Wednesday, April 21, 2021
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क्यों लग रहा है COVID-19 वैक्सीन में समय? जानिए क्या है ‘ड्रग डेवलपमेन्ट प्रोसेस’ और नई दवा के सृजन से लेकर बाजार में आने तक की चुनौतियाँ

एक नई दवा के मूल सृजन से लेकर बनाने और बाजार तक उतारने तक कितने तकनीकी और महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। किन चुनौतियों से एक स्पॉन्सर या दवा निर्माता को गुजरना होता है और किस प्रकार इस पूरी प्रक्रिया के हर एक चरण में अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन सुनिश्चित करना होता है।

मानव जीवन को हिलाकर रख देने वाले नोवल कोरोना वायरस (COVID-19) के आगमन के साथ ही समूचा विश्व यह जानने को आतुर हो गया था कि सबसे पहले इस COVID-19 वायरस से लड़ने या इसे ख़त्म करने की दवा/टीका की रेस में कौन सा देश, कौन सी फार्मा कंपनी या रिसर्च सेंटर बाजी मार ले जाएगा?

जनवरी, 2020 से अब तक कई देशों की नामी कंपनियों ने कोरोना वायरस का तोड़ निकालने के दावे तो किए हैं, लेकिन कोई भी अभी तक सौ प्रतिशत असरदार दवा को खोज निकालने या बना पाने का दावा नहीं कर सका है।

इस चर्चा ने हाल ही में सभी का ध्यान आकर्षित किया, जब टीका बनाने में अग्रणी रहने का दावा करने वाली एक फार्मा कंपनी का ट्रायल (क्लीनिकल) रोकने का निर्णय लिया गया। इस वैक्सीन के फेज – 2 परीक्षण के दौरान एक प्रतिभागी में ‘ट्रांसवर्स मायलाइटिस (तंत्रिकीय विकार, जिसमें मेरुरज्जु के पूरे एक खंड में सूजन हो जाती है) रिपोर्ट किया गया।

‘ट्रांसवर्स मायलाइटिस’ उक्त वैक्सीन से हुआ है या नहीं, इसकी विस्तृत जानकारी जुटाने के लिए कंपनी ने कुछ समय के लिए क्लीनिकल ट्रायल को रोकने का फैसला लिया। हालाँकि, इसके एक सप्ताह बाद ही इस ट्रायल को जारी रखने की अनुमति हेल्थ केयर रेगुलेटरी संस्थाओं द्वारा इस कंपनी को दे दी गई थी।

एक नई दवा के निर्माण की चुनौतियाँ: अंतरराष्ट्रीय रेगुलेटरी संस्थाओं की निगरानी, आम जन तक दवाओं के पहुँचने के तकनीकी पहलू

मुख्यतः, एक नई दवा/टीके के शोध और निर्माण में चार प्रमुख पड़ाव होते हैं, जिन्हें यहाँ तदनुसार वर्गीकृत किया गया है:

स्टेप 1: खोज और निर्माण 

खोज : सामान्यतः, शोधकर्ता नई दवा अथवा वैक्सीन की खोज में निम्न बिंदुओं पर ध्यान देते हैं –

  • बीमारी के सभी पहलुओं की जानकारी अथवा नए लक्षण, जिनसे दवा द्वारा बीमारी को रोकने अथवा उसके प्रकोप को कम करने पर काम किया जा सके।
  • दवा के मॉलिक्यूल पर कई तरह के परीक्षण, जिससे कि बीमारी जिसके लिए दवा का निर्माण किया जा रहा है, उसमें दवा से होने वाले फायदों को सुनिश्चित किया जा सके।
  • वर्तमान (दवा पर की जा रही शोध के समय) में किसी बीमारी के लिए उपलब्ध अन्य टीके और उनकी उपयोगिता।
  • उन्नत टेक्नोलॉजी जिसके माध्यम से शोध की जा रही दवा को शरीर के किसी विशेष हिस्से (मॉलिक्युलर स्तर) पर टारगेट करवाया जा सके, अथवा जेनेटिक मैटेरियल में बदलाव करवाया जा सके।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि टेस्टिंग के इस चरण की शुरुवात में हजारों कम्पाउंड से उम्मीद होती है कि टेस्टिंग में वे सफल साबित होंगे। लेकिन इस स्क्रीनिंग में सीमित कम्पाउंड अथवा मॉलिक्यूल ही उपयोगी साबित होते हैं और आगे के परीक्षण के लिए चुने जाते हैं।

निर्माण : किसी भी मॉलिक्यूल के टेस्टिंग में उपयोगी साबित होने के बाद शोधकर्ता अन्य एक्सपेरिमेंट करना शुरू करते हैं, यह जानने के लिए कि: 

  • यह मॉलिक्यूल शरीर में किस तरह से एब्जॉर्ब, डिस्ट्रीब्यूट, मेटाबोलाइज और निष्काषित होता है।
  • मॉलिक्यूल के संभावित फायदे और बीमारी में कारगर होने की विधि (मैकेनिज्म ऑफ़ एक्शन)।
  • संभावित कारगर खुराक (डोज) और रुट (दवा देने का माध्यम- टेबलेट/कैप्सूल/इंजेक्शन इत्यादि)
  • संभावित नुकसान (साइड इफेक्ट या टॉक्सिसिटी)
  • अलग-अलग पॉपुलेशन जिसमें उम्र, लिंग, जातीयता (एथनिसिटी) इत्यादि शामिल हैं, पर मॉलिक्यूल के संभावित असर
  • अन्य दवाओं के साथ मॉलिक्यूल का असर (ड्रग इंटरैक्शन)
  • अन्य उपलब्ध दवाओं की तुलना में मॉलिक्यूल से बीमारी में होने वाले फायदे

स्टेप 2: प्री-क्लीनिकल रिसर्च

मानव परीक्षण से पहले शोधकर्ता यह जानना चाहते हैं कि जो मॉलिक्यूल टेस्टिंग में है, क्या उससे किसी भी प्रकार के नुकसान (टॉक्सिसिटी) होनी संभव हैं? प्री-क्लीनिकल रिसर्च दो तरह से संचालित की जाती है।

  • इन- विट्रो: सजीव शरीर में न होकर किसी वैज्ञानिक उपकरण (जैसे कि टेस्ट ट्यूब या पेट्री डिश) में होने वाली जैविक प्रक्रिया
  • इन-विवो: लैटिन में इन-विवो का अर्थ है ‘सजीव शरीर में’। दवा निर्माण में मुख्य रूप से इन-विवो स्टडी सजीव कोशिका, ऊतक या प्राणी (जानवर) में संचालित की जाती है।

प्री-क्लीनिकल रिसर्च की संरचना बहुत क्लिष्ठ या बड़ी नहीं होती है लेकिन यह डोजिंग और टॉक्सिसिटी पर जरूरी जानकारी प्रदान करती है। प्री-क्लीनिकल रिसर्च सुनिश्चित करती है कि मॉलिक्यूल मानव शरीर में परीक्षण के लिए सुरक्षित है।

स्टेप 3: क्लीनिकल रिसर्च

क्लीनिकल रिसर्च में मानव शरीर पर मॉलिक्यूल के ट्रायल किए जाते हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि यही वह चरण भी है, जिसकी शुरुआत से पहले ही मॉलिक्यूल पर काम कर रही फार्मा कंपनियाँ (स्पॉन्सर) ‘इंवेस्टीगेशनल न्यू ड्रग एप्लिकेशन’ के लिए रेगुलेटरी एजेंसी जैसे कि अमेरिका की ‘फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’ अथवा यूरोप की ‘ईएमए’ को आवेदन के लिए बाध्य होती हैं।

इस आवेदन में स्पॉन्सर को आवेदन की तिथि तक, मॉलिक्यूल से सम्बंधित सभी जानकारियाँ (पूरी पारदर्शिता के साथ) इन एजेंसियों से साझा करनी होती हैं। इसमें स्पॉन्सर चाहे तो ‘एफडीए या ईएमए’ से रिसर्च में सहयोग की माँग भी कर सकता है। बिना रेगुलेटरी एजेंसी की अनुमति के कोई भी स्पॉन्सर किसी भी दवा या टीके को बाजार में नहीं उतार सकता है।

क्लीनिकल रिसर्च में शोधकर्ता एक सेट स्टडी प्लान या ‘प्रोटोकॉल’ के तहत कार्य करते हैं जिसके कि चार प्रमुख पड़ाव हैं।

फेज 1:

  • स्टडी प्रतिभागी: 20-100 स्वस्थ प्रतिभागी अथवा प्रतिभागी जो उक्त बीमारी से ग्रसित हों।
  • स्टडी का अनुमानित समय: कुछ महीने
  • उद्देश्य: सेफटी और दवा/टीके की खुराक (डोज)
  • इस फेज से 70% दवाएँ/मॉलिक्यूल फेज 2 में प्रवेश कर पाती हैं।

फेज 2:

  • स्टडी प्रतिभागी: कई सौ प्रतिभागी, जो उक्त बीमारी से ग्रसित हों
  • स्टडी का अनुमानित समय: कुछ महीने से दो वर्ष 
  • उद्देश्य: प्रभावकारिता और साइड इफेक्ट
  • इस फेज से लगभग 33% दवाएँ/मॉलिक्यूल फेज 3 में प्रवेश कर पाती हैं।

फेज 3:

  • स्टडी प्रतिभागी: 300-3,000 प्रतिभागी, जो उक्त बीमारी से ग्रसित हों
  • स्टडी का अनुमानित समय: 1 वर्ष से 4 वर्ष 
  • उद्देश्य: प्रभावकारिता और साइड इफेक्ट की जाँच
  • यहाँ से 25-30% दवाएँ/मॉलिक्यूल फेज 4 में प्रवेश कर पाती हैं।

फेज 4:

  • स्टडी प्रतिभागी: कई हजार प्रतिभागी, जो उक्त बीमारी से ग्रसित हों
  • उद्देश्य: प्रभावकारिता और सुरक्षित इस्तेमाल

आईएनडी एप्लिकेशन के प्रथम औपचारिक आवेदन के 30 दिनों के भीतर रेगुलेटरी संस्था को अपना रिव्यू करना होता है। संतुष्टि पर रेगुलेटरी एजेंसी क्लीनिकल ट्रायल को अनुमति दे सकती है अथवा कुछ स्पष्टीकरण की माँग के साथ ट्रायल होल्ड भी करवा सकती है।

एजेंसी से अनुमति मिलने के पश्चात क्लीनिकल ट्रायल और रेगुलेटरी सँस्था को उसके रिजल्ट समयानुसार बताने का यह क्रम, ट्रायल के पूरे होने अथवा स्पॉन्सर द्वारा दवा/वैक्सीन की मार्केटिंग के आवेदन तक चलता रहता है।

यह स्पॉन्सर और क्लीनिकल रिसर्चर की जिम्मेदारी है कि वे रेगुलेटरी एजेंसी को बिना किसी हेराफेरी के, पारदर्शिता के साथ ट्रायल रिजल्ट दिखाए। साथ ही ट्रायल के प्रतिभागियों के स्वास्थ्य,अधिकारों और रेगुलेटरी एजेंसी के नियमों के तहत वित्तीय सहयोग को भी सुनिश्चित करें। सर्वविदित है कि रेगुलेटरी एजेंसी ट्रायल प्रतिभागियों के हितों के प्रति हमेशा से ही बेहद गंभीर रही हैं। 

स्टेप 4: रेगुलेटरी एजेंसी रिव्यू

उपरोक्त वर्णित तीन स्टेप्स के सफलतापूर्वक संपन्न हो जाने के बाद और हर स्टेप के बाकायदा डॉक्युमेंटेशन और साक्ष्यों के होने पर यदि फार्मा/रिसर्च कंपनी (स्पॉन्सर) को लगता है कि उक्त मॉलिक्यूल किसी बीमारी को ठीक करने में सक्षम और सुरक्षित है, तो वह रेगुलेटरी एजेंसी के समक्ष दवा अथवा वैक्सीन की ‘मार्केटिंग’ के लिये आवेदन कर सकता है।

एजेंसी द्वारा सभी उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों की गहन पड़ताल के उपरान्त ही दवा अथवा वैक्सीन के मार्केटिंग की अनुमति दी जाती है। एजेंसी यदि रिसर्च के तरीकों या परिणामों से संतुष्ट न हो तो स्पॉन्सर को इनमें संशोधन करने का सुझाव दे सकती है अथवा और अधिक जानकारी माँगने का अधिकार रखती है। स्पॉन्सर की जिम्मेदारी होती है कि रेगुलेटरी एजेंसी द्वारा उठाये गये प्रश्नों का विस्तार से उत्तर दे और किसी भी तरह की खामी का पूर्ण निवारण भी करे।

स्टेप 5: मार्केटिंग के उपरांत ड्रग सेफ्टी मॉनिटरिंग

किसी भी दवा/वैक्सीन के क्लीनिकल रिसर्च के बाद भी यह दावा नहीं किया जा सकता कि उसकी सभी क्षमताओं अथवा संभावित हानिकारक तत्वों के बारे में पूर्ण जानकारी हासिल की जा चुकी है। इसका एक मुख्य कारण है कि क्लीनिकल रिसर्च एक सीमित जनसँख्या, सीमित प्रकार के लोगों और सीमित समय में संचालित की जाती हैं।

इसलिए, मार्केटिंग की इजाजत मिलने के बाद भी किसी दवा/वैक्सीन की हमेशा ही (दवा की मार्केटिंग के बाद आजीवन) कुशल मेडिकल प्रोफेशनल्स द्वारा दवा के अन्य किसी भी हानिकारक प्रभाव को जाँचने और रोकने के प्रयास किए जाते हैं। इसमें दवा के पहले से ही ज्ञात नुकसानदेह कारकों की फ्रीक्वेंसी और सीवियरटी की भी निगरानी की जाती है।

साथ ही, एक अन्य पहलू यह भी है कि किसी अन्य बीमारी के लिए दवा की उपयोगिता अथवा किसी अन्य संभावित उपयोगिता जो कि अभी तक ज्ञात न हो, को जानने का प्रयास भी इस दौरान मेडिकल प्रोफेशनल करते रहते हैं।

पुनः, यह दवा निर्माता कंपनी की जिम्मेदारी है कि किसी भी प्रकार की नई जानकारी (लाभ अथवा हानिप्रद) को अपने रेगुलेटरी डॉक्युमेंट्स के माध्यम से उपयोगकर्ता और हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स को समय पर मुहैया करवाते रहें।

इस आर्टिकल को पढ़ने के उपरान्त आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक नई दवा के मूल सृजन से लेकर बनाने और बाजार तक उतारने तक कितने तकनीकी और महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। किन चुनौतियों से एक स्पॉन्सर या दवा निर्माता को गुजरना होता है और किस प्रकार इस पूरी प्रक्रिया के हर एक चरण में अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन सुनिश्चित करना होता है।

उम्मीद करते हैं कि जल्द ही आम-जन मानस के लिए कोविड-19 का सफल और असरदार टीका उपलब्ध हो सकेगा और जन-जीवन पहले की तरह ही सामान्य हो सकेगा।

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