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आधार नहीं, वोटर ID नहीं, पासपोर्ट भी अंतिम प्रमाण नहीं: फिर भारत में नागरिकता कैसे साबित होती है? समझें पूरी बहस

भारत में नागरिकता साबित करने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज कानूनी रूप से मान्य माने जाएँगे, इस पर कोई एक साफ और अंतिम सूची सामने नहीं दिखती। लेकिन नागरिकता का मूल ढाँचा संविधान और नागरिकता ऐक्ट, 1955 से आता है।

विदेश मंत्रालय के एक बयान के बाद बवाल मच गया है। विदेश मंत्रालय ने बुधवार (24 जून 2026) को 14वें ‘पासपोर्ट सेवा दिवस’ पर एक कार्यक्रम में बताया कि पासपोर्ट मुख्य रूप से यात्रा का दस्तावेज है और इसे नागरिकता के सबूत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। हालाँकि, अधिकारियों ने साफ किया कि यह सिर्फ भारतीय नागरिकों को जारी किया जाता है लेकिन यह नागरिकता साबित करने वाला दस्तावेज नहीं है।

जुलाई 2025 की ही बात है जब सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने कहा था कि आधार कार्ड कोई नागरिकता का सबूत नहीं है। वोटर ID कार्ड को भी नागरिकता का दस्तावेज नहीं माना जाता है। तो अब इस बात पर बहस छिड़ गई कि जब पासपोर्ट, आधार कार्ड और वोटर ID जैसे दस्तावेज नागरिकता का सबूत नहीं है तो फिर नागरिकता का सबूत है क्या? सबसे पहले बात पासपोर्ट और इसके नागरिकता का डॉक्यूमेंट ना होने की करते हैं।

पासपोर्ट होता क्या है?

पासपोर्ट वह सरकारी दस्तावेज है जिसके आधार पर कोई व्यक्ति भारत से बाहर यात्रा कर सकता है और विदेश में अपनी पहचान/राष्ट्रीयता दिखा सकता है। भारत में पासपोर्ट का कानूनी आधार पासपोर्ट ऐक्ट, 1967 (Passports Act, 1967) है। इस कानून का उद्देश्य ही ‘पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेज जारी करना’ और भारत से बाहर जाने को रेगुलेट करना है। यानी इसका काम यात्रा को वैध बनाना है ना कि नागरिकता का अंतिम फैसला देना।

भारत में पासपोर्ट का इतिहास क्या रहा है?

भारत में पासपोर्ट व्यवस्था की शुरुआत पहले विश्व युद्ध के दौरान हुई थी। उससे पहले भारतीय पासपोर्ट जारी करने की कोई व्यवस्था नहीं थी। 1915 में ब्रिटिश सरकार ने Defence of India Act लागू किया और इसके तहत भारत में आने-जाने के लिए पासपोर्ट अनिवार्य कर दिया गया।

युद्ध खत्म होने के बाद यह कानून समाप्त हो गया लेकिन सरकार चाहती थी कि पासपोर्ट व्यवस्था जारी रहे जिससे भारत की प्रणाली ब्रिटिश साम्राज्य के दूसरे देशों और दुनिया के बाकी देशों जैसी हो सके। इसी कारण 1920 में भारतीय पासपोर्ट ऐक्ट बनाया गया। बाद में पासपोर्ट ऐक्ट, 1967 आने के बाद इसी कानून का नाम ‘Passport (Entry into India) Act, 1920’ कर दिया गया। यह कानून आज भी भारत में प्रवेश करने वालों के लिए पासपोर्ट की अनिवार्यता से जुड़ा है और इसे गृह मंत्रालय देखता है।

आजादी के बाद पासपोर्ट जारी करने का विषय केंद्र सरकार के पास आया और इसे विदेश मंत्रालय को सौंपा गया। 1954 तक राज्य सरकारें विदेश मंत्रालय की ओर से पासपोर्ट जारी करती रहीं। फिर मुंबई, कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई और नागपुर में पहले पाँच रीजनल पासपोर्ट ऑफिस बनाए गए। 1959 में विदेश मंत्रालय के अधीन केंद्रीय पासपोर्ट और इमीग्रेशन संगठन बनाया गया।

पासपोर्ट से जुड़ा बड़ा कानूनी बदलाव 1966 में आया। सतवंत सिंह साहनी बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया कानून से तय होनी चाहिए ताकि सरकार मनमाने तरीके से पासपोर्ट रोक या जारी न कर सके। इसके बाद सरकार ने 1967 में पासपोर्ट अधिनियम लाया और फिर पासपोर्ट ऐक्ट, 1967 बनाया। यह कानून 24 जून 1967 से लागू हुआ। इसी तारीख को विदेश मंत्रालय हर साल पासपोर्ट सेवा दिवस के रूप में मनाता है।

बाद में पासपोर्ट ऐक्ट में 1978, 1993 और 2001 में संशोधन हुए। इसी कानून के तहत केंद्र सरकार ने पासपोर्ट नियम बनाए हैं। पासपोर्ट आवेदन फॉर्म और उससे जुड़ी जानकारी भी इन्हीं नियमों का हिस्सा मानी जाती है।

क्या गैर-भारतीयों को भी मिल सकता है पासपोर्ट?

Passports Act की धारा 3 कहती है कि कोई व्यक्ति भारत से बाहर जाने का प्रयास तभी कर सकता है, जब उसके पास वैध पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज हो। धारा 4 पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेजों की श्रेणियाँ बताती है। इसलिए पासपोर्ट को समझने का सबसे सही तरीका यह है कि यह व्यक्ति की विदेश यात्रा के लिए अनुमति और पहचान का दस्तावेज है। विदेश में यह भारतीय राज्य की ओर से व्यक्ति की पहचान/राष्ट्रीयता को प्रस्तुत करता है लेकिन नागरिकता का मूल पासपोर्ट नहीं है।

ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि तो क्या किसी ऐसे शख्स को भी पासपोर्ट मिल सकता है जो भारत का नागरिक नहीं है। इसका सीधा जवाब है, हाँ और यह हमें पासपोर्ट ऐक्ट में ही मिलता है। पासपोर्ट ऐक्ट की धारा 20 कहती है, “केंद्र सरकार ऐसे व्यक्ति को, जो भारत का नागरिक न हो, पासपोर्ट या यात्रा-दस्तावेज जारी कर या करवा सकेगी यदि उस सरकार की यह राय हो कि ऐसा करना लोकहित में आवश्यक है।

पासपोर्ट ऐक्ट की धारा 20

पासपोर्ट क्यों नहीं है नागरिकता का सबूत?

यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। सामान्य तौर पर भारतीय पासपोर्ट भारतीय नागरिकों को जारी होता है, इसलिए पासपोर्ट बहुत मजबूत साक्ष्य माना जा सकता है। लेकिन कानून की भाषा में साक्ष्य और निर्णायक सबूत अलग चीजें हैं। पासपोर्ट किसी व्यक्ति की नागरिकता के पक्ष में साक्ष्य हो सकता है लेकिन यह अपने आप नागरिकता का अंतिम प्रमाण-पत्र नहीं बन जाता।

विदेश मंत्रालय के पासपोर्ट मैनुअल में यह बात साफ तौर पर कही गई है कि पासपोर्ट धारक की नागरिकता का साक्ष्य देता है लेकिन यह किसी भी व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति से संबंधित अन्य साक्ष्यों की ही श्रेणी में शामिल है। इसका कारण यह है कि पासपोर्ट में पूर्ण नागरिकता प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता है।

पासपोर्ट मैनुअल

इसका दूसरा कारण यह है कि पासपोर्ट जारी करने वाली अथॉरिटी नागरिकता का अंतिम निर्धारण नहीं करती है। पासपोर्ट के लिए दस्तावेज, पुलिस सत्यापन और पासपोर्ट के आधार पर जाँच की जाती है लेकिन नागरिकता का वास्तविक कानूनी ढाँचा नागरिकता अधिनियम, 1955 और उससे जुड़े नियम हैं। अगर किसी मामले में नागरिकता विवाद पैदा हो जाए तो पासपोर्ट आपका अंतिम जवाब नहीं होगा बल्कि वह केवल एक साक्ष्य जैसा होगा।

विपक्ष का हंगामा और सरकार का जवाब?

कॉन्ग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने सरकार के इस बयान पर सवाल उठाते हुए X पर लिखा, “पासपोर्ट जारी करने से पहले सरकारी एजेंसियाँ जिनमें पुलिस भी शामिल है, आखिर किस बात की जाँच करती हैं? विदेशी देशों और इमिग्रेशन काउंटरों का क्या होगा? क्या अब उन्हें यह मानना चाहिए कि भारतीय पासपोर्ट रखने वाला व्यक्ति जरूरी नहीं कि भारतीय नागरिक ही हो?”

कपिल सिब्बल ने भी उन पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने X पर लिखा, “24 जून 2026 को कहा गया कि ‘पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का दस्तावेज नहीं।’ तो फिर नागरिकता का प्रमाण कौन-सा दस्तावेज है? अगर BLO मेरी नागरिकता पर शक कर सकता है और मुझे वोट देने के अधिकार से वंचित कर सकता है, तो इसका नतीजा क्या होगा? भाजपा चुनाव जीत जाएगी। अब मामला सुप्रीम कोर्ट के हवाले है।”

इस मामले पर विपक्ष के सवाल और हंगामे के बीच सरकार ने भी जवाब दिया है। PTI ने केंद्र सरकार के सूत्रों के हवाले से लिखा है, “पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का प्रमाण नहीं रहा है और मोदी सरकार ने पिछले 12 वर्षों में इस दस्तावेज को लेकर कोई नया फैसला नहीं लिया है।”

सूत्रों का कहना है, “विदेश मंत्रालय द्वारा यह स्पष्ट किए जाने की मीडिया रिपोर्टों पर कि पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाण नहीं, सूत्रों ने कहा कि यह कोई कल लिया गया नया फैसला नहीं है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा।”

पहले भी अदालतें कह चुकी हैं कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं

यह कोई नई बात नहीं है जब पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना गया है। 2013 के एक फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि पासपोर्ट, आधार कार्ड या जन्म प्रमाणपत्र को अकेले नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। कोर्ट 4 लोगों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था जिन पर बांग्लादेश से अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने का आरोप था।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में 2013 की यह रिपोर्ट छपी है। इस रिपोर्ट में लिखा गया है, ”जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट और आधार कार्ड यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते कि आप भारतीय नागरिक हैं। खासकर अगर आपका जन्म एक जुलाई 1987 के बाद हुआ है।”

बॉम्बे हाईकोर्ट का एक हालिया फैसला भी इसी बात को साफ करता है। अगस्त 2025 में ‘बाबू अब्दुल रूफ सरदार बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में जस्टिस अमित बोरकर ने बांग्लादेशी नागरिक की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। उस व्यक्ति पर अवैध रूप से भारत में घुसने और फर्जीवाड़े के जरिए दस्तावेज हासिल करने का आरोप था।

अदालत ने कहा कि भारत में नागरिकता या राष्ट्रीयता से जुड़े सवालों को तय करने के लिए नागरिकता ऐक्ट, 1955 मुख्य और नियंत्रक कानून है। यही कानून बताता है कि कौन भारतीय नागरिक हो सकता है, नागरिकता कैसे हासिल की जा सकती है और किन परिस्थितियों में नागरिकता खत्म हो सकती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आधार कार्ड, PAN कार्ड या वोटर ID जैसे दस्तावेज होने भर से कोई व्यक्ति अपने आप भारत का नागरिक नहीं बन जाता।

नागरिकता तय करने का असली कानून कौन-सा है?

भारत में नागरिकता का मूल ढाँचा संविधान और नागरिकता ऐक्ट, 1955 से आता है। संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 में नागरिकता से जुड़े मूल प्रावधान हैं। अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के अधिग्रहण, समाप्ति और नागरिकता से संबंधित सभी मामलों पर कानून बनाने की शक्ति मिलती है। इसी आधार पर नागरिकता ऐक्ट, 1955 बनाया गया।

यही कानून बताता है कि कौन व्यक्ति भारत का नागरिक माना जाएगा, कौन भारतीय नागरिक बन सकता है, और किन हालात में किसी की नागरिकता खत्म हो सकती है। अगर कोई व्यक्ति जन्म से भारतीय है, विदेश में भारतीय माता-पिता से पैदा हुआ है, या बाद में रजिस्ट्रेशन/नेचुरलाइजेशन के जरिए भारतीय नागरिक बनना चाहता है, तो इन सभी मामलों के नियम इसी कानून में दिए गए हैं।

गृह मंत्रालय के Indian Citizenship Online Portal पर भी साफ बताया गया है कि भारतीय नागरिकता नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के तहत प्राप्त की जा सकती है। इस कानून के अनुसार नागरिकता मुख्यत: पाँच आधारों पर मिल सकती है। धारा 3 के तहत जन्म से नागरिकता, धारा 4 के तहत वंशानुक्रम द्वारा नागरिकता, धारा 5 के तहत पंजीकरण द्वारा नागरिकता, धारा 6 के तहत देशीकरण यानी naturalisation द्वारा नागरिकता और धारा 7 के तहत किसी भू-भाग के भारत में समावेशन के आधार पर नागरिकता।

indiancitizenshiponline.nic.in

सबसे जरूरी बात यह समझनी है कि भारत में हर नागरिक के पास अलग से कोई एक जैसा ‘नागरिकता प्रमाण पत्र’ होना जरूरी नहीं होता। भारत में करोड़ों लोग जन्म से भारतीय नागरिक हैं लेकिन उनके पास अलग से ‘Indian Citizenship Certificate’ नहीं होता।

जिन लोगों ने बाद में भारत की नागरिकता ली है, उनके लिए अलग व्यवस्था होती है। अगर किसी व्यक्ति को पंजीकरण के जरिए भारतीय नागरिकता मिली है, तो उसे Certificate of Registration मिलता है। अगर किसी व्यक्ति को देशीकरण यानी naturalisation के जरिए नागरिकता मिली है, तो उसे Certificate of Naturalisation मिलता है। इसी तरह CAA के तहत पात्र लोगों को नागरिकता मिलने पर भी सरकार की ओर से प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। ऐसे मामलों में यही प्रमाण पत्र नागरिकता का साफ दस्तावेज माना जाता है।

हालाँकि, जो लोग भारत में पैदा हुए हैं और जन्म से नागरिक हैं, उनके पास आम तौर पर ऐसा कोई अलग नागरिकता प्रमाण पत्र नहीं होता। ऐसे लोगों की नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता के दस्तावेज, उनके नागरिकता से जुड़े रिकॉर्ड, स्कूल के दस्तावेज, निवास से जुड़े रिकॉर्ड, सरकारी कागजात और जरूरत पड़ने पर अन्य सहायक दस्तावेज देखे जा सकते हैं। यानी जन्म से नागरिकता वाले मामलों में कोई एक दस्तावेज हर स्थिति में अंतिम प्रमाण नहीं होता बल्कि दस्तावेजों और कानून के आधार पर पूरी स्थिति देखी जाती है।

इसे यूँ भी समझ सकते हैं कि दिल्ली में अगर आपको ‘राष्ट्रीयता प्रमाण-पत्र’ चाहिए तो उसके लिए आवेदन करना होता है। इसमें आवेदक की जानकारी के साथ-साथ कुछ सहायक डॉक्यूमेंट भी माँगे जाते हैं। दिल्ली सरकार की वेबसाइट पर दिए गए इस फॉर्म में इन कागजातों का जिक्र है। आवेदनकर्ता को सबसे पहले पूरा भरा हुआ आवेदन फॉर्म जमा करना होता है, जिसे क्लास-1 गजेटेड अधिकारी से सत्यापित कराना जरूरी है।

इसके साथ आधार नंबर देना होता है। अगर आधार नंबर उपलब्ध नहीं है, तो आधार एनरोलमेंट नंबर देना होगा और पहचान के लिए PAN कार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर कार्ड या पहचान पत्र में से कोई एक दस्तावेज देना होगा। आवेदनकर्ता के आधार कार्ड पर लिखा नाम आवेदन में दिए गए नाम से मेल खाना चाहिए।

आवेदन जमा करते समय या वेरिफिकेशन के समय आवेदनकर्ता की फोटो वेब कैमरे से ली जाएगी। यह फोटो आधार कार्ड पर लगी फोटो से मेल खानी चाहिए। इसके अलावा निर्धारित फॉर्मेट में शपथपत्र देना होगा। अगर मामला 18 साल से कम उम्र के बच्चों से जुड़ा है, तो शपथपत्र किसी वयस्क व्यक्ति की ओर से दिया जाएगा।

वर्तमान पते के प्रमाण के लिए वोटर कार्ड, बिजली बिल, पानी बिल, टेलीफोन बिल जैसे दस्तावेज दिए जा सकते हैं। इसके साथ भारत का जन्म प्रमाण पत्र या देशीकरण से जुड़ा प्रमाण पत्र भी जमा करना होगा। इसके अलावा क्लास-1 गजेटेड अधिकारी से नागरिकता के संबंध में प्रमाण पत्र भी देना होगा।

राष्ट्रीयता प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन का एक हिस्सा

भारत में नागरिकता साबित करने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज कानूनी रूप से मान्य माने जाएँगे, इस पर कोई एक साफ और अंतिम सूची सामने नहीं दिखती। 20 दिसंबर 2019 को प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो ने NRC से जुड़े सवाल-जवाब में कहा था कि नागरिकता साबित करने के लिए जन्म की तारीख और जन्म-स्थान से जुड़े दस्तावेज दिए जा सकते हैं। हालाँकि, उसी जवाब में यह भी साफ किया गया था कि ऐसे स्वीकार्य दस्तावेजों की सूची पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।

दिसंबर 2019 में केंद्र सरकार की ओर से जारी प्रेस रिलीज में भी यही बात दोहराई गई थी। सरकार ने कहा था कि नागरिकता के प्रमाण के तौर पर कौन-कौन से दस्तावेज स्वीकार किए जाएँगे, इस बारे में अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है। यानी उस समय तक सरकार ने आधार, पासपोर्ट, वोटर ID, PAN कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र या किसी अन्य दस्तावेज को अलग से नागरिकता का अंतिम प्रमाण घोषित नहीं किया था।

फरवरी 2020 में संसद में भी सरकार से यही सवाल पूछा गया था कि क्या आधार, पासपोर्ट, वोटर ID, PAN कार्ड या जन्म प्रमाण पत्र को नागरिकता का पक्का प्रमाण माना जा सकता है। इस पर गृह मंत्रालय ने किसी एक दस्तावेज को अंतिम प्रमाण नहीं बताया। मंत्रालय का जवाब यही था कि नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 और उसके नियमों के आधार पर होगा। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत में नागरिकता का सवाल किसी एक कागज से नहीं बल्कि कानून और दस्तावेजों की पूरी जाँच से तय होता है।

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