Thursday, April 2, 2020
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ट्रेन की एक सीट पर हिंदू देवी-देवता को जगह देना एहसान नहीं… यह होना चाहिए, यही वक्त की माँग है

तीर्थ संबंधी इस ट्रेन के लिए IRCTC को निश्चित तौर पर एक सीट भगवान शिव के लिए रिजर्व रखनी चाहिए। और क्यों नहीं? क्योंकि इसी देश में कभी चर्च को तो कभी मौलवियों को सरकारी प्रश्रय मिलता रहा है, राज्य सरकारें यह खेल खेलती रही हैं।

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काशी महाकाल एक्सप्रेस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हरी झंडी दिखाई जाने के बाद कई तथाकथित सेकुलरों में कुलबुलाहट है। ओवैसी जैसे कट्टरपंथी नेता इस ट्रेन की एक सीट पर शिव भगवान का मंदिर स्थापित किए जाने को लेकर नाराज हैं। साथ ही संविधान की प्रस्तावना ट्वीट करके पीएम मोदी का ध्यान इस बात पर केंद्रित करवा रहे हैं कि जब संविधान में सभी धर्मों को बराबर रूप से समानता है तो फिर ट्रेन में भगवान के लिए अलग से जगह क्यों? हालाँकि IRCTC ने स्पष्ट कर दिया है कि भगवान शिव के लिए कोई भी सीट रिजर्व नहीं है। फिर भी अब ओवैसी की तरह सोशल मीडिया पर भी कई यूजर इस मामले पर सवाल उठा रहे हैं और इस फैसले को मोदी सरकार द्वारा भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने की ओर एक कदम कह रहे हैं।

अब प्रश्न है कि क्या वाकई तीर्थ स्थानों को एक दूसरे से जोड़ने वाली एक्सप्रेस ट्रेन में हिंदू देवी-देवताओं को एक सीट पर स्थान देने से किसी अन्य धर्म को ठेस पहुँच रही है या फिर क्या सच में इस एक कदम से किसी समुदाय को नीचा दर्शाने का प्रयास हो रहा है?

तो, जरा इन बिंदुओं पर गौर डालिए और समझिए कि ट्रेन में देवी-देवताओं के लिए मंदिर की स्थापना का ये पहला वाकया है। जिसको देखकर ये तथाकथित सेकुलर लोग आहत हो गए हैं। लेकिन यहाँ बता दें शिव भगवान की प्रतिमा की स्थापना एक ऐसे ट्रेन में की गई है, जो हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों को एक साथ जोड़ रही है न कि किसी सामान्य ट्रेन में।

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मगर, संविधान की उलाहना देने वालों के लिए इस बिंदु का कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे लोग तब कभी सवाल करते नहीं देखे जाते कि आखिर क्यों धार्मिक भावना को ठेस न पहुँचाए जाने के नाम पर पटरियों पर नमाज पढ़ने वालों को बर्दाशत किया जाता है। क्यों राज्य सरकारें एक धर्म विशेष को अल्पसंख्यक श्रेणी में रखकर बढ़ावा देती है? क्यों कभी इनके ख़िलाफ़ एक्शन नहीं लिया जाता और लिया जाता भी है तो उसके राजनीतिक पहलूओं को ध्यान में रखा जाता है?

आज तक देश के तथाकथित सेकुलरिज्म को संरक्षित करने के लिए कई राज्यों में ईसाई धर्म और इस्लाम मजहब को बढ़ावा दिया जाता रहा है। लेकिन कभी किसी ने इस पर सवाल नहीं उठाए। मगर एक हिंदू देवता को ट्रेन की एक सीट पर जगह क्या दी गई, सबने संविधान की तस्वीरें अपलोड करनी शुरू कर दीं। मेरे विचार से तीर्थ संबंधी इस ट्रेन के लिए IRCTC को निश्चित तौर पर एक सीट भगवान शिव के लिए रिजर्व रखनी चाहिए। और क्यों नहीं? क्योंकि इसी देश की पिछले साल की कुछ खबरों पर नजर डालिए और अनुमान लगाइए क्या इन सबके बीच कभी हिंदुओं के लिए कुछ हुआ?

  • तेलंगाना सरकार ने पिछले साल केवल क्रिसमस मनाने के लिए 200 चर्चों को एक-एक लाख रुपए दिए। वहीं कर्नाटक सरकार भी समय समय पर चर्च पर करोड़ों खर्च करती रही।
  • जगन मोहन रेड्डी ने पिछले साल ही अपने राज्य में पादरियों को हर महीने 5000 रुपए देने की घोषणा की। हालाँकि भाजपा ने इसे हिंदुओं के ख़िलाफ भी बताया। लेकिन जगन मोहन रेड्डी इस पर कायम रहे।
  • इसके अलावा देश की राजधानी में खुलेआम एक विशेष मजहब को ध्यान में रखते हुए मौलवियों की पगार निर्धारित हुई। लेकिन हिंदू मंदिर के पंडितों पर हमेशा निशाना साधा जाता रहा।

इसके अलावा कई ऐसी खबरें आई। लेकिन कभी इन पर किसी ने प्रश्नचिह्न नहीं लगाया। बहुसंख्यक कह-कहकर हिंदुओं को, उनकी प्रथाओं को, उनसे जुड़ी सभ्यताओं को दबा डालने का जैसे एक दौर चल पड़ा है। जिसमें उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष होने का सीधा पर्याय केवल हिंदू विरोधी होना परिभाषित कर दिया गया है।

विचार करिए, आज देशभर के बड़े हिंदू मंदिरों में चढ़ावे का करोड़ों रुपया रोज़ सरकारी ख़ज़ाने में जाता है। इसका बड़ा हिस्सा मस्जिदों और चर्च को दिया जाता है। राज्यों के धर्मार्थ विभाग कमाते तो मंदिरों से हैं, लेकिन उससे हज हाउस बनवाते हैं। ये वही पैसा है, जिससे मस्जिदों के इमामों को सैलरी दी जाती है। अगर उस करोड़ों की कमाई के बदले में सरकार किसी हिंदू देवी-देवता को ट्रेन में एक सीट दे रही है तो एहसान नहीं कर रही।

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