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FIFA World Cup: फुटबॉल की सबसे लंबी रात; नेमार की विदाई, हालांड का इतिहास और रोनाल्डो का इम्तिहान

आर्थर जी. लेविस ने अपने काव्य-संग्रह ‘Stub Ends of Thoughts and Verse’ में लिखा था, “It’s not the size of the dog in the fight, but the size of the fight in the dog.” अर्थात, जीत हमेशा आकार नहीं, बल्कि भीतर धधकते साहस और संघर्ष की भूख तय करती है।

बीते दिन खेले गए दो मुकाबलों ने इस विचार को मानो हरे मैदान पर सजीव कर दिया।

न्यू जर्सी स्टेडियम की रोशनी में एक ओर पाँच बार की विश्वविजेता ब्राज़ील थी, तो दूसरी ओर वाइकिंग्स की अदम्य विरासत अपने कंधों पर लिए नॉर्वे। कागज़ पर ब्राज़ील कहीं अधिक शक्तिशाली दिख रही थी, लेकिन फुटबॉल का इतिहास बार-बार याद दिलाता है कि मैदान पर प्रतिष्ठा नहीं, प्रदर्शन बोलता है।

कोच कार्लो एन्सेलोटी ने अपनी टीम को 4-2-3-1 की पारंपरिक संरचना में उतारा। मिडफ़ील्ड की धुरी पर अनुभवी कैसेमीरो के साथ ब्रूनो गुइमाराएज़ थे। उनके आगे विनीसियस जूनियर, गेब्रियल मार्टिनेली और रायान की तेज़तर्रार तिकड़ी विपक्षी रक्षा-पंक्ति को भेदने के लिए तैयार थी, जबकि आक्रमण की अगुवाई शानदार फॉर्म में चल रहे माथियूस कुन्हा कर रहे थे। लाखों प्रशंसकों की निगाहें एक बार फिर नेमार जूनियर को खोज रही थीं, लेकिन वह लगातार दूसरी बार शुरुआती एकादश का हिस्सा नहीं थे।

रेफ़री इस्माइल एलफ़ात की पहली सीटी के साथ ही मुकाबले का आगाज़ होता है। शुरुआती क्षणों से ही नॉर्वे ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह केवल बचाव करने नहीं आई है। मानो किसी मतवाले हाथी की ऊर्जा उनके पैरों में उतर आई हो। तीसरे ही मिनट में नॉर्वे ने एक खतरनाक आक्रमण रचा, लेकिन एलेक्सांडर सोरलोथ ऑफ़साइड करार दिए गए। उधर ब्राज़ील ने भी कुछ ही मिनटों में अपनी लय पकड़ ली। गेंद पर नियंत्रण बढ़ा, पासिंग की गति तेज़ हुई और रायान ने एक शानदार अवसर भी बनाया, मगर अंतिम स्पर्श उन्हें गोल का सुख नहीं दे सका।

बारहवें मिनट में मुकाबले का पहला बड़ा मोड़ आता है। नॉर्वे के पेनाल्टी बॉक्स में ब्राज़ील के एक खिलाड़ी को गलत टैकल से गिरा दिया जाता है और रेफ़री बिना देर किए पेनाल्टी स्पॉट की ओर इशारा कर देते हैं।

विनीसियस जूनियर गेंद उठाकर आगे बढ़ते हैं। पूरा स्टेडियम मानो उनकी ओर देख रहा था। तभी डगआउट से निर्देश आता है और पेनाल्टी लेने की ज़िम्मेदारी ब्रूनो गुइमाराएज़ संभाल लेते हैं।

लेकिन अगले ही पल न्यू जर्सी स्टेडियम गूँज उठता है।

पिछले मुकाबले के नायक ओर्हान नायलांड अपनी दाईं ओर बिजली-सी फुर्ती के साथ डाइव लगाते हैं और शानदार बचाव करते हुए ब्राज़ील की पेनाल्टी को गोल में बदलने से रोक देते हैं। यह केवल एक सेव नहीं थी; यह पूरे मुकाबले की मानसिक दिशा बदल देने वाला क्षण था। नॉर्वे का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ चुका था और ब्राज़ील पहली बार दबाव महसूस करती दिखाई दी।

इसके बाद खेल लगातार एक छोर से दूसरे छोर तक बहता रहा। ब्राज़ील की ओर से रायान और विनीसियस जूनियर लगातार नॉर्वे की रक्षापंक्ति को परखते रहे, जबकि दूसरी ओर अर्लिंग हालांड और कप्तान मार्टिन ओडेगार्द भी गोल की दिशा में कई प्रयास करते रहे। दोनों टीमें आक्रमण कर रही थीं, दोनों अवसर बना रही थीं, लेकिन गोल जैसे दोनों गोलपोस्टों से रूठ गया था।

पहले हाफ़ की समाप्ति पर स्कोरबोर्ड अब भी 0-0 ही दिखा रहा था।

दूसरे हाफ़ की शुरुआत के साथ ही नॉर्वे ने अपनी रणनीति में बदलाव किया। कोच सोलबाक्केन ने एंटोनियो नूसा और एलेक्सांडर सोरलोथ को बाहर बुलाकर आंद्रेस शेल्डेरुप और ऑस्कर बॉब को मैदान पर उतारा। जवाब में ब्राज़ील ने भी माथियूस कुन्हा की जगह युवा एंड्रिक को मौका दिया।

समय आगे बढ़ता गया और मुकाबला पहले से कहीं अधिक खुलने लगा। दोनों टीमें जीत की तलाश में लगातार जोखिम उठा रही थीं। ब्राज़ील गेंद पर अधिक नियंत्रण रख रही थी, जबकि नॉर्वे हर जवाबी हमले में खतरनाक दिख रही थी।
फिर भी घड़ी जब पैंसठवें मिनट तक पहुँची, स्कोर अब भी शून्य पर अटका हुआ था।

मैदान पर ऐसे खिलाड़ी मौजूद थे जो एक स्पर्श, एक दौड़ या एक शॉट से पूरे मुकाबले की कहानी बदल सकते थे। लेकिन फुटबॉल कभी-कभी धैर्य की भी परीक्षा लेता है; और इस रात, गोल अब भी दोनों टीमों की पहुँच से दूर था।

मुकाबले का अड़सठवाँ मिनट।

अचानक पूरा न्यू जर्सी स्टेडियम शोर से भर उठता है।

टचलाइन के पास एक परिचित चेहरा वार्म-अप समाप्त कर चौथे अधिकारी के साथ खड़ा था। वह खिलाड़ी, जिसे देखने के लिए करोड़ों लोग अब भी हर बार टीवी स्क्रीन के सामने बैठ जाते हैं।

एक गोल की तलाश में कोच कार्लो एन्सेलोटी आखिरकार अपना सबसे बड़ा दाँव चलते हैं।

गेब्रियल मार्टिनेली की जगह नेमार जूनियर मैदान पर उतरते हैं।

जैसे ही वह हरी घास पर कदम रखते हैं, स्टेडियम तालियों और नारों से गूँज उठता है। यह केवल एक बदलाव नहीं था; यह ब्राज़ील की आख़िरी उम्मीद थी।

लेकिन समय किसी का इंतज़ार नहीं करता।

पचहत्तरवें मिनट तक स्कोरबोर्ड अब भी 0-0 पर स्थिर था। हर बीतता सेकंड दोनों देशों के समर्थकों की धड़कनें और तेज़ कर रहा था। अब किसी भी टीम के लिए सबसे बड़ा भय एक लेट गोल था, वह गोल जो पूरे अभियान की दिशा बदल देता है।

और फिर…

उन्नासीवें मिनट में वही हुआ जिसकी कल्पना बहुत कम लोगों ने की थी।

बाएँ फ्लैंक पर स्थानापन्न खिलाड़ी आंद्रेस शेल्डेरुप गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं। बॉक्स के किनारे पहुँचकर वह एक सटीक पास अर्लिंग हालांड की ओर बढ़ाते हैं। हालांड अपने सामने खड़े ब्राज़ीली डिफेंडर को एक झटके में छकाते हैं, संतुलन बनाते हैं और अगले ही पल दाएँ पैर से गोल की दिशा में विस्फोटक प्रहार करते हैं।

एलिसन बेकर पूरी ताकत से डाइव लगाते हैं। लेकिन इस बार उनकी उँगलियाँ गेंद तक नहीं पहुँच पातीं।

गेंद जाल से टकराती है।

गोल।

नॉर्वे 1, ब्राज़ील 0।

कुछ क्षण पहले तक पीले रंग में डूबा न्यू जर्सी स्टेडियम अचानक मौन हो चुका था। यह केवल एक गोल नहीं था; यह उस आत्मविश्वास पर पहला गहरा प्रहार था जिसके सहारे ब्राज़ील मैदान में उतरी थी।

ब्राज़ील संभल भी नहीं पाई थी कि दस मिनट बाद नॉर्वे ने दूसरी चोट कर दी।

एक बार फिर बाएँ किनारे से आंद्रेस शेल्डेरुप ने शानदार क्रॉस उठाया। एक बार फिर गेंद अर्लिंग हालांड तक पहुँची। और एक बार फिर विश्व फुटबॉल के इस घातक स्ट्राइकर ने एलिसन बेकर को छकाते हुए गेंद को गोलपोस्ट के भीतर पहुँचा दिया।

नॉर्वे 2, ब्राज़ील 0।

ब्राज़ील के खिलाड़ियों के कंधे झुक चुके थे।

दर्शक-दीर्घा में बैठे लाखों समर्थकों के चेहरों से रंग उतर चुका था। दस मिनट पहले तक जो मुकाबला बराबरी पर था, वह अचानक ब्राज़ील की पकड़ से फिसल चुका था। निगाहें बार-बार डगआउट की ओर उठ रही थीं, लेकिन कार्लो एन्सेलोटी के पास भी इस तूफ़ान का कोई तत्काल उत्तर नहीं था।

फिर भी ब्राज़ील ने हार स्वीकार नहीं की।

हर आक्रमण के साथ वह वापसी की उम्मीद तलाशती रही। दूसरी ओर नॉर्वे अब अपने प्रत्येक खिलाड़ी के साथ केवल एक लक्ष्य लेकर खेल रही थी; किसी भी कीमत पर यह बढ़त बचानी है।

इंजरी टाइम चल रहा था।

90+8वें मिनट में नॉर्वे से एक चूक हो जाती है। अपने ही पेनाल्टी बॉक्स में किया गया फाउल रेफ़री इस्माइल एलफ़ात की नज़र से नहीं बचता और ब्राज़ील को पेनाल्टी मिल जाती है।

अब गेंद के पीछे खड़े थे नेमार जूनियर।

कंधों पर करोड़ों उम्मीदों का भार था, लेकिन यह भार उनके लिए नया नहीं था।

नेमार लंबी साँस लेते हैं।

दौड़ते हैं।

और सटीक प्रहार के साथ गेंद को गोलपोस्ट के भीतर पहुँचा देते हैं।

स्कोर अब 2-1 था।

उम्मीद अभी पूरी तरह मरी नहीं थी।

लेकिन फुटबॉल कभी-कभी आशा को केवल कुछ क्षणों का ही समय देता है।

दो मिनट बाद रेफ़री इस्माइल एलफ़ात अंतिम सीटी बजा देते हैं।

और उसी सीटी के साथ केवल ब्राज़ील का विश्व कप अभियान समाप्त नहीं होता।

उसके साथ समाप्त होता है एक ऐसे राजकुमार का अंतरराष्ट्रीय अध्याय भी, जो अपार प्रतिभा के बावजूद कभी विश्व फुटबॉल का ताज अपने सिर पर नहीं सजा सका।

कई प्रशंसकों को यह एहसास था कि शायद वे नेमार को आख़िरी बार विश्व कप में देख रहे हैं।

उनकी आँखें नम थीं।

ब्राज़ील के खिलाड़ी रो रहे थे।

दर्शक-दीर्घा में बैठे हज़ारों समर्थकों की आँखें भीग चुकी थीं।

उधर दूसरी ओर नॉर्वे इतिहास रच रही थी।

खिलाड़ी अपने समर्थकों के साथ विजय का उत्सव मना रहे थे। स्टेडियम में मौजूद अल्फ-इंगे हालांड अपने पुत्र को निहार रहे थे। जो सपना उनकी पीढ़ी पूरा नहीं कर सकी थी, उसे आज अर्लिंग हालांड ने साकार कर दिया था।

नॉर्वे ने पाँच बार की विश्व चैंपियन ब्राज़ील को पराजित कर क्वार्टर फ़ाइनल में प्रवेश कर लिया था।

यह केवल एक जीत नहीं थी; यह नॉर्वेजियन फुटबॉल के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखी जाने वाली रात थी।

ओस्लो की सड़कों पर उत्सव शुरू हो चुका था।

स्टेडियम में वाइकिंग क्लैप्स की गूँज दूर तक सुनाई दे रही थी।

मैच के बाद कोच स्टाले सोलबाक्केन ने कहा; यह नॉर्वेजियन फुटबॉल के इतिहास की सबसे महान रात है।

उधर अर्लिंग हालांड इस टूर्नामेंट में अपने सातवें गोल के साथ अब गोल्डन बूट की दौड़ में सबसे आगे निकल चुके थे।

मैच से पहले अधिकांश विशेषज्ञों ने ब्राज़ील की सहज जीत की भविष्यवाणी की थी। किसी ने 2-1 कहा, किसी ने 3-0।

लेकिन फुटबॉल भविष्यवाणियों से नहीं, मैदान पर लिखी गई कहानियों से याद रखा जाता है।

अपने सबसे घातक योद्धा अर्लिंग हालांड के दो गोल, ओर्हान नायलांड के अद्भुत बचाव और अंतिम क्षण तक अडिग रहे सामूहिक जज़्बे के दम पर नॉर्वे ने न केवल ब्राज़ील को पराजित किया, बल्कि विश्व फुटबॉल को यह भी याद दिला दिया कि साहस, अनुशासन और विश्वास जब एक साथ मैदान पर उतरते हैं, तब दिग्गज भी धराशायी हो जाते हैं।

लेकिन यह दिन अभी समाप्त नहीं हुआ था।

कुछ ही घंटों बाद, भारतीय समयानुसार सुबह साढ़े छह बजे, विश्व फुटबॉल की निगाहें मेक्सिको सिटी के ऐतिहासिक ऐज़्टेका स्टेडियम पर टिक गईं।

यहाँ मेज़बान मेक्सिको के सामने थी यूरोप की सबसे प्रबल दावेदारों में गिनी जाने वाली इंग्लैंड।

दर्शक-दीर्घा गहरे हरे रंग की जर्सियों से पट चुकी थी। हजारों मेक्सिकन समर्थक अपने पारंपरिक गीतों और नारों के साथ अपनी टीम का उत्साह बढ़ा रहे थे।

ऐज़्टेका; वह दुर्ग जिसने दशकों तक मेक्सिकन फुटबॉल की सबसे बड़ी जीतों का साक्षी बनकर इतिहास रचा है, आज एक और अविस्मरणीय अध्याय अपने भीतर दर्ज करने के लिए तैयार खड़ा था।

अब बारी थी दिन के दूसरे महासंग्राम की।

ऐज़्टेका स्टेडियम में अपनी पारंपरिक गहरे हरे रंग की जर्सी पहने मेक्सिको मैदान पर उतरती है। दूसरी ओर कप्तान हैरी केन के नेतृत्व में इंग्लैंड की ‘थ्री लायन्स’ पूरे आत्मविश्वास के साथ इतिहास की एक और सीढ़ी चढ़ने को तैयार थी।

रेफ़री की पहली सीटी बजती है।

और मुकाबला शुरू होते ही तनाव अपने चरम पर पहुँच जाता है।

पहले ही मिनट में इंग्लैंड के मिडफ़ील्डर डेक्लन राइस को पीला कार्ड दिखा दिया जाता है। तीसरे मिनट में राउल जिमिनेज़ इंग्लैंड के गोल पर पहला गंभीर हमला बोल देते हैं।

शुरुआती क्षणों से ही मेक्सिको ने इंग्लैंड की कमर कस दी थी।

गेंद पर नियंत्रण, तेज़ पासिंग और आक्रामक प्रेसिंग; हर विभाग में मेक्सिको इंग्लैंड से एक कदम आगे दिखाई दे रही थी। इंग्लिश खिलाड़ियों के पास गेंद पहुँचती भी तो अगले ही क्षण हरे रंग की जर्सियाँ उन्हें चारों ओर से घेर लेतीं और गेंद वापस अपने कब्ज़े में ले लेतीं।

ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा मुकाबला इंग्लैंड के आधे हिस्से में सिमट गया हो।

राउल जिमिनेज़ ने एक और शानदार अवसर बनाया, लेकिन इंग्लिश डिफेंस ने समय रहते ख़तरा टाल दिया। कुछ ही देर बाद गिल्बर्टो मोरा ने भी गोल की दिशा में दमदार प्रयास किया। पहले हाइड्रेशन ब्रेक तक इंग्लैंड किसी तरह स्कोरलाइन को 0-0 पर रोकने में सफल रही।

ब्रेक के बाद इंग्लैंड ने अपनी रणनीति बदली।

अब उनका लक्ष्य गेंद पर नियंत्रण नहीं, बल्कि जवाबी हमले थे। वे धैर्य के साथ मेक्सिको को आगे आने दे रहे थे ताकि गेंद छीनते ही बिजली की गति से पलटवार किया जा सके।

यही बदलाव आगे चलकर निर्णायक साबित होने वाला था।

एंथनी गॉर्डन ने एक तेज़ आक्रमण रचा, लेकिन उनका प्रयास लक्ष्य से बाहर चला गया। दूसरी ओर मेक्सिको भी बिना किसी भय के लगातार हमले करती रही।

फिर अचानक…

छत्तीसवें मिनट में बुकायो साका के सटीक पास पर ज्यूड बेलिंघम बॉक्स के भीतर पहुँचते हैं और गेंद को गोल में बदल देते हैं।

इंग्लैंड 1, मेक्सिको 0।

मेक्सिको अभी इस झटके से उबर भी नहीं पाई थी कि दो मिनट बाद बेलिंघम ने फिर वही कहानी दोहरा दी।

एक और शानदार मूव।

एक और सटीक फ़िनिश।

और देखते ही देखते स्कोर 2-0 हो चुका था।

जो टीम कुछ क्षण पहले तक पूरे मैच पर हावी थी, वह अचानक बैकफुट पर पहुँच गई थी। ऐज़्टेका की गूँज कुछ पल के लिए थम-सी गई।

लेकिन मेक्सिको ने हार मानना नहीं सीखा था।

सिर्फ पाँच मिनट बाद हूलियान क्विन्योनेस ने हवा में उछलती गेंद पर अद्भुत वॉली लगाई और इंग्लैंड की बढ़त आधी कर दी।

स्कोर 2-1।

ऐज़्टेका एक बार फिर जीवित हो उठा।

45+1वें मिनट में राउल जिमिनेज़ ने दूर से जोरदार प्रहार किया, लेकिन गेंद लक्ष्य से भटक गई। कुछ ही देर बाद उनका हेडर भी गोल में तब्दील नहीं हो सका। फिर एक कॉर्नर मिला, फिर एक अवसर बना, लेकिन बराबरी का गोल नहीं आया।

पहला हाफ़ इंग्लैंड की 2-1 की बढ़त के साथ समाप्त हुआ, मगर स्कोरलाइन यह नहीं बता पा रही थी कि मेक्सिको ने इस मुकाबले में कितनी ऊर्जा और साहस झोंक दिया था।

दूसरे हाफ़ का आगाज़ हुआ।

मेक्सिको ने फिर वही आक्रामक लय पकड़ ली।

और चौवनवें मिनट में मुकाबले का सबसे बड़ा मोड़ सामने आया।

एक ख़तरनाक टैकल के लिए जारेल क्वान्सा को सीधा रेड कार्ड दिखा दिया गया।

अब इंग्लैंड को शेष मुकाबला केवल दस खिलाड़ियों के साथ खेलना था।

मौका देखकर मेक्सिको ने दबाव और बढ़ा दिया। हूलियान क्विन्योनेस ने फिर गोल की ओर हमला बोला, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। उधर इंग्लैंड के कोच ने तुरंत सामरिक बदलाव करते हुए एक आक्रमणकारी खिलाड़ी को बाहर बुलाकर अतिरिक्त डिफेंडर मैदान पर उतार दिया।

लेकिन ठीक उसी समय मेक्सिको से एक ऐसी भूल हुई जिसकी कीमत उन्हें बहुत भारी पड़ने वाली थी।

सत्तावनवें मिनट में अपने ही पेनाल्टी बॉक्स के भीतर किया गया अनावश्यक फाउल इंग्लैंड के पक्ष में पेनाल्टी में बदल गया।

कप्तान हैरी केन गेंद के पीछे खड़े थे।

उन्होंने बिना कोई गलती किए गेंद को गोल में पहुँचा दिया।

इंग्लैंड 3, मेक्सिको 1।

जो संख्यात्मक बढ़त रेड कार्ड के कारण मेक्सिको को मिली थी, वह एक पल की असावधानी में लगभग निष्प्रभावी हो चुकी थी।

फिर भी मेक्सिको झुकी नहीं।

साठ मिनट के बाद एक बार फिर उसने लगातार आक्रमणों की झड़ी लगा दी।

और अड़सठवें मिनट में इस बार इंग्लैंड से चूक हुई।

हैरी केन अपने ही पेनाल्टी बॉक्स में मेक्सिको के खिलाड़ी को गिरा बैठते हैं और रेफ़री बिना हिचकिचाहट पेनाल्टी स्पॉट की ओर इशारा कर देते हैं।

राउल जिमिनेज़ आगे बढ़ते हैं।

एक शांत, सटीक और आत्मविश्वास से भरा प्रहार।

गेंद जाल में समा जाती है।

स्कोर अब 3-2 था।

ऐज़्टेका फिर गरज उठा।

अब दबाव पूरी तरह इंग्लैंड के कंधों पर था।

अगले बीस मिनट विश्व कप फुटबॉल के सबसे रोमांचक क्षणों में बदल गए।

मेक्सिको लगातार आक्रमण करती रही। हर पास, हर क्रॉस और हर शॉट के साथ स्टेडियम साँसें रोक लेता।

लेकिन दूसरी ओर जॉर्डन पिकफ़र्ड मानो दीवार बनकर खड़े थे।

उन्होंने एक के बाद एक कई ऐसे बचाव किए जो लगभग असंभव प्रतीत हो रहे थे।

दस खिलाड़ियों के साथ खेल रही इंग्लैंड ने अंतिम सीटी तक अनुशासन नहीं छोड़ा।

और अंततः वही अनुशासन उन्हें क्वार्टर फ़ाइनल का टिकट दिला गया।

इंग्लैंड 3, मेक्सिको 2।

मेक्सिको हार चुकी थी।

लेकिन यह उन हारों में से नहीं थी जिनमें सम्मान छिन जाता है।

वे लड़कर गिरे थे।

और शायद इसी कारण पूरे ऐज़्टेका ने अंतिम सीटी के बाद भी अपने खिलाड़ियों का सिर झुकने नहीं दिया।

विश्व कप के इतिहास में कुछ मुकाबले केवल परिणामों से नहीं, बल्कि अपने साहस, गति और भावनाओं से अमर हो जाते हैं।

यह भी उन्हीं में से एक था।

ज्यूड बेलिंघम के दो मिनट में आए दो गोल निर्णायक साबित हुए और ‘थ्री लायन्स’ क्वार्टर फ़ाइनल में पहुँच गई।

अब निगाहें अगले महासंग्राम पर टिक चुकी हैं।

आज रात डलास स्टेडियम में यूरोपीय फुटबॉल की दो महाशक्तियाँ; पुर्तगाल और स्पेन आमने-सामने होंगी।

यदि स्पेन विजयी होती है, तो संभव है कि फुटबॉल प्रेमी ठीक वैसे ही एक युग का अंत देखें, जैसा उन्होंने ब्राज़ील की हार के साथ नेमार के विदाई क्षणों में देखा।

क्या आज क्रिस्टियानो रोनाल्डो भी राष्ट्रीय टीम की जर्सी में अपना अंतिम मुकाबला खेलेंगे?

या फिर जीत के लिए सदैव भूखे रहने वाले रोनाल्डो एक बार फिर स्पेन जैसी दिग्गज टीम को टूर्नामेंट से बाहर का रास्ता दिखाकर अपने सफ़र को आगे बढ़ाएँगे?

याद रहे, स्पेन मौजूदा यूरोपीय चैंपियन है, लेकिन पुर्तगाल ने इसी स्पेन को यूईएफ़ए नेशन्स लीग के फ़ाइनल में पेनाल्टी शूटआउट में हराकर ट्रॉफी अपने नाम की थी।

इतिहास, प्रतिद्वंद्विता और दिग्गजों का यह टकराव; हर मायने में एक फ़ाइनल जैसा होने वाला है।

इसके बाद कल सुबह साढ़े पाँच बजे सिएटल में मेज़बान अमेरिका का सामना शानदार लय में चल रही बेल्जियम से होगा।

लेकिन उससे पहले…

पूरी दुनिया की निगाहें आज रात साढ़े बारह बजे डलास पर टिकी होंगी।

क्या यह क्रिस्टियानो रोनाल्डो की आख़िरी रात होगी?

या फिर एक बार फिर इतिहास उनके पक्ष में झुक जाएगा?

इस प्रश्न का उत्तर देगा केवल मैदान। यही रात अंतिम। यही रात भारी।

दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’ पर फैलाया जा रहा ‘अर्धसत्य’: इसे कानूनी वजहों से ZEE5 ने हटाया, सरकार ने नहीं लगाया कोई बैन; जानिए पूरा मामला

करीब चार साल की देरी और तीन बार नाम बदलने के बाद हनी त्रेहान की मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी फिल्म रिलीज हुई। पहले इस फिल्म का नाम घल्लूघारा था, फिर इसे पंजाब ’95 और औखिर में सतलुज नाम दिया गया। दिलजीत दोसांझ इस फिल्म में मुख्य किरदार निभा रहे हैं।

फिल्म को ZEE5 पर भारत और दुनिया के दूसरे देशों में एक साथ रिलीज किया गया। लेकिन रिलीज होने के सिर्फ दो दिन बाद ही इसे भारत में ZEE5 से हटा दिया गया, जबकि दूसरे देशों में यह फिल्म पहले की तरह उपलब्ध रही। ZEE5 ने फिल्म हटाने की वजह बताते हुए सिर्फ इतना कहा कि यह फैसला ‘मौजूदा परिस्थितियों’ को देखते हुए लिया गया है।

आम धारणा के उलट, यह फिल्म किसी सरकारी बैन या आधिकारिक रोक की वजह से नहीं हटाई गई। इसकी असली वजह भारत के इंटरनेट नियमों का एक कम चर्चित प्रावधान है। इस नियम पर फिलहाल अदालत के आदेशों के कारण पूरी तरह अमल नहीं हो रहा है। ऐसे में जब किसी तरह का कानूनी सवाल उठता है, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म अक्सर सावधानी बरतते हुए कंटेन्ट को हटा देते हैं।

ZEE5 ने साफ कहा कि वह इस फिल्म का समर्थन करता है और इसे दोबारा प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए सभी जरूरी कानूनी और दूसरे विकल्पों पर काम कर रहा है। इससे यह साफ होता है कि यह मामला सीधे तौर पर सेंसरशिप का नहीं, बल्कि डिजिटल कंटेन्ट से जुड़े कानूनी नियमों की जटिल प्रक्रिया का है।

यानी जिस फिल्म को कई साल इंतजार के बाद आखिरकार दर्शक मिले थे, वह एक बार फिर लोगों की नजरों से ओझ हो गई। लेकिन इसकी वजब किसी सरकार की रोक नहीं, बल्कि अधूरे और उलझे हुए कानूनी नियम बने।

तीन साल और 127 बदलाव

फिल्म की मुश्किलें 2022 के आखिर में ही शुरू हो गई थीं, जब RSVP ने इसे केंद्रीय फिल्म प्रमाण बोर्ड (CBFC) के पास सर्टिफिकेट के लिए भेजा। करीब 6 महीने चली प्रक्रिया के बाद बोर्ड ने 21 बदलाव (कट) औऱ फिल्म का नाम बदलने की शर्त पर इसे मंजूरी दी। बोर्ड का कहना था कि फिल्म के कुछ दृश्य हिंसा को बढ़ावा दे सकते हैं या सिख युवाओं पर गलत असर डाल सकते हैं।

इसके बाद RSVP ने इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद माँगे गए बदलावों की संख्या बढ़कर 127 तक पहुँच गई। फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान ने बाद में यह जानकारी साझा की।

बोर्ड ने फिल्म के नाम से ‘पंजाब’ शब्द हटाने की भी माँग की, जबकि पूरी कहानी पंजाब में ही दिखाई गई है। इसके अलावा पंजाब पुलिस का जिक्र हटाने और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का नाम न लेने की भी बात कही गई। हनी त्रेहान ने इन माँगों को इतिहास के कुछ हिस्सों को मिटाने की कोशिश बताया।

इसी लंबे विवाद के बीच 2023 में फिल्म का टोरोंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में होने वाला वर्ल्ड प्रीमियर भी रद्द हो गया। मीडिया रिपोर्ट्स में इसके पीछे राजनीतिक कारणों को जिम्मेदार बताया गया।

असल सवाल: IT नियम 2021 का नियम 9 क्या कहता है और यह अब तक लागू क्यों नहीं हो पाया?

सतलुज फिल्म के रिलीज और हटने की कहानी सीधे सेंसरशिप से ज्यादा भारत के डिजिटल कंटेन्ट से जुड़े नियमों को समझने की कहानी है। भारत में किसी फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज करने से पहले CBFC से सर्टिफिकेट लेना जरूरी होता है। यह नियम सिनेमैटोग्राफ नियम, 1952 के तहत लागू है। लेकिन OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने वाली फिल्मों और वेब सीरीज के लिए CBFC का सर्टिफिकेट जरूरी नहीं है।

दिसंबर 2025 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने लोकसभा में भी साफ किया था कि CBFC की जिम्मेदारी केवल सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली फिल्मों तक सीमित है। OTT प्लेटफॉर्म पर आने वाले कंटेन्ट पर CBFC नियम लागू नहीं होते।

OTT प्लेटफॉर्म पर आने वाले कंटेन्ट के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 लागू होते हैं। इनमें सबसे अहम नियम 9 है। नियम 9 के तहत OTT प्लेटफॉर्म को तय की गई आचार संहिता का पालन करना होता है। वहीं नियम 9(3) यह बताता है कि इन नियमों का पालन कैसे कराया जाएगा। इसके लिए तीन स्तर की स्व-नियमन (Self-Regulation) व्यवस्था बनाई गई है।

पहला स्तर: OTT प्लेटफॉर्म खुद शिकायतों की सुनवाई करता है। इसके लिए हर प्लेटफॉर्म को अपना शिकायत निवारण अधिकारी (Grievance Officer) नियुक्त करना होता है।
दूसरा स्तर: अगर मामला वहीं नहीं सुलझता, तो उसे उद्योग के स्व-नियामक संगठन (Self-Regulating Body) के पास भेजा जाता है।
तीसरा स्तर: इसके बाद भी जरूरत पड़ने पर मामला सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की अंतर-विभागीय निगरानी समिति के पास जाता है।

यह तीन स्तरीय व्यवस्था तय करती है कि OTT प्लेटफॉर्म अपने कंटेन्ट को कैसे जारी करेंगे और जरूरत पड़ने पर उसे हटाने या उस पर कार्रवाई करने का फैसला कैसे लिया जाएगा।

लेकिन सबसे अहम बात यह है कि IT नियम 2021 का नियम 9 लागू होने के कुछ ही दिनों बाद अदालत ने उस पर अंतरिम रोक लगा दी थी। 14 अगस्त 2021 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने नियम 9(1) और 9(3) पर रोक लगा दी। यह मामला पत्रकार निखिल वागले और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘द लीफलेट’ की ओर से दायर किया गया था। अदालत ने शुरुआती सुनवाई में माना कि इन नियमों में शामिल आचार संहिता संविधान के खिलाफ हो सकती है और केंद्र सरकार को IT कानून के तहत ऐसे नियम बनाने का अधिकार भी नहीं हो सकता।

इसके कुछ हफ्तों बाद मद्रास हाई कोर्ट ने भी इसी तरह की रोक लगाई और कहा कि बॉम्बे हाई कोर्ट का आदेश पूरे देश में लागू माना जाएगा।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2024 में इस नियम से जुड़े सभी मामलों को एक साथ सुनवाई के लिए दिल्ली हाई कोर्ट भेज दिया। वहाँ नवंबर 2024 से सुनवाई शुरू हुई, लेकिन अब तक इस मामले में अंतिम फैसला नहीं आया है। यानी नियम 9 को बने हुए लगभग पूरा समय बीत चुका है, लेकिन उस पर लगी अदालत की रोक अभी भी जारी है। इसके बावजूद केंद्र सरकार संसद में अब भी इन्हीं नियमों को भारत में OTT प्लेटफॉर्म के लिए लागू व्यवस्था बताती रही है।

सीधे शब्दों में कहें तो जिस नियम 9 के तहत OTT प्लेटफॉर्म अपने कंटेन्ट का खुद वर्गीकरण (Self-Certification) करते हैं और शिकायत मिलने पर उसे हटाने जैसी कार्रवाई कर सकते हैं, वही नियम कई वर्षों से अदालत में चुनौती के दायरे में है और उस पर अंतरिम रोक लगी हुई है।

यानी सतलुज जिस कानूनी व्यवस्था के तहत OTT पर रिलीज हुई थी, उसी व्यवस्था के तहत बाद में उसे प्लेटफॉर्म से हटा भी दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया ऐसे नियमों के आधार पर हुई, जिनकी वैधता पर पिछले करीब पाँच साल से अदालतों में सुनवाई चल रही है और जिन पर अब तक अंतिम फैसला नहीं आया है।

फिल्म हटाने का फैसला ZEE5 का था, सरकार का नहीं

सतलुज के निर्माताओं ने फिल्म का पूरा और बिना किसी कट वाला संस्करण पहले ही दिन दुनिया भर में ZEE5 पर रिलीज करने का फैसला किया। उन्होंने फिल्म में और बदलाव करने के बजाए इसे उसी रूप में दर्शकों तक पहुँचाया, जैसा इसे पहले अलग-अलग फिल्म समारोहों में दिखाया गया था।

निर्माताओं का मकसद साफ था। वे चाहते थे कि दुनिया भर के दर्शक फिल्म को बिना किसी बदलाव के देख सकें, इससे पहले कि किसी तरह के नए दबाव के कारण इसमें और कट लगाने पड़ें। यह इसलिए भी अहम था क्योंकि फिल्म के आखिर में जसवंत सिंह खालड़ा की पुलिस हिरासत में हत्या को दिखाया गया है। अगर इस हिस्से में बदलाव किया जाता, तो फिल्म का मुख्य संदेश कमजोर पड़ जाता।

हालाँकि, रिलीज के सिर्फ दो दिन बाद ZEE5 ने फिल्म को भारत में अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया। प्लेटफॉर्म ने हटाने की कोई साफ वजह नहीं बताई, लेकिन कहा कि वह तय कानूनी प्रक्रिया के तहत फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहा है।

अब तक इस मामले में सरकार की ओर से फिल्म हटाने का कोई आधिकारिक आदेश सामने नहीं आया है। यानी फिल्म को हटाने का फैसला ZEE5 ने अपनी आतंरिक शिकायत और स्व-नियमन प्रक्रिया के तहत लिया। यही वह कानूनी व्यवस्था है, जिस पर कई वर्षों से अदालत में सुनवाई चल रही है और जिस पर अभी भी अंतरिम रोक लगी हुई है।

रिकॉर्ड क्या कहते हैं?

फिल्म जिस मुद्दे को उठाती है, उसका सबसे बड़ा सवाल यह है कि पंजाब में लापता हुए लोगों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन था? इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है। उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि इस कहानी के दो पहलू हैं और दोनों को समझना जरूरी है।

जसवंत सिंह खालड़ा, जो अमृतसर में एक बैंक मैनेजर थे, उन्होंने श्मशान घाटों में खरीदी गई लकड़ियों के रिकॉर्ड की जाँच की। इसी आधार पर उन्होंने दावा किया कि कई अज्ञात लोगों के शवों को गैरकानूनी तरीके से अंतिम संस्कार किया गया था। सितंबर 1995 में पंजाब पुलिस ने उनका अपहरण कर लिया और बाद में उनकी हत्या कर दी। इस मामले में 6 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

CBI की दिसंबर 1996 की रिपोर्ट में भी कहा गया कि केवल अमृतसर जिले में ही 2,097 लोगों का गैरकानूनी तरीके से अंतिम संस्कार किया गया था। इनमें से 582 लोगों की पहचान हो गई थी, जबकि 278 लोगों की आंशिक पहचान हो सकी थी।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया। अदालत ने इस मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के पास भेजा। इसके बाद 2006 तक 1245 पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया गया।

लेकिन यह कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है। दूसरी ओर, पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियान ऐसे समय चला, जब करीब एक दशक तक खालिस्तानी उग्रवाद ने राज्य में भारी हिंसा फैलाई थी। पुलिस अधिकारी केपीएस गिल के अनुसार, इस हिंसा में करीब 21,469 लोगों की जान गई। इनमें लगभग 11,700 आम नागरिक थे, जिन्हें खालिस्तानी उग्रवादी संगठनों ने मार डाला। मरने वालों में हजारों सिख और करीब 4,500 हिंदू भी शामिल थे।

Human Rights Watch की रिपोर्ट भी इन दोनों पहलुओं का जिक्र करती है। रिपोर्ट के अनुसार, एक तरफ खालिस्तानी संगठनों ने आम लोगों की हत्याएँ और राजनीतिक नेताओं पर हमले किए। वहीं दूसरी तरफ 1984 से 1995 के बीच सरकारी कार्रवाई के दौरान कई लोगों को बिना कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में लिया गया, उनके साथ यातनाएँ हुईं और हजारों लोग लापता हो गए।

यानी अगर कोई फिल्म या लेख सिर्फ एक पक्ष दिखाता है, तो जरूरी नहीं कि वह गलत हो। लेकिन वह पूरी कहानी भी नहीं बता रहा होता। इस पूरे दौर को समझने के लिए दोनों पक्षों को साथ देखकर ही सही तस्वीर सामने आती है।

निष्कर्ष

अगर कोई कहता है कि सतलुज पर सरकार ने बैन लगा दिया, तो पूरी सच्चाई इससे थोड़ी अलग है। अब तक ऐसे कोई जानकारी सामने नहीं आई है कि सरकार ने फिल्म पर आधिकारिक रोक लगाई हो। फिल्म पहले IT नियम, 2021 के नियम 9 के तहत OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई और बाद में उसी व्यवस्था के तहत उसे हटा भी दिया गया। खास बात यह है कि इसी नियम पर 2021 से अदालतों में सुनवाई चल रही है और इसकी वैधता पर अब तक अंतिम फैसला नहीं आया है।

फिल्म के निर्माताओं रॉनी स्क्रूवाला की कंपनी RSVP Movies और MacGuffin Pictures ने पहले ही दिन का पूरा और बिना किसी कट वाला संस्करण ZEE5 के अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर रिलीज कर दिया था। इसलिए भारत में फिल्म हटने के बाद भी दुनिया के कई देशों में दर्शक इसे देख सकते थे।

कुल मिलाकर, पाँच साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद IT नियम 2021 के नियम 9 की कानूनी स्थित अब भी पूरी तरह साफ नहीं है। इसके बावजूद OTT प्लेटफॉर्म और कंटेन्ट बनाने वाले इसी व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

बाबू जगजीवन राम: वो दलित नेता जिन्हें कॉन्ग्रेस और लेफ्ट से कभी उनका हक नहीं मिला, क्योंकि वे हिंदू धर्म से नहीं करते थे नफरत

आज देश के पूर्व उप-प्रधानमंत्री और महान दलित नेता बाबू जगजीवन राम की पुण्यतिथि है। भारतीय राजनीति के इतिहास में ‘बाबूजी’ के नाम से मशहूर जगजीवन राम एक ऐसे अद्वितीय और कद्दावर नेता थे, जिन्होंने लगभग आधी सदी तक देश की मुख्यधारा की राजनीति और नीति-निर्धारण में केंद्रीय भूमिका निभाई। लेकिन यह भारतीय इतिहास की एक बड़ी विडंबना है कि दलित अधिकारों और सामाजिक समरसता के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले इस नेता को न तो कॉन्ग्रेस ने वह ऐतिहासिक स्थान दिया जिसके वे हकदार थे, और न ही देश के वामपंथी (लेफ्ट) विचारकों ने उन्हें कभी खुलकर अपनाया।

आइए बाबू जगजीवन राम की पुण्यतिथि पर समझते हैं कि छुआछूत और सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़ाई में बाबूजी और डॉ. आंबेडकर के रास्तों में क्या बुनियादी अंतर था और क्यों बाबूजी को इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।

छुआछूत बनाम जाति के मामले में दोनों नेताओं की वैचारिक समझ का अंतर

बाबू जगजीवन राम और डॉ. भीमराव आंबेडकर दोनों का अंतिम लक्ष्य एक ही था दलितों और शोषितों को समाज में समानता, सम्मान और अधिकार दिलाना। लेकिन इस बीमारी के कारणों और उसके इलाज को लेकर दोनों की समझ में गहरा अंतर था। बाबू जगजीवन राम छुआछूत को हिंदू समाज की एक विकृति या सामाजिक समस्या मानते थे। उनका मानना था कि समय के साथ हिंदू समाज में कुछ कुरीतियाँ और पाप प्रवेश कर गए हैं, जिन्हें दूर किया जा सकता है।

इसके विपरीत डॉ. आंबेडकर जाति प्रथा को केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि हिंदू धर्म के धार्मिक ग्रंथों और उसके सामाजिक ढाँचे का अभिन्न हिस्सा मानते थे। आंबेडकर का मानना था कि जब तक इस ढाँचे को पूरी तरह चुनौती नहीं दी जाएगी, तब तक सामाजिक न्याय संभव नहीं है।

इसी वैचारिक अंतर के कारण दोनों के कार्य करने के तरीकों में भी भिन्नता आई। बाबूजी का दृढ़ विश्वास था कि हिंदू समाज के भीतर रहकर ही इस सामाजिक बुराई के खिलाफ लड़ना सबसे प्रभावी तरीका है। वे गाँधी-नेहरू विचारधारा से प्रभावित थे और मानते थे कि व्यापक समाज को साथ लिए बिना स्थाई बदलाव नहीं आ सकता। वहीं आंबेडकर का मानना था कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था के भीतर दलितों को कभी भी पूर्ण समानता नहीं मिल सकती, इसलिए वे कानून, संविधान और स्वतंत्र आंदोलनों के जरिए व्यवस्था परिवर्तन के पैरोकार थे।

धर्म परिवर्तन पर था अलग दृष्टिकोण, ‘सनातन पहचान’ बनाम ‘बौद्ध धम्म’ का रास्ता

दोनों नेताओं के बीच सबसे बड़ा और स्पष्ट वैचारिक टकराव धार्मिक पहचान और धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर था। सोशल मीडिया पर अक्सर जगजीवन राम के ऐतिहासिक भाषणों और बयानों से जुड़ी कतरनें चर्चा का विषय बनती हैं, जो वास्तव में उनके गहरे धार्मिक और राष्ट्रीय स्वाभिमान को रेखांकित करती हैं। अकादमिक शोध पत्रों से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस वैचारिक संघर्ष के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।

Reassessing Religion and Politics in the Life of Jagjivan Rām नाम के रिसर्च पेपर में दर्ज विवरणों के अनुसार, बाबू जगजीवन राम ने 1931 में पटना में ‘अछूतोद्धार सभा’ के एक सम्मेलन में (जहाँ मुख्य अतिथि डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे) एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक भाषण दिया था। जगजीवन राम ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि सवर्ण हिंदुओं द्वारा दलितों को मांस छोड़ने, शराब छोड़ने और पवित्र जीवन जीने के उपदेश देने का समय अब चला गया है। अब दलितों को उपदेश नहीं, बल्कि उचित व्यवहार और ठोस कार्रवाई की जरूरत है।

जगजीवन राम ने कहा था कि मोहम्मद अली जिन्ना मुसलमानों के लिए अलग देश की माँग कर रहे हैं और डॉ. आंबेडकर अलग निर्वाचन क्षेत्र के लिए आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन मैं किसी भी प्रकार के धार्मिक धर्मांतरण के खिलाफ हूँ। हम अछूत हिंदू हैं, हम हिंदू पैदा हुए हैं, हिंदू रहेंगे और हिंदू ही मरेंगे। हमने इस राष्ट्र का निर्माण किया है; हम राष्ट्र द्वारा निर्मित नहीं हुए हैं, यह राष्ट्र हमारा है।

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिसर्च पब्लिकेशन एंड रिव्यूज में प्रकाशित प्रगति पटेल के शोधपत्र – ‘एंपॉवरमेंट ऑफ द बैकवर्ड क्लासेस: कॉन्ट्रिब्यूशन ऑफ बाबू जगजीवन राम’ को पढ़ें तो उसमें साफ लिखा है कि जगजीवन राम का मानना था कि किसी दूसरे धर्म में चले जाना जातिवाद की बीमारी से मुक्ति पाने का सही तरीका नहीं है, क्योंकि जातिगत भेदभाव का जाल कमोबेश हर धर्म में फैल चुका है। उनका मानना था कि अपने मूल धर्म को छोड़ना एक तरह से समस्या से भागने जैसी कायरता है; बहादुरी इसमें है कि आप समाज के भीतर रहकर बुराइयों से लड़ें और उसे सुधारें।

मुख्यधारा की राजनीति बनाम स्वतंत्र दलित नेतृत्व वाली राजनीति का रास्ता

बाबू जगजीवन राम और डॉ आंबेडकर को राजनीतिक रणनीति के मामले में देखें, तो इसमें भी दोनों दिग्गजों के रास्ते पूरी तरह अलग थे। बाबू जगजीवन राम चाहते थे कि दलित समाज देश की मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बने। इसी सोच के तहत वे भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस में शामिल हुए और अखिल भारतीय शोषित वर्ग लीग (All India Depressed Classes League) के माध्यम से दलित युवाओं को संगठित किया। उनका मानना था कि सत्ता और शासन के शीर्ष पर बैठकर देश की मुख्यधारा के साथ मिलकर नीतियाँ बनाने से दलितों का अधिक भला होगा।

इसके विपरीत डॉ. आंबेडकर एक स्वतंत्र दलित राजनीतिक नेतृत्व और स्वतंत्र राजनीतिक दलों के गठन के पैरोकार थे। उनका मानना था कि मुख्यधारा के दलों में शामिल होकर दलित नेता अपनी स्वतंत्र आवाज खो देते हैं और सवर्ण नेतृत्व के अधीन हो जाते हैं।

बाबूजी का अनूठा ‘रेलवे प्रयोग’, मानसिकता बदलने की एक अनूठी सोशल इंजीनियरिंग

बाबू जगजीवन राम केवल बातों के बैरिस्टर नहीं थे, वे एक बेहद कुशल और व्यावहारिक प्रशासक थे। जब वे देश के रेल मंत्री बने, तो उन्होंने छुआछूत की मानसिकता पर चोट करने के लिए एक ऐसा क्रांतिकारी और व्यावहारिक कदम उठाया जो भारतीय प्रशासनिक इतिहास में अमर है। आमतौर पर आरक्षण या सकारात्मक भेदभाव को केवल सरकारी नौकरियों या उच्च पदों तक सीमित देखा जाता है, लेकिन बाबूजी ने इंसानी स्वभाव और मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर एक अनोखा आरक्षण लागू किया। उन्होंने रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को मुफ्त पानी पिलाने (Watermen) के पदों पर बड़े पैमाने पर दलितों की भर्ती करने का आदेश दिया।

यह एक बेहद गहरा और रणनीतिक कदम था। भारत की झुलसा देने वाली तपती गर्मी में जब कोई सवर्ण यात्री प्यास से व्याकुल होता, तो उसके सामने दो ही रास्ते होते या तो वह छुआछूत के अपने अहंकार को छोड़कर उस दलित कर्मचारी के हाथ से पानी पी ले और अपनी जान बचाए या फिर प्यासा तड़पता रहे।

इस प्रयोग ने सवर्ण समाज की उस मानसिकता पर सीधा प्रहार किया जो दलितों को छूने तक से कतराती थी। जब लोगों ने प्यास के मारे तड़पते हुए दलितों के हाथों से पानी पीना शुरू किया, तो सदियों पुरानी छुआछूत की मानसिक दीवारें अपने आप ढहने लगीं। यह एक क्रांतिकारी कदम था, लेकिन इसमें आंबेडकर के दृष्टिकोण की तरह कोई कटुता या शत्रुता नहीं थी। यह समाज को बिना तोड़े, उसकी बुनियादी इंसानी जरूरत के जरिए सुधारने का एक बेजोड़ तरीका था।

संत परंपरा और ‘बेगमपुरा’ की परिकल्पना जैसी आध्यात्मिक ताकत

वामपंथी और आधुनिक सेक्युलर विचारक अक्सर बाबू जगजीवन राम को केवल एक धर्मनिरपेक्ष राजनेता के रूप में देखते हैं, लेकिन अकादमिक शोध बताते हैं कि बाबूजी के राजनीतिक विचार उनकी गहरी धार्मिक और आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े थे। बाबूजी का परिवार ‘शिव नारायणी’ संत परंपरा से जुड़ा था और वे स्वयं मध्यकालीन दलित संत गुरु रविदास के बहुत बड़े भक्त और अनुयायी थे।

साल 1980 में आई अपनी पुस्तक ‘Caste Challenge in India’ में बाबूजी ने लिखा था कि भारत में बुद्ध से लेकर कबीर, नानक, रविदास, एकनाथ, तुकाराम और महात्मा गाँधी जैसे संतों ने हमेशा भगवान के सामने सभी मनुष्यों की समानता की बात की। बाबूजी का मानना था कि जातिवाद को खत्म करने के लिए तीनतरफा हमले की जरूरत है, जिसमें कानून, आर्थिक विकास और आरक्षण शामिल हैं।

साल 1986 में अपने निधन से कुछ समय पहले उन्होंने ‘रविदास’ पत्रिका में एक बेहद प्रभावशाली लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था- “ईश्वर के अंशधरों के प्रतीक के रूप में गुरु रविदास”। इस लेख में उन्होंने गुरु रविदास के प्रसिद्ध पद ‘बेगमपुरा’ (गम से रहित शहर) का जिक्र किया था।

‘बेगमपुरा’ एक ऐसे आदर्श समाज की परिकल्पना है जहाँ कोई दुःख, चिंता या डर न हो, कोई टैक्स या भेदभाव न हो और सभी लोग बराबर हों तथा किसी को भी कहीं भी आने-जाने से न रोका जाए।

जगजीवन राम ने कबीर, नामदेव और रविदास के दोहों का हवाला देते हुए यह साबित किया कि भारतीय अध्यात्म और संत परंपरा में पहले से ही ऊँच-नीच और धार्मिक कट्टरता के खिलाफ बेहद मजबूत विद्रोह मौजूद रहा है। वे इसी उदारवादी, समतावादी और समावेशी हिंदू संत परंपरा के बल पर समाज को बदलना चाहते थे, न कि पश्चिमी सिद्धांतों या धर्म-विरोधी विचारों के सहारे।

कॉन्ग्रेस और लेफ्ट ने क्यों नहीं दिया बाबूजी को उनका हक?

इतने विशाल व्यक्तित्व, दूरदर्शी सोच और देश के सबसे लंबे समय तक कैबिनेट मंत्री रहने वाले नेता को इतिहास में वह गौरवशाली स्थान क्यों नहीं मिला जो डॉ. आंबेडकर या अन्य नेताओं को मिला?

इसके पीछे साफ तौर पर राजनीतिक और वैचारिक कारण थे। पहली वजह कॉन्ग्रेस की बेरुखी थी, जो उनके इंदिरा गाँधी से विद्रोह के बाद पैदा हुई। बाबू जगजीवन राम दशकों तक कॉन्ग्रेस के संकटमोचक रहे। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय वे देश के रक्षा मंत्री थे, जब भारत ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। लेकिन 1977 में आपातकाल के बाद बाबूजी ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए इंदिरा गाँधी के खिलाफ विद्रोह कर दिया। उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़कर ‘कॉन्ग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ बनाई और जनता पार्टी की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई। कॉन्ग्रेस इस विद्रोह को कभी पचा नहीं पाई, जिसके कारण बाद के वर्षों में कॉन्ग्रेस के इतिहास और प्रचार-प्रसार से बाबूजी के योगदान को धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिया गया।

दूसरी वजह लेफ्ट यानी वामपंथ द्वारा उनकी उपेक्षा की जानी थी, जिसका कारण उनका हिंदू धर्म से नफरत न करना था। भारत के वामपंथी और प्रगतिशील विचारकों ने हमेशा उसी दलित विमर्श को बढ़ावा दिया जो हिंदू धर्म, उसके ग्रंथों और उसकी संस्कृति के प्रति आक्रामक या पूरी तरह शत्रुतापूर्ण रुख रखता था।

चूँकि बाबू जगजीवन राम गर्व से खुद को हिंदू कहते थे, कबीर-रविदास की परंपरा पर गर्व करते थे और हिंदू समाज के भीतर से सुधार के पैरोकार थे, इसलिए लेफ्ट ने उन्हें कभी अपना प्रतीक पुरुष नहीं माना। वामपंथी बुद्धिजीवियों के लिए बाबूजी का यह रुख उनकी वैचारिक लाइन में फिट नहीं बैठता था।

हिंदू धर्म से नफरत न करने के चलते भुला दिए गए बाबू जगजीवन राम?

आज जब हम बाबू जगजीवन राम को उनकी पुण्यतिथि पर याद करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता कि डॉ. आंबेडकर और बाबूजी के बीच का अंतर किसी वैमनस्य का नहीं, बल्कि दो महान शख्सियतों के बीच का अकादमिक और रणनीतिक मतभेद था। दोनों ही नेता अपने समाज को न्याय दिलाना चाहते थे। आंबेडकर का रास्ता संवैधानिक, कानूनी और अंततः धर्मांतरण का था, तो बाबूजी का रास्ता व्यावहारिक प्रशासन, मुख्यधारा की राजनीति और देश की मूल संत-संस्कृति के भीतर रहकर हृदय-परिवर्तन कराने का था।

बाबूजी को केवल इसलिए भुला दिया जाना कि वे हिंदू धर्म से नफरत नहीं करते थे या उन्होंने एक समय पर राजनीतिक सत्ता को चुनौती दी थी, इस महान राष्ट्र नायक के साथ सरासर अन्याय है। समय आ गया है कि देश के इस सच्चे, निडर और व्यावहारिक सपूत को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इतिहास की पाठ्यपुस्तकों और जनमानस में उनका वास्तविक और उचित स्थान दिया जाए।

खंजर से चीरी कोख, निर्वस्त्र की गई बहन… सब भूल जाओ, जिया की चाँद बाली पर लिखो नज्म: पढ़िए Arfa Khanum को क्यों भायी इम्तियाज अली की ‘मैं वापस आऊँगा’

घर की माँ-बहन-बेटी का चाहे बलात्कार हो जाए, गर्भवतियों की कोख चीर दी जाए, चाहे एक साथ सारी महिलाएँ अपना गला खुद रेतने को मजबूर हो जाएँ… लेकिन आपकी स्मृति में रहनी चाहिए एक मुस्लिम लड़की की चाँद बालियाँ, उसके प्रेम में लिखी गई सिख लड़के की नज्म और लाहौर के सरगोधा की गलियाँ…

यही मकसद है 12 जून को पर्दे पर आई इम्तियाज अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ का। इस फिल्म में कलाकार के तौर पर दिलजीत दोसांझ, नसीरुद्दीन शाह मुख्य कलाकार हैं। फिल्म कैसी है इसका अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि इसकी तारीफ करने वालों में एक नाम आरफा खानम शेरवानी जैसों का भी है जिन्हें ये फिल्म विभाजन के जख्मों पर मरहम लगाने वाली एक ‘कविता’ जैसी लगती है।

आरफा इस फिल्म को देखकर रोने लगती हैं क्योंकि उनसे ये नहीं देखा जाता है कि कैसे इतने समय बाद पर्दे पर कीनू की कहानी के रूप में उनके नैरेटिव का कंटेंट आया है।

इंटरनेट पर फिल्म के बारे में पढ़ने चलेंगे तो पता चलेगा इम्तियाज अली ने कहने को ये फिल्म विभाजन के दर्द को बयाँ करते हुए बनाई है, लेकिन जब देखेंगे तो खुद से सवाल पूछेंगे कि क्या सच में ये फिल्म विभाजन की त्रासदी का सही चित्रण करती है, या फिर ‘क्रिएटिव लिबर्टी’ के नाम पर इतिहास को धुँधला करने का एक और बॉलीवुड प्रयास है?

फिल्म की मूल कहानी एक सिख बुजुर्ग ‘कीनू’ (नसीरुद्दीन शाह) के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जिन्हें अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में आकर 1947 के विभाजन के दौरान लाहौर में छूटा अपना पहला प्यार याद आता है। यह प्यार एक मुस्लिम लड़की ‘जिया’ से था, जो विभाजन की वजह से मुकम्मल नहीं हो सका। भारत आकर कीनू सब भुलाकर कड़ी मेहनत से वो सब हासिल करता है जो लाहौर में छूट गया था, लेकिन जीवन के आखिरी पलों में वे जिया पर आकर दोबारा रुक गए है, उनकी यादश्त में सिर्फ जिया और जिया की कहानी चल रही है। उन्हें ये दर्द नहीं है कि उनकी घर की औरतों के साथ क्या हुआ…

फिल्म में कीनू जब अपने पोते (दिलजीत दोसांझ ) को यह प्रेम कहानी सुनाने की शुरुआत करते हैं, वहीं से फिल्म का नैरेटिव साफ होने लगता है।

सबसे शर्मनाक चीज ये पकड़ में आती है कि फिल्म निर्माता यहाँ क्रिएटिव लिबर्टी और सौहार्द बनाने की आड़ में बड़ी चालाकी से मजहबी दंगाइयों को ढाँकने की कोशिश करते हैं और मजहबी दंगाइयों को MARS से आए प्राणी बताकर पेश करते हैं।

फिल्म में विभाजन के दर्द को, गैर-मुस्लिमों पर हुए अत्याचार को पूरी तरह एक सूफियाना रोमांस के पर्दे के पीछे छिपा दिया है। विभाजन की इस अथाह पीड़ा को एक प्रेम कहानी के तौर पर परोसा गया है।

ढाई घंटे की इस फिल्म में माताओं-बहनों के साथ हुई बर्बरता, बच्चियों के गले रेते जाने और खचाखच भरी लाशों की ट्रेनों के उस खौफनाक सच को महज 5 से 10 मिनट के दृश्यों में समेट कर किनारे कर दिया गया।

फिल्म का अंत होते-होते उस खूनी इतिहास को इस तरह भुला दिया जाता है, मानो वह कोई बड़ी घटना थी ही नहीं।

फिल्म में गैर-मुस्लिम औरतों के साथ हुई वीभत्सता को एक डॉयलॉग ‘हमारे घर को श्राप है कि कोई औरत नहीं बचेगी’ जैसे डॉयलॉग के साथ भी समेटने का प्रयास हुआ है।

देखने वालों को ये लगे कि बुजुर्ग कीनू के भीतर अब भी महिलाओं के साथ हुए अत्याचार का दर्द है और पर्दे पर उनके साथ वीभत्सता करने वालों की कहानी भी न आए।

क्या सिर्फ एक डॉयलॉग या 5-7 मिनट के सीन से आप सोच सकते हैं कि विभाजन के वक्त हिंदू-सिख औरतों के साथ दंगाइयों ने क्या किया होगा।

प्रेम कहानी के नाम पर विभाजन का दर्द बताने का दावा करने वाली ये फिल्म बिलकुल वैसी करतूत है जैसा कुछ समय पहले विधु विनोद ने ‘शिकारा’ परोस कर की थी। उसमें भी कश्मीरी पंडितों के वास्तविक विस्थापन और दर्द को बताकर फिल्म ‘शिकारा’ का प्रमोशन हुआ और आखिर में वो सिर्फ एक प्रेम कहानी निकली। इस बार भी पीड़ितों की चीखों को दबाकर उनके दर्द का सरलीकरण किया जा रहा है।

फिल्म में जगह-जगह सोच-समझकर ‘बैलेंसिंग एक्ट’ दिखाने की कोशिश हुई है। कहानी में दिखाया गया है कि अगर सामने मजहबी दंगाई थे, तो ‘मुस्तफा’ जैसे लोग भी थे जिन्होंने अपनों को खोकर भी सिख परिवार की जान बचाई।

बेशक इतिहास में इंसानियत के ऐसे उदाहरण रहे होंगे, लेकिन फिल्म निर्माता ने जिस तरह उन्हें पेश किया है और जैसे मजहबी कट्टरपंथ को ढाका है, उससे उनकी मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है।

फिल्म यह संदेश देने की कोशिश करती है कि उजड़े हुए हिंदू-सिख घरों के पीछे उनके पड़ोस में रहने वाले मजहबी कट्टरपंथियों का हाथ नहीं था, बल्कि मानो वे लोग किसी दूसरे ग्रह ‘मार्स’ से आए थे।

इम्तियाज अली की मंशा तब और ज्यादा बेनकाब हो जाती है, जब वे विभाजन का दर्द बताते-बताने अचानक लेबनान और गाजा की समकालीन क्लिप्स चलाने लगते हैं।

एक बार को ये देख ऐसा लग सकता है कि वे इसे यहाँ विस्थापन की पीड़ा बयान करने के लिए दिखाते हैं लेकिन हकीकत में उनका मकसद दर्शकों के दिमाग में एक खास तरह की राजनीतिक धारणा को बिठाना था।

राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर विपक्ष का प्रोपेगेंडा फेल, श्रद्धालुओं की आस्था अटूट: आँकड़े बता रहे हैं कि अयोध्या में रामलला के दर्शन पर नहीं पड़ा कोई असर, कॉन्ग्रेसी-सपाई सियासी नरेटिव हुआ ध्वस्त

बीते एक महीने से अयोध्या स्थित राम मंदिर में चढ़ावा चोरी को लेकर सियासत गरमाई हुई है। विपक्ष एक नरेटिव खड़ा करने की कोशिश कर रहा है कि चढ़ावा चोरी का सीधा असर श्रद्धालुओं के आस्था पर पड़ा है। हालाँकि श्रद्धालुओं की संख्या में हुई बढ़ोतरी ने इस नरेटिव को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है।

राम मंदिर में श्रद्धालुओं का आना रुका नहीं है, कम नहीं हुआ है और न ही किसी तरह से आस्था कमजोर पड़ी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जून 2026 में राम मंदिर में रोजाना लगभग 1 लाख श्रद्धालु और 7 जून से 11 जून के बीच रोजाना 81,000 से 1,16,689 तक दर्शनार्थी दर्ज किए गए।

इस रिपोर्ट के अनुसार, महज पाँच दिनों में 4.90 लाख दर्शनार्थी राम मंदिर में दर्शन करने पहुँचे। अगर मंदिर खाली हो गया होता या लोग आना बंद कर चुके होते, तो इस तरह के फुटफॉल आँकड़े सामने ही नहीं आते।

टीवी9 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 7 जून से पहले औसत 16-18 लाख रुपए प्रतिदिन चढ़ावे के तौर पर बैंक में जमा किए जाते थे। वहीं चढ़ावे का विवाद के शुरू होने के बाद ये औसत 22-24 लाख के बीच पहुँच गया है।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, 22 जनवरी 2024 से 2026 तक करीब 12 करोड़ लोगों ने रामलला के दर्शन किए और सामान्य दिनों में लगभग 50 से 60 हजार श्रद्धालु रोज आते रहे।

SIT की रिपोर्ट में भी औसतन हर महीने 25 लाख श्रद्धालुओं के आने की बात सामने आई है। जहाँ तक सवाल है चढ़ावा चोरी और उसमें कमी का, तो हाल के हफ्तों में दान 16 से 18 लाख से बढ़कर 22 से 24 लाख रुपये प्रतिदिन तक पहुँच गया।

‘कोई सबूत नहीं है’- अफवाह को सुर्खी बनाने की कोशिश

कहानी की शुरुआत ही पाखंड की मिसाल है। 5 जून 2026 को मंदिर परिसर में रूटीन सुरक्षा जाँच के दौरान कुछ कर्मचारियों की जेब से नकदी बरामद हुई थी। 7 जून को जब यह बात सार्वजनिक हुई तो सपा मुखिया अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर गबन का मुद्दा उठाकर जाँच की माँग कर दी। लेकिन जब सवाल पूछा गया, तो असली रंग सामने आया।

अयोध्या से पूर्व विधायक और सपा प्रवक्ता पवन पांडेय ने खुद ऑपइंडिया को बताया कि यह बात महज चार दिनों से शहर में सूत्रों के हवाले से ‘टहल’ रही थी, जिसका कोई ठोस सबूत उनके पास नहीं था। यानी जिस ‘सबूत दो’ के नारे पर सपा हर सरकारी योजना, हर मुठभेड़, हर आंकड़े को कठघरे में खड़ा करती है, अपने ही सबसे बड़े ‘राम-भक्ति’ के दावे में वह खुद यह शर्त भूल गई।

ऑपइंडिया की अपनी पड़ताल में अखिलेश का यह दावा तथ्यों की कसौटी पर टिक ही नहीं पाया था। पूरे तथ्य सामने आने से पहले ही निशाना साध दिया गया था।

भले ही बाद में जाँच में सचमुच गड़बड़ी मिली, लेकिन टूटी हुई घड़ी भी दिन में दो बार सही समय बता देती है तो इससे घड़ी की साख साबित नहीं होती। सवाल यह नहीं कि सपा का शक गलत निकला या इत्तेफाक से सही, सवाल यह है कि बिना सबूत माइक थामकर हल्ला मचाना और बाद में संयोगवश सही साबित होकर पूरा श्रेय बटोर लेना ही अब सपा की स्थायी रणनीति बन चुकी है।

गोलियाँ चलवाने वाले ले रहे भगवान राम का सहारा

मंदिर में चढ़ावे की चोरी एक प्रशासनिक और जाँच का विषय है। वह प्रक्रिया चल भी रही है। लेकिन इसे बहाना बनाकर राम मंदिर के खिलाफ माहौल बनाकर श्रद्धालुओं की भावना पर सवाल उठाना और फिर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करना एक अलग ही एजेंडा दिखाता है। यह मंदिर-विरोधी नरेटिव वही लोग आगे बढ़ा रहे हैं, जिनका राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रति रवैया हमेशा से ही सवालों के घेरे में रहा है।

यह भी याद रखने की जरूरत है कि राम मंदिर पर सवाल उठाने वालों का राजनीतिक इतिहास पहले से दर्ज है। 1990 के दशक में जब कारसेवक राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए निकलते थे, तब गोलियों से उनका स्वागत करने वाली समाजवादी पार्टी आज रामभक्ति के सबसे बड़े पैरोकार बनने की कोशिश कर रही है।

30 अक्टूबर 1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के आदेश पर पुलिस ने कारसेवकों पर गोली चलाई, जिसमें कई लोगों की मौत हुई। दो दिन बाद, 2 नवंबर 1990 को हनुमानगढ़ी के पास दोबारा गोलीबारी हुई। जान बचाने के लिए कई कारसेवकों ने सरयू नदी में छलांग लगा दी। कुछ तो शवों के बीच लेटकर ही बच पाए।

आडवाणी की रथ यात्रा रोकने के लिए मुलायम यादव ने ऐलान किया था कि कारसेवकों को ‘कानून का अर्थ’ सिखाया जाएगा और हनुमानगढ़ी की तरफ बढ़ते कारसेवकों को चेतावनी दी थी कि ‘बाबरी मस्जिद पर परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा।’

1990 का गोलीकांड कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं थी बल्कि यह सपा की स्थापना की बुनियाद बना। बाबरी ढाँचा गिरने के बाद 1992 में मुलायम सिंह यादव ने जनता दल से अलग होकर समाजवादी पार्टी की नींव रखी थी यानी जिस पार्टी का जन्म ही राम मंदिर आंदोलन के सीधे विरोध की कोख से हुआ, वह पार्टी आज उसी मंदिर की आस्था का ठेकेदार बनने चली है।

समाजवादी पार्टी का समाजवाद अयोध्या के मसले पर हमेशा एक खास वोट बैंक के तुष्टिकरण का रहा है। यही प्रवृत्ति मुलायम सिंह के बाद उनके बेटे अखिलेश यादव के दौर में भी बिना रुके चलती रही। हजारों कारसेवकों की गिरफ्तारियाँ और अस्थायी जेलें भी उसी सपाई विरासत का हिस्सा रही हैं।

अब यह सिर्फ सपा तक सीमित बीमारी भी नहीं रही बल्कि पूरे ‘इंडिया गठबंधन’ में यही रग दौड़ती है। बिहार में लालू यादव की पार्टी आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव ने प्राण प्रतिष्ठा से पहले तंज कसा था कि मंदिर जाओगे तो वहाँ भी दान माँग लेंगे। मतलब गोत्र भले ही अलग हों, पर नीयत एक जैसी ही है।

असल में जिनके राजनीतिक संस्कार राम मंदिर के विरोध, तुष्टिकरण और मंदिर आंदोलन की आलोचना से बने हों, उनसे आज श्रद्धा और मर्यादा की उम्मीद करना जनता की समझ का अपमान होगा।

यह सबसे बड़ा विरोधाभास भी है कि जब असल में राम मंदिर के लिए जनता का साथ देने की बारी थी तब इसी विपक्ष का विरोध दिखा था और अब जब चुनावी माहौल और सियासत के जरिए जनता को लुभाना है तो दिखावटी सहानुभूति सामने आ रही है। तब राम आंदोलन को रोकने की कोशिश थी और आज उन्हीं श्री राम के नाम पर नरेटिव बनाने की कोशिश में सपा और कॉन्ग्रेस जुटी हुई है।

चुनाव आया तो याद आ गए श्री राम

सबसे बड़ा सवाल यही है कि विपक्ष की अयोध्या-सक्रियता चुनाव से ठीक पहले अचानक तेज क्यों हुई। मंदिर निर्माण के पाँच साल और प्राण प्रतिष्ठा के डेढ़ साल में सपा को मंदिर-प्रबंधन की पारदर्शिता की याद कभी क्यों नहीं आई? यह ‘चिंता’ अचानक तभी क्यों जागी जब 2027 का विधानसभा चुनाव सिर पर है? इसी समय चढ़ावा-चोरी की खबर को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जाने लगा।

असल बात यह है कि विपक्ष को चढ़ावा चोरी के मामले से एक ऐसा राजनीतिक मुद्दा मिल गया, जिसके सहारे वह राम मंदिर को बदनाम करने का प्रयास कर सकता था। लेकिन यह दांव उल्टा पड़ रहा है, क्योंकि जनता भावनाओं से ज्यादा अब वास्तविक आँकड़े देख रही है।

मंदिर में भीड़ है, दर्शन हो रहे हैं, श्रद्धालु आ रहे हैं और आस्था जस की तस बनी हुई है। अगर कहीं कमी है, तो वह विपक्ष की विश्वसनीयता में है, रामभक्तों की श्रद्धा में नहीं। राम मंदिर के खिलाफ यह प्रोपेगेंडा सिर्फ एक विवाद को हवा देना नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना पर चोट करने की कोशिश है जिसने देश को वर्षों तक एक प्रतीक के लिए संघर्ष करते देखा।

हालाँकि अयोध्या का सच साफ है कि रामलला के दर्शन के लिए आने वाले भक्त आज भी उतनी ही निष्ठा से कतारों में खड़े हैं और यह तथ्य हर झूठे नरेटिव पर भारी पड़ता नजर आ रहा है।

जिस पार्टी की सरकार ने कभी राम भक्तों पर गोलियाँ चलवाईं, आज वही पार्टी खुद को उन्हीं भक्तों की आस्था का सबसे बड़ा प्रहरी बताकर पेश कर रही है। यही पाखंड की पराकाष्ठा है। विपक्ष जिस ‘कम भीड़’ वाले नरेटिव को बार-बार दोहरा रहा है, वह तथ्य के बजाय प्रचार पर आधारित है।

दान और चढ़ावे की राशि पर बहस अलग हो सकती है, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल अलग हो सकते हैं, लेकिन श्रद्धालुओं की उपस्थिति के बारे में झूठ फैलाना न केवल गलत है बल्कि सनातन आस्था के साथ खिलवाड़ भी है।

राम मंदिर सिर्फ एक इमारत नहीं, करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं, संघर्ष और प्रतीक्षा का प्रतीक है। ऐसे में उसके खिलाफ कोई भी झूठा प्रचार स्वाभाविक रूप से जनता के बीच टिक नहीं सकता।

‘आप कौन हैं?’ वाला सवाल अरविंद केजरीवाल पर पड़ा भारी, AAP नेता को याद दिलाई गई उनके ‘भ्रष्टाचारों’ की गिनती: शायद इसीलिए ‘कर्मठ’ BJP अध्यक्ष नितिन नवीन को पहचानने से कर रहे इनकार

अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे को लेकर चल रहे विवाद में विपक्षी नेताओं के राजनीतिक स्वर बदल रहे हैं। कभी इसी राम मंदिर को बनने के विरोध में रहे इन विपक्षी नेताओं को अचानक ‘हिंदुओं की आस्था’ की चिंता सताने लगी है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अध्यक्ष नितिन नवीन ने इन्हीं विपक्षी नेता राहुल गाँधी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल को आईना दिखाया है।

लखनऊ में शक्ति केंद्र संयोजक सम्मेलन को संबोधित करते हुए नितिन नवीन ने कहा, “आज मैं राहुल गाँधी, अखिलेश यादव और केजरीवाल से कहना चाहता हूँ कि हिंदू धर्म को इतना कमजोर मत समझिएगा कि लोग आपके साँझे में आ जाएँगे।” उन्होंने आगे कहा, “क्योंकि जब आपके लोग हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करते हैं, तो आप लोग मौन रहते हैं। सनातन का अपमान यूपी और देश की जनता कभी बर्दाश्त नहीं करेगी। हमने विरासत को संजोया है, इसके लिए हमारे पुरखों ने कुर्बानियाँ तक दी हैं।”

नितिन नवीन के इस बयान पर आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने टिप्पणी की है। बीजेपी के ‘एक्स’ हैंडल से शेयर हुए नितिन नवीन के बयान पर कमेंट करते हुए केजरीवाल ने नितिन नवीन से पूछा कि आप कौन हैं? लेकिन अरविंद केजरीवाल को उनकी यह टिप्पणी भारी पड़ गई क्योंकि सिर्फ बीजेपी के नेता ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया यूजर्स तक केजरीवाल को उनकी ‘औकात’ दिखाने लगे।

अपने ही सवाल पर घिरे केजरीवाल

अरविंद केजरीवाल से दिल्ली की मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनने वालीं रेखा गुप्ता ने खुद मोर्चा संभाला और इसे केजरीवाल का ‘अहंकार’ बताया। रेखा गुप्ता ने नितिन नवीन का परिचय देते हुए केजरीवाल से सीधे तौर पर कहा, “आप हताश और निराश हैं, इस बात से सभी अवगत हैं। लेकिन लगता है, आपका अहंकार अभी भी सातवें आसमान पर है!”

रेखा गुप्ता ने याद दिलाया कि यही सवाल एक बार तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और मौजूदा केंद्रीय मंत्री अमित शाह से भी पूछा था और कहा कि समय हर प्रश्न का उत्तर देता है। उन्होंने केजरीवाल से यह भी कहा कि अहंकार तो रावण का भी नहीं टिका, आप कौन?

दिल्ली सरकार में मंत्री प्रवेश शर्मा ने भी केजरीवाल के सवाल पर तंज कसते हुए कहा, “मैं याद हूँ कि नहीं?” बता दें कि प्रवेश वर्मा ने ही दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में नई दिल्ली विधानसभा सीट से अरविंद केजरीवाल को हराकर दिल्ली से बाहर का रस्ता दिखाया था।

वहीं दिल्ली के मंत्री कपिल मिश्रा ने तो केजरीवाल की इज्जत उतारकर रख दी। उन्होंने कहा, “दारू के नशे में कुछ ऐसे डूबे AAP, बाप से ही पूछ बैठे कौन हैं आप।”

यहाँ तक की AAP की बागी नेता स्वाती मालीवाल भी केजरीवाल को आइना दिखाने से पीछे नहीं रही हैं। उन्होंने कहा कि जो सवाल केजरीवाल ने नितिन नवीन से पूछा है, वही सवाल आज पंजाब की जनता केजरीवाल से भी पूछ रही है। स्वाती मालीवाल ने पंजाब की AAP सरकार में अपराध, भ्रष्टाचार, ड्रग्स पर सवाल उठाए।

स्वाती मालीवाल ने नितिन नवीन को मेहनती और विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बताते हुए कहा कि AAP में केवल केजरीवाल को तर्जी दी जाने पर भी सवाल किया, “AAP में केजरीवा ही अध्यक्ष है, वही सरकार है और वही सुपर CM है।” साथ ही केजरीवाल के सवाल को अहंकार बताते हुए स्वाती ने कहा, “इतना अहंकार अच्छा नहीं है, पहले दिल्ली में टूटा था, अब पंजाब में टूटेगा।”

सिर्फ नेता ही नहीं, केजरीवाल को आम जनता ने भी लताड़ा। एक्स पर कल्पना श्रीवास्तव ने केजरीवाल से कहा, “यह सवाल पूछने वाले आप स्वयं कौन हैं? जो दिल्ली की जनता ने नौकर बनाया था, मालिक बन बैठे। आप वो हैं जिनकी पार्टी में हिंदू देवी-देवताओं का अपमान होने पर मौन रह जाते हैं। आप वो हैं जो राम मंदिर पर चढ़ावे की चोरी पर भी राजनीति करते हैं, लेकिन सनातन के अपमान पर “आप कौन हैं” कहकर बच निकलना चाहते हैं।”

अर्पित मिश्र ने कहा, “लगातार भ्रष्टाचार के आरोप में जेल और अदालतों के चक्कर लगाने वाले, झूठ और मक्कारी के प्रत्यक्ष प्रमाण अरविंद केजरीवाल का गुरूर 7वें आसमान पर है या यह मात्र सुर्खियों में बने रहने का इसका वही पुराना राग है। केजरीवाल के नीचे जमीन ही नहीं है, लेकिन कमाल है इसको अभी भी यकीन ही नहीं है।”

आनंद शंकर झा ने केजरीवाल के सवाल का जवाब देते हुए कहा, “तेरे जैसे गिरगिट को जिस पार्टी ने तेरी सही औकात बता दी उसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं!”

केजरीवाल के लिए जानिए, कौन हैं नितिन नवीन?

अरविंद केजरीवाल ने जिस नितिन नवीन से ‘आप कौन हैं?’ पूछा है, वे बीजेपी के कोई साधारण नेता नहीं हैं। हर कोई उन्हें जानता है लेकिन केजरीवाल को शायद इसकी जानकारी नहीं है इसीलिए उनकी जानकारी में लाने के लिए नितिन नवीन का परिचय जरूरी है। 45 वर्षीय नितिन नवीन के पास इस समय बीजेपी की कमान है यानी वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और पार्टी के सबसे कम उम्र में इस पद तक पहुँचने वाले नेताओं में शामिल हैं। वे बिहार की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे हैं और लंबे समय तक संगठन से लेकर सरकार तक अहम जिम्मेदारियाँ निभा चुके हैं।

नितिन नवीन बिहार के पटना स्थित बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र से लगातार पाँच बार के विधायक हैं। उनके पिता नवीन किशोर सिन्हा भी बीजेपी के वरिष्ठ नेता और विधायक थे। पिता के निधन के बाद नितिन नवीन ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और साल 2006 में महज 26 साल की उम्र में उपचुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। परिसीमन के बाद बनी बांकीपुर सीट से वे लगातार चुनाव जीतते रहे और अब तक पाँच बार विधानसभा पहुँच चुके हैं।

सिर्फ चुनावी राजनीति ही नहीं, नितिन नवीन का संगठन में भी लंबा अनुभव रहा है। उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) में कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत की और प्रदेश अध्यक्ष से लेकर राष्ट्रीय महासचिव तक की जिम्मेदारी निभाई। इसके बाद बीजेपी ने उन्हें छत्तीसगढ़ का सह-प्रभारी और फिर प्रभारी बनाया। संगठन में लगातार बढ़ती जिम्मेदारियों के बाद पार्टी नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी।

बिहार सरकार में भी नितिन नवीन कई जरूरी विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। वे पथ निर्माण मंत्री रहने के साथ-साथ कानून एवं न्याय और शहरी विकास एवं आवास जैसे विभागों का भी नेतृत्व कर चुके हैं। संगठन और सरकार, दोनों स्तर पर उनके अनुभव को देखते हुए बीजेपी ने उन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व की कमान सौंपी।

‘₹20 की थाली शेयर करते थे’: सहपाठी ने सुनाए नितिन नवीन के छात्र जीवन के किस्से

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नवीन के छात्र जीवन से जुड़े कई किस्से भी सामने आए हैं। इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर पीयूष पदमाकर ने ‘एक्स’ पर पोस्ट कर दावा किया कि वह नितिन नवीन के सहपाठी रहे हैं। उन्होंने 1998 के दिनों को याद करते हुए बताया कि दोनों ने 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली में कॉलेज में दाखिले की तैयारी साथ की थी और कुछ समय तक एक ही कमरे में भी रहे थे।

पीयूष पदमाकर के मुताबिक, उस समय नितिन नवीन के पिता बिहार में विधायक थे, लेकिन उन्होंने कभी इसका रौब नहीं दिखाया। उन्होंने बताया कि दोनों कई बार ₹20 की थाली शेयर करके खाना खाते थे ताकि ₹10 बच सकें। ऑटो की जगह डीटीसी बसों में सफर करते थे और खर्च कम रखने की पूरी कोशिश करते थे। उन्होंने लिखा कि नितिन ने कभी यह जताने की कोशिश नहीं की कि वह एक विधायक के बेटे हैं।

पीयूष पदमाकर ने अपने दूसरे पोस्ट में बताया कि कॉलेज शुरू होने के बाद उन्होंने नितिन नवीन और दो अन्य दोस्तों के साथ दिल्ली के पटपड़गंज इलाके में किराए का कमरा तलाशा था। प्रॉपर्टी डीलर को जब पता चला कि नितिन के पिता विधायक हैं तो उसने महँगे फ्लैट दिखाने शुरू कर दिए। हालाँकि, नितिन ने साफ कह दिया कि उनके पास पूरे महीने का बजट सिर्फ ₹2 हजार है और उसी में रहना, खाना और कॉलेज जाना है। इसके बाद चारों दोस्तों ने पश्चिम विनोद नगर के मंडावली इलाके में एक साधारण किराए का कमरा लिया।

उन्होंने दावा किया कि उस दौरान चारों दोस्त मिलकर घर का सारा काम खुद करते थे। कोई नाश्ता बनाता था तो कोई बर्तन धोता था। झाड़ू-पोंछा लगाने से लेकर खाना बनाने तक सभी जिम्मेदारियाँ आपस में बाँट लेते थे। पीयूष पदमाकर के मुताबिक, नितिन नवीन उस समय भी बेहद अनुशासित, सरल और मिलनसार स्वभाव के थे। दोस्तों के बीच जब भी किसी बात पर विवाद होता, तो उसे सुलझाने का काम अक्सर नितिन ही करते थे।

अब जान लेते हैं कि सवाल करने वाले केजरीवाल आखिर कौन हैं?

नितिन नवीन के राजनीतिक सफर, संगठन में उनकी भूमिका और छात्र जीवन के संघर्ष की कहानी तो जान ली। अब उस सवाल के दूसरे पहलू पर भी नजर डाल लेते हैं। आखिर जिस नेता ने नितिन नवीन से पूछा कि आप कौन हैं? वह खुद कौन हैं? अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक सफर की उपलब्धियाँ क्या हैं, कैसे उनके कारनामों के चलते दिल्ली से भागना पड़ा, कैसे अब घोटाले ही केजरीवाल की पहचान बन चुके हैं और ये भी जानेंगे कि अचानक हिंदुओं और राम मंदिर की बात करने वाले केजरीवाल कभी इसी मंदिर को बनवाने के खिलाफ क्या-क्या बोले?

अरविंद केजरीवाल का जन्म 16 अगस्त 1968 को हरियाणा में हुआ था। वे देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIT खड़गपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर 1993 में भारतीय राजस्व सेवा (IRS) में नौकरी करने लगे। लेकिन राजनीति में हाथ आजमाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता बने।

साल 2011 के अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोल का प्रमुख चेहरा बने। उसी आंदोलन से उन्हें पहचान मिली और अन्ना हजारे को अलग कर 2012 में अपनी आम आदमी पार्टी (AAP) का गठन किया। अब तक हर कोई उन्हें अन्ना हजारे के आंदोलन से ही जानता था और उसी अन्ना हजारे को उन्होंने पूछा तक नहीं।

अब बारी आई दिल्ली में 2013 के विधानसभा चुनावों की, इन चुनावों में पहली बार AAP ने दिल्ली की सत्ता हासिल की और अगले 10 वर्षों तक दिल्ली में राज किया। केजरीवाल का ऐसा राज, जो जनता को लूटकर अपना खजाना भरने में लगे रहे। इन 10 वर्षों में केजरीवाल ने अपना ‘शीशमहल‘ खड़ा किया और जनता के पैसों से कई घोटाले किए। चाहे ₹100 करोड़ का शराब घोटाला हो, दिल्ली के अस्पतालों में ₹382 करोड़ का घोटाला हो, दिल्ली जल बोर्ड अनियमितता का मामला हो या दिल्ली में बस खऱीदने को लेकर करोंड़ो का घोटाला हो।

और केजरीवाल के इन घोटालों का असर यह हुआ कि 2025 के विधानसभा चुनाव में केजरीवाल को दिल्ली छोड़नी पड़ी और बीजेपी ने पहली बार सत्ता संभाली। इन चुनावों में वह अपनी नई दिल्ली सीट भी नहीं बचा सके। अब केजरीवाल दिल्ली जैसा हाल पंजाब में करने में लगे हुए हैं। पंजाब में AAP सरकार में अपराध कई गुना बढ़ चुका है, ड्रग्स पर शिकंजा कसने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जा रही। यहाँ तक कि हाल ही में सीएम भगवंत मान के ‘बेअदबी’ के वीडियो सामने आने के बाद ‘पंजाबी’ लोगों में सरकार के खिलाफ गुस्सा और फूट गया है।

अरविंद केजरीवाल का हिंदू-विरोधी चेहरा

अरविंद केजरीवाल का हिंदू-विरोधी चेहरा भी किसी से छिपा नहीं है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर केजरीवाल ने विरोध किया। उन्होंने कई मौकों पर कहा था कि मंदिरों की देश में जरूरत नहीं है, मंदिर से देश का भलो नहीं हो सकता जैसे कई कथन कहे थे। हिंदू त्योहारों को भी केजरीवाल ने निशाना बनाया और दिल्ली में सत्ता संभालने के दौरान दीवाली पर पटाखों पर बैन लगा दिया था।

बीजेपी भी केजरीवाल का हिंदू विरोधी चेहरा सामने ला चुकी है। बीजेपी ने याद दिलाया कि जब केजरीवाल ने ‘स्वास्तिक’ और भगवान हनुमान का अपमान करते एक्स पोस्ट किया था। बीजेपी ने अरविंद केजरीवाल के उन पुराने बयानों को भी सामने लाकर रखा जिसमें वह कश्मीरी हिंदुओं का मजाक बना रहे हैं और राम मंदिर का विरोध कर रहे हैं और दूसरे तरफ मस्जिद में नमाज अदा करने पहुँच रहे हैं।

अब यही अरविंद केजरीवाल की आजकल हिंदओं के हित की बात कर रहे हैं। अयोध्या के राम मंदिर के चढ़ावा में कथित चोरी मामले में लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं और हिंदुओं की आस्था आहत होने का रोना रो रहे हैं। अब उन्हें मंदिर याद आ रहे हैं। उनकी एक्स की टाइमलाइन देखें तो आजकल उनके पोस्ट में केवल हिंदू और सनातन प्रेम भरा हुआ है और इसकी आड़ में बीजेपी पर निशाना साधने में लगे हुए हैं।

निष्कर्ष: केजरीवाल ने नितिन नवीन को पहचानने से क्यों किया इनकार?

अब नितिन नवीन और अरविंद केजरीवाल, दोनों के राजनीतिक सफर पर नजर डालने के बाद यह सवाल पाठकों के सामने है कि आखिर ‘आप कौन हैं?’ वाला सवाल किस पर ज्यादा भारी पड़ता है। एक तरफ नितिन नवीन हैं, जिन्होंने छात्र राजनीति से लेकर पार्टी संगठन और सरकार में अलग-अलग जिम्मेदारियाँ निभाते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक का सफर तय किया। दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से अपनी राजनीति शुरू की, लेकिन बाद में खुद भ्रष्टाचार के आरोपों से लद गए।

इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि नितिन नवीन का औदा और उनकी उपलब्धियाँ अरविंद केजरीवाल से कहीं ज्यादा हैं। नितिन नवीन का न तो अब तक किसी घोटाले में नाम सामने आया है, न ही उन्हें केजरीवाल की तरह कोर्ट से कोई लताड़ लगाई जाती है। नितिन नवीन का कानूनी रिकॉर्ड नहीं रहा है, इसीलिए शायद एक ‘भ्रष्टाचारी’ नेता को नहीं मालूम कि नितिन नवीन कौन हैं? और हाँ हिंदुओं की आस्था की चिंता की बात करें तो केजरीवाल का रुख सबके सामने है कि कैसे उन्होंने राम मंदिर का विरोध किया था और अब यूपी में चुनाव करीब आते ही उन्हें राम मंदिर और हिंदुओं के आस्था की चिंता होने लगी है।

कर्नाटक की मस्जिदों से भराए गए SIR के फॉर्म, घुसपैठियों की मदद करने में जुटा कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम: BJP ने उठाए DK शिवकुमार की सरकार पर सवाल, EC से शिकायत भी की; जानें पूरा मामला

कर्नाटक में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर अभियान को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल कई जगह पर बूथ लेवल ऑफिसर चुनाव आयोग के निर्धारित घर-घर जाकर सत्यापन की प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहे हैं, बल्कि लोगों को सामूहिक कैंपों में बुलाकर फॉर्म भरवा रहे हैं। कुछ स्थानों पर लोगों को कहा गया कि वे स्वयं कैंप में आकर फॉर्म भरें और जमा करें।

यह चुनाव आयोग के निर्देशों का सीधा उल्लंघन है। आयोग ने अपने निर्देश में साफ कहा है कि एसआईआर के लिए बीएलओ घर-घर जाएँगे और वोटर वेरिफिकेशन करेंगे, लेकिन कर्नाटक में कई जगहों पर बीएलओ घर-घर जाने के बजाय मैरिज हॉल, कम्युनिटी हॉल, स्कूल, मस्जिद जैसे स्थानों पर कैंप लगाकर लोगों को वहीं बुला रहे हैं।

मैरिज हॉल और मस्जिदों में भरे जा रहे SIR फॉर्म

विजयपुरा में कथित तौर पर स्टार वेडिंग हॉल में SIR कैंप लगाया गया। लोगों का घर-घर जाकर सत्यापन नहीं हुआ। बेंगलुरु में एक मस्जिद के बाहर और एक निजी कार्यालय के पास BLO ने कैंप लगाकर लोगों को बुलाया। इस पर जब सवाल उठाए गए तो प्रक्रिया रोक दी गई। इतना ही नहीं रामनगर, मंड्या और बेंगलुरु के अन्य इलाकों में भी इसी तरह की शिकायतें मिलीं हैं।

जेडीयू ने कर्नाटक में एसआईआर रोकने और पूरी प्रक्रिया फिर से शुरू करने की माँग की है। इसका कहना है कि फॉर्म मस्जिदों में भरवाए गए हैं। पार्टी के नेता कृष्णप्पा ने आरोप लगाया कि SIR फॉर्म सीधे घरों में बांटने के बजाय मस्जिदों, शादी हॉल और चौराहों में भरे जा रहे थे। केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी पहले ही एक वीडियो दिखा चुके हैं जिसमें कथित तौर पर ऐसी जगहों पर SIR फॉर्म भरे जाते हुए दिखाए गए।

कृष्णप्पा ने कहा, “वे नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। हर BLO को हर घर जाना चाहिए और ग्राम पंचायत के जरिए हर घर को कवर किया जाना चाहिए। इसलिए हाल ही में बांटे गए सभी SIR फॉर्म तुरंत रोके जाने चाहिए। हर BLO को घर-घर जाना चाहिए और पूरी प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करनी चाहिए।”

वहीं पूर्व सीएम और केन्द्रीय मंत्री कुमारस्वामी ने चुनाव आयोग से कर्नाटक में अब तक किए गए इलेक्टोरल रोल के पूरे SIR को रद्द करने और नए SIR काम की निगरानी के लिए राज्य के बाहर से एक काबिल अधिकारी नियुक्त करने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया, “कर्नाटक में इलेक्टोरल रोल में बदलाव में बहुत ज्यादा गड़बड़ियाँ हो रही हैं। राज्य सरकार इसे आसान बनाने के लिए पूरे प्रशासनिक तंत्र का गलत इस्तेमाल कर रही है।

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि मौजूदा एसआईआर पर भरोसा नहीं बचा है। राज्य चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज करा दी है और भारत के चुनाव आयोग को भी शिकायत भेजी है। राज्य चुनाव अधिकारियों ने कहा है कि वे आयोग से मिले निर्देशों के अनुसार काम करेंगे। हमारी पार्टी की साफ माँग है कि अब तक किए गए एसआईआर को रद्द किया जाना चाहिए।

नेताओं ने चुनाव आयोग से शिकायत की

एनडीए का एक प्रतिनिधिमंडल कर्नाटक के मुख्य चुनाव आयुक्त से मिला और अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार पाए गए सभी अधिकारियों और राजनीतिक पदाधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की माँग की।

इस प्रतिनिधिमंडल में केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी, BJP के केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी और शोभा करंदलाजे, कर्नाटक विधानसभा और परिषद में विपक्ष के नेता आर. अशोक और चलावदी नारायणस्वामी शामिल थे। इनलोगों राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त अंबुकुमार से मुलाकात की और शिकायत सौंपी।

पत्र में नेताओं ने कर्नाटक में वोटर लिस्ट के वेरिफिकेशन यानी एसआईआर में भारी गड़बड़ियों पर चिंता जताई। इसमें कहा गया है कि SIR के लिए जाने वाले अधिकारी तय प्रक्रिया का बिल्कुल भी पालन नहीं कर रहे हैं, जिससे लोकतंत्र की मूल भावनाओं को नुकसान पहुँच रहा है।

नेताओं ने कहा कि SIR गाइडलाइंस के मुताबिक, डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर (DEO/DC) के निर्देशों पर बूथ लेवल ऑफिसर्स को घर-घर जाकर जरूरी वेरिफिकेशन करना होता है और हर घर के सदस्यों की पहचान की व्यक्तिगत रूप से पुष्टि करनी होती है। लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा नहीं हो रहा है। इसके सबूत सोशल मीडिया पर शेयर किए गए हैं और न्यूज चैनल्स ने भी इसे दिखाया है।

व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए भेज रहे मस्जिदों पर भीड़

NDA नेताओं ने आरोप लगाया कि कम्युनिटी हॉल, मस्जिदों और BLOs के घरों में बैठकर एन्यूमरेशन फॉर्म भरे जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए WhatsApp ग्रुप भी बनाए गए हैं और लोगों को SIR प्रक्रिया के लिए इन कम्युनिटी हॉल और मस्जिदों में जाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

बीजेपी का कहना है कि कॉन्ग्रेस अधिकारियों पर दबाव बना रही है और वोट शेयर बढ़ाने के लिए घुसपैठियों और अयोग्य लोगों को वोटर लिस्ट में शामिल करने की कोशिश में जुटी हुई है। ये लोग एक बार देश के वोटर बन गए, तो कॉन्ग्रेस का वोट बैंक भी बड़ा हो जाएगा। स्थानीय बीएलओ को ‘एक साथ काम खत्म’ करने का दबाव है। ये लोग मुस्लिमों का वोट शेयर बढ़ाना चाहते हैं, इसलिए मस्जिदों और दूसरी जगहों पर एक साथ नाम डाले जा रहे हैं। इससे एसआईआर का असली मकसद काफी पीछे रह गया है। लोगों को खास जगहों पर जमावड़ा किया जा रहा है।

इसको लेकर बीजेपी विधायक कृष्णाप्पा ने कहा, “कई जगहों पर शिकायतें आई हैं कि कुछ BLO और सरकारी अधिकारी मस्जिदों और खुली जगहों पर बहुत भीड़ जमा कर रहे हैं, खासकर माइनॉरिटी की भीड़… मुझे लगता है कि वे कॉन्ग्रेस पार्टी के कहने पर ऐसा कर रहे हैं। वे इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया के दिए गए निर्देशों के अनुसार काम नहीं कर रहे हैं… हर भारतीय नागरिक को वोट देने का हक होना चाहिए।”

BJP नेता के मुताबिक, बूथ लेवल ऑफिसर को हर बूथ में घर-घर जाकर घर के दरवाजे पर एक स्टिकर चिपकाना था, ताकि यह पक्का हो सके कि उन्होंने फॉर्म भर दिया है। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। गैर कानूनी तरह से देश में घुस आए घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने के बजाए उन्हें वोटिंग का अधिकार दिया जा रहा है। कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार इसके लिए बीएलओ पर दबाव बना रही है।

उन्होंने कहा, “हम नहीं चाहते कि एंटी-नेशनल, देश के बाहर के लोगों और गैर-कानूनी इमिग्रेंट्स को वोटिंग का अधिकार दिया जाए… मुझे लगता है कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार इन BLOs को उकसा रही है और उन पर दबाव डाल रही है कि वे अपना वोट शेयर बढ़ाने के लिए गैर-कानूनी इमिग्रेंट्स का एनरोलमेंट करें।”

एक अनुमान के मुताबिक, राज्य में कुल जनसंख्या का करीब 12-18 फीसदी मुस्लिम आबादी है। हाल ही सरकार ने जो सर्वे करवाई थी वह लीक हो गई। इसमें मुस्लिम आबादी करीब 12.87 फीसदी से लेकर 18 फीसदी तक होने का अनुमान है। लगातार तटीय क्षेत्रों और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या बढ़ रही है। इससे इन इलाकों में डेमोग्राफी बदलाव की आशंका जताई जा रही है। ये मुद्दा राज्य की सुरक्षा व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।

बेंगलुरु पुलिस की केंद्रीय अपराध शाखा और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी समय-समय पर अवैध बस्तियों, कचरा बीनने वाले क्षेत्रों और निर्माण स्थलों पर छापेमारी करती है। जाँच में सामने आया है कि कई घुसपैठियों ने स्थानीय दलालों की मदद से फर्जी आधार कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड बनवा लिए हैं। इसी वजह से चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि SIR के दौरान केवल आधार कार्ड देना पर्याप्त नहीं होगा, मतदाताओं को नागरिकता या निवास स्थापित करने के लिए अन्य 11 वैकल्पिक वैध दस्तावेजों में से साक्ष्य देने होंगे।

कर्नाटक सरकार ने बेंगलुरु के पास ‘नेलमंगला’ में एक डिटेंशन सेंटर स्थापित किया है। यहाँ अवैध रूप से रह रहे उन विदेशियों को रखा जाता है जिनकी पहचान हो चुकी है और जिनके निर्वासन की कानूनी प्रक्रिया संबंधित दूतावासों के साथ चल रही है। लेकिन इसमें काफी वक्त लगता है। बांग्लादेश अपने नागरिकों को ‘अपना’ कहने से इनकार करता है। रोहिंग्याओं को तो न ही बांग्लादेश और न ही म्यांमार ‘अपना’ मानता है। स्थिति यह है कि भारत के टुकड़ों पर पल रहे ये रोहिंग्या देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए काफी बड़ा खतरा बनते जा रहा है।

यही वजह है कि एनडीए नेता कर्नाटक कॉन्ग्रेस नेता और सरकार पर एसआईआर में गड़बड़ी को लेकर चुप्पी साधने पर सवाल खड़ी कर रही है। पूर्व सीएम कुमारस्वामी ने तो वीडियो सबूत देते हुए एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने राज्य प्रशासन पर वोटर लिस्ट में हेरफेर करने के लिए मशीनरी का ‘इस्तेमाल’ करने का आरोप लगाया और मौजूदा एसआईआर प्रक्रिया तुरंत खत्म करने की माँग की। उन्होंने यशवंतपुर और रामनगर समेत कई चुनाव क्षेत्रों में SIR की गाइडलाइंस का उल्लंघन करने पर हमला किया और कहा कि सीधे राजनीतिक असर में किया जा रहा है।

कुमारस्वामी ने इस मुद्दे पर चुप्पी को लेकर KPCC प्रेसिडेंट बीके हरिप्रसाद और होम मिनिस्टर प्रियांक खड़गे पर तीखा हमला किया। अपने घर पर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “बेचारे। मुझे नहीं पता कि KPCC प्रेसिडेंट कहाँ गायब हो गए हैं। इतनी सारी अफरा-तफरी के बावजूद, वह कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। वह लगभग हर मुद्दे पर, हर दिन कमेंट करते हैं। राज्य के होम मिनिस्टर भी लगभग हर चीज पर बयान देते हैं। क्या उन्हें SIR प्रोसेस में गड़बड़ियों के बारे में नहीं बोलना चाहिए? जो लोग सबको डिसिप्लिन और कंट्रोल के बारे में लेक्चर देते हैं, उन्हें इस बारे में भी जरूर कुछ कहना चाहिए।”

दरअसल चुनाव आयोग से एनडीए नेताओं की मुलाकात और एसआईआर पर सवाल के बाद पूरी प्रक्रिया को नए सिरे से काम करने की जरूरत है। इसकी निगरानी केंद्र करे, क्योंकि एसआईआर कराना लोकतंत्र के लिए काफी अहम है। क्योंकि गायब, मृत और स्थायी रूप से राज्य से बाहर जा चुके लोगों के नाम हटने ही चाहिए, लेकिन किसी भी हाल में घुसपैठियों और अयोग्य लोगों के हाथों में वोटर आईकार्ड न पहुँचे इसकी निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।

छत्तीसगढ़ में ‘लव जिहाद’ पर लगेगी लगाम, गैर-मुस्लिम से निकाह से पहले वक्फ बोर्ड से लेनी होगी परमिशन: मौलानाओं पर भी सख्ती, जानें- ऐसे नियम दूसरे राज्यों में क्यों जरूरी

छत्तीसगढ़ में निकाह की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और रिकॉर्ड आधारित बनाने की दिशा में बड़ा बदलाव किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड ने अंतरधार्मिक निकाह (Inter-religion) को लेकर नए नियम लागू करने की तैयारी की है, जिन्हें अगस्त 2026 से पूरे प्रदेश में लागू करने का प्रस्ताव है।

नई व्यवस्था के तहत यदि कोई मुस्लिम युवक या युवती किसी गैर-मुस्लिम से निकाह करना चाहता है, तो पहले वक्फ बोर्ड से अनुमति लेना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही निकाह कराने वाले सभी मौलानाओं का पंजीयन किया जाएगा और हर निकाह का रिकॉर्ड भी वक्फ बोर्ड के पास सुरक्षित रखा जाएगा।

बोर्ड का कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य निकाह प्रक्रिया को कानूनी रूप से अधिक पारदर्शी बनाना, फर्जी दस्तावेजों और लव जिहाद जैसे मामलों की निगरानी को प्रभावी बनाना है। बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था किसी मजहब विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि निकाह प्रक्रिया को एक समान और कानून के अनुरूप संचालित करने के लिए तैयार की गई है।

छत्तीसगढ़ की नई पहल क्या है, कैसे बदलेगी निकाह की पूरी प्रक्रिया?

छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड पहली बार निकाह की व्यवस्था को एक केंद्रीकृत और निर्धारित प्रक्रिया के तहत लाने जा रहा है। अभी तक कई स्थानों पर अलग-अलग तरीके से निकाह कराए जाते रहे हैं और उनका कोई साझा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होता था। नई व्यवस्था लागू होने के बाद अंतरधार्मिक निकाह के लिए वक्फ बोर्ड की पूर्व अनुमति अनिवार्य होगी।

यानी यदि कोई मुस्लिम युवक या युवती किसी गैर-मुस्लिम से निकाह करना चाहता है, तो पहले बोर्ड के सामने आवेदन देना होगा, इतना ही नहीं यदि निकाह दूसरे धर्म की लड़की से किया जाना है, तो उसके परिजनों की सहमति भी जरूरी होगी और आवश्यक दस्तावेज और कानून के तहत जरूरी औपचारिकताएँ पूरी करनी होंगी।

सभी दस्तावेजों और प्रक्रिया की जाँच के बाद ही अनुमति दी जाएगी। इसके बाद ही निकाह कराया जा सकेगा। बोर्ड का मानना है कि इससे पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड में रहेगी और भविष्य में किसी भी प्रकार का विवाद होने पर संबंधित जानकारी उपलब्ध रहेगी।

नई व्यवस्था में निकाह के बाद जारी होने वाला प्रमाणपत्र भी वक्फ बोर्ड के माध्यम से जारी किया जाएगा। साथ ही अभी अलग-अलग प्रारूप में तैयार होने वाले निकाहनामों की जगह पूरे प्रदेश में एक समान प्रारूप लागू किया जाएगा। इससे सभी निकाह एक ही व्यवस्था के तहत दर्ज होंगे और दस्तावेजों में एकरूपता आएगी।

क्या होंगे नए नियम और ‘लव जिहाद’ जैसे मामलों में कैसे काम करेगी यह व्यवस्था?

वक्फ बोर्ड ने अंतरधार्मिक निकाह के लिए अलग प्रक्रिया तय करने का फैसला किया है। यदि मुस्लिम युवक या युवती किसी गैर-मुस्लिम से निकाह करना चाहते हैं, तो केवल आवेदन देना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि दोनों पक्षों की पहचान, प्रस्तुत किए गए दस्तावेज और सभी कानूनी औपचारिकताओं की विस्तार से जाँच भी की जाएगी।

यदि किसी मामले में धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव रखा गया, तो उससे संबंधित कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। बोर्ड की ओर से सभी औपचारिकताओं की पुष्टि होने और आवश्यक अनुमति मिलने के बाद ही निकाह संपन्न कराया जा सकेगा।

बोर्ड का कहना है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य लव जिहाद, फर्जी निकाह, धर्म और पहचान छिपाकर निकाह करने और दस्तावेजों में गड़बड़ी जैसे मामलों पर रोक लगाने में मदद करना है। जब प्रत्येक अंतरधार्मिक निकाह निर्धारित प्रक्रिया के तहत होगा और उसका पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा, तब ऐसे मामलों की निगरानी और जाँच पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित तरीके से की जा सकेगी।

मौलानाओं के लिए होंगे नए नियम, बिना अनुमति निकाह कराने पर होगी कार्रवाई

नई व्यवस्था केवल निकाह करने वाले जोड़ों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि निकाह पढ़ाने वाले मौलानाओं के लिए भी नए नियम लागू किए जाएँगे। प्रदेश में निकाह कराने वाले सभी मौलानाओं का वक्फ बोर्ड में पंजीयन कराया जाएगा। पंजीयन के बाद केवल वही मौलाना निकाह संपन्न करा सकेंगे जिनका नाम बोर्ड के रिकॉर्ड में दर्ज होगा।

यदि कोई मौलाना निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना या आवश्यक अनुमति के बिना अंतरधार्मिक निकाह कराता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। बोर्ड का मानना है कि इससे निकाह कराने वालों की जवाबदेही तय होगी और बिना रिकॉर्ड या नियमों के निकाह कराने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।

बोर्ड का यह भी कहना है कि पंजीकृत मौलानाओं की व्यवस्था लागू होने के बाद फर्जी पहचान या दस्तावेज छिपाकर कराए जाने वाले निकाह के मामलों पर प्रभावी निगरानी रखी जा सकेगी। इससे पूरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनेगी।

हर निकाह का रिकॉर्ड रहेगा सुरक्षित, जनजातीय इलाकों पर रहेगा विशेष फोकस

छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष सलीम राज के अनुसार, वर्तमान में कई स्थानों पर बिना किसी केंद्रीय रिकॉर्ड के निकाह कराए जाते हैं। इसके कारण बाद में पहचान, वैवाहिक स्थिति और अन्य सरकारी दस्तावेजों से जुड़े विवाद सामने आते हैं।

नई व्यवस्था में प्रत्येक निकाह का पूरा रिकॉर्ड वक्फ बोर्ड के पास सुरक्षित रखा जाएगा, ताकि भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर उसकी जाँच की जा सके और प्रमाणित जानकारी उपलब्ध रहे। बोर्ड ने यह भी बताया है कि जनजातीय क्षेत्रों से महिलाओं को बहला-फुसलाकर विवाह करने तथा बाद में संपत्ति हड़पने से जुड़े कुछ मामलों की शिकायतें मिली हैं।

इन्हीं शिकायतों को ध्यान में रखते हुए ऐसे मामलों की निगरानी बढ़ाने का निर्णय लिया गया है। सभी निकाह का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने से भविष्य में किसी भी विवाद की स्थिति में जाँच करना आसान होगा और संबंधित जानकारी तत्काल उपलब्ध कराई जा सकेगी।

वक्फ बोर्ड का कहना है कि अंतरधार्मिक निकाह करने वाले जोड़ों को संबंधित कानूनों का पालन करते हुए आवश्यक अनुमति और निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

बोर्ड का मानना है कि एक समान नियम, प्रमाणित रिकॉर्ड, दस्तावेजों की जाँच और पंजीकृत मौलानाओं की व्यवस्था से निकाह प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, व्यवस्थित और कानूनी रूप से मजबूत बन सकेगी और लव जिहाद के मामलों को रोकने में भी मदद मिलेगी।

भारत के प्रणेता, प्रखर राष्ट्रवादी और महान शिक्षाविद्… डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर पढ़ें PM मोदी का खास लेख, कहा- उनके बलिदान से प्रेरित होती है हर पीढ़ी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर राष्ट्रनिर्माण में उनके योगदान को याद करते हुए एक आलेख लिखा है। आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और माँ भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं।

श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहाँ उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना।

उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे।

इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी।

डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे।

शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, “शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’

कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान में रिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।

उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कॉन्ग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न ‘दीपक’ यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे।

उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।

यहाँ मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूँ। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।

भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है।

उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।

75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कॉन्ग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।

डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटर शुरू किए गए।

एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया।

कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’

आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उसभारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएँगे।

क्या है आइसोब्यूटेनॉल जो 15% डीजल में मिलाने की तैयारी, E20 पर चल रहे विवाद के बीच शुरू हुई चर्चा: जानिए सबकुछ

पेट्रोल के अंदर E20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का काम तो पूरे देश में लागू हो चुका है और अब लोग धीरे-धीरे इस बदलाव के आदी भी हो रहे हैं। लेकिन अभी लोगों के मन से एथेनॉल को लेकर सवाल पूरी तरह निकले भी नहीं थे कि सरकार ने डीजल को लेकर भी एक बड़ा प्लान तैयार कर लिया है। इस बार सीधे एथेनॉल नहीं, बल्कि एक बिल्कुल नया केमिकल आइसोब्यूटेनॉल (Isobutanol) इस्तेमाल होने जा रहा है।

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने 04 जुलाई 2026 में भारत की पहली फ्लेक्स-फ्यूल पैसेंजर कार के लॉन्च के मौके पर यह बड़ा ऐलान किया। इस कार्यक्रम में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी भी मौजूद थे। गडकरी ने बताया कि एथेनॉल को सीधे डीजल के साथ नहीं मिलाया जा सकता इसीलिए सरकार अब एथेनॉल से आइसोब्यूटेनॉल बनाने की तकनीक पर काम कर रही है, ताकि इसे डीजल में मिलाकर इस्तेमाल किया जा सके। उनके मुताबिक डीजल में 15 प्रतिशत तक आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की योजना पर काम चल रहा है।

नितिन गडकरी ने बताया कि किर्लोस्कर ऑयल इंजिन्स लिमिटेड (KOEL) के साथ मिलकर 100 प्रतिशत आइसोब्यूटेनॉल और एथेनॉल पर चलने वाले जनरेटर सेट का सफल परीक्षण किया जा चुका है।

दरअसल गडकरी ने पुणे में KOEL द्वारा विकसित इस अत्याधुनिक इंजन तकनीक का खुद अनावरण किया और कंपनी के मुताबिक यह जेनसेट यानी जनरेटर के लिए दुनिया की अपनी तरह की पहली तकनीक है, जिसका मूल्यांकन ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी ARAI ने किया है। यानी यह टेस्ट किसी निजी दावे पर नहीं, बल्कि सरकार की अपनी मान्यता प्राप्त संस्था की जाँच पर आधारित है। हालाँकि गडकरी ने यह भी साफ किया कि इसे व्यावसायिक रूप से बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए अभी सरकार की अंतिम मंजूरी मिलनी बाकी है।

सरकार की इस घोषणा के बाद फिर एक बार आम जनता के मन में सवाल खड़े हो गए हैं। जो जनता अभी एथेनॉल को लेकर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई थी, उसके सामने अब एक नया शब्द आ गया है- आइसोब्यूटेनॉल। तो आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर आइसोब्यूटेनॉल होता क्या है, क्या यह आपके वाहन के लिए सुरक्षित है और सबसे बड़ा सवाल- जब देश में पहले से इतनी सारी फैक्ट्रियों में एथेनॉल तैयार किया जा रहा है तो डीजल के लिए सरकार एक अलग विकल्प क्यों लेकर आई है?

क्या है आइसोब्यूटेनॉल?

तो चलिए सबसे पहले समझते हैं कि आइसोब्यूटेनॉल है क्या? आइसोब्यूटेनॉल भी एथेनॉल की तरह ही एक एल्कोहॉल बेस्ड बायोफ्यूल (Alcohol Based Biofuel) है और इसे भी उन्हीं फसलों से बनाया जाता है जिनसे एथेनॉल बनता है, जैसे गन्ना, मक्का और चावल की पराली। दोनों में फर्क सिर्फ इतना है कि एथेनॉल को एक और स्टेप से गुजार कर आइसोब्यूटेनॉल में बदला जाता है, ताकि इसकी केमिकल बनावट डीजल के साथ मिलने लायक बन सके।

यानी सीधे शब्दों में कहें तो आइसोब्यूटेनॉल, एथेनॉल का ही एक अपग्रेडेड वर्जन है, जो डीजल के लिए ज़्यादा माफिक बैठता है। इसका केमिकल नाम C4H10O यानी 2-methyl-1 propanol है। यह बिना रंग का एक लिक्विड है जिसमें हल्की एल्कोहॉल जैसी गंध होती है और यह ब्यूटेनॉल के चार स्ट्रक्चरल रूपों में से एक है।

एथेनॉल से बेहतर क्यों है आइसोब्यूटेनॉल?

अब बात करते हैं कि यह एथेनॉल से बेहतर क्यों माना जा रहा है। सबसे पहली वजह है इसकी एनर्जी डेंसिटी, यानी यह प्रति किलोग्राम कितनी ऊर्जा देता है। आइसोब्यूटेनॉल की एनर्जी डेंसिटी करीब 36 मेगाजूल (MJ) प्रति किलोग्राम होती है, जबकि एथेनॉल की सिर्फ 26.8 MJ प्रति किलोग्राम। यानी बराबर मात्रा में इस्तेमाल करने पर यह एथेनॉल से कहीं ज्यादा ताकत देता है, जिससे गाड़ी की माइलेज पर भी असर कम पड़ता है।

दूसरी बड़ी वजह है इसकी वॉटर सॉल्युबिलिटी यानी पानी सोखेन की क्षमता का कम होना। एथेनॉल हवा में मौजूद नमी को आसानी से खींच लेता है और पानी के साथ पूरी तरह घुल जाता है, जिससे फ्यूल टैंक और पाइपलाइन में जंग लगने का खतरा रहता है। आइसोब्यूटेनॉल में यह खतरा काफी कम होता है, इसलिए इसे मौजूदा फ्यूल इंफ्रास्ट्रक्चर में बिना किसी बदलाव के इस्तेमाल किया जा सकता है।

एक दिलचस्प बात यह भी है कि यह टेक्नोलॉजी भारत के लिए बिल्कुल नई नहीं है। अमेरिका में तो साल 2010 में ही वहाँ की एनवायरमेंट एजेंसी EPA ने आइसोब्यूटेनॉल को पेट्रोल में 16 प्रतिशत तक मिलाने की मंजूरी दे दी थी, वो भी बिना गाड़ियों के इंजन में कोई मॉडिफिकेशन किए। वहाँ की कई बड़ी कंपनियाँ जैसे Gevo, BP और DuPont की साझा कंपनी Butamax सालों से इस ईंधन पर काम कर रही हैं। यानी दुनिया के कई देशों में यह प्रयोग पहले ही हो चुका है और कामयाब भी रहा है और अब भारत इसे डीजल के लिए अपनाने की तैयारी में है।

एक और अहम बात यह है कि आइसोब्यूटेनॉल सिर्फ गाड़ियों के लिए ही नहीं, बल्कि यह पहले से एक इंडस्ट्रियल सॉल्वेंट के तौर पर पेंट और स्याही जैसी चीजों को बनाने में भी इस्तेमाल होता आया है। आगे चलकर इसका इस्तेमाल जेट फ्यूल और क्लीन गैसोलीन यानी साफ-सुथरे पेट्रोल में भी किया जा सकता है। यही खूबियाँ हैं जिनकी वजह से इसे सेकेंड जेनरेशन बायोफ्यूल माना जा रहा है।

डीजल में एथेनॉल क्यों नहीं मिलाया जा सकता?

अब सबसे जरूरी सवाल पर आते हैं। जब पेट्रोल में एथेनॉल इतनी आसानी से मिल गया, तो आखिर डीजल में एथेनॉल क्यों नहीं मिलाया जा रहा? दरअसल इसकी शुरुआत एक असफल कोशिश से हुई थी। साल 2025 में खुद नितिन गडकरी ने बताया था कि डीजल में 10 प्रतिशत तक एथेनॉल मिलाने के प्रयास किए गए थे, लेकिन इसके नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आए, जिसके बाद सरकार को दूसरे विकल्प तलाशने पड़े।

इसकी सबसे बड़ी वजह है दोनों ईंधन की केमिकल बनावट का अलग होना। एथेनॉल पानी के साथ पूरी तरह घुल जाता है, जबकि डीजल में यह गुण नहीं होता। इसी वजह से जब एथेनॉल को डीजल में मिलाया गया, तो दोनों अलग-अलग तापमान पर आपस में अलग होने लगे, जिसे फेज सेपरेशन कहा जाता है। यानी टंकी में डीजल और एथेनॉल एक साथ मिलकर टिक ही नहीं पाते, बल्कि कुछ समय बाद अलग परतों में बँट जाते हैं।

दूसरी बड़ी दिक्कत है सीटेन नंबर की। डीजल इंजन को ठीक तरह से चलने के लिए 45 से 55 के बीच सीटेन नंबर वाला ईंधन चाहिए होता है। सीटेन नंबर जितना ज्यादा होगा, ईंधन उतनी ही जल्दी और अच्छे से जलेगा। जब डीजल में एथेनॉल मिलाया गया, तो इससे सीटेन नंबर तेजी से नीचे गिर गया। इसका सीधा असर यह हुआ कि इंजन में इग्निशन यानी ईंधन जलने की प्रक्रिया देर से शुरू हुई, दहन अधूरा रहा, गाड़ी की पावर कम हो गई और इंजन में तेज आवाज यानी नॉकिंग की समस्या भी सामने आई।

तीसरी बड़ी वजह सुरक्षा से जुड़ी है। एथेनॉल का फ्लैश पॉइंट यानी वह तापमान जिस पर कोई तरल पदार्थ आग पकड़ सकता है, बहुत कम होता है। इसका मतलब है कि एथेनॉल डीजल के मुकाबले कहीं ज़्यादा जल्दी आग पकड़ सकता है, यानी यह ज़्यादा ज्वलनशील होता है। इस वजह से इसे स्टोर करना और डीजल के साथ ब्लेंड करना असुरक्षित और अस्थिर माना गया।

इन सभी तकनीकी दिक्कतों को देखते हुए, आखिरकार ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी ARAI को डीजल में 5 प्रतिशत से ज़्यादा एथेनॉल मिलाने का प्रयोग बीच में ही रोकना पड़ा। यही वह मोड़ था जहाँ से सरकार ने एथेनॉल की जगह उसी से बनने वाले आइसोब्यूटेनॉल की तरफ रुख किया, क्योंकि इसकी मॉलिक्यूलर बनावट डीजल के साथ इन सभी दिक्कतों को दूर करती है।

डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने के फायदे?

इतना ही नहीं डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने के फायदे भी बहुत हैं। सबसे पहला और सबसे बड़ा फायदा है क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी। वैसे भी भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा ते बाहर से मँगाता है और डीजल की खपत पेट्रोल के मुकाबले लगभग दोगुनी है। ऐसे में अगर डीजल में 15 प्रतिशत आइसोब्यूटेनॉल मिल जाए, तो इसका असर पेट्रोल में हुई E20 ब्लेंडिंग से भी कहीं बड़ा हो सकता है, क्योंकि यह विदेशी मुद्रा की भारी बचत करेगा और देश को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाएगा।

दूसरा फायदा सीधे किसानों को होगा। चूँकि आइसोब्यूटेनॉल भी उन्हीं फसलों जैसे गन्ना और मक्का से बनता है जिनसे एथेनॉल बनता है, इसलिए इन फसलों की माँग बढ़ेगी, जिससे किसानों को उनकी उपज की बेहतर कीमत मिल सकेगी। यही वजह है कि सरकार किसानों को अन्नदाता से ऊर्जादाता बनाने की बात कहती रही है। तीसरा फायदा पर्यावरण से जुड़ा है, क्योंकि आइसोब्यूटेनॉल पारंपरिक डीजल के मुकाबले कम प्रदूषण फैलाता है, जिससे उत्सर्जन यानी एमिशन में कमी आएगी।