Monday, September 21, 2020
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लिप्सटिक नारीवाद: सिंदूर पोंछ दो, चूड़ियाँ तोड़ दो, साड़ियाँ खोल लो, ब्रा उतार दो

नारी को समझो, तब नारीवाद को समझ पाओगे। उसकी बेहतरी शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता में है। शिक्षित होने से विवेक आता है। विवेक कभी नहीं कहता कि साड़ी नहीं पहनने से, सिंदूर पोंछ लेने से समानता मिल जाएगी। समानता पाने की एक प्रक्रिया है, ऑन ऑफ़ स्विच नहीं।

बेगूसराय (या बिहार-यूपी) के कपड़ों की दुकान से जब आप कपड़े लेकर निकलेंगे तो आपको जिस पन्नी (पॉली बैग) में कपड़ा दिया गया है, उसके ऊपर बड़े शब्दों में लिखा रहता है: फ़ैशन के दौर में गारंटी की इच्छा ना करें। हमारे तरफ के लोग छोटा वाला एस्टेरिक या स्टार मार्क लगाकर छुपाकर नहीं लिखते: कन्डीशन्स अप्लाय। पूरा फ़्रंट में, बढ़िया से लिखा होता है कि भाई कितना का भी कपड़ा लो, गारंटी नहीं है।

इसी तरह का फ़ैशनेबल कॉस्मेटिक्स एक ‘वाद’ पर आजकल चढ़ाया जाता है। इसको लिपस्टिक नारीवाद कहते हैं। ये नारीवाद तभी तक रहता है जब तक आपका चमचमाता, फ़्लेवर वाला लिप्सटिक रहता है। आजकल ऐसे नारीवादी बहुतायत में मिल जाएँगे।

इनका ज्ञान तो छिछला है ही, साथ ही इनकी समझ भी वैसी ही छिछली है। इनके तर्क नारीवादी ना होकर पुरुष-विरोधी होते हैं। यहीं सबसे बड़ी समस्या है। आप एक को जिताने के लिए, दूसरे को मार डालना चाह रहे हैं। इसकी कोई जरूरत नहीं है। लड़कियों या महिलाओं की बेहतरी के लिए उनकी आर्थिक स्वतंत्रता, शिक्षा और सामाजिक स्थिति की बेहतरी ज़रूरी है ना कि इस बात कि आप कह रहे हैं ‘सिंदूर पोंछ दो, चूड़ियाँ तोड़ दो, साड़ियाँ खोल लो, ब्रा उतार दो’।

ये वैचारिक खोखलापन है। इसको कई लोग कन्डिशनिंग कहते हैं। कन्डिशनिंग हर स्तर पर है समाज में। हम घर बनाकर क्यों रहते हैं? हम पूजा क्यों करते हैं? हम कपड़े क्यों पहनते हैं? हम टाई क्यों लगाते हैं? हम बर्गर क्यों खाने लगे हैं? हम हॉलीवुड की फ़िल्में क्यों देखते हैं? हम जीन्स क्यों पहनते हैं? हम माँ-बाप के पैर क्यों छूते हैं? हम राखी क्यों बँधवाते हैं? हम स्कूल में किसी और से क्यों पढ़ते हैं?

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मुझे नहीं लगता कि आपके सिंदूर पोंछ देने से, चूड़ियाँ तोड़ देने से, साड़ियाँ खोल लेने से, ब्रा उतार देने से नारीवाद आ जाएगा। क्योंकि वो दिक़्क़त नहीं है। पता कीजिए कि बीस साल से कम उम्र की कितनी लड़कियाँ सिंदूर लगाती हैं। पता कीजिए कि क्या मुस्लिम, ईसाई आदि धर्म की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं? पता कीजिए साड़ी नहीं पहनने वाली पंजाब-हिमांचल की औरतें स्वतंत्र हैं! पता कीजिए बिहार के गाँवों की औरतें जो ब्रा नहीं पहनती स्वतंत्र हैं?

कन्डिशनिंग तो आपकी भी हो गई है कि आपको लगता है कि हर वो चिह्न जो आपकी समझ से बाहर है, वो पितृसत्ता का परिचायक है। आपको सिंदूर मत लगाना है मत लगाईए, लेकिन ये मान लेना कि लोग एक कंडिशनिंग के कारण ऐसा करते हैं, मूर्खता है।

लिप्सटिक नारीवादियों को ये लगता है कि गाँव में खाना बनाती हर औरत पितृसत्ता का शिकार है। घर सँभालना किसी भी आठ घंटे वाली नौकरी से कठिन काम है। अगर मेरी माँ घर सँभालती है तो ये कन्डिशनिंग कैसे हो गई? और मैं जानता हूँ कि मेरी पाँचवीं पास माँ, जिसकी शादी तेरह साल में हो गई थी, वो दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ी अधिकांश लड़कियों से ज्यादा खुले विचारों वाली स्वतंत्र महिला है। 

अगर सब नौकरी करने लगें तो घर कौन सँभालेगा? नौकर? अब नौकर समाज में किस आर्थिक स्तर का व्यक्ति होगा? दलित, निचली जाति का? और आप लिपस्टिक नारीवादी होने के साथ दलित चिंतक भी हैं तो बताईए भला कि कोई और मेरा खाना क्यों बनाएगा? वहाँ आपको दिक़्क़त हैं कि नहीं? आपको ये क्यों लगता है कि खाना बनाना एक हेय कार्य है?

आप तो इस हद तक जाओगे कहने कि औरतें बच्चे क्यों जने? सही बात है, वो अंडे निकाल ले, मर्द शुक्राणु दे दें और फिर प्रयोगशालाओं में बच्चे पैदा हों, अपने आप पलें (क्योंकि बाकी लोग तो काम करेंगे ना) ताकि बचपन से ही आत्मनिर्भर बनें। है कि नहीं? क्या कहा? दाई रख लें? यहाँ पर दलित चिंतन अप्लाय होगा या नहीं? या मर्द से शुक्राणु क्यों लें, हम बंदर से लेंगे, बिल्ली से लेंगे, शेर से लेंगे… है कि नहीं?

कन्डिशनिंग क्या है मैं बताता हूँ। कन्डिशनिंग है आपका वही पढ़ना, और सुनना जो आपको अच्छा लगता है। फिर आपके विचार वैसे ही विकसित होते हैं। ये बंद हो जाना होता है। आपको फ़ौरन नारीवादी बनना है तो आपको जो भी औरत अभी के समाज में कर रही है, सबको बिना किसी तर्क के गरियाना शुरू करना चाहिए। 

लड़कियाँ पढ़ रही हैं। वो साड़ी भी पहनती है, ब्रा भी, सिंदूर भी लगाती है और मन करे तो चूड़ियाँ भी। आप फेसबुक पर बैठे-बैठे ज्ञान देते रहिए और गाँवों की सासें और मर्द अपने घरों में नई बहू को जीन्स भी पहनने को कह रहे हैं, पल्लू ना डाले ये भी कह रहे हैं क्योंकि अब वो ये स्वीकारने लगे हैं कि सबको ये करने में सहजता नहीं है।

लोगों ने समझना शुरू कर दिया है कि ये ज़रूरी नहीं है। स्त्रियों को सताना तब तक जारी रहेगा जब तक आप उसे पढ़ाते नहीं, नौकरी करने नहीं देते, या उसकी इच्छाओं का दमन सिर्फ इसलिए होता है कि वो लड़की है। लड़की पिछड़ती इसलिए नहीं कि उसे तो ब्रा पहनना होगा, उसे तो साड़ी पहननी होगी, चूड़ियाँ पहननी होगी… इस हिसाब से तो हर विधवा को स्वतंत्र होना चाहिए!

मेरी दादी ने, जिसके पति पैंतीस साल में छः बच्चों, और मात्र छः बीघा ज़मीन, जमीन के साथ छोड़कर परलोक सिधार गए, अपने सारे बच्चों को पढ़ाने की कोशिश की और इस लायक बनाया कि वो अपनी जिंदगी में जहाँ जाएँ, बेहतर करें। क्या वो विधवा थी इसलिए ऐसा हो गया? जी नहीं, उसकी सोच थी कि पढ़ लिखकर आदमी सही जगह पहुँच सकता है। हमारे पिताजी को लगा कि घर कौन देखेगा तो सातवीं का बोर्ड दिए बग़ैर खेती में लग गए। 

पूरे घर की तरक़्क़ी का कारण दो महिलाएँ हैं, मेरी दादी और मेरी माँ। क्या इन दोनों की कंडिशनिंग नहीं हुई थी? आज की लिपस्टिक नारीवादी के लिए मैचिंग जूती, जीन्स, लिपस्टिक, इयररिंग, शेड्स, बैग ठीक है, लेकिन गाँव की स्त्री का बिन्दी लगाना पितृसत्तात्मक समाज का प्रतीक है! मतलब तुम्हारा फ़ैशन, फ़ैशन, लेकिन इनकी बिन्दी, सिंदूर, लोहरंगा, ठोररंगा, साड़ी, चूड़ियाँ ग़ुलामी का प्रतीक! 

तुम क्यों इतना मैचिंग के चक्कर में हो! किसके लिए? और वो क्यों शृंगार करती है, किसके लिए? उसकी इच्छाएँ, तुम्हारी इच्छाओं से कमतर कैसे हैं? क्या वो कंडिशनिंग है तो तुम्हारा मैचिंग हैंडबैग कंडिशनिंग कैसे नहीं है? 

क्या पूरे नारीवाद का विमर्श अब इतने पर आकर गिर गया है कि कोई सिंदूर क्यों लगाती है, बिंदी क्यों चिपकाती है, ब्रा क्यों पहनती है? 

कंडिशनिंग उनसे ज्यादा तुम्हारी हो गई है क्योंकि तुम बंद डिब्बे से बाहर सोच नहीं पाते। तुम्हें स्वतंत्रता क्या है और वो कैसे किसी को सशक्त करता है, इसका भान नहीं है। तुम्हें ये पता नहीं है कि एक औरत के अपनी रीढ़ पर सीधे खड़े होने के लिए सिंदूर-बिन्दी त्यागने से ज्यादा ज़रूरी है शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता। 

हर उस औरत को पति की तरफ से घर सँभालने हेतु पैसा मिलना चाहिए। सरकारों को ये नियम बनाना चाहिए कि उनके पति, बच्चे उनकी सेवा (बच्चों को पालना, खाना बनाना, घर की देखरेख) के लिए एक नियमित वेतन दें। अब वो वेतन वो फिर से अपने बच्चों पर खर्च करे, घर के टूटे हिस्से को ठीक करवाने में करे, ये उसकी मर्ज़ी।

ये स्वीपिंग जेनरलाइजेशन बंद होना चाहिए कि हर औरत जो सिंदूर लगा रही है वो दवाब में है। शादी मत करो अगर सिंदूर नहीं लगाना है तो। या शादी करो, और मत लगाओ अगर तुम्हें दिक़्क़त है तो। तुम ये क्यों सोचते हो कि जिसने लगाया है वो गुलाम है, कंडिशनिंग हो गई है उसकी? कंडिशनिंग तुम्हारी हो गई है कि नारीवाद पर लिखना हो तो ऐसे ही लिखा जाए। 

घूम फिर कर दस से बारह चीज़ें है तुम्हारे नारीवाद के बस्ते में: सिंदूर, ब्रा, चूड़ियाँ, साड़ी, शादी की संस्था, फ़्री सेक्स की आज़ादी का ना होना, कईयों से सेक्स करने की आज़ादी ना होना, लड़कियों का जो मन हो वो करें… इत्यादि। कुछ और होंगे जो तुम ख़ुद जोड़ लोगे।

इस सोच से बाहर निकलो। नारी को समझो, तब नारीवाद को समझ पाओगे। उसकी बेहतरी शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता में है। पढ़ाओगे तो वो समाज को समझेगी, उसे लगेगा कि लड़के-लड़की का भेदभाव गलत है। शिक्षित होने से विवेक आता है, और विवेक तुम्हें अच्छे और बुरे का फर्क सिखाता है। विवेक कभी नहीं कहता कि साड़ी नहीं पहनने से, सिंदूर पोंछ लेने से समानता मिल जाएगी। समानता पाने की एक प्रक्रिया है, ऑन ऑफ़ स्विच नहीं। 

क्योंकि सिंदूर का नारीवाद से कोई लेना-देना नहीं है। सिंदूर लगाती कई नारीवादियों को मैं जानता हूँ, और हाँ वो ब्रा भी पहनती हैं। 

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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