Thursday, August 18, 2022
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महाराष्ट्र सियासी संकट के बीच मिलिए शंकर सिंह वाघेला से, ऑपइंडिया से खास बातचीत: की थी ‘रिसोर्ट पॉलिटिक्स’ की शुरुआत, PM मोदी के रहे हैं दोस्त

"जिस तरह से चीजें चल रही हैं, उससे लगता है कि गुजरात और महाराष्ट्र में एक साथ चुनाव हो सकते हैं। यह सब देखकर लोग एंटरटेन हो रहे हैं। मुझे इस दिसंबर में महाराष्ट्र में चुनाव होने की उम्मीद है।"

महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार का जाना लगभग तय माना जा रहा है। शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) उनका समर्थन करने वाले अन्य विधायकों के साथ असम के गुवाहाटी में डेरा जमाए हुए हैं। इन बागी विधायकों ने उद्धव सरकार को घुटनों पर ला दिया है। इन सबके बीच रिसॉर्ट पॉलिटिक्स (Resort Poltics) खासा चर्चा में। रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के तहत कई सरकारें बनाई और गिराई गईं। वर्ष 1995 में एक सफल तख्तापलट गुजरात में भाजपा के बागी नेता शंकर सिंह वाघेला ने किया था। गुजरात में बापू के नाम से मशहूर शंकर सिंह वाघेला ने मध्य प्रदेश के खजुराहो में कॉन्ग्रेस के शासन में अपने समर्थक विधायकों के साथ लंबे समय तक डेरा जमाया हुआ था।

ऑपइंडिया गुजराती के संपादक सिद्धार्थ छाया ने शंकर सिंह वाघेला के गाँधी नगर स्थित आवास पर जाकर उनका इंटरव्यू लिया। इस दौरान उन्होंने अपने समय के मित्र और विरोधी नरेंद्र मोदी सहित गुजरात की राजनीति के बारे में खुलकर चर्चा की।

ऑपइंडिया: बापू, अब क्या कर रहे हो?

शंकर सिंह वाघेला: इन दिनों मैं खेती कर रहा हूँ और अपने परिवार के साथ समय बिता रहा हूँ। मैं जरूरतमंदों की मदद करता हूँ, पुराने दोस्तों से मिलता हूँ, सामाजिक और राजनीतिक काम करता हूँ और दिन भर खुद को व्यस्त रखता हूँ। इसके अलावा सुबह 6 से 8 बजे तक मैं व्यायाम करता हूँ और प्रकृति के साथ समय बिताता हूँ, जहाँ मुझे तोते, मोर, गौरैया और कभी-कभी बंदर भी देखने को मिलते हैं। संक्षेप में कहूँ तो, मैं जीवन का आनंद ले रहा हूँ।

ऑपइंडिया: क्या आप राजनीति से दूर रहते हैं?

शंकरसिंह वाघेला : राजनीतिक काम ही चल रहा है। कुछ मुलाकातें होती रहती हैं। मैं लंबे से राजनीति से जुड़ा हुआ हूँ। यह काम 2022 तक जारी रहेगा।

ऑपइंडिया: आज महाराष्ट्र में जो हो रहा है वह आपके लिए नया नहीं है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

शंकरसिंह वाघेला : लोग कहते हैं कि यह सब राजनीतिक मतभेदों के कारण हो रहा है, लेकिन यह सब केवल मूर्ख बनाने वाली बातें हैं। 1965 तक राजनीतिक विचारधारा का अस्तित्व था। पहले देश, फिर पार्टी और आखिरी में अपना हित सर्वोपरि था। अब हर कोई खुद को प्राथमिकता दे रहा है। हर कोई चाहता है कि पार्टी बदले में उनके लिए कुछ करे, लेकिन जब उन्हें उम्मीद के मुताबिक वह सब नहीं मिलता, तो उनका इगो हर्ट हो जाता है और इस तरह के हालात बन जाते हैं।

वह आगे क​हते हैं, “शिवसेना में जो हो रहा है वह रातोंरात नहीं हुआ है। अगर आपको जल्दबाजी में कोई कदम उठाना है, तो आपको राजनीति में नहीं आना चाहिए। शिवसेना, कॉन्ग्रेस और राकांपा गठबंधन यानी महाविकास अघाड़ी (एमवीए) की शुरुआत ही एनसीपी में नाकाम बगावात से हुई थी। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है। हकीकत में ऐसी बातें कोर्ट में नहीं जानी चाहिए थीं। कुछ ही मामले होने चाहिए जो कोर्ट तक पहुँचने चाहिए। याद है जब इंदिरा गाँधी पर चुनाव में धाँधली का आरोप लगाया गया और यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट तक पहुँच गया। शिवसेना के लोग हमेशा से महत्वाकांक्षी रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “जिस तरह से चीजें चल रही हैं, उससे लगता है कि गुजरात और महाराष्ट्र में एक साथ चुनाव हो सकते हैं। यह सब देखकर लोग एंटरटेन हो रहे हैं। मुझे इस दिसंबर में महाराष्ट्र में चुनाव होने की उम्मीद है।”

ऑपइंडिया: महाराष्ट्र की ‘रिजॉर्ट पॉलिटिक्स’ गुजरात के लिए कोई नहीं बात नहीं है। हमने यहाँ खजुराहो तख्तापलट देखा है। किस बिंदु पर नेता को लगता है कि उसके पास बहुमत जुटाने के लिए समर्थक हैं?

शंकरसिंह वाघेला: यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि इसे कौन प्रायोजित कर रहा है। उस वक्त मेरे विधायकों ने मुझसे शिकायत की थी कि पार्टी में कोई उनकी बात नहीं सुन रहा है। उन्होंने मुझे भी नजरअंदाज किया, जिसने राज्य में पार्टी को सत्ता में लाने के लिए जमीनी स्तर पर काम किया था, वह भी टिपिंग पॉइंट था। जब मैंने महसूस किया कि पार्टी में राजनीति बढ़ गई है, तो विधायक खुद प्रायोजक बन गए। अगर कोई उस व्यक्ति की बात नहीं सुनता जिसने पार्टी की जीत दिलाने में जीतोड़ मेहनत की है, तो क्या इससे वह शख्स नाराज नहीं होगा? बागी विधायकों ने खुद ऐसा किया। एक मुख्यमंत्री को बनाने में सभी विधायकों का सामूहिक प्रयास होता है। जब कोई काम ही नहीं हो रहा था तो विधायक अपने चुने हुए लोगों को क्या कहेंगे? बस यही मुद्दा था।

उन्होंने कहा, “मैं उस समय कॉन्ग्रेस के नेताओं से नहीं मिला था। ना ही कॉन्ग्रेस ने मुझे अपना समर्थन दिया था। हम सब कॉन्ग्रेस को हराकर सत्ता में आए थे। फिर वे हमारा समर्थन क्यों करेंगे? 120 में से 105 विधायक एक तरफ आए थे। कॉन्ग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का कोई मौका नहीं था। बात बस इतनी थी कि हम अपने स्वाभिमान से समझौता करके राजनीति नहीं कर सकते थे।” वाघेला ने बताया, “हमारे साथ पार्टी में बाहरी लोगों की तरह व्यवहार किया जाता था। यह हमारे स्वाभिमान के खिलाफ था। इसी वजह से खजुराहो वाली घटना हुई।”

ऑपइंडिया: खजुराहो ही क्यों?

शंकरसिंह वाघेला: ओह, हम तो यहीं थे, अपने गाँव में। किसी विधायक पर दबाव नहीं डाला गया था। सभी अपनी मर्जी से आने और जाने के लिए स्वतंत्र थे, लेकिन जब गुजरात पुलिस ने कड़ा रुख अपनाया, तो विधायकों ने गुजरात से बाहर सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए कहा, क्योंकि वे यहाँ खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे।

उन्होंने कहा, “कहाँ जाना है, ये हमारा सवाल था। हमने गैर-भाजपा शासित राज्य में जाने का फैसला किया। उस समय केवल मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। इसलिए हमने केंद्रीय मंत्री (उस वक्त केंद्र में भी कॉन्ग्रेस की सरकार थी) को फोन किया और कहा कि हमें खजुराहो हवाई पट्टी का इस्तेमाल नाइट लैंडिंग के लिए करने दें। चूँकि, यह एक चार्टर्ड फ्लाइट थी और राजनीतिक महत्व से जुड़ी थी, इसलिए वे सहमत हो गए।”

उन्होंने कहा, “हम खजुराहो गए क्योंकि इसका नाम सबसे पहले आया। अगर किसी और जगह का नाम आता तो हम कहीं और चले जाते। हमने होटल भी बुक नहीं किए थे। दिलीप पारिख ने इसमें मदद की और भुगतान भी उनके एक दोस्त ने किया।”

ऑपइंडिया: इस तरह से लंबे समय तक रिसॉर्ट में रहना जैसे आपके मामले में यह एक सप्ताह से अधिक चला। ऐस में विधायकों की मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है? क्या वे रिसॉर्ट में घर जैसा महसूस करते हैं?

शंकर सिंह वाघेला: नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। जब तक हमारा लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक रिसॉर्ट छोड़ने का कोई मतलब नहीं है। तब भी उमा भारती और काशुभाऊ ठाकरे हमसे मिलने आए थे, लेकिन उस वक्त वहाँ मौजूद सभी विधायकों ने कहा था कि वे वापस नहीं आना चाहते। बाद में जब हमें कॉन्ग्रेस से बिना शर्त समर्थन मिला और तब हमने एक गुट बनाया। उस समय एक भी कॉन्ग्रेस विधायक को मंत्री नहीं बनाया गया था।

ऑपइंडिया: क्या खजुराहो की घटना ऐसी पहली राजनीतिक घटना थी? अब ‘रिजॉर्ट पॉलिटिक्स’ फैशन बन गई है। क्या यह आगे भी जारी रहेगा या फिर आप आने वाले समय में इसका अंत देख रहे हैं?

शंकरसिंह वाघेला: नहीं, खजुराहो पहली घटना नहीं थी। इससे पहले 1967 में मध्य प्रदेश ने सरकार के लिए एक संयुक्त विधायक दल का गठन किया था। हरियाणा के अयाराम-गयाराम को तो सभी जानते हैं। पहले के समय में विपक्ष भी कहाँ था? 1969 में इंडिकेटेड सिंडिकेट के रूप में विपक्ष एक साथ आने लगा। यह एक प्रक्रिया है और लोकतंत्र का हिस्सा है। लोगों को इससे दूर नहीं भागना चाहिए। चिमनभाई पटेल भी समर्थन करने वाले विधायकों को अपने फार्महाउस पर ले गए थे।

उन्होंने कहा, “आपको अपने विधायकों की सुरक्षा के लिए आइसोलेशन की जरूरत है। राज्यसभा में जब भी बॉर्डर-केस होता है तो ऐसा ही होता है। वास्तव में मेरा मानना है कि राज्यसभा में चुनाव नहीं होने चाहिए। प्रत्येक पार्टी के पास आनुपातिक सीटें होनी चाहिए और उन्हें सिर्फ नामांकन फॉर्म दाखिल करना चाहिए।”

ऑपइंडिया: पिछले तीन दशकों से गुजरात में विपक्ष मजबूत क्यों नहीं है?

शंकर सिंह वाघेला: जब भी मैच फिक्सिंग होती है तो ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है। अब कॉन्ग्रेस में कोई मैच फिक्सिंग नहीं है। अहमद पटेल के चुनाव के दौरान मानसिंह चौहान के अलावा किसी ने मुझसे यह नहीं पूछा था कि उन्हें वोट दूँ या नहीं। लेकिन अब पार्टी में दम नहीं रहा। जब आपसी तालमेल में कमी आ जाती है, तो ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसे में आपको अपने विधायकों का ध्यान रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “अभी भले ही कॉन्ग्रेस गुजरात में जीतने की जीतोड़ कोशिश कर रही हो, लेकिन कॉन्ग्रेस में ऐसा कोई भी नहीं है जो उनका सही से मार्गदर्शन कर सके। उनके पास अनुभव के साथ-साथ भावनात्मक जुड़ाव की भी कमी है, जो एक बड़ी चिंता है।”

ऑपइंडिया: आपकी और नरेंद्र मोदी की दोस्ती की काफी चर्चा रही है। जब वे प्रधानमंत्री बने तो आप गुजरात विधानसभा में विपक्ष के दमदार नेता के रूप में नजर आए।

शंकरसिंह वाघेला: जब आप एक सार्वजनिक व्यक्ति होते हैं, तो आपको हमेशा मर्यादा बनाए रखनी चाहिए और दूसरों के प्रति सम्मानजनक होना चाहिए। जब मैं विपक्ष का नेता था तो मैंने कभी भी अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। जब मैं जनसंघ और भाजपा में था, तो मैंने हमेशा इंदिरा गाँधी को इंदिरा जी कहकर बुलाया था। वे मेरी वैचारिक विरोधी थीं, दुश्मन नहीं।

उन्होंने कहा, “उस समय कॉन्ग्रेस नेता मोदी के शादीशुदा होने का विरोध करने जा रहे थे। मैं तब साबरकांठा में था और मीडिया के दोस्तों ने इस मामले में मुझे प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए कहा। तब मैंने कहा था, मैं इस बात का गवाह हूँ कि नरेंद्र मोदी ने वास्तव में कभी भी वैवाहिक जीवन का सुख नहीं लिया (कानूनी रूप से विवाहित होने के बावजूद)। मैंने उस वक्त यह भी कहा था, इस मुद्दे को तूल देने से कॉन्ग्रेस को वोट नहीं मिलने वाले। यह उनका निजी मामला है। अतीत में उन्होंने मुझे अपना विश्वसनीय समझकर जो कुछ साझा किया था, वह आज भी मैंने अपने तक ही सीमित रखा है।”

वह आगे कहते हैं, “हम तब काफी करीब थे। मोटरसाइकिल और जीप पर साथ-साथ जाते थे। मुझे बीजेपी छोड़ो हुए 25 साल हो गए हैं। इन 25 सालों में हम 5 बार (सार्वजनिक रूप से) भी नहीं मिले हैं। मैं पिछले 7-8 सालों में दिल्ली में एक बार भी उनसे नहीं मिला हूँ। राजनीति में विरोधी विचार हो सकते हैं, लेकिन दुर्भावना नहीं रखनी चाहिए।”

ऑपइंडिया: कहा जाता है कि खजुराहो के दौरान आपकी एक शर्त थी कि मोदी गुजरात छोड़ दें?

शंकरसिंह वाघेला: देखिए, असल में केशुभाई पटेल ने मुझे नरेंद्र मोदी को ‘समस्या’ बताया था। मैंने तब कहा था कि उनके विचार यही हैं। जब मैं खजुराहो से लौटा तब भी गुजरात में आंतरिक दलगत राजनीति जारी थी। इसलिए, उस समय मैंने वाजपेयी को सुझाव दिया कि मोदी को पार्टी में एक बड़ा पद दिया जाए और गुजरात से बाहर भेज दिया जाए। उन्होंने तब सुझाव दिया था कि केशुभाई की जगह या तो कांशीराम राणा या सुरेश मेहता को मुख्यमंत्री बनाया जाए।

ऑपइंडिया: 2022 के बाद क्या? राजनीति से सन्यास?

शंकर सिंह वाघेला: अभी तो नहीं कह सकते, लेकिन मैं 2024 में गुजरात के रास्ते दिल्ली जाना चाहता हूँ।

कौन हैं शंकर सिंह वाघेला

81 वर्षीय शंकर सिंह वाघेला ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत भाजपा (जनसंघ) से की। इंदिरा गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान उन्हें जेल में डाल दिया गया था। इसके बाद वे भाजपा के वरिष्ठ नेता बने। 1996 में, उन्होंने अपनी खुद की राजनीतिक पार्टी राष्ट्रीय जनता पार्टी बनाई। इसके बाद कॉन्ग्रेस के समर्थन से केशुभाई पटेल की भाजपा सरकार को गिराकर गुजरात में सरकार बनाई। 1998 में, गुजरात में नए सिरे से चुनाव के बाद भाजपा फिर से सत्ता में आई। इसके बाद उनकी पार्टी का कॉन्ग्रेस में विलय हो गया। 2017 में उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़ दी, फिर एक और राजनीतिक संगठन, जन विकल्प मोर्चा बनाया। इस पर उन्होंने 2017 का चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। 2019 से 2020 के बीच वह एनसीपी के सदस्य थे। उन्होंने जून 2020 में राकांपा छोड़ दी।

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