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अंबेडकर, माधवी जाधव और नासिक की 26 जनवरी… वर्दी वाली का ये रोना-धोना लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं

भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार है, जब किसी नेता पर 'अपमान' का आरोप लगा। ये उसके कहे गए शब्दों के लिए नहीं, बल्कि अनकहे शब्दों के लिए लगाया गया है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि नासिक की घटना और इससे पहले की घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि कैसे सार्वजनिक अधिकारियों ने राजनीतिक दिखावे और वैचारिक गुंडागर्दी के लिए सीमाओं का उल्लंघन किया है।

नासिक में महाराष्ट्र के मंत्री गिरीश महाजन के गणतंत्र दिवस भाषण में वन विभाग के एक अधिकारी द्वारा बाधा डालना, कोई भावनात्मक मामला नहीं है और न ही यह केवल डॉ. बी.आर. अंबेडकर के प्रति श्रद्धा का मुद्दा है। यह संस्थागत पतन का एक गंभीर मामला है। राज्य के पदाधिकारी संविधान के प्रति जवाबदेह होते हैं और उन्हें संवैधानिक पद पर बैठे नेताओं का सम्मान करने का आदेश होता है।

क्या थी घटना

गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद गिरीश महाजन ने अपने आधिकारिक भाषण में डॉ. अंबेडकर का नाम नहीं लिया। यह चूक, चाहे जानबूझकर की गई हो या नहीं, वन विभाग की कर्मचारी माधवी जाधव ने पकड़ ली और भाषण के बीच में ही स्पष्टीकरण माँगा। पुलिस ने इस दौरान हस्तक्षेप किया, उन्हें कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया और मामला देखते ही देखते एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गया।

महाजन ने बाद में स्पष्ट किया कि यह चूक अनजाने में हुई थी और उन्होंने माफी माँगी। उन्होंने कहा कि वे अपने भाषणों में नियमित रूप से अंबेडकर का जिक्र करते हैं और उनका मकसद अंबेडकर का अपमान करना नहीं था। सामान्य लोकतांत्रिक और नागरिक मानकों के अनुसार, यह मामला यहीं समाप्त हो जाना चाहिए था।

इसके बजाय यह एक साजिश के तहत गुस्से में बदल गया, जिसमें ‘अंबेडकर की पहचान मिटाने’ के आरोप लगे, एफआईआर दर्ज करने की माँग और राजनीतिक नेताओं द्वारा मंत्री को हटाने की माँग शामिल थी।

माधवी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए घोषणा की कि गिरीश महाजन द्वारा किया गया तथाकथित ‘पाप’ इतना गंभीर था कि उन्हें माफ नहीं किया जा सकता। उन्होंने दावा किया कि आगामी महाकुंभ में पवित्र स्नान भी इसे धो नहीं पाएगा।

यह तनाव बहुत कुछ कहता है। यह न केवल महाकुंभ में स्नान करने की हिंदू संस्कारों के प्रति घोर अवमानना ​​को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस प्रकार उपेक्षा को अब अपमान के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, और किस प्रकार राजनीतिक व्यवस्था के कुछ वर्गों ने अंबेडकर को एक ऐसे व्यक्ति में बदल दिया है जिनका आह्वान अब प्रतीकात्मक या श्रद्धापूर्ण नहीं, बल्कि अनिवार्य हो गया है।

भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार है कि किसी नेता पर ‘अपमान’ का आरोप उसके कहे गए शब्दों के लिए नहीं, बल्कि उसके अनकहे शब्दों के लिए लगाया गया है।

खतरनाक है यह बदलाव

संविधान में ऐसा कोई प्रावधान, कानूनी आदेश या परंपरा नहीं है, जो गणतंत्र दिवस के प्रत्येक भाषण में डॉ. अंबेडकर के नाम को अनिवार्य कर दे। भाषण शपथ पत्र नहीं होते। वे जोर, संदर्भ और विषयवस्तु को दर्शाते हैं। कोई मंत्री राष्ट्रवाद, संघवाद, शिवाजी महाराज या समकालीन शासन के बारे में बात कर सकता है, वह किसी अहम व्यक्ति का नाम नहीं भी ले सकता है।

यदि ‘अपमान’ का मापदंड केवल उल्लेख न करने तक सीमित कर दिया जाए, तो कोई भी भाषण सुरक्षित नहीं रहेगा। हर भाषण को बाधित किया जा सकता है। हर मंत्री पर आरोप लगाया जा सकता है। हर चूक को दुर्भावना के रूप में पेश किया जा सकता है।

व्यक्तिगत शिकायत की आड़ में राजनीतिक सक्रियता

माधवी जाधव कोई आम नागरिक नहीं थीं जो असहमति व्यक्त कर रही हों। वह एक संवैधानिक समारोह में ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारी थीं। सेवा नियम, प्रशासनिक अनुशासन और भारतीय राज्य की मूलभूत संरचना के अनुसार, नौकरशाहों और वर्दीधारी कर्मियों को आधिकारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते समय राजनीतिक रूप से तटस्थ रहना आवश्यक है।

लोकतंत्र विरोधी नहीं, घोर अनुशासनहीनता

मंत्री के माफी माँग लेने के बावजूद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की माँग की गई। इससे पता चलता है कि यह टकराव संवैधानिक मूल्यों को लेकर नहीं, भावनात्मक आवेश में उठाया गया।

इससे भी अधिक चिंताजनक बात उसकी प्रतिक्रिया थी। सियासत करने वालों ने माधवी के काम की तारीफ की अनुशासनहीनता को नजरअंदाज किया और कर्तव्य की अवहेलना करने के बावजूद उसे सराहा।

प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने पर भी अधिकारी का विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने तारीफ की। मुंबई की कॉन्ग्रेस सांसद वर्षा गायकवाड़ ने कहा कि यह ‘हर स्वाभिमानी मराठी मानुष की आवाज’ है।

कॉन्ग्रेस नेता शमा मोहम्मद ने वन अधिकारी को ‘बहादुर’ बताया और संविधान के निर्माता का कथित तौर पर अपमान करने के आरोप में महाजन को तुरंत बर्खास्त करने की माँग की।

कॉन्ग्रेस का समर्थन करनेवाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वन अधिकारी की तारीफ की और उन्हें सलाम किया।

जब राजनीतिज्ञ ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों की अनुशासनहीनता का सार्वजनिक रूप से समर्थन करते हैं, तो वे वैचारिक टकराव को पुरस्कृत कर रहे होते हैं, दंडित नहीं। सरकारी कर्मचारियों से उम्मीद की जाती है कि वे निष्पक्ष रहें, लेकिन यहाँ मामला उल्टा हो गया।

संस्थाएँ होती हैं कमजोर

अंबेडकर की आलोचना, अनदेखी और पूजनीय बनाना एक और चिंताजनक पहलू है। ऐसा तब है जब डॉ. अंबेडकर स्वयं नायक पूजा के प्रबल आलोचक थे। संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “धर्म में भक्ति, आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है। लेकिन राजनीति में भक्ति या नायक पूजा तानाशाही की ओर ले जाने वाला निश्चित मार्ग है।”

लेकिन आज, उनके नाम पर काम करने का दावा करने वाले कई लोगों ने उन्हें नायक बना दिया है, जिसके खिलाफ वे खुद थे। एक ऐसा प्रतीक जिसका नाम लेना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसके बिना ये ईशनिंदा माना जाएगा।

यह श्रद्धांजलि नहीं, साधन के रूप में उपयोग है

सबसे अहम बात यह है कि ऐसे काम स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर देता है। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। अंबेडकर का उल्लेख न करना कोई अपराध नहीं है। यह कदाचार भी नहीं है। गणतंत्र दिवस के भाषण में किसी भी विषय पर बात की जा सकती है और इसके लिए किसी निर्धारित वैचारिक ढाँचे का पालन करना अनिवार्य नहीं है।

यदि कल कोई मंत्री जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सावरकर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस या किसी अन्य ऐतिहासिक व्यक्ति का नाम छोड़ दे, तो क्या इससे भी व्यवधान उत्पन्न करना उचित होगा? भारत के स्वतंत्रता संग्राम और संवैधानिक यात्रा में सदियों से अनगिनत योगदानकर्ताओं का हाथ रहा है। कोई भी भाषण उन सभी का नाम नहीं ले सकता, और न ही इसकी अपेक्षा की जानी चाहिए।

भाषण को लेकर गुस्से की निरर्थकता को इस बात से भी समझी जा सकती है कि स्वतंत्रता के बाद से, प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों या यहाँ तक कि कुछ प्रमुख हस्तियों ने गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर सैकड़ों भाषण दिए हैं। किसी को भी कभी भी सभी स्वतंत्रता सेनानियों या संविधान निर्माताओं के नाम गिनाने के लिए बाध्य नहीं किया गया है। किसी पर भी भगत सिंह, विवेकानंद या अंबेडकर का ‘अपमान’ करने का आरोप नहीं लगाया गया है, सिर्फ इसलिए कि उनके नाम किसी विशेष भाषण में नहीं लिए गए।

तो फिर यह अपवाद क्यों?

इसका उत्तर सिद्धांतों में नहीं, राजनीति में निहित है।

सीआईएसएफ अधिकारी ने कंगना रनौत पर हमला किया

नासिक की घटना कोई छोटी बात नहीं है। यह दिखाता है कि नौकरशाही और वर्दीधारी सेवाओं का राजनीतिकरण कितना हुआ और लगातार होता ही जा रहा है। हाल में सबसे चर्चित उदाहरण 2024 की वह घटना है, जब सीआईएसएफ अधिकारी कुलविंदर कौर ने कथित तौर पर हवाई अड्डे पर सांसद कंगना रनौत को थप्पड़ मारा था। कौर ने बाद में रनौत की किसान विरोध प्रदर्शनों पर की गई टिप्पणियों का हवाला देकर अपने कृत्य को सही ठहराया था।

कुलविदर का थप्पड़ मारना सुरक्षा और प्रोटोकॉल दोनों का ही उल्लंघन था। लेकिन इसके बाद जो हुआ वह और भी चिंताजनक था। कौर को निलंबित और स्थानांतरित कर दिया गया, लेकिन संस्थागत स्तर पर इसकी कोई कड़ी निंदा नहीं हुई। इसके बजाय, सार्वजनिक हस्तियों ने खुलेआम हमले को ‘सामान्य’ बताया। संगीतकार विशाल ददलानी ने तो कार्रवाई होने पर उन्हें नौकरी दिलाने का भी प्रस्ताव रखा। राजनीतिक समर्थकों ने उनके आचरण को विरोध का साहसी आवाज कहा।

इससे जो संदेश गया वह यह था कि यदि राजनीतिक विचार से सहमत न हो तो राजनीतिज्ञों का विरोध करने का अधिकार ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों को भी है, लेकिन ये कैसे हो सकता है?

नासिक की घटना इसी तर्क को पुष्ट करती है। अधिकारी को साहसी के रूप में चित्रित किया गया है। मंत्री, माफी माँगने के बावजूद दोषी के रूप में पेश किए जाते हैं, क्योंकि वे भाजपा से हैं। यह प्रधानमंत्री मोदी की पार्टी है। इसलिए कॉन्ग्रेस समर्थकों का वह निशाना बनते हैं। अनुशासन को दमन के रूप में देखा जाता है। तटस्थता को नैतिक कायरता बताकर खारिज कर दिया जाता है।

बरेली के मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने यूजीसी के नए नियमों के विरोध में इस्तीफा दे दिया। गणतंत्र दिवस पर बरेली नगर मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने इस प्रवृत्ति को और भी स्पष्ट कर दिया है। हालाँकि इस्तीफा देना एक व्यक्तिगत अधिकार है, लेकिन अग्निहोत्री द्वारा अपने इस्तीफे को सरकारी नीतियों के खिलाफ राजनीतिक विरोध के रूप में पेश करना एक बार फिर प्रशासन और राजनीति के बीच की रेखा को धुँधला करता है।

संवैधानिक लोकतंत्र के लिए निष्पक्ष प्रशासन जरूरी

सरकारी और प्रशासनिक सेवा में शामिल व्यक्ति पर निष्पक्ष होने की जिम्मेदारी है। वो किसी संगठन का हिस्सा नहीं बन सकते। उनकी तटस्थता ही देश और समाज के लिए जरूरी है। एक बार जब अधिकारी स्वयं को निर्णायक समझने लगते हैं और व्यक्तिगत या वैचारिक विश्वास के आधार पर निर्वाचित प्रतिनिधियों का विरोध करने के लिए सशक्त हो जाते हैं, तो सत्ता की श्रृंखला टूटती है।

आज अंबेडकर का नाम नहीं लेने पर सरकारी अधिकारी को शिकायत है। कल जाति, धर्म, भाषा, आरक्षण नीति या आस्था भी इसका कारण हो सकती है। यदि हर अधिकारी को लगता है कि उसे ड्यूटी के दौरान व्यवधान डालने, नाटकीय ढंग से इस्तीफा देने या राजनेताओं के साथ दुर्व्यवहार करने का अधिकार है, तो शासन व्यवस्था ठप्प हो जाएगी।

गणतंत्र दिवस केवल संविधान को अपनाने और मानने का ही दिन नहीं है, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था, संयम, प्रक्रिया, संस्थागत सीमाओं और भूमिकाओं के प्रति सम्मान का भी दिन है। नासिक की घटना में इन सभी सिद्धांतों का उल्लंघन किया।

कर्तव्य के दौरान राजनीतिक सक्रियता साहस नहीं है। यह कर्तव्य का उल्लंघन है। और जब ऐसे उल्लंघन को सराहा जाता है, प्रोत्साहित किया जाता है और उसका राजनीतिकरण किया जाता है, तो यह अपवाद नहीं रह जाता, बल्कि एक संक्रामक रोग बन जाता है।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ लिंक करें)

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Jinit Jain
Jinit Jain
Writer. Learner. Cricket Enthusiast.

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