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ChatGPT को जातिवादी बताने वाले विजेंद्र चौहान का प्रोपेगेंडा नया नहीं, UPSC कोचिंग की आड़ में ओझा-दिव्यकीर्ति भी फैला चुके हैं हिंदू घृणा

ये कोचिंग संस्थान अब वैचारिक युद्ध के केंद्र बन चुके हैं जहाँ हिंदू आस्थाओं (नींबू-मिर्ची, नारियल फोड़ना) का मजाक उड़ाना 'प्रगतिशीलता' माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, बुर्के और हिजाब को 'सोशल प्राइड' बताकर डिफेंड किया जाता है।

देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा, यूपीएससी (UPSC) की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थान आज शिक्षा के मंदिर कम और ‘ब्रेनवॉशिंग’ के केंद्र ज्यादा नजर आ रहे हैं। हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के प्रोफेसर और ‘दृष्टि IAS’ के चर्चित मुखौटा रहे विजेंद्र सिंह चौहान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है। विजेंद्र चौहान ने दावा किया है कि ChatGPT जैसे आधुनिक तकनीक के एल्गोरिदम भी ‘जातिवादी’ हैं और सवर्णों का पक्ष लेते हैं।

विजेंद्र सिंह चौहान का यह केवल एक बयान नहीं है, बल्कि उस गहरे और जहरीले नैरेटिव का हिस्सा है, जिसके तहत भविष्य के नौकरशाहों के मन में हिंदू धर्म, सवर्ण समाज और भारतीय संस्कृति के प्रति नफरत भरी जा रही है। विजेंद्र चौहान, जो ‘कैजुअल’ ड्रेसिंग वाले बयान से वायरल होकर यूट्यूबर बने, अब उसी प्रभाव का इस्तेमाल समाज को बाँटने के लिए कर रहे हैं।

ChatGPT में भी ‘सवर्ण षड्यंत्र’: विजेंद्र चौहान का नया शिगूफा

विजेंद्र सिंह चौहान ने एक पुस्तक विमोचन के दौरान दावा किया कि ChatGPT (Generative Pre-trained Transformer) हिंदू समाज के सवर्णों द्वारा प्रशिक्षित किया गया है, इसका डेटा सवर्णों की तरफ झुका हुआ है क्योंकि इसे ट्रेन करने वाले लोग उसी वर्ग से आते हैं।

विजेंद्र सिंह चौहान ने इसे ‘एल्गोरिदम की लड़ाई’ करार दिया। चौहान का यह तर्क न केवल तकनीकी रूप से हास्यास्पद है, बल्कि समाज में अविश्वास पैदा करने वाला है। विजेंद्र सिंह चौहान के अनुसार, लड़ाई अब केवल मुख्यमंत्रियों या प्रधानमंत्रियों से नहीं, बल्कि मशीनों से भी है क्योंकि वे ‘न्याय’ नहीं कर सकतीं।

इस बयान पर सोशल मीडिया पर उनकी जमकर किरकिरी हुई। जानकारों का कहना है कि यह पूरी तरह से बेतुका और हास्यास्पद तर्क है, क्योंकि AI डेटा पर काम करता है न कि किसी की जाति पर। कुछ ने तंज कसते हुए कहा कि अब शायद ChatGPT में भी ‘आरक्षण’ की माँग की जाएगी। आलोचकों का मानना है कि यह सब केवल अपनी गिरती लोकप्रियता को बचाने और हिंदू समाज को जाति के नाम पर लड़ाने का एक सधा हुआ प्रोपेगेंडा है।

प्रसिद्ध पैरोडी अकाउंट ‘द स्किन डॉक्टर’ ने तंज कसते हुए लिखा कि सैम ऑल्टमैन (OpenAI के CEO) असल में बिहार के समस्तीपुर के ‘मैथिल ब्राह्मण’ हैं, जो दलितों का शोषण करने अमेरिका चले गए थे।

व्यंग्य तो अपनी जगह है, लेकिन गंभीर सवाल यह है कि एक शिक्षक, जो हजारों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शक है, वह तकनीक जैसी तटस्थ चीज में भी जाति का जहर क्यों घोल रहा है? क्या यह उनकी गिरती लोकप्रियता और सोशल मीडिया पर अप्रासंगिक होने की छटपटाहट है, या फिर हिंदू समाज को बाँटने का कोई बड़ा वैश्विक एजेंडा?

कोचिंग के ‘जहरीले’ टीचर: लादेन के मुरीद और राम-सीता के आलोचक

विजेंद्र चौहान अकेले नहीं हैं। UPSC कोचिंग की इस मंडी में कई ऐसे ‘सेलिब्रिटी’ शिक्षक हैं जो खुलेआम हिंदूफोबिया और इस्लामी महिमामंडन का खेल खेल रहे हैं। अवध प्रताप ओझा (ओझा सर) का उदाहरण सामने है, जिन्होंने वैश्विक आतंकी ओसामा बिन लादेन को ‘सपना देखने वाला’ और ‘महान उपलब्धि’ हासिल करने वाला बताया। ओझा सर ने इस्लाम को ‘रोशनी वाला मजहब’ करार दिया और दावा किया कि जब पूरी दुनिया में अँधेरा था, तब मोहम्मद साहब दीया लेकर खड़े थे। वे हिंदू धर्म की सती प्रथा पर प्रहार करते हैं लेकिन इस्लाम की कट्टरता पर मौन रहते हैं।

इसी कड़ी में विकास दिव्यकीर्ति (दृष्टि IAS) का नाम भी आता है, जिन्होंने माता सीता की तुलना ‘कुत्ते द्वारा चाटे गए घी’ से की थी। उन्होंने वाल्मीकि रामायण के संदर्भों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और भगवान राम को ‘जातिवादी’ साबित करने की कोशिश की। यह वही पैटर्न है जिसके तहत Vision IAS की स्मृति शाह ने भक्ति आंदोलन को ‘लिबरल इस्लाम’ की देन बताया और कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार को जायज ठहराने की कोशिश की। ये शिक्षक क्लास में पढ़ाते समय धीरे-धीरे छात्रों के दिमाग में यह बात बिठा देते हैं कि हिंदू संस्कृति पिछड़ी और शोषक है, जबकि हमलावर और विदेशी विचारधाराएँ महान थीं।

इतिहास का ‘व्हाइटवॉश’ और मुगलों का फर्जी महिमामंडन

इन कोचिंग सेंटरों में इतिहास को इस तरह पेश किया जाता है जैसे मुगल काल ‘स्वर्ण युग’ था। औरंगजेब, जिसने हजारों मंदिर तुड़वाए, उसे इन क्लासों में ‘नैतिकता का प्रतीक’ बताया जाता है। Vision IAS के एक वीडियो में शिक्षक दावा करता है कि औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर इसलिए तुड़वाया क्योंकि वहाँ ‘अवैध गतिविधियाँ’ हो रही थीं।

शाहजहाँ, जिसे प्रेम का पुजारी बताया जाता है, उसके असली वहशीपन को छिपाया जाता है। इतिहास गवाह है कि शाहजहाँ के हरम में 8,000 से ज्यादा महिलाएँ यौन दासी (Sex Slaves) के रूप में रखी गई थीं, जिनमें बड़ी संख्या हिंदू महिलाओं की थी।

इतना ही नहीं, शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा के साथ शारीरिक संबंध बनाए और जब मौलवियों ने सवाल उठाया, तो उन्होंने ‘माली और पेड़’ का हवाला देकर इसे जायज ठहरा दिया। शाहजहाँ ने बनारस के 76 मंदिरों को ध्वस्त किया और हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार किए, लेकिन वामपंथी प्रभाव वाले ये शिक्षक उसे एक ‘महान निर्माता’ के रूप में पेश करते हैं।

छात्रों को यह नहीं बताया जाता कि दिल्ली का रेड लाइट एरिया ‘जीबी रोड’ शाहजहाँ की हवस और उसके हरम से निकाली गई महिलाओं के कारण ही बसा था। इतिहास का यह अपराधीकरण केवल हिंदू धर्म को बदनाम करने के लिए किया जाता है।

भावी नौकरशाहों का ‘ब्रेनवॉश’: देश के लिए कितना बड़ा खतरा?

चिंता की बात यह है कि ये संस्थान केवल परीक्षा की तैयारी नहीं करा रहे, बल्कि एक विशेष विचारधारा के ‘सैनिक’ तैयार कर रहे हैं। जब एक अभ्यर्थी क्लास में स्मृति शाह जैसे शिक्षकों से सुनता है कि हिंदू जमींदारों ने मुस्लिम किसानों का शोषण किया, इसलिए कश्मीर में जो हुआ वह ‘क्लास डिस्टिंक्शन’ था, तो वह कश्मीरी हिंदुओं के दर्द के प्रति संवेदनहीन हो जाता है। जब वह विजेंद्र चौहान से सुनता है कि तकनीक भी जातिवादी है, तो वह पूरे सिस्टम को ही शंका की नजर से देखने लगता है।

ये कोचिंग संस्थान अब वैचारिक युद्ध के केंद्र बन चुके हैं जहाँ हिंदू आस्थाओं (नींबू-मिर्ची, नारियल फोड़ना) का मजाक उड़ाना ‘प्रगतिशीलता’ माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, बुर्के और हिजाब को ‘सोशल प्राइड’ बताकर डिफेंड किया जाता है। यह ‘भूरी बाल साफ करो” (सवर्णों को खत्म करो) वाली लालू यादव की उस हिंसक राजनीति का नया और परिष्कृत रूप है, जिसे अब एयरकंडीशन्ड कमरों में बैठकर ‘मेंटर्स’ के जरिए फैलाया जा रहा है। अगर यह सिलसिला नहीं रुका, तो भविष्य में देश को ऐसे नौकरशाह मिलेंगे जो अपनी ही जड़ों और धर्म के प्रति घृणा से भरे होंगे।

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