Thursday, September 24, 2020
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राम मंदिर निर्माण का विरोध करने वाले बाबर की मानस संतान

अब भी जो राम मंदिर का विरोध कर रहे हैं वे न भारत के संविधान में, न भारत की न्यायिक व्यवस्था में और न ही किसी नैतिकता में आस्था रखते हैं। वे उन ताकतों की मानस संतान हैं जिन्होंने मंदिर ही नहीं, बल्कि मध्यकाल में भारत की आत्मा को तोड़ने का भी असफल प्रयास किया था।

अयोध्या से मेरा संबंध बहुत पुराना है। बचपन से ही माता-पिता साल में कम से कम दो बार अयोध्या जाते रहे हैं। उनके गुरु स्वामी राम हर्षण दास जी का आश्रम वहीं है। पिछले लगभग 50- 55 साल से उनका ये क्रम अनवरत चलता रहा है।

उस समय विश्व हिंदू परिषद के राम जन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत भी नहीं हुई थी। मेरे माता-पिता दोनों को ही हमेशा ये उत्कृष्ट इच्छा रही कि अयोध्या में जन्मस्थान पर राम मंदिर बन जाए। मेरे माता-पिता दरससल उन करोड़ों राम भक्तों का प्रतिनिधित्व करते थे, जो बिना किसी राजनीतिक उद्देश्य के अयोध्या में जन्मभूमि पर रामलला का भव्य मंदिर बनते देखना चाहते हैं।

कई विदेशी अखबारों में पिछले दिनों कई लेख छपे हैं जिनमें अयोध्या की घटना को भाजपा के नेतृत्व में ‘हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा मंदिर निर्माण’ को एक राजनीतिक कदम बताया गया है। ऐसा लिखने वाले बड़ी भारी गलती कर रहे हैं।

इसे महज राजनीतिक आंदोलन कहना इसका बड़ा सतही विश्लेषण हैं। राम जन्मभूमि के लिए चला संघर्ष कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं है। किसी भी राजनीतिक आंदोलन में इतनी शक्ति नहीं होती कि वह अनवरत कई सौ साल तक चल सके। हिन्दुओं के मन में राम मंदिर निर्माण की आकांक्षा और उसके लिए संघर्ष तकरीबन 500 साल से तो चल ही रहा है। मंदिर निर्माण के शुरू होने के कार्यक्रम को एक संकुचित राजनीतिक परिपेक्ष्य में देखने वाले ये लोग एक वैचारिक भ्रम के शिकार हैं।

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मेरे पिताजी राजनीतिक नहीं थे। वे रेलवे में काम करते थे। उनका राजनीतिक विचारधारा या किसी दल से कोई संबंध नहीं था। पर अनन्य राम भक्त होने के कारण रामजन्मभूमि में उनकी अटूट आस्था थी। उनकी तरह ही करोड़ों रामभक्तों ने शताब्दियों से इस मनोरथ में जीवन गुजारा है कि अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थान पर गरिमापूर्ण मंदिर बने।

उस समय तक भाजपा के पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ और आरएसएस की उत्तर प्रदेश में कोई खास पकड़ नहीं थी। दरअसल 60 -70 के दशक में तो उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस के अलावा समाजवादी आंदोलन की पकड़ कहीं अधिक मजबूत थी।

मुझे ध्यान है कि जब मैं छोटा था तो मेरे बड़े भाई साहब ने आगरा कॉलेज में छात्र संघ का चुनाव समाजवादी युवजन सभा के बैनर पर लड़ा था। पर उनके राम भक्त होने और समाजवादी होने के बीच कोई द्वंद नहीं था। इस बारीकी को राजनीतिक चिंतकों और राजनीतिक लेखकों को समझना आवश्यक है।

जब आप राममंदिर आंदोलन को सिर्फ एक राजनीतिक दल या विचारधारा के नजरिए से देखते हैं तो आप उसके आकलन में गलती करते हैं। जनमानस में क्या चल रहा है इसे समझने में ऐसी गलती खासकर 80-90 के दशक और उसके बाद कॉन्ग्रेस के नेताओं और वामपंथी बुद्धिजीवियों ने की।

वे खासकर उत्तर प्रदेश और भारत के बड़े हिस्से में जमीन पर क्या हो रहा है, इसको समझ ही नहीं पाए। जनभावनाओं के सतही आकलन और अपने ‘सेकुलर’ पूर्वाग्रह के कारण उन्होंने हर रामभक्त को ‘संघी’ घोषित कर दिया। जब चिंतन पर राजनीतिक स्वार्थ हावी हो जाता है तो आप नीर-क्षीर विवेक खो देते हैं।

जमीन से कटे हुए इन कथित चिंतकों, विचारकों, मीडियाकर्मियों और बुद्धिजीवियों को ये पता ही नहीं पड़ा कि उनका ये मतिभ्रम कब हिन्दू विरोध की आदत में बदल गया। आज भी जब मोदी के समर्थकों को ‘भक्त’ कहकर गाली दी जाती है तो अपनी ‘श्रेष्ठ बौद्धिकता’ के मद में जीने वाले ये लोग वही गलती दोहरा रहे होते हैं। 

इसका नतीजा क्या हुआ? मेरे पिताजी जो कि राजनीतिक नहीं थे, ने 90 के दशक तक आते-आते पूरे तरीके से भाजपा और संघ के समर्थक बन गए। उन्हें लगा कि उनके आराध्य भगवान राम के न्यायोचित मंदिर का निर्माण सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनसे अनुप्राणित संगठनों के लोग ही करवा सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यकर्ताओं के समर्पण, निष्ठा, त्याग के मेरे पिताजी जैसे लोग कायल हो गए। बाकी तो सब इतिहास की बात है।

राम जन्मभूमि के उद्धार के लिए संघर्ष बहुत लंबा चला है। जब से बाबर के सेनापति मीर बाकी ने वहाँ मंदिर का विध्वंस कर मस्जिद का निर्माण किया, राम भक्तों ने चैन की कभी साँस नहीं ली है। कहते हैं कि मंदिर को 1526 में तोड़ा गया। उसके बाद से ही अयोध्या में अनगिनत संघर्षों की गाथा है। संघर्ष कभी रुके नहीं।

अपने आराध्य के मंदिर के तलवार की नोंक पर हुए इस क्रूरतापूर्ण विध्वंस को सामान्य समाज ने कभी स्वीकार नहीं किया। कोई समाज अपने न्यायोचित अधिकारों के लिए 500 साल तक संघर्ष करता रहे, यह एक अद्भुत घटना है। इस दौरान पहले इस्लाम को मानने वाले विदेशी आक्रांताओं का राज रहा।

उन्होंने अक्सर पाश्विक क्रूरता और असहिष्णुता के साथ हिन्दुओं के समस्त अधिकारों का निर्दयतापूर्वक अतिक्रमण किया। बाद में ईसाइयत को मानने वाले अंग्रेजों का राज रहा। अत्यधिक दमन, भय, जोर-जबरदस्ती और प्रलोभन के इस अंधकारपूर्ण माहौल में में भी पाँच सदी तक हमारे समाज ने विधर्मी आक्रांताओं का प्रतिकार किया। दुनिया के इतिहास में कोई अन्य ऐसी घटना नहीं मिलती। 

कहते हैं कि 50 साल के क्रम में कोई चार पीढ़ियाँ गुजर जाती है। तो इन 500 सालों में कोई 40 पीढ़ियाँ तो गुजर ही गई होंगी। इन 40 पीढ़ियों में से हर एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को इस संघर्ष की चेतना उत्तराधिकार के रूप में सौपीं। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को यह बताते गई कि राम की भूमि अयोध्या ही है। इसलिए बलपूर्वक जिन विधर्मी आक्रमणकारियों ने राम की जन्मभूमि को उनके भक्तों से छीना है उसके लिए संघर्ष करना उनका धार्मिक, नैतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व है।

इस मायने में राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू होना अपने आप में सिर्फ एक धार्मिक घटना मात्र नहीं है। यह घटना सामूहिक राष्ट्रीय चेतना के निरंतर संग्रहण और सिंचन का प्रतीक है। यह उस अनवरत चलने वाले संघर्ष की ज्योति का प्रतीक है जो करोड़ों दिलों में अनवरत जलती रही है।

5 अगस्त की घटना को सीमित, संकुचित राजनीतिक और धार्मिक नजरिए से देखने वाले फिर एक मूलभूत गलती कर रहे हैं। वे इस समाज और उसमें व्याप्त चेतना को समझ ही नहीं पा रहे। अयोध्या का समारोह भारतीय समाज की जिजीविषा, समृद्ध विरासत के प्रति उसका समर्पण, उसके शाश्वत संकल्प, साधन हीन होने पर भी संघर्ष करने के मनोबल और घोर विपरीत परिस्थितियों में ना चुकने वाले उसके धैर्य का प्रतीक है।

इस राष्ट्रीय सामाजिक चेतना की लौ को निरंतर जलाए रखने में एक महानायक ने बड़ी भूमिका अदा की। वे थे गोस्वामी तुलसीदास। तुलसीदास जी रामचरितमानस लिखकर ही रुके नहीं, बल्कि उन्होंने रामलीला का मंचन भी आरंभ किया। गरीब, अमीर, हर जाति और वर्ग, विद्वान, अनपढ़, स्त्री और पुरुष सब तक तुलसी ने अनुपम रामकथा द्वारा इस चेतना को पहुँचाया।

रामलीला और रामचरितमानस इस संघर्ष की अंतः चेतना की रीढ़ की हड्डी है। इस नाते गोस्वामी तुलसीदास राम जन्मभूमि पुनर्निर्माण के वैचारिक प्रणेता ही नहीं, बल्कि पहले एक्टिविस्ट भी हैं। आज देश के कण-कण में जो राम बसे हुए हैं, वह गोस्वामी तुलसीदास की देन है। 

इस संघर्ष के अनेक ज्ञात और अज्ञात नायक रहे हैं। जिन्होंने 500 साल निरंतर अपने रक्त और विचारों से इसे सींचा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ, स्वर्गीय अशोक सिंघल, लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता निस्संदेह इसके तात्कालिक नायक हैं। क्योंकि आज उनके समय में इस यज्ञ की पूर्णाहुति हो रही है। पर क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और अनेकानेक संतों की भूमिका और अनगिनत अनाम रामभक्तों की भूमिका को भुलाया जा सकता है?

जब इस्लामी जिहाद और क्रूसेड का अंधड़ शुरू हुआ तब मध्य पूर्व से लेकर सुदूर पूर्व तक एक के बाद एक देश, संकृतियाँ और पुरानी सभ्यताएँ परास्त होने के बाद समूल परिवर्तित/नष्ट होती गई।  मेसोपोटामिया, मिस्र, ईरान, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि इसके अन्यतम उदाहरण हैं।

एक के बाद एक पुरानी सभ्यताओं का तकरीबन नामोनिशान मिटा दिया गया। पर विदेशी आक्रांता अपनी भरपूर कोशिशों के बावजूद भारत में ऐसा नहीं कर पाए। भारतीय समाज की अंतर चेतना में जो सांस्कृतिक और विरासत के मूल्य स्थापित हुए थे वह इतनी सघन, शुद्ध और गहरे थे कि तलवार का भय, प्रलोभन और अन्य कोई लालच उसे बदल नहीं सका।

ये सही है कि इन प्रचंड आँधियों ने कुछ पेड़ों को झुकाया, कुछ डालियों को तोड़ दिया, कुछ फूल मसल दिए गए और अनगिनत कलियों को कुम्हला दिया, पर भारतीय सभ्यता का समूचा उपवन उजड़ा नहीं। अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में निर्माण कार्य का शुरू होना हमें यही बताता है।

रामचरितमानस में एक वर्णन है। जब राम और रावण युद्ध के लिए आमने-सामने खड़े हुए तो विभीषण ने देखा कि राम पैदल और नंगे पैर हैं, जबकि महा बलशाली रावण रथ पर सवार था। तुलसीदास जी लिखते हैं, “रावनु रथी बिरथ रघुवीरा, देखि बिभीषन भयउँ अधीरा।”

विभीषण ने राम से पूछा कि आप नंगे पैर, बिना रथ कैसे दस सिरों और बीस भुजाओं वाले रावण को जीतेंगे? वहाँ जो राम नीति का वर्णन करते हैं वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। भगवान राम कहते हैं कि युद्ध सिर्फ शस्त्रों से नहीं जीते जाते। जिसके पास धर्म, नीति, सत्य पर आस्था और विवेकपूर्ण आचरण का रथ होता है वही युद्ध भी जीतता है।

श्रीराम कहते हैं, “महा अजय संसार रिपु, जीति सकइ सो बीर। जाके अस रथ होइ दृढ, सुनहुँ सखा मतिधीर।”

भगवान राम की यह उक्ति राम जन्मभूमि के लिए हिंदुओं द्वारा किए गए संघर्ष पर भी लागू होती है। न तो उन्होंने धर्म छोड़ा, न आशा छोड़ी और ना ही संघर्ष छोड़ा। इसी कारण 500 साल बाद राम जन्मभूमि पर मंदिर बनने की शुरुआत उस राष्ट्रीय स्वप्न की पूर्ति है जो करोड़ों भारतीयों ने कई सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार धैर्यपूर्वक सँजोकर रखा था। सामाजिक और राष्ट्रीय जागरण का ये आंदोलन समाज की सामूहिक चेतना, उसकी अस्मिता, उसके मान सम्मान, आत्म भान का संकल्प है।  

यह राष्ट्रीय अनुष्ठान अभी पूरा नहीं हुआ है। जिस अनुदारवादी और असहिष्णु सोच ने मध्यकाल में मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई थी उसकी अनुकृतियाँ आज भी जिंदा है। वैसे अच्छा तो यह होता कि 1947 के बाद इस्लाम के अनुयायी कहते कि राम आपके इष्ट हैं। मीर बाकी और बाबर विदेशी आक्रांता थे तथा इस्लाम में पूज्य भी नहीं हैं। इसलिए आप अपने इष्ट देव का मंदिर बनाएँ।

आजादी के बाद ही यदि तुरंत ये जमीन राम मंदिर बनाने को सौंप दी जाती तो कितना अच्छा होता? पर राजनीतिक स्वार्थों, छद्म सेकुलरवादियों की हरकतों और इतिहासकारों के रूप में प्रचारित वामपंथी बुद्धिजीवी एक्टिविस्टों ने ऐसा नहीं होने दिया।

एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सर्वानुमति से मंदिर के पक्ष में नवम्बर 2019 को फैसला दिया। इसी के तहत मंदिर निर्माण का काम शुरू हुआ है। अब भी जो इसका विरोध कर रहे हैं वे न भारत के संविधान में, न भारत की न्यायिक व्यवस्था में और न ही किसी नैतिकता में आस्था रखते हैं। वे उन ताकतों की मानस संतान हैं जिन्होंने मंदिर ही नहीं, बल्कि मध्यकाल में भारत की आत्मा को तोड़ने का भी असफल प्रयास किया था।

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