मटन खरीदने वाले सावधान: बेचा जा रहा बीफ मिलाकर, विजयवाड़ा में 3 बूचड़खानों पर लगाया गया ताला

500 से 600 रुपए/Kg के हिसाब से बिकने वाले मटन की तुलना में गोमांस 250 रुपए से 300 रुपए/Kg की सस्ती कीमत पर उपलब्ध है। इसलिए बूचड़खाने वाले सस्ते दामों में बीफ खरीदकर उसे मटन के साथ मिलावट करके बेच रहे।

आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में रविवार (नवंबर 24, 2019) को मटन में बीफ (गोमांस) मिलाकर बेचने का मामला सामने आया। इसके बाद सोमवार को तीन बूचड़खानों का लाइसेंस रद कर दिया गया। वेटरिनरी विंग के प्रमुख नथालपति श्रीधर को स्थानीय लोगों से मटन में बीफ मिलाकर बेचने की शिकायत मिली थी। इसके बाद उन्होंने कई स्थानों पर औचक निरीक्षण किया और त्वरित कार्रवाई करते हुए उन बूचड़खानों का लाइसेंस रद कर दिया

उनकी टीमों ने अयोध्यानगर, जेम्मी चेट्टू केंद्र और सुन्नपु बटीला केंद्र में गोमांस बेचने वाले बूचड़खानों की पहचान की और लगभग 200 किलोग्राम मिलावटी मांस (मटन+बीफ) जब्त किया। नागरिक निकाय ने तीनों दुकानों पर 10,000 रुपए का जुर्माना लगाने के साथ ही और ट्रेड लाइसेंस भी रद कर दिया। श्रीधर ने मीट खरीदते समय लोगोंं को सतर्क रहने की सलाह दी और साथ ही कहा कि वो शहर में निरीक्षण जारी रखेंगे और आने वाले दिनों में मीट कारोबारियों पर कड़ी कार्रवाई करेंगे।

इससे पहले श्रीधर ने शनिवार (नवंबर 23, 2019) को कहा था, “हमें पता चला कि शहर में कुछ कसाई मटन की मिलावट कर रहे हैं और शहर के होटल और रेस्तरां को बेच रहे हैं। इस संबंध में नागरिक निकाय ने होटल व्यवसायियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का फैसला किया है। अगर वे मिलावटी मांस बेचते पाए जाते हैं, तो उनके ट्रेड लाइसेंस मौके पर रद कर दिए जाएँगे।”

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बता दें कि 4 नवंबर को भी तडेपल्ली पुलिस ने एक बीफ तस्करी रैकेट का भांडाफोड़ किया था और लगभग 10 टन संदिग्ध गोमांस जब्त किया था। विशाखापत्तनम से चेन्नई तक एक कंटेनर में मांस की तस्करी की जा रही थी। इस संबंध में ड्राइवर और क्लीनर को हिरासत में ले लिया गया था। साथ ही पुलिस ने पशु चिकित्सा विभाग के अधिकारियों को यह पता लगाने के लिए कहा था कि जब्त मांस गोमांस था या फिर किसी अन्य जानवर का। उस गोमांस को आंध्र-ओडिशा सीमा (AOB) से तमिलनाडु ले जाया जा रहा था। गुप्त सूचना के आधार पर ताड़पल्ली पुलिस ने कनक दुर्गम्मा वरदही में कंटेनर को रोक लिया और गोमांस के स्टॉक को जब्त कर लिया।

इन घटनाओं को देखकर ऐसा लग रहा है जैसे कि ये धंधा बड़े पैमाने पर फैला हुआ है। हालाँकि अभी सिर्फ तीन बूचड़खानों में ही मटन के साथ बीफ मिलाकर बेचने की बात की पुष्टि हो पाई है, लेकिन जिस तरह से आंध्र-ओडिशा सीमा (AOB) से तमिलनाडु के रास्ते गोमांस को ले जाया जा रहा है, उससे प्रतीत हो रहा है कि इसका नेटवर्क काफी बड़े क्षेत्र में पैर पसारे हुए है।

विजयवाड़ा में सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के साथ नामांकित लगभग 300 मटन स्टॉल और 30 बीफ़ स्टॉल हैं। जिनमें से कुछ बूचड़खाने वाले बीफ के साथ मटन की मिलावट करके मोटा पैसा कमा रहे हैं। बता दें कि शहर में लगभग 500 से 600 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकने वाले मटन की तुलना में गोमांस 250 रुपए से 300 रुपए प्रति किलोग्राम की सस्ती कीमत पर उपलब्ध है। इसलिए बूचड़खाने वाले सस्ते दामों में बीफ खरीदकर उसे मटन के साथ मिलावट करके बेच रहे हैं।

बता दें कि मांस भी दो प्रकार के होते हैं- हलाल और झटका। झटका सर्टिफिकेशन अथाॅरिटी के चेयरमैन रवि रंजन सिंह बताते हैं कि ‘झटका‘ हिन्दुओं, सिखों आदि भारतीय, धार्मिक परम्पराओं में ‘बलि/बलिदान’ देने की पारम्परिक पद्धति है। इसमें जानवर की गर्दन पर एक झटके में वार कर रीढ़ की नस और दिमाग का सम्पर्क काट दिया जाता है, जिससे जानवर को मरते समय दर्द न्यूनतम होता है। इसके उलट हलाल में जानवर की गले की नस में चीरा लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जानवर खून बहने से तड़प-तड़प कर मरता है।

इसके अलावा मारे जाते समय जानवर को मुस्लिमों के पवित्र स्थल मक्का की तरफ़ ही चेहरा करना होगा। लेकिन सबसे आपत्तिजनक शर्तों में से एक है कि हलाल मांस के काम में ‘काफ़िरों’ (‘बुतपरस्त’, गैर-मुस्लिम, जैसे हिन्दू) को रोज़गार नहीं मिलेगा। यानी कि यह काम सिर्फ मुस्लिम ही कर सकता है।

वे इसका अगला आर्थिक पहलू बताते हैं कि किसी भी भोज्य पदार्थ, चाहे वे आलू के चिप्स क्यों न हों, को ‘हलाल’ तभी माना जा सकता है जब उसकी कमाई में से एक हिस्सा ‘ज़कात’ में जाए- जिसे वे जिहादी आतंकवाद को पैसा देने के ही बराबर मानते हैं, क्योंकि हमारे पास यह जानने का कोई ज़रिया नहीं है कि ज़कात के नाम पर गया पैसा ज़कात में ही जा रहा है या जिहाद में। और जिहाद काफ़िर के खिलाफ ही होता है- जब तक यह इस्लाम स्वीकार न कर ले! यानी जब कोई गैर-मुस्लिम हलाल वाला भोजन खरीदता है, तो वह उसका एक हिस्सा अपने ही खिलाफ होने जा रहे जिहाद को आर्थिक सहायता देने में खर्च करता है। इसे वह ‘हलालो-नॉमिक्स’ यानी हलाल का अर्थशास्त्र कहते हैं।

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