छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्कूलों में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र जैसी प्रार्थनाएँ कराने के सरकारी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि यह फैसला बिल्कुल सही है क्योंकि किसी भी छात्र को जबरदस्ती ये प्रार्थनाएँ गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जज अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने इस मामले पर सुनवाई की। उन्होंने कहा कि यह याचिका समय से पहले दाखिल की गई है। कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे लगे कि बच्चों के अधिकारों का हनन हो रहा है। कोर्ट ने कहा कि सरकार के इस आदेश में किसी के साथ कोई जबरदस्ती नहीं की गई है और न ही किसी के धर्म में दखल दिया गया है।
संस्कार सिखाना गलत नहीं: हाई कोर्ट
कोर्ट ने हमारे संविधान के नियम (अनुच्छेद 28-1) का हवाला देते हुए एक बड़ी बात कही। कोर्ट ने समझाया कि सरकारी स्कूलों में किसी खास धर्म के रीति-रिवाज या पूजा-पाठ की शिक्षा देने पर रोक है। लेकिन बच्चों को अच्छी बातें, नैतिकता और अच्छे संस्कार सिखाने पर कोई रोक नहीं है। यह तो बच्चों को एक अच्छा नागरिक बनाने और समाज में भाईचारा बढ़ाने के लिए बहुत जरूरी है।
यह याचिका छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन अब्दुल सलाम रिजवी, अल्पसंख्यक विभाग के पूर्व चेयरमैन महेंद्र छाबड़ा और सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद ने मिलकर लगाई थी। उनका कहना था कि सरकार का यह नियम बच्चों की मर्जी के खिलाफ है। उन्होंने आरोप लगाया था कि इसमें सिर्फ एक धर्म की प्रार्थनाओं को शामिल किया गया है, जो कि सही नहीं है।
सरकार ने क्या दलील दी?
दूसरी तरफ, सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखा। सरकार ने कहा कि ये मंत्र और वंदनाएँ किसी धर्म विशेष की नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति और अच्छे संस्कारों का हिस्सा हैं। इनका मकसद बच्चों में अनुशासन, बड़ों के प्रति आदर और पर्यावरण के प्रति प्रेम जगाना है। सरकार ने यह भी बताया कि यह नियम लागू हो चुका है और किसी भी बच्चे या माता-पिता को इससे कोई शिकायत नहीं है।
स्कूल शिक्षा विभाग के इस नियम के मुताबिक, राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में सुबह की सभा में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना और गुरु मंत्र का पाठ करना होता है। इसके साथ ही महापुरुषों की कहानियाँ सुनाई जाती हैं। दोपहर के खाने से पहले भोजन मंत्र और स्कूल की छुट्टी होने से पहले गायत्री मंत्र और शांति मंत्र का पाठ किया जाता है।
हाई कोर्ट ने फिलहाल इस याचिका को खारिज कर दिया है। लेकिन कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को एक मौका भी दिया है। कोर्ट ने कहा कि अगर भविष्य में किसी बच्चे के साथ जबरदस्ती होती है या किसी को परेशान किया जाता है, तो वे पक्के सबूतों के साथ दोबारा कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

