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बंगाल में सरेआम ‘गाय-बैल-बछड़ा’ काटने पर लगी रोक तो छटपटाए वामपंथी: कलकत्ता HC में CPI-M ने अर्जी देकर कहा- ये मुस्लिमों की आजादी पर खतरा

पश्चिम बंगाल सरकार के गृह और पहाड़ी मामलों के विभाग ने एक नोटिस जारी किया, जिसमें 'पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950' को सख़्ती से लागू करने की बात दोहराई गई। सरकार ने गायों, बैलों, बछड़ों, भैंसों और बधिया भैंसों का वध करने से पहले आधिकारिक सर्टिफ़िकेशन लेना अनिवार्य कर दिया है। इसका उल्लंघन करने पर छह महीने तक की जेल और 1000 रुपये का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन (CPI-ML) की पश्चिम बंगाल इकाई ने कलकत्ता हाई कोर्ट में शुभेंदु सरकार के एक आदेश के खिलाफ अर्जी दायर की है। दरअसल BJP सरकार ने ‘पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950’ को लागू कर दिया है। इस कानून को चुनौती देते हुए तत्काल मामले में दखल देने की माँग की है। जनहित याचिका पर कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ सुनवाई करेगी।

अपनी याचिका में CPI-ML ने दावा किया है कि इस कानून को लागू करना मुस्लिम समुदाय की धार्मिक आजादी, पशु व्यापार से जुड़े किसानों के अधिकारों और नागरिकों के भोजन केअधिकार पर हमला है। CPI-ML के मुताबिक, “यह एक साथ मुस्लिम समुदाय की धार्मिक आजादी पर, पशु व्यापार से जुड़े किसानों (जो ज़्यादातर हिंदू समुदाय से हैं) की रोजी-रोटी पर, नागरिकों की अपनी पसंद का खाना खाने की आजादी पर और पश्चिम बंगाल की खान-पान की विविधता पर किया गया हमला है।”

इस कानून को ‘पुराना’ बताते हुए, CPI-ML ने आरोप लगाया कि इस कानून को लागू करना, पशुओं की कुर्बानी पर रोक लगाने के लिए किया गया है।

पश्चिम बंगाल सरकार ने 13 मई 2026 को एक नोटिस जारी किया, जिसमें ‘पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950’ को सख्ती से लागू करने की बात दोहराई गई। आइए इस अधिनियम के उद्देश्य और प्रावधानों पर एक नजर डालते हैं।

यह अधिनियम क्यों पारित किया गया?

पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950, दरअसल पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा दूध की आपूर्ति बढ़ाने और कृषि सुधार के लिए आवश्यक पशु शक्ति की बर्बादी को रोकने के उद्देश्य से पारित किया गया था। यही कारण है कि यह अधिनियम सभी पशुओं के वध पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता, बल्कि केवल कुछ विशिष्ट पशुओं और एक निश्चित आयु तक के पशुओं के वध पर ही प्रतिबंध लगाता है। इस अधिनियम का उद्देश्य राज्य में पशुओं के वध को पूरी तरह रोकना नहीं है, बल्कि दुधारू पशुओं को संरक्षण देना है।

यह अधिनियम विशेष रूप से सांडों, बैलों, गायों, बछड़ों, नर और मादा भैंसों, भैंस के बछड़ों और बधिया की गई भैंसों के वध पर रोक लगाता है। अधिनियम में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इसमें निर्दिष्ट किसी भी जानवर का वध तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसे वध के लिए ‘उपयुक्त’ घोषित करने वाला प्रमाण पत्र न प्राप्त हो जाए।

जानवरों के वध के लिए प्रमाण पत्र

अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, किसी जानवर को वध के लिए उपयुक्त घोषित करने वाला प्रमाण पत्र नगरपालिका के अध्यक्ष और पशु चिकित्सा सहायक सर्जन द्वारा संयुक्त रूप से केवल तभी जारी किया जा सकता है, जब जानवर की आयु 14 वर्ष से अधिक हो, या यदि वह आयु, चोट, शारीरिक विकलांगता या किसी असाध्य रोग के कारण कार्य करने या प्रजनन करने में स्थायी रूप से असमर्थ हो गया हो।

यदि नगरपालिका के अध्यक्ष और पशु चिकित्सा सहायक सर्जन किसी निर्णय पर पहुँचने में विफल रहते हैं, तो यह मामला पशु चिकित्सा अधिकारी के पास चला जाएगा। तत्पश्चात, पशु चिकित्सा अधिकारी यह निर्णय लेते हैं कि प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा अथवा अस्वीकृत कर दिया जाएगा। पशु चिकित्सा अधिकारी के लिए यह अनिवार्य है कि वे जानवर के वध की अनुमति देने अथवा उसे अस्वीकृत करने संबंधी एक हस्ताक्षरित आदेश पारित करें।

पश्चिम बंगाल सरकार ने 1950 के कानून का हवाला देते हुए गाय, बैल और भैंस जैसे गोवंश के वध के लिए स्थानीय निकाय प्रमुख और सरकारी पशु चिकित्सक का संयुक्त फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य कर दिया है। यह प्रमाणपत्र केवल तभी जारी होगा, जब पशु की उम्र 14 वर्ष से अधिक हो या वह बीमारी या चोट के कारण स्थायी रूप से अक्षम हो।

इसके अलावा खुले में वध करने पर रोक लगाया गया है। खुले स्थानों या सार्वजनिक जगहों पर पशु वध पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है और इसके उल्लंघन पर 6 महीने तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।

अस्वीकृति के विरुद्ध अपील का अधिकार

कोई भी व्यक्ति जो वध के लिए प्रमाण पत्र नहीं मिलने से असंतुष्ट है तो वह सर्टिफिकेट नहीं मिलने की सूचना 15 दिनों के भीतर राज्य सरकार से कर सकता है। इस अधिनियम के तहत राज्य सरकार के पास पुनरीक्षण (revisional) शक्तियाँ हैं, जिनका प्रयोग करते हुए वह मामले की जाँच कर सकती है और ऐसा आदेश पारित कर सकती है जिसे वह उचित समझे। राज्य सरकार का निर्णय अंतिम होगा और उसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

अधिनियम राज्य सरकार को यह अधिकार देता है कि वह धार्मिक, औषधीय या अनुसंधान उद्देश्यों के लिए किसी भी पशु के वध को इस अधिनियम के प्रावधानों से छूट दे सकती है।

पशुओं का वध केवल निर्धारित स्थानों पर ही किया जाएगा

अधिनियम के अनुसार, पशुओं का वध तय स्थान पर ही किया जा सकता है। राज्य सरकार अधिसूचना के माध्यम से इसे निर्धारित कर सकता है। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, प्रमाणित पशुओं का वध केवल नगरपालिका के बूचड़खानों या स्थानीय प्रशासन जहाँ तय करे, वहाँ किया जा सकता है। सार्वजनिक स्थानों पर वध करने पर सख्त मनाही है।

यह अधिनियम किसी नगरपालिका के अध्यक्ष, पशु चिकित्सा सहायक सर्जन, या पशु चिकित्सा सहायक सर्जन द्वारा तय किए गए व्यक्ति को निरीक्षण करने की शक्ति प्रदान करता है। निरीक्षक को किसी भी तरह का संदेह हो, तो वह बूचड़खानों की तलाशी ले सकता है।

अधिनियम के तहत सजा

कोई भी व्यक्ति जो इस अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, उसे 6 महीने तक की कैद या ₹1000 तक का जुर्माना, या दोनों की सजा दी जा सकती है। अधिनियम के तहत बताए गए सभी अपराध संज्ञेय हैं। इसका मतलब है कि पुलिस अपराध के मामले में मजिस्ट्रेट की पहले से अनुमति लिए बिना FIR दर्ज कर सकती है या गिरफ्तारी कर सकती है। यहाँ तक कि जाँच भी शुरू कर सकती है।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे मूल रुप से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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