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घूसखोर पंडत… एक टाइटल नहीं, प्रयोग है हिंदुओं की सहनशीलता परखने का: समझिए पूरे बवाल को, दोबारा न शुरू हो जाए ‘ढोंगी बाबा-लालची ब्राह्मण’ वाला पुराना प्रोपगेंडा

'घूसखोर' और 'पंडत' को एक साथ जोड़ देना कोई मासूम क्रिएटिविटी नहीं है, यह वही प्रोपेगेंडा है जो बॉलीवुड और नेटफ्लिक्स सालों से इस्तेमाल करते आए हैं, जहाँ पंडित और ब्राह्मण पहचान 'सेफ टारगेट' समझी जाती है। फिल्म का ऐसा नाम एक प्रयोग कहा जा सकता है, जिससे हिंदुओं की सहनशीलता को परखा जा सके।

नेटफ्लिक्स पर ‘घूसखोर पंडत’ नाम की फिल्म का टीजर सामने आया। उसी पल साफ हो गया कि असल में कुछ बदला नहीं है। बल्कि ये ओटीटी प्लैटफॉर्म और बॉलीवुड इंडस्ट्री का वही पुराना खेल है। फिल्म की रिलीज डेट तय नहीं हुई है, लेकिन नाम तय कर चुका है कि निशाना कौन होगा। ‘घूसखोर’ और ‘पंडत’ को एक साथ जोड़ देना कोई मासूम क्रिएटिविटी नहीं है, यह वही प्रोपेगेंडा है जो बॉलीवुड और नेटफ्लिक्स सालों से इस्तेमाल करते आए हैं, जहाँ पंडित और ब्राह्मण पहचान ‘सेफ टारगेट’ समझी जाती है।

इससे पहले ‘धुरंधर’ आई, ‘द कश्मीर फाइल्स’ आई और जब लोगों को लगने लगा कि अब शायद असली मुद्दों पर फिल्मे बनने लगी हैं, पूरा माहौल दक्षिणपंथी हो गया, तभी ‘घूसखोर पंडत’ नाम से फिल्म आ टपकती है। एक ओर जब देशभर में UGC के नए नियमों को लेकर ब्राह्मणों के खिलाफ नफरत खुलेआम फैलाई जा रही है, उसी बीच में इस नाम का आना किसी भी तरह से संयोग नहीं कहा जा सकता है।

बल्कि फिल्म का ऐसा नाम एक प्रयोग जरूर कहा जा सकता है, जिससे हिंदुओं की सहनशीलता को परखा जा सके। प्रयोग उन ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द बंगाल फाइल्स’ और ‘धुरंधर’ के आलोचकों के लिए भी है, जिससे ‘घूसखोर पंडत’ नाम देकर बॉलीवुड की छवि को बैलेंस किया जा सके। लेकिन यह नया नहीं है, ये बॉलीवुड में सालों से होता आया है, जहाँ पंडित और बाबा की छवि को बदनाम कर, उन्हें घूस, लालच और पाखंड से जोड़कर बेहिचक पेश किया जाता है। क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री को पता है कि यही ‘सेफ टारगेट’ है।

घूसखोर पंडत कोई मासूम टाइटल भी नहीं है और न ही इसे किसी एक कहानी की आजादी कहकर टाला जा सकता है। बॉलीवुड और अब नेटफ्लिक्स बरसों से पंडित और ब्राह्मण पहचान को एक खास फ्रेम में फिट करता आया है, जहाँ नाम के साथ ही चरित्र का फैसला सुना दिया जाता है।

‘दुश्मन’ में गोकुल पंडित को बलात्कारी और सीरियल किलर बनाया गया, ‘मातृभूमि’ में पंडित जगन्नाथ सामाजिक हिंसा और क्रूरता का चेहरा बना, ‘पीके’ और ‘OMG’ जैसी फिल्मों में पंडित और साधुओं को ढोंगी और ठग के रूप में पेश किया गया। बार-बार यही मैसेज दिया गया कि पंडित और बाबा का मतलब लालच, पाखंड और झूठ-फरेब।

यही सोच ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर और ज्यादा बेखौफ होकर सामने आई, खासकर नेटफ्लिक्स पर। जहाँ ‘अन्नपूर्णा‘ में ब्राह्मण लड़की को मांस पकाते और खाते दिखाया गया, भगवान राम को लेकर संवाद डाले गए और विरोध के बाद FIR हुई तो फिल्म हटा ली गई। ऐसे ही ‘लीला’ में एक काल्पनिक हिंदू राष्ट्र को कट्टर, जातिवादी और हिंसक बताकर पूरे हिंदू समाज को ही नकारात्मक रंग में रंग दिया गया।

इतना ही नहीं ‘ए सूटेबल बॉय’ में मंदिर को महज एक सेट बनाकर हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़के का किसिंग सीन दिखाया गया और फिर प्रगतिशील का नाम दिया गया। इसी बैकग्राउंड में जब नेटफ्लिक्स ‘घूसखोर पंडत’ जैसा नाम सामने लाता है, तो यह किसी एक फिल्म का मामला नहीं रह जाता। यह उसी सिलसिले की अगली कड़ी बन जाता है, जहाँ हिंदू और पंडित पहचान को बार-बार व्यंग्य और अच्छे सिनेमा की आड़ में अपमानित किया जाता है, और इसे सबसे सुरक्षित रणनीति मानी जाती है।

वैसे ‘घूसखोर पंडत’ के नाम ने एक बात तो साफ कर दी है कि अब दर्शक अंधे नहीं है। फिल्म का टीजर आते ही जिस तरह सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूटा, ‘शेमऑननेटफ्लिक्स’ नाम से हैशटैग ट्रेंड हुए और सीधा नेटफ्लिक्स के मेकर्स पर कानूनी कार्रवाई हुई, उसने बॉलीवुड के पुराने नैरेटिव से रची गई दोहरी साजिश को धराशायी कर दिया।

जबकि पहले हुआ करता था कि कोई फिल्म आती थी, पंडित और बाबा की छवि को बदनाम कर पतली गली से निकल जाती थी। और कुछ चुनिंदा लोग विरोध करते रह जाते थे और वो भी बोलते-बोलते थककर शांत हो जाते थे। अब ऐसा नहीं है। घूसखोर पंडत नाम पर विवाद मामले में विरोध फिल्म की रिलीज से पहले ही शुरू हो गया, क्योंकि लोग पैटर्न पहचान चुके हैं।

यही वजह है कि लोग सवाल उठा रहे है कि हर बार ‘सेफ टारगेट’ पंडितों को क्यों समझा जाता है? सबसे बड़ा सवाल लोग पूछ रहे हैं कि अगर यही टाइटल किसी और पहचान के साथ होता, अगर फिल्म का नाम घूसखोर ‘मौलवी’ या ‘घूसखोर मौलाना’ रखा गया होता, तो क्या नेटफ्लिक्स और बॉलीवुड इतने निश्चिंत होकर टीजर लॉन्च कर पाते। क्या तब इसे क्रिएटिव फ्रीडम कहा जाता?

यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा संकेत है। बॉलीवुड और नेटफ्लिक्स अब वही पुराना नैरेटिव आसानी से आगे नहीं बढ़ा सकते। जिस समाज को उन्होंने सालों तक ‘सेफ टारगेट’ समझा, वह अब जवाब दे रहा है, नाम पर सवाल उठा रहा है और नैरेटिव को धो रहा है। ‘घूसखोर पंडत’ एक फिल्म से ज्यादा एक चेतावनी बन चुका है, उस इंडस्ट्री के लिए जो अब तक यह मानकर चल रही थी कि वह कुछ भी परोस देंगे और कोई पूछने वाला नहीं होगा। अब पूछने वाले भी हैं और यही बात उन्हें सबसे ज्यादा चुभ रही है।

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