Wednesday, December 2, 2020
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क्या अफगान-तालिबान शांतिवार्ता की घुटन का परिणाम है ISIS द्वारा गुरूद्वारे पर हमला, भारत में लिबरल-वामपंथी गिरोह की चुप्पी के मायने?

तालिबान और अफगान सरकार के बीच चल रहे शांति वार्ता से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। जिसके कारण वो अफगान में अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों को निशाना बना रहा है। इस्लामिक स्टेट पाकिस्तान का प्रॉक्सी है। पाकिस्तान भले ही अपनी धृष्टता लोगों से छुपाता रहा हो लेकिन भारत सहित अन्य शांतिप्रिय देश पाकिस्तान के मुजाहिदों के इस हरकत को नज़रंदाज़ नहीं करेगा।

इस बीच चाइनीज़ लोगों के खाने-पीने की गलत आदतों से फैले वुहान वायरस से पूरी दुनिया संकटग्रस्त है और उधर अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के मुजाहिदों ने काबुल के शोरबाज़ार इलाके के अकेले गुरूद्वारे में आत्मघाती हमला कर 27 सिख श्रद्धालु की कायरतापूर्ण हत्या कर दी। इस संकट की घड़ी में इस्लामिक स्टेट के धार्मिक रूप से संकटग्रस्त सिख-हिन्दू लोगों पर हमले ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया हैl इस हमले के बाद ऐसा लगता है कि इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट की कमर टूटने में कोई कसर बाकि रह गई थी। इस कारण इसके आतंकी अपनी आदतों से बाज नहीं आ रहे हैं। इस्लामिक स्टेट का भले ही इराक-सीरिया से खात्मा हो रहा है लेकिन भारत में इसके ब्रीडिंग ग्राउंड अभी भी मौजूद हैं। अभी हाल ही में पश्चिम बंगाल से इसके एक मॉड्यूल का खुलासा हुआ है। जो भारत में किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रहा है।  

गौरतलब है कि कल यानी 25 मार्च को जब ये हमला हुआ उस वक़्त अरदास के लिए गुरुद्वारे में कई छोटे-छोटे बच्चे भी मौजूद थे। हमले के बाद हर तरफ चीख-पुकार मची हुई थी। सुरक्षाकर्मियों ने जब उन्हें बाहर निकाला, तब उनके चेहरे पर खौफ साफ दिखाई दे रहा था।

हमले के समय का चुनाव 

सिखों पर इस हमले का चुनाव इस्लामिक स्टेट के मुजाहिद उस वक्त किए जब अफगानिस्तान के गिने-चुने हिन्दू और सिख वैशाख का पर्व मनाते हैं। इस पर्व को अफगानिस्तान के हिन्दू और सिख बहुत ही उत्साह से मनाते हैं। हालाँकि, यह अफगानिस्तान के सिखों और हिन्दुओं पर कोई पहला हमला नहीं है। इसके पूर्व वर्ष 2018 में इसी तरह से इस्लामिक स्टेट के मुजाहिदों ने अफगानी राष्ट्रपति से मिलने जा रहे हिन्दू और सिखों से भरे हुए बस को बम से उड़ाकर 20 लोगों की जघन्य हत्या कर दी थी।  

इस हत्या का मकसद बेशक जिहाद तो है ही लेकिन इसका एक मायना यह भी है कि इस्लामिक स्टेट के जिहादी इस बात से खफा हैं कि अफगान सरकार और तालिबान के बीच चल रहे शांति समझौते के लिए सरकार ने इस्लामिक स्टेट को क्यों नहीं आमंत्रित किया।

पाठकों की सहूलियत के लिए एक बात का जिक्र कर दूँ कि मुजाहिद और तालिबानियों में अंतर है– मुजाहिद वो हैं जिसने रूस की लाल सेना के विरुद्ध अमरीका और पाकिस्तान के संरक्षण में जंग किया था। मुजाहिद का निर्माण कोई नया नहीं है। मुजाहिद, जिहाद के लिए लड़ने वाले लड़ाके होते हैं। ब्रिटिश काल में ये अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला लड़ाई करते थे। अफगानिस्तान के प्रसिद्ध इतिहासकार फैज मोहम्मद कितब हजारा मुजाहिदों के बारे में लिखते हैं कि मुजाहिद अफगानी सरदारों के लड़ाके होते थे जो कि लूट, बलात्कार और हत्याओं के लिए कुख्यात थे। इसलिए उनका निशाना हमेशा काबुल रहा क्योंकि काबुल में पर्याप्त धन संपदा थी।

समय-समय पर इन मुजाहिदों ने अफगानिस्तान के हिन्दू और सिखों को निशाना बनाया क्योंकि हिन्दू और सिख बहुत धनवान थे l इन पर हमला करके इनको मालो-असबाब तो मिलता ही था, साथ ही साथ काफिरों की हत्या का मजहबी लुत्फ़ उठाकर ये जन्नत की गारंटी भी ले लेते थे। हिन्दू और सिखों पर इन मुजाहिदों के इन लगातार मजहबी हमले का ये असर हुआ कि जहाँ 1970 तक काबुल और उसके आसपास के क्षेत्रों में 7 लाख के आसपास हिन्दू और सिख बिरादरी रहते थे। अफगान वार के ख़त्म होते होते-यानि 1990 तक इनकी आबादी महज कुछ हजारों में सिमट गई। मुजाहिदों के इस बेरहम हमले से सिख और हिन्दू बिरादरियों के मंदिर और गुरूद्वारे बुरी तरह तबाह हो गए और ज्यादातर हिन्दू और सिख अफगानिस्तान के अपने कारोबार समेट कर दूसरे मुल्कों का रुख कर लिए। 

इसके उलट तालिबानी मुजाहिद अफगानिस्तान में शरिया लागू करने के पक्षधर हैं। हालाँकि, इनका विचार भी मुजाहिदों की ही तरह है लेकिन सर्वहारा विचारों की वकालत करने वाले तालिबानियों ने काबुल की जगह अपना ठिकाना कंधार को बनाया। कंधार अफगानिस्तान का एक पिछड़ा इलाका है। कंधार को अपना केंद्र बनाने के पीछे तालिबानियों का इस्लाम की तरफ ज्यादा झुकाव को दर्शाना और व्यापक जनसमर्थन हासिल करना है। साथ-साथ तालिबानी,  इन बर्बर मुजाहिदों से इस रूप में भी अलग है कि तालिबानी अपने विरोधियों पर हमला करने के बाद उनकी प्रॉपर्टी नहीं लूटते हैं। उनकी खबातीनों को आपस में बाँट कर उनका बलात्कार नहीं करते हैं। इसलिए इन तालिबानियों के शासन में बचे हुए सिखों और हिन्दुओं को थोड़ी राहत भी मिली क्योंकि इन लोगों ने काबुल में रह रहे हिन्दू-सिख सहित अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना कम बनाया।

तालिबानियों के इसी शासनकाल में हिन्दुओं और सिखों को अपने घर और बदन पर पीला कपड़ा बाँधने को कहा गया था। जिसका मौलिक कारण हिन्दू-सिखों की धार्मिक पहचान हो सके और नमाज या अन्य इस्लामिक मूल्यों की अवमानना करने वाले मुस्लिमों को दंड देते वक्त हिन्दू और सिख को इससे अलग किया जा सके। हालाँकि, बाद में इस प्रथा का ब्रिटेन और अमरीका में विरोध भी हुआ लेकिन यह प्रथा वहाँ निर्बाध रूप से जारी है। वर्त्तमान में इस्लामिक स्टेट के खतरे कम नहीं हुए हैं आज ये मुजाहिदीन भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ पाकिस्तान का प्रॉक्सी वार लड़ रहे हैं।  

इन हमलों के मायने क्या हैं? 

अफगानिस्तान में भारत के विकास कार्यों में अभूतपूर्व योगदान से पाकिस्तान तिलमिलाया हुआ है। आज बड़ी संख्या में अफगानी छात्र भारत में आकर पढ़ाई करते हैं। किसी भी अन्य मुल्कों के मुकाबले अफगानी भारत के लोगों को बहुत मोहब्बत करते हैं। अफगानी भारतीय फिल्मों के दीवाने हैं और अभी भी भारतीय फिल्मों के पुराने गाने वहाँ के लोग बड़े मोहब्बत से गुनगुनाते हैं। इसके उलट पाकिस्तान के प्रति इस देश में वो लगाव नहीं है। पाकिस्तान भी अफगानियों के बीच संबंधों को ऑर्गेनिक करने के लिए भारत की नकल करता है लेकिन वो उसमें कभी सफल नहीं रहा। अभी तालिबान और अफगान सरकार के बीच चल रहे शांति वार्ता से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। जिसके कारण वो अफगान में अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों को निशाना बना रहा है। बेशक इस्लामिक स्टेट पाकिस्तान का प्रॉक्सी है। पाकिस्तान भले ही अपनी धृष्टता लोगों से छुपाता रहा हो लेकिन भारत सहित अन्य शांतिप्रिय देश पाकिस्तान के मुजाहिदों के इस हरकत को नज़रंदाज़ नहीं करेगा।  

कल गुरूद्वारे पर हमले के बाद पूरा अफगानिस्तान अपने सिख-हिन्दू भाइयों के लिए उमड़ पड़ा और अपनी सहानुभूति व्यक्त कर उसके साथ खड़े होने की दृढ़ता दिखाई। इस हमले पर अभी तक तालिबान की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। इस्लामिक स्टेट ने इसकी जिम्मेदारी लेकर एक बार फिर अपना घिनौना चेहरा दुनिया के सामने रख दिया। इधर भारत में लिबरल-वामपंथी गिरोह इसको लेकर चुप्पी साधे हुए है। जैसे उसने सुकमा में नक्सली हमले के वक्त साधा था। भारत के वामपंथियों का एक धड़ा अभी जिनपिंग सरकार को डिफेंड करने में लगा है, और एक धड़ा (रसिया समर्थक) जी जिनपिंग को उखाड़ फेंकने की बात कर रहा है। खैर वक्त सबका हिसाब करता है।

नोट : यहाँ सिख-हिन्दू का अर्थ अफगानिस्तान और पाकिस्तान के लिए एक इकाई की तरह है, क्योंकि इन मुल्कों में धार्मिक स्थलों के विनाश, शिक्षा से वंचना और उत्पीड़न दोनों समुदायों के मामूली धार्मिक विभेद को ख़त्म कर दिया है और ये कमोबेश धार्मिक स्थल और पर्व को आपस में शेयर करते हैं।

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