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80+ देशों में Make In India हथियार, ब्रह्मोस के साथ अस्त्र, तेजस और पिनाका की तेजी से बढ़ी माँग: समझें मोदी सरकार के किन कदमों से भारत बना हथियारों का प्रमुख निर्यातक

भारत का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच चुका है। ब्रह्मोस, अस्त्र, पिनाका और तेजस जैसे स्वदेशी हथियारों की वैश्विक माँग लगातार बढ़ रही है। 80 से अधिक देशों तक पहुँच चुके भारतीय रक्षा उत्पाद आत्मनिर्भर भारत की सफलता और वैश्विक रक्षा बाजार में देश की मजबूत होती स्थिति का प्रमाण बन रहे हैं।

आज की दुनिया में कोई भी देश कितना शक्तिशाली है, यह इस बात से तय होता है कि वह हथियारों के मामले में दूसरों पर कितना निर्भर है। कुछ साल पहले तक भारत को दुनिया के उन देशों में गिना जाता था जो बाहर से सबसे ज्यादा हथियार खरीदते थे। लेकिन अब समय पूरी तरह बदल चुका है।

‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत जैसी योजनाओं के कारण आज भारत खुद अपने देश में आधुनिक हथियार बना रहा है। यही वजह है कि आज भारत दुनिया के करीब 80 से ज्यादा देशों को अपने सैन्य उत्पाद, हथियारों के कलपुर्जे और मिसाइलें बेच रहा है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 के आँकड़े बताते हैं कि भारत का रक्षा निर्यात (Defence Export) 38,424 करोड़ रुपए (लगभग 4 बिलियन डॉलर) को पार कर चुका है, जो अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। इस कामयाबी के बीच इंडोनेशिया के साथ हुआ ‘ब्रह्मोस’ और ‘अस्त्र’ मिसाइल का नया सौदा भारत के लिए एक बहुत बड़ी रणनीतिक जीत है।

इस ऐतिहासिक डील के बाद अब पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि भारत बहुत जल्द डिफेंस सेक्टर में दुनिया का नया ‘सम्राट’ बनने की राह पर है।

वैश्विक रक्षा बाजार में भारतीय हथियारों की बढ़ती माँग और इसकी बड़ी वजहें

आज के समय में दुनिया के तमाम देश अपनी सुरक्षा के लिए भारतीय हथियारों और मिसाइलों पर भरोसा जता रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत की मिसाइल तकनीक अत्यधिक आधुनिक होने के साथ-साथ दुनिया के अन्य बड़े देशों के मुकाबले कई गुना ज्यादा किफायती है।

कम रक्षा बजट वाले छोटे देशों के लिए पश्चिमी देशों या अमेरिका से इस स्तर की मारक क्षमता वाले हथियार खरीदना उनके बजट से बाहर होता है। दूसरा सबसे बड़ा कारण भारत की रणनीतिक छवि है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को एक ऐसे व्यावहारिक प्रदाता के रूप में देखा जाता है जो किसी भी महाशक्ति के गुट का हिस्सा नहीं है और न ही वह इन देशों की संप्रभुता के लिए कोई राजनीतिक दबाव या सुरक्षा खतरा पैदा करता है।

यही वजह है कि ये देश अपनी रक्षा जरूरतों के लिए पूरी तरह अमेरिका या पश्चिमी देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहते, क्योंकि उनके हथियारों के साथ कई तरह के कड़े राजनीतिक प्रतिबंध और शर्तें जुड़ी होती हैं। रणनीतिक स्वायत्तता की इसी चाहत ने आज भारतीय हथियारों को दुनिया की एक बड़ी जरूरत बना दिया है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ से लेकर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक: कहाँ-कहाँ सफल रही स्वदेशी मिसाइलें

किसी भी हथियार प्रणाली की साख तब तक पूरी तरह स्थापित नहीं होती जब तक कि वह वास्तविक युद्ध या किसी बड़े और जटिल सैन्य ऑपरेशन में अपनी उपयोगिता और अचूकता साबित न कर दे। भारतीय मिसाइल तकनीक के संदर्भ में यह अटूट साख ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पूरी तरह सिद्ध हुई थी।

इस बड़े और संवेदनशील सैन्य अभियान के दौरान भारत की इन दोनों स्वदेशी मिसाइल प्रणालियों ने पाकिस्तान के बारह सैन्य एयरबेस को पूरी तरह से तबाह करने और दुश्मन की हवाई तथा जवाबी ताकत को पंगु बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इसी वास्तविक युद्ध-परीक्षित सफलता के कारण आज वैश्विक स्तर पर इन दोनों मिसाइलों को लेकर कौतूहल और अंतरराष्ट्रीय माँग दोनों में भारी इजाफा हुआ है। भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन तथा रूस के संयुक्त उपक्रम द्वारा तैयार की गई ब्रह्मोस मिसाइल 300 किलोमीटर की दूरी तक अत्यंत सटीक मार करने में पूरी तरह सक्षम है।

इसकी सबसे बड़ी खूबी इसकी सुपरसोनिक गति, अत्यधिक संहारक क्षमता और बहुमुखी प्रतिभा है, जिसके कारण इसे थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों के द्वारा भूमि, युद्धपोत, पनडुब्बी और लड़ाकू विमानों से समान रूप से संचालित किया जा सकता है।

दूसरी तरफ रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO द्वारा पूरी तरह स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित की गई अस्त्र मिसाइल हवा से हवा में मार करने वाली एक बेहद घातक प्रणाली है, जो सौ किलोमीटर की दूरी तक दुश्मन के विमानों को आसानी से निशाना बना सकती है।

यह मिसाइल हवा की सामान्य गति से साढ़े चार गुना तेज रफ्तार से चलती है और 20 किलोमीटर की अत्यधिक ऊँचाई तक जाकर दुश्मन के आधुनिक लड़ाकू विमानों को ध्वस्त करने की क्षमता रखती है।

इंडोनेशिया के साथ हुआ दोहरा समझौता: भारतीय रक्षा निर्यात का एक नया मील का पत्थर

भारत की इसी बढ़ती साख का ताजा उदाहरण इंडोनेशिया के साथ हुआ हालिया रक्षा समझौता है, जिसे इस दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र मिसाइल की खरीद को लेकर दो अलग-अलग समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।

यह भारत के रक्षा इतिहास में पहला मौका है जब किसी देश के साथ एक ही समय में एक साथ दो बड़े रक्षा सौदे किए गए हैं। हालाँकि रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इंडोनेशिया को कुल कितनी संख्या में ये मिसाइलें दी जाएँगी और इसकी अंतिम व्यावसायिक कीमत क्या होगी, यह तय होना बाकी है, जिस पर आने वाले दिनों में दोनों देशों की टीमें बैठकर चर्चा करेंगी।

इंडोनेशिया के पास भी वही रूसी सुखोई लड़ाकू विमान हैं जिनका इस्तेमाल भारतीय वायुसेना करती है। चूँकि भारत अपनी वायुसेना के सुखोई विमानों में अस्त्र मिसाइल को पहले ही सफलतापूर्वक फिट और संचालित कर चुका है, इसलिए इंडोनेशियाई वायुसेना के लिए भी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए यह मिसाइल तकनीकी रूप से आसान विकल्प बनकर उभरी है।

फिलीपींस से लेकर वियतनाम तक: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के खिलाफ बनता नया समीकरण

इंडोनेशिया से पहले हिंद-प्रशांत और दक्षिण-पूर्वी एशिया के कई अन्य देश भी भारत की मिसाइल तकनीक को अपना चुके हैं। फिलीपींस और वियतनाम के बाद इंडोनेशिया तीसरा ऐसा देश है जिसने भारत से ब्रह्मोस मिसाइलों की खरीद की है। फिलीपींस ने साल 2022 में लगभग 375 मिलियन डॉलर का बड़ा अनुबंध करके भारतीय मिसाइल को अपनी नौसेना का हिस्सा बनाया था, जबकि इस साल वियतनाम ने भी इसके लिए समझौता किया है।

इन समझौतों के पीछे सबसे बड़ी वजह दक्षिण चीन सागर में चीन का बढ़ता आक्रामक व्यवहार और सैन्य विस्तारवाद है, जिसने इस क्षेत्र के छोटे देशों को अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित कर दिया है। हालाँकि इंडोनेशिया सीधे तौर पर चीन को अपना प्राथमिक सुरक्षा खतरा नहीं मानता, लेकिन उत्तरी नटूना सागर में समुद्री दावों को लेकर बीजिंग के साथ उसके मतभेद साफ हैं।

हाल ही में चीन द्वारा प्रशांत महासागर में किए गए बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण ने इन देशों को अपनी रक्षा प्रणालियों को मजबूत करने के लिए और प्रेरित किया है। ऐसे में भारत इन देशों के लिए एक गैर-आक्रामक और भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में सामने आया है, जो इस पूरे क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में मदद कर रहा है।

खाड़ी देशों से लेकर लैटिन अमेरिका तक: ब्रह्मोस को खरीदने की कतार में लगे 11 अन्य देश

भारतीय मिसाइलों का जादू सिर्फ दक्षिण-पूर्वी एशिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई अन्य क्षेत्रों में भी इसकी भारी माँग देखी जा रही है। वर्तमान में दुनिया के 11 अन्य प्रमुख देश जिनमें थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रुनेई, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान, चिली, अर्जेंटीना तथा वेनेजुएला शामिल हैं, ब्रह्मोस मिसाइल को खरीदने में बहुत गहरी दिलचस्पी दिखा चुके हैं।

भारत और रूस द्वारा संयुक्त रूप से बनाई जा रही ब्रह्मोस की तटीय और तटीय सुरक्षा क्षमताओं, विशेष रूप से इसके एंटी-शिप वर्जन ने इन देशों को बहुत प्रभावित किया है। संयुक्त अरब अमीरात जैसी खाड़ी शक्तियों के साथ भी ब्रह्मोस मिसाइल और आकाशतीर एयर-डिफेंस कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम को लेकर बातचीत चल रही है, जो भारत के रक्षा निर्यात को पश्चिम एशिया के बाजारों में एक बहुत बड़ा विस्तार दे सकती है।

इसके अलावा एक बेहद दिलचस्प बात यह भी सामने आ रही है कि खुद रूस, जो इस मिसाइल के सह-विकास में भारत का साझेदार रहा है, वह भी अपनी सशस्त्र सेनाओं में ब्रह्मोस प्रणाली को शामिल करने पर विचार कर रहा है, जो इस मिसाइल की अंतरराष्ट्रीय साख को और ज्यादा मजबूत बनाता है।

पिनाका और तेजस: मिसाइलों से आगे बढ़कर दुनिया में धूम मचाते अन्य स्वदेशी हथियार

भारत की यह रक्षा सफलता केवल ब्रह्मोस या अस्त्र मिसाइल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत के कई अन्य अत्याधुनिक और स्वदेशी सैन्य उत्पाद भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में धूम मचा रहे हैं। इसमें सबसे पहला नाम रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित की गई पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर प्रणाली का है।

यह घातक लॉन्चर बेहद खराब मौसम में भी महज 44 सेकेंड के भीतर 72 रॉकेट दागकर सत्तर किलोमीटर की दूरी पर स्थित दुश्मन के ठिकानों को पूरी तरह नष्ट कर सकता है। आर्मेनिया ने भारत के साथ इस स्वदेशी प्रणाली और गोला-बारूद को खरीदने के लिए एक बड़ा समझौता किया है।

इसी तरह भारत का स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान ‘तेजस’ भी कई देशों की पहली पसंद बना हुआ है। मलेशिया के साथ तेजस का रक्षा सौदा इस समय बिल्कुल अंतिम चरण में है।

इसके अलावा अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, मिस्र, अमेरिका, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे छह बड़े देशों ने भी तेजस फाइटर जेट को अपने बेड़े में शामिल करने के लिए उन्नत स्तर की रुचि दिखाई है, जो दिखाता है कि भारत अब विमानन क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर अपना लोहा मनवा रहा है।

सम्राट बनने की राह में मौजूद बड़ी चुनौतियाँ और भविष्य का रोडमैप

भले ही भारत का रक्षा निर्यात पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा है और भारत की साख एक निर्यातक के रूप में मजबूत हुई है, लेकिन वैश्विक स्तर पर रक्षा उद्योग का असली और ‘सम्राट’ बनने की राह में भारत के सामने अभी कई बड़ी चुनौतियाँ खड़ी हैं और एक लंबा सफर तय करना बाकी है।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी SPRI की वैश्विक रिपोर्टों और रक्षा आँकड़ों के अनुसार, भारत अभी भी दुनिया के शीर्ष 25 हथियार निर्यातक देशों की मुख्य सूची में अपनी स्थायी जगह बनाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहा है। वैश्विक रक्षा बाजार के कुल हथियार कारोबार में भारत की हिस्सेदारी वर्तमान में एक प्रतिशत के आसपास ही सिमटी हुई है।

इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका 331 बिलियन डॉलर के भारी-भरकम कारोबार के साथ दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।

इसके साथ ही भारतीय रक्षा परिदृश्य की एक बड़ी हकीकत यह भी है कि वह आज भी दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश होने के बावजूद वैश्विक स्तर पर हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा आयातक यानी खरीदार देश बना हुआ है, जो अपनी कुल आधुनिक रक्षा जरूरतों का आठ प्रतिशत से अधिक हिस्सा बाहर से मंगाता है।

रक्षा विश्लेषकों और सामरिक विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि भारत की दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि वह कितनी मिसाइलें या लड़ाकू विमान बेचता है, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगी कि वह खरीदार देशों को कितनी बेहतर ट्रेनिंग, निरंतर स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति, समय पर तकनीकी मरम्मत और पूरे जीवनकाल के लिए तकनीकी सहायता यानी लाइफसाइकिल सपोर्ट प्रदान कर पाता है, जैसा कि दुनिया के स्थापित और पुराने रक्षा आपूर्तिकर्ता देश करते आए हैं।

भारत सरकार ने आने वाले समय में रक्षा उत्पादन को 1 लाख 75 हजार करोड़ रुपए तक पहुँचाने और दुनिया के शीर्ष पाँच रक्षा निर्यातक देशों में गरिमापूर्ण स्थान हासिल करने का एक बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इंडोनेशिया के साथ हुआ दोहरा समझौता निश्चित रूप से भारत को इस लक्ष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाने का काम करेगा।

हालाँकि वैश्विक बाजार पर पूरी तरह हावी होने और अपनी बादशाहत कायम करने के लिए भारत को अपने घरेलू निजी क्षेत्र और सरकारी रक्षा विनिर्माण उद्यमों को और अधिक व्यापक, आधुनिक, तकनीकी रूप से उन्नत तथा त्वरित निर्णय लेने में सक्षम बनाना होगा।

भविष्य की ओर बढ़ता भारत: आत्मनिर्भरता का नया अध्याय

अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत का 80 से अधिक देशों में हथियार बेचना और ब्रह्मोस तथा अस्त्र जैसी मिसाइलों का सफल अंतरराष्ट्रीय सौदा करना इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल दूसरों की तकनीक पर निर्भर रहने वाला देश नहीं रहा। भारत ने रक्षा के क्षेत्र में अपनी स्वदेशी अनुसंधान और विनिर्माण क्षमता का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया है।

हालाँकि वैश्विक रक्षा बाजार के शिखर पर पहुंचने के लिए अभी भारत को अपनी आयात निर्भरता को शून्य करना होगा और अपने निर्यात के दायरे को कलपुर्जों से बढ़ाकर बड़े रक्षा प्लेटफॉर्म्स जैसे युद्धपोत, लड़ाकू विमान और पूर्ण मिसाइल रेजीमेंट की बिक्री तक ले जाना होगा।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
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