Wednesday, April 21, 2021
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अदृश्य शत्रु हमारे जैसा ही दिखेगा, बोलेगा, रहन-सहन करेगा, ‘नज़र’ रखना जरूरी: अजित डोभाल

"देशहित में यही है कि देश प्रधानमंत्री की आवाज़ और उनके निर्णय, उनके विचार सुने, प्रधानमंत्री के सलाहकारों के नहीं। मैं उनका सलाहकार हूँ।"

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के चीफ इनोवेशन ऑफिसर डॉ अभय जेरे को एक साक्षात्कार दिया था। लोकसभा टीवी द्वारा प्रसारित यह साक्षात्कार डोवाल का एनएसए बनने के बाद संभवतः पहला विस्तृत साक्षात्कार था। इसे हम दो हिस्सों में प्रकाशित कर रहे हैं। पहला हिस्सा आप यहाँ पढ़ सकते हैं

दूसरे हिस्से के महत्वपूर्ण अंश:

‘जिसकी योजना न बना के चले हों…’

अगला सवाल था कि अजित डोवाल को अजित डोवाल क्या किसी एक घटना ने बनाया, और क्या उन्होंने चैतन्य रूप से अपनी उस मानसिकता का निर्माण किया, जिसके बारे में उन्होंने थोड़ी देर पहले बताया था। जवाब में डोवाल ने कहा कि पहली बात तो उनके चरित्र, मन और मानसिक स्थिति का निर्माण किसी एक घटना या कारण से नहीं हुआ। दूसरे, इसे चैतन्य रूप से, किसी योजना के तहत नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि जिस चीज़ की हम योजना पहले ही बना चुके हैं, उसका हमारे मन पर न्यूनतम प्रभाव होता है।

असल में मन का निर्माण और विकास उन चीजों से होता है जो हमारी योजना का हिस्सा नहीं होतीं। वह मिसाल अपने बचपन की देते हैं कि मिलिट्रीमैन पिता के पुत्र होने के बावजूद वो थोड़े से बिगड़े हुए और हद से अधिक संवेदनशील बच्चे थे क्योंकि बचपन से वह अपनी बहनों और बुआओं के प्यारे रहे। ऐसे में उन्हें हॉस्टल के जीवन से तालमेल बिठाने में शुरू में दिक्कत हुई। साथ ही यह अहसास भी हुआ कि यहाँ उनकी माँ बचाने नहीं आ सकतीं और वह अपने लिए खुद जिम्मेदार हैं। उस अहसास ने उन्हें स्वतंत्र स्वभाव का बनाया और एकांत को उनका मित्र। और सालों बाद जाकर यह एकान्तप्रियता और स्वातंत्र्य उन्हें गुप्तचर जीवन में सफल होने में सहायक बने।

अगली जो चीज उन्होंने योजना से नहीं की बल्कि हो गई और बाद में बहुत उपयोगी निकली, वह था मुक्केबाजी में चयन। डोवाल के अनुसार उनके स्कूल में हर छात्र का चयन एक खेल में होता था। उनके टीचर ने उन्हें मुक्केबाजी के लिए चुना। बकौल डोवाल, “मेरे सर ने कहा कि तुम हार नहीं मानते, मैदान नहीं छोड़ते। चाहे तुम दोस्तों से लड़ाई में कितनी भी बुरी तरह पिट जाओ, तुम हमेशा उठ कर एक बार फ़िर लड़ने जाने की कोशिश करते हो। और एक मुक्केबाज के लिए यही सबसे बड़ा गुण होना चाहिए। स्कूल में तुमसे भी ज्यादा कस कर मुक्का मार सकने वाले बहुतेरे छात्र हैं, पर उन्हें जब पलट कर 1-2 मुक्के पड़ेंगे तो वे बिलबिलाकर रिंग से बाहर निकल भागना चाहेंगे- जो कि तेरे साथ बिलकुल नहीं है।”

डोवाल के अनुसार मुक्केबाजी ने उनमें चोट सहने की क्षमता के अलावा धैर्य का भी विकास किया। और यह उनके तब काम आया, जब वो 7-7 साल तक पाकिस्तान में और उत्तर-पूर्व में तैनात रहे। इस दौरान वो बड़ी आसानी से इतने समय तक बैठकर योजना के आगे बढ़ने का इंतजार कर पाए। डोवाल ने पाक या उत्तर-पूर्व में दुश्मन के हाथों प्रताड़ित किए जाने की ओर भी हल्का-सा इशारा करते हुए कहा कि दुश्मन जितना चाहे उतना उन्हें प्रताड़ित कर लेता, लेकिन वो धैर्यपूर्वक समय बीतने की प्रतीक्षा करते थे। उन्होंने कहा, “मैंने यह सीखा कि आप पिट-पिटा कर भी अंत में विजेता बन कर उभर सकते हो।”

परिस्थितिजन्य बनाम ‘सही’ निर्णय के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह ‘बनाम’ एक false-binary होगा; यानि हर बार ऐसा जरूरी नहीं कि चैतन्य होकर जो ‘सही’ निर्णय लिया जाए, उसमें परिस्थिति का सहयोग न हो। असल में कई बार तो परिस्थिति इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है कि ‘सही’ और ‘गलत’ केवल आपकी प्रतिक्रिया भर बचती है, और परिणाम परिस्थितियों के हाथ में चला जाता है।

‘इलेक्ट्रॉनिक्स: ताकत भी, कमजोरी भी’

साक्षातकर्ता डॉ जेरे ने जब उन्हें बताया कि बहुत से छात्रों और युवाओं ने तकनीक की भविष्य के युद्धों में भूमिका के बारे में पूछा है तो डोवाल ने कहा कि पारंपरिक युद्ध तो अब जान-माल की कीमत के कारण और नाभिकीय हथियारों के प्रसार के चलते, लगभग नगण्य हो चुके हैं। ऐसे में आने वाला युद्ध क्षेत्र तकनीकी युद्धभूमि पर ही लड़ा जाना है।

डोवाल ने साफ़ किया कि पारंपरिक युद्ध न केवल बेवजह का विनाश करते हैं बल्कि उनसे इच्छित राजनीतिक और सामरिक परिणाम पाना भी मुश्किल होता जा रहा है। उन्होंने सोवियत रूस की तालिबान के हाथों और अमेरिका की वियतनाम के हाथों हार का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि कैसे विषम परिस्थितियों में अक्सर पारंपरिक रूप से ताकतवर सेनाएँ (रूस-अमेरिका) ‘कमज़ोर’ शत्रु (तालिबान-वियतनामी) से पार न पाकर अपने सामरिक लक्ष्य (आतंकवादियों का सफाया या वियतनाम को कम्युनिस्ट देश बनने से रोकना) पूरे नहीं कर पाईं।

आधुनिक और आगामी युद्ध-शैली को डोवाल ने चौथी पीढ़ी का युद्ध बताया, जिनमें शत्रु ‘अदृश्य’ होगा, और उसे देखने-पहचानने में सक्षम होना ही सबसे महत्वपूर्ण युद्ध-कौशल। ऐसे में गुप्त सूचनाओं का महत्व पहले से बढ़ जाता है। यह अदृश्य शत्रु हमारे जैसा ही दिखेगा, बोलेगा, रहन-सहन करेगा। लेकिन तब भी इसे 130 करोड़ की आबादी में तलाश पाने में गुप्त सूचना की महती भूमिका पर डोवाल ने जोर दिया।

साइबर को उन्होंने सीमाविहीन युद्धक्षेत्र की संज्ञा दी और कहा कि यहाँ पर एक बार घुसपैठ कर लेने पर यदि हम चाहें तो दुश्मन की विद्युत, आर्थिक, नागरिक उड्डयन, संचार आदि सभी क्षमताओं को एक ही झटके में ध्वस्त कर सकते हैं।

और इसीलिए इलेक्ट्रॉनिक्स एक ही समय पर दुश्मन के खिलाफ हमारा सबसे बड़ा हथियार भी है, और हमारी सबसे बड़ी कमजोरी भी।

‘फ़िल्में नहीं देखता, मॉल कभी गया नहीं, सामाजिक जीवन शून्य है’

एक छात्र का सवाल था कि जैसे उड़ी फ़िल्म में युवाओं का सर्जिकल स्ट्राइक में तकनीकी सपोर्ट द्वारा योगदान था, उस तरह क्या असल में भी छात्र और युवा महत्वपूर्ण सामरिक योगदान देते हैं। डोवाल ने जवाब में हालाँकि फ़िल्म पर टिप्पणी करने से मना कर दिया पर इसकी पुष्टि की कि सरकार, गुप्तचर एजेंसियाँ और डीआरडीओ युवा वैज्ञानिकों के शोधों और उनके द्वारा विकसित की जा रही उपयोगी नई टेक्नोलॉजी का स्वागत करते हैं। उन्होंने बताया कि हाल ही में उनके संज्ञान में आईआईटी मद्रास द्वारा विकसित की जा रही एक संभावित रूप से उपयोगी ड्रोन तकनीक आई है, और उन्होंने डीआरडीओ से उस तकनीक का विकास कर रही टीम का संपर्क कराया है।

उन्होंने यह साथ में जोड़ा कि ज्यादातर गुप्तचर एजेंसियाँ ज्यादा पसंद यह करतीं हैं कि अपने काम की टेक्नोलॉजी वे अपने आप से विकसित करें क्योंकि यह ज्यादा सुरक्षित उपाय है। पर अगर बाहर से कोई तकनीक लेनी ही पड़ती है तो हमेशा उसमें महत्वपूर्ण और अच्छे-खासे बदलाव कर दिए जाते हैं ताकि अविष्कारकर्ता की एजेंसी के तंत्र में संभावित तकनीकी घुसपैठ को रोका जा सके। साथ ही अविष्कारकर्ता को कभी यह पता नहीं होता कि वह जो तकनीक बेच रहा है, उसका अन्ततोगत्वा उपयोग कौन और कैसे करेगा।

अपने आधुनिक तकनीक से निजी सम्बन्ध के बारे में अजित डोवाल ने खुलासा किया कि न ही उनके पास कभी मोबाईल रहा, और न ही उन्होंने कभी इंटरनेट का प्रयोग कंप्यूटर पर किया है। वह इलेक्ट्रॉनिक संचार जैसे ईमेल, सोशल मीडिया आदि से भी दूर रहते हैं। कारण उन्होंने यह बताया कि उन्हें इस क्षेत्र से होने के कारण पता है कि इन उपकरणों में सामरिक सेंध कितनी आसान है। इसी में उन्होंने यह भी जोड़ा कि उन्होंने न कभी किसी पिक्चर हॉल में फ़िल्म देखी है न ही कभी किसी मॉल में कदम रखा है। यहाँ कारण यह था कि जब तक वह आईबी में थे, तब तक उनकी ड्यूटी का तकाजा यह था कि वे सार्वजनिक स्थलों पर, परिवार के साथ आदि कम-से-कम दिखें। और जब तक वह रिटायर हुए (2005), तब तक इन सब की इच्छा ही नहीं बची। अतः उन्होंने फ़िल्में केवल कभी-कभार टीवी पर ही देखी हैं।

युवाओं द्वारा अपने विचार जानने और अपने नाम से ‘उड़’ रही सामग्री पर उन्होंने बताया कि उन्होंने सार्वजनिक बयान बहुत कम दिए हैं। 2005 में रिटायर होकर 2009 में उन्होंने ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन’ नामक थिंक-टैंक बनाया और कुछ किताबें व शोध पत्र लिखे, कुछ भाषण दिए। बस इतना ही उनके द्वारा दिए बयान हैं। 2014 से वह एनएसए हैं और बहुत कम मौकों पर सार्वजनिक तौर पर उन्होंने कुछ बोला है।

उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल उन्हें जो कहना होता है, वह प्रधानमंत्री से सीधे कहते हैं। और लोग भी कहते हैं और प्रधानमंत्री उसके आधार पर निर्णय लेते हैं। देशहित में यही है कि देश प्रधानमंत्री की आवाज़ और उनके निर्णय, उनके विचार सुने, प्रधानमंत्री के सलाहकारों के नहीं।

‘अपनी पहचान देश से जोड़ो’

अंत में देश के छात्रों और युवाओं के नाम सन्देश में डोवाल ने उनसे आग्रह किया कि वे अपनी पहचान देश की पहचान से जोड़ें क्योंकि यह मानव का स्वभाव है कि जिस चीज़ से उसकी पहचान जुड़ जाती है, वह चीज़ की रक्षा वह स्वयंस्फूर्त हो करने लगता है। वह स्वामी विवेकानंद का संस्मरण सुनाते हैं कि कैसे एक बार एक जापानी जहाज पर यात्रा के दौरान स्वामीजी ने देखा कि एक भारतीय जापान को गाली दे रहा था क्योंकि उसे किसी कारणवश एक समय का भोजन नहीं मिल रहा था। एक जापानी ने उसे अपना एक वक्त का खाना देने की पेशकश की, और साथ में धमकी भी दी कि यदि उस भारतीय को जापानी ने जापान के विरुद्ध एक भी शब्द बोलते सुन लिया तो उसे उठा कर जहाज से पानी में फेंक देगा। डोवाल ने भारतीयों से भी अपने देश के प्रति ऐसी ही प्रचण्ड लगन उत्पन्न करने का आग्रह किया।

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