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कभी ग्रीस से लेकर गंगा तक थी दहाड़, अब सिर्फ गिर तक सीमित क्यों हैं एशियाई शेर?: पढ़ें विलुप्ति के कगार से जंगलों पर फिर से राज करने का सफर

साल 1968 की गणना में जहाँ शेरों की संख्या महज 177 थी, वहीं वर्ष 2020 में यह 674 तक पहुँची। गुजरात सरकार द्वारा घोषित हालिया आँकड़ों के मुताबिक, अब राज्य में एशियाटिक शेरों की संख्या बढ़कर रिकॉर्ड 891 हो चुकी है।

जूनागढ़ से अमरेली की ओर जाने वाले रास्ते पर सुबह के वक्त जब हवा में रात की ठंडक बाकी हो, मालधारियों के नेसड़ों (बस्तियों) से धुआँ उठ रहा हो और पेड़ों की छाँव में बैठे मालधारियों के पास ही किसी खेत की आड़ में शेरनी अपने बच्चों के साथ आराम कर रही हो, तो यह नजारा दुनिया के अधिकाँश हिस्सों में असंभव माना जाएगा। अफ्रीका के कई क्षेत्रों में शेर और इंसान के बीच की दूरी जितनी ज्यादा हो, उतना अच्छा माना जाता है, लेकिन गुजरात के गिर और उसके आसपास के इलाकों में सदियों से एक अलग ही कहानी लिखी जा रही है। यहाँ शेर और इंसान न सिर्फ एक जमीन साझा करते हैं, बल्कि वे एक ही पर्यावरण के भागीदार बनकर जीते आए हैं।

आज दुनिया में अगर कोई जंगलों में खुलेआम घूमते हुए एशियाई शेरों को देखना चाहता है, तो उसे गुजरात के काठियावाड़ (सौराष्ट्र) में आना पड़ता है। गिर और उसके आसपास के इलाकों के अलावा पूरी दुनिया में इस प्रजाति का प्राकृतिक अस्तित्व कहीं नहीं है। लेकिन यह बात जितनी गौरव की है, उतनी ही हैरान करने वाली भी है, क्योंकि एक समय ऐसा था जब एशियाई शेर सिर्फ गुजरात में ही नहीं, बल्कि उत्तर अफ्रीका से लेकर पश्चिम एशिया और भारत के विशाल क्षेत्रों में पाए जाते थे।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

फिर ऐसा क्या हुआ कि वे पूरी दुनिया से गायब हो गए? और सबसे जरूरी बात कि जब हर जगह से उनका अस्तित्व मिट रहा था, तब ‘गांडी गिर’ (घने गिर) में ही वे कैसे बच सके? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें सिर्फ गिर के जंगलों में नहीं, बल्कि हजारों साल पुराने इतिहास में पीछे जाना होगा।

एक समय ग्रीस से गंगा तक गरजते थे एशियाई शेर

आज शेरों का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के मन में अफ्रीका के सवाना के दृश्य सामने आते हैं, लेकिन इतिहास का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जिसमें एशियाटिक शेरों का साम्राज्य भी उतना ही विशाल था। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि शेरों की उत्पत्ति यूरोप में हुई थी और इसके बाद वे एशिया माइनर की तरफ फैले। हजारों साल पहले एशियाई शेर उत्तर अफ्रीका के भूमध्य सागर के तट से लेकर ईरान, इराक और पूरे उत्तर भारत तक पाए जाते थे।

भारतीय उपमहाद्वीप में उनका क्षेत्र आज के गुजरात से बहुत आगे तक फैला हुआ था। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश के हिस्सों में भी शेरों की मौजूदगी दर्ज थी। महाभारत काल के वर्णनों में शेरों का उल्लेख मिलता है। भगवान बुद्ध के समय से पहले तो वे सिंध से लेकर बिहार तक के क्षेत्रों में घूमते हुए माने जाते हैं। मौर्य और गुप्त काल के दौरान शेर राजसत्ता और शक्ति का प्रतीक थे। आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक माना जाने वाला अशोक स्तंभ के चार शेर इसी परंपरा की याद दिलाते हैं।

भारतीय संस्कृति में शेर सिर्फ एक जानवर नहीं था। देवी दुर्गा का वाहन शेर है। कई शिल्पों में शेर का विशेष स्थान है और प्राचीन साहित्य में वह शौर्य और पराक्रम के रूपक के रूप में बार-बार दिखाई देता है। एक तरह से देखें तो शेर भारतीय सभ्यता की कल्पना में हजारों साल से मौजूद रहा है, लेकिन प्रकृति के इतिहास में गौरव हमेशा अस्तित्व की गारंटी नहीं देता।

…जब विलुप्ति की कगार पर पहुँच गए थे एशियाई शेर

19वीं सदी तक पहुँचते-पहुँचते एशियाई शेरों के लिए स्थिति भयानक हो गई थी। एक तरफ बढ़ता शिकार और दूसरी तरफ घटते जंगल। राजाओं-नवाबों, महाराजाओं और ब्रिटिश अधिकारियों के लिए शेर का शिकार प्रतिष्ठा का विषय बन गया था। उस समय की तस्वीरों और वर्णनों में शेर के शिकार को एक गौरवपूर्ण उपलब्धि के रूप में पेश किया गया है।

सिर्फ शिकार ही जिम्मेदार नहीं था। खेती का दायरा बढ़ा, इंसानी बस्तियाँ फैलीं, जंगल कटे और शेरों के प्राकृतिक आवास सीमित होते गए। बड़े शिकारी जानवरों के लिए सबसे बड़ी जरूरत इलाके की होती है। जैसे-जैसे यह इलाका घटता गया, वैसे-वैसे उनकी संख्या भी घटती गई।

नतीजे में एक समय ऐसा भी आया जब पूरी दुनिया में एशियाई शेरों की आखिरी उम्मीद सिर्फ गिर के जंगल ही बचे। 19वीं सदी के अंत में उनकी संख्या इतनी कम हो गई थी कि कुछ अनुमानों के अनुसार केवल एक दर्जन शेर ही बचे रह गए थे। एक प्रजाति, जिसने हजारों साल तक विशाल भूभाग पर राज किया था, अब विलुप्ति की कगार पर खड़ी थी।

लेकिन यहाँ से कहानी में एक अप्रत्याशित मोड़ आता है; क्योंकि गिर सिर्फ एक जंगल नहीं था, वह उससे भी कहीं बढ़कर था।

आखिरकार गिर में ही क्यों बचे शेर?

इस सवाल का सबसे सीधा जवाब देना हो तो कहा जा सकता है कि गिर में शेरों को जीने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मिलीं, लेकिन यह जवाब अधूरा है। हकीकत में गिर की सफलता किसी एक कारण का परिणाम नहीं है, यह कई कारकों के संयोग से बनी गाथा है।

गिर में पानी था, गिर में जंगल थे, गिर में शिकार के लिए जानवर थे, लेकिन यह सब तो दूसरे कई इलाकों में भी था। गिर को अनोखा बनाने वाली बात यह थी कि यहाँ पूरा इकोसिस्टम लंबे समय तक टिका रह सका।

गिर के जंगलों को अक्सर एक ही प्रकार के जंगल के रूप में देखा जाता है, लेकिन वास्तव में यहाँ कई प्रकार की वनस्पतियाँ और जमीन देखने को मिलते हैं। सूखे पतझड़ वाले जंगल, कँटीले वन, घास के मैदान, नदी किनारे के इलाके और खुले मैदान मिलकर एक ऐसा पर्यावरणीय तालमेल बनाते हैं, जिसे बड़े शिकारी जानवरों के लिए आदर्श माना जाता है। शेरों को सिर्फ आश्रय ही नहीं बल्कि शिकार भी चाहिए और गिर के पास इसकी भी कोई कमी नहीं थी।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Bing)

चीतल, सांभर और नीलगाय: शेरों के साम्राज्य का आधार

किसी भी शेर की दहाड़ के पीछे एक पूरी खाद्य श्रृंखला (फूड चेन) काम कर रही होती है। अगर जंगल में पर्याप्त शिकार न हो, तो शेर लंबे समय तक टिक नहीं सकते। गिर की सबसे बड़ी ताकतों में से एक यहाँ की समृद्ध शिकार आबादी रही है।

चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली सूअर, चिंकारा और चौसिंगा जैसी प्रजातियों ने गिर के पर्यावरण को जीवित रखा। सालों के दौरान इन प्रजातियों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। खासतौर पर चीतल की आबादी में हुई वृद्धि गिर के पूरे इकोसिस्टम के लिए निर्णायक साबित हुई। जहाँ एक समय उनकी संख्या हजारों में थी, वहीं बाद के दशकों में वह कई गुना बढ़ गई।

शेरों की सफलता के पीछे ये मूक नायक हैं, क्योंकि किसी भी शिकारी का भविष्य उसके शिकार के भविष्य से ही जुड़ा होता है। लेकिन अभी भी गिर की सबसे बड़ी ताकत की बात बाकी है और शायद वही इस पूरी गाथा का दिल है।

गिर का दिल: मालधारियों और शेरों के बीच सह-अस्तित्व

अगर गिर के शेरों की सफलता की कहानी से जंगलों को हटा दिया जाए, तो भी ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। अगर शिकार वाले जानवरों को हटा दिया जाए, तो धीमा-धीमा कुछ कम होने का अहसास होता रहेगा। लेकिन अगर इस कहानी से मालधारी लोगों को निकाल दिया जाए, तो शायद गिर को समझना ही असंभव हो जाएगा।

गिर के जंगलों में सदियों से एक ऐसा समाज रहता है, जिसकी जीवनशैली, संस्कृति और अस्तित्व ही पशुपालन से जुड़ा हुआ है। इन्हें हम मालधारी के नाम से जानते हैं। गिर के अंदर और आसपास स्थित उनके आवासों को ‘नेस’ (नेसडा) कहा जाता है। बाहर से आने वाले व्यक्ति के लिए यह सिर्फ कुछ घरों और मवेशियों का समूह लग सकता है, लेकिन वास्तव में ये नेस गिर के सामाजिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का अभिन्न हिस्सा हैं।

दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में शेर और इंसान के बीच का रिश्ता संघर्ष का होता है। अफ्रीका के कई देशों में शेरों द्वारा मवेशियों के शिकार के कारण स्थानीय लोगों में नाराजगी देखी जाती है। कई जगहों पर शेरों और इंसानों के बीच का संघर्ष इतना बढ़ जाता है कि दोनों में से किसी एक को पीछे हटना पड़ता है, लेकिन गिर में दशकों नहीं, बल्कि सदियों से एक अलग ही व्यवस्था विकसित होती रही। यहाँ मालधारी और शेर एक-दूसरे की मौजूदगी को जीवन के स्वाभाविक हिस्से के रूप में स्वीकार करते आए हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि यहाँ कभी नुकसान नहीं होता। शेर मवेशियों का शिकार भी करते हैं और मालधारियों को आर्थिक नुकसान भी होता है, लेकिन इसके बावजूद गिर में शेरों के प्रति जो नजरिया देखने को मिलता है, वह दुनिया के अन्य कई इलाकों से अलग है। शायद इसकी वजह यह है कि गिर के लोगों के लिए शेर बाहर से आया हुआ कोई खतरा नहीं है। वह इस जमीन का उतना ही पुराना निवासी है, जितने वे खुद हैं।

गिर के पुराने मालधारियों से बात करें तो वे शेरों के बारे में इस तरह बातें करते हैं जैसे किसी दूर के जंगली जानवर के बारे में नहीं, बल्कि सालों से जानने वाले पड़ोसी के बारे में बात कर रहे हों। उनके लिए शेर के प्रति नजरिया डर और सम्मान के अनोखे मिश्रण से बना है। वे जानते हैं कि शेर ताकतवर है, खतरनाक भी हो सकता है, लेकिन साथ ही वे यह भी जानते हैं कि शेर का सम्मान करना पड़ेगा, वह देव-प्राणी है और जंगलों का खुद से बना राजा भी। शेरों का बर्ताव कैसा होता है, उनकी हलचल कैसी होती है और किस परिस्थिति में सावधान रहना चाहिए, यह भी ‘गांडी गिर’ के मालधारियों को सिखाना नहीं पड़ता।

शायद यही वजह है कि गिर में इंसान और शेर के बीच का सह-अस्तित्व सिर्फ नीतियों या कानूनों से नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे अनुभव और आपसी समझ से टिका हुआ है।

इस सह-अस्तित्व का मतलब यह भी नहीं है कि दोनों के बीच कोई अदृश्य दोस्ती है। प्रकृति में रिश्ते हमेशा वास्तविक होते हैं, लेकिन गिर में सालों के दौरान एक प्रकार का संतुलन विकसित हुआ। एक तरफ शेरों ने इंसानी बस्तियों के बीच जीना सीखा और दूसरी तरफ स्थानीय लोगों ने शेरों की मौजूदगी के साथ जीने का तरीका विकसित किया।

शायद यही गिर का सबसे बड़ा रहस्य है। जब दुनिया के कई इलाकों में इंसान और बड़े शिकारी जानवरों के बीच का संघर्ष उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन गया, तब गिर में यह रिश्ता पूरी तरह से टूटा नहीं। इसमें उतार-चढ़ाव आए, चुनौतियाँ आईं, लेकिन मूल संतुलन बना रहा और शायद इस संतुलन के बिना गिर आज एशियाटिक शेरों का आखिरी घर नहीं होता।

नेस से जंगल तक: सह-अस्तित्व की अनूठी संस्कृति

गिर को समझने के लिए सिर्फ शेरों को देखना काफी नहीं है। गिर को समझने के लिए उसके लोगों, उनकी बोली, उनके मवेशियों, उनके नेसड़ों और उनके दैनिक जीवन को भी समझना होगा।

सुबह-सुबह गिर के किसी नेस में जब दिन की शुरुआत होती है, तो जीवन की रफ्तार सदियों पुरानी परंपराओं के साथ आगे बढ़ती दिखाई देती है। पशुओं को चराने ले जाया जाता है, दूध दुहा जाता है, घर के कामकाज शुरू होते हैं और जंगल के बीच इंसानी जिंदगी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ती है। यह पूरी जीवन पद्धति ऐसी जमीन पर विकसित हुई है जहाँ शेरों की मौजूदगी हमेशा रही है।

इसीलिए गिर में सह-अस्तित्व कोई सरकारी नारा नहीं है, यह एक जीवंत हकीकत है। इस रिश्ते ने समय के साथ कई बदलाव भी देखे हैं। गिर के संरक्षण के लिए कुछ मालधारी परिवारों का पुनर्वास भी किया गया। कई लोग जंगल के बाहर बसे, फिर भी गिर और मालधारियों के बीच का रिश्ता आज भी टूटा नहीं है। गिर की पहचान में उनका योगदान इतना गहरा है कि शेरों की कहानी से उन्हें अलग करना मुमकिन नहीं है।

अगर गिर के जंगल इस प्रजाति का शरीर हैं, तो मालधारी और स्थानीय समाज इसकी आत्मा हैं। लेकिन अगर सिर्फ सह-अस्तित्व ही काफी होता, तो शायद शेरों की संख्या कुछ दर्जनों पर ही रुकी रहती। गिर की कहानी का दूसरा बड़ा अध्याय तब शुरू हुआ, जब संरक्षण को वैज्ञानिक दिशा मिली और गुजरात ने शेरों को बचाने के लिए एक लंबी और निरंतर यात्रा शुरू की।

गुजरात का संरक्षण मॉडल: दहाड़ को फिर जिंदा करने वाले प्रयास

एशियाई शेरों की इस विजय गाथा में गिर के जंगल और मालधारी जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण संरक्षण की वह लंबी यात्रा भी है, जिसने एक समय विलुप्ति की कगार पर खड़ी प्रजाति को फिर से मजबूत बनाया। कई बार जब वन्यजीव संरक्षण की सफलता की बात होती है, तो लोग सिर्फ अंतिम परिणाम देखते हैं। वे आज गिर में दिखने वाले शेरों को देखते हैं, लेकिन उस परिणाम तक पहुँचने के पीछे दशकों का नियोजन, अनुसंधान, नीतियाँ और लगातार निगरानी काम करती रही है।

आजादी के बाद के शुरुआती सालों में ही यह साफ हो गया था कि अगर शेरों को बचाना है, तो सिर्फ शिकार पर प्रतिबंध काफी नहीं होगा, बल्कि उनके पूरे इकोसिस्टम को बचाना होगा। इसी समझ के तहत 1965 में गिर को अभयारण्य का दर्जा मिला। आज के समय में यह फैसला सामान्य लग सकता है, लेकिन उस समय के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि पहली बार पूरा दृष्टिकोण शेर से आगे बढ़कर उसके आवास पर केंद्रित होने लगा।

1970 के दशक में गिर पर व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन शुरू हुए। शेर कैसे रहते हैं, उनकी हलचल कैसी होती है, उन्हें कितना इलाका चाहिए, उनके लिए शिकार वाली प्रजातियाँ कितनी महत्वपूर्ण हैं और जंगल के अलग-अलग हिस्से एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं… इस सबको समझने का प्रयास हुआ। शायद आज के दौर में यह बात स्वाभाविक लगे, लेकिन उस समय तक भारत में वन्यजीव संरक्षण अभी विकास के चरण में था। गिर ने इस दिशा में एक नया रास्ता दिखाया।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI GROK)

इसी बीच एक ऐतिहासिक फैसला भी लिया गया। गिर के अंदर रहने वाले कई मालधारी परिवारों का पुनर्वास किया गया। यह फैसला आसान नहीं था। पीढ़ियों से जंगल में रह रहे लोगों के लिए अपना पारंपरिक निवास स्थान छोड़ना सहज नहीं था, लेकिन संरक्षण की दीर्घकालिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह प्रक्रिया अपनाई गई। नतीजतन, जंगल के कई इलाकों को प्राकृतिक रूप से पुनर्जीवित होने का मौका मिला। घास के मैदानों, वनस्पतियों और शिकार वाले जानवरों की आबादी को इसका सीधा फायदा मिला।

इसके बाद गिर का संरक्षण सिर्फ एक अभयारण्य तक सीमित नहीं रहा। गिर को एक बड़े लैंडस्केप के रूप में देखने की शुरुआत हुई। गिरनार और अन्य इलाकों को भी संरक्षण की व्यापक योजना से जोड़ा गया, क्योंकि एक हकीकत साफ हो रही थी कि शेरों की संख्या बढ़ रही थी और उन्हें और अधिक इलाके की जरूरत पड़ने वाली थी।

इस अवधि में गुजरात वन विभाग ने कई ऐसे कदम उठाए, जो आम लोगों की नजर में शायद न आएँ, लेकिन शेरों के अस्तित्व के लिए बेहद अहम थे। जैसे गिर के इलाकों में वायरलेस नेटवर्क तैयार करना, लगातार मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करना, वनमित्रों की नियुक्ति करना, स्थानीय समाज के साथ संवाद बढ़ाना और वन्यजीवों के लिए खतरनाक साबित हो सकने वाले हजारों खुले कुओं को सुरक्षित बनाने का काम, यह सब एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण का हिस्सा था।

इन कदमों का असर धीरे-धीरे दिखने लगा। गिर के जंगल और अधिक स्वस्थ हुए, शिकार वाली प्रजातियों की संख्या बढ़ी और सबसे महत्वपूर्ण बात, शेरों की संख्या भी लगातार बढ़ने लगी।

177 से 891 तक: विलुप्ति की कगार से वापसी

किसी भी संरक्षण गाथा की सबसे बड़ी परीक्षा उसके परिणामों में दिखाई देती है। गिर के शेरों की कहानी में भी यही सच है। 1968 की गणना में शेरों की संख्या 177 थी। यह आँकड़ा खुद याद दिलाता है कि स्थिति कितनी नाजुक थी। अगर कुछ दशक पहले की स्थिति देखी जाए, तो यह प्रजाति लगभग विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी थी। लेकिन इसके बाद शुरू हुई एक ऐसी यात्रा, जो आज दुनिया के सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण उदाहरणों में गिनी जाती है।

आखिरकार, साल 1974 में संख्या 180 हुई। 1979 में 205, 1984 में 239, 1990 में 284, 1995 में 304। नई सहस्राब्दी की शुरुआत तक यह संख्या 327 तक पहुँच गई। इसके बाद रफ्तार और तेज हुई; 2005 में 359, 2010 में 411 और अगले दशक में तो यह वृद्धि और भी साफ दिखाई दी।

ये आँकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं। हर बढ़ते आँकड़े के पीछे और ज्यादा सुरक्षित जंगल और अधिक समृद्ध शिकार प्रजातियाँ, मजबूत संरक्षण व्यवस्था और एक पूरे समाज की भागीदारी छिपी है। जब 2020 में शेरों की संख्या 674 तक पहुँची, तभी यह साफ हो गया था कि गिर की कहानी अब सिर्फ बच जाने की बात नहीं रह गई है, बल्कि अब यह विकास और विस्तार की विजय गाथा बन चुकी है।

और फिर आया 2025 का आँकड़ा। गुजरात सरकार द्वारा घोषित की गई हालिया गणना के अनुसार, राज्य में एशियाई शेरों की संख्या बढ़कर 891 तक पहुँच गई है। एक सदी पहले विलुप्ति की कगार पर खड़ी प्रजाति के लिए यह सिर्फ सफलता नहीं है, बल्कि यह एक असाधारण पुनरुत्थान है।

दुनिया में वन्यजीव संरक्षण के कई उदाहरण मिलते हैं, लेकिन ऐसी प्रजातियाँ बहुत कम हैं जो एक समय सिर्फ दर्जनों तक सीमित हो गई हों और फिर से लगभग 900 के आँकड़े तक पहुँच गई हों।

अब सिर्फ गिर नहीं, पूरा काठियावाड़ है शेरों का साम्राज्य

शेरों की संख्या में हुई इस बढ़ोतरी ने एक नई हकीकत को भी जन्म दिया। गिर अब उनके लिए पर्याप्त नहीं था। एक समय ऐसा था जब लगभग पूरी आबादी गिर के जंगलों में केंद्रित थी, लेकिन जैसे-जैसे संख्या बढ़ी, शेरों ने नए इलाकों की तरफ बढ़ना शुरू कर दिया। गिरनार, तटीय इलाके, अमरेली और भावनगर के क्षेत्र… धीरे-धीरे शेरों ने अपने पुराने साम्राज्य का एक नया नक्शा बनाना शुरू कर दिया।

आज स्थिति यह है कि राज्य के कई शेर गिर के कोर (मुख्य) क्षेत्र से बाहर रहते हैं। वे खेती-बाड़ी वाले इलाकों, नदी तटीय क्षेत्रों, झाड़ियों वाले लैंडस्केप और इंसानी बस्तियों के पास भी देखे जाते हैं। दुनिया के दूसरे हिस्सों में शायद यह चिंता का विषय बने, लेकिन गुजरात में यह एक अलग ही हकीकत बन चुकी है।

इसका मतलब यह नहीं है कि चुनौतियाँ खत्म हो गई हैं। बढ़ती आबादी के साथ नए सवाल भी खड़े होते हैं, लेकिन एक बात निर्विवाद है कि एशियाटिक शेर अब सिर्फ गिर के जंगलों में कैद रहने वाली प्रजाति नहीं हैं; वे फिर से अपने क्षेत्र का विस्तार कर रहे हैं।

एक प्रजाति बची, एक विरासत जीवंत रही

आखिरकार गिर के शेरों की कहानी सिर्फ शेरों की नहीं है। यह गिर के जंगलों की कहानी है। यह चीतल और सांभर की कहानी है। यह मालधारियों की कहानी है। यह वन रक्षकों, वैज्ञानिकों और संरक्षण के लिए दशकों तक काम करने वाले हजारों लोगों की कहानी है। यह गुजरात की वह कहानी है, जिसमें प्रकृति और इंसान के बीच का रिश्ता सिर्फ संघर्ष से तय नहीं होता।

एक समय ऐसा था जब एशियाई शेरों का इतिहास खत्म होता दिख रहा था। उनकी दहाड़ धीरे-धीरे दुनिया के नक्शे से गायब हो रही थी, लेकिन गिर ने उस दहाड़ को जिंदा रखा। गिर के जंगलों ने उन्हें आश्रय दिया, शिकार वाली प्रजातियों ने उन्हें जीवन दिया, मालधारियों ने सह-अस्तित्व का उदाहरण पेश किया और गुजरात के संरक्षण प्रयासों ने उन्हें फिर से उठने का मौका दिया।

आज जब गिर के किसी जंगल में शेर की दहाड़ गूँजती है, तो वह महज एक जानवर की आवाज नहीं होती। वह एक ऐसी सफलता की गूँज होती है, जो याद दिलाती है कि अगर सही इच्छाशक्ति, सही नीतियाँ और समाज की भागीदारी हो, तो विलुप्ति की कगार से भी वापसी संभव है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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ભાર્ગવ રાજ્યગુરુ
ભાર્ગવ રાજ્યગુરુ
Being learner, Spiritual, Reader

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