₹125 नहीं, ₹350 होगी हर दिन कमाई: आदिवासी महिलाओं के लिए वरदान होगी यह सिल्क मशीन

महिलाओं को पुराने तरीक़े से निजात दिलाने के लिए एक ऐसी मशीन का निर्माण किया गया, जो न केवल आदिवासी महिलाओं को उनकी आय बढ़ाने में मददगार साबित होगा बल्कि इस व्यवसाय से जुड़े स्वास्थ्य संबंधी ख़तरों से भी बचाएगा।

केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने शनिवार (9 फ़रवरी 2019) को आदिवासी महिलाओं को बुनियाद तसर सिल्क रीलिंग मशीनें वितरित की। बुनियाद रीलिंग मशीनें सिल्क उत्पादन में देश की आदिवासी महिलाओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पारम्परिक तरीकों को बदल कर उन्हें ज्यादा सक्षम बनाने के लिए हैं। साथ ही इससे घरेलू आय को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।

भारत में प्रतिवर्ष 32,000 मीट्रिक टन रेशम का उत्पादन होता है। शहतूत सिल्क, तसर सिल्क, मुगा सिल्क और एरी सिल्क भारत में उत्पादित सिल्क के मुख्य प्रकार हैं। कुल सिल्क उत्पादन में शहतूत का योगदान लगभग 80% है।

भारत में तसर सिल्क उत्पादन मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, उड़ीसा आदि राज्यों में होता है। इन राज्यों में रहने वाली आदिवासी महिलाओं की आय का यह एक प्रमुख स्रोत है। भारत प्रति वर्ष 2,080 मीट्रिक टन तसर सिल्क का उत्पादन करता है, जो कुल सिल्क उत्पादन का लगभग 6.5% है।

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तसर सिल्क रीलिंग एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें कोकून से रेशा निकाला जाता है। परम्परागत रूप से, यार्न रीलिंग पारम्परिक तरीक़ों द्वारा निकाला जाता है, जिसे थाई रीलिंग कहते हैं। इसमें, रील करने वाले व्यक्ति को फ़र्श पर क्रॉस-लेग्ड बैठना पड़ता है, सोडियम कार्बोनेट में पकाए गए कोकून से जांघों को नुक़सान होता है, जिससे घाव भी हो जाते हैं। बता दें कि इस दौरान कुछ मात्रा में राख पाउडर, तेल और स्टार्च का भी उपयोग किया जाता है।

इस प्रक्रिया के माध्यम से, आदिवासी महिलाएँ 70 डेनियर यार्न का प्रतिदिन औसतन 70 ग्राम उत्पादन करती हैं। तसर सिल्क का ज्यादातर उत्पादन थाई रीलिंग के माध्यम से किया जाता है। यह प्रक्रिया न केवल आदिवासी महिलाओं के लिए हानिकारक होती है, बल्कि इस पारंपरिक तरीक़े से निकाले गए यार्न की प्रक्रिया धीमी भी होती है। दूसरी बात यह कि थाई रीलिंग करने वाली महिलाएँ दिन भर में मात्र 125 रुपए तक ही कमा पाती हैं।

महिलाओं की इसी तक़लीफ़ को समझते हुए छत्तीसगढ़ स्थित चंपा के एक उद्यमी ने उनके लिए एक अनोखा काम किया। महिलाओं को पुराने तरीक़े से निजात दिलाने के लिए उन्होंने एक ऐसी मशीन का निर्माण किया, जो न केवल आदिवासी महिलाओं को उनकी आय बढ़ाने में मददगार साबित होगा बल्कि इस व्यवसाय से जुड़े स्वास्थ्य संबंधी ख़तरों से भी बचाएगा। उद्यमी द्वारा बनाई गई बुनियाद रीलिंग मशीन के माध्यम से एक महिला प्रतिदिन 200 ग्राम सिल्क के धागे का उत्पादन कर सकती है, जिससे उसकी आय प्रतिदिन 350 रुपए तक बढ़ सकती है। निर्माता की इच्छानुसार मशीन को बिजली द्वारा या पैरों से चलाया जा सकता है।

कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी ने उम्मीद जताई है कि थाई रीलिंग तक़नीक से मशीन आधारित रीलिंग को 2020 की बजाए इसी वर्ष परिवर्तित किया जाएगा। कार्यक्रम में एक मोबाइल एप्लिकेशन ई-कोकून भी लॉन्च किया गया, जो रेशम क्षेत्र में गुणवत्ता प्रमाणन में मदद करेगा। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी वैश्विक बाज़ारों में सिल्क को बढ़ावा देने के लिए समर्थन देने का वादा किया।

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