अगर कोई किसी को गुस्से में ‘मादर***’ या दूसरी कोई गाली दे दे, तो क्या यह अपने आप में अपराध माना जाएगा? क्या ऐसी भाषा को कानून ‘अश्लीलता’ मानता है या यह सिर्फ अभद्र व्यवहार है? इन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस को जन्म दिया है। कोर्ट ने साफ किया है कि हर गाली अपने आप में ‘अश्लील’ नहीं होती, लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि ऐसी भाषा पूरी तरह कानूनी सुरक्षा पा जाती है।
यह पूरा मामला तमिलनाडु के एक गाँव से जुड़ा है, जहाँ जमीन के झगड़े में एक बुजुर्ग शख्स ने सामने वाले को बुरी तरह गालियाँ दे दी थीं। मामला निचली अदालत से होते हुए हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पांचोली की बेंच ने इस पर सुनवाई करते हुए साफ कहा, “कानूनी तौर पर अश्लीलता… वल्गैरिटी, गाली या अभद्रता का पर्यायवाची नहीं है।” कोर्ट के इसी एक वाक्य ने पूरे मामले की दिशा तय कर दी। आइए पूरा मामला सिलसिलेवार समझते हैं।
पूरा मामला क्या था?
बात अगस्त 2017 की है। तमिलनाडु में जमीन के एक विवाद को लेकर मणि नाम के शख्स की पहले शिकायतकर्ता के जीजा से बहस हुई। दो दिन बाद इसी जमीन को लेकर मणि का झगड़ा शिकायतकर्ता के भतीजे से भी हो गया। जब शिकायतकर्ता बीच बचाव करने आया तो मणि ने उसे बुरी तरह गालियाँ दीं और जातिसूचक शब्द भी बोले। इतना ही नहीं गुस्से में मणि घर से एक बिलहुक यानी खेती में इस्तेमाल होने वाला हथियार उठा लाया और शिकायतकर्ता पर हमला कर दिया। इस हमले में शिकायतकर्ता के माथे, नाक और अँगूठे में चोटें आईं। बाद में सीटी स्कैन में पता चला कि उसकी नाक की हड्डी टूट गई है।
निचली अदालत ने मणि को कई धाराओं में दोषी ठहराया। इनमें IPC की धारा 294(B) यानी अश्लीलता, धारा 326 यानी गंभीर चोट पहुँचाना और धारा 506(2) यानी आपराधिक धमकी शामिल थी। इसके अलावा Sc/St एक्ट की धाराएँ भी लगीं। मद्रास हाई कोर्ट ने बाद में Sc/St एक्ट वाले आरोपों से तो बरी कर दिया लेकिन बाकी IPC की धाराओं में सजा बरकरार रखी। इसके बाद मणि सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
मामला में सुप्रीम कोर्ट का रुख
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट के सामने सवाल यह था कि क्या गाली देना अश्लीलता की श्रेणी में आता है। इस पर कोर्ट ने कहा कि सिर्फ गाली या अभद्र शब्दों का इस्तेमाल, चाहे वो कितने भी घटिया या असभ्य क्यों न हों, उन्हें अश्लीलता के बराबर नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने आगे कहा, “सिर्फ गाली या अभद्र शब्द सुनकर घिन, गुस्सा या झटका लग सकता है, लेकिन इतने भर से वो शब्द कानून की नजर में अश्लील नहीं बन जाते।”
अब सवाल यह उठता है कि फिर अश्लीलता किसे माना जाएगा। कोर्ट ने इसका भी जवाब दिया। बेंच ने कहा कि IPC की धारा 294(B) के तहत किसी शब्द को अश्लील मानने के लिए तीन शर्तें पूरी होनी जरूरी हैं। पहली यह कि वो बातें अश्लील होनी चाहिए, जो लोगों की गंदी इच्छाओं को भड़काएँ, दूसरी यह कि जिनका असर सुनने वाले लोगों को बिगाड़ने और तीसरा यह कि उनमें लोगों को भ्रष्ट या बिगाड़ने की प्रवृत्ति हो। साथ ही ये भी साबित करना होगा कि उस बात से पब्लिक प्लेस पर दूसरों को परेशानी या तकलीफ हुई थी।
मणि ने क्या गाली दी?
कोर्ट के फैसले में मणि के कहे शब्द भी दर्ज हैं। कोर्ट ने फैसले में जिक्र किया कि झगड़े के दौरान मणि ने कहा, “अरे मादर***! तू रं## का बच्चा! क्या तू अपने भाँजे का साथ देने आया है? दफा हो जा, तू ‘कुरुथा’ मादर***…”
इस पर कोर्ट ने कहा, “ऐसे शब्द, चाहे कितने भी गाली गलौज वाले, बदस्वादी या असभ्य क्यों न हों, धारा 294 (B) की शर्तें पूरी नहीं करते। साथ ही यह किसी का भी मामला नहीं था कि इन शब्दों से किसी सार्वजनिक जगह पर किसी और को नाराजगी हुई हो, जो कि इस धारा के लिए जरूरी शर्त है।”
इसी आधार पर कोर्ट ने अश्लीलता के आरोप से मणि को बरी कर दिया।
यहाँ तक कि कोर्ट ने मणि पर लगा आपराधिक धमकी का आरोप भी हटा दिया। कोर्ट ने कहा कि झगड़े के दौरान सिर्फ धमकी भरे शब्द बोल देना भर काफी नहीं है। यह साबित करना जरूरी है कि आरोपित की मंशा सामने वाले को डराने की थी या उसे किसी काम को करने या न करने पर मजबूर करने की थी। चूँकि यह साबित नहीं हो पाया, इसलिए यह आरोप भी खारिज हो गया।
लेकिन हमले की सजा बरकरार रही
गाली और धमकी के मामले में राहत मिलने के बावजूद मणि पूरी तरह बरी नहीं हुआ। कोर्ट ने बिलहुक से हमला करके गंभीर चोट पहुँचाने वाली धारा 326 में उसकी सजा बरकरार रखी है। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल सबूत शिकायतकर्ता की बात की पुष्टि करते हैं कि उस पर बिलहुक से हमला हुआ था और उसकी नाक की हड्डी टूटी थी, जो गंभीर चोट की परिभाषा में पूरी तरह फिट बैठता है।
कोर्ट ने कहा, “रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से साफ पता चलता है कि शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूटी थी। ये चोट सीधे तौर पर IPC की धारा 320 के तहत ‘गंभीर चोट’ की श्रेणी में आती है। ये भी साबित हुआ है कि ये चोट बिलहुक से की गई थी, जो एक खतरनाक हथियार है। इसलिए रिकॉर्ड के सबूतों को ध्यान से देखने के बाद हम अपीलकर्ता को IPC की धारा 326 में दोषी ठहराने के फैसले में कोई गलती नहीं पाते और उस सजा को सही मानते हैं।”
निचोड़ क्या निकला?
इस फैसले से एक बात बिल्कुल साफ हो गई कि सड़क पर, झगड़े में या गुस्से में किसी को गाली दे देना भर अश्लीलता के जुर्म में नहीं फँसाया जा सकता। कानून की नजर में अश्लीलता के लिए कामुकता, प्रुरिएंट अपील और लोगों को बिगाड़ने की प्रवृत्ति जैसी शर्तें साबित करनी पड़ती हैं। सिर्फ भद्दी और अभद्र भाषा बोल देने से यह जुर्म नहीं बनता। हाँ, अगर गाली के साथ मारपीट या हमला हो जाए तो उसकी सजा से कोई छूट नहीं मिलती, जैसा मणि के मामले में हुआ।


