Saturday, November 28, 2020
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‘मेरे पिता ने तालिबानियों को दिया था ID कार्ड’: जॉब छुड़ाने के लिए अफगान महिला की आँख में घोपा गया चाकू, चली गोलियाँ

“काश मैं पुलिस में कम से कम एक साल काम कर पाती। अगर ऐसा होता तो ये सब मुझे कम दुख देता। ये सब बहुत जल्दी हुआ। मुझे सिर्फ़ काम मिला था और सपने साकार करते हुए सिर्फ़ 3 महीने हुए थे।”

अफगानिस्तान के काबुल में तालिबानियों ने एक मुस्लिम महिला की आँख में चाकू मारकर उन्हें हमेशा के लिए अंधा बना दिया। उनकी गलती बस ये थी कि वो घर से निकल कर जॉब करने जाती थीं। तालिबानियों को उनकी यही आत्मनिर्भरता नागवार गुजरी और एक दिन उनके दफ्तर से घर लौटते हुए उनपर हमला बोल दिया।

पूरी घटना अफगानिस्तान के गजनी प्रांत की है। खटेरा नाम की 33 वर्षीय महिला ने कुछ समय पहले क्राइम ब्रांच में एक अधिकारी के तौर पर काम करना शुरू किया था। एक दिन पुलिस थाने से काम पूरा करके वह घर लौट रही थीं तभी तालिबानियों ने उन्हें पकड़ा और उनपर गोली चला दी। इसके बाद उनकी आँख में चाकू घोपे गए।

जब महिला को होश आया तो वह अस्पताल में थीं। उन्होंने होश आने पर डॉक्टरों से पूछा कि आखिर वह देख क्यों नहीं पा रहीं? इस पर डॉक्टर्स का जवाब था कि आँख में चोट लगने के कारण बैंडेज लगी हुई है इसलिए वह देखने में असमर्थ हैं। हालाँकि, खटेरा को एहसास हो चुका था कि उनकी आँखें निकाल ली गई हैं।

उन्होंने अपने साथ हुई इस बर्बरता के लिए तालिबानियों को जिम्मेदार ठहराया। मगर तालिबानी इसमें अपनी संलिप्ता को खारिज करते रहे और इन सबके लिए महिला के पिता को आरोपित बताया। उन्होंने कहा कि महिला के पिता के कहने पर उस पर हमला हुआ क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि खटेरा बाहर काम करे।

अब यह हमला चाहे किसी के कारण भी हुआ है मगर इसने खटेरा की न केवल जिंदगी खराब की है बल्कि उसके सपनों को भी तोड़ दिया है। इस हमले के कारण सिर्फ़ उनकी आँखे नहीं गईं बल्कि उन्होंने जो आत्मनिर्भर होने के सपने देखे थे वह भी चकनाचूर हो गए। घटना से कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपने सपने को साकार करने के लिए क्राइम ब्रांच में काम करना शुरू किया था। लेकिन वह वहाँ एक साल भी अपनी सेवा नहीं दे पाईं।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, वह कहती हैं, “काश मैं पुलिस में कम से कम एक साल काम कर पाती। अगर ऐसा होता तो ये सब मुझे कम दुख देता। ये सब बहुत जल्दी हुआ। मुझे सिर्फ़ काम मिला था और सपने साकार करते हुए सिर्फ़ 3 महीने हुए थे।”

इस हमले पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी अपना विरोध प्रकट किया। उन्होंने तालिबानियों के ख़िलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया। उनका मानना है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा सेना वापस बुलाए जाने के बाद से अफगानिस्तान के रूढिवादी और तालिबानी फायदा उठा रहे हैं।

खटेरा का बचपन से सपना था कि वह घर से निकल कर दफ्तर जाएँ और काम करें। लेकिन उसके पिता हमेशा से इसका इंकार करते थे। शादी के बाद उसने अपने शौहर का समर्थन पाया मगर पिता तब भी उसके घर से बाहर निकलने का विरोध करते रहे।

वह बताती हैं, “कई बार जब मैं ड्यूटी पर जाती थी तो मेरे पिता मेरा पीछा करते थे। उन्होंने आसपास के इलाके में तालिबान से संपर्क रखना शुरू कर दिया था और उनसे कहने लगे थे कि वह मुझे मेरी जॉब करने से रोकें।”

खटेरा के मुताबिक उनके पिता ने ही तालिबानियों को उनकी आईडी कार्ड की कॉपी दी थी ताकि यह साबित कर सकें कि वो पुलिस में काम करती हैं। जिस दिन हमला हुआ उस दिन भी महिला के पिता उसे लगातार कॉल कर रहे थे और उससे उसकी लोकेशन पता कर रहे थे।

गजनी पुलिस ने भी यह माना है कि इस हमले के पीछे तालिबानियों का ही हाथ था। उन्होंने खटेरा के पिता को कस्टडी में भी लिया। वहीं तालिबान प्रवक्ता ने कहा कि उनके समूह को पूरे मामले का पता था लेकिन उनका इसमें कोई हाथ नहीं है क्योंकि यह पारिवारिक मामला था।

खटेरा अब अपने परिवार के साथ काबुल में छिपी हुई हैं। वह पहले से बेहतर हैं लेकिन करियर खत्म होने का दुख उनसे बर्दाश्त नहीं हो पाता। अपने पिता की गिरफ्तारी के कारण उन्हें अपनी माँ की उलाहनाओं को झेलना पड़ रहा है जिसके कारण उन्हें रातों में नींद तक नहीं आती। उन्हें बस यही उम्मीद है कि डॉक्टर किसी तरह उन्हें उनकी दृष्टि लौटा दें।

वह कहती हैं, “अगर ऐसा मुमकिन हुआ और मुझे दोबारा दिखने लगा तो मैं अपनी जॉब दोबारा शुरू करूँगी।” वह आय की आवश्यकता पर बात जरूर करती हैं, लेकिन साथ में यह भी कहती हैं कि घर के बाहर जाकर नौकरी उनका जुनून है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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