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हैशटैग लगाओ, दुनिया बदलो… कितना आसान है न? क्या सोशल मीडिया लोकतंत्र को बर्बाद कर रहा है?

सदियों से इंसान एक ही खूबसूरत लेकिन शायद असंभव सपने के पीछे भागता आया है, एक ऐसे समाज का सपना, जहाँ सब कुछ आदर्श हो। प्राचीन दार्शनिकों की कल्पनाओं से लेकर प्रबुद्धता काल के बड़े-बड़े विचारों और बीसवीं सदी के खतरनाक सामाजिक प्रयोगों तक, इंसान बार-बार इस भ्रम में पड़ता रहा है कि समाज से हर तरह का तनाव, संघर्ष और दुख हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है।

आज इसी पुराने सपने को डिजिटल दुनिया ने एक नया ठिकाना दे दिया है।

सोशल मीडिया और उससे जुड़े डिजिटल एक्टिविस्ट सिर्फ दुनिया की कमियाँ नहीं गिनाते। कई बार वे एक ऐसी दुनिया का सपना भी बेचते हैं, जहाँ सब कुछ बिल्कुल सही हो, पूरी तरह न्याय हो, हर किसी के साथ बराबरी हो और हर व्यक्ति नैतिक रूप से सही हो।

लेकिन समस्या ये है कि ऐसी पूर्ण दुनिया कोई भी सरकार नहीं बना सकती। चाहे सरकार कितनी भी अमीर हो, कितनी भी सक्षम हो या कितनी भी दूरदर्शी क्यों न हो। यही आधुनिक Perfectionism यानी पूर्णतावाद असल में खतरनाक हो सकता है। क्योंकि ये धीरे-धीरे लोकतंत्र की नींव को ही कमजोर कर सकता है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि इंसान परफेक्ट नहीं है। इसलिए लोकतंत्र ऐसा सिस्टम है जो लोगों के मतभेदों और कमियों के बावजूद उन्हें साथ लेकर चलने की कोशिश करता है। ये कोई परफेक्ट या तेज़ सिस्टम नहीं है। बल्कि ये जानबूझकर ऐसा बनाया गया है कि बड़े से बड़ा मतभेद भी गृहयुद्ध में न बदले।

लेकिन जब सोशल मीडिया लोगों को ये उम्मीद दिलाने लगे कि हर नीति बिल्कुल सही होनी चाहिए, हर संस्था पूरी तरह ईमानदार होनी चाहिए और हर समस्या का तुरंत समाधान हो जाना चाहिए, तब लोकतंत्र की सामान्य कमियाँ भी लोगों को असहनीय लगने लगती हैं।

फिर सरकार की कोई गलती सिर्फ एक गलती नहीं रह जाती। उसे पूरे सिस्टम के भ्रष्ट होने का सबूत मान लिया जाता है। और फिर मांग उठती है कि पूरे सिस्टम को ही जड़ से बदल दिया जाए। यानी जिस शासन व्यवस्था को इंसान की कमियों और मतभेदों को संभालने के लिए बनाया गया था, उसी के खिलाफ़ अब एक ऐसी ‘पूर्णता’ की उम्मीद को हथियार बनाया जा रहा है, जिसे हासिल करना असल में संभव ही नहीं है।

आज के डिजिटल दौर के इस खतरे को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाकर इतिहास को देखना होगा। हमें समझना होगा कि समय-समय पर बड़ी-बड़ी आदर्शवादी कल्पनाएँ कैसे टूटती रही हैं, पश्चिमी और यूरोपीय सभ्यताओं में बार-बार कौन-सी कमजोरियाँ सामने आती रही हैं, और सबसे जरूरी बात- आज के सोशल मीडिया का पूरा ढांचा किस तरह लोकतंत्र के लिए एक नए तरह का संकट पैदा कर रहा है।

भ्रम की कहानी: काल्पनिक आदर्श समाज बार-बार क्यों असफल हुए?

‘यूटोपिया’ शब्द 1516 में सर थॉमस मोर ने बनाया था। यह ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना था- ‘अच्छी जगह’ और ‘ऐसी जगह जो कहीं है ही नहीं’। यानी मोर अपने समय में ही समझ गए थे कि एक बिल्कुल परफेक्ट समाज, असल में, शायद सिर्फ कल्पना में ही हो सकता है।

लेकिन इसके बावजूद इंसान ने सदियों तक इस कल्पना को हकीकत बनाने की कोशिश की। और जब-जब ऐसा करने की कोशिश हुई, नतीजे अक्सर बेहद विनाशकारी रहे।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमें अठारहवीं सदी के आखिर में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान देखने को मिलता है। क्रांतिकारी इस विचार से प्रभावित थे कि अगर समाज की पुरानी व्यवस्थाओं को पूरी तरह बदल दिया जाए, तो इंसान और उसका स्वभाव भी बदला जा सकता है। इसलिए उन्होंने सदियों पुरानी परंपराओं, धर्म और संस्थाओं को तेजी से खत्म करने की कोशिश की।

शुरुआत में नारा था- स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व। लेकिन कुछ ही समय में यही क्रांति ‘आतंक के शासन’ में बदल गई। रोबेस्पिएर और उसके साथियों का मानना था कि एक आदर्श गणराज्य बनाने के लिए ‘सद्गुण’ के साथ ‘आतंक’ का इस्तेमाल भी जरूरी है। समस्या यही थी, जब आप एक ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जहाँ कोई भ्रष्टाचार या असहमति हो ही नहीं, तो जो भी आपके आदर्श से असहमत होगा, वह आपको दुश्मन नजर आने लगेगा।

और फिर वही हुआ। जिस क्रांति ने एक बेहतर समाज का सपना दिखाया था, उसी ने अपने ही लोगों को गिलोटिन पर चढ़ाना शुरू कर दिया।

यही वह बात थी जिसकी ओर ब्रिटिश विचारक एडमंड बर्क ने इशारा किया था, जब इंसान खुद को ईश्वर की तरह समाज को पूरी तरह गढ़ने वाला समझने लगता है, तो उसके फैसले कई बार राक्षसी रूप ले लेते हैं। उन्नीसवीं सदी में भी ऐसे आदर्श समाज बनाने की कोशिशें जारी रहीं। हालांकि इस बार उनका रूप थोड़ा नरम था।

ब्रिटेन और अमेरिका में रॉबर्ट ओवेन और फ्रांस में चार्ल्स फूरियर जैसे विचारकों ने औद्योगिक क्रांति से पैदा हुई गरीबी और असमानता का समाधान एक नए तरह के समाज में खोजने की कोशिश की। उन्होंने ऐसे समुदाय बनाने की कोशिश की जहाँ प्रतिस्पर्धा, लालच और सामाजिक ऊँच-नीच को खत्म किया जा सके।

रॉबर्ट ओवेन ने अमेरिका के इंडियाना में न्यू हार्मनी नाम की एक ऐसी ही सामुदायिक व्यवस्था बनाई। लेकिन कुछ ही सालों में वह टूट गई। आपसी वैचारिक मतभेद, खराब प्रबंधन और सबसे बड़ी बात, इंसानी स्वभाव का किसी तय खांचे में फिट न होना; इसके पीछे बड़ी वजहें थीं।

चार्ल्स फूरियर ने भी ऐसे सहकारी समुदायों की कल्पना की थी जिन्हें उन्होंने ‘फैलनस्टेरी’ कहा। उनका मानना था कि अगर समाज को सही तरीके से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो काम भी इंसान के लिए आनंद का अनुभव बन सकता है। लेकिन ये प्रयोग भी बड़े स्तर पर सफल नहीं हो सके।

इन सभी उदाहरणों में एक बात कॉमन थी। इन विचारों में इंसान को एक जटिल और स्वतंत्र प्राणी मानने के बजाय ऐसी चीज़ समझ लिया गया जिसे किसी भी मनचाहे साँचे में ढाला जा सकता है। और जब असली दुनिया उस कल्पना के मुताबिक नहीं चलती, तो समस्या विचार में नहीं, इंसानों में खोजी जाती है।

फिर दबाव बढ़ाया जाता है। नियम और सख्त किए जाते हैं। विरोध को दबाया जाता है। और आखिरकार आदर्श समाज बनाने की कोशिश, लोगों को मजबूर करने की कोशिश बन जाती है।

बीसवीं सदी में यह प्रवृत्ति अपने सबसे खतरनाक रूप में दिखाई दी। यूरोप के अधिनायकवादी शासन, खासकर सोवियत साम्यवाद और नाज़ीवाद, दोनों ने समाज को एक बिल्कुल नए आदर्श के मुताबिक ढालने का दावा किया।

मार्क्सवाद-लेनिनवाद ने एक ऐसे वर्गहीन और अंततः राज्यहीन समाज का सपना दिखाया जिसमें पुराने ‘बुर्जुआ’ ढाँचे का पूरी तरह अंत हो जाएगा। लेकिन इस सपने को लागू करने की कोशिशों में जबरन सामूहिकीकरण, अकाल, गुलाग और राजनीतिक सफाए जैसी भयावह घटनाएँ हुईं, जिनमें करोड़ों लोगों की जान गई।

दूसरी तरफ नाज़ीवाद ने नस्ल और राष्ट्र के पुनरुत्थान का सपना दिखाया। उसका अंत होलोकॉस्ट के औद्योगिक पैमाने पर किए गए नरसंहार और पूरे यूरोप को तबाह करने वाले युद्ध में हुआ। इतिहास से एक बात बहुत साफ दिखाई देती है- जब कोई समाज पूर्णता हासिल करने के नाम पर इंसानी स्वभाव और उसकी सीमाओं को नज़रअंदाज़ करता है, तो वह अक्सर सुधार के बजाय विनाश की तरफ बढ़ने लगता है।

ये आदर्शवादी प्रयोग सिर्फ संयोग से असफल नहीं हुए। उनके भीतर ही एक बुनियादी समस्या थी, उन्होंने इंसान को वैसा स्वीकार नहीं किया जैसा वह वास्तव में है। इंसान जटिल है। उसमें स्वार्थ भी है और परोपकार भी, अच्छाई भी है और बुराई भी, तर्क भी है और भावनाएँ भी। और शायद इसी वजह से एक परफेक्ट समाज बनाने की कोशिश, बार-बार एक ही गलती करती है, वह इंसान को बदलने से पहले इंसान को समझना भूल जाती है।

यूरोप का अनुभव: उत्थान, पतन और हमेशा टिके रहने का भ्रम

अगर हम यूरोप के इतिहास को देखें, तो आधुनिक ‘आदर्श समाज’ की कल्पनाओं को लेकर सावधान रहने की वजह और साफ दिखाई देती है। यूरोपीय सभ्यता का इतिहास लंबे समय से एक जैसे चक्रों से गुजरता रहा है, बड़े सपने, बड़ी महत्वाकांक्षाएँ, ताकत और विस्तार… और फिर किसी न किसी मोड़ पर भारी गिरावट।

रोमन साम्राज्य हो, पवित्र रोमन साम्राज्य, पुनर्जागरण के दौर के अलग-अलग यूरोपीय राजतंत्र या उन्नीसवीं सदी की साम्राज्यवादी ताकतें, इन सभी को कभी न कभी लगा कि उनकी व्यवस्था लंबे समय तक चलती रहेगी।

लेकिन इतिहास ने बार-बार दिखाया कि कोई भी व्यवस्था हमेशा के लिए नहीं चलती। संस्थाएँ कितनी भी मजबूत और विकसित क्यों न हों, बाहरी संकट, अंदर का भ्रष्टाचार और जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास धीरे-धीरे उन्हें कमजोर कर सकते हैं। बीसवीं सदी में यूरोप ने इसका सबसे भयानक उदाहरण देखा। दो विश्व युद्धों ने यूरोप को बुरी तरह तबाह कर दिया और दुनिया में उसकी पुरानी ताकत और पकड़ लगभग खत्म हो गई। जिस यूरोप को अपनी तकनीकी और सभ्यतागत श्रेष्ठता पर बहुत भरोसा था, वही यूरोप अनजाने में ऐसी तबाही की तरफ बढ़ गया जिसकी कीमत करोड़ों लोगों ने चुकाई।

लेकिन 1945 के बाद यूरोप ने फिर खुद को खड़ा किया। युद्ध के खंडहरों से एक नई व्यवस्था निकली; कल्याणकारी राज्य, मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएँ और बाद में यूरोपीय संघ जैसी व्यवस्थाएँ।

यह मॉडल पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण बन गया। विचार ये था कि पूंजीवाद से पैदा होने वाली असमानताओं और समस्याओं को सामाजिक सुरक्षा के जरिए कम किया जाए और साथ ही फासीवाद और साम्यवाद जैसी चरम विचारधाराओं को दोबारा मजबूत होने से रोका जाए।

लेकिन आज यूरोप और बड़े पैमाने पर पश्चिमी लोकतांत्रिक दुनिया फिर से कई तरह के दबावों का सामना कर रही है।

अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार, घटती आबादी, यूरोपीय एकीकरण को लेकर मतभेद और अपनी सभ्यता को लेकर बढ़ता आत्मविश्वास का संकट, इन सबने युद्ध के बाद बनी उस व्यवस्था को फिर सवालों के घेरे में ला दिया है।

यहीं से एक पुराना विचार फिर सुनाई देने लगता है कि यूरोपीय समाज धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ता है।

लेकिन पतन का मतलब हमेशा कोई अचानक आने वाली हॉलीवुड फिल्म जैसी तबाही नहीं होता।

कई बार सभ्यताएँ धीरे-धीरे कमजोर होती हैं। उनका सामाजिक मेल-जोल कम होने लगता है, लोग अलग-अलग वैचारिक खेमों में बंटने लगते हैं और वे साझा कहानियाँ और मूल्य कमजोर पड़ने लगते हैं जो कभी पूरे समाज को एक साथ जोड़ते थे।

आज इन मुश्किलों का सामना करने के लिए व्यावहारिक और धीरे-धीरे होने वाले सुधारों की जरूरत है।

लेकिन इसके बजाय सार्वजनिक बहस में डिजिटल आदर्शवाद का असर बढ़ता जा रहा है।

सोशल मीडिया पर जटिल समस्याओं के आसान समाधान पेश किए जाते हैं।

खरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था हो, अलग-अलग विचारों और पहचानों वाला समाज हो या कोई गहरा सामाजिक संकट; इन सबका समाधान कभी-कभी ऐसे बताया जाता है मानो बस कुछ लोगों को ‘गलत’ घोषित कर दो, सही हैशटैग चला दो या अपनी संस्थाओं की नैतिकता पर लगातार सवाल उठाते रहो… और फिर समाज अपने आप एक आदर्श स्थिति में पहुँच जाएगा।

यानी असली दुनिया की जटिल समस्याओं के लिए भी डिजिटल दुनिया एक बेहद सरल जवाब देती है, सही लोगों को दोष दो, सही नारा लगाओ और मान लो कि समस्या हल हो गई।

सोशल मीडिया और नया यूटोपियनवाद

पहले के दौर में जब लोग एक आदर्श समाज बनाने का सपना देखते थे, तो उसके पीछे कोई बड़ा नेता, कोई क्रांतिकारी संगठन या कोई राजनीतिक आंदोलन होता था।

आज ऐसा नहीं है।

आज का नया यूटोपियनवाद सिलिकॉन वैली के सर्वर और सोशल मीडिया के एल्गोरिदम से चलता है और दुनिया भर में फैले डिजिटल एक्टिविस्टों के नेटवर्क के जरिए फैलता है।

सोशल मीडिया का पूरा ढांचा लोकतांत्रिक व्यवस्था के उस तरीके से काफी अलग है, जिसमें धीरे-धीरे बातचीत, समझौते और सहमति से फैसले लिए जाते हैं।

सोशल मीडिया कंपनियों का कारोबार इस बात पर टिका है कि लोग ज्यादा से ज्यादा समय प्लेटफॉर्म पर बिताएँ और ज्यादा से ज्यादा प्रतिक्रिया दें। और लोगों को सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया किस चीज़ पर होती है? भावनाओं पर; खासकर गुस्से, नैतिक आक्रोश और किसी मुद्दे पर सामूहिक रूप से भड़कने पर।

इसलिए सोशल मीडिया पर राजनीति भी धीरे-धीरे सरल और ज्यादा आक्रामक होती चली गई है।

जटिल नीतिगत बहसों को अक्सर ‘अच्छाई बनाम बुराई’ की लड़ाई में बदल दिया जाता है। आपको बस ये तय करना होता है कि कौन सही है और कौन गलत।

बीच की कोई जगह नहीं।

इसी माहौल में डिजिटल एक्टिविस्ट खुद को नैतिकता के नए पहरेदार की तरह पेश करने लगते हैं।

वे समाज से ऐसी वैचारिक और नैतिक पूर्णता की उम्मीद करने लगते हैं, जिसे कोई इंसान तो क्या, कोई सरकार भी कभी पूरी तरह हासिल नहीं कर सकती।

X, TikTok और Instagram जैसे प्लेटफॉर्मों पर अक्सर ऐसी मांगें तेजी से फैलती हैं जो बेहद कठोर और चरम (बोलचाल की भाषा में इसे ‘एक्ट्रिमिस्ट’ कहा जाने लगा है) होती हैं।

बारीकियों और संदर्भ की कोई खास जगह नहीं बचती। अगर आप थोड़ा संतुलित रुख अपनाते हैं, तो आपको गलत व्यवस्था का समर्थक मान लिया जाता है। अगर आप समझौता करते हैं, तो आपको अपने ही विचारों से विश्वासघात करने वाला बता दिया जाता है।

अब जरा सोचिए कि इसका असर सरकार और नीतियों पर कैसे पड़ता है।

एक लोकतांत्रिक सरकार के लिए कानून बनाना कोई आसान काम नहीं है। सरकार को अलग-अलग लोगों और समूहों के हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। बजट सीमित होता है, संसाधन सीमित होते हैं और हर फैसले के कुछ फायदे तो कुछ नुकसान होते हैं।

मान लीजिए सरकार को परिवहन व्यवस्था सुधारनी है, स्वास्थ्य सेवा बेहतर करनी है या प्रवासन की समस्या संभालनी है। उसे कई अलग-अलग हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ेगा। और कई बार उसे ऐसी कमियाँ भी स्वीकार करनी पड़ेंगी जिन्हें तुरंत दूर करना संभव नहीं है।

लेकिन सोशल मीडिया की राजनीति इस पूरी प्रक्रिया को ‘पूर्णता’ के पैमाने पर परखती है।

कोई कानून पूरी तरह आदर्श नहीं है, तो वह भ्रष्टाचार का सबूत है।

किसी सरकारी संस्था में कमी है, तो मान लिया जाता है कि यह जानबूझकर की गई गड़बड़ी है।

किसी नीति में समझौता हुआ है, तो उसे कमजोरी या विश्वासघात समझ लिया जाता है।

और यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर है।

डिजिटल एक्टिविस्टों को सरकार चलाने की जिम्मेदारी नहीं उठानी पड़ती। उन्हें देश का बजट संतुलित नहीं करना होता, सीमाओं की सुरक्षा नहीं करनी होती, दूसरी सरकारों से बातचीत नहीं करनी होती और न ही हर दिन ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जिनमें किसी न किसी पक्ष को निराश होना ही है।

इसलिए वे वैचारिक रूप से पूरी तरह ‘शुद्ध’ रहने का दावा कर सकते हैं।

यहीं से समस्या शुरू होती है।

जब लोगों को इंटरनेट पर हर मुद्दे का एकदम साफ, नैतिक और आदर्श जवाब दिखाई देता है, तो लोकतंत्र की असली प्रक्रिया, जो धीमी है, उलझी हुई है और जिसमें लगातार समझौते करने पड़ते हैं, बहुत निराशाजनक लगने लगती है।

और यही अंतर धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।

इंटरनेट हमें जिस दुनिया की उम्मीद दिखाता है और राजनीति जिस दुनिया में वास्तव में काम करती है, उनके बीच की दूरी जितनी बढ़ती जाती है, लोकतंत्र पर लोगों का भरोसा उतना ही कमजोर होता जाता है।

बारीक समझ का अंत और लोकतंत्र की कमजोरी

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह किसी ‘परफेक्ट समाज’ का सपना बेचने के बजाय इस बात को स्वीकार करता है कि इंसान और समाज दोनों अपूर्ण हैं।

दार्शनिक कार्ल पॉपर ने अपनी किताब The Open Society and Its Enemies में इसी तरह के विचारों के खिलाफ तर्क दिया था। वे इस सोच के विरोधी थे कि इतिहास किसी तय दिशा में आगे बढ़ रहा है और हम पूरे समाज को एक झटके में नए सिरे से बना सकते हैं।

इसके बजाय पॉपर ने ‘क्रमिक सामाजिक बदलाव’ (Piecemeal social engineering) की बात की।

मतलब ये कि समाज की किसी खास समस्या; जैसे- गरीबी, बीमारी या अन्याय को पहचानो, उसका धीरे-धीरे समाधान निकालो और फिर देखो कि उस समाधान से कोई नई समस्या तो पैदा नहीं हो गई। अगर हुई है, तो उसे भी धीरे-धीरे ठीक करो।

यही लोकतंत्र की असली ताकत है।

लोकतंत्र इसलिए काम करता है क्योंकि वह धरती पर स्वर्ग बनाने का वादा नहीं करता। वह हमें इससे कहीं ज्यादा व्यावहारिक चीज़ देता है; बिना हिंसा के सरकार बदलने का रास्ता, लोगों के अधिकारों की रक्षा और ऐसा मंच जहाँ अलग-अलग हितों और विचारों के बीच कानून और बातचीत के जरिए रास्ता निकाला जा सके।

लेकिन सोशल मीडिया इस लोकतांत्रिक संस्कृति को कई तरीकों से कमजोर कर रहा है।

1. साझा सच्चाई पर भरोसा कम होना

लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि लोग कम से कम कुछ बुनियादी तथ्यों पर सहमत हों। लेकिन सोशल मीडिया के एल्गोरिदम हर व्यक्ति को उसकी पसंद के हिसाब से अलग-अलग जानकारी दिखाते हैं।

नतीजा ये है कि लोग सिर्फ नीतियों पर एक-दूसरे से असहमत नहीं हैं। कई बार दोनों पक्षों के पास दुनिया को देखने के लिए बिल्कुल अलग-अलग ‘तथ्य’ होते हैं।

जब समाज के पास सच को परखने का कोई साझा आधार ही नहीं बचता, तो लोकतांत्रिक बहस धीरे-धीरे विचारों की बहस न रहकर गुटों की लड़ाई बन जाती है।

2. कैंसल करने और डर का माहौल

सोशल मीडिया पर लगातार आलोचना या ‘कैंसल’ होने का डर लोगों को खुलकर बोलने से रोक सकता है।

राजनेता, शिक्षक, पत्रकार और आम लोग भी कई बार सिर्फ इसलिए अपनी बात कहने से बचते हैं कि कहीं सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ अभियान न शुरू हो जाए।

और जब लोग अपनी बात कहने से डरने लगें, तो खुली बहस कैसे होगी?

3. राजनीति का बहुत तेजी से अस्थिर होना

सोशल मीडिया को तेजी चाहिए। नया मुद्दा, नया विवाद, नया ट्रेंड और कुछ ही घंटों में पूरा ध्यान उस पर चला जाता है।

इसका असर राजनीति पर भी पड़ता है। लंबे समय की योजनाओं और मुश्किल समस्याओं पर लगातार काम करने के बजाय सरकारों पर भी हर नए ट्रेंडिंग मुद्दे पर तुरंत प्रतिक्रिया देने का दबाव बढ़ता जाता है।

नतीजा ये होता है कि सरकारें कई बार किसी समस्या को जड़ से हल करने के बजाय एक ट्रेंडिंग मुद्दे से दूसरे ट्रेंडिंग मुद्दे की तरफ भागती रहती हैं।

और जब ये तीनों चीजें एक साथ आती हैं, तो लोकतंत्र का सबसे जरूरी हिस्सा, मध्यमार्ग और संतुलन, कमजोर पड़ने लगता है।

जो लोग बातचीत, समझौते और धीरे-धीरे बदलाव की बात करते हैं, उनकी आवाज़ अक्सर उन ज्यादा उग्र लोगों के बीच दब जाती है जो मानते हैं कि मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह तोड़कर ही एक नई और बेहतर दुनिया बनाई जा सकती है।

यही लोकतंत्र के लिए असली खतरा है; जब सुधार की जगह क्रांति, समझौते की जगह पूर्णता और बातचीत की जगह वैचारिक युद्ध हावी होने लगे।

राजनीतिक यथार्थवाद को फिर से समझना

अगर राहुल गांधी ये चेतावनी दे रहे हैं कि लोकतंत्र खतरे में है, तो उनकी बात को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया जिस तरह आज काम करता है, वह लोकतंत्र की सोच और उसकी संस्थाओं के लिए सचमुच एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

डिजिटल दुनिया लोगों को लगातार एक ऐसी ‘आदर्श व्यवस्था’ की तस्वीर दिखाती रहती है, जो असल जिंदगी में संभव ही नहीं है। इससे लोग अपनी सरकार, संस्थाओं और पूरी राजनीतिक व्यवस्था से हमेशा असंतुष्ट रहने लगते हैं।

राजनीति भी धीरे-धीरे ऐसी हो जाती है जहाँ हर विवाद पर तुरंत प्रतिक्रिया चाहिए, हर समस्या का तुरंत समाधान चाहिए और हर समाधान बस एक नए सोशल मीडिया कैंपेन की दूरी पर दिखाई देने लगता है।

इस डिजिटल दौर में लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए हमें अपनी सोच और अपनी संस्थाओं, दोनों में कुछ बदलाव करने होंगे।

सबसे पहले हमें इंटरनेट से पैदा होने वाली इन अवास्तविक उम्मीदों को थोड़ा कम करना होगा और राजनीतिक यथार्थवाद को फिर से समझना होगा।

इसके लिए नागरिकों में जागरूकता जरूरी है। लोगों को ये समझना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला हर आक्रोश स्वाभाविक नहीं होता, कई बार एल्गोरिदम ही उसे बढ़ा रहे होते हैं।

हमें अपने नेताओं से भी ये उम्मीद करनी होगी कि वे हर ट्रेंडिंग मुद्दे के पीछे भागने के बजाय लंबी अवधि की समस्याओं पर ध्यान दें।

और सिर्फ सोशल मीडिया पर बहस करने के बजाय लोगों को स्थानीय समुदायों, सामाजिक संगठनों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के वास्तविक काम में भी हिस्सा लेना होगा।

इतिहास हमें एक और महत्वपूर्ण बात सिखाता है।

समाज सिर्फ बाहरी दुश्मनों के हमले से नहीं टूटते। कई बार वे तब भी कमजोर पड़ने लगते हैं जब उनके अपने लोग ही अपनी व्यवस्था पर भरोसा खो देते हैं।

डिजिटल आदर्शवाद हमें एक ऐसी दुनिया का सपना दिखाता है जिसमें सब कुछ परफेक्ट हो। लेकिन इतिहास बार-बार बता चुका है कि ऐसा समाज बनाना लगभग हमेशा एक भ्रम ही साबित हुआ है।

इसलिए आज लोकतंत्र की असली रक्षा इस बात में नहीं है कि हम उसे परफेक्ट बनाने की कोशिश करें।

उसकी असली रक्षा इस बात में है कि हम उसकी कमियों को स्वीकार करें, उसकी गलतियों को सुधारते रहें और फिर भी उस व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखें।

क्योंकि एक ऐसा समाज जो स्वतंत्र है, जटिल है और अपनी गलतियों को सुधारने की क्षमता रखता है, वह किसी भी सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले ‘परफेक्ट समाज’ के सपने से कहीं ज्यादा कीमती है।

बेचे जाने और लीज पर देने का अंतर भूल बैठे हैं अखिलेश यादव, JPNIC ‘बिक गया’ या सिर्फ लीज पर गया? सपा प्रमुख के दावे और CAG की रिपोर्ट के बीच का सच

लखनऊ के गोमतीनगर में खड़ा जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर, यानी JPNIC एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब एक दशक पहले शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज तक ठीक से जनता के काम नहीं आ पाया और अब योगी सरकार ने तय किया है कि इसका बचा-खुचा निर्माण और आगे का संचालन निजी हाथों में सौंप दिया जाए। सरकार की दलील सीधी है, परिसर भी पूरा हो जाएगा, और रखरखाव का बोझ भी खजाने पर नहीं पड़ेगा।

बस यही ऐलान होते ही अखिलेश यादव मैदान में कूद पड़े। उनका कहना है कि योगी सरकार JPNIC को ‘बेच’ रही है, निजीकरण के नाम पर सरकारी संपत्ति ठिकाने लगाई जा रही है।

तो सवाल उठता है कि क्या वाकई JPNIC बिक गया? क्या इसकी मिल्कियत किसी कंपनी के नाम हो गई? जिस प्रोजेक्ट को लेकर आज इतना हंगामा है, उसके निर्माण में खर्च को लेकर खुद CAG ने क्या पाया था? इन सबका जवाब जानने के लिए कहानी को शुरू से पकड़ना होगा।

पहले जानिए, JPNIC है क्या चीज

गोमतीनगर की करीब 18-20 एकड़ ज़मीन पर बना यह एक बड़ा सा बहुउद्देशीय परिसर है, जिसे शुरू से ही एक आधुनिक कन्वेंशन और सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर सोचा गया था। नक्शे में एक स्टेट लेवल कन्वेंशन सेंटर, करीब 2,000 लोगों के बैठने लायक हॉल, ऑडिटोरियम, स्पोर्ट्स कोर्ट, ओलंपिक साइज का स्विमिंग पूल, होटल, पार्किंग और जयप्रकाश नारायण से जुड़ा एक म्यूजियम ब्लॉक, सब कुछ शामिल था। मतलब सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि आयोजनों, सम्मेलनों और खेल गतिविधियों के लिए बना एक पूरा कॉम्प्लेक्स।

इसकी नींव 2013 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते पड़ी थी। तब लागत आंकी गई थी ₹265.59 करोड़ लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए, यह आंकड़ा भी बढ़ता गया और नवंबर 2016 आते-आते संशोधित लागत पहुँच गई ₹864.99 करोड़ तक। CAG की ऑडिट रिपोर्ट में भी यही दो आँकड़े दर्ज हैं, शुरुआती 265.59 करोड़ और संशोधित 864.99 करोड़।

यहीं से यह कहानी सिर्फ ‘एक अधूरी इमारत’ की नहीं रह जाती, यह सार्वजनिक पैसे के हिसाब-किताब और जवाबदेही की कहानी बन जाती है।

लखनऊ के गोमती नगर में स्थित जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर। फोटो साभार- X

लागत तीन गुने से भी ज्यादा कैसे बढ़ी

निर्माण की जिम्मेदारी लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी LDA को दी गई थी। मार्च 2013 में जब लागत ₹265.59 करोड़ तय हुई, उसके कुछ ही महीनों बाद मई 2013 में LDA ने काम एक ठेकेदार को सौंप दिया ₹149.60 करोड़ में जो अनुमानित लागत से करीब 12.35 फीसदी ज्यादा था।

फिर धीरे-धीरे प्रोजेक्ट में बदलाव जुड़ते गए। जैसे, शुरुआती डिज़ाइन में हेलिपैड का कोई ज़िक्र नहीं था। बाद में नेशनल बिल्डिंग कोड की शर्तों के चलते छत पर हेलिपैड जोड़ना पड़ा, और इसके लिए नींव में 600 मिमी की जगह 1,000 मिमी वाले पाइल इस्तेमाल करने पड़े। अब यह बदलाव अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं, निर्माण के दौरान ऐसे फेरबदल होते रहते हैं। असली सवाल इस काम पर चुकाई गई दर को लेकर उठा।

और यहीं CAG ने उंगली उठाई

ऑडिट में सामने आया कि 1,000 मिमी पाइल के काम के लिए ठेकेदार को ₹8,773.69 प्रति मीटर की दर से भुगतान हुआ, जबकि CAG के मुताबिक 2013 की लागू दर के हिसाब से यह सिर्फ ₹8,201.40 प्रति मीटर बनती थी। कुल 24,680 मीटर के इस काम पर यह छोटा-सा अंतर जुड़कर करीब ₹1.41 करोड़ का ‘अनुचित लाभ’ ठेकेदार की जेब में गया और उतनी ही रकम का घाटा सरकारी खजाने को हुआ। रिपोर्ट में इसे साफ शब्दों में ‘undue benefit’ कहा गया है।

यह कोई विपक्ष का लगाया आरोप नहीं बल्कि खुद देश के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज है।

योगी सरकार ने गड़बड़ियों की जाँच कराई

2017 में सरकार बदली और योगी आदित्यनाथ ने JPNIC के खर्चों पर आई रिपोर्ट के आधार पर जाँच कराई जिससे काम रुक गया। इसके बाद बरसों तक यह विशाल परिसर लगभग सुनसान पड़ा रहा। आखिरकार 2025 में सरकार ने फैसला लिया कि इसे फिर से LDA के जिम्मे किया जाए, ताकि अधूरा काम पूरा हो सके और कोई संचालन मॉडल तय हो।

अब हुआ क्या

अगस्त 2026 में योगी कैबिनेट ने JPNIC को निजी क्षेत्र के जरिए चलवाने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक खुली निविदा प्रक्रिया के बाद वृंदावन बॉटलर्स प्राइवेट लिमिटेड और रॉकवुड होटल्स एंड रिजॉर्ट्स के एक संयुक्त उपक्रम को चुना गया।

अब यहीं पर ध्यान देने वाली बात है कि ‘बेचना’ और ‘लीज पर देकर चलवाना’, दोनों एक चीज नहीं हैं। सरकार ने न तो JPNIC की जमीन बेची है, न ही इसकी सरकारी मिल्कियत किसी कंपनी के नाम की है। जो व्यवस्था बनी है वह लीज और सहभागिता की है और कंपनी को संचालन का अधिकार मिलेगा, मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा। जैसे कि म्यूजियम ब्लॉक, जो LDA के नियंत्रण में ही रहने वाला है।

तो अखिलेश यादव का यह कहना कि JPNIC ‘बेच दिया गया’ सरासर उनकी सरकार के विरोध और खुद असफल होने की कुंठा का प्रतीक है। यह बिक्री नहीं लंबी अवधि की लीज पर निजी संचालन की व्यवस्था है।

निजी कंपनी को बदले में करना क्या होगा

अब इस फैसले का वह हिस्सा जो अक्सर नारेबाजी में दब जाता है। JPNIC अभी भी पूरी तरह तैयार नहीं है, इसमें इंटीरियर, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, फायर सेफ्टी जैसे कई काम बाकी हैं, जिन पर करीब ₹200 से ₹250 करोड़ और खर्च होने का अंदाजा है और यह खर्च सरकार नहीं, निजी ऑपरेटर अपनी जेब से उठाएगा।

इसके अलावा कंपनी को LDA को शुरुआत में ₹10.11 करोड़ का अपफ्रंट प्रीमियम और ₹25 करोड़ रुपये की परफॉर्मेंस गारंटी देनी होगी। संचालन शुरू होते ही हर साल ₹6 करोड़ का भुगतान होगा, जिसमें हर वर्ष 5 फीसदी की बढ़ोतरी भी जुड़ी है।

यानी सालों से अधूरा पड़ा जो परिसर सरकार खुद पूरा नहीं करवा पाई, उसे अब पूरा करने, चलाने और संभालने के लिए निजी पैसा लगाया जा रहा है।

पहले लगे 821.74 करोड़ का क्या होगा

एक और अहम पहलू है जो अक्सर बहस में छूट जाता है। सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट पर अब तक करीब ₹821.74 करोड़ जारी हो चुके हैं। यह रकम सरकार ने LDA को दी थी और अब इसे एक ‘ट्रांसफर्ड लोन’ माना जा रहा है, जिसे LDA को अगले 30 सालों में वापस चुकाना होगा।

मतलब सरकार का मौजूदा मॉडल सिर्फ ‘कंपनी को सौंप दो’ तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें पहले खर्च हो चुके पैसे की वसूली, बाकी निर्माण, आगे के संचालन का खर्च और JPNIC को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना, ये सारी चीज़ें एक साथ जुड़ी हैं।

अखिलेश को नहीं पता बेच देने और लीज पर देने फर्क

विपक्ष का काम ही है सवाल पूछना और इस मायने में अखिलेश यादव का सरकार पर निशाना साधना कोई अटपटी बात नहीं। लेकिन जब आरोप ‘संपत्ति बेचने’ जैसा गंभीर हो, तो तथ्य और राजनीतिक भाषा में फर्क करना ज़रूरी हो जाता है।

तथ्य यह है कि JPNIC की शुरुआत खुद अखिलेश सरकार के दौर में हुई। तथ्य यह भी है कि इसकी लागत 265 करोड़ से बढ़कर CAG के रिकॉर्ड के मुताबिक 865 करोड़ तक पहुँच गई। तथ्य यह भी कि CAG ने पाइल के काम में दर के हेरफेर से 1.41 करोड़ के नुकसान की आपत्ति दर्ज की।

यह भी सच है कि 2017 के बाद जाँच बैठी, काम बरसों रुका रहा और आखिरकार 2025-26 में सरकार ने इसे LDA के जरिए फिर से पटरी पर लाने और निजी भागीदारी से संचालित करने का रास्ता चुना जिसके एवज में उसे प्रीमियम, गारंटी और नियमित लीज आय मिलेगी।

इन सारी बातों को जोड़कर देखें, तो सीधे ‘JPNIC बेच दिया गया’ कह देना पूरे मामले को बहुत ज्यादा सरल बना देना है।

’97 हजार करोड़’ वाली रिपोर्ट का JPNIC से क्या नाता है

अखिलेश सरकार के दौर के वित्तीय रिकॉर्ड को लेकर 2018 में एक और CAG रिपोर्ट सामने आई थी, जिसका ज़िक्र अक्सर राजनीतिक बहसों में होता है। 2014 से मार्च 2017 के बीच उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों से जुड़े ₹97,906.27 करोड़ के उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित थे और CAG ने कहा था कि इससे धन के दुरुपयोग का जोखिम पैदा होता है।

असली सवाल बेचने का नहीं, इस्तेमाल में लाने का है

पिछले करीब दस साल से JPNIC उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अधूरे वादे की तरह खड़ा रहा है और सैकड़ों करोड़ खर्च होने के बावजूद जनता को इसका कोई फायदा नहीं मिला। अब सरकार इसका संचालन मॉडल बदलने जा रही है।

बहस सिर्फ इस एक लाइन पर टिकी है कि ‘JPNIC बेच दिया गया’, तो मौजूदा तथ्यों के आधार पर यह दावा टिकता नहीं दिखता। मामला बिक्री का नहीं, लंबी लीज और निजी भागीदारी से चलाए जाने का है।

इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस प्रोजेक्ट की लागत 265 करोड़ से बढ़कर 865 करोड़ तक पहुँच गई, जिसके निर्माण में CAG ने ठेकेदार को दिए गए 1.41 करोड़ के अनुचित फायदे पर आपत्ति जताई और जो सालों तक अधूरा पड़ा रहा, उसी को अब पूरा कराने के लिए सरकार निजी पैसे का सहारा ले रही है।

UP में तेजी से बढ़ रही है ‘गो-इकोनॉमी’, दूध के साथ-साथ गोमूत्र भी बन रहा है रोजगार का साधन: शैम्पू, साबुन और ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर सबमें हो रहा इस्तेमाल

गाय, गोबर और गौमूत्र का उपहास उड़ाना हमारे देश में एक आम बात बन चुकी है। जब भी इनकी उपयोगिता पर बात होती है, तो अक्सर इसे गंभीरता से लेने के बजाय इसका मजाक बनाया जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत इस संकीर्ण सोच से परे एक बेहद उम्मीद जगाने वाले ‘इकोनॉमिक मॉडल’ को दर्शाती है।

आज उत्तर प्रदेश में देसी गायों के गोबर और गौमूत्र का इस्तेमाल करके करीब 200 तरह के प्रोडक्ट्स तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी इंटरनेशनल मार्केट में भारी डिमांड है। इसमें शैम्पू, साबुन और अर्क से लेकर ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर तक शामिल हैं। जिस चीज को बेकार मानकर बहा दिया जाता था, आज वही किसानों के लिए अतिरिक्त नकद आय का एक मजबूत जरिया बन चुकी है।

बाजार में बिकने वाला महंगा ऑर्गेनिक फूड इसी प्राकृतिक खाद और गौमूत्र से बने जैविक पेस्टिसाइड्स के दम पर उगता है, जो मिट्टी को जहर-मुक्त और उपजाऊ बनाने का काम करते हैं।

इसका एक प्रत्यक्ष और सफल मॉडल उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में देखा जा सकता है। वहाँ FPO यानी फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन के ज़रिए 15 गाँवों के स्थानीय संग्रह केंद्रों से रोज 500 लीटर गौमूत्र 10 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से खरीदा जा रहा है।

इसके भंडारण के लिए गाँवों में 200 लीटर क्षमता वाले टैंक लगाए गए हैं। इस पूरी व्यवस्था से गाँव की लगभग 300 महिलाएँ जुड़ी हुई हैं, जिन्हें प्रति लीटर 2 रुपए का कमीशन मिलने के साथ-साथ FPO में शेयरहोल्डर भी बनाया गया है।

इस पूरे मॉडल ने किसान के पास मौजूद गाय को एक ‘थ्री-इन-वन’ इकोनॉमिक इंजन में बदल दिया है। किसान को दूध से सीधी कमाई होती है, गोबर से खेत के लिए मुफ्त खाद मिलने के कारण रासायनिक खाद का खर्च शून्य हो जाता है, और गौमूत्र की बिक्री से प्रति लीटर नकद मुनाफा मिलता है।

बुलंदशहर के 15 गाँवों से शुरू हुआ यह प्रयोग अगर पूरे राज्य में लागू होता है, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का कायाकल्प कर सकता है। ऐसे में सवाल उन लोगों से है जो गाय, गोबर और गौमूत्र का नाम सुनते ही मजाक बनाने लगते हैं- जब यही व्यवस्था किसान का खर्च घटाकर उसकी आय बढ़ा रही है और रोजगार के नए साधन बना रही है, तो उपहास किस बात का है?

स्पष्ट है कि समस्या गोबर या गौमूत्र में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो किसी संसाधन की उपयोगिता समझे बिना उसका मजाक उड़ाने लगती है।

मुस्लिमों को रिझाने में 2017 में औंधे मुँह गिरे थे अखिलेश, आरक्षण का वादा किया लेकिन घोषणापत्र खाली रहा: 2027 के चुनावी रण में क्या फिर से अखिलेश करेंगे मुस्लिम आरक्षण पर बात?

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अखिलेश यादव ने मुस्लिम आरक्षण का वही कार्ड फिर उठाया था, जो समाजवादी पार्टी की राजनीति में बरसों से रचा-बसा रहा है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इसके बावजूद 2017 में सपा 224 सीटों से लुढ़ककर सिर्फ 47 सीटों पर आ सिमटी थी।

यूपी की राजनीति में चुनाव नजदीक आते ही कुछ पुराने मुद्दे धूल झाड़कर फिर सामने आ जाते हैं और मुस्लिम आरक्षण भी उन्हीं में से एक है। 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि उनकी सरकार मुस्लिमों को आरक्षण देने का वादा तो कर चुकी है, मगर कानूनी अड़चनें आड़े आ रही हैं।

अखिलेश ने संविधान में संशोधन की जरूरत बताकर भरोसा दिलाया था कि मिल-बैठकर कोई रास्ता निकाला जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि सरकारी योजनाओं में मुस्लिम आबादी को 20 फीसदी हिस्सेदारी दी जाएगी। यह कोई अचानक आया बयान नहीं था, इसकी जड़ें सपा की पुरानी चुनावी राजनीति में काफी गहरे तक जमी हैं।

2012 में चला था 18 फीसदी आरक्षण का दांव

इससे पहले 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने मुस्लिमों को आरक्षण देने का वादा किया था। पार्टी के घोषणापत्र में पिछड़े मुस्लिमों के लिए आरक्षण के साथ-साथ मुस्लिम बहुल इलाकों में कॉलेज खोलने और गरीब परिवारों के बच्चों की फीस में राहत देने जैसे वादे भी शामिल थे।

आगे चलकर इस वादे को अक्सर ‘18 फीसदी मुस्लिम आरक्षण’ कहकर ही राजनीतिक बहस में घसीटा जाता रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले खुद मुलायम सिंह यादव ने भी दोहराया था कि पार्टी मुस्लिमों को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण देने के अपने वादे पर कायम है। लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है, जो अक्सर नजरअंदाज हो जाता है।

आजम खान विधानसभा में अपने वादे से मुकरे

अगस्त 2016 में उसी सपा सरकार में मंत्री रहे आजम खान ने विधानसभा में यह कहकर सबको चौंका दिया था कि पार्टी ने कभी 18 फीसदी आरक्षण का वादा किया ही नहीं था और संविधान बदले बिना ऐसा आरक्षण देना मुमकिन नहीं। यानी खुद सपा के भीतर भी इस वादे की व्याख्या पर एकमत नहीं था।

फिर मई 2016 में अखिलेश यादव ने खुद इस वादे को दोहराया। कानूनी अड़चनों का हवाला देते हुए उन्होंने संविधान संशोधन की जरूरत बताई और कहा कि उनकी पार्टी 20 फीसदी आबादी के हक के लिए लड़ती रहेगी। यहीं से मुस्लिम आरक्षण सिर्फ सामाजिक न्याय का मसला न रहकर, यूपी की चुनावी राजनीति में वोट के गणित का सवाल बन जाता है।

यूपी में मुस्लिम आबादी आखिर कितनी है?

2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 3 करोड़ 84 लाख है, यानी कुल आबादी का 19.26 फीसदी। राज्य सरकार के दस्तावेजों में भी यही आँकड़ा दर्ज है, जबकि हिंदू आबादी करीब 79.73 फीसदी बताई जाती है।

इसका मतलब लगभग हर पाँचवाँ शख्स मुस्लिम है। यही वजह है कि यूपी की चुनावी राजनीति में किसी भी बड़ी पार्टी के लिए मुस्लिम मतदाताओं को नजरअंदाज करना आसान नहीं रहा।

समाजवादी पार्टी के लिए तो यह गणित और भी अहम है क्योंकि लंबे अरसे से उसकी राजनीति को MY यानी मुस्लिम-यादव समीकरण से जोड़कर देखा जाता रहा है। 2022 के चुनावी विश्लेषणों में भी मुस्लिम और यादव समुदाय को सपा का पारंपरिक कोर वोटबैंक माना गया था।

लेकिन 2017 में यही कार्ड चला क्यों नहीं?

2012 में सपा ने 403 में से 224 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। मगर 5 साल बाद 2017 में तस्वीर पूरी तरह पलट गई। भाजपा 312 सीटों के साथ बहुमत में आई, जबकि सपा महज 47 सीटों पर सिमट गई। उसका वोट शेयर घटकर 21.82 फीसदी रह गया, यानी कुल मिलाकर 177 सीटों का भारी नुकसान।

2017 में अखिलेश यादव ने पार्टी की छवि विकास, एक्सप्रेसवे, मेट्रो, लैपटॉप और युवा राजनीति से जोड़ने की कोशिश की थी। कांग्रेस के साथ हुए गठबंधन को भी राजनीतिक विश्लेषक अक्सर मुस्लिम वोटों के बिखराव रोकने की रणनीति से जोड़कर देखते रहे। इस गठबंधन के पीछे का मकसद करीब 20 फीसदी मुस्लिम वोट को एकजुट रखना भी था।

हालाँकि 2017 के सपा घोषणापत्र में 2012 जैसी साफ-साफ मुस्लिम आरक्षण की राजनीति उतनी उभरकर सामने नहीं आई थी। अखिलेश के नए घोषणापत्र से मुस्लिम केंद्रित मुद्दे काफी हद तक गायब हो गए थे। जहाँ 2012 में साफ तौर पर 18 फीसदी आरक्षण का वादा था, वहीं 2017 में ऐसे किसी वादे को उतनी तवज्जो नहीं दी गई।

मुलायम से अखिलेश तक, MY राजनीति की विरासत

समाजवादी पार्टी की मुस्लिम राजनीति को ठीक से समझना है तो मुलायम सिंह यादव के दौर तक जाना जरूरी है। 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर हुई पुलिस फायरिंग के वक्त मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे। आगे चलकर उन्होंने कई बार इस फैसले का बचाव भी किया। 2013 में उन्होंने कहा था कि गोली चलवाने का उन्हें अफसोस है, लेकिन उस वक्त देश की एकता और मंदिर-मस्जिद विवाद का सवाल इतना बड़ा था कि उनके पास और कोई चारा नहीं बचा था।

2016 में तो उन्होंने इससे भी आगे जाकर कह दिया था कि बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए गोली चलाना जरूरी था और इससे ज्यादा जानें भी जातीं तो भी वह पीछे नहीं हटते। बाद की राजनीतिक व्याख्याओं में इस फैसले को अक्सर मुलायम की मुस्लिम राजनीति और MY समीकरण की नींव से जोड़ा गया।

आरक्षण की असली संवैधानिक पेचीदगी क्या है?

अखिलेश यादव ने 2016 में संविधान संशोधन की बात यूँ ही नहीं की थी। दरअसल, भारत का संविधान धर्म को आरक्षण का आधार नहीं मानता। आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन जैसे संवैधानिक आधारों पर ही दिया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के मशहूर इंद्रा साहनी फैसले में आरक्षण की सामान्य सीमा को 50 फीसदी के दायरे में रखने का सिद्धांत भी काफी अहम माना जाता है, और केंद्र सरकार भी संसद में इसी न्यायिक व्यवस्था का हवाला देती रही है।

मतलब मुस्लिम समुदाय के भीतर जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समूह हैं, उन्हें OBC व्यवस्था के तहत आरक्षण मिलना एक बात है, जबकि पूरे मुस्लिम समुदाय को सिर्फ धर्म के आधार पर अलग कोटा दे देना बिल्कुल अलग संवैधानिक सवाल है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में भी मुस्लिम OBC समूहों और अलग-अलग राज्यों की आरक्षण व्यवस्थाओं का जिक्र मिलता है।

दिलचस्प यह भी है कि मार्च 2025 में अखिलेश यादव ने कर्नाटक में मुस्लिम आरक्षण को लेकर छिड़ी बहस के दौरान साफ कह दिया था कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पिछड़ों, दलितों और वंचित वर्गों को मिलना चाहिए। यानी 2016 के अखिलेश और 2025 के अखिलेश के रुख में काफी फर्क नजर आता है।

योगी सरकार में मुसलमानों को क्या मिला?

योगी सरकार के 2026-27 के बजट में अल्पसंख्यक कल्याण के लिए ₹2,058 करोड़ रखे गए हैं। प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम के तहत अल्पसंख्यक बहुल 21 जिलों में बहुक्षेत्रीय विकास के लिए ₹500 करोड़ का प्रावधान है, वहीं अल्पसंख्यक छात्रों की पूर्वदशम और दशमोत्तर छात्रवृत्ति के लिए ₹391 करोड़ तय किए गए हैं।

राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के तहत छात्रवृत्ति, फीस प्रतिपूर्ति, गरीब अल्पसंख्यक परिवारों की बेटियों की शादी के लिए अनुदान, शिक्षा ऋण, बेरोजगार युवाओं के लिए टर्म लोन के साथ-साथ अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में स्कूल, स्वास्थ्य, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं जुटाने वाली योजनाएं भी चल रही हैं।

अब निगाहें 2027 पर

उत्तर प्रदेश की मौजूदा 403 सीटों वाली विधानसभा का कार्यकाल 2027 में पूरा होना है और अभी चुनाव की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में 2027 में अखिलेश यादव का मुस्लिमों को आरक्षण का ऊंट किस करवट बैठेगा ये देखना दिलचस्प होगा। उनके हालिया बयानों से तस्वीर थोड़ी ज़्यादा उलझी हुई नजर आती है।

2025 में वह धर्म आधारित आरक्षण से दूरी बना चुके हैं। 2026 में उनकी राजनीति में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का फॉर्मूला ज़्यादा उभरता दिख रहा है। यानी पुराना MY फॉर्मूला अब PDA के बड़े और व्यापक फ्रेम में पेश किया जा रहा है। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या सिर्फ सामाजिक समीकरण और आरक्षण की राजनीति 2027 में काफी होगी?

2017 के नतीजे यह साफ बता चुके हैं कि सिर्फ किसी एक वोटबैंक को साधना सत्ता की गारंटी नहीं देता। 2012 में 224 सीटें जीतने वाली सपा 2017 में 47 सीटों तक सिमट गई थी। 2022 में भी भाजपा ने सरकार बनाई और सपा को विपक्ष में ही बैठना पड़ा।

अब असल सवाल तो यह होगा कि क्या अखिलेश यादव मुस्लिम आरक्षण या PDA जैसे सामाजिक समीकरणों के साथ-साथ रोजगार, कानून-व्यवस्था, निवेश, उद्योग, किसान, महिला सुरक्षा और बुनियादी ढांचे जैसा एक ठोस एजेंडा भी पेश कर पाते हैं जो सिर्फ किसी एक वोटबैंक तक सीमित न रहकर पूरे उत्तर प्रदेश को अपनी बात कह सके।

क्योंकि चुनाव आते-आते पुराना कार्ड फिर से निकाला जा सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि मतदाता हर बार वही खेल उसी तरह खेलें और शायद यही 2017 की सबसे बड़ी सीख थी।

अंग्रेजों की गोलियाँ खाकर भी पेड़ पर फहराया तिरंगा, कहानी गुलाब सिंह लोधी और ‘झंडेवाला पार्क’ की: बलिदान दिवस पर CM योगी ने दी श्रद्धांजलि

लखनऊ में सीएम योगी आदित्यनाथ 23 अगस्त 2026 को अमर बलिदानी गुलाब सिंह लोधी की प्रतिमा पर पहुँचे। उनके बलिदान दिवस पर सीएम ने उनकी प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाए और उन्हें याद किया। करीब 9 दशक पहले यही गुलाब सिंह लोधी थे, जिन्होंने अंग्रेजी बन्दूकों की परवाह किए बिना लखनऊ के अमीनाबाद पार्क में तिरंगा फहरा दिया था। बदले में अंग्रेजों ने उन्हें गोलियों से भून डाला, मगर उनके हाथों में लहराता झंडा उस वक्त अंग्रेज हुकूमत को सीधी चुनौती दे चुका था।

गुलाब सिंह लोधी की कहानी महज एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की कहानी भर नहीं है, ये उस दौर की झलक है जब गाँव-गाँव से उठे मामूली किसान-मजदूर भी अंग्रेजों के खिलाफ अपनी जान दाँव पर लगाने से पीछे नहीं हटते थे। इतिहास की किताबों में बड़े-बड़े नाम तो दर्ज हैं, पर गुलाब सिंह लोधी जैसे कई सेनानी ऐसे भी रहे, जिनकी कहानी स्थानीय यादों में तो रही, मगर राष्ट्रीय पटल पर उन्हें वो जगह कभी नहीं मिली, जिसके वो हकदार थे।

उन्नाव की माटी से निकला था ये वीर

साल 1903 में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे गुलाब सिंह लोधी उन्नाव जिले के फतेहपुर चौरासी इलाके के चंद्रिकाखेड़ा गाँव के रहने वाले थे। पिता का नाम था ठाकुर रामरतन सिंह लोधी।

उनका बचपन ऐसे समय में बीता, जब अंग्रेजी राज के खिलाफ गुस्सा हर तरफ पनप रहा था। असहयोग आँदोलन, सत्याग्रह, स्वदेशी की हवा गाँवों तक पहुँच चुकी थी। अंग्रेजों की सख्ती और क्रूरता के खिलाफ माहौल पूरे देश में बन रहा था, और गुलाब सिंह लोधी भी इसी हवा में साँस ले रहे थे।

जब तिरंगा अंग्रेजों के लिए खतरा बन गया

गुलाब सिंह लोधी का नाम सबसे ज्यादा जुड़ा है लखनऊ के झंडा सत्याग्रह से। उस दौर में तिरंगा फहराना अपने आप में बगावत मानी जाती थी। अंग्रेज सरकार झंडे से जुड़े आंदोलनों को बेहद संजीदगी से लेती थी, और ऐसे किसी भी जमावड़े को रोकने के लिए पुलिस-फौज उतार देती थी।

उसी दौर में उन्नाव से सत्याग्रहियों के कई जत्थे लखनऊ की तरफ कूच कर गए। मकसद था तिरंगा फहराना, अंग्रेजी सत्ता के मुँह पर राष्ट्रीय स्वाभिमान का तमाचा जड़ना मगर अंग्रेज फौज ने रास्ता रोक दिया। कई सत्याग्रही वहीं रुक गए, आगे नहीं बढ़ सके।

गुलाब सिंह लोधी के बलिदान दिवस के मौक पर सीएम योगी आदित्यनाथ लखनऊ के अमीनाबाद स्थित झँडेवाला पार्क पहुँचे

गुलाब सिंह लोधी रुकने वालों में नहीं थे

वे सैनिकों की नजर बचाकर किसी तरह अमीनाबाद पार्क में घुस गए। साथ में था सिर्फ एक पैना (पतली लाठी, छड़ी), वही ‘औजार’ जिससे किसान बैलों को हाँकते हैं। इसी में उन्होंने तिरंगा बाँध रखा था। इरादा एक ही था – जैसे भी हो, पार्क तक पहुँच कर झंडा फहराना।

यहीं उनकी सूझबूझ भी सामने आती है। पहरे के बीच से निकल कर वे एक पेड़ पर चढ़ गए, और फिर वहीं से तिरंगा लहरा दिया। एक किसान का बेटा, अंग्रेजी हुकूमत के सामने खुले आसमान तले भारत का झंडा फहरा रहा था।

तिरंगा फहरते ही चल गईं गोलियाँ

झंडा लहराते ही अंग्रेज सैनिकों की नजर गुलाब सिंह लोधी पर पड़ गई। हुक्म मिला- गोली चलाओ। कई बंदूकों से एक साथ फायरिंग हुई, गोलियाँ उनके बदन में धँस गईं, जिससे वे गंभीर हालत में पेड़ से नीचे गिर पड़े और 23 अगस्त 1935 को उन्होंने आखिरी साँस ली।

32 साल की उम्र में जब एक आम आदमी अपने परिवार और भविष्य के सपने बुनता है, उस उम्र में गुलाब सिंह लोधी ने देश की आजादी को अपनी जिंदगी से ऊपर रख दिया।

जिस पार्क में उन्होंने अंग्रेजी गोलियों के सामने झंडा फहराया, अमीनाबाद का वही पार्क आगे चलकर ‘झंडेवाला पार्क‘ के नाम से मशहूर हो गया और आजादी की लड़ाई का एक अहम ठिकाना बन गया।

गुलाब सिंह लोधी का बलिदान खास क्यों?

भारत की आजादी की लड़ाई सिर्फ दिल्ली-मुंबई-कोलकाता के बड़े नेताओं की कहानी नहीं है। इसकी असली जान थी वो लाखों-करोड़ों गुमनाम भारतीय, जिन्होंने अंग्रेजों के सामने खड़े होने की हिम्मत जुटाई। गुलाब सिंह लोधी इसी जनसैलाब का चेहरा हैं।

न कोई बड़ा राजनीतिक खानदान, न सत्ता, न फौजी ताकत, न हथियार। उनके पास बस एक झंडा था, आजादी का सपना था, और अंग्रेजों के आगे न झुकने का जज्बा। उनकी कहानी बताती है कि आजादी की लड़ाई में किसान समाज और गाँव का कितना बड़ा हाथ था। उन्नाव के एक गाँव से चलकर लखनऊ के अमीनाबाद पार्क तक पहुँचना, और वहाँ तिरंगा फहरा देना, ये अपने आप में उस दौर के ग्रामीण भारत की राजनीतिक चेतना की मिसाल है।

इतिहास में कम जगह, पर लोगों के दिलों में जिंदा

इतनी बड़ी घटना के बावजूद गुलाब सिंह लोधी का नाम राष्ट्रीय स्तर पर वो पहचान नहीं बना पाया, जो कई और सेनानियों को मिली।

फिर भी उन्नाव और लखनऊ में उनकी यादें आज भी जिंदा हैं। फतेहपुर चौरासी में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और पुलिस प्रशिक्षण केंद्र उनके नाम पर हैं। उनके पैतृक गाँव चंद्रिकाखेड़ा में उनकी प्रतिमा लगी है।

सीएम योगी ने लोधी के गाँव में प्रतिमा का किया अनावरण

13 मार्च 2024 को सीएम योगी आदित्यनाथ खुद चंद्रिकाखेड़ा पहुँचे थे और गुलाब सिंह लोधी की प्रतिमा का अनावरण किया था। उस मौके पर उन्होंने याद दिलाया था कि कैसे 1935 में उन्नाव से लखनऊ जाकर इस किसान बेटे ने तिरंगा फहराया और देश के लिए बलिदान दिया।

यानी जो कहानी कभी सिर्फ एक गाँव की याद बनकर रह सकती थी, उसे स्मारकों और सरकारी कार्यक्रमों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुँचाने की कोशिश हुई।

आज भी तिरंगे में बसी है उनकी कहानी

गुलाब सिंह लोधी की शहादत की सबसे गहरी तस्वीर यही है कि एक साधारण गाँव का लड़का, अंग्रेजी बंदूकों के सामने पेड़ पर चढ़कर तिरंगा फहरा रहा है। ये सिर्फ 1935 की एक घटना नहीं रह गई। ये इस बात की गवाही बन गई कि उस दौर में तिरंगा कोई साधारण कपड़ा नहीं, बल्कि गुलामी के खिलाफ भारतीय स्वाभिमान का ऐलान था।

आज जब देश आजादी के इतने दशकों बाद आगे बढ़ रहा है, तो गुलाब सिंह लोधी जैसे सेनानियों को याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि आजादी हमें यूँ ही नहीं मिल गई थी, इसके पीछे बलिदानों की एक लंबी, दर्दनाक फेहरिस्त है।

23 अगस्त का दिन गुलाब सिंह लोधी की सिर्फ बरसी नहीं, बल्कि उस जज्बे की याद है जिसके आगे अंग्रेजों की बंदूकें भी छोटी पड़ गई थीं। अमीनाबाद में लहराया गया वो तिरंगा भले ही 1935 की बात हो, लेकिन उसकी गूँज आज भी सुनी जा सकती है।

यही वजह रही कि सीएम योगी आदित्यनाथ आज उनके बलिदान दिवस पर उनकी प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाने पहुँचे। गुलाब सिंह लोधी का नाम उस पीढ़ी के साथ हमेशा दर्ज रहेगा, जिसने तिरंगे को झुकने नहीं दिया और इसके लिए अपनी जान तक दे दी।

जिस चुनाव आयोग को राहुल गाँधी विदेश तक कोसते रहे, ट्रंप ने उसी की तारीफ की: कॉन्ग्रेस को लगी मिर्ची

जरा सोचिए, हमारे देश के चिर युवा नेता यानी राहुल गाँधी जब भी विदेश जाते हैं, तो अक्सर विदेशी मंचों पर जाकर यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश करते हैं कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है, चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है और संस्थाएँ बिक चुकी हैं। लेकिन अब एक ऐसा मोड़ आया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। जिस पश्चिमी दुनिया से हमारे देश के कुछ नेता सर्टिफिकेट माँगते फिरते हैं, आज उसी पश्चिमी दुनिया का सबसे ताकतवर देश, यानी अमेरिका, भारत की चुनाव प्रणाली की मिसाल दे रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के चुनाव आयोग, हमारे वोटर आईडी सिस्टम और हमारी मतदान प्रक्रिया की खुलकर तारीफ की है। दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र कहे जाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति अब भारत के चुनाव सिस्टम से सीख लेने की बात कर रहे हैं। हमें अमेरिका के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है लेकिन ये उनके लिए है जिनको चीन के इंफ्रा और अमेरिका के लोकतंत्र में ही जान नजर आती है।

लेकिन विडंबना देखिए, जिस चुनाव आयोग और व्यवस्था की तारीफ व्हाइट हाउस और अमेरिकी राष्ट्रपति कर रहे हैं, हमारे अपने देश का विपक्ष उसी व्यवस्था को हर चुनाव के बाद कटघरे में खड़ा करने की आदत नहीं छोड़ पा रहा है। ट्रंप की तारीफ के बाद कॉन्ग्रेस को फिर मिर्ची लगी है और व्यंग्य कसते हुए बयान दे डाला है।

डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा और Save America Act क्या है?

आइए सबसे पहले जानते हैं कि आखिर हुआ क्या है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर एक लंबी पोस्ट लिखी। इस पोस्ट में उन्होंने भारत के चुनाव सिस्टम की जमकर तारीफ की और अपने देश के सामने भारत का मॉडल रखा।

ट्रंप ने लिखा कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से एक सीधा सवाल पूछा था, कि आखिर अमेरिका में बिना वैध फोटो पहचान पत्र के चुनाव कैसे हो सकते हैं? अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने दुनिया के सामने भारत के 2024 के आम चुनाव के आँकड़े भी रखे। उन्होंने कहा कि भारत के पिछले चुनाव में करीब 65 करोड़ मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। इनमें से 1 प्रतिशत से भी कम लोगों ने डाक यानी मेल-इन वोटिंग का सहारा लिया। और सबसे बड़ी बात, वोट डालने वाले हर एक नागरिक के पास अपनी वैध फोटो पहचान पत्र (Voter ID) होना अनिवार्य था।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इसी व्यवस्था का हवाला देते हुए अमेरिका में ‘SAVE America Act’ को तुरंत पास करने की माँग की। इस कानून का सीधा मकसद यह है कि अमेरिका में वोट डालने के लिए नागरिकता का पक्का सबूत अनिवार्य किया जाए, हर वोटर के लिए फोटो आईडी जरूरी हो और मेल-इन वोटिंग यानी डाक से वोटिंग के फर्जीवाड़े को रोका जा सके।

इतना ही नहीं, भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने भी ट्रंप के इस बयान का समर्थन किया और कहा कि भारत का चुनाव मॉडल पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है। सोचिए, 65 करोड़ लोग लाइन में लगकर, पहचान पत्र दिखाकर वोट डालते हैं और एक भी फर्जीवाड़े की गुंजाइश नहीं बचती, यही ताकत आज पूरी दुनिया देख रही है।

भारत में विपक्ष का दोहरा रवैया- ‘जीते तो जनता, हारे तो EVM’

अब सिक्के का दूसरा पहलू देखिए। एक तरफ अमेरिका जैसा देश हमारी व्यवस्था की तारीफ कर रहा है, और दूसरी तरफ हमारे अपने देश के भीतर की सियासत को देखिए। भारत में विपक्ष की राजनीति का एक सीधा-सा नियम बन चुका है… अगर किसी राज्य में चुनाव जीत गए, सरकार बन गई, तो कहते हैं- ‘यह जनता का फैसला है, लोकतंत्र की जीत है।’ लेकिन जहाँ चुनाव हारे, जहाँ पार्टी का जनाधार खिसका, वहाँ अगले ही दिन सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हो जाती है कि ‘EVM हैक हो गया’, ‘चुनाव आयोग बिक गया’ और ‘वोट चोरी हो गई।’

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने तो कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ऐसे दावे किए जैसे कोई बहुत बड़ा ‘हाइड्रोजन बम‘ फूटने वाला हो। बड़े-बड़े खुलासे करने की बातें कही गईं, वोटर लिस्ट से नाम गायब होने के आरोप लगाए गए। लेकिन जब चुनाव आयोग या अदालत ने उनसे पूछा कि भाई, अगर आपके पास गड़बड़ी के कोई सबूत हैं तो टेबल पर रखिए, तो हर बार नतीजा सिफर यानि शून्य निकला। आरोप तो खूब लगे, लेकिन ठोस सबूत के नाम पर सिर्फ हवा-हवाई बातें सामने आईं।

बात सिर्फ देश के भीतर तक सीमित नहीं रही। राहुल गाँधी विदेशों में, चाहे अमेरिका हो या यूरोप, वहाँ की यूनिवर्सिटी और मंचों पर जाकर भी भारतीय चुनाव व्यवस्था और लोकतंत्र पर सवाल उठाते रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जिस देश की जनता आपको चुनकर संसद भेजती है, उसी देश की लोकतांत्रिक साख को विदेश में जाकर गिराने से किसका फायदा होता है?

यही हाल पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिला, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया को लेकर सीधे सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया। लोकतंत्र में सवाल पूछना, पारदर्शिता माँगना हर किसी का हक है लेकिन बिना किसी सबूत के सिर्फ अपनी हार का गुस्सा संवैधानिक संस्थाओं पर निकालना कहाँ तक जायज है?

चुनाव आयोग की तारीफ पर कॉन्ग्रेस को लगी मिर्ची

जब डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान आया, तो सामान्य समझ यह कहती थी कि देश के हर दल को गर्व होना चाहिए कि हमारी चुनाव व्यवस्था का लोहा पूरी दुनिया मान रही है। लेकिन इस पर भी कॉन्ग्रेस को मिर्ची लगना लाजमी था। कॉन्ग्रेस की तरफ से जो बयान आया, उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे आत्ममंथन के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर ट्रंप को टैग करते हुए तंज कसा। उन्होंने लिखा, “प्रिय डोनाल्ड ट्रंप, आप ज्ञानेश कुमार को अपने साथ अमेरिका ले जाइए और उन्हें वहीं रखिए। हम अगली ही फ्लाइट से अपनी EVM मशीनें भी अमेरिका भेज देंगे। आपने हमारे साथ जो भी बर्ताव किया है, उसके बदले में हम कम से कम इतना तो आपके लिए कर ही सकते हैं।”

जरा सोचिए, यह बयान क्या दिखाता है? क्या यह बयान किसी संवैधानिक संस्था के प्रति सम्मान दिखाता है? या फिर यह सिर्फ इस बात की झुंझलाहट है कि जिस विदेशी धरती पर जाकर आप भारत की बदनामी कर रहे थे, उसी धरती का सबसे बड़ा नेता आज भारत के चुनाव आयोग का मुरीद बन बैठा है?

असली बात क्या है और इससे क्या समझना चाहिए?

यहाँ समझने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का असली मतलब यह होता है कि जब जनादेश आपके खिलाफ जाए, तब भी आप जनता के फैसले और व्यवस्था का सम्मान करें। अगर वाकई कहीं कोई गड़बड़ी है, तो उसके लिए देश में कानून है, अदालतें हैं, चुनाव आयोग का मंच है। तथ्यों के साथ जाइए और साबित कीजिए।

लेकिन सिर्फ अपनी राजनीतिक हार को छुपाने के लिए पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर देना और ‘वोट चोरी’ का नैरेटिव फैलाना किसी भी तरह से देशहित में नहीं हो सकता। आज अमेरिका जैसा देश यह मान रहा है कि भारत की 65 करोड़ लोगों वाली फोटो आईडी आधारित चुनाव व्यवस्था दुनिया के लिए एक बेंचमार्क है। ट्रंप का यह बयान इस बात का सबूत है कि हमारी चुनावी मशीनरी कितनी मजबूत, सुरक्षित और पारदर्शी है।

बंगाल मे शुभेंदु सरकार के 100 दिन पूरे: जानिए ममता राज जाने से राज्य में क्या-क्या हुए परिवर्तन

बंगाल का वो दौर आपको याद होगा जब पूरे राज्य में तुष्टिकरण का बोलबाला था। ऐसे चौराहे थे, जिन्हें एक खास समुदाय अपनी बपौती मान बैठा था, वो सड़कें- जहाँ नियमों को ताक पर रखकर नमाज पढ़ना आम बात बन चुकी थी, और वो लाचार व्यवस्था, जहाँ देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए BSF जवानों को भी ज़मीन का एक टुकड़ा पाने के लिए संघर्ष करना पड़।

जनता बेबस थी- चाहकर भी वे न तो केंद्र सरकार की ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ का लाभ ले पा रही थी और न ही ‘आयुष्मान भारत’ के तहत अस्पतालों में इलाज करा पाती थी। ऐसा लगता था जैसे बंगाल देश की मुख्यधारा से पूरी तरह कट चुका हो, लेकिन क्या आप यकीन करेंगे कि जिस बंगाल में कभी बदलाव असंभव सा लगता था, मात्र 100 दिनों में बदलाव साफ़ और सीधा दिखने लगा है।

दरअसल, बदलाव की असली शुरुआत हुई 9 मई 2026 को! कोलकाता का वो ऐतिहासिक ‘ब्रिगेड परेड ग्राउंड’… जहाँ शुभेंदु अधिकारी, दिलीप घोष और अग्निमित्रा पॉल जैसे दिग्गजों के मंच से एक साथ शपथ ली, तो पूरे बंगाल में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ और पश्चिम बंगाल की जनता में वापस से एक उम्मीद सी जगी कि अब शायद नया निजाम हमारे लिए कुछ बेहतर करेगा!

यह वही सपना था, जिसे पूर्व की टीएमसी सरकार ने दशकों तक सिर्फ चुनाव जीतने के लिए चूरन की तरह बाँटा… लेकिन जब धरातल पर काम करने की बारी आई, तो वे अपनी तुष्टिकरण और वोटबैंक की राजनीति में ही उलझे रहे।

पर इस बार माहौल कुछ अलग था! 9 मई के बाद बंगाल के इतिहास में पहली बार लोग बेखौफ होकर भगवा लहरा रहे थे, एक दूसरे को रंग गुलाल लगाकर मानो असली आजादी का जश्न मना रहे थे तो कुछ मंदिरों की घंटियाँ बजाकर अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व महसूस कर रहे थे। मंदिरों से गूँजती घंटियों की आवाज अब किसी को चुभ नहीं रही थी, बल्कि जनता के चेहरों पर बंगाल की बदलती तस्वीर साफ दिख रही थी और इन्हीं कुछ तस्वीरों को देखते 100 दिन बीत गए।

अब जब बंगाल में भाजपा सरकार के 100 दिन पूरे हो चुके हैं। तो आइए जानते हैं कि इन 100 दिनों के भीतर बंगाल की तस्वीर कितनी बदली है?

बंगाल में BSF को मिली भूमि

आपको याद होगा कि बंगाल में सालों तक बांग्लादेश की सीमा पर तार लगाने के लिए गृह मंत्रालय राज्य सरकार से ज़मीन माँगता रहा, लेकिन ममता सरकार ने अपने तुष्टिकरण के चक्कर में इसे लटकाए रखा और फिर खुली सीमा का फायदा उठाकर बांग्लादेशी घुसपैठिए अपनी मनमर्जी से भारत आते-जाते रहे, लेकिन राज्य में भाजपा सरकार बनने के महज दो हफ्तों के भीतर ही सीएम शुभेंदु अधिकारी ने इस पर सबसे बड़ा फैसला लिया और कहा, “हम सीमा पर बाड़ लगाने के लिए BSF को 27 किलोमीटर ज़मीन सौंपने जा रहे हैं।”

यह सिर्फ एक प्रशासनिक ऐलान नहीं था बल्कि इस आधिकारिक घोषणा का असर कुछ ऐसा हुआ कि आज विभिन्न सीमावर्ती जिलों में प्रक्रिया तेज़ करते हुए 1100 एकड़ से अधिक भूमि BSF को सौंपी जा चुकी है। इसका परिणाम ये है कि देश की सीमाएँ अब सुरक्षित होने वाली हैं। जिन बॉर्डर्स से अपनी मनमर्जी से बांग्लादेशी आते-जाते थे, वो अब सील हो रहे हैं।

आयुष्मान भारत की बंगाल में शुरुआत

इसी तरह केंद्र की क्रांतिकारी ‘आयुष्मान भारत योजना’, जिसे ममता बनर्जी ने सिर्फ़ राजनीतिक द्वेष के कारण राज्य में लागू नहीं किया था उसे शुभेंदु सरकार ने 16 अगस्त को पूरे राज्य में लागू कर दिया। इसके चलते आज बंगाल के लगभग 1 करोड़ 43 लाख परिवार यानी 6 करोड़ लोगों को हर साल 5 लाख रुपये तक के मुफ़्त कैशलेस इलाज का लाभ मिल सकेगा। यहां तक कि अब बंगाल के 1,240 निजी और 627 सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ, राज्य के नागरिक देशभर के 38 हज़ार से अधिक सूचीबद्ध अस्पतालों में मुफ़्त इलाज का लाभ उठा सकेंगे।

आवास योजना

ममता सरकार ने सिर्फ़ केंद्र सरकार से बैर के चलते राज्य के गरीब लोगों को आवास जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा था। यही नहीं प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर भी ममता सरकार में जमकर धांधली और भ्रष्टाचार की बातें सामने आईं थीं। मगर, शुभेंदु सरकार ने सत्ता में आते ही इस पूरे सिस्टम का शुद्धिकरण किया।

राज्य में इसे पारदर्शी बनाते हुए ‘पश्चिम बंगाल आवास योजना’ का रूप दिया गया। हाल ही में एक कार्यक्रम के जरिए राज्य के 10.20 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों के खातों में सीधे ₹6122.27 करोड़ की राशि भेजी गई है। इतना ही नहीं, पिछली टीएमसी सरकार द्वारा तैयार की गई 30 लाख लोगों की संदेहास्पद सूची की जाँच की गई तो उसमें 12 लाख से अधिक अयोग्य और फर्जी नाम सामने आए जिन्हें शुद्धिकरण के तहत हटाया गया।

सरकार का संदेश साफ है- बिना किसी धर्म, जाति या राजनीतिक भेदभाव के, योजना का शत-प्रतिशत लाभ केवल असली ज़रूरतमंदों को ही मिलना चाहिए। इसी का परिणाम है कि वर्तमान में 18 लाख से अधिक पात्र परिवारों के मकानों का निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर जारी है।

अन्नपूर्णा योजना

चुनाव के दौरान भाजपा का प्रमुख वादा था कि सरकार बनने पर महिलाओं के लिए ‘अन्नपूर्णा योजना’ लागू की जाएगी। सरकार ने पहले ही चरण में इसे ज़मीन पर उतारा। आज इस योजना के तहत राज्य की पात्र महिलाओं को ₹3,000 प्रति माह की सीधी वित्तीय सहायता दिए जाने का काम शुरू हो गया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार करीब 1.45 करोड़ पात्र महिलाओं को इस योजना के तहत 3,000 रुपए मिलेंगे।

तो ये वह कुछ जनकल्याणकारी योजनाएँ थीं जिनसे ममता सरकार ने राजनीतिक द्वेष व मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते बंगाल की जनता को आज तक वंचित रखा था।

अब बात करते हैं पश्चिम बंगाल के विकास और कानून व्यवस्था की…

मेट्रो का सुलझा मुद्दा

शुभेंदु सरकार आने से पहले बंगाल में कोलकाता मेट्रो की ऑरेंज लाइन से जुड़ा एक 62 मीटर का एक गैप भरने का काम प्रशासनिक अड़चनों के कारण रुका हुआ था।

ममता सरकार तो ट्रैफिक का हवाला देते हुए इसके खिलाफ कोर्ट तक चली गई थी कि ये नहीं हो सकता। लेकिन नई सरकार बनते ही जो अनुमति मिलने का काम सालों से अटका था, वह चंद दिनों में हल हो गया और फिर 15 मई को रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पुष्टि की कि कोलकाता पुलिस की अनुमति समेत तमाम एनओसी (NOC) जारी कर दी गई हैं।

जूट मीलें दोबारा शुरू

इसी तरह टीएमसी शासन में तालाबंदी का शिकार हुई ऐतिहासिक जूट मिलों को दोबारा शुरू किया गया। सुनने में भले ये सामान्य लगे लेकिन श्रम विभाग की त्वरित कार्रवाई के चलते जो 14 जूट मिलें फिर से चालू हुई हैं उनसे हज़ारों मज़दूरों को अपने ही राज्य में रोजगार मिल सकेगा।

कानून व्यवस्था और डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट

इसके बाद शुभेंदु सरकार के आने के बाद सबसे बड़ा असर अगर देखें तो राज्य की कानून-व्यवस्था पर साफ दिखाई देता है। उपद्रवियों और सिंडिकेट राज पर नकेल कसने के लिए ‘पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ लागू किया गया।

‘डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट’ नीति का असर जगह-जगह दिखा। याद करिए सत्ता परिवर्तन होते ही बांग्लादेशी सीमाओं पर भारत छोड़ने वाले घुसपैठियों की लंबी कतारें देखी गईं थीं। टीएमसी के नेता जहाँ राज्य में किसी भी घुसपैठिए की होने की बात को नकारते थे, वहीं उस कतार में समान बटोरे लोग खुद स्वीकार कर रहे थे कि वो घुसपैठिए हैं…

सालों से संरक्षण पा रहे अवैध घुसपैठियों के नेटवर्क पर जब शिकंजा कसा, तो सिंडिकेट चलाने वाले सहाबुद्दीन मंडल जैसे अपराधियों का पर्दाफाश हुआ, जो बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ कराने में मुख्य रूप से शामिल था।

सड़कों पर किसी समुदाय की मनमानी नहीं बल्कि कानून का राज दिखना शुरू हुआ- लोग ये देखकर हैरान थे कि आखिर जिस रेड रोड पर नमाज़ के नाम पर घटों तक यातायात ठप कर दिया जाता था और जिसे पूर्व मुख्यमंत्री खुद बढ़ावा देती थीं, 2026 की ईद पर वही ‘रेड रोड’ कैसे पूरी तरह सुचारू नजर आया। वहाँ नमाज के नाम पर कोई शक्ति प्रदर्शन नहीं, कोई आम जनता के लिए असुविधा नहीं थी।

क्या पड़ा बंगाल पर असर

कट-मनी वसूलने वाले टीएमसी नेताओं से हिसाब माँगना हो, बंद पड़े स्कूलों को खुलवाना हो और मंदिरों को पुनर्जीवित करना हो, या फिर उद्योगों के लिए भयमुक्त माहौल बनाना हो… इन 100 दिनों में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि बंगाल की जनता को अब बिना डरे सच बोलने का साहस मिल गया है। जो बदलाव कभी नामुमकिन कहे जाते थे, वे अब धरातल पर हकीकत बन चुके हैं।

मजहब देखकर वित्तीय सहायता देने का दौर पश्चिम बंगाल से अब जा चुका है और बंगाल के विकास की कहानी बेहतर इन्फ्रा, उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था, महिला कल्याण, युवाओं के लिए रोजगार देखकर तय होनी शुरू हो गई है।

भारत को ‘हजार टुकड़ों में बाँटने’ की रणनीति से शहजाद भट्टी के डिजिटल आतंकवाद तक: पाकिस्तान के ‘स्लीपर सेल’ वाले Proxy War की कहानी

12 अगस्त को देश के 14 राज्यों में पुलिस फोर्सेज एक साथ हरकत में आती हैं। अलग-अलग राज्यों में कार्रवाई होती है, 253 लोगों को हिरासत में लिया जाता है और 80 से ज्यादा FIR दर्ज होती हैं। इस पूरे ऑपरेशन की जानकारी 17 अगस्त को गृह मंत्री अमित शाह देते हैं और दावा करते हैं कि सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान समर्थित ‘शहजाद भट्टी नेटवर्क’ को ध्वस्त कर दिया है।

इस कार्रवाई को सिर्फ 12 अगस्त की एक बड़ी पुलिस कार्रवाई मानना इस पूरी कहानी को छोटा करके देखना होगा। इस ऑपरेशन की तैयारी करीब डेढ़ साल से चल रही थी। जिस नेटवर्क पर शिकंजा कसा गया, उसकी जड़ें कितनी गहरी थीं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी कड़ियाँ कश्मीर की वादियों से लेकर मुंबई की उन गलियों तक जाती दिखाई देती हैं, जहाँ से कभी डी-कंपनी जैसी अंडरवर्ल्ड की ताकत का जन्म हुआ था। उत्तर प्रदेश के माफिया अतीक अहमद से लेकर आज सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप्स की दुनिया तक इस कहानी के अलग-अलग किरदार सामने आते हैं।

शहजाद भट्टी पर बात करने से पहले यह समझना जरूरी है कि पाकिस्तान के उस आतंक के मॉडल की शुरुआत कहाँ से हुई, जिसने भारत के खिलाफ सीधी जंग के बजाय छद्म युद्ध को अपना हथियार बनाया।

जब पाकिस्तान ने सीधी जंग के बजाय छद्म युद्ध का रास्ता चुना

1947, 1965, 1971 और कारगिल के युद्धों में भारत से मिली शिकस्त के बाद पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी ISI के सामने एक बात धीरे-धीरे साफ होती गई कि भारत को पारंपरिक युद्ध में हराना आसान नहीं है। इसके बाद भारत के खिलाफ छद्म युद्ध यानी Proxy War की रणनीति को आगे बढ़ाया गया।

पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान ने भारत के भीतर अस्थिरता पैदा करने के लिए आतंकवाद, अलगाववाद और स्थानीय नेटवर्क का इस्तेमाल करना शुरू किया। इसी मॉडल का एक अहम हिस्सा थे- स्लीपर सेल।

जनरल जिया-उल-हक के शासन के दौर में पाकिस्तान की रणनीति और आक्रामक हुई। ‘Bleed India by a thousand cuts’ की सोच के तहत भारत को भीतर से कमजोर करने का मॉडल विकसित किया गया। इसी संदर्भ में K2 रणनीति का भी जिक्र आता है, जिसमें एक K कश्मीर और दूसरा खालिस्तान को दर्शाता था। बाद में ‘ऑपरेशन टुपैक’ के जरिए भारत में असंतोष और उग्रवाद को बढ़ावा देने की रणनीति को जमीन पर उतारने की कोशिश की गई।

पाकिस्तान ने सिर्फ सीमा पार से आतंकवादियों को भारत भेजने पर भरोसा नहीं किया। इसके साथ-साथ भारत के भीतर मौजूद युवाओं को प्रभावित करने, उन्हें कट्टरपंथ की तरफ ले जाने और जरूरत पड़ने पर उन्हें अपने नेटवर्क का हिस्सा बनाने की कोशिश भी की गई। यहीं से भारत में स्लीपर सेल के उस मॉडल को बढ़ावा मिला, जिसकी चुनौती आज भी सुरक्षा एजेंसियों के सामने बनी हुई है।

1993 मुंबई धमाके और डी-कंपनी का आतंकी नेटवर्क

भारत में स्लीपर सेल और स्थानीय आपराधिक नेटवर्क के आतंकवाद से जुड़ने का सबसे खौफनाक चेहरा 12 मार्च 1993 को सामने आया। मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया। इस हमले में 250 से ज्यादा लोगों की जान गई और सैकड़ों लोग घायल हुए।

इस पूरे मामले में पाकिस्तान की ISI और डी-कंपनी के बीच संबंधों की बात सामने आई। जाँच में यह आरोप सामने आया कि स्थानीय तस्करों और युवाओं को इस नेटवर्क में शामिल किया गया, कुछ लोगों को पाकिस्तान ले जाकर हथियार और विस्फोटकों की ट्रेनिंग दी गई और फिर उन्हें भारत में हमले के लिए तैयार किया गया।

इस घटना ने सुरक्षा एजेंसियों को एक बेहद अहम सबक दिया। खतरा हमेशा सीमा पार से आने वाले किसी आतंकवादी के रूप में दिखाई नहीं देगा। कई बार आतंकवाद के लिए जरूरी लोगों, संसाधनों, हथियारों और लॉजिस्टिक्स का नेटवर्क भारत के भीतर ही तैयार किया जा सकता है। यहीं से ‘स्लीपर सेल’ को समझना जरूरी हो जाता है।

आखिर स्लीपर सेल होता क्या है?

आसान भाषा में समझें तो स्लीपर सेल आतंकियों का ऐसा छिपा हुआ नेटवर्क है, जिसमें शामिल लोग हमेशा हथियार लेकर या किसी आतंकी संगठन के सदस्य के तौर पर सामने नहीं आते। वे आम लोगों की तरह सामान्य जीवन जीते रहते हैं और किसी खास समय या निर्देश का इंतजार करते हैं।

जरूरी नहीं कि स्लीपर सेल में शामिल व्यक्ति खुद किसी हमले को अंजाम दे। उसका काम किसी आतंकी संगठन के लिए ठिकाना उपलब्ध कराना, हथियार या पैसा पहुंचाना, किसी जगह की रेकी करना, नए लोगों को नेटवर्क से जोड़ना या हमलावरों तक जरूरी जानकारी पहुंचाना भी हो सकता है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि कई बार नेटवर्क में शामिल किसी व्यक्ति को पूरे नेटवर्क की जानकारी तक नहीं होती। उसे सिर्फ उतना ही काम बताया जाता है, जितना उसके लिए जरूरी है।

यही वजह है कि ऐसे नेटवर्क को पकड़ना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बेहद मुश्किल होता है। सीमा पार बैठा हैंडलर खुद भारत में मौजूद नहीं होता। वह भारत में मौजूद छोटे-छोटे स्थानीय संपर्कों के जरिए अपना काम करवाता है। एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से जुड़ता है, दूसरा तीसरे से और इस तरह एक ऐसा नेटवर्क तैयार होता है जिसकी पूरी तस्वीर जांच एजेंसियों को लंबे समय तक दिखाई नहीं देती।

आतंकवाद की जाँच का सवाल बदला

भारत में जब-जब बड़े आतंकी हमले हुए, जाँच एजेंसियों के सामने सिर्फ यह सवाल नहीं रहा कि आतंकवादी भारत में आया कहाँ से। सवाल धीरे-धीरे बदल गया।

वह भारत पहुँचने के बाद किससे मिला? किसने उसे रास्ता बताया? किसने उसे रहने की जगह दी? पैसा किसने पहुँचाया? हथियार किसने उपलब्ध कराए? किसने रेकी की? और अगर हमलावर वापस चला गया तो उसके पीछे भारत में कौन बचा रह गया? यही वह सोच थी जिसने स्लीपर सेल की जाँच को आतंकवाद विरोधी कार्रवाई का अहम हिस्सा बना दिया।

समय के साथ सुरक्षा एजेंसियों को यह भी समझ आने लगा कि आतंकवाद और स्थानीय अपराध की दुनिया हमेशा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जहाँ अपराधियों के पास पैसा, हथियार, स्थानीय संपर्क और लॉजिस्टिक्स होते हैं, वहीं आतंकवादी नेटवर्क को भी इन्हीं चीजों की जरूरत होती है। इसी बिंदु पर आतंकवाद और अंडरवर्ल्ड के रास्ते एक-दूसरे से जुड़ने लगते हैं।

अतीक अहमद तक पहुँची स्लीपर सेल की कहानी

स्लीपर सेल की इस लंबी कहानी की एक कड़ी उत्तर प्रदेश के माफिया अतीक अहमद से भी जुड़ती है। अतीक अहमद पर 100 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज थे। 2005 में बसपा विधायक राजू पाल की हत्या के मामले में उसे बाद में उम्रकैद की सजा भी सुनाई गई। फरवरी 2023 में गवाह उमेश पाल और दो पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद उसका नाम एक बार फिर देशभर में चर्चा में आया।

उमेश पाल हत्याकांड के बाद हुई पूछताछ और सामने आए दस्तावेजों में अतीक अहमद के पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI और लश्कर-ए-तैयबा से संपर्क के दावे सामने आए। उसके रिमांड दस्तावेज में हथियारों की उस सप्लाई चेन का भी जिक्र था, जिसमें पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए पंजाब में हथियार गिराए जाने की बात कही गई थी।

इन हथियारों को स्थानीय नेटवर्क के जरिए इकट्ठा किया जाता और फिर अलग-अलग आपराधिक तथा आतंकी नेटवर्क तक पहुंचाया जाता था। आरोपों के मुताबिक कुछ हथियार पैसे के बदले अतीक के नेटवर्क तक भी पहुंचे।

अतीक अहमद की मौत के साथ उसका अध्याय जरूर बंद हो गया, लेकिन जिस गठजोड़ की तस्वीर उसकी पूछताछ और जांच में सामने आई थी, वह खत्म नहीं हुआ। अगले कुछ वर्षों में यही गठजोड़ एक नए और ज्यादा डिजिटल रूप में दिखाई देने लगा। और इस नई कड़ी के केंद्र में एक नाम बार-बार सामने आया- शहजाद भट्टी।

कौन है शहजाद भट्टी और कैसे तैयार हुआ उसका नेटवर्क?

शहजाद भट्टी पाकिस्तान का सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और गैंगस्टर बताया जाता है। आरोप है कि उसने इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल युवाओं तक पहुंच बनाने, उन्हें प्रभावित करने और सीमा पार से आपराधिक तथा आतंकी गतिविधियों के लिए नेटवर्क तैयार करने में किया।

यानी जिस आतंक का पुराना मॉडल हथियारों, तस्करी और आमने-सामने के संपर्क पर टिका था, उसमें अब सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की एक नई परत जुड़ गई थी।

भट्टी पर आरोप है कि उसने भारत में दहशत फैलाने के लिए TTH नाम का एक नया मुखौटा संगठन खड़ा किया। इसका इस्तेमाल कथित तौर पर नार्को-टेररिज्म और हिंसक गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए किया गया। उसका तरीका भी इसी नए मॉडल को दिखाता है।

शुरुआत में युवाओं को छोटे-छोटे काम दिए जाते। कुछ मामलों में 5,000 से 10,000 रुपये तक देकर सार्वजनिक जगहों की रेकी कराने या पोस्टर लगाने जैसे काम करवाए जाते। धीरे-धीरे यही संपर्क बड़े कामों में बदले जाते और आरोप है कि बाद में कुछ युवाओं को हथियार उपलब्ध कराकर टारगेट किलिंग और ग्रेनेड हमलों जैसी गतिविधियों में धकेला गया।

यानी पहले भरोसा और पैसा, फिर छोटा अपराध और उसके बाद धीरे-धीरे आतंक की दुनिया में प्रवेश।

जालंधर से सिरसा और अंबाला तक धमाकों की कड़ियाँ

शहजाद भट्टी नेटवर्क पर आरोपों की गंभीरता का अंदाजा उन मामलों से लगाया जा सकता है, जिनमें उसका नाम जाँच के दौरान सामने आया। मार्च 2025 में पंजाब के जालंधर में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रोजर संधू के घर पर ग्रेनेड हमला हुआ। अप्रैल 2026 में एनआईए ने इस मामले में शहजाद भट्टी को फरार आरोपित के रूप में चार्जशीट किया।

इसके बाद हरियाणा के सिरसा महिला पुलिस थाने में नवंबर 2025 में हुए विस्फोट और अंबाला के बलदेव नगर पुलिस स्टेशन में जनवरी 2026 में हुए धमाके की साजिश में भी भट्टी का नाम सामने आया।

सिरसा मामले में मई 2026 में एनआईए ने शहजाद भट्टी समेत 9 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। इसमें पाकिस्तान स्थित हैंडलर सोहेल अहमद उर्फ सोहेल बलोच का नाम भी शामिल था। आरोप सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहे। हिमाचल प्रदेश के नालागढ़ में बब्बर खालसा से जुड़े लोगों के साथ मिलकर ग्रेनेड हमले की साजिश रचने के आरोप भी भट्टी नेटवर्क से जुड़े।

इन घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ देखा जाए तो तस्वीर ज्यादा साफ होती है। एक ऐसा नेटवर्क सामने आता है जिसमें पाकिस्तान में बैठे हैंडलर, सोशल मीडिया संपर्क, स्थानीय अपराधी, छोटे स्तर पर काम करने वाले युवा और हथियारों की सप्लाई सब एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।

12 अगस्त की कार्रवाई ने खोली नेटवर्क की परतें

ऐसे नेटवर्क पर शिकंजा कसने की तैयारी लंबे समय से चल रही थी और स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले 12 अगस्त को सुरक्षा एजेंसियों ने एक साथ बड़ी कार्रवाई की।

उत्तर प्रदेश में 62, हरियाणा में 52, दिल्ली में 51, पंजाब में 44 और राजस्थान में 15 संदिग्धों को हिरासत में लिया गया। कुल मिलाकर 14 राज्यों में 253 लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई। कार्रवाई सिर्फ गिरफ्तारी या हिरासत तक सीमित नहीं थी। जाँच के दौरान जो सामान बरामद हुआ, उसने सुरक्षा एजेंसियों के सामने मौजूद खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट किया।

पुलिस और जाँच एजेंसियों को पाकिस्तानी हथियार फैक्ट्री की मुहर वाले ग्रेनेड, IED यानी इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस, पिस्तौल और बड़ी संख्या में जिंदा कारतूस बरामद होने की जानकारी दी गई। इसके अलावा ऐसे हाई-टेक CCTV कैमरे भी बरामद किए गए, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर पुलिस और सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर नजर रखने के लिए किया जा रहा था।

यानी नेटवर्क की तैयारी सिर्फ हमला करने तक सीमित नहीं थी। निगरानी, रेकी, हथियार, विस्फोटक और स्थानीय संपर्क हर स्तर पर एक व्यवस्था तैयार किए जाने के संकेत मिले। इस कार्रवाई के बाद UAPA, आर्म्स एक्ट और NDPS एक्ट के तहत 80 से ज्यादा एफआईआर दर्ज की गईं। लेकिन सवाल अब भी बाकी है।

शहजाद भट्टी नेटवर्क खत्म भी तो स्लीपर सेल का क्या?

किसी एक नेटवर्क पर कार्रवाई हो जाना और उस मॉडल का पूरी तरह खत्म हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं। जाँच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ऐसे नेटवर्क में एक व्यक्ति के पकड़े जाने के बाद दूसरा व्यक्ति उसकी जगह ले सकता है। सोशल मीडिया पर एक अकाउंट बंद होने के बाद दूसरा अकाउंट बनाया जा सकता है। एक स्थानीय संपर्क के पकड़े जाने के बाद दूसरा संपर्क तैयार किया जा सकता है।

यही कारण है कि स्लीपर सेल के खिलाफ लड़ाई सिर्फ किसी एक संगठन या व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में जाँच एजेंसियों को आतंकवाद और गैंगस्टर नेटवर्क के बीच बढ़ते गठजोड़ के संकेत भी मिले हैं। 2024 में एनआईए ने अर्श डल्ला और दूसरे आरोपितों से जुड़े टेरर-गैंगस्टर नेक्सस मामले में चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में 30 ठिकानों पर छापेमारी की थी।

इसका मतलब साफ है कि आतंकी नेटवर्क के लिए अपराध की दुनिया अब हमेशा अलग दुनिया नहीं रह गई है। कई मामलों में दोनों के रास्ते एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं।

गैंगस्टर नेटवर्क स्थानीय संपर्क और पैसा दे सकता है। आतंकी नेटवर्क हथियार और सीमा पार से हैंडलिंग उपलब्ध करा सकता है। सोशल मीडिया नए लोगों तक पहुंच बनाने का रास्ता दे सकता है और ड्रग्स का नेटवर्क पैसे का इंतजाम कर सकता है। यानी आतंक का मॉडल अब सिर्फ बंदूक और बम तक सीमित नहीं रह गया है।

अब आतंक की भर्ती मोबाइल स्क्रीन से भी हो सकती है

इस बदलते मॉडल का एक और उदाहरण दिल्ली से जुड़े आतंकी मामले में सामने आया, जहाँ उमर नाम के आरोपित पर सोशल मीडिया के जरिए लोगों से संपर्क बनाने और उन्हें जैश-ए-मोहम्मद की विचारधारा से प्रभावित करने का आरोप लगा। जांच में उसके जरिए एक बड़े स्लीपर सेल नेटवर्क को तैयार करने की कोशिश की बात सामने आई।

यही बदलाव सबसे ज्यादा चिंता पैदा करता है। एक समय था जब आतंकवादी नेटवर्क में शामिल होने के लिए किसी व्यक्ति को सीमा पार जाना पड़ता था, किसी संपर्क के जरिए किसी संगठन तक पहुंचना पड़ता था या किसी स्थानीय मॉड्यूल से मिलना पड़ता था। अब मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप्स उस दूरी को कम कर सकते हैं।

यानी जो खतरा कभी सरहद के उस पार दिखाई देता था, वह अब आपके शहर, आपकी गली और यहां तक कि आपके मोबाइल की स्क्रीन तक पहुँच सकता है। शहजाद भट्टी की कहानी को सिर्फ एक पाकिस्तानी गैंगस्टर की कहानी समझना भी सही नहीं होगा। यह उस बदलते आतंकी मॉडल की कहानी है, जिसमें कई अलग-अलग दुनिया एक-दूसरे से जुड़ रही हैं।

आतंकवाद, हथियार, ड्रग्स, गैंगस्टर नेटवर्क, पैसा, सोशल मीडिया और सीमा पार बैठे हैंडलर जब ये सभी एक ही सिस्टम का हिस्सा बनने लगते हैं तो खतरा सिर्फ किसी एक आतंकी हमले का नहीं रह जाता। यह खतरा देश की सामान्य कानून-व्यवस्था तक पहुँच जाता है।

यही वजह है कि स्लीपर सेल को पकड़ना अब सिर्फ आतंकवाद रोकने की लड़ाई नहीं है। यह उस पूरे नेटवर्क को तोड़ने की लड़ाई है जो अपराध और आतंक के बीच की दूरी को लगातार कम कर रहा है।

शहजाद भट्टी की कहानी इसी बदलते मॉडल की कहानी है। एक ऐसा मॉडल जिसमें अंडरवर्ल्ड की पुरानी लॉजिस्टिक्स, आतंकवाद की सीमा पार फंडिंग, ड्रग्स का पैसा और सोशल मीडिया की नई दुनिया एक-दूसरे से जुड़कर एक नया नेटवर्क तैयार कर रहे हैं। और शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि आतंक हमेशा बम या ग्रेनेड लेकर नहीं आता। कभी-कभी वह पहले सिर्फ एक फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजता है।

भारतीय परमाणु हथियारों के विरोध से लेकर ‘भगवा आतंकवाद’ के नैरेटिव तक: चिदंबरम के खुद को ‘दिमागी नक्सल’ स्वीकारने पर क्यों हैरान नहीं है कोई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए शब्द ‘दिमागी नक्सल’ से वामपंथी और कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम बिलबिलाया हुआ है। हाल में इसी टिप्पणी को लेकर पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुद को गर्व से ‘दिमागी नक्सल’ घोषित किया। उन्होंने लिखा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है।

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ और जंगल में बंदूकें थामे ‘सशस्त्र नक्सलियों’ के बीच का फर्क साफ किया था। उन्होंने बताया कि जहाँ हथियारबंद नक्सली छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हिंसा और खूनी खेल खेलते हैं, वहीं ये ‘दिमागी नक्सल’ सत्ता के गलियारों, वातानुकूलित कमरों और शैक्षणिक संस्थानों में बैठकर उसी जनसंहारी विचारधारा को खाद-पानी देते हैं।

इनका मुख्य मकसद भारत की संप्रभुता को चोट पहुँचाना और लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त करना है। पीएम मोदी ने देश को इन छद्म-बुद्धिजीवियों से सतर्क रहने की चेतावनी दी, जो युवाओं के मन में जहर घोलकर उन्हें काल्पनिक ‘क्रांति’ का मोहरा बनाते हैं।

हालाँकि, देश के पूर्व गृह मंत्री का खुलकर देशद्रोही और हिंसक नक्सली विचारधारा के पक्ष में खड़े होना बेहद शर्मनाक है, लेकिन कॉन्ग्रेस के इतिहास को देखते हुए इसमें कोई हैरानी नहीं होती।

चिदंबरम की यह स्वीकारोक्ति कोई नई बात नहीं है। साल 2010 में, जब वे देश के गृह मंत्री थे, तब उन्होंने जेएनयू (JNU) के मंच से सरेआम देश विरोधी ताकतों के आगे घुटने टेकने की पेशकश की थी। उन्होंने कहा था कि सरकार नक्सलियों से बिना उनके हथियार डाले भी बातचीत करने को तैयार है। उनका तर्क था कि चूँकि नक्सली ‘सशस्त्र संघर्ष’ में भरोसा रखते हैं, इसलिए सरकार उनसे हथियार छोड़ने को नहीं कहेगी।

चौंकाने वाली बात यह है कि चिदंबरम ने यह बयान दंतेवाड़ा में हुए उस बर्बर माओवादी हमले के ठीक एक महीने बाद दिया था, जिसमें 76 सीआरपीएफ (CRPF) जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। देश के वीर जवानों की शहादत पर मरहम लगाने के बजाय, कॉन्ग्रेसी गृह मंत्री नक्सलियों को पुचकार रहे थे और जेएनयू के वामपंथी गढ़ में इस बयान पर खूब तालियाँ पीटी गई थीं।

चिदंबरम के कार्यकाल में नक्सलवाद अपने चरम पर था, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने न केवल इस खतरे को अनदेखा किया, बल्कि तुष्टिकरण की नीति अपनाकर देश को आग में झोंकने का काम किया। चिदंबरम का नक्सली हमदर्दी का यह पुराना ट्रैक रिकॉर्ड और उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा विरोधी सोच उनके ‘दिमागी नक्सल’ होने के दावे की पूरी तरह पुष्टि करती है।

एक तरफ जहाँ उनका दिल खूनी माओवादियों के लिए पसीजता रहा है, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने और उनकी पार्टी ने सनातन और पूरे हिंदू समाज को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कॉन्ग्रेस के वोटबैंक तुष्टिकरण का सबसे घिनौना चेहरा तब सामने आया जब चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने ‘हिंदू आतंकवाद’ और ‘भगवा आतंकवाद’ जैसी काल्पनिक अवधारणाएँ गढ़ीं।

2008 के मालेगाँव बम विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और सेवारत सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित को झूठे मामलों में फँसाकर जेलों में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया, ताकि ‘हिंदू आतंक’ का झूठा नैरेटिव खड़ा किया जा सके। हालाँकि, 17 साल की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत में कॉन्ग्रेस का यह सफेद झूठ पूरी तरह बेनकाब हो गया और पूरा मामला औंधे मुंह गिर पड़ा।

इतना ही नहीं, चिदंबरम की भारत विरोधी और विकास विरोधी मानसिकता उनके हर फैसले में साफ झलकती है। जब मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार और काले धन पर नकेल कसने के लिए डिजिटल पेमेंट और नोटबंदी जैसी क्रांतिकारी नीतियाँ लागू कीं, तो चिदंबरम ने इसका कड़ा विरोध किया और इसे ‘घोटाला’ तक बता डाला। जबकि विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्टों ने यह साबित किया कि कैश-आधारित फंडिंग बंद होने से आतंकवाद और नक्सलवाद की रीढ़ की हड्डी टूट गई।

चिदंबरम का भारत की रक्षा तैयारियों और सैन्य मजबूती से भी पुराना बैर रहा है। 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पोखरण-द्वितीय परीक्षण करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाया, तब संसद में चिदंबरम ने इसका पुरजोर विरोध किया था।

उनका बचकाना तर्क था कि भारत को परमाणु हथियार बनाने के बजाय अपनी खोखली ‘नैतिक श्रेष्ठता’ बनाए रखनी चाहिए। भारत के आक्रामक और हिंसक पड़ोसियों को दरकिनार कर देश की सुरक्षा को दांव पर लगाने का तर्क देना यह साबित करता है कि चिदंबरम का दिमाग हमेशा से भारत विरोधी और ‘दिमागी नक्सलवादी’ सोच से ही संचालित होता रहा है।

मैन्युफैक्चरिंग से सॉफ्ट पावर तक… क्या है ‘शक्ति की सप्तधारा’? PM मोदी ने लाल किले से दिया विकसित भारत का नया विजन, जानें- 7 शक्तियों से क्या बदलेगा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए विकसित भारत के निर्माण के लिए ‘शक्ति की सप्तधारा’ का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि देश अब ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ पर चल पड़ा है और आने वाले दिनों में ‘नेक्स्ट लेवल रिफॉर्म’ की ओर बढ़ना है। इसके लिए सरकार ही नहीं, बल्कि समाज, उद्योग, उत्पादक और किसान हर किसी को अपनी पारंपरिक व्यवस्थाओं और सोच में बदलाव करना होगा। प्रधानमंत्री ने अगले 5-7 वर्षों में ऐसी उपलब्धियाँ हासिल करने का लक्ष्य रखा है, जो पिछले 5-7 दशकों में नहीं हो सकी थीं।

पीएम मोदी ने इसके लिए देश की सात ऐसी शक्तियों को सामने रखा, जिनके सहारे भारत को नई गति और नई ऊँचाई देने की बात कही। ये सात धाराएँ हैं- मैन्युफैक्चरिंग पावर, कृषि और फूड प्रोडक्शन, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन, गतिशक्ति, रक्षा शक्ति, ग्रीन और ब्लू इकॉनमी और भारत की सॉफ्ट पावर।

  1. मैन्युफैक्चरिंग पावर

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत को मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बहुत आगे बढ़ाना होगा। केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि छोटे-छोटे पुर्जों से लेकर बड़े-बड़े प्रोडक्ट तक बनाने होंगे। डिजाइन से लेकर मैन्युफैक्चरिंग तक पूरी वैल्यू चेन भारत में होनी चाहिए और भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का भरोसेमंद केंद्र बनना होगा।

उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में तीन बातों ‘कॉस्ट, क्वालिटी और स्केल’ पर विशेष जोर दिया। भारतीय फैक्ट्रियाँ कॉम्पिटिटिव हों, प्रोडक्ट्स यूजर फ्रेंडली हों और पैकेजिंग दुनिया के लोगों को आकर्षित करने वाली हो। प्रधानमंत्री ने ‘जीरो डिफेक्ट’ और ‘प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग’ को भारत की पहचान बनाने की बात कही।

उन्होंने मैन्युफैक्चरर्स, एंटरप्रेन्योर्स और एमएसएमई से कहा कि ग्लोबल मार्केट में भारत की पहचान विश्वसनीयता और गुणवत्ता के आधार पर होनी चाहिए। इसके लिए क्वालिटी से कोई समझौता नहीं होना चाहिए और हमारा मंत्र होना चाहिए- ‘क्वालिटी, क्वालिटी, क्वालिटी।’ यही भारत की ग्लोबल ब्रांड वैल्यू बनेगी।

  1. कृषि और फूड प्रोडक्शन

PM मोदी ने ‘शक्ति की सप्तधारा’ की दूसरी शक्ति कृषि और फूड प्रोडक्शन को बताया। उन्होंने फूड प्रोसेसिंग को बढ़ाने पर जोर दिया और कहा कि अब दुनिया के बाजार भारतीय किसानों के लिए खुले हैं। एफपीए के कारण बड़ा बाजार मिल रहा है और भारत को वहाँ पहुँचने का प्रयास करना होगा।

प्रधानमंत्री ने खेत से एक्सपोर्ट मार्केट तक जाने की बात कही। उन्होंने कहा कि भारत के पारंपरिक खानपान, मिलेट्स, मसाले, फल और फूल जैसे उत्पादों में वैश्विक ब्रांड बनने की क्षमता है। किसानों को केमिकल फ्री खेती को बल देने की बात कहते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया में इसकी माँग और बढ़ने वाली है।

PM मोदी ने कहा कि जब भारत के एग्रो प्रोडक्ट जब ग्लोबल पैरामीटर्स पर खरे उतरेंगे, तो उन्हें दुनिया के बाजारों तक आसानी से पहुँचाया जा सकेगा।

  1. टेक्नोलॉजी और इनोवेशन

तीसरी शक्ति है टेक्नोलॉजी और इनोवेशन। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज का समय एआई, क्वांटम, स्पेस, रोबोटिक्स और डेटा सेंटर का है। इमर्जिंग टेक्नोलॉजी लगातार नई चुनौतियाँ दे रही है और एक नया क्षेत्र खुल चुका है।

उन्होंने साफ कहा कि भारत को दुनिया के लिए केवल एक बाजार नहीं बनना है बल्कि इनोवेशन का हब बनना है। यूपीआई और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का उदाहरण देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत ने अपनी ताकत दुनिया को दिखा दी है।

अब डिजिटल पब्लिक टेक्नोलॉजी को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाने और नेक्स्ट जनरेशन कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी में भारत को लीड करने का लक्ष्य रखना होगा। प्रधानमंत्री ने ‘मेड इन इंडिया 6G’ को हर कोने तक पहुँचाने की दिशा में तेजी से काम करने की बात कही।

  1. गतिशक्ति

सप्तधारा की चौथी शक्ति है- गतिशक्ति। प्रधानमंत्री ने देश के भीतर सीमलेस और फास्ट कनेक्टिविटी पर जोर दिया। शहरों को हाई स्पीड रेल से जोड़ने, मॉडर्न हाईवे बनाने, इनलैंड वाटर बेस और एयरपोर्ट विकसित करने तथा मल्टीमोडल लॉजिस्टिक की व्यवस्था खड़ी करने की बात उन्होंने कही है।

उन्होंने कहा कि भारत के पोर्ट्स केवल सामान उतारने और चढ़ाने की जगह नहीं होने चाहिए। पोर्ट्स को ‘पोर्ट लेड डेवलपमेंट’ और ग्रोथ की दिशा में आगे बढ़ाना होगा।

  1. रक्षा शक्ति

पाँचवीं शक्ति है- रक्षा शक्ति। PM मोदी ने कहा कि रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना अब भारत ने भी अनुभव कर लिया है और दुनिया ने भी इसका महत्व समझ लिया है। जब दुनिया अपनी-अपनी सोच रही है, तब भारत केवल दुनिया के लिए बाजार बनकर नहीं रह सकता।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत को रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना होगा और नेक्स्ट जनरेशन डिफेंस टेक्नोलॉजी विकसित करके ग्लोबल सप्लायर बनने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

प्रधानमंत्री ने ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम विकसित करने तथा हाइपरसोनिक डिफेंस टेक्नोलॉजी में नेतृत्व लेने की बात कही। उन्होंने साइबर सुरक्षा को भी रक्षा का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया और कहा कि इसमें देश के युवाओं की क्षमता का उपयोग भारत और दुनिया के लिए किया जा सकता है।

  1. ग्रीन और ब्लू इकॉनमी

छठी शक्ति है ग्रीन इकॉनमी और ब्लू इकॉनमी, जो ग्रीन जॉब्स को भी जन्म देती है। प्रधानमंत्री ने ग्रीन हाइड्रोजन, रिन्यूएबल एनर्जी, एनर्जी स्टोरेज, ग्रीन मोबिलिटी और ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग को ग्लोबल स्केल पर आगे बढ़ाने की बात कही।

उन्होंने कहा कि जब दुनिया ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा कर रही है, तब भारत समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है। भारत के पास एक बड़े ग्रीन मूवमेंट की ताकत है।

इसके साथ ही भारत के पास ब्लू इकॉनमी के लिए भी बड़ा अवसर है। लंबी कोस्टलाइन, फिशरीज, कोस्टल टूरिज्म और ओशन टेक्नोलॉजी जैसे कई क्षेत्रों में भारत आगे बढ़ सकता है।

  1. भारत की सॉफ्ट पावर

सप्तधारा की सातवीं शक्ति है- भारत की सॉफ्ट पावर। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की सॉफ्ट पावर की अपनी एक बड़ी ताकत है। योग ने पूरी दुनिया को भारत के साथ जोड़ा है और दुनिया के लिए ऊर्जा तथा भारत के लिए विश्वास का कारण बनता जा रहा है।

भारत के पास आस्था के केंद्र, आयुर्वेद और होलिस्टिक हेल्थ केयर की व्यवस्था है। प्रधानमंत्री ने ‘हील इन इंडिया’ के माध्यम से भी भारत के सामर्थ्य को दुनिया तक ले जाने की बात कही।

इसके साथ ही हैंडीक्राफ्ट, संस्कृति, फिल्में, क्रिएटिव वर्ल्ड, वीएफएक्स, एनिमेशन, गेमिंग और डिजिटल कंटेंट में भारत के लिए बड़ी संभावनाएँ हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि क्रिएटिव वर्ल्ड में भारत अपना रुतबा दिखा सकता है और इसे वैश्विक सामर्थ्य के रूप में विकसित करना होगा।

उन्होंने वर्ल्ड ऑडियो विजुअल एंड एंटरटेनमेंट समिट यानी वेव समिट को भी भारत की क्रिएटिव ताकत से जोड़ते हुए कहा कि दुनिया धीरे-धीरे इसकी राह देख रही है।

भारत की विशाल वन्य संपदा और 100 से अधिक नेशनल पार्कों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने में भारत अभी पीछे है। सॉफ्ट पावर के माध्यम से दुनिया के पर्यटकों को भारत की ओर आकर्षित करने का अवसर है।

स्पोर्ट्स और कॉन्सर्ट इकॉनमी में भी भारत के लिए बड़ी संभावनाएँ हैं। दुनिया का हर कलाकार कभी न कभी भारत की धरती पर अपना कॉन्सर्ट करना चाहता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस अवसर को मोबिलाइज करने के लिए व्यवस्थाएँ खड़ी करनी होंगी।

इन सात शक्तियों से क्या बदलेगा?

‘शक्ति की सप्तधारा’ को अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूरी बात के संदर्भ में समझें तो इसका मतलब सिर्फ सात क्षेत्रों में अलग-अलग काम करना नहीं है। असल विचार देश की अलग-अलग ताकतों को एक साथ जोड़कर विकास की ऐसी रफ्तार तैयार करना है, जिसमें किसान, उद्योग, युवा, तकनीक, रोजगार, सुरक्षा, पर्यावरण और भारत की वैश्विक पहचान सब एक-दूसरे से जुड़े हों।

प्रधानमंत्री ने जिस ‘होलिस्टिक अप्रोच’ की बात की, उसका मतलब यही है कि देश की प्रगति को अलग-अलग खाँचों में नहीं देखा जाए। एक क्षेत्र में आगे बढ़ने का फायदा दूसरे क्षेत्र को भी मिले और सभी शक्तियाँ मिलकर भारत को नई गति दें।

इसका सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि भारत केवल दुनिया का एक बड़ा बाजार बनकर नहीं रहेगा। प्रधानमंत्री की बात में बार-बार यह जोर दिखाई देता है कि भारत को दुनिया के लिए उत्पादन करना है, अपनी पूरी वैल्यू चेन तैयार करनी है, नई तकनीक विकसित करनी है और अपने उत्पादों को वैश्विक स्तर की गुणवत्ता के साथ दुनिया तक पहुँचाना है।

इसे आसान भाषा में समझें तो भारत में चीजें केवल असेंबल न हों बल्कि उनके छोटे-छोटे पुर्जों से लेकर डिजाइन और अंतिम उत्पाद तक की पूरी व्यवस्था भारत में तैयार हो। इससे भारतीय उद्योग की क्षमता बढ़ेगी और वैश्विक सप्लाई चेन में भारत को एक भरोसेमंद केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश होगी।

इसी का सीधा संबंध किसानों से भी जुड़ता है। अगर भारत उत्पादन करता है, फूड प्रोसेसिंग बढ़ाता है और बेहतर पैकेजिंग के साथ अपने उत्पादों को दुनिया तक पहुँचाता है तो खेत और वैश्विक बाजार के बीच की दूरी कम होगी।

भारत के मिलेट्स, मसाले, फल, फूल और पारंपरिक खानपान केवल स्थानीय उत्पाद नहीं रहेंगे बल्कि दुनिया के बाजार में भारतीय पहचान के साथ पहुँच सकते हैं। इसके लिए गुणवत्ता और वैश्विक मानकों पर खरा उतरना जरूरी होगा। यानी खेती को केवल उत्पादन से जोड़कर नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट से जोड़कर देखने की दिशा बनती है।

दूसरी तरफ, तकनीक इस पूरी व्यवस्था को गति देने वाली ताकत बन सकती है। AI, क्वांटम, रोबोटिक्स, स्पेस, डेटा सेंटर और नई कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भारत अगर सिर्फ तकनीक का उपभोक्ता बनने के बजाय उसे विकसित करने और दुनिया तक पहुँचाने की क्षमता हासिल करता है, तो इसका असर उद्योग, शिक्षा, रक्षा, संचार और रोजगार हर क्षेत्र पर पड़ेगा।

UPI और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का उदाहरण देकर प्रधानमंत्री ने यही दिखाया कि भारत ऐसी तकनीक बना सकता है जिसे दुनिया अपना सकती है। अब इसी क्षमता को अगली पीढ़ी की तकनीकों में ले जाने की बात है।

इसके साथ मजबूत कनेक्टिविटी जरूरी है। देश में हाई स्पीड रेल, आधुनिक हाईवे, एयरपोर्ट, इनलैंड वाटर और मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था मजबूत होगी तो उत्पादन को बाजार तक पहुँचाना आसान होगा।

उद्योगों की लागत कम हो सकती है, सामान तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुँच सकता है और देश के अलग-अलग हिस्से बेहतर तरीके से आपस में जुड़ सकते हैं। पोर्ट्स को केवल माल चढ़ाने-उतारने की जगह न मानकर उनके आसपास विकास की नई गतिविधियाँ खड़ी करने की बात भी इसी सोच का हिस्सा है।

इस पूरी आर्थिक ताकत के साथ सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। इसलिए रक्षा में आत्मनिर्भरता को भी इसी बड़ी तस्वीर में रखा गया है। भारत अगर ड्रोन, काउंटर-ड्रोन, हाइपरसोनिक डिफेंस और साइबर सुरक्षा जैसी अगली पीढ़ी की तकनीक खुद विकसित करता है तो इससे केवल देश की सुरक्षा मजबूत नहीं होगी बल्कि भारत के लिए दुनिया को रक्षा तकनीक और उपकरण देने का अवसर भी पैदा होगा। यानी आत्मनिर्भरता का लक्ष्य केवल अपनी जरूरत पूरी करना नहीं, बल्कि भारत को ग्लोबल सप्लायर बनाने तक ले जाना है।

इसी तरह विकास की इस पूरी प्रक्रिया में ऊर्जा और पर्यावरण को पीछे नहीं छोड़ा जाना है। ग्रीन हाइड्रोजन, रिन्यूएबल एनर्जी, एनर्जी स्टोरेज, ग्रीन मोबिलिटी और ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों को आगे बढ़ाने का मतलब भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए अभी से तैयारी करना है। इसके साथ भारत की समुद्री सीमा और समुद्र से जुड़े संसाधनों को ब्लू इकॉनमी के रूप में देखने की बात है। फिशरीज, कोस्टल टूरिज्म और ओशन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्र आर्थिक गतिविधियों के नए रास्ते खोल सकते हैं।

और फिर आती है भारत की वह ताकत जो केवल फैक्ट्री, मशीन या तकनीक से नहीं बनती और वो है… भारत की सॉफ्ट पावर। योग, आयुर्वेद, आस्था, संस्कृति, हैंडीक्राफ्ट, फिल्में, वीएफएक्स, एनिमेशन, गेमिंग और डिजिटल कंटेंट के जरिए भारत दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना सकता है। पर्यटन को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है।

भारत के नेशनल पार्क, वन्य संपदा, संस्कृति और विरासत विदेशी पर्यटकों को आकर्षित कर सकते हैं। इसी तरह कॉन्सर्ट और स्पोर्ट्स जैसे क्षेत्रों में दुनिया के कलाकारों और दर्शकों को भारत तक लाने की संभावनाएँ हैं। इससे केवल भारत की छवि मजबूत नहीं होगी, बल्कि पर्यटन और क्रिएटिव इंडस्ट्री में आर्थिक गतिविधियाँ भी बढ़ेंगी।

इन सभी चीजों को जोड़कर देखें तो प्रधानमंत्री का संदेश यह है कि भारत की अगली विकास यात्रा किसी एक मंत्रालय, किसी एक उद्योग या किसी एक वर्ग के भरोसे पूरी नहीं होगी। एक तरफ किसान उत्पादन करेगा, दूसरी तरफ उद्योग उसे प्रोसेस और पैकेज करेगा, तकनीक गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाएगी, बेहतर कनेक्टिविटी उसे देश और दुनिया के बाजार तक पहुँचाएगी, आत्मनिर्भर रक्षा भारत की सुरक्षा मजबूत करेगी और ग्रीन एनर्जी भविष्य की अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाएगी। वहीं भारत की संस्कृति, पर्यटन और क्रिएटिव ताकत दुनिया में भारत के लिए आकर्षण पैदा करेगी।

युवाओं की भूमिका भी इस पूरी तस्वीर के केंद्र में है। प्रधानमंत्री ने शुरुआत में ही कहा कि उनकी शक्ति को राष्ट्र निर्माण में जोड़ा जाएगा। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में रोजगार और अवसर केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहने वाले हैं। मैन्युफैक्चरिंग से लेकर एआई, रक्षा तकनीक, साइबर सुरक्षा, ग्रीन एनर्जी, गेमिंग, एनीमेशन और स्पेस जैसे नए क्षेत्रों में युवाओं की क्षमता का इस्तेमाल करने की कोशिश होगी।

इसलिए ‘शक्ति की सप्तधारा’ का असली अर्थ सात अलग-अलग घोषणाओं से कहीं बड़ा है। यह भारत की आर्थिक, तकनीकी, सामरिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक ताकत को एक साथ इस्तेमाल करने की सोच है जिसमें सरकार, समाज, उद्योग, उत्पादक और किसान सभी को इसमें अपनी भूमिका निभानी है।

अंततः लक्ष्य यही है कि भारत उत्पादन भी करे, दुनिया को तकनीक भी दे, अपने किसानों के उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुँचाए, अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर बने, स्वच्छ ऊर्जा और समुद्री अर्थव्यवस्था में आगे बढ़े और अपनी संस्कृति तथा रचनात्मक शक्ति के जरिए दुनिया को आकर्षित करे।