें 18 साल तक रोके रखता है। और जैसे ही लड़की इस तय आयु की सीमा के आसपास पहुँचती है, वह उसे विदा करने का इंतजाम कर देते हैं।

व्यवहारिक बदलाव की बात करें तो कम उम्र में शादी के कारण न केवल लड़की की शिक्षा पर इसका प्रभाव पड़ता है बल्कि उसके व्यवहार में भी अकस्मात् परिवर्तन आने लगते हैं। कुछ लड़कियों को तो अपने व्यक्तित्व के विकास हेतु ही पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ इतनी बढ़ती चली जाती हैं कि या तो उसके भीतर गुस्सा उमड़ता है या फिर वह एकदम शांत होती जाती हैं। पुराने समय में नारी का खुद के प्रति नीरस रहना और बेवजह घरेलू कलह का बढ़ाना शायद इन्हीं प्रथाओं का परिणाम था। अगर, हमेशा से लड़की को उसे और उसकी संरचना को समझने का मौका दिया जाता, तो शायद ऐसी स्थितियाँ ही पैदा नहीं होतीं।

जीव विज्ञान में 10 से 19 वर्ष की आयु तक के बच्चे (लड़का हो या लड़की) को किशोर अवस्था में माना जाता है। किशोर अवस्था में लड़की हो या लड़का- उसके शरीर में तरह तरह के बदलाव हो रहे होते हैं। शरीर की बनावट से लेकर स्वभाव तक में स्वत: ही परिवर्तन झलकने लगता है। ऐसे में लड़का तो समाज के चार लोगों के साथ उठते-बैठते वक्त अपने भीतर हो रही तबदीली को कई हद तक समझ भी पाता है, मगर लड़कियाँ चार दिवारी में असहज से सिर्फ़ उधेड़ बुन में रहती हैं कि आखिर इन बदलावों के परिणाम क्या है?

फिर कम उम्र में विवाह और माँ बनने का इंतजार लड़कियों की सभी जिज्ञासाओं को मार देता है। उन्हें उसी में खुशी ढूँढनी पड़ती है, जिसकी ओर समाज और परिवार इशारा करते हैं। किशोरावस्था से लेकर युवावस्था तक में उसे केवल सेक्स की वस्तु और बच्चे पैदा करने की मशीन समझ लिया जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में आपने देखा होगा पुराने समय में अधिकाँश महिलाओं की उम्र और उनके बच्चों की उम्र में कोई खासा फर्क नहीं होता। इसकी वजह छोटी उम्र में हुआ विवाह ही होता है। खेलने कूदने की उम्र में लड़की को गर्भधारण करवा दिया जाता है। कई बार बच्ची अपने अपनी दर्द सहने की क्षमता पर विजयी होकर शिशु को जन्म भी दे देती है, लेकिन कई बार उसे समाज की बनाई कुरीति की भेंट भी चढ़ना पड़ता है, क्योंकि ये बात जाहिर जो लोग एक बच्ची को माँ बनाने की कल्पना कर सकते हैं, उन्हें उसके स्वास्थ्य से क्या सरोकार होगा? वो आखिर क्यों अस्पताल या फिर आशा वर्कर की ओर भागेंगे? शर्मनाक बात तो ये होती है कि कई बार कम उम्र में लड़कियों के साथ शादी करने वाले दोगुने उम्र के व्यक्ति भी होते हैं, लेकिन तब भी उन्हें उस बच्ची से एक शिशु की अपेक्षा रहती है।

लड़की की यदि शारीरिक क्षमता के मुताबिक देखा जाए तो 20-24 साल में लड़की में फर्टिलिटी रेट सबसे अधिक होती है। इसके बाद परिपक्तवा के साथ माँ बनने के लिए सबसे अच्छी 25-29 भी मानी जाती है। 30 की उम्र के बाद लड़की को माँ बनने में परेशानी होती है और उसकी प्रजनन क्षमता घटने लगती है। इसका मतलब ये नहीं होता कि वह  30 के बाद माँ बनने में अक्षम हो जाती हैं, बस उम्र बताने का तर्क यही है कि गर्भाधान की क्षमता बढ़ती उम्र के साथ घटती जाती है और परेशानियाँ उत्पन्न जरूर होती हैं। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि उसे 18 साल की उम्र में ही उसकी शादी करवाकर उसे माँ बनने को मजबूर कर दिया जाए। 30 से पहले और 18 के बाद, 20 से 29 की उम्र तो बचती है न!

जब बाल विवाह को रोकने के लिए लड़की की न्यूनतम उम्र 18 की गई, तो समय के मुताबिक वह एक क्रांतिकारी बदलाव था। मगर, अब यह समय की जरूरत है कि इसमें फिर बदलाव लाया जाए ताकि लड़की संभोग की वस्तु न रहकर समाज के उत्थान में भागीदार बनें।

लड़कियों के लिए सरकार जो योजनाएँ ला रही है उनका उद्देश्य है कि लड़कियों की भागदारी समाज कल्याण में और अधिक बढ़े। ऐसे में अगर लड़कियाँ मात्र 12वीं पास करके पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा दी जाएँगी तो सरकार का उद्देश्य कभी पूरा नहीं होगा और उनका मानसिक विकास व शारीरिक विकास भी ख़िलवाड़ बन कर रह जाएगा।

लड़की को शिक्षा के स्तर पर सशक्त बनाना हो या शारीरिक रूप से परिपक्व बनाना हो, जरूरी है कि अब यह उम्र का दायरा थोड़ा और आगे बढ़े व मुमकिन हो तो 21 साल तक इसे किया ही जाना चाहिए।

निस्संदेह ही इस फैसले का असर समाज के कुछ तबकों पर बहुत देर से पड़ेगा खासकर ग्रामीण इलाकों में। मगर जब एक समय आने पर इसे हर चौथे घर में रिवाज की तरह अपना लिया जाएगा, इसे लेकर जागरूकता फैलाई जाएगी, तो यह हर घर तक पहुँचने में समय नहीं लेगा और शहर की किशोरियों की तरह ही ग्रामीण क्षेत्रों में पलने वाली लड़कियों का विकास और आर्थिक स्थिति में उनकी भागीदारी, सब बहुत तेजी से बढ़ती देखने को मिलेगी।

कुछ उदाहरण अगर एक बार स्थापित हो गए तो पिछड़ी सोच रखने वाले उन लोगों का विकास भी होगा जिन्हें लड़की की उम्र बढ़ने के साथ अपनी नाक का डर सताने लगता है। जिन्हें लगता है कि लड़की के किशोर अवस्था में प्रवेश करते ही वो किसी के भी साथ भाग जाएगी, या उसका किसी के साथ शारीरिक संबंध बन जाएगा।

ये बात अक्सर सुनने में आती है कि भारत में लड़कियों की कम उम्र में शादी की प्रथा शुरूआत से नहीं थी। मगर, जब विदेशी आक्रांताओं का जुल्म देश पर बढ़ने लगा और वह बच्चियों तक को अपनी भोगविलास की वस्तु समझने लगे, तो लोगों ने बच्चियों के अपहरण और बलात्कार रोकने के लिए इस प्रथा को प्रचलित किया और बाद में समय के साथ बिना संदर्भ समझे इसे परंपरा मान लिया गया। कुछ लोगों ने इस पौत्र सुख पाने से भी जोड़ कर सही साबित करने का प्रयास किया लेकिन इसके नतीजे महिलाओं के लिए सिर्फ़ घातक रहे। शिशुओं और माताओं की मृत्यु दर में वृद्धि हुई और शारीरिक व मानसिक विकास भी कम होता गया।

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह आह्वान एक आशा की तरह है कि जो यदि चरितार्थ हो गया अगर तो लड़कियों को सपने देखने की आजादी, उन्हें पूरा करने के लिए संसाधन, सरकार की योजनाओं का लाभ उठाने का मौका, खुद को साबित करने का अवसर, सब थोड़े और समय तक मिल पाएगा। देखना है कि केंद्र सरकार द्वारा गठित की गई समिति क्या रिपोर्ट देती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज उन सभी जागरूक लड़कियों को आश्वासन दिया है जो इस मामले पर जल्द से जल्द फैसला लेने के लिए गुहार लगा रही हैं।

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