पाकिस्तान इस समय आर्थिक संकट से जूझ रहा है। उसे निवेश चाहिए, तेल चाहिए और खाड़ी देशों का भरोसा भी चाहिए। शायद यही वजह है कि वह एक के बाद एक खाड़ी देशों के साथ रक्षा समझौते बढ़ाने में लगा है। पहले सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग किया और अब कुवैत के साथ भी इसी तरह के समझौते पर बातचीत चल रही है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान और कुवैत के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने को लेकर बातचीत चल रही है। यह बातचीत अभी शुरुआती दौर में है और इसकी जानकारी मामले से जुड़े पाँच सूत्रों ने दी है।
लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू भी है। सवाल यह है कि अगर भविष्य में ईरान और खाड़ी देशों के बीच बड़ा संघर्ष छिड़ गया, तो क्या पाकिस्तान खुद को ऐसी स्थिति में पहुँचा देगा, जहाँ किसी भी फैसले की कीमत उसे ही चुकानी पड़े?
कुवैत के साथ पाकिस्तान की नई डील में क्या तय हो रहा है?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक यह बातचीत अभी शुरुआती दौर में है। कुवैत चाहता है कि पाकिस्तान के साथ समझौता सऊदी अरब जैसा व्यापक हो, जिसमें सैनिकों की तैनाती, लड़ाकू विमान, ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम तक शामिल हों। बदले में पाकिस्तान ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग और निवेश चाहता है। पाकिस्तान अपने तेल और ईंधन भंडार बढ़ाने के लिए कुवैत में फ्यूल स्टोरेज सुविधा बनाने पर भी विचार कर रहा है।
यहाँ एक जरूरी बात समझनी होगी। सूत्रों ने साफ कहा है कि पाकिस्तान फिलहाल कुवैत में लड़ाकू सैनिक टुकड़ियाँ भेजने की स्थिति में नहीं है और अभी इस पर विचार भी नहीं कर रहा। यानी जिस तरह से यह मामला सुनने में लग सगकता है कि पाकिस्तान भाड़े के सैनिक भेजने जा रहा है, हकीकत उतनी सीधी नहीं है। कुवैत की चाहत लंबी लिस्ट जैसी है, लेकिन इस्लामाबाद अभी सतर्क कदम रख रहा है।
मिडिल ईस्ट के एक सूत्र ने यह भी कहा कि अभी यह साफ नहीं है कि यह बातचीत किसी पूर्ण रक्षा समझौते में बदलेगी भी या नहीं। क्योंकि पाकिस्तान और कुवैत के बीच 2023 में पहले से एक रक्षा समझौता होने की कोशिश की गई थी, जिसमें सैन्य अभ्यास और प्रशिक्षण जैसी चीजें शामिल हैं। यह नई बातचीत उसी को आगे बढ़ाने की कोशिश है।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव इस बातचीत की रफ्तार पर सीधा असर डाल रहा है। एक सूत्र के मुताबिक यह डील और उलझ भी सकती है क्योंकि क्षेत्र में हालात लगाकार बदल रहे हैं।
सऊदी अरब वाला समझौता पहले से पाकिस्तान की गले की फाँस क्यों बना हुआ?
यह समझने के लिए कि पाकिस्तान किस मुश्किल में फँसता जा रहा है, पिछले साल हुए सऊदी अरब समझौते को समझना जरूरी है। पिछले साल 2025 में कतर की राजधानी दोहा में इजरायल के हमास आतंकियों को निशाना बनाकर किए गए हमले के बाद सऊदी अरब और पाकिस्तान ने ‘सामरिक पारस्परिक रक्षा समझौता‘ किया था। इसके तहत दोनों देशों में से किसी एक पर हमले को दोनों पर हमला माना जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे नाटो (NATO) देशों में होता है।
इस समझौते के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब में हजारों सैनिक, JF-17 लड़ाकू विमानों का एक पूरा स्क्वाड्रन और चीन निर्मित एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर दिए। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि यह समझौता सऊदी अरब को पाकिस्तान की ‘परमाणु सुरक्षा छतरी’ के नीचे भी ला सकता है।
अब हालात यह बन गए हैं कि यमन के ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने सोमवार (14 जुलाई 2026) को सऊदी अरब पर हमला किया। इसके जवाब में पाकिस्तान ने साफ कह दिया कि सऊदी अरब पर हमले को वह अपने ऊपर हमला मानेगा। यानी पाकिस्तान अब सिर्फ कागजी वादे से आगे बढ़कर सार्वजनिक रूप से चेतावनी देने की स्थिति में पहुँच चुका है। यही वजह है कि रॉयटर्स ने बताया कि इस्लामाबाद में चिंता बढ़ रही है कि सऊदी अरब से समझौता पाकिस्तान को अमेरिका-ईरान युद्ध में सीधे घसीट सकता है।
ईरान अगर जमीनी हमला करता है तो पाकिस्तान कैसे फँसेगा?
पाकिस्तान की सबसे बड़ी दिक्कत उसकी भौगोलिक स्थिति और पहले से बँटी हुई फौज है। पाकिस्तान की फौज का बड़ा हिस्सा भारत सीमा पर तैनात रहता है। इसके अलावा अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के साथ उत्तर-पश्चिमी सीमा पर पहले से तनाव और सैन्य कार्रवाइयाँ चल रही हैं। ऐसे में अगर ईरान के साथ पश्चिमी सीमा पर भी हालात बिगड़ते हैं, तो पाकिस्तान के लिए तीन मोर्चों पर एक साथ निपटना लगभग नामुमकिन हो जाएगा।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने खुद संसद में यह कबूल किया कि उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से सीधे बात करके सऊदी अरब वाले रक्षा समझौते का जिक्र किया। डार के मुताबिक ईरान ने जवाब में यह भरोसा माँगा कि सऊदी अरब की जमीन को ईरान के खिलाफ किसी हमले के लिए लॉन्चपैड के तौर पर इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा।
बलूचिस्तान का इलाका ईरान और पाकिस्तान, दोनों तरफ फैला हुआ है और दोनों ही देशों में अलगाववादी गुट सीमा पार से मौका उठाते रहे हैं। अगर ईरान में अंदरूनी अस्थिरता बढ़ती है या सरकार कमजोर पड़ती है, तो पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा खाली जगह बन सकती है, जिसका फायदा अलगाववादी उठा सकते हैं। जनवरी 2024 में भी पाकिस्तान और ईरान के बीच मिसाइल हमलें हुए थे, जिसे दोनों देशों ने महज 72 घंटों में सुलझा लिया था क्योंकि किसी को भी अपने परमाणु और मिसाइल प्रोग्राम पर अंतरराष्ट्रीय नजर नहीं चाहिए थी। लेकिन इस बार हालात कहीं ज्यादा उलझे हुए हैं, क्योंकि अमेरिका-ईरान युद्ध, सऊदी पर हूती हमले और अब कुवैत के साथ नई बातचीत, यह सब एक साथ चल रहा है।
पाकिस्तानी सैन्य विश्लेषकों का भी मानना है कि अभी तक इस्लामाबाद सभी पक्षों को साधने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अगर हूती हमलों का दायरा सऊदी अरब के भीतर और बढ़ता है, तो यह संतुलन बिगड़ सकता है।
निष्कर्ष
फिलहाल की तस्वीर यह है कि पाकिस्तान कुवैत के साथ बातचीत के शुरुआती चरण में है और कुवैत में ‘भाड़े के सैनिक’ भेजने का कोई फैसला अभी नहीं हुआ है। लेकिन सऊदी अरब वाला समझौता पहले से पाकिस्तान को अमेरिका-ईरान युद्ध के करीब खींच चुका है और सैनिकों की तैनाती व सार्वजनिक चेतावनी के जरिए इस्लामाबाद पहले ही आधा कदम आगे बढ़ा चुका है।
अगर ईरान अपनी पश्चिमी सीमा से जमीनी स्तर पर किसी तरह की कार्रवाई की तरफ बढ़ता है तो पाकिस्तान के पास भारत, अफगानिस्तान और अब संभावित रूप से ईरान, तीन मोर्चों पर एक साथ ध्यान देने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। ऐसे में कुवैत के साथ नई डील पाकिस्तान की ताकत बढ़ाने की बजाय उसकी जिम्मेदारियों और जोखिम, दोनों को और बड़ा कर सकती है। यही वजह है कि यह सवाल जायज है कि क्या पाकिस्तान खाड़ी देशों को खुश करने की कोशिश में खुद अपने लिए मुश्किलों की स्क्रिप्ट लिख रहा है?


