Wednesday, September 22, 2021
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स्टानिकजई ने भारत में ली थी ट्रेनिंग, आज टॉप के 7 तालिबानी शासकों में से एक: IMA के बैचमेट बुलाते थे ‘शेरू’

ऐसे में सवाल यह उठता है कि आईएमए में ट्रेनिंग लेने वाले एक अफगान सैनिक को एक कट्टरपंथी तालिबान नेता में कैसे बदल दिया गया? सैन्य बलों से इस्लामी आतंकवादी संगठन तालिबान की ओर उनके कदम कैसे बढ़े?

तालिबान 15 अगस्त को काबुल पर कब्जा कर एक बार फिर से अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो गया है। अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी और उनके प्रशासन के बड़े नेता और अधिकारी देश छोड़कर जा चुके हैं। वहीं, अफगानिस्तान के नागरिक मुसीबत में हैं। अमेरिका के साथ 20 साल तक चले लंबे संघर्ष के बाद तालिबान फिर से अफगानिस्तान की सत्ता पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेगा, शायद ही किसी ने सोचा होगा।

तालिबान इस्लामी खिलाफत स्थापित करने के लिए और जिहाद जारी रखने के लिए विभिन्न पृष्ठभूमि के आतंकवादियों को हमेशा से पनाह देता रहा है। इसे सात शक्तिशाली नेताओं के एक समूह द्वारा चलाया जाता है, जिनमें से एक बेहद कट्टर नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकजई तालिबान के प्रमुख चेहरों में एक है। स्टानिकजई के सरकार में शामिल होने की आंशका जताई जा रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं स्टानिकजई का भारत से भी गहरा संबंध रहा है।  

तालिबानी नेतृत्व का प्रमुख चेहरा स्टानिकजई कभी उत्तराखंड के देहरादून में प्रतिष्ठित भारतीय सैन्य अकादमी (आइएमए) के 1982 बैच में रह चुका है। यहाँ उसके सहपाठी उसे प्यार से ‘शेरू’ कह कर बुलाते थे। बताया जाता है कि जब वह आईएमए में भगत बटालियन की केरेन कंपनी में शामिल हुआ था, तब वह 20 साल का होने वाला था। उसने भारत-अफगान रक्षा सहयोग कार्यक्रम के तहत भारत की यात्रा की। उसके साथ 44 अन्य विदेशी कैडेट भी इस बटालियान का हिस्सा थे।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्टानिकजई जब देहरादून में था तब उसके विचार बिल्कुल भी कट्टरपंथी नहीं थे। वह बहुत ही मिलनसार और साधारण व्यक्ति था। वह एक आम अफगान कैडेट था, जो यहाँ अपने समय का लुत्फ उठा रहा था। भारतीय सैन्य अकादमी में उसके कई बैचमेट उसे काफी पंसद करते थे और आज भी मिलनसार व्यक्ति के रूप में याद करते हैं।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि आईएमए में ट्रेनिंग लेने वाले एक अफगान सैनिक को एक कट्टरपंथी तालिबान नेता में कैसे बदल दिया गया? सैन्य बलों से इस्लामी आतंकवादी संगठन तालिबान की ओर उनके कदम कैसे बढ़े?

अफगान सेना में स्टानिकजई के प्रारंभिक वर्ष और IMA में उनका प्रशिक्षण

लोगार प्रांत के बाराकी बराक जिले में 1963 में स्टानिकजई का जन्म हुआ था। वह मूल रूप से पश्तून हैं और तालिबान में सबसे अधिक पढ़े-लिखे नेता है। राजनीति विज्ञान में मास्टर्स करने के बाद शेर मोहम्मद स्टानिकजई ने डेढ़ साल में आईएमए में अपना प्री-कमीशन प्रशिक्षण पूरा किया था।

स्टानिकजई के सहपाठी रह चुके मेजर जनरल डीए चतुर्वेदी (सेवानिवृत्त) आईएमए के दिग्गजों में से एक हैं, जिन्होंने उसके साथ प्रशिक्षण लिया था। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि जब वह देहरादून में था तब उसके विचार बिल्कुल कट्टरपंथी नहीं थे। वह अकादमी में अन्य कैडेटों की तुलना में थोड़ा बड़ा लगता था। स्टानिकजई की मूंछें काफी आकर्षक थीं और उस समय उनका कोई कट्टरपंथी विचार नहीं था। वह तो केवल अपने सुखद पलों को जी रहा था। मालूम हो कि चतुर्वेदी परम विशिष्ट सेवा पदक, अति विशिष्ट सेवा पदक और सेना पदक प्राप्त कर चुके हैं। 

एक अन्य बैचमेट कर्नल केसर सिंह शेखावत (सेवानिवृत्त) भी स्टानिकजई के सहपाठी रह चुके हैं। उन्हें एक साथ प्रशिक्षण के दौरान अपने समय का एक किस्सा याद आता है जब वे सप्ताहांत में लंबी पैदल यात्रा कर ऋषिकेश गए और गंगा नदी में स्नान किया। कर्नल शेखावत ने अंग्रेजी अखबार को बताया है ऋषिकेश में जब हम गंगा नदी में नहाने गए थे तबकी तैराकी की चड्डी में उनकी एक तस्वीर मौजूद है।

तालिबान में कैसे शामिल हुआ

उस समय तक भारतीय सैन्य संस्थान ने अफगानों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद वह लेफ्टिनेंट के रूप में अफगान नेशनल आर्मी में शामिल हुआ था। उसने सोवियत-अफगान युद्ध और अफगानिस्तान की मुक्ति के लिए लड़ाई लड़ी। इसके बाद साल 1996 में उसने सेना छोड़ दी और तालिबान में शामिल हो गया। 

लेकिन अफगान बलों के साथ उनके समय और उनके अंतरराष्ट्रीय अनुभव ने उन्हें तालिबान से अलग कर दिया। न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में, स्टानिकजई के पुराने दोस्त ने कहा कि वह शुरू में आतंकवादी संगठन के साथ अच्छी तरह से फिट नहीं थे।

हालाँकि, बाद में जब साल 1996 से 2001 के बीच जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर शासन किया, त​ब स्टानिकजई को उपविदेश मंत्री बनाया गया था। वह तालिबान शासन के दौरान अक्सर विदेशी मीडिया को इंटरव्यू देता था। बताया जाता है कि वह काफी अच्छी अंग्रेजी बोलता था।

1996 में, स्टानिकजई ने क्लिंटन प्रशासन से तालिबान शासित अफगानिस्तान की राजनयिक मान्यता प्राप्त करने के लिए कार्यवाहक विदेश मंत्री के रूप में वाशिंगटन डीसी की यात्रा की थी। बाद में जब अमेरिका ने तालिबान को अफगानिस्तान से उखाड़ फेंका तो स्टानिकजई भी बाकी कमांडर्स के साथ विदेश भाग गया था।

बता दें कि अफगानिस्तान में एक बार फिर तालिबान शासन करने की तैयारी में है। इसका शीर्ष नेतृत्व कौन है, सरकार में कौन शामिल होगा, इस बात को लेकर दुनिया भर में चर्चा जोरों पर है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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