आम लोग कपड़े और राशन दे जाते हैं, केजरीवाल ने कोई मदद नहीं की: पाकिस्तानी हिंदू

"पिछले साल गर्मियों में बस्ती के करीब 12 लोगों की मौत हुई। इनमें बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे। 9 साल पहले भारत आए। कई साल तक तो कोई शौचालय नहीं था। दो साल पहले कुछ बनाए गए हैं। इनका इस्तेमाल महिलाएँ करती हैं। वो पहले रात में डर के चलते बाहर नहीं निकल पातीं थीं।"

दिल्ली में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर इन दिनों राजनीति की चर्चा हर गली, हर नुक्कड़ पर है। बिजली-पानी-शिक्षा के अलावा इस बार इन चुनावों में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) भी जनता से संपर्क साधने के लिए मुख्य विषय है। इस कानून से लाभान्वित होने वालों का एक बड़ा तबका दिल्ली के मजनू का टीला, सिग्नेचर ब्रिज, मजलिस पार्क, आदर्श नगर जैसे इलाकों में रह रहे हैं। ये लोग भी आने वाली सरकार से बुनियादी सुविधाओं को पूरी करने की आस लगाए बैठे हैं।

इन शरणार्थी कैंपों में रहने वाले लोगों के पास अभी तक मतदान का अधिकार नहीं है। मगर फिर भी दिल्ली के चुनावों पर इनकी पूरी नजर है। ये चाहते हैं कि आने वाली सरकार इनकी मूलभूत जरूरतों का ख्याल रखे और इन्हें बदतर स्थिति से उबारने में मदद करे। हालाँकि, सीएए आने के बाद देश भर में रह रहे हिंदू शरणार्थियों का ये कहना है भला केवल मोदी सरकार कर सकती हैं।

पिछले 5 साल से दिल्ली की सत्ता में काबिज केजरीवाल सरकार को लेकर अधिकांश हिंदू शरणार्थियों का कहना है कि उन्हें सरकार से कोई गिला शिकवा नहीं है, बस उन्हें बिजली-पानी मुहैया करवा दिया जाए। इनकी हालत देखी और दर्द सुना जाए, तो उसमें वर्तमान सरकार के प्रति हताशा साफ नजर आती है। जानकारी के अनुसार पिछले साल मजनू का टीला के पास स्थित इन लोगों की बस्ती सुविधाओं के अभाव के कारण 12 लोगों की मौत हुई थी। इनमें बच्चे-बुजुर्ग दोनों शामिल थे। बावजूद इसके इनकी मदद के लिए राज्य सरकार का कोई नुमाइंदा आगे नहीं आया। न ही इस विषय पर कोई बात हुई।

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दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार इस कैंप में रह रहे धर्मदास 2011 में सिंध से हरिद्वार का वीजा लेकर भारत आए थे और अब वे वापस नहीं जाना चाहते। वे बताते हैं, “पाकिस्तान में बहुत प्रताड़ना झेली। मजहब बदलने का दबाव था। कोई रोजगार नहीं था। हरिद्वार के लिए वीजा बनवाया। फिर दिल्ली आ गए। मदद माँगने कई बार केजरीवाल के पास गए। लेकिन, कुछ हासिल नहीं हुआ। आम लोग कभी कपड़े तो कभी राशन दे जाते हैं।”

सोनदास कहते हैं, “साहब, हालात क्या बताएँ। पिछले साल गर्मियों में बस्ती के करीब 12 लोगों की मौत हुई। इनमें बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे। 9 साल पहले भारत आए। कई साल तक तो कोई शौचालय नहीं था। दो साल पहले कुछ बनाए गए हैं। इनका इस्तेमाल महिलाएँ करती हैं। वो पहले रात में डर के चलते बाहर नहीं निकल पातीं थीं। “

गौरतलब है कि ये कहानी केवल मजनू का टीला और सिग्नेचर ब्रिज की नहीं है, बल्कि दिल्ली में स्थित अन्य शरणार्थी कैंपों की भी ऐसी ही हालत है। कुछ समय पहले जहांगीर पुरी के मजलिस पार्क मेट्रो स्टेशन के पीछे सेना की जमीन पर रह रहे शर्णार्थियों को तंगहाल में जीने को मजबूर कर दिया गया था। कैंपो के पास नाले बना दिए गए थे, जिनसे जलभराव हो गया। उससे मच्छरों की ब्रीडिंग बढ़ गई थी और डेंगू-मलेरिया का खतरा भी। इसके अलावा कुछ समय तक तो बिजली विभाग के कर्मचारियों ने इनके कैंपों से बिजली का कनेक्शन काट दिया था।

मजलिस पार्क में रह रहे शरणार्थियों की मदद करने वाले समाजसेवी हरिओम के अनुसार कुछ लोगों के सहयोग से इलाके में एक छोटा सा स्कूल खुलवाया गया था, जहाँ अब शर्णार्थियों के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दी जा रही है। लेकिन इसके लिए उन्हें किसी तरह का कोई सरकारी सहयोग नहीं मिलता। उनके मुताबिक आम आदमी पार्टी के विधायक पवन कुमार शर्मा ने उन्हें एक बार मदद के नाम पर आश्वासन दिया था। मगर बाद में कोई मदद नहीं मिली।

अमर उजाला की साल 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, मजलिस पार्क मेट्रो स्टेशन के पास करीब पॉंच साल से रह रहे हिंदू शरणार्थियों पर कभी कोई एफआईआर नहीं हुई। वहीं इनके कैंपों से महज कुछ ही दूरी पर बसे बांग्लादेशी और रोहिंग्या शरणार्थी दिल्ली की सुरक्षा के लिए खतरा बने रहते हैं। समय-समय पर उनके खिलाफ कई मामले दर्ज हुए हैं।

हालाँकि केजरीवाल सरकार से हताश हो चुके लोगों को मोदी सरकार से बहुत उम्मीदें हैं। बीते दिनों हमने पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी गुलशेर की कहानी साझा की थी। जिन्हें अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए केजरीवाल सरकार के आदेश के ख़िलाफ़ कोर्ट तक जाना पड़ा। लेकिन सीएए आने के बाद फूले नहीं समाए।

इसी प्रकार मजनू टीला, सिग्नेचर ब्रिज, आदर्श नगर, मजलिस पार्क में रह रहे पाकिस्तानी हिंदू एक ही स्वर में मोदी सरकार को दिल्ली में देखना चाहते हैं। यहाँ अधिकतर घरों के ऊपर तिरंगा और दरवाजे पर मोदी सरकार की तस्वीर इलाके में घुसते ही देखी जा सकती है। इन लोगों के मुताबिक मोदी सरकार ने उनके लिए बहुत काम किया है। इसलिए वे चाहते हैं कि वो ही जीतें। बता दें एक परिवार ने तो सीएए आने की खुशी में अपनी बेटी का नाम ही नागरिकता रख दिया था। जिसका जिक्र प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में भी किया था।

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