हम राफेल सौदे की निर्णय प्रक्रिया से संतुष्ट, किसी भी प्रकार के जांच की जरूरत नहीं: शीर्ष अदालत

शीर्ष अदालत ने सभी चार याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि वो राफेल सौदे की निर्णय प्रक्रिया से पूरी तरह संतुष्ट हैं और इस मामले में अदालत द्वारा किसी भी प्रकार की छानबीन की जरूरत नहीं है

देश की शीर्ष अदालत ने राफेल फाइटर जेट करार को लेकर हुए सारे विवादों को विराम देते हुए कहा है कि वो इस मामले की निर्णय प्रक्रिया से पूरी तरह संतुष्ट हैं। राफेल सौदे को लेकर दाखिल की गई सभी याचिकाओं को ख़ारिज करते हुए मुख्य न्यायधीश तरुण गोगोई ने कहा कि सारी चीजों को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद और रक्षा अधिकारीयों से विचार-विमर्श के बाद उन्होंने ये निष्कर्ष निकाला है कि इस मामले में अदालत द्वारा किसी भी प्रकार की छानबीन की जरूरत नहीं। बार एंड बेंच की वेबसाइट के अनुसार मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति केएम जोसफ की पीठ ने निर्णय देते हुए कहा कि ये अदालत का काम नहीं है कि वो ओफ़सेट साझेदार चुनने और मूल्य निर्धारित करने जैसे मामलों में हस्तक्षेप करे।

अदालत ने इस बात से भी संतुष्टि जताई कि राफेल सौदे में नियमों का पालन किया गया और भारत को इस में वित्तीय बढ़त मिली है। प्राइसिंग पर अदालत ने कहा कि इस मामले में जाना अदालत का काम नहीं है। ऑफसेट पर अदालत ने कहा कि ये सरकार का नहीं बल्कि विक्रेताओं का निर्णय क्षेत्र है। साथ ही अदालत ने ये भी साफ़ कर दिया कि व्यक्तियों की अनुभूति हस्तक्षेप का आधार नहीं बन सकती।

ज्ञात हो कि छः लोगों द्वारा भारत और फ्रांस के बीच हुए 36 राफेल जेट के लिए हुए सौदे को लेकर कुल चार याचिकाएं दाखिल की गई थी। ये याचिकाएं दायर करने वाले लोगों में वकील प्रशांत भूषण, पूर्व भाजपा नेता यशवंत सिन्हा और आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह इत्यादि शामिल थे। बता दें कि इस मामले पर सुनवाई करते हुए अदालत ने भारतीय वायु सेना के अधिकारीयों से उनकी जरूरतों के बारे में जाना था और रक्षा सचिव से इस प्रकिया को पूरी करने से पहले जो स्टेप्स लिए गए उस बारे में जानकारी मांगी थी।

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अदालत के इस फैसले के बाद राफेल को लेकर दिए जा रहे विवादित बयानों और लगाये जा रहे भ्रष्टाचार और नियमों में उल्लंघन के आरोपों पर भी विराम लगने की उम्मीद है। उधर फ्रांस के विदेश मंत्री ने भी एक साक्षात्कार में ये साफ़ कर दिया है कि राफेल सौदे में साझेदारों को चुनने को लेकर उनपर भारत सरकार का कोई दबाव नहीं था।

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