कल गुरूद्वारे पर हमले के बाद पूरा अफगानिस्तान अपने सिख-हिन्दू भाइयों के लिए उमड़ पड़ा और अपनी सहानुभूति व्यक्त कर उसके साथ खड़े होने की दृढ़ता दिखाई। इस हमले पर अभी तक तालिबान की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। इस्लामिक स्टेट ने इसकी जिम्मेदारी लेकर एक बार फिर अपना घिनौना चेहरा दुनिया के सामने रख दिया। इधर भारत में लिबरल-वामपंथी गिरोह इसको लेकर चुप्पी साधे हुए है। जैसे उसने सुकमा में नक्सली हमले के वक्त साधा था।
अफगानिस्तान में 29 फरवरी को शांति समझौता हुआ था। हमलों से पहले ट्रंप और तालिबानी नेता मुल्ला बरादर के बीच बातचीत भी हुई थी। ताजा हमलों से शांति समझौता टूटने की कगार पर पहुॅंच गया है।
"सोशल मीडिया और व्हाट्सएप जैसे मैसेजिंग एप के ज़रिए लोगों को आतंकवादी बनाने को लेकर काम तेज़ी से चल रहा है। इस सम्बन्ध में भारतीय अधिकारियों ने वैश्विक सोशल मीडिया कम्पनियों के प्रतिनिधियों से भी मुलाक़ात की है।"
तालिबान द्वारा आजाद किए गए तीनों इंजीनियर, उन्हीं 7 भारतीयों में से हैं, जिनका पिछले वर्ष अफगानिस्तान में अपहरण हुआ था। इन्हें अफगानिस्तान के बघनाल प्रांत से अगवा किया गया था। सातों इंजीनियर केईसी कंपनी की ओर से वहाँ में एक पॉवर प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे।
तालिबान ने कश्मीर को अफ़ग़ानिस्तान से न जोड़ने की हिदायत दी है। तालिबान के प्रवक्ता ने कहा है कि कुछ पक्षों द्वारा कश्मीर को अफ़ग़ानिस्तान से जोड़ कर देखना समस्या को खत्म नहीं करेगा, क्योंकि कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान अलग-अलग मसले हैं।