Monday, October 26, 2020
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क्या आप बहन-बीवी के लिए चाय बनाए हैं, बर्तन धोए हैं? नहीं… तो वेद के ये 4 श्लोक पढ़ डालिए अभी

1. “सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव। ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु।।“ 2. “अमोऽहमस्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहम्। सामाहमस्मि ऋक् त्वम्….।” 3. “ते सन्तु जरदष्टय: सं प्रियौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौ।“

महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर छोटे-मोटे ध्यानाकर्षक हैश टैग्स चलाकर ही हम किसी बड़े अभियान जैसा संतोष हासिल कर लेते हैं और ख़ुशफ़हमी में जी लेते हैं। इसलिए कभी-कभी हमें #MeToo जैसे चलन ही बहुत बड़ी मुहिम लगने लगते हैं। लेकिन बिना किसी औपचारिकता के एक बात कहूँ तो मुझे लगता है कि न तो ये बहुत बड़ी बात है, न ही एक्सक्लूसिवली महिला होने के नाते सुरक्षा हासिल करने के बारे में है क्योंकि हर ज़िंदा चीज़ को सुरक्षित रहने का अधिकार है और महिलाएँ उनमें से ही हैं। पशु, पक्षी, इंसान सबको सुरक्षित रहना चाहिए। जहाँ तक इस अभियान के बड़ा अभियान होने की बात है, तो शायद ये उतना ही बड़ा है जितना उस बच्चे का कक्षा में नीचे से प्रथम आना बड़ा है, जो कभी स्कूल गया ही नहीं। अब शिक्षा के उपयुक्त अवसर प्राप्त न करने वाला बच्चा बस किसी तरह उत्तीर्ण ही हो जाए, यही बहुत बड़ी बात होती है। उसके अव्वल दर्जे वाले अंक प्राप्त करने की बात तो सोचना ही बेमानी है। बस वो पास हो जाए इतना ही काफी है। ऐसी ही स्थिति महिलाओं की है, सुरक्षित है इतना काफी है। बच्चा पास तो हुआ चाहे प्रथम न आया हो, चलेगा।

क्या हम कभी सोचते हैं वो कौन सी बातें हैं जो अभी भी उसे अग्रणी बनने की स्थिति से दूर रखती हैं? कुछ प्रबुद्ध और संवेदनशील लोगों को छोड़ दें तो अधिकांश रूप में सब जगह महिलाओं के साथ वही पूर्वग्रहों वाला रवैया देखने को मिलता है। महिलाओं को उतनी ही सहजता से हर जगह स्वीकार नहीं किया जाता, जितनी सहजता से पुरुषों को किया जाता है। अगर वो कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर लें तो यह एक आश्चर्य का विषय होता है। अधीनस्थ कर्मचारी अपनी बॉस की इसलिए आसानी से अवहेलना करते हैं क्योंकि वो एक महिला है और प्राय: उनको अपनी धाक ज़माने के लिए अतिरिक्त कठोरता का प्रदर्शन करना पड़ता है, चाहे वो उनके व्यक्तित्व से मेल खाता हो या नहीं। अगर पुरुष भद्दा मज़ाक भी करें तो उसको सेलिब्रेट किया जाता है जबकि महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वो इससे दूर ही रहें। कोई महिला सभ्य-सुशील अंदाज़ में भी हास-परिहास करे तो भी कोई गारंटी नहीं कि लोग उसका उतनी ही सहजता से आनंद लें, जितना पुरुषों की मज़ाक से लिया जाता है। पहले इस बात पर ध्यान जाएगा कि ये जोक एक लड़की की तरफ़ से आया है।

एडवेंचर, शिक्षा के समान अवसर? रुकिए कहीं आप महिला तो नहीं हैं? घर में भाई-बहन की परवरिश के बीच होने वाला फ़र्क कितना स्पष्ट है। पुरुषों की तरह से ही दिन भर परिश्रम करके शाम को घर लौटने के बाद घर के सभी कामों की ज़िम्मेदारी केवल महिलाओं की होती है,जबकि बहुत-सी महिलाएँ अपने पतियों के कामों में अक्सर हाथ बँटाती हैं लेकिन बदले में उन्हें वैसा सहयोग नहीं मिलता। ऐसी कितनी ही और अनचाही बातें हैं जो अगर समाप्त हो जाएँ तो हम सोच सकते हैं कि हाँ अब ये बच्चा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण हुआ है।

पति परमेश्वर जैसी अवधारणाएँ पता नहीं कब और कैसे पैदा हो गईं। शायद इसी के चलते कई लोगों के व्यवहार को देख कर ऐसा लगता है जैसे उनकी पत्नी उनकी पत्नी न होकर उनकी सेविका हो जबकि वेद में पत्नी को घर की साम्राज्ञी कहा है- “सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव। ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु।।“ मैंने ऋषि दयानंदकृत संस्कारविधि के विवाह और गृहस्थाश्रम प्रकरण से संबंधित वेद मंत्रों को ध्यान से देखा तो कुछ ही मंत्रों को पढ़कर बात स्पष्ट हो गई। वहाँ पढ़े गए मंत्रों में वर और वधू से समान प्रतिज्ञाएँ कराई गई हैं। किसी को किसी पर वरीयता नहीं दी गई है- “अमोऽहमस्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहम्। सामाहमस्मि ऋक् त्वम्….।” और अंततः सब कुछ इस बात पर टिका है कि दोनों एक दूसरे का कितना सम्मान कर पाते हैं और कितना एक दूसरे की भावनाओं का ख्याल रख पाते हैं, उनका परस्पर कितना प्रेमपूर्ण व्यवहार है- “ते सन्तु जरदष्टय: सं प्रियौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौ।“ यह तो सिर्फ़ विवाह प्रकरण के मंत्रों की बात है, जिनको मैंने यह बताने के लिए यहाँ वर्णित किया है कि जहाँ स्वाभाविक रूप से संसार भर के सभी पुरुष अपनी पत्नियों पर अतिरिक्त अधिकार होने की बात करते हैं, वहाँ वेद इस विषय में क्या कहते हैं।

इसके अतिरिक्त वेदों में महिलाओं की स्थिति के विषय में जो मंत्र हैं, अगर आप उनको पढ़ेंगे तो महसूस करेंगे कि महिलाओं को वहाँ बहुत अधिक सम्मानजनक दर्जा प्राप्त है। ये बहुत ही राहत की बात है कि संसार के सबसे प्राचीन ज्ञान-भंडार वेद महिलाओं को इतना सशक्त, उदात्त और स्वीकार्य स्थान प्रदान करते हैं कि दुनिया की कोई भी तथाकथित आधुनिक और विकसित सभ्यताएँ उसके बारे में सोच भी नहीं सकती।

एक-दो वर्ष पहले लेडी गागा ने Women in Hollywood नामक आयोजन में पावरफुल सूट पहनकर अपनी पावरफुल स्पीच में कहा- “As a sexual assault survivor by someone in the entertainment industry, as a woman who is still not brave enough to say his name, as a woman who lives with chronic pain, as a woman who was conditioned at a very young age to listen to what men told me to do, I decided today I wanted to take the power back. Today I wear the pants.“ सारी दुनिया में महिलाओं के साथ यही दुर्घटना घटती रहती है। ये सब जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात है और कुछ नहीं। और सच तो ये है कि यदि महिलाओं का शारीरिक सामर्थ्य पुरुषों से अधिक हुआ करता तो वो भी ऐसा ही करतीं। Power corrupts, absolute power corrupts absolutely.

इसलिए सोचने वाली बात ये है कि सब को अपने अंदर मानवीय दृष्टिकोण पैदा करना चाहिए और सचमुच अपने शिक्षित होने का परिचय देना चाहिए न कि एक दूसरे से अधिक दबंग होने का,चाहे वो महिला हो या पुरूष। जंगली पशु इंसानों पर इसलिए हमला नहीं करते कि वो इंसानों से अधिक शिक्षित हैं या आक्रमण की अच्छी योजना बना सकते हैं बल्कि उनका इंसानों पर हावी होने का आत्मविश्वास इस बात पर टिका होता है कि वो शरीर-बल में उनसे बढ़कर हैं। तो क्या इस वजह से हम उन्हें मानव जाति से श्रेष्ठ समझ लें? इसी तरह से जिस बल का प्रयोग विवेक के साथ नहीं किया जाता वो पशु-बल ही है, उसकी वजह से आप श्रेष्ठ नहीं कहला सकते। बल का शालीन प्रयोग ही बल की गरिमा है। जो बल का गरिमामय उपयोग करते हैं उनके व्यक्तित्व में देवत्व झलकता है। अपेक्षाकृत कम शारीरिक बल वाली महिलाओं पर अपना जोर दिखाना दानवता है।

शायद, इसीलिए देवत्व की कसौटी को मनीषियों ने कुछ इस तरह से निर्द्धारित किया- “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्तेरमन्ते तत्र देवता:।” पूजा यानी न केवल सुरक्षा बल्कि सम्मान भी। अंतत: किसी के भी साथ हमारे व्यवहार का आधार मानवीय होना चाहिए क्योंकि हम मानव हैं। यही हम पर शोभा देता है और यही सबसे उपयुक्त बात है। जब ऐसा होगा तब ये बड़ी बात होगी।

लेखिका: अमिता, कन्या गुरुकुल चोटिपुरा

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