Saturday, September 26, 2020
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जिस डॉक्टर ने कोरोना के बारे में सबसे पहले बताया, उसे ही चीन ने प्रताड़ित किया: करनी वामपंथियों की, भुगत रही पूरी दुनिया

चीन ने कोविड-2019 के बारे में पहली बार जानकारी देने वाले डॉक्टर डी वेनलियांग को बहुत प्रताड़ित किया और उसे सामाजिक शांति भंग करने का दोषी करार कर दियाl हालाँकि, उस डॉक्टर की कोरोना से ही मौत हो गई? लेकिन चाइना ने जिस ऐतिहासिक गलती को पुनः दोहराया उसकी कीमत आज पूरी मानव सभ्यता चुका रही है l

कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को अपने गिरफ्त में ले लिया है l इसने अभी तक पूरी दुनिया में 381,462 लोगों को संक्रमित किया है और 16,550 लोगों की जान ले ली है। 101,069 लोग इससे पूर्णतया स्वस्थ हो गए हैं l 3 मार्च को विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा जारी एक आँकड़े के अनुसार इस रोग की मृत्युदर 3.8 प्रतिशत हैl इस वायरस के संक्रमण में आए 70 या उससे अधिक उम्र के व्यक्तियों की मृत्युदर सबसे ज्यादा हैl यह मृत्युदर विशेष कर उन परिस्थियों में ज्यादा होता है जब संक्रमित व्यक्ति क्रमशः ह्रदय रोग, डायबिटीज, श्वांस संबधी गंभीर रोग, हायपरटेंशन और कैंसर के मरीज होंl ऐसा संक्रमित व्यक्ति जो कि उपरोक्त रोगों से कभी भी पीड़ित नहीं रहा है उसकी मृत्युदर अबतक के आँकड़ों के अनुसार मात्र 0.9 प्रतिशत मापी गई हैl भारत में अबतक इस विषाणु के 500 से अधिक सक्रीय संक्रमित मरीज हैं और इस विषाणु से भारत में अबतक 35 संक्रमित व्यक्ति स्वस्थ हो चुके हैं और 9 व्यक्तियों की मौत हो चुकी हैl 

क्या है कोरोना 

कोरोना एक (+) ssRNA एकरेशीय आर एन ए वायरस हैl इस विषाणु की खोज 1960 में ही हो गई थी, लेकिन इसके विभिन्न स्वरूपों की खोज आगे आने वाले दशकों में होते रहीl कोरोना वायरस की संक्रमण क्षमता का एहसास पहली बार वर्ष 2002 में हुआl यह संक्रमण दक्षिण चीन से शुरू होकर अमरीका, यूरोप और एशिया को अपनी जद में ले लिया थाl चूँकि, कोरोना वायरस श्वसन तंत्र को गंभीरतम क्षति पहुँचता है, अतः इसे सार्स (severe acute respiratory syndrome) कहा गया l यह रोग भी चीनी लोगों के हिमालयन पाम सिवेट (Himalayan Palm Civet) को खाने के कारण फैला थाl वैसे ही जैसे कोरोना चाइनीज लोगों के चमगादड़ खाने से फैलाl चीन के लोग जंगली जानवरों, कीड़े-मकोड़े, कुत्ते, बिल्ली, साँप और गीदड़ खाने के लिए पूरी दुनिया में कुख्यात हैं। इस विषाणु का नाम कोरोना इसलिए पड़ा क्योंकि इसकी आकृति यूरोप की प्रचलित मुकुटों की तरह मिलती जुलती है।  

सार्स 2002 और चाइनीज प्रोपगेंडा की कहानी 

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नवम्बर 2002 का महीना था चीन के गुवांगझू प्रान्त के दक्षिणपूर्वी भाग के शहर फूशान को एक अनजान रोग ने अपने गिरफ्त में ले लिया। इस अनजाने रोग के निशान फूशान शहर से होते हुए हूयान और झोंगशान शहर में मिलने लगे। दिसंबर के मध्य माह तक इस रोग को चीन के स्थानीय चिकित्सा विभाग ने गंभीरता से लेना शुरू कर दिया। जनवरी के पहले सप्ताह में चीन के स्वास्थ्य विभाग ने एक जाँच समिति को हूयान शहर भेजा और इस रोग के विषाणुजनित होने की पहचान हुई। जनवरी के अंतिम सप्ताह तक इस रोग पर चीन ने पूरी रिपोर्ट तैयार कर ली और इस रिपोर्ट को अत्यंत गोपनीय श्रेणी में रखा। इस रहस्यमयी बीमारी की रिपोर्ट बनकर जब तैयार हुई थी उस समय चीन में चीनी नववर्ष के उत्सव की तैयारी जोरों पर थी और पूरा सरकारी अमला नववर्ष की छुट्टियाँ मना रहा था। इसी बीच चीनी सरकार का वह काला कानून जिसमें किसी भी जीवाणु या विषाणु जनित रोग की जानकारी कोई भी स्वास्थ्य एजेंसी या कोई व्यक्ति संप्रभु रूप से बिना चीनी कम्युनिस्ट सरकार को बताए सार्वजानिक करने पर प्रतिबंधित है और इस नियम को भंग करने वाले को कठोरतम सजा का प्रावधान है l ऐसी स्थिति में स्थानीय सरकार को इस रहस्यमयी बीमारी की पूरी जानकारी होने के बावजूद चीनी कम्युनिस्ट सरकार के आला अधिकारियों के प्रतिक्रिया का इंतजार करती रह गई और इधर सार्स 2002 ने अपना कहर बरपाना जारी रखा।   

लोग लगातार बीमार पड़ रहे थे, वर्ष 2002 का चीनी नववर्ष की चमक फीकी पड़ गई और लोगों ने परेशान होकर रोग को लेकर अफवाह फैलाना शुरू कर दिया और सरकार को कोसने लगे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने 10 फरवरी को एक प्रेस रिलीज जारी कर इससे बचने के उपाय को सार्वजानिक किया। लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी थी और हजारों लोग इसके संक्रमण में आ गए। 11 फरवरी को चाइनीज सरकार ने अपना मौन तोड़ते हुए एक प्रेस वार्ता के जरिए इस रोग के सन्दर्भ में लोगों को बताया कि यह एक विषाणुजनित रोग है जिसकी कोई दवा उपलब्ध नहीं है। इस बीच दुनिया भर में चीन की बदनामी ना हो, इसलिए चीनी कम्युनिस्ट सरकार ने अप्रैल महीने तक इस बीमारी के बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी सीमित जानकारी ही दी और इस बीमारी की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को मुँह बंद रखने की हिदायत दी। रिपोर्ट की अति गोपनीयता और वैश्विक जगत को इस रोग से अनभिग्य रखना सरकार को इतना भारी पड़ा कि वह इस रोग के सन्दर्भ में आधी-अधूरी जानकारी ही जमा कर पाई। रोग के प्रकृति की व्यवस्थित पहचान न होने के कारण अकेले चीन के गुवांगझू प्रान्त में ही 900 स्वास्थ कर्मी इस रोग से प्रभावित हो गए थे। इधर ये रोग चीन से चलकर कनाडा पहुँच गया और उधर चाइनीज कम्युनिस्ट सरकार को अपने पार्टी प्रोपगंडा की पड़ी थी। रोगों को लेकर कम्युनिस्ट सरकार की गोपनीयता और कम्युनिस्ट प्रोपगंडा ने पूरी दुनिया में चाइना को एक fragmented authoritarian state के रूप में कुख्यात कर दिया l 

राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर थू-थू होने पर चीनी कम्युनिस्ट सरकार अप्रैल में इस गंभीर बीमारी को लेकर जागरूक हुआ। चीन को ऐसा लग रहा था कि ख़बरों को दबाने से रोग भी दब जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ थियानमेन चौक पर लोकतंत्र समर्थकों के नरसंहार के बाद उपजे हालातों के बाद सार्स (SARS) चीन के लिए सबसे बड़ा सामाजिक-आर्थिक चुनौती बन गया था। 17 अप्रैल 2002 को चीनी कम्युनिस्ट पोलित ब्यूरो ने सार्स 2002 को लेकर एक मीटिंग की और इससे लड़ने के लिए व्यापक रूप-रेखा बनाई। इस बैठक के बाद सरकार ने अपनी नाकामी का ठीकरा अपने कई मंत्रियों पर फोड़ते हुए उन्हें पदच्युत कर दिया। साथ ही इस रोग से लड़ने के लिए चाइना की माओवादी सरकार ने “Patriotic Hygiene Campaign” चलाया और लाखों माओवादियों को घर और सड़कों की साफ-सफाई के लिए लगा दिया। हालाँकि, जबतक चीन की सड़कों पर माओवादी उतरकर मोर्चा संभालते तबतक कम्युनिस्ट सरकार की विश्वसनीयता बहुत कम हो गई थी। बाद में चीन ने इस घटना से कुछ सबक भी लिया जब उसने अप्रैल के अंतिम सप्ताह में एक चाइनीज सबमरीन के दुर्घटना की खबर को बिना छुपाए सार्वजानिक कर दिया।  

लेकिन यह सबक चीन के सामूहिक याददाश्त में तबतक ही जिन्दा रहा जबतक कि वह एक आर्थिक ताकत नहीं बन गया। एक बार पुनः वैश्विक पहचान प्राप्त करने के बाद चीन फिर से अहंकारी हो गया। और इसी अहंकार के दोहराव के चलते चीन ने कोविड-2019 के बारे में पहली बार जानकारी देने वाले डॉक्टर डी वेनलियांग को बहुत प्रताड़ित किया और उसे सामाजिक शांति भंग करने का दोषी करार कर दियाl हालाँकि उस डॉक्टर की कोरोना से मौत हो गई? लेकिन चाइना ने जिस ऐतिहासिक गलती को पुनः दोहराया उसकी कीमत आज पूरी मानव सभ्यता चुका रही है l आज चीन के लोग डॉ डी. वेनलियांग की समाधि पर फूल चढ़ा रहे हैं। और जो लोग वुहान जाकर उसकी समाधी पर फूल नहीं चढ़ा पा रहे हैं, वो डॉ वेंलियांग के सोशल मिडिया अकाउंट पर अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं, और अबतक कुल दो लाख से अधिक लोगों ने उनके अकाउंट पर प्रतिक्रिया देकर अपनी श्रधांजलि व्यक्त कर चुके हैं। आज अगर चीन अपनी गलतियों से सीखा होता और वहाँ लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा और प्रेस को स्वन्त्रता होती तो शायद नवम्बर में ही इस रोग से दुनियाँ आगाह हो गया होता और सभ्यता पर ऐसे संकटों के बादल नहीं छाते।  

कांस्पीरेसी थ्योरी और राजनीति 

चीन में चाइनीज लोगों के चमगादड़ खाने से फैले रोग को अमरीकी कांस्पीरेसी करार देने की कोशिश की गई। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। वायरस के जैविक तत्वों का अध्ययन और इसके प्रसार के तरीके को देखते हुए इसे चीन के वुहान शहर से ही उत्पन्न रोग माना गया है। चूँकि, सार्स 2002 पर चाइना ने घृणित अंकुश लगाया था इसलिए पूरी दुनिया चीन के लोगों से दूरी बनाने लगी। और उसे प्रताड़ित करने लगी। बेशक इस रोग के लिए डायस्पोरा चाइनीज जिम्मेदार नहीं थे लेकिन सामाजिक पूर्वाग्रह ने चीन या उसके तरह दिखने वाले लोगों को कोरोना वायरस कहकर उनके प्रति खूब घृणा बाँटने का काम किया। हालाँकि, इससे निपटने के और भी कई उपाय थे लेकिन इटली जहाँ कि सबसे ज्यादा चाइनीज टूरिस्ट जाते हैं, वहाँ के एक सनकी वामपंथी ने ‘हग अ चाइनीज’ (एक चाइनीज को गले लगाओ) कैम्पेन चलाया। हालाँकि, चाइनीज को गले लगाने में कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन उस सनकी इटालियन वामपंथी ने ऐसे समय चाइनीज लोगों को गले लगाया जबकि यह ज्ञात हो गया था कि कोरोना संपर्क से होने वाली बीमारी है। उस समय चाइनीज ही क्या इटालियन, जर्मन, फ्रेंच या अमरीकी जिसे भी कोई संक्रमित व्यक्ति गले लगता उनको संक्रमण होना तय था।

आज एक वामपंथी सनक का सबब पूरी दुनिया देख रही है। एक राजनीति तो इसके नाम पर भी चल रही है लोग यह कह रहे हैं कि जब जापानी इन्सेफेलाईटिस, जो कि जापान के नाम पर है तो कोरोना वायरस को चाइनीज वायरस क्यों नहीं कह सकते हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने तो इसे चाइनिज वायरस कहकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। अभी भी भारत के गाँवों में इसे चाइनीज वायरस ही कहते हैं लेकिन इससे भारत के विभिन्न हिस्सों में रह रहे उत्तर-पूर्व के लोगों के प्रताड़ित होने की खबर आ रही है। हालाँकि, भारतीय हितों को ध्यान में रखते हुए इस शब्द का इस्तेमाल ठीक नहीं है। लेकिन वैश्विक स्तर पर इसने चीन के लोगों की नस्लीय पहचान पर एक दाग लगा दिया है। जिसकी जिम्मेदार वहाँ की जनता नहीं बल्कि एक बेरहम कम्युनिस्ट सरकार है।

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