मुस्लिम आक्रांता सैयद सालार ने हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण कराया। जिसने भी इनकार किया उनके सिर काट दिए। हिंदू घृणा उसमें इतने भरी थी कि इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए वह ‘गाजी’ बन गया। 1034 ईस्वी में महाराजा सुहेलदेव ने उसे पराजित कर भारत और हिंदुओं को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई।
5 अप्रैल 2026 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान महाराजा सुहेलदेव की इसी वीरगाथा का जिक्र किया। यह सुनते ही असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के यूपी प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली का मजहब बिलबिलाने लगा।
इस बिलबिलाहट में एक्स पर एक पोस्ट करते हुए उसने सैयद सालार को ‘अमन पसंद’ बताते हुए महाराजा सुहेलदेव को अपमानित करने की कोशिश की। पूर्व में वह महाराजा सुहेलदेव को ‘लुटेरा’ भी कह चुका है।
शौकत अली ने एक्स पर लिखा, “सालार मसूद गाजी A.R के बारे में गलत इतिहास बता रहे हैं हमारे मुख्यमन्त्री जी, अगर सालार मसूद ग़ाज़ी, लुटेरे होते अक्रान्ता होते, तो भारत के मुसलमानों के साथ साथ बड़ी तादाद में हमारे हिन्दू भाईयों की उनके प्रति आस्था ना होती, राजा सुहैल देव का भारत की आज़ादी, या भारत के निर्माण में कोई योगदान नहीं था यही सच्चाई है।”
इससे पहले वो सितंबर 2025 में महाराजा सुहैल देव को लुटेरा और सालार मसूद को ‘अमन पसंद‘ बता चुका है। तब शौकत अली के खिलाफ लखनऊ के हजरतगंज थाने में FIR दर्ज हुई थी।
सालार मसूद ग़ाज़ी A.R के बारे में ग़लत इतिहास बता रहे हैं,हमारे मुख्यमन्त्री जी,अगर सालार मसूद ग़ाज़ी,लुटेरे होते अक्रान्ता होते, तो भारत के मुसलमानों के साथ साथ बड़ी तादाद में हमारे हिन्दू भाईयों की उनके प्रति आस्था ना होती,राजा सुहैल देव का भारत की आज़ादी,या भारत के निर्माण…
— Shaukat Ali (@imshaukatali) April 5, 2026
शौकत अली ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उन बयानों के पलटवार में ये विवादित टिप्पणी की, जिनमें सीएम ने सालार मसूद गाजी को विदेशी आक्रांता और माफिया बताते हुए कहा था कि महाराजा सुहेलदेव ने उसे मौत के घाट उतार दिया था।
बता दें कि सीएम योगी ने 5 अप्रैल 2026 को लखनऊ भारतेंदु नाट्य अकादमी के 50 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित समारोह में कहा था, “जो माफिया अभी मिट्टी में मिले हैं, उन्हीं का एक रूप था सालार मसूद। उसने सोमनाथ मंदिर तोड़ा, अयोध्या की राम जन्मभूमि को भी क्षति पहुँचाई। महाराजा सुहेलदेव ने उसे न सिर्फ हराया, बल्कि ऐसी मौत दी जिसे इस्लाम में सबसे बुरी, जहन्नुम‑गारंटी वाली मौत माना जाता है।”
शौकत अली के बयान पर भड़का राजभर समाज
शौकत अली के इस बयान पर खास तौर पर राजभर समाज और हिंदू संगठनों में रोष देखने को मिल रहा है। राजभर कार्यकर्ता इसे केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि एक समग्र जातीय‑सांस्कृतिक संवेदना को चोट पहुँचाने की कोशिश मानते हैं।
इसी वजह से उन्होंने न सिर्फ आक्रोश जताया बल्कि शौकत के खिलाफ कानूनी और आंदोलनात्मक प्रतिक्रिया की धमकी भी दी है।
उत्तर प्रदेश के पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने महाराज सुहेलदेव पर एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली के विवादित बयान पर कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने कहा कि अगर शौकत ने माफी नहीं माँगी तो प्रदेश भर में आंदोलन होगा।
मंत्री राजभर ने कहा कि शौकत अली को इतिहास की पुस्तकें पढ़नी चाहिए। AIMIM के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओवैसी से कहूँगा कि अपने प्रदेश अध्यक्ष को माफी माँगने के लिए कहें, नहीं तो प्रदेशव्यापी आंदोलन होगा। आपका निकलना दूभर हो जाएगा।
शौकत अली के बयान पर भड़के ओम प्रकाश राजभर! कैबिनेट मंत्री ओपी राजभर का शौकत अली पर करारा पलटवार। राजभर ने शौकत अली को बताया 'अनपढ़ और जाहिल', कहा- "उन्हें इतिहास पढ़ने की ज़रूरत है।"#Lucknow #OPRajbhar #ShaukatAli #UPPolitics #BreakingNews #Breaking #UttarPradesh pic.twitter.com/mGMu01AWVJ
— News18 Uttar Pradesh (@News18UP) April 6, 2026
मंत्री राजभर ने कहा कि यह सोची समझी रणनीति के तहत है क्योंकि आने वाले 10 जून को बहराइच में मेला लगने जा रहा है जो 10 दिन चलेगा। पहले लुटेरे गाजी का मेला लगता था।
मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने कहा कि अब देश के वीरों का मेला, जिन्होंने देश को गुलाम होने से बचाया, देश को लुटने से बचाया, जिन्होंने देश की संपत्ति को बचाया, ऐसे देश के राष्ट्रीय वीर राजभर महाराज सुहेलदेव जी का मेला लगने लगने जा रहा है।
गौरतलब है कि संभल में सैयद सालार मसूद गाजी के नाम पर हर साल नेजा मेला लगाया जाता था। योगी सरकार ने 2025 में यह कहते हुए इसे रोक दिया कि विदेशी आक्रांताओं के नाम पर कोई मेला नहीं लगने दिया जाएगा। गाजी के नाम पर हर साल बहराइच शहर के दरगाह शरीफ में कई दशकों से मेला लगता आ रहा था।
राजभर समाज के लिए राजा सुहेलदेव की अहमियत
महाराजा सुहेलदेव को राजभर समाज का ‘कुलपुरुष’ माना जाता है। उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र ने भी उन्हें राष्ट्रीय वीरता‑परंपरा का हिस्सा मानकर उनके नाम पर स्मारक, मेडिकल कॉलेज, ट्रेन और डाक टिकट आदि जैसे ठोस सम्मान दिए हैं।
सुहेलदेव को मुस्लिम आक्रमणकारी सालार मसूद पर विजय प्राप्त करने वाले योद्धा के रूप में देखा जाता है। ऐसे में उनके खिलाफ अपमानजनक शब्द बोलना राजभर समाज की ऐतिहासिक स्मृति और गौरव को ठेस पहुँचाना माना गया।
उत्तर प्रदेश में सुहेल देव को मानने वाले राजभर समुदाय की संख्या लाखों में है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में करीब 18 फीसद राजभर हैं और बहराइच से लेकर वाराणसी तक के 15 जिलों में 60 विधानसभा सीटों पर राजभर समुदाय प्रभुत्व काफी अधिक है।
ऐतिहासिक‑सांस्कृतिक चर्चाओं के अनुसार, सुहेलदेव 11वीं शताब्दी के एक क्षेत्रीय राजा और शासक माने जाते हैं, जिनका राज्य श्रावस्ती‑बहराइच के इलाके में बताया जाता है।
कहा जाता है कि उन्होंने बहराइच के पास सालार मसूद गाजी के खिलाफ स्थानीय राजाओं का गठबंधन तैयार किया और सालार मसूद की सेना को 1034 ईस्वी में पराजित कर दिया। इसके बाद मसूद की मौत हुई और उसे बहराइच में दफन किया गया।
राजभर समाज के दृष्टिकोण से यह लड़ाई छोटे और आम लोगों के खिलाफ विदेशी आक्रांता की पराजय का प्रतीक है, जिसमें राजभर आधार‑समूह के रूप में दिखते हैं।
चुनावी राजनीति में सुहेलदेव का नाम बार-बार उभरता है, क्योंकि राजभर समाज उन्हें अपने अधिकारों और प्रतिनिधित्व की लड़ाई से जोड़ता है। वर्तमान में सुभासपा जैसी राजभर केंद्रित पार्टियाँ महाराजा सुहेलदेव को अपना आधार मानती हैं। राजभर नेता उन्हें दलित‑शोषित‑किसान वर्ग का राष्ट्रीय वीर कहते हैं।
शौकत अली की टिप्पणी राजभर समाज के लिए केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं बल्कि उनके पूरे इतिहास और गौरव पर चोट है। महाराजा सुहेलदेव राजभर समाज के लिए सम्मान, संघर्ष और आत्मगौरव का प्रतीक हैं।
सालार मसूद गाजी: ‘वॉरियर संत’ या आक्रांता?
सालार मसूद गाजी के बारे में जो प्रमुख विवरण मिलता है, वह 17वीं सदी की किताब मिरात‑ए‑मसूदी से आता है, जो घटनाओं के करीब 600 साल बाद लिखी गई। वह गजनी के सुल्तान महमूद का भतीजा माना जाता है। खुद इतिहासकार मानते हैं कि यह ग्रंथ सूफी परंपरा और लोककथाओं से प्रभावित है, न कि ठोस ऐतिहासिक प्रमाणों से।
मिरात‑ए‑मसूदी के अनुसार, सालार मसूद गाजी को गाजी मियाँ भी कहा जाता था। गजनी के साथ मिलकर उसने भारत में इस्लाम फैलाने और गजनवी प्रभाव बढ़ाने के लिए अभियान चलाया। लेकिन महाराजा सुहेलदेव के सामने ये अभियान टिक न सका और मसूद को करारी हार मिली।
इस लिहाज से कहा जा सकता है कि मसूद की छवि एक ‘वॉरियर संत’ या योद्धा के तौर पर जबरन गढ़ी गई। इसमें इतिहास से ज्यादा आस्था और परंपरा को शामिल करने की कोशिश की गई।
असल में मिरात‑ए‑मसूदी किताब सालार मसूद को एक मजहबी योद्धा और संत के रूप में महिमामंडित करती है, जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से वह गजनवी आक्रमण का हिस्सा था।
कुल मिलाकर शौकत अली का बयान सिर्फ उनके ‘अपने’ लोगों को बरगलाने के काम आ सकता है लेकिन दुनिया के सामने कुछ भी कह देने से इतिहास को वह नहीं बदल पाएँगे।


