जेल में गाँधी पर लिखा निबंध, बॉम्बे HC ने बलात्कारी कलामुद्दीन की घटा दी सजा: 12 साल पहले नाबालिग बच्ची का रेप करने पर मिली थी उम्रकैद

बॉम्बे हाई कोर्ट ने नाबालिग लड़की से दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए कलामुद्दीन मोहम्मद इस्तेयार अंसारी की सजा कम कर दी है। कोर्ट ने उसकी उम्रककैद की सजा को घटाकर 12 साल की सजा कर दिया है। हालाँकि, कोर्ट ने उसके दोषी ठहराए जाने के फैसले में कोई बदलाव नहीं किया है।

कोर्ट ने सजा कम करने का फैसला कुछ खास बातों को ध्यान में रखकर लिया है। कोर्ट ने कहा कि अपराध के समय आरोपित की उम्र कम थी। इसके अलावा वह कई साल से जेल में बंद है और जेल के दौरान उसने खुद को सुधारने की कोशिश भी की है। इन सभी बातों को देखते हुए कोर्ट ने सजा कम करने का फैसला लिया है।

यह आदेश 2 फरवरी 2026 को जस्टिस सारंग कोतवाल और जस्टिस संदेश पाटिल की बेंच ने दिया था। इस आदेश की कॉपी 10 फरवरी 2026 को उपलब्ध हुई। आरोपित ने विशेष POCSO अदालत द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

कोर्ट ने कहा कि जब आरोपित ने यह अपराध किया था, तब उसकी उम्र सिर्फ 20 साल थी। उसके खिलाफ पहले किसी भी तरह का आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। वह दिसंबर 2016 से लगातार जेल में बंद है। यहाँ तक कि कोविड-19 के दौरान भी उसे रिहा नहीं किया गया था।

कोर्ट ने यह भी देखा कि जेल में रहते हुए उसने पढ़ाई और अन्य शैक्षणिक गतिविधियों में हिस्सा लिया। उसने शैक्षणिक कार्यक्रमों में भाग लिया, निबंध लेखन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और महात्मा गाँधी के विचारों पर आधारित एक कार्यक्रम में भी शामिल हुआ। इन गतिविधियों के प्रमाण पत्र भी कोर्ट के सामने पेश किए गए। बेंच ने कहा कि इससे पता चलता है कि जेल में रहते हुए उसमें कुछ हद तक सुधार आया है।

इन सुधार से जुड़ी बातों और अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि 12 साल की सजा उचित होगी। इसीलिए उम्रकैद की सजा को घटाकर 12 साल कर दिया गया।

जानें पूरा मामला

यह मामला 09 दिसंबर 2016 का है। जब 5 साल की बच्ची पानी लेने के लिए पड़ोसी के घर गई थी। उसी दौरान पड़ोसी कलामुद्दीन ने उसके साथ रेप किया। डरी हुई बच्ची तुरंत अपनी माँ के पास भागकर गई और पूरी बात बता दी। पीड़िता की माँ ने आरोपित के खिलाफ पुलिस से शिकायत दर्ज कराई।

बाद में जब मामला कोर्ट पहुँचा, तब बच्ची ने 8 साल की उम्र में ट्रायल कोर्ट में गवाही दी। हाई कोर्ट ने कहा कि नाबालिग बच्ची की गवाही भरोसेमंद और साफ थी। उसने बिना किसी सिखाए या दबाव के अपनी बात स्पष्ट रूप से बताई। इसीलिए उसकी गवाही को विश्वसनीय मानते हुए आरोपित को सजा सुनाई।