Monday, April 19, 2021
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लालू यादव जिसे सेक्रेटरी, स्टेपनी बताकर जीवन भर खारिज करते रहे, हर मोड़ पर उसने ही उन्हें नचाया

जेल से बीजेपी विधायकों को फोन करने का आरोप लगाने का हो या 2017 में लालू परिवार की बेनामी संपत्ति को लेकर लगातार 44 प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का (जिसकी परिणति महागठबंधन सरकार गिरने के रूप में हुई) या फिर 1996 में चारा घोटाले की सीबीआई जॉंच को लेकर पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर करना (जिस मामले की वजह से न केवल लालू की मुख्यमंत्री कुर्सी गई, बल्कि आज भी वे जेल की सजा काट रहे हैं)।

वैसे तो सुशील मोदी पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव थे। लालू प्रसाद यादव अध्यक्ष। लेकिन, सुशील मोदी की सियासी हैसियत को नीचा दिखाने के लिए अपने पूरे राजनीतिक जीवन में लालू यादव सार्वजनिक मंचों से उन्हें अपना सेक्रेटरी और जूनियर बताते रहे। पर दिलचस्प यह है कि लालू के सियासी जीवन की हर बड़ी मुश्किलों की वजह सुशील मोदी ही रहे हैं।

चाहे वह ताजा मामला जेल से बीजेपी विधायकों को फोन करने का आरोप लगाने का हो या 2017 में लालू परिवार की बेनामी संपत्ति को लेकर लगातार 44 प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का (जिसकी परिणति महागठबंधन सरकार गिरने के रूप में हुई) या फिर 1996 में चारा घोटाले की सीबीआई जॉंच को लेकर पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर करना (जिस मामले की वजह से न केवल लालू की मुख्यमंत्री कुर्सी गई, बल्कि आज भी वे जेल की सजा काट रहे हैं)। अब एक बार फिर बीजेपी उनके खिलाफ हाईकोर्ट में पीआईएल दाखिल करने जा रही है।

सुशील मोदी के ताज़ा दावे ने न केवल उन्हें बिहार की राजनीति में अचानक प्रासंगिक बना दिया है, बल्कि इससे जमानत हासिल करने की लालू यादव की उम्मीदों को भी झटका लगा है। वैसे बिहार की सियासत में नतीजों के आने से बाद ही दबी जुबान यह चर्चा चल रही थी कि लालू यादव ने समर्थन के लिए मुकेश सहनी और जीतनराम मांझी को फोन किया है। लेकिन, सच यह भी है कि सुशील मोदी द्वारा आरोप लगाए जाने से पहले तक यह बहस का मुद्दा नहीं बन पाया था।

जेपी आंदोलन ने बिहार को जो राजनीतिक सितारे दिए उनमें से चार के इर्द-गिर्द ही बिहार की राजनीति 1990 से घूमती रही है। ये हैं- लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, हाल ही में दिवंगत हुए रामविलास पासवान और सुशील मोदी। इनमें लालू प्रसाद यादव और सुशील मोदी इन तीन दशकों में हमेशा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ही रहे। नीतीश और रामविलास कभी लालू के साथ रहे तो कभी उनके खिलाफ रहे।

2015 के विधानसभा चुनावों से पहले जब लालू और नीतीश साथ आ गए थे तब सुशील मोदी को खारिज करने के लिए लालू उन्हें नीतीश कुमार का स्टेपनी बताते थे। 2017 में प्रवेश करते ही इसी स्टेपनी ने राजद का टायर पंचर कर वह रास्ता तैयार किया था कि नीतीश लालू को झटका दे फिर से एनडीए में लौट आएँ। बिहार में लालू के एकछत्र राज्य को समाप्त करने में नीतीश कुमार के जमीनी आधार का जितना योगदान माना जाता है, उससे कम सुशील मोदी के सियासी कौशल का भी योगदान नहीं रहा है।

अब भले बिहार बीजेपी ने सुशील मोदी के चेहरे से अलग होकर राज्य की सियासत में आगे बढ़ने का फैसला किया हो, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी से लेकर नीतीश के कैबिनेट तक हर जगह उनकी छाप आज भी दिखती है। विधानसभा अध्यक्ष चुने गए विजय सिन्हा वही नेता हैं जिनके विरोध में बीजेपी के पटना कार्यालय में टिकट वितरण से पहले कार्यकर्ताओं ने सुशील मोदी की गाड़ी घेर ली थी। मीडिया में इस घटना के छाने के बावजूद न तो विजय कुमार सिन्हा का टिकट कटा और न टिकट वितरण में सुशील मोदी का प्रभाव कम हुआ।

सुशील मोदी के इस असर को लालू ने भले कभी नहीं माना हो पर नीतीश कुमार इसकी ताकत खूब समझते हैं।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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