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‘Shroud of Turin’ पर भारत के कनेक्शन का दावा: DNA से छिड़ी नई बहस, आस्था बनाम विज्ञान में उलझी सच्चाई; जानें- फिर से क्यों छिड़ा विवाद

ट्यूरिन के कफन पर भारत से जुड़े DNA दावे ने नई बहस छेड़ी, जहाँ आस्था, विज्ञान और इतिहास के बीच सच्चाई को लेकर विवाद जारी है।

ट्यूरिन का कफन (Shroud of Turin) एक बार फिर दुनिया भर में चर्चा का केंद्र बन गया है, जब एक नए वैज्ञानिक दावे ने ऑनलाइन व्यापक बहस छेड़ दी। यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब NDTV के एक ट्वीट के बाद यह मुद्दा वायरल हो गया और इसके बाद आई रिपोर्ट्स में एक बड़े वैज्ञानिक विकास को उजागर किया गया।

शोधकर्ताओं ने इस प्रसिद्ध लिनन कपड़े पर भारत से जुड़े DNA के निशान पाए हैं, जिसे कई लोग यीशु मसीह का कफन मानते हैं। उन्नत जेनेटिक परीक्षण की मदद से वैज्ञानिकों ने कपड़े के रेशों के भीतर गहराई में मौजूद मानव और पौधों दोनों के डीएनए को भारत से जुड़ा हुआ पाया है।

यह अध्ययन 31 मार्च को bioRxiv पर प्री-पीयर-रिव्यू पेपर के रूप में प्रकाशित हुआ, जिसमें यह संकेत दिया गया है कि यह कफन भारत में बुना गया हो सकता है या मध्यकालीन यूरोप में सामने आने से कई सदियों पहले तक यह भारत में रहा हो।

इस दावे ने इतिहास के सबसे चर्चित रहस्यों में से एक को फिर से जीवित कर दिया है, जहाँ आस्था, जेनेटिक्स और वैश्विक व्यापार का इतिहास एक साथ आकर चर्चा का विषय बन गए हैं।

श्राउड ऑफ ट्यूरिन क्या है?

श्राउड ऑफ ट्यूरिन एक लंबा प्राचीन लिनन कपड़ा है, जिस पर एक आदमी की हल्की, लगभग भूत जैसी छवि दिखाई देती है, जिसे सूली पर चढ़ाया गया प्रतीत होता है। सदियों से कई ईसाई इस कपड़े को यीशु मसीह का कफन मानते रहे हैं।

यह कपड़ा पहली बार 14वीं सदी में यूरोप में सामने आया था और तब से इटली के ट्यूरिन शहर के कैथेड्रल ऑफ सेंट जॉन द बैपटिस्ट में सुरक्षित रखा गया है। समय के साथ यह दुनिया के सबसे अधिक अध्ययन किए गए और विवादित धार्मिक अवशेषों में से एक बन गया है। इसे पहली बार 1354 में फ्रांस में पाया गया था और 16वीं सदी से यह लगभग आधी सहस्राब्दी से ट्यूरिन के इसी कैथेड्रल में रखा हुआ है।

इस कफन की सबसे खास बात उस पर बनी छवि है। इसमें एक व्यक्ति के शरीर का आगे और पीछे का हिस्सा दिखाई देता है, जिस पर ऐसे निशान हैं जो बाइबिल में वर्णित सूली पर चढ़ाने की घटनाओं से मिलते-जुलते लगते हैं। इनमें हाथ, पैर और बगल में घाव के निशान शामिल हैं, साथ ही ऐसे चिन्ह भी हैं जो कोड़े मारने जैसे प्रतीत होते हैं।

दागों के पीछे का विज्ञान: लेटेस्ट स्टडी हमें क्या बताती है

मौजूदा समय में इस कफन को लेकर बढ़ी दिलचस्पी एक ऐसे अध्ययन की वजह से है, जिसमें वैज्ञानिकों ने नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग (NGS) तकनीक का इस्तेमाल कर कफन से मिले बेहद छोटे धूल कणों और रेशों की जाँच की।

मानव और पौधों के अवशेषों से माइटोकॉन्ड्रियल DNA निकालकर, जियानी बार्कासिया के नेतृत्व वाली टीम ने कुछ चौंकाने वाले निष्कर्ष सामने रखे। परिणामों में भारतीय उपमहाद्वीप से स्पष्ट जेनेटिक संबंध मिले।

खास तौर पर, वैज्ञानिकों को ऐसे मानव DNA वंश मिले जो आमतौर पर दक्षिण एशिया में पाए जाते हैं और पौधों का DNA भी मिला, जैसे लोबिया (काउपी), जो भारत में पाया जाता है।

अध्ययन के अनुसार, शोधकर्ताओं ने 1978 में किए गए एक वैज्ञानिक परीक्षण के दौरान इकट्ठा किए गए बेहद छोटे जैविक नमूनों का विश्लेषण किया। आधुनिक जीनोमिक सीक्वेंसिंग की मदद से उन्होंने इंसान, पौधे, जानवर और यहाँ तक कि कीड़ों से जुड़े DNA के अंशों की पहचान की। इससे यह संकेत मिलता है कि सदियों के दौरान इस कपड़े को कई लोगों ने छुआ और यह अलग-अलग तरह के वातावरण के संपर्क में आया।

सबसे खास बात यह रही कि पाए गए मानव माइटोकॉन्ड्रियल DNA का लगभग 38% से 40% हिस्सा भारत से जुड़े वंशों से संबंधित पाया गया। बाकी DNA मुख्य रूप से मध्य-पूर्व (जैसे आज के इजरायल और सीरिया) की आबादी से जुड़ा था, जबकि बहुत कम हिस्सा पश्चिमी यूरोप से संबंधित था।

इन निष्कर्षों से दो संभावनाएँ सामने आती हैं या तो इस कपड़े को दक्षिण एशिया के लोगों ने बड़े पैमाने पर छुआ, या फिर यह लिनन धागा भारत में तैयार किया गया था, जो ऐतिहासिक रूप से हाई क्वालिटी वाले वस्त्र निर्माण के लिए प्रसिद्ध रहा है।

यह कपड़ा यीशु से क्यों जुड़ा है?

कहानी के अनुसार, सूली पर चढ़ाए जाने के बाद अरिमथिया के यूसुफ ने यीशु के शरीर को एक साफ लिनन कपड़े में लपेटकर उसे कब्र में रखा था। श्राउड ऑफ ट्यूरिन बाइबिल में बताए गए बेहतरीन लिनन कपड़े के विवरण से मेल खाता है।

इसमें एक मध्यम आयु के व्यक्ति का पूरा शरीर दिखाई देता है, जिसमें मूंछ, दाढ़ी और लंबे बाल हैं। कपड़े का एक हिस्सा शरीर के आगे का भाग दिखाता है और दूसरा हिस्सा पीछे का, जैसे एक लंबा कपड़ा सिर के ऊपर से मोड़कर पैरों के नीचे तक लपेटा गया हो।

यह कफन 1898 में दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया, जब एक इतालवी वकील और फोटोग्राफर सेकोणदो पिया (Secondo Pia) ने इसकी पहली आधिकारिक तस्वीरें लीं। जब उन्होंने नेगेटिव फिल्म को डेवलप किया, तो यह देखकर हैरान रह गए कि कपड़े पर बनी छवि असल में पॉजिटिव इमेज थी, यानी यह कपड़ा खुद एक फोटोग्राफिक नेगेटिव की तरह काम कर रहा था।

इन तस्वीरों में उस व्यक्ति के चेहरे के भाव, घाव, सूजन और खून के निशान नंगी आंखों से देखने की तुलना में कहीं ज्यादा साफ दिखाई दिए। श्रद्धालु और शोधकर्ता उन लाल धब्बों की ओर इशारा करते हैं जो खून और घाव जैसे लगते हैं, खासकर कलाई, पैरों और शरीर के किनारे पर।

इसके अलावा, सिर पर कांटों के ताज जैसे निशान और कंधों पर चोट के चिन्ह भी दिखते हैं, जिन्हें कई लोग भारी क्रॉस उठाने की वजह से हुआ मानते हैं।

कई ईसाइयों के लिए धार्मिक महत्व

कई ईसाइयों के लिए श्राउड ऑफ ट्यूरिन सिर्फ एक वस्तु नहीं है, बल्कि उनकी आस्था की सबसे महत्वपूर्ण घटना का खामोश गवाह माना जाता है। बाइबिल के मार्क, मैथ्यू और ल्यूक के सुसमाचारों में भी उल्लेख मिलता है कि यीशु को साफ लिनन में लपेटा गया था। लगभग 4.36 मीटर लंबा और 1.1 मीटर चौड़ा यह कपड़ा कुछ लोगों के अनुसार वही कफन हो सकता है।

समय के साथ यह कपड़ा कई घटनाओं से गुजरा, जिनमें 16वीं सदी के मध्य में फ्रांस में लगी आग भी शामिल है। उस आग के कारण कपड़े पर काले धब्बे और हीरे के आकार के जले हुए निशान पड़ गए थे, जिन्हें कुछ लोग चमत्कारिक रूप से बच जाना मानते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि भारत से इसका संबंध उन लोगों के लिए नया नहीं है, जो इसे ऐतिहासिक या वैकल्पिक इतिहास के नजरिए से देखते हैं। होल्गर केर्स्टन ने अपनी विवादित किताब यीशु भारत में रहते थे। इस में दावा किया था कि इस कपड़े की बुनाई पूर्वी मूल की ओर इशारा करती है। इस कपड़े के रेशे 3:1 के अनुपात में बुने गए हैं, जिससे फिशबोन पैटर्न बनता है।

इस तरह की जटिल बुनाई उस समय यहूदिया में बहुत दुर्लभ थी, लेकिन रोमन प्रांत सीरिया में पाई जाती थी और खासतौर पर भारत से आने वाले हाई क्वालिटी वाले वस्त्र व्यापार से जुड़ी हुई थी।

पहली सदी में ही भारत कपास और बेहतरीन कपड़ों का बड़ा केंद्र था। रोमन इतिहासकार प्लिनी द एल्डर ने भी लिखा था कि भारतीय कपड़ों के लिए रोम से बड़ी मात्रा में सोना बाहर जाता था।

ऐसे में यह संभव माना जा सकता है कि येरुशलम में इस्तेमाल किया गया कोई हाई क्वालिटी वाला कफन भारत से आया हो, हालाँकि यह अब भी वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं हुआ है कि यही वास्तव में यीशु का कफन है।

शक और इसे पुराने समय की नकली चीज बताने का दावा

कफन के प्रति गहरी आस्था के बावजूद इसके बारे में काफी संदेह भी मौजूद है। कई वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के लिए यह 2000 साल पुराना चमत्कार नहीं, बल्कि मध्यकाल का एक बेहद चतुर निर्माण हो सकता है।

इसकी प्रामाणिकता को सबसे बड़ा झटका 1988 में लगा, जब तीन अलग-अलग प्रयोगशालाओं ने कार्बन-14 डेटिंग की। उनके अनुसार, जिस फ्लैक्स से यह लिनन बना है, वह 1260 से 1390 ईस्वी के बीच उगा था। यह समय वही है, जब यह कफन पहली बार 1354 में फ्रांस में ऐतिहासिक रिकॉर्ड में सामने आया था।

हाल के अध्ययनों ने कलाकार द्वारा बनाए गए सिद्धांत को और मजबूत किया है। 2025 में ब्राजील के विशेषज्ञ सिसरो मोरेस के 3D डिजिटल विश्लेषण से पता चलता है कि यह छवि किसी मानव शरीर से बनी हुई नहीं लगती। जब उन्होंने एक 3D मानव मॉडल पर कपड़ा वर्चुअली डाला, तो जो छवि बनी वह टेढ़ी-मेढ़ी और विकृत थी, जिसे ‘अगामेमनॉन मास्क प्रभाव’ कहा जाता है।

लेकिन जब उन्होंने कपड़े को एक उथली मूर्ति (हल्की नक्काशी) पर डाला, तो बनी हुई छवि लगभग कफन की छवि से पूरी तरह मेल खाती थी। इससे यह संकेत मिलता है कि कफन को किसी कलाकार ने लकड़ी या पत्थर के उथले सांचे का इस्तेमाल कर बनाया हो सकता है, जिसमें हल्की गर्मी या रंग का उपयोग कर यह धुंधली छवि तैयार की गई हो।

धोखाधड़ी का जल्दी पता चलना

यह विचार कि यह कफन नकली हो सकता है, सिर्फ आधुनिक नास्तिक सोच नहीं है, 14वीं सदी में भी यह एक आम मान्यता थी। हाल के शोध में 14वीं सदी के प्रसिद्ध विद्वान और बिशपनिकोल ओरेस्मे की लिखाइयों का अध्ययन किया गया, जिसमें उन्होंने 1370 के दशक में ही इस कफन को चर्च द्वारा लोगों को भ्रमित करने का एक साफ उदाहरण बताया था।

ओरेस्मे ने चेतावनी दी थी कि कई पादरी लोगों से चढ़ावा लेने के लिए उन्हें धोखा देते हैं। उन्होंने फ्रांस के लिरे में रखे इस कफन का जिक्र करते हुए इसे एक गढ़ा हुआ चमत्कार बताया था।

उस समय चर्च भी इसे लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं था। 1389 में ट्रॉयस के बिशप पियरे डी’आर्किस ने पोप को पत्र लिखकर दावा किया था कि यह कफन एक पेंटिंग के जरिए बनाया गया नकली है और इसे बनाने वाले कलाकार का पता भी लगा लिया गया है। बाद में पोप ने इसे दिखाने की अनुमति तो दी, लेकिन इस शर्त के साथ कि इसे असली अवशेष नहीं, बल्कि कफन का प्रतीक या चित्र कहा जाएगा।

इतिहास की एक बड़ी विडंबना यह है कि जिसे मध्यकालीन विचारकों ने साफ तौर पर नकली बताया था, वही वस्तु आज के समय में सबसे प्रसिद्ध पवित्र अवशेषों में से एक बन गई है।

यीशु को स्थानीयकृत करने का प्रयास

आलोचकों का कहना है कि इन वैज्ञानिक निष्कर्षों को एक खास तरह की कहानी गढ़ने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत से जुड़े डीएनए के निशान मिलने के बाद कुछ लोग इसे यीशु को स्थानीय बनाने की कोशिश के रूप में देखते हैं, यानी उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप से गहराई से जुड़ा हुआ दिखाना।

यह सिर्फ इतिहास का मामला नहीं है, आलोचकों के अनुसार यह एक तरह की धर्म-प्रचार रणनीति भी हो सकती है। अगर यीशु को एक स्थानीय व्यक्तित्व या भारत से जुड़ा हुआ बताया जाए, तो धर्म कम विदेशी लगता है और इससे इस क्षेत्र में उसका प्रभाव बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

यहीं से सूचना के युद्ध की बात सामने आती है। सोशल मीडिया के दौर में ऐसी कहानियाँ बहुत तेजी से फैलती हैं। माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए पर आधारित एक वैज्ञानिक अध्ययन को सरल बनाकर यीशु का कफन भारत में बना था जैसी हेडलाइन में बदल दिया जाता है, जिसे फिर हजारों बार शेयर किया जाता है।

X और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म पर ये दावे अपनी अलग ही दिशा में फैलने लगते हैं। कई बार समर्थन करने वाले लोग भी बिना पूरी वैज्ञानिक जानकारी समझे इन्हें आगे बढ़ा देते हैं।

भारत से कनेक्शन उन लोगों के लिए एक मजबूत माध्यम बन जाता है, जो पश्चिमी ईसाई धर्म और भारतीय संस्कृति के बीच दूरी कम करना चाहते हैं। लेकिन वहीं, यह उन लोगों के लिए विवाद का कारण भी बनता है, जो मानते हैं कि आधुनिक समय में फायदे के लिए धार्मिक इतिहास को धीरे-धीरे बदला जा रहा है।

क्रिटिकल थिंकिंग की जरूरत

आखिरकार श्राउड ऑफ ट्यूरिन इतिहास का एक ऐसा रहस्य बना हुआ है, जिसे हर कोई अपने नजरिए से समझ सकता है। यह याद रखना जरूरी है कि दुनिया भर के बड़े विद्वानों और शोधकर्ताओं के बीच अलग-अलग मत मौजूद हैं, और अब तक कोई भी एक अध्ययन इस बहस को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाया है।

हाल ही में भारत कनेक्शन को लेकर जो चर्चा वायरल हुई है, वह यह भी दिखाती है कि हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ विज्ञान और आस्था का इस्तेमाल अक्सर सांस्कृतिक और धार्मिक कहानियों को मजबूत करने के लिए किया जाता है। कपड़े पर दक्षिण एशियाई डीएनए मिलना एक दिलचस्प वैज्ञानिक तथ्य जरूर है, लेकिन इसका मतलब क्या निकाला जाए, इस पर अब भी बहस जारी है।

जैसे-जैसे ऐसी कहानियाँ हमारी सोशल मीडिया फीड पर सामने आती रहती हैं, वैसे-वैसे सावधानी और गहराई से सोचने की जरूरत भी बढ़ जाती है। हमें इस रहस्य का आनंद लेना चाहिए, लेकिन बिना पूरी सच्चाई और जटिल इतिहास, विज्ञान और इसके पीछे के उद्देश्यों को समझे किसी भी वायरल दावे को आंख बंद करके साझा करने से बचना चाहिए।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Shriti Sagar
Shriti Sagar
Journalist

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