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ऑस्ट्रेलिया में यहूदियों का कत्लेआम करने वाले मुस्लिम बाप-बेटे ‘इस्लामिस्ट’ हैं, ‘इस्लामिक’ नहीं: आरफा खानम ने बदल ली ‘स्ट्रेटजी’ ताकि आतंकवाद के ‘मजहब’ पर न हो बात

आरफा खानम की तकरीर सुनने के बाद मुस्लिमों ने अपनी 'स्ट्रेटेजी' कितनी बदली इसका कोई स्पष्ट उदाहरण नहीं है लेकिन इन लोगों के हमलों से मजहब को बचाने के लिए आरफा ने अपनी 'स्ट्रेटेजी' जरूर बदल ली है। अब वो 'इस्लामिस्ट' शब्द लेकर आई हैं।

ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में बीते रविवार (14 दिसंबर 2025) को पाकिस्तानी मूल के नवीद अकरम (24) और उसके अब्बू साजिद अकरम (50) ने यहूदियों को निशाना बनाते हुए गोलीबारी की और 16 लोगों की जान ले ली। मकसद, मकसद वही था जो अक्सर ऐसे आतंकियों का होता है, लोगों में दहशत फैलाना और दिखाना कि वो सबसे ताकतवर हैं।

जब भी कोई मजहबी उन्माद के नाम पर कत्लेआम करता है तो उसके नए नई-नई शब्दावलियाँ गढ़ दी जाती हैं। कभी उसे मानसिक बीमार बताया जाता है तो कभी पीड़ित तो कभी हेडमास्टर का बेटा। ऐसी ही कोशिश अब ‘द वायर’ की प्रोपेगेंडाबाज पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने शुरू की है। उसने इन आतंकियों को ‘इस्लाम के नाम का गलत इस्तेमाल’ करने वाला बताया है।

CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान आरफा ने मुस्लिमों से कहा था, “हम अपनी विचारधारा से समझौता नहीं कर रहे बल्कि अपने तरीके और स्ट्रेटेजी बदल रहे हैं।” आरफा खानम की तकरीर सुनने के बाद मुस्लिमों ने अपनी ‘स्ट्रेटेजी’ कितनी बदली इसका कोई स्पष्ट उदाहरण नहीं है लेकिन इन लोगों के हमलों से मजहब को बचाने के लिए आरफा ने अपनी ‘स्ट्रेटेजी’ जरूर बदल ली है। अब वो ‘इस्लामिस्ट’ शब्द लेकर आई हैं।

सिडनी हमले के कुछ दी देर बाद आरफा ने ‘X’ पर एक पोस्ट किया। आरफा ने लिखा, “बोंडी बीच पर हुआ हमला एक शांतिपूर्ण यहूदी सभा को निशाना बनाकर किया गया इस्लामी (Islamist) आतंकी हमला है। इसमें कोई भ्रम या दो राय नहीं है। यह इंसानियत के खिलाफ नफरत से भरा एक कायर और बर्बर कृत्य है।”

आरफा की इस बात पर उनकी विचारधारा के लोग ही भड़क गए। मोहम्मद जुनैद नाम के एक यूजर ने लिखा, “घटना निंदनीय है लेकिन इस्लाम का दहशतगर्दी से कोई वास्ता नहीं है। बहन Islamist हटाएगीं तो अच्छा रहेगा।” इस पर आरफा ने सफाई देते हुए कहा, “भाई गौर से पढ़िए ‘इस्लामिक’ नहीं ‘इस्लामिस्ट’ है। यानि इस्लाम के नाम का गलत इस्तेमाल। अरबी नाम वाले कुछ लोग धर्म को हाइजैक और बदनाम करना चाहते हैं अपने नापाक इरादों के लिए।”

एक अन्य X पोस्ट में आरफा ने लिखा, “गलत पढ़ रहे हैं। इस्लामिक नहीं इस्लामिस्ट। इतना ही फर्क है जितना जमीन और आसमान में।” इन सब चर्चाओं, नामों के जरिए असल कोशिश होती है उस विचार को छिपाने की जिससे प्रेरित होकर नवीद या साजिद जैसे शख्स आतंकी बनते हैं। क्या है उसकी विचारधारा, वो ISIS से प्रेरित था, ISIS यानी इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक ऐंड सीरिया। यह संगठन किसके नाम पर चलता है और क्या चाहता है, ये किसी से छिपा नहीं है। ISIS ‘खिलाफत’ स्थापित करना चहाता है और पूरी दुनिया में इस्लामी शासन चाहता है।

ISIS जैसे आतंकी समूहों की भरमार है, लश्कर-ए-तैयबा से लेकर जैश-ए-मोहम्मद और हरकत-उल-मुजाहिदीन तक दुनिया के इन तमाम आतंकी संगठनों के नाम भर का अर्थ ही अगर पता कर लिया जाए तो समझ आ जाएगा कि आतंक की असल विचारधारा कहाँ से आती है। अमेरिका में आतंकी हमला हो, दिल्ली में हो या सिडनी में हो, हर हमले के पीछे एक ही मजहबी विचार प्रेरित लोग क्यों मिलते हैं?

नए-नए शब्दों की आड़ में ‘आतंक के मजहब’ को वॉइटवॉश करने की कोशिशें लंबे समय तक चलती रही हैं। ‘इस्लामिक कट्टरता’ को नए शब्द गढ़ कर बचाने की आरफा जैसे ‘बौद्धिक जिहादियों’ की कोशिशें दुनिया देख रही है लेकिन सच क्या है ये किसी से छिपा नहीं है। ‘अल्लाह-हू-अकबर’ कहकर जब हमला किया जाता है तो उन आतंकियों की विचारधारा स्पष्ट नजर आती है।

हर आतंकी हमले का पैटर्न एक जैसा होता है। कोई भी आतंकी हमला आप उठाकर देखिए वही ट्रेनिंग, वही विचारधारा और वही ‘पाक जंग’ के नाम पर खुद को मिटाने को तैयार जिहादी आपको नजर आएँगे। यह आतंक किसी सामाजिक असमानता, गरीबी, भूख, रोजगार की कमी से नहीं बल्कि महजबी कट्टरता की फैक्ट्री से निकलता है, जहाँ युवाओं को यह सिखाया जाता है कि हिंसा ही खुदा की इबादत है और हत्या या मौत जन्नत का शॉर्टकट है।

दुनिया की तथाकथित उदार लॉबी वर्षों से नाम बदलकर सच ढकने में लगी रही। विचारधारा से जुड़े लोगों ने आतंकी संगठनों और आतंकियों को पैसे से लेकर संसाधन तक सब मुहैया कराए। कभी अच्छे आतंकवादी-बुरे आतंकवादी का नाम देकर तो कभी अपने वैचारिक एजेंडे के लिए जिहादी समर्थक चुप्पियाँ ओढ़े बैठे रहे और कट्टरता हर सीमा को पार कर अब दुनिया भर में खून-खराबा कर रही है।

अब समय आ गया है कि आतंक को बचाने के लिए किए जा रहे बौद्धिक पाखंड की परतें एक-एक कर उतारी जाएँ। आतंक को सिर्फ घटना नहीं बल्कि एक सोच, एक वैचारिक बीमारी के रूप में पहचाना जाए। जहाँ से वो पैदा हुआ है, उस विचार का नाम लेकर चुनौती दी जाए।

आरफा जैसे ‘बौद्धिक जिहादी’ जो कलम और नैरेटिव के सहारे ‘इस्लामी कट्टरता’ को जायज ठहराने की कोशिश करते हैं, उन्हें बेनकाब करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। क्योंकि जब विचारों का जहर फैलाया जाता है तो उसकी कीमत निर्दोष लोग अपनी जान देकर चुकाते हैं। आतंक के खिलाफ लड़ाई तभी जीती जाएगी जब उसकी ‘मजहबी रीढ़’ तोड़ी जाएगी और उसे बचाने वालों को भी उसी कठघरे में खड़ा किया जाएगा, जहाँ आतंकवाद खड़ा है।

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शिव
शिव
7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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