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रामशरण रस्तोगी को दुकान से उठाया, तराजू-बाट बाँध कुएँ में फेंक दिया शव: 48 साल बाद पीड़ित परिवार को संभल में बसाएगी UP सरकार, ‘मस्जिद में पूजा’ की अफवाह फैला हुआ था हिंदुओं का नरसंहार

परिवार के मुखिया रामशरण रस्तोगी को 29 मार्च 1978 में भड़के सांप्रदायिक दंगों में बेरहमी से मार डाला था। रामशरण रस्तोगी की संभल कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला ठेर में परचूने की दुकान थी। यह दुकान पुलिस चौकी से महज 50 मीटर ही दूर थी। दंगाइयों ने उन्हें दुकान से उठा लिया और टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

उत्तर प्रदेश के संभल में हिंदुओं को मिटाने का दौर अब खत्म होने जा रहा है। राज्य की योगी सरकार इन हिंदुओं को दोबारा ‘अपने घर’ बसाने की तैयारी कर रही है। इसी कड़ी में योगी सरकार 1978 के सांप्रदायिक दंगों में मारे गए रामशरण दास रस्तोगी के परिवार को जमीन देने जा रही है। प्रशासन ने आलम सराय में तीन बीघा सरकारी जमीन पर बने कब्रिस्तान पर बुलडोजर चलाकर कब्जामुक्त कराई गई थी, अब उसमें से 100 गज जमीन को पीड़ित परिवार को लीज (पट्टे) पर दिया जा रहा है।

03 जून 2026 को संभल के डीएम अंकित खंडेलवाल और एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई की मौजूदगी में आलम सराय गाँव की इस 100 गज जमीन का पट्टा पीड़ित परिवार को सौंपेंगे। जहाँ पीड़ित परिवार दोबारा अपना घर बसा सकेगा। इसके लिए पीड़ित रस्तोगी परिवार ने योगी सरकार और प्रशासन से गुहार लगाई थी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी पिछले दिनों मथुरा के एक कार्यक्रम में 1978 के संभल दंगों में सैंकड़ों हिंदुओं की हत्या का जिक्र करते हुए पीड़ित रस्तोगी परिवार से मिलने की बात कही थी। सीएम ने बताया था कि रस्तोगी परिवार ने उनसे मिलकर अपनी संपत्ति लूटे जाने का दर्द सुनाया था। तब सीएम ने परिवार को जमीन वापस देने का आश्वासन दिया था।

कैसे प्रशासन और सरकार ने मिलकर रस्तोगी परिवार को लौटाई जमीन

पिछले साल रामशरण रस्तोगी के पौत्र कपिल रस्तोगी ने अपनी बुजुर्ग माँ के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर न्याय और पुनर्वास की माँग की थी। संज्ञान लेते हुए पीड़ित परिवार को वापस लौटाने के लिए प्रशासन और सरकार ने मिलकर काम किया।

योगी सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संभल प्रशासन से मामले की जाँच कराई। जाँच में पता लगा कि रस्तोगी परिवार मूलरूप से संभल का निवासी था और दंगों में परिवार के मुखिया रामशरण रस्तोगी की हत्या के बाद पलायन को मजबूर हुआ था। फिर स्थानीय तहसीलदार धीरेंद्र कुमार सिंह ने पैमाइश पर पीड़ित परिवार के लिए जमीन तैयार की।

संभल के कोतवाली कस्बा क्षेत्र के आलम सराय देहात में स्थित तीन बीघा सरकारी जमीन का 100 गज पीड़ित परिवार को देने का फैसला किया गया। इस सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर कब्रिस्तान बना लिया गया था, जो ‘टीले वाली मस्जिद’ के नाम से जाना जाता था। लेकिन प्रशासन ने उस सरकारी जमीन को कब्जा मुक्त करवाया और जमीन पर बने कब्रिस्तान को बुलडोजर से ध्वस्त किया। अब इसमें से 100 गज जमीन पीड़ित रस्तोगी परिवार को सौंपी जा रहा है।

1978 में रामशरण रस्तोगी को दी थी दर्दनाक मौत

आज जिन रस्तोगी परिवार को जमीन दी जा रही है, उसका जख्म काफी गहरा है। योगी सरकार अब उन्हें जमीन देकर उनके जख्म पर मरहम लगाने का काम कर रही है। परिवार के मुखिया रामशरण रस्तोगी को 29 मार्च 1978 में भड़के सांप्रदायिक दंगों में बेरहमी से मार डाला था। रामशरण रस्तोगी की संभल कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला ठेर में परचूने की दुकान थी। यह दुकान पुलिस चौकी से महज 50 मीटर ही दूर थी। दंगाइयों ने उन्हें दुकान से उठा लिया और टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

इतना ही नहीं दंगाइयों ने रामशरण के शव को दुकान कुआं मोहल्ला महमूद खान सराय कुएँ में तराजू-बाट से बाँधकर फेंक दिया था। रामशरण की दुकान भी दंगाइयों ने लूट ली थी और उसे आग के हवाले कर दिया था। बाद में जब तीन दिन बाद रामशरण का शव मिला, तो उस पर चाकू और कुल्हाड़ी के गहरे घाव थे। 

तब रामशरण रस्तोगी के बेटे स्वर्गीय सुभाष चंद्र रस्तोगी ने हत्या और सबूत मिटाने की धाराओं में अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR भी दर्ज कराई थी। लेकिन परिवार का कहना है कि मामले में जाँच आगे नहीं बढ़ी और न्याय की उम्मीद अधूरी रह गई। इस खौफनाक मंजर से डरकर पूरा परिवार संभल से विस्थापित होकर दिल्ली में बस गया।

इसी दंगे में मारे गए तुलसीराम को भी योगी सरकार ने दी जमीन

इससे पहले योगी सरकार इसी 1978 के संभल दंगों में अपनी जमीन से बेदखल हुए तुलसीराम के परिवार को भी जमीन वापस दिला चुकी है। पीड़ित परिवार को 46 साल बाद न्याय मिला। जब संभल प्रशासन ने 14 जनवरी 2025 को तुलसीराम के परिवार को 10,000 वर्गफुट जमीन का कब्जा दिलाया।

माली समाज के तुलसीराम की 1978 के दंगों में हत्या कर दी गई थी और उनके तीन बेटे और परिवार को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था। इस जमीन पर मौजूदा समय में जन्नत निशा नाम का स्कूल चलाया जा रहा था। हालाँकि अब ये जमीन तुलसीराम के वंशजों को मिल गई है। यह कार्रवाई राजस्व विभाग और पुलिस प्रशासन की देखरेख में हुई, जिसमें भारी सुरक्षा बल तैनात किया गया था।

जब बनवारी लाल को दंगाई ‘भाइयों’ ने मौत के घाट सुलाया

रामशरण की हत्या इकलौती दर्दनाक कहानी नहीं है। इसी 1978 में हुए संभल दंगों में कई खौफनाक कहानियाँ सामने आई। एक कहानी है बनवारी लाल की। संभल के जाने माने कारोबारी बनवारी लाल गोयल की तड़पा-तड़पाकर हत्या की गई थी। ऑपइंडिया के पास मौजूद इंटरनल रिपोर्ट बताती है कि दंगे भड़कने की सूचना मिलने पर बनवारी लाल गोयल प्रभावित इलाके में उनकी पत्नी और बेटे के रोके जाने के बावजूद यह कहते हुए चले गए, “सारे मुस्लिम मेरे मित्र और भाई जैसे हैं। सब मेरे साथ काम करते हैं। मुझे कुछ नहीं होगा।”

लेकिन बनवारी लाल गोयल को मुस्लिम दंगाइयों ने पकड़ लिया। उनसे कहा कि तुम इन पैरों से पैसे लेने आए हो और उनके पैर काट दिए। फिर कहा कि तुम इन हाथों से पैसे लेने आए हो और हाथ भी काट दिए। इसके बाद गर्दन काट कर उनकी हत्या कर दी गई। इस दौरान मुस्लिम दंगाइयों के सामने बनवारी लाल गिड़गिड़ाते रहे कि मुझे काटो मत, गोली मार दो। पर किसी ने नहीं सुनी।

इरफान, वाजिद, जाहिद, मंजर, शाहिद, कामिल, अच्छन जैसे नाम आरोपित थे। लेकिन 2010 में यह केस बंद करना पड़ा, क्योंकि गवाह ही हाजिर नहीं हुए। जज ने यह टिप्पणी करते हुए केस बंद किया कि मैं सोच भी नहीं सकता कि इनलोगों (आरोपितों) को फाँसी नहीं हो रही है। इंटरनल रिपोर्ट के अनुसार बनवारी लाल के परिवार पर डॉक्टर शफीकुर रहमान बर्क की ओर से भी दबाव डाला गया था।

बर्क संभल से समाजवादी पार्टी से सांसद रहे हैं। फिलहाल उनके पोते जियाउर्रहमान बर्क इस सीट से सपा के सांसद हैं। जामा मस्जिद में सर्वे के दौरान हुई हिंसा में जियाउर्रहमान बर्क के खिलाफ भी केस दर्ज किया गया। इसके बाद 1995 के आसपास बनवारी लाल गोयल के परिवार ने संभल ही छोड़ दिया। 2024 में संभल हिंसा के बाद बनवारी लाल के बेटे विनीत गोयल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिले थे। तब मुख्यमंत्री ने उनसे कहा था कि अब आप वापस संभल आकर बसिएगा, क्योंकि माहौल सुरक्षित हो गया। परिवार नेभी वापस लौटने पर विचार किया था।

गन्ने की खोई और टायर का ढेर लगाकर 24 हिंदुओं को जलाया

दंगे भड़कने के बाद बनवारी लाल गोयल ने कई हिंदू दुकानदारों को अपने साले मुरारी लाल की कोठी में छिप जाने को कहा था। मुस्लिम आढ़तियों ने इसकी सूचना दंगाइयों को दी। इसके बाद मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ ने ट्रैक्टर लगाकर मुरारी लाल की कोठी का गेट तोड़ दिया।

यहाँ 24 हिंदुओं की हत्या कर उन्हें गन्ने की खोई और टायर का ढेर लगाकर मुस्लिम दंगाइयों ने जला दिया। हालात इतने बदतर थे कि अधिकतर हिंदुओं ने कपड़ों के पुतले बनाकर बृजघाट पर अपनों का अंतिम संस्कार किया था। दैनिक भास्कर ने संभल के इतिहास के जानकार 58 साल के संजय शंखधर के हवाले से भी इस घटना के बारे में बताया है। 

इसी दंगे के दौरान एक हिंदू शिक्षक की बेटी और पत्नी को मंजर शफी ने उठा लिया था। इस दंगे को भड़काने के पीछे भी शफी की बड़ी भूमिका थी। हिंदू शिक्षक की बेटी को बलात्कार के बाद छोड़ा गया। उनकी पत्नी को हिंदुओं ने बचा लिया था। आज न तो इस शिक्षक और न ही बनवारी लाल गोयल का परिवार संभल में रहता है।

वहीं बनवारी लाल की हत्या को हरद्वारी लाल शर्मा और सुभाष चंद्र रस्तोगी ने अपनी आँखों से देखा था। इस कत्लेआम के दौरान दोनों ने एक ड्रम में छिपकर अपनी जान बचाई थी। हाई स्कूल में पढ़ने वाले हरद्वारी लाल के सगे भाई को भी मुस्लिम दंगाइयों ने चाकू से गोदकर इसी दौरान मार डाला था। शर्मा और रस्तोगी भी इस बनवारी लाल के कत्लेआम के गवाह थे।

1978 का संभल दंगा और तत्कालीन सपा सरकार का अँधापन

संभल के इतिहास में काले पन्नों में दर्ज दंगा भयानक था। 29 मार्च 1978 को उत्तर प्रदेश के संभल जिले में एक भयानक सांप्रदायिक दंगा हुआ, जो कई दिनों तक चला और जिसमें 184 लोगों की मौत हुई थी। दंगे के बाद दो महीने तक कर्फ्यू लगा रहा और पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक बना रहा।

दंगे की शुरुआत मंजर अली नाम के व्यक्ति ने की, जो डिग्री कॉलेज की प्रबंधन समिति में सदस्यता नहीं मिलने पर नाखुश था। उसने 28 मार्च को मुस्लिम छात्राओं के साथ मिलकर बाजार में उत्तेजक नारेबाजी शुरू की और जबरन दुकानें बंद करवाईं। जब कुछ दुकानदारों ने विरोध किया, तो लूटपाट, आगजनी और हत्या का सिलसिला शुरू हो गया ।

अफवाहें फैलाई गईं कि ‘मस्जिद में पूजा‘ की जा रही है और इमाम को मार दिया गया, जिससे इस्लामी भीड़ और अधिक आक्रोशित हो गया। दंगे के दौरान खग्गूसराय, सर्राफा बाजार और गंज क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। मुरारीलाल नाम के व्यक्ति की दुकान में आग लगाई गई, जिसकी फड़ पर 24 हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया था। लोगों को चाकुओं से गोदा गया, सिर कटे गए, हाथ-पैर अलग किए गए। किसी के पिता को जिंदा जलाया गया और शवों को टायर से जलाया गया।

इन दंगों में कुल 169 मुकदमे दर्ज हुए थे, जिनमें 3 पुलिस की तरफ से और बाकी दोनों पक्षों की तरफ से लगाए गए। दंगों में पुलिस और प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। पूरे संभल में दो महीने तक कर्फ्यू लगा रहा।

दंगे के बाद हिंदू परिवारों पर पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। आँकड़ों के मुताबिक, 40 हिंदू परिवार विस्थापित हुए। इन परिवारों को जान बचाने के लिए मंदिरों की तालाबंदी करनी पड़ी और अपना घर-बार और कारोबार छोड़कर जाना पड़ा। इसके बाद संभल में हिंदू आबादी 45 प्रतिशत से घटकर 15 प्रतिशत रह गई।

तत्कालीन सपा सरकार ने भी दंगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। NDTV को मिली एक फाइल के अनुसार, 23 दिसंबर 1993 को मुलायम सिंह यादव की सरकार ने 8 मुकदमे वापस लेने का फैसला किया था। उत्तर प्रदेश सरकार के न्याय विभाग के विशेष सचिव ने जिला मजिस्ट्रेट को लिखा था कि 8 मुकदमों को वापस लिया जाए। वहीं दंगों 10 केस की फाइल खंगालने से पता चला कि हत्या जैसे संगीन मामलों को भी तत्कालीन सपा सरकार ने ठीक से हैंडल नहीं किया था। सभी 48 आरोपितों को बरी कर दिया गया था।

इससे पहले 1978 में हुए संभल दंगों को तब याद किया गया जब उत्तर प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र के पहले दिन (15 दिसंबर 2024) CM योगी आदित्यनाथ ने बड़ा बयान दिया। उन्होंने बताया कि संभल मे 1947 से अब तक 209 हिंदुओं की हत्या हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष ने हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर अंधापन दिखाया।

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