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‘इस्लाम को रियायतों से आज खतरे में फ्रांस’: सैनिकों ने राष्ट्रपति को गृहयुद्ध के खतरे से किया आगाह

पत्र लिखने वाले सैनिकों का कहना है कि साल 2015 के हमले के बाद हुए सिक्योरिटी ऑपरेशन का वे हिस्सा रहे हैं। उन्होंने पाया है कि कुछ मजहबी समुदायों के लिए फ्रांस मजाक या घृणा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।

फ्रांसीसी सेना में सेवारत सैनिकों के एक समूह ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को खुला पत्र लिख देश की सुरक्षा के संबंध में चेताया है। Valeurs Actuelles नाम की मैग्जीन में प्रकाशित इस पत्र के मुताबिक राष्ट्रपति मैक्रों से कहा गया कि इस्लाम को दी गई उनकी रियायतों के कारण आज फ्रांस खतरे में है। खुले पत्र में चेतावनी दी गई है कि हिंसा, इस्लाम और संस्थानों के प्रति घृणा के कारण फ्रांस का पतन अनिवार्य रूप से गृहयुद्ध का कारण बनेगा और सेना को हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर करेगा। 

बता दें कि पिछले महीने भी एक ऐसा ही लेटर इसी मैग्जीन में प्रकाशित हुआ था। उसमें भी नागरिक संघर्ष (गृह युद्ध) को लेकर राष्ट्रपति को आगाह किया गया था। उस पत्र को लिखने के पीछे कुछ अधिकारी और 20 सेमी रिटायर्ड जनरल थे। 

फिलहाल ये स्पष्ट नहीं है कि हालिया पत्र लिखने वाले कौन हैं और सेना में किन पदों पर हैं। खुले पत्र में कहा गया है, “हम आपके जनादेश को बढ़ाने या दूसरों पर विजय पाने की बात नहीं कर रहे हैं। हम अपने देश के अस्तित्व की बात कर रहे हैं।” इस पत्र को लिखने वालों ने खुद को मिलिट्री की युवा पीढ़ी का सैनिक कहा है। इसके मुताबिक इस्लामी कट्टरपंथ को खत्म करने के लिए उन्होंने अपनी जानें दी है। लेकिन राष्ट्रपति ने उसे देश में पनपने के लिए रियायत दे दी। 

पत्र में सैनिकों ने बताया कि साल 2015 में हमले के बाद हुए सिक्योरिटी ऑपरेशन का वे हिस्सा रहे हैं। इस दौरान उन्हें कुछ मजहबी समुदायों को देख पता चला कि फ्रांस उनके लिए एक मजाक या फिर घृणा से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। पत्र में कहा गया, “अगर गृहयुद्ध छिड़ जाता है तो सेना अपनी धरती पर व्यवस्था बनाए रखेगी।” इसमें ये भी कहा गया, “फ्रांस में गृह युद्ध चल रहा है और आप इसे अच्छी तरह जानते हैं।”

बता दें कि ये पत्र ऐसे वक्त में सामने आए हैं जब 2022 में फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। इन चुनावों में मरीन ले पेन को मैक्रों के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है। ऐसे में मैंक्रो ने अभी तक सार्वजनिक तौर पर इन पत्रों का जवाब नहीं दिया है। लेकिन ले पेन ने पिछली बार प्रकाशित हुए पत्र के बाद अधिकारियों के पक्ष का समर्थन किया था। साथ ही अपनी बात रखने के लिए सैनिकों को सराहा भी था। इस पत्र से फ्रांस के प्रधानमंत्री नाराज हो गए थे और उन्होंने इसे राजनीति में सेना का हस्तक्षेप बताया था।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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