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300 वर्ष पहले ही भारत में रख दी विकास की नींव, रानी अहिल्याबाई ने बनवाई सड़कें-मंदिर-बाँध: जानिए भारत की एकता में क्या रहा ‘मालवा की रानी’ का योगदान

महारानी अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमाएँ मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान आदि देश के विभिन्न स्थानों पर स्थापित हो चुकी हैं। पिछले महीनों में जयपुर, सांगली आदि स्थानों पर भी प्रतिमाएँ स्थापित हुईं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार 13 अप्रैल 2026 को मुजफ्फरनगर में रानी अहिल्याबाई होल्कर की भव्य प्रतिमा का अनावरण किया। यह कार्यक्रम जिला अस्पताल चौराहे पर आयोजित हुआ, जहाँ सीएम ने कई विकास परियोजनाओं का भी लोकार्पण किया।

मुजफ्फरनगर में यह अनावरण ₹951 करोड़ की 423 परियोजनाओं के साथ हुआ। सीएम योगी ने लोकमाता अहिल्याबाई के न्यायप्रिय शासन और लोक कल्याण कार्यों की याद दिलाई। यह उनके 300वीं जयंती वर्ष का हिस्सा है। माहेश्वर में अहिल्याबाई होल्कर की मौजूदा प्रतिमा उनके योगदान का प्रतीक है।

महारानी अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमाएँ देश के विभिन्न हिस्सों में स्थापित हो चुकी हैं, जो उनके शासनकाल, धार्मिक योगदान और लोक कल्याण कार्यों की स्मृति को जीवंत रखती हैं।

मध्य प्रदेश के माहेश्वर में नर्मदा तट पर उनकी एक प्रमुख प्रतिमा स्थित है, जो उनके सादगीपूर्ण जीवन और राजधानी के रूप में चुने गए इस स्थान का प्रतीक है। माहेश्वर में स्थित यह प्रतिमा अहिल्याबाई होल्कर के शाही स्वरूप और धार्मिक निष्ठा को खूबसूरती से दर्शाती है।

इंदौर के राजवाड़ा के सामने अहिल्या चौक पर भी एक भव्य प्रतिमा स्थापित है, जिसे लगाने में 36 वर्षों का लंबा संघर्ष हुआ। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में संगम नोएडा पर 12 फीट ऊँची प्रतिमा का अनावरण 2025 में डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने किया, जबकि जयपुर के हरिपुरा क्षेत्र के अहिल्याबाई होल्कर उद्यान में 8 फीट की प्रतिमा 2025 में स्थापित हुई।

गुजरात के अहमदाबाद में शहर की पहली प्रतिमा पाल बघेल समुदाय ने स्थापित की, वहीं सोमनाथ में उनकी मंदिर निर्माण की स्मृति में दूसरी प्रतिमा है।

जबलपुर के तिलवाराघाट पर नर्मदा तट के किनारे 2025 में एक और प्रतिमा लोकार्पित हुई। इसके अलावा काशी विश्वनाथ क्षेत्र के मणिकर्णिका घाट पर हाल में स्थानांतरण के बाद उनकी प्रतिमा की पूजा प्रारंभ हुई।

300वीं जयंती वर्ष के अवसर पर कई अन्य शहरों जैसे आगरा आदि में स्थानीय समितियों ने प्रस्ताव दिए हैं। प्रस्तावित प्रतिमाओं की बात करें तो उत्तर प्रदेश के संभल जिले के सद्भावना पार्क में उनकी प्रतिमा लगाने की योजना पर डीएम और एसपी ने 2025 में निरीक्षण किया जो जल्द ही पूरा हो सकता है।

इसके अलावा महाराष्ट्र में पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर स्मारक स्थल पर ₹681 करोड़ की परियोजना के तहत एक भव्य प्रतिमा प्रस्तावित है, जिसमें उनके जीवन से जुड़े स्मारक शामिल होंगे। ये सभी प्रयास अहिल्याबाई के न्यायप्रिय शासन और सांस्कृतिक एकता के संदेश को आगे बढ़ाते हैं।

महारानी से लोकमाता बनने का अहिल्याबाई का सफर

महारानी अहिल्याबाई होल्कर का जीवन भारतीय इतिहास की एक ऐसी प्रेरणादायी कहानी है, जो शासन, धर्म, समाज सुधार और लोक कल्याण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है।

31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के चौंडी गाँव में एक साधारण धांगर परिवार में जन्मीं अहिल्याबाई ने 28 वर्षों तक मालवा साम्राज्य पर शासन किया और पूरे भारत में मंदिरों, घाटों, धर्मशालाओं तथा सड़कों का निर्माण करवाकर सनातन संस्कृति की रक्षा की।

2025 में उनकी 300वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भोपाल में विकास परियोजनाओं का लोकार्पण किया, स्मारक डाक टिकट और सिक्का जारी किया तथा काशी विश्वनाथ मंदिर में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई, जो उनके योगदान का प्रमाण है।

प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

अहिल्याबाई का जन्म माकोजी शिंदे और सुशीला बाई के घर हुआ, जहाँ उनके पिता गाँव के पाटिल थे। बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति की अहिल्याबाई मंदिर सेवा में रुचि रखती थीं। बाजीराव पेशवा के सेनापति मल्हार राव होल्कर ने 1733 में उनका विवाह अपने पुत्र खांडेराव से करवाया लिया।

पति की 1754 में कुम्भेर के युद्ध में मृत्यु के बाद उन्होंने सती होने का संकल्प लिया, किंतु ससुर मल्हार राव ने उन्हें रोककर प्रशासन और युद्धकला सिखाई। 1766 में मल्हार राव तथा 1767 में पुत्र माले राव की मृत्यु के बाद पेशवा से अनुमति लेकर उन्होंने 11 दिसंबर 1767 को इंदौर की गद्दी संभाली।

उनका शासनकाल मराठा साम्राज्य के लिए स्वर्णिम युग सिद्ध हुआ। उन्होंने महेश्वर को राजधानी बनाया, जहाँ नर्मदा तट पर सादा जीवन व्यतीत किया। व्यक्तिगत खजाने से ही उन्होंने कई लोक कल्याण कार्य किए।

अहिल्याबाई का मानना रहा कि राज्य कोष का दुरुपयोग न किया जाए। ब्रिटिश अधिकारी सर जॉन माल्कम ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि वे न्याय की मूर्ति थीं तथा प्रजा के दुख-दर्द को स्वयं सुनती थीं।

शासन प्रणाली और प्रशासनिक कुशलता

अहिल्याबाई का शासन कल्याणकारी राज्य का प्रतीक था। उन्होंने दैनिक दरबार लगाकर प्रजा की समस्याएँ सुनीं तथा न्याय निःशुल्क प्रदान किया। जाति, धर्म भेदभाव के बिना उन्होंने ब्राह्मण, मराठा, बहुजन, मुस्लिम सबको सभी को समान अवसर दिया। टिपू सुल्तान के राज्य से ब्राह्मणों ने शरण ली, निजाम के क्षेत्रों में भी शांति बनी रही।

उन्होंने सैन्य शक्ति पर ध्यान दिया। 1792-93 में अमेरिकी जनरल बॉयड को राज्य में नियुक्त कर ब्रिटिश शैली की ड्रिल सेना गठित की। साथ ही पेशवा को पत्र लिखकर सैन्य सुदृढ़ीकरण की सलाह दी।

उनके शासन से मालवा आर्थिक दृष्टि से काफी समृद्ध हुआ। कर-व्यवस्था बेहतर हुई। व्यापार को भी प्रोत्साहन मिला। उन्होंने माहेश्वरी साड़ियों का उद्योग स्थापित कर स्थानीय आदिवासी महिलाओं को प्रशिक्षित किया, जिससे वे आत्मनिर्भर बनीं। इसके अलावा किसानी में मिश्रित फसलें, मसाले, बागवानी को बढ़ावा दिया। साथ ही बीज परीक्षण, जल संरक्षण, तालाब, बाँध पर जोर दिया।

रानी अहिल्याबाई ने माहेश्वर को सांस्कृतिक केंद्र बनाया। वहाँ कवि, कलाकार, विद्वानों को संरक्षण मिली। उन्होंने पुस्तकालय स्थापित कर धार्मिक ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ बनवाईं।

इसके अलावा महिलाओं के लिए क्रांतिकारी कदम उठाए। विधवा के लिए पुनर्विवाह को प्रोत्साहन दिया, संपत्ति में अधिकार, शिक्षा तथा सेना में भर्ती जैसे कई विस्तार में महिलाओं को अग्रणी रखने में उनकी सर्वाधिक भूमिका रही।

धार्मिक योगदान और सांस्कृतिक पुनरुत्थान

अहिल्याबाई ने मुगल आक्रमणों से क्षतिग्रस्त मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया। काशी विश्वनाथ (1780), ज्ञानवापी क्षेत्र में कार्य, सोमनाथ (अहिल्याबाई मंदिर के नाम से प्रसिद्ध), केदारनाथ, बद्रीनाथ, त्र्यंबकेश्वर, ओंकारेश्वर, महाकालेश्वर आदि 12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़े स्थलों का निर्माण करवाया।

इसके अलावा काशी में मणिकर्णिका घाट, दशाश्वमेध घाट, लोलार्क कुंड का निर्माण करवाया। काशी के साथ हरिद्वार में घाट-धर्मशाला बनवाई, गया में विष्णुपद मंदिर, वृंदावन में बावड़ी और भोजनालय बनवाए और पुरी में छत्र दान का निर्माण करवाया।

उन्होंने काशी से लेकर कोलकाता तक जाने वाली देशव्यापी सड़कें, पुल और देश भर में तालाब बनवाए। गर्मियों में लोगों की सहूलियत के लिए प्याऊ लगवाए और सर्दियों में लोगों के बीच गर्म कपड़ों के वितरण को बढ़ावा दिया। यहाँ तक कि चिड़ियों और मछलियों के लिए चारा स्थल भी बनवाया।

अहिल्याबाई ने व्यक्तिगत धन से ब्रह्मपुरी (काशी) और सदावर्त को स्थापित किया। यह कार्य राष्ट्रीय एकता का प्रतीक के तौर पर उभरा। ऐसा करके मालवा की रानी ने पूरे भारत को आपस में जोड़ा और सशक्तिकरण की मिसाल कायम की।

सामाजिक सुधार और महिला सशक्तिकरण

रानी अहिल्याबाई समाज सुधारों में अग्रणी रहीं। विधवाओं को पुनर्विवाह, शिक्षा, आर्थिक सहायता दी। आदिवासी महिलाओं को कपड़ा बुनाई सिखाई, ऋण दिए। जाति भेद मिटाया, धार्मिक सहिष्णुता बढ़ाई। महिलाओं की सेना गठित कर स्वरक्षा सिखाई।

ब्रिटिश इतिहासकारों ने उनकी धार्मिकता पर आपत्ति की पर वे सिद्ध करती रहीं कि धर्म ही कल्याण का आधार है। उनका राज्य आदर्श कल्याण राज्य था जिसमें कृषि, उद्योग, जल प्रबंधन, शिक्षा समेत हर स्तर और विधा विकसित हुई।

आधुनिक प्रासंगिकता और 300वीं जयंती

13 अगस्त 1795 को 70 वर्ष की आयु में उन्होंने समाधि ली थी। उनकी विरासत आज भी जीवंत है। इंदौर का हवाई अड्डा और विश्वविद्यालय आज भी उनके नाम पर है। 2024 में ‘पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर महिला स्टार्टअप योजना’ शुरू की गई।

इसके अलावा 2025 में उनकी जयंती पर 31 मई 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भोपाल के जंबूरी मैदान में महिला सशक्तिकरण महासम्मेलन के दौरान अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती पर ₹300 का विशेष स्मारक सिक्का जारी किया। यह सिक्का संस्कृति मंत्रालय द्वारा जारी किया गया, जिसमें उनकी छवि अंकित है।

अहिल्याबाई का जीवन सिद्ध करता है कि सत्ता सेवा का माध्यम है। छत्रपति शिवाजी की उत्तराधिकारी के रूप में उन्होंने स्वराज्य को सांस्कृतिक एकता से मजबूत किया। आज के नेताओं को उनके सादगीपूर्ण जीवन से प्रेरित होना चाहिए।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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