भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में तीन चूरन सबसे अधिक चटाया जाता है;
- वामपंथ
- समाजवाद
- क्रांति
हम भारतीयों का सौभाग्य देखिए कि तीनों ही चूरन असफल रहे हैं। कभी भी हमारी व्यवस्था का स्थायी आधार नहीं बन पाए। इसका सबसे बड़ा कारण भारत की वह जनता है, जिसके पास मत देने का अधिकार है। बौद्धिक बहसों में इसी जनता के बुद्धि और विवेक पर ‘विद्वतजन’ संदेह करते हैं, क्योंकि वह चूरन का हैवी डोज लेती ही नहीं।
राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार और बीजेपी के राजनीतिक विस्तार के बाद तो अलग-अलग मुखौटों में इस चूरन का डेली डोज बाँटा जा रहा है। नया मुखौटा है- कॉकरोच जनता पार्टी (CJP- Cockroach Janata Party)।
आंदोलनजीवी ऐसे हर चूरन के सफल होने के दो आधार अतीत से लाते हैं। पहला, जेपी की संपूर्ण क्रांति और दूसरा अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन। अव्वल तो जेपी ने जब आंदोलन किया था, तब लोकतंत्र पर ही सीधा हमला हुआ था। वोट देने वाली जनता के अधिकारों को ही कुचल दिया गया था। इसी तरह अन्ना हजारे का आंदोलन जब हुआ, तब कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार का इकबाल वोट देने वाली जनता की नजरों में पूरी तरह समाप्त हो चुका था। यही कारण है कि इन दोनों आंदोलनों को भले तात्कालिक समर्थन मिला और सत्ता परिवर्तन भी हुआ, पर वह हमारी व्यवस्था का स्थायी आधार नहीं बन सकी।
उलटे इसके राजनीतिक परिणामों ने वोट देने वाली जनता को पहले की तुलना में अधिक सावधान बना दिया है। अब वह केवल यह सुनकर उत्साहित नहीं हो रहा है कि कोई नया समूह पुरानी राजनीति को समाप्त करने का दावा कर रहा है। वह पूछ रहा है कि सत्ता परिवर्तन के बाद क्या होगा?
यह सत्य है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने 6 जून 2026 को जंतर-मंतर पर शिक्षा से जुड़े जिन मुद्दों को लेकर कथित प्रदर्शन किया है, उसको लेकर लोगों की नाराजगी बीजेपी की सरकार से है। कुछ स्थानीय प्रशासनिक समस्याओं और कई सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को लेकर भी असंतोष है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्वभाविक है। विशेषकर तब जब कोई पार्टी 12 सालों से लगातार देश की सत्ता में बनी हुई हो। जब देश के 22 राज्यों की सत्ता उस पार्टी या उसके सहयोगियों के हाथों में हो।
पर मूल प्रश्न यह नहीं है कि नाराजगी है या नहीं? प्रश्न यह है कि क्या यह नाराजगी इतनी व्यापक और संगठित है कि वह सत्ता परिवर्तन का आधार बन सके? अभी ऐसा कोई संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। यदि 2019 के आम चुनावों में बीजेपी की ताकत घटने को इसका संकेत मान लिया जाए तो इसका दूसरा पक्ष यह है कि उसके बाद हुए राज्यों के चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए ने चौंकाया है। जिस महाराष्ट्र और हरियाणा में उसकी पराजय तय बताई जा रही थी, वहाँ धमक के साथ वह सत्ता में लौटी। जिस बिहार में नीतीश कुमार की सरकार को बीमार-लाचार बताया जा रहा था, वहाँ राजद किसी तरह विपक्ष की हैसियत बचा पाई। जिस ममता बनर्जी के किले को अभेद्य बताया जा रहा था, उसे ताश के पत्तों की तरह बीजेपी ने ढाह दिया।
जाहिर है कि वोट देने वाली जनता में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो चाय की गुमटी से लेकर सोशल मीडिया की गलियों तक आज सरकार की आलोचना करता दिख रहा है। पर वह विकल्प को लेकर आश्वस्त नहीं है। वह सरकार की किसी नीति को लेकर मुखर असहमति दर्ज करा रहा है, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि वह पूरी व्यवस्था बदल देना चाहता है।
ध्यान रखिएगा भारतीय लोकतंत्र में कोई सरकार केवल इसलिए नहीं हारती कि लोग नाराज हैं। वे तब हारती हैं जब कोई अधिक विश्वसनीय विकल्प दिखाई देता है। विरोध पर्याप्त नहीं होता। विश्वसनीय विकल्प भी चाहिए होता है। यदि नाराजगी से ही सरकारें जाती तो बिहार में लालू यादव का जंगलराज डेढ़ दशक का नहीं होता। पश्चिम बंगाल में वामपंथी आतंक साढ़े तीन दशक और फिर टीएमसी का आतंक समाप्त होते डेढ़ दशक नहीं लगते। कॉन्ग्रेस के एकछत्र शासन को समाप्त करने के लिए कभी जेपी, कभी वीपी, कभी अटल बिहारी तो कभी नरेंद्र मोदी का चेहरा नहीं लगता।
जब केवल व्यवस्था विरोध ही आधार हो तो उस प्रयोग की एकमात्र राजनीतिक पूँजी असंतोष होता है। विश्वास नहीं। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनुभव बताता है कि बिना विश्वास के असंतोष और सत्ता परिवर्तन के बीच बहुत लंबी दूरी होती है।
हमारी राजनीतिक व्यवस्था में केवल विरोध पर कोई दल नहीं टिकता। उन्हें समाज के सामने एक व्यापक आख्यान प्रस्तुत करना पड़ता है। उसे विश्वसनीय तरीके से जमीन पर उतारना पड़ता है। कॉन्ग्रेस ने ऐसा ही आख्यान अपने प्रोपेगेंडा तंत्र के बल पर देश को आजादी दिलाने की बुनी। इसके बल पर ही लंबे समय तक राजनीति में उसका आधिपत्य रहा।
आज जो राजनीति में बीजेपी का वर्चस्व दिख रहा है, वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और विकास के विश्वसनीय आख्यान के इर्द-गिर्द खड़ी है। इसी तरह राज्यों में समाजवादियों ने जो छिटपुट सफलता हासिल की वह ‘सामाजिक न्याय’ के आख्यान में लपेटकर परोसी गई, तभी संभव हो पाया।
इन आख्यानों से किसी की सहमति या असहमति हो सकती है। लेकिन ये आख्यान केवल विरोध पर आधारित नहीं थे। इनके पास विश्वास की जमीनी पूँजी भी थी और एक बड़ा जन समूह उससे जुड़ भी रहा था।
2014 के बाद अलग-अलग मुखौटों में तात्कालिक असंतोष को भुनाने के जो भी प्रयास हुए हैं, वे जनता के सामने न तो व्यापक आख्यान प्रस्तुत कर पाएँ हैं और न ही बेहतर व्यवस्था चलाने की क्षमता का विश्वास पैदा कर पाए हैं। यहीं कारण है कि कुछ राज्यों में विपक्ष को कभी-कभार सफलता मिल जाती है, 2019 के आम चुनाव जैसे कुछ झटके बीजेपी को भी लगते हैं, पर दूर-दूर तक उसकी राजनीतिक व्यवस्था का विकल्प बन जाने की कोई गंभीर संभावना नहीं दिखाई देती है।
संगठन, विचार, नेतृत्व और विश्वसनीयता की कसौटी पर बीजेपी का मूल्य जनता की दृष्टि में आज भी उसके विरोधियों से कहीं अधिक है। लोकतंत्र में राजनीतिक विकल्प बनने के यही चार स्तम्भ हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी जैसे प्रयोग तो इस अर्थ में और भी हास्यास्पद हैं कि उसका आधार उस सोशल मीडिया पर टिका है, जो भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक जमीन है ही नहीं। सोशल मीडिया में भले ट्रेंड बने, पर व्यवस्था जमीन पर ही खड़ी होती है। सोशल मीडिया में भले रील से क्रांति की मुनादी हो, पर सफल होने के लिए उसे भी जमीन ही चाहिए।
पोस्ट-रील-फॉलोवर से सोशल मीडिया में कंटेंट की बाढ़ लाना अलग बात है। ‘सनस्क्रीन’ लगाकर दिल्ली के उस जंतर-मंतर पर कथित प्रदर्शन कर लेना भी अलग बात है, जो मीडिया और यूट्यूबर्स के कैमरों से घिरी होती है। लेकिन जमीन पर जनता के असंतोष को झेलकर उसे अपने पक्ष में वोट के लिए प्रेरित कर लेना, 45 डिग्री के तापमान में सुदूर देहातों में कैमरे और ताली बजाने वाली भीड़ के बिना घर-घर जाकर अपनी पार्टी-नेता के किसी विचार के लिए समर्थन जुटाना बिल्कुल अलग बात है।
ये जो बाद वाली अलग बात है- वही भारतीय लोकतंत्र का अंतिम तत्व है, क्योंकि सत्ता परिवर्तन सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर नहीं, मतदाता सूची में दर्ज नामों से निश्चित होता है।
आज कॉकरोच हैं, कल पेंगुइन होंगे, परसों कुछ और। भारत में क्रांति का चूरन बेचने वाले हमेशा मिलेंगे। खरीदार भी खूब दिखेंगे। पर वास्तविक धरातल पर क्रांति शायद ही कभी स्थायी तौर पर गोदाम से बाहर निकल पाए। क्योंकि व्यवस्था बदलने की शक्ति उस जनता के हाथ में है जो टीवी स्टूडियो, कंस्टीट्यूशन क्लब की कथित बौद्धिक बहसों और सोशल मीडिया स्पेस की बकलोली से बहुत दूर रहती है, लेकिन चुनाव के दिन मतदान केंद्र तक अवश्य पहुँचती है।
यह जनता असंतुष्ट होने पर भी केवल विरोध नहीं देखती, विकल्प भी देखती है। उसे केवल व्यवस्था की कमियाँ नहीं लुभाती, वह संभावित विकल्प की क्षमताओं को भी तौलती है। वह भले हैशटैग नहीं बनाती है, पर व्यवस्था वही बनाती है।


