राष्ट्रवाद एक ‘जहर’ है जो वैयक्तिक अधिकारों का हनन करने से नहीं हिचकिचाता: हामिद अंसारी

अंसारी ने कहा कि मानवता की रक्षा तभी की जा सकती है जब इन दोनों महामारियों से बचा जाए और इनकी जगह सामूहिक अनुभव एवं नैतिक दिशानिर्देश के तहत मानव व्यवहार को तरजीह दी जाए।

देश के पूर्व उप राष्ट्रपति और कॉन्ग्रेस नेता हामिद अंसारी ने चंडीगढ़ में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रवाद को वैचारिक जहर बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद एक ऐसा ‘वैचारिक जहर’ है, जो वैयक्तिक अधिकारों का हनन करने से नहीं हिचकिचाता। अंसारी ने कहा कि आजकल ‘राष्ट्रवाद’ और ‘देशभक्ति’ के बीच अक्सर भ्रम देखने को मिलता है, लेकिन उनके अर्थ और विषय वस्तु बिल्कुल अलग-अलग हैं।

उन्होंने कहा कि दुनिया भर के लोग धार्मिकता और उग्र राष्ट्रवाद, इन दो महामारियों का शिकार बने हैं। ये महामारी लोगों के व्यवहार को प्रभावित करता है। अंसारी ने सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव के 550 वें प्रकाश पर्व के अवसर पर आयोजित सम्मेलन में अपने संबोधन में कहा कि धार्मिक आस्थाओं के संस्थापकों के अनुयायियों ने उनकी शिक्षाओं का स्वरूप बिगाड़ दिया और धर्म को कमजोर या भ्रष्ट किया।

अंसारी ने कहा कि गुरु नानक, जिनकी 550 वीं जयंती मनाई जा रही है, उन्होंने सभी इंसानों के बीच भाईचारे की वकालत करने के साथ-साथ दलितों के उद्धार की वकालत की थी। उन्होंने आज की शब्दावली में उपयोग में लाए जाने वाले ‘अंतर-धार्मिक संवाद’ की हिमायत की थी।

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इस दौरान अंसारी ने यह भी कहा कि दशकों पहले रबींद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रवाद को एक बड़ी बुराई बताया था। वह खुद  ‘राष्ट्र की पूजा’ की खिलाफ करते थे। उनका कहना है कि टैगोर ने इसे बेहोश करने की सर्वाधिक प्रभावी दवा बताया था, जिसका आविष्कार मनुष्यों ने ही किया है। वहीं अंसारी ने देशभक्ति को सैन्य और सांस्कृतिक दोनों तरफ से रक्षात्मक बताया। उन्होंने कहा कि महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन ने इसे एक ‘बाल रोग’ कहा था।

हामिद अंसारी ने कहा कि यह उत्कृष्ट भावनाओं को प्रेरित करती है लेकिन जब यह सिर चढ़ कर बोलेगी तो ऐसी स्थिति में यह उन मूल्यों को कुचल डालेगी, जिसकी रक्षा देश करना चाहता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद और देशप्रेम के बीच में भ्रम की ऐसी स्थिति पैदा हो रही है कि यदि इसे इसे छूट मिलती रही तो इसके परिणाम विस्फोटक होंगे।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद का मतलब है कि खुद की पहचान एक राष्ट्र के रूप में करना, उसे अच्छाई और बुराई, सही या गलत से परे रखना। इसके साथ ही वैयक्तिक फैसलों को निलंबित करना और अपने हितों को आगे बढ़ाने वालों को छोड़ कर दूसरों के कर्तव्य को मान्यता नहीं देना।

उन्होंने कहा, ‘‘अक्सर ही इसे देशभक्ति मान लिया जाता है और दोनों को एक दूसरे की जगह इस्तेमाल में लाया जाता है। लेकिन दोनों ही अस्थिर एवं विस्फोटक विषय-वस्तु वाले शब्द हैं तथा इनका सावधानी के साथ इस्तेमाल किए जाने की जरूरत है। क्योंकि उनके अर्थ और विषय-वस्तु अलग-अलग हैं।’’ अंसारी ने कहा कि मानवता की रक्षा तभी की जा सकती है जब इन दोनों महामारियों से बचा जाए और इनकी जगह सामूहिक अनुभव एवं नैतिक दिशानिर्देश के तहत मानव व्यवहार को तरजीह दी जाए।

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