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‘हिन्दू एक गाली, इसका मतलब चोर, डाकू, गुलाम’ बोलने वाले ईसाई संगठन के 11 लोगों को राहत नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने केस रद्द करने की अर्जी खारिज की, कहा- अभिव्यक्ति की आजादी का दावा ट्रायल में देखेंगे

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 'हिंदू एक गाली है' टिप्पणी मामले में 11 ईसाई संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार करते हुए ट्रायल जारी रखने के निर्देश दिए।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सार्वजनिक तौर पर ‘हिन्दू एक गाली, इसका मतलब चोर, डाकू, लुटेरा और गुलाम’ कहने वाले ईसाई संगठन से जुड़े 11 सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया है।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ऐसे सवाल शामिल हैं, जिनका फैसला केवल पूरे ट्रायल के दौरान सबूतों की जाँच के बाद ही किया जा सकता है। शुरुआती चरण में इन्हें तय नहीं किया जा सकता, इसलिए FIR को खारिज नहीं किया जा सकता है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 11 आरोपितों, सुनील कुमार जाल्क्सो, संजय सक्सेना, रेमिश टोप्पो, श्याम सुंदर मरावी, अरविंद कच्छप, पॉलुस कुजूर, हर्ष कुजूर, धर्मू एक्का, दिनेश भगत, मीरा तिर्की और ब्लैसियस टिग्गा की याचिका खारिज कर दी।

इन सभी ने अपने खिलाफ दर्ज FIR, चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की माँग की थी। यह मामला फरवरी 2024 का है, जब छत्तीसगढ़ के जेशपुर की एक सार्वजनिक सभा में हिन्दू धर्म के खिलाफ विवादास्पद और आपत्तिजनक बयान दिए गए थे। इसका आयोजन भारत मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा ने किया था।

क्या है मामला?

यह मामला 28 फरवरी 2024 को शुरू हुआ, जब विश्व हिंदू परिषद, जशपुर के जिला अध्यक्ष कर्नैल सिंह ने कुनकुरी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में उन्होंने कहा, “वक्ताओं ने हिंदू देवी-देवताओं का अपमान किया है, इसलिए उन्हें सजा मिलनी चाहिए। पूरे हिंदू और ब्राह्मण समाज का भी अपमान किया गया। इससे समुदाय में भारी आक्रोश है और लोग आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।”

अभियोजन के अनुसार, 27 फरवरी 2024 को कुनकुरी के सलियाटोली मिनी स्टेडियम में भारत मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा की ओर से आयोजित एक सार्वजनिक सभा में ये सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए थे।

इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि ‘हिंदू’ शब्द का मतलब ‘चोर, डकैत, लुटेरा और गुलाम’ होता है और हिंदू कोई धर्म नहीं बल्कि एक गाली है। इसके अलावा धार्मिक कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के खिलाफ भी टिप्पणियाँ की गईं।

सभा में लोगों से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) तोड़ने और ईवीएम के जरिए होने वाले चुनावों का विरोध करने की भी अपील की गई। शिकायत में कहा गया कि ये भाषण अलग-अलग समुदायों के बीच दुश्मनी बढ़ाने, राष्ट्रीय एकता को प्रभावित करने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं।

शिकायत के बाद पुलिस ने 4 मार्च 2024 को 12 लोगों के खिलाफ हेट क्राइम का मामला दर्ज किया। जाँच पूरी होने के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A, 153B, 295A, 505(2), 294 और 34 के तहत आरोप तय किए।

बाद में सेशन कोर्ट ने भी इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद आरोपित सामाजिक कार्यकर्ता हाई कोर्ट पहुँचे। अभियोजन पक्ष ने कहा कि ऐसे बयानों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। यह भी देखना जरूरी है कि ये बातें किस तरह के लोगों के सामने कही गईं और उनका सांप्रदायिक सौहार्द तथा कानून-व्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता था।

गौरतलब है कि FIR में कुल 12 लोगों के नाम थे, लेकिन उनमें से रूपनारायण एक्का ने कार्यवाही रद्द कराने वाली इस याचिका में हिस्सा नहीं लिया।

कार्यकर्ताओं ने अभिव्यक्ति की आजादी का दिया हवाला

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि वे सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए काम करते हैं और उनके बयान सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मुद्दों पर चर्चा का हिस्सा थे।

उन्होंने कहा कि उनके बयान संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से संरक्षित हैं और वैज्ञानिक सोच तथा सामाजिक सुधार को बढ़ावा देने से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 51A(h) के अनुरूप हैं।

उनका यह भी कहना था कि उनका किसी की धार्मिक भावनाएं आहत करने या समुदायों के बीच दुश्मनी फैलाने का कोई जानबूझकर इरादा नहीं था।

कोर्ट ने कहा- ट्रायल जरूरी है

हाईकोर्ट ने यह दलील खारिज करते हुए कहा कि इस तरह के तर्कों पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर याचिका में विचार नहीं किया जा सकता। यह प्रावधान पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के बराबर था।

खंडपीठ ने कहा, “जाँच के दौरान जुटाई गई सामग्री से प्रथम दृष्टया यह सामने आता है कि बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी वाली एक सार्वजनिक सभा में, जिसमें अलग-अलग समुदायों के लोग भी शामिल थे, हिंदू धर्म, धार्मिक व्यक्तित्वों और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कुछ कथित बयान दिए गए थे।”

कोर्ट ने आगे कहा, “यह तय करना कि संबंधित बयान वैध आलोचना की सीमा में आते हैं या फिर अभियोजन द्वारा लगाई गई दंडात्मक धाराओं के तहत दंडनीय अपराध की सीमा पार करते हैं, शुरुआती चरण में कार्यवाही रद्द करने वाली याचिका में उचित तरीके से नहीं किया जा सकता।”

बचाव पक्ष की इस दलील पर कि याचिकाकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता, तर्कवादी या वैज्ञानिक सोच के समर्थक हैं और उनके बयान केवल सामाजिक सुधार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दिए गए थे, कोर्ट ने कहा कि केवल इसी आधार पर इस स्तर पर आपराधिक कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए कि इन बयानों के बाद कोई वास्तविक सांप्रदायिक हिंसा या कानून-व्यवस्था की समस्या सामने नहीं आई, यह मुकदमा खत्म करने का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने कहा कि जाँच में गवाहों के बयान, कार्यक्रम के पर्चे, कार्यक्रम की वीडियोग्राफी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत प्रमाणपत्र भी शामिल हैं।

इससे स्पष्ट है कि मामला केवल अनुमान पर आधारित नहीं है, बल्कि उसके समर्थन में पर्याप्त सामग्री मौजूद है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसकी ये टिप्पणियां केवल कार्यवाही रद्द करने की याचिका पर फैसला देने तक सीमित हैं और ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष पर इनका कोई असर नहीं पड़ेगा।

फैसले में कहा गया, “FIR, चार्जशीट, 19 सितंबर 2025 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, कुनकुरी द्वारा आरोप तय करने के आदेश, 24 जनवरी 2026 को प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, कुनकुरी द्वारा पारित पुनरीक्षण आदेश तथा उनसे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। इसलिए यह याचिका निराधार है और इसे खारिज किया जाता है।”

हाईकोर्ट ने अंत में स्पष्ट किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियां केवल कार्यवाही रद्द करने की याचिका तक सीमित हैं और मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं हैं। कोर्ट ने कहा, “ट्रायल कोर्ट इस मामले की सुनवाई स्वतंत्र रूप से करेगा और कानून के अनुसार तथा ट्रायल के दौरान पेश किए जाने वाले साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला सुनाएगा।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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