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‘तुम्हें जहाँ से निकाला गया है, उन्हें भी वहाँ से निकालो’: पढ़ें- कैसे अयोध्या में विशाल मस्जिद ना बनने के पीछे चंदे का अकाल नहीं, जिहादी मानसिकता है असल वजह

अयोध्या के धन्नीपुर की मस्जिद का इतना बड़ा प्लान अचानक बहुत छोटा हो जाना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। जब तक लोग सच को स्वीकार नहीं करेंगे और अपनी सोच नहीं बदलेंगे, तब तक सिर्फ विरोध और जिद के दम पर कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।

यह खबर देश के हर नागरिक के लिए बेहद विचारणीय है। अयोध्या के धन्नीपुर में बनने वाली प्रस्तावित भव्य मस्जिद के लिए मुस्लिम समुदाय से उतने पैसे भी नहीं मिले, जितने की उम्मीद की जा रही थी। सुनने में शायद यह बात अजीब लगे लेकिन हकीकत में यह हँसने की नहीं बल्कि गहराई से सोचने की बात है। यह इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि एक खास समुदाय की सोच में कितना कट्टरपंथ और जिद्द बसी है।

ये मुस्लिम समुदाय सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मिली दूसरी जगह पर एक भव्य मस्जिद, अस्पताल या लाइब्रेरी बनाने के लिए अपनी जेब से पैसा देने को तैयार नहीं हैं। वे आज भी इसी बात पर अड़े हैं कि राम जन्मभूमि की वही जमीन उनकी थी और वे उसी जमीन के मोह में फँसे हैं। यह मानसिकता केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में वक्फ की हर संपत्ति और विवादित ढांचे पर उनकी इसी सोच को बयाँ करती है।

चंदे का महासंकट: क्यों औंधे मुँह गिरी भव्य मस्जिद की योजना?

साल 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया, तो उसके बाद सरकार ने अयोध्या के धन्नीपुर गाँव में मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन दी थी। इस जमीन पर मुस्लिम ट्रस्ट ने बहुत बड़ा प्लान बनाया था। उन्होंने सोचा था कि यहाँ एक शानदार और भव्य मस्जिद बनेगी। साथ ही, लोगों की भलाई के लिए 300 बेड का एक बड़ा अस्पताल, एक बढ़िया लाइब्रेरी और एक बड़ा लंगर (कम्युनिटी किचन) भी तैयार किया जाएगा। पूरा नक्शा और तैयारी एकदम पक्की थी।

लेकिन असलियत में हुआ इसके ठीक उलटा। खुद मुस्लिम समाज के लोगों ने ही इस पूरे प्रोजेक्ट में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और इससे अपना मुँह मोड़ लिया। अपनों के इस तरह साथ छोड़ने की वजह से यह बड़ा और खूबसूरत प्लान पूरी तरह ठप हो गया। अब संस्था के बड़े अधिकारियों का कहना है कि वे यहाँ कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि सिर्फ एक बहुत छोटी सी मस्जिद बनाएँगे। इस छोटी मस्जिद को खड़ा करने के लिए भी कम से कम 3 से 5 करोड़ रुपए चाहिए, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी समाज से सिर्फ डेढ़ करोड़ रुपए का ही चंदा मिल पाया है।

मजहबी किताबों की उल्टी व्याख्या और जमीन का मोह

देखिए, मस्जिद के लिए चंदा न मिलने की असली वजह यह बिल्कुल नहीं है कि लोगों के पास पैसे खत्म हो गए हैं। इसके पीछे असल में एक गहरी मजहबी और राजनीतिक सोच काम कर रही है। इस पुरानी और कट्टरपंथी सोच में जीत और हार का पैमाना हमारे आज के रक्षा विज्ञान से बिल्कुल अलग है। इस मानसिकता में लोग तब तक खुद को हारा हुआ मानते ही नहीं, जब तक कि उनके कब्जे से जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा भी हमेशा के लिए न चला जाए। सीधा सा नियम समझ लीजिए… इनके लिए किसी भी तरह जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखना ही सबसे बड़ी जीत है।

इस अजीब जिद के पीछे कुछ कट्टरपंथी विचारकों की अपनी तरह से की गई व्याख्या है। जैसे, कुरान के सूरा अल-बकरा की आयत 191 में एक जिक्र आता है कि ‘तुम्हें जहाँ से निकाला गया है, उन्हें भी वहाँ से निकालो।’ शुरुआत में यह बात सिर्फ मक्का की जमीन को वापस पाने के लिए कही गई थी, लेकिन समय के साथ कट्टरपंथी सोच के लोगों ने इसे पूरी दुनिया की जमीनों से जोड़ दिया। उनकी सोच यह बन गई कि जो जमीन एक बार ‘दार-अल-इस्लाम’ यानी इस्लामिक शासन के नीचे आ गई, वह हमेशा के लिए उन्हीं की हो गई। उसे किसी भी गैर-मुस्लिम के हाथ में जाने देना ये अपनी सबसे बड़ी मजहबी हार मानते हैं। यही वजह है कि इतिहास में सदियों पहले स्पेन (अंडालूसिया) में हुई अपनी हार का रोना ये लोग आज भी रोते हैं।

वक्फ संपत्तियों पर अवैध दावा और जमीन हड़पने की वही पुरानी नीति

यही रवैया हमें वक्फ बोर्ड और बाकी जमीनी विवादों में भी साफ देखने को मिलता है। इनकी सोच बहुत सीधी है, जिस भी सरकारी या प्राइवेट जमीन पर एक बार हक जता दिया या जिसे अपना मान लिया, उसे फिर किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं है। उसे छोड़ना ये अपनी नाक कटने जैसा या अपनी हार मानते हैं।

यही वजह है कि जब भी सरकार या अदालतें वक्फ की जमीनों की जाँच करने या उनके नियमों को सुधारने की कोशिश करती हैं, तो ये लोग तुरंत विरोध में खड़े हो जाते हैं और हंगामा शुरू कर देते हैं। इनके लिए जमीन हाथ से जाने का सीधा मतलब है अपनी ताकत का कम होना। पुरानी सोच के मुताबिक, जो जमीन एक बार इनके कब्जे में आ गई, उसे किसी और को देना ये अपनी सबसे बड़ी हार समझते हैं। इसी चक्कर में ये अदालती फैसलों को भी मन से स्वीकार नहीं कर पाते और हर जगह कोई न कोई नया विवाद खड़ा रखते हैं।

प्रशासनिक पेंच और अब सरकारी सहायता पर टिकी निगाहें

अयोध्या के धन्नीपुर में इस काम के समय पर शुरू न होने की वजह सिर्फ पैसों की कमी ही नहीं थी, बल्कि इस मस्जिद को बनाने वाले ट्रस्ट की अपनी कमियाँ भी थीं। सरकारी दफ्तर से नक्शा पास कराने और उसकी फीस जमा करने जैसे कागजी कामों में ही इस ट्रस्ट ने बहुत लंबा समय खराब कर दिया। छोटे-छोटे तकनीकी कामों को भी ये लोग समय पर नहीं संभाल पाए।

अब जब मुस्लिम समाज के लोगों ने इस बड़े प्रोजेक्ट को पूरी तरह नकार दिया है और चंदा देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, तो ये लोग अंदर ही अंदर एक नया रास्ता ढूँढ रहे हैं। ट्रस्ट के लोगों की बातों से अब ऐसा लग रहा है कि जब अपनों से कोई मदद नहीं मिली, तो इनकी नजरें सरकार की तरफ टिक गई हैं। अब ये जुगाड़ लगाने में जुटे हैं कि कैसे भी करके सरकारी मदद या विकास का पैसा मिल जाए, ताकि किसी तरह इनकी इज्जत बच सके।

एक तरफ भव्य राम मंदिर, दूसरी तरफ खोखली जिद

अगर आप इस पूरे मामले को ध्यान से देखें, तो यह एक तरफ भारत के गौरव और हमारे भव्य राम मंदिर के शानदार निर्माण को दिखाता है। वहीं दूसरी तरफ, यह कुछ लोगों की पुरानी और जिद से भरी सोच की पोल भी खोलता है। एक तरफ जहाँ देश-विदेश से करोड़ों हिंदुओं ने अपनी मर्जी से दिल खोलकर चंदा दिया और राम मंदिर का सपना पूरा कर दिखाया, वहीं दूसरी तरफ सिर्फ जिद और कट्टरपंथ के चक्कर में मुस्लिम समाज अपनी ही इस नई मस्जिद के लिए थोड़ी सी रकम भी जमा नहीं कर पाया।

चाहे वाराणसी का ज्ञानवापी मामला हो, धार की भोजशाला का विवाद हो या फिर वक्फ कानून में सुधार की बात… हर जगह सिर्फ जमीन पर अपना कब्जा जमाए रखने की यह मानसिक लड़ाई साफ दिखती है। अयोध्या के धन्नीपुर की मस्जिद का इतना बड़ा प्लान अचानक बहुत छोटा हो जाना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। जब तक लोग सच को स्वीकार नहीं करेंगे और अपनी सोच नहीं बदलेंगे, तब तक सिर्फ विरोध और जिद के दम पर कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।

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