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‘डिटेंशन कैंप में एक भी बंगाली हिंदू नहीं’: CM हिमंता बोले- CAA से मिला संरक्षण, समझें- इस नेता ने कैसे पाट दी असमिया-गैर असमिया हिंदुओं के बीच की खाईं

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने वह कर दिखाया है, जिसे असंभव माना जाता था। उन्होंने राज्य में रहने वाले असमिया हिंदू और बंगाली हिंदू समुदाय के बीच मौजूद मतभेदों और तनाव को खत्म कर दिया है।

दशकों तक असम असमिया और बंगाली आबादी के बीच जातीय तनाव की आग में सुलगता रहा। बड़े पैमाने पर पलायन, धार्मिक उत्पीड़न, जनसंख्या में बदलाव और आर्थिक अवसर जैसे मुद्दों ने दोनों समुदायों के बीच एकता और सौहार्द को काफी हद तक बनने नहीं दिया।

हिमंता बिस्वा सरमा ने एक निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाते हुए बंगाली हिंदू शरणार्थियों, जो उत्पीड़न से बचने के लिए भारत आए और बंगाली मुस्लिम घुसपैठियों, जो आर्थिक अवसरों के लिए असम आए, के बीच जरूरी अंतर स्पष्ट किया।

जो व्यक्ति अपनी धार्मिक पहचान की रक्षा के लिए असम आया हो, उसकी तुलना उस व्यक्ति से कैसे की जा सकती है, जिसने पहले एक इस्लामी राष्ट्र बनाया और फिर अवसरवाद के तहत आर्थिक लाभ के लिए भारत आ गया? हालाँकि ऐसी तुलना किसी भी तरह से उचित नहीं है, लेकिन लंबे समय तक यही असम की राजनीति का आधार बनी रही।

जनता को बाँटकर शासन करने के उद्देश्य से वर्षों तक चलाए गए राजनीतिक प्रचार को हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में ध्वस्त कर दिया गया। लक्षित संदेशों और जागरूकता अभियान के माध्यम से इन दोनों वर्गों के बीच के बड़े अंतर और जनसंख्या में बदलाव में उनके अलग-अलग योगदान को लोगों के सामने पूरी तरह स्पष्ट किया गया।

असमिया हिंदू समुदाय, जिसे कभी कुछ स्वार्थी राजनीतिक समूहों ने यह विश्वास दिलाया था कि बंगाली हिंदू ही उनका दुश्मन है, अब इस बात को लेकर आश्वस्त है कि उनका असली दुश्मन केवल एक है। वह बंगाली हिंदू शरणार्थी नहीं, बल्कि वह अवैध प्रवासी है, जो असम समझौता में तय 24 मार्च 1971 की कट-ऑफ तारीख के बाद आर्थिक लाभ लेने और राज्य की संस्कृति में बदलाव लाने के उद्देश्य से पूर्वोत्तर राज्य असम में आए।

असम में डिटेंशन सेंटर में एक भी बंगाली हिंदू नहीं: हिमंता बिस्वा सरमा

शुक्रवार (3 जुलाई 2026) को हिमंता बिस्वा सरमा ने इंडियन एक्सप्रेस आइडिया एक्सचेंज कार्यक्रम में जो बयान दिया, उससे उनका रुख पूरी तरह स्पष्ट हो गया।

असम में डी-वोटर्स (D Voters) यानी ऐसे लोगों के बारे में पूछे जाने पर, जो अपनी भारतीय नागरिकता साबित नहीं कर पाए हैं और जिनके मामले विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) में लंबित हैं, उन्होंने कहा, “अब बंगाली हिंदुओं की संख्या 1 लाख से भी कम रह गई है। एक समय यह लगभग 4.5 लाख थी। ट्रिब्यूनल अपना काम कर रहे हैं और मुझे लगता है कि यह मामला सुलझ जाएगा, क्योंकि अब यह संख्या बहुत कम रह गई है।”

सीएम ने आगे कहा, “हमारे डिटेंशन कैंप में एक भी बंगाली हिंदू नहीं है। यह अच्छी खबर है, क्योंकि लगभग सभी समस्याओं का समाधान हो चुका है। पहले उनके पास आधार कार्ड नहीं था, लेकिन अब सभी को आधार कार्ड मिल चुका है। अब 4.5 लाख से यह संख्या घटकर 1 लाख से भी कम रह गई है। इसलिए यह समस्या लगभग सुलझ चुकी है। मेरा मानना है कि अगले 1-2 वर्षों में यह मुद्दा पूरी तरह हल हो जाएगा, क्योंकि हर मामला ट्रिब्यूनल में जाता है और वहाँ विवाद होते हैं। हम कानूनी प्रक्रिया के जरिए इन विवादों का समाधान कर रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “एक समय दोनों समुदायों (हिंदू और मुस्लिम) को मिलाकर यह संख्या लगभग 12 से 14 लाख थी। आज यह घटकर 3.54 लाख रह गई है और इनमें भी बंगाली हिंदुओं की संख्या 1 लाख से कम है। यानी यह संख्या लगातार काफी कम हो रही है।”

हिमंता बिस्वा सरमा ने अंत में कहा, “लेकिन जब NRC प्रकाशित होगी, तो मुझे आशंका है कि उसके प्रकाशित होने के बाद शुरुआत में यह संख्या फिर बढ़ सकती है, क्योंकि कई लोगों के नाम उसमें नहीं होंगे। उस समय बंगाली हिंदुओं को CAA के तहत आवेदन करना होगा। इसलिए यह मुद्दा थोड़ा जटिल है, लेकिन हम इसका समाधान कर रहे हैं।”

लोगों के नजरिए में बदलाव और हिमंता बिस्वा सरमा की भूमिका

जब वर्ष 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) लागू किया गया, तब असम में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। बिना दस्तावेज वाले बंगाली हिंदू शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता दिए जाने की संभावना को लेकर भारी विवाद खड़ा हो गया।

राज्य के कई राजनीतिक दलों ने यह भी दावा किया कि इससे असम समझौता का उद्देश्य खत्म हो जाएगा, जिसके तहत 24 मार्च 1971 के बाद असम आने वाले हर अवैध प्रवासी को निर्वासन के योग्य माना गया था।

CAA के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के कारण 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए छह धार्मिक समुदायों (हिंदू, ईसाई, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध) के लोगों को भारतीय नागरिकता पाने के लिए एक तेज प्रक्रिया (फास्ट-ट्रैक) का रास्ता दिया गया।

सात साल बाद इस कट-ऑफ तारीख को बढ़ाकर 31 दिसंबर 2024 कर दिया गया। हिमंता बिस्वा सरमा यह संदेश लोगों तक पहुँचाने में सफल रहे कि पूर्वी पाकिस्तान/बांग्लादेश से मजबूरी में असम आए बंगाली हिंदू और आर्थिक लाभ के लिए सीमा पार कर भारत आए बंगाली मुस्लिम एक जैसे नहीं हैं। भले ही दोनों के पास दस्तावेज न हों, लेकिन एक शरणार्थी है, जबकि दूसरा घुसपैठिया।

इसके परिणामस्वरूप असम समझौता अब बंगाली हिंदू शरणार्थियों पर लागू नहीं होता और उन्हें नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत संरक्षण प्राप्त है। हिमंता बिस्वा सरमा ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू किया जाएगा और केवल ‘घुसपैठियों’ को ही बांग्लादेश भेजे जाने तक डिटेंशन कैंपों में रखा जाएगा।

किसी भी बंगाली हिंदू शरणार्थी को न तो निर्वासित किया जाएगा और न ही डिटेंशन सेंटर में भेजा जाएगा। जिस तरह इजरायल दुनिया भर के यहूदियों की मातृभूमि माना जाता है, उसी तरह भारत सभी हिंदुओं की मातृभूमि था, है और रहेगा। लेकिन असम में लोगों को इस बात के लिए आश्वस्त करने के लिए अलग स्तर की राजनीतिक इच्छाशक्ति, संदेश और नीतिगत फैसलों की जरूरत थी। हिमंता बिस्वा सरमा लगातार घुसपैठियों और शरणार्थियों के बीच अंतर को लेकर मुखर रहे हैं।

उन्होंने लोगों के नजरिए में ऐसा बदलाव लाने का दावा किया, जिसकी 30 साल पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यही कारण है कि अगस्त 2025 में जब वे सिलचर गए तो उनका भव्य स्वागत हुआ। लाखों बंगाली हिमंता बिस्वा सरमा की एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़े।

उस दिन असमिया भाषी मुख्यमंत्री को जनता से जो जबरदस्त स्वागत, स्नेह और प्रशंसा मिली, वह राज्य के इतिहास में अभूतपूर्व है। 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले, पश्चिम बंगाल में उनका भव्य स्वागत हुआ। उनके भाषणों में हजारों बंगाली मतदाता शामिल हुए।

हिमंता बिस्वा सरमा ने अपनी हिंदू पहचान को लेकर कोई संकोच नहीं दिखाया है और असम में भाषाई और जातीय सीमाओं को पार करते हुए हिंदू समुदाय को एकजुट करने के लिए अथक प्रयास किए हैं। असमिया हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच ऐतिहासिक मतभेद दूर हो चुके हैं और राज्य स्थायी सुलह की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

स्वार्थी समूह, जो सामाजिक दरारों का फायदा उठाकर फल-फूल रहे थे, अब किनारे खड़े होकर घटनाक्रम देख रहे हैं। वे हताश और शक्तिहीन रह गए हैं। हिमंता बिस्वा सरमा को इसका पूरा श्रेय जाता है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

क्या मोरक्को के ‘एटलस लायंस’ रोक पाएँगे फ्रांस का विजय रथ? विश्व कप 2026

फुटबॉल का सुरूर सब के सिर चढ़कर बोल रहा है। हाल ही की हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि विम्बल्डन को भारी नुक़सान झेलना पड़ रहा है क्योंकि फिलहाल तमाम लोगों को फुटबॉल का बुखार चढ़ा हुआ है। चलते मैचों के दौरान लोग अपने अपने मोबाइल फोनों में फुटबॉल मैचों में व्यस्त हैं। हाल ही में जैसे ही फीफा विश्व कप के मैच के अंतिम पन्द्रह मिनट में कप्तान हैरी केन ने DR Congo के विरुद्ध जरूरी गोल दाग कर स्कोर बराबर किया, विम्बल्डन के सेंटर कोर्ट व कोर्ट नम्बर एक की दर्शक-दीर्घा में मौजूद दर्शकों ने खुशी में जोर से शोर मचाया, वहां चल रहे खेल के खिलाड़ियों को लगा वह उनके खेल पर उनकी हौसला-अफजाई कर रहे हैं, परन्तु, ऐसा था नहीं। फीफा विश्व कप सब को अपने आगोश में ले चुका है। हर ओर बस उसके ही चर्चे हैं।

बीती रात राउंड ऑफ 16 के दो मैच खेले गए। पहला मैच था यूएस के टेक्सास प्रांत के सबसे घनी आबादी वाले शहर ह्यूस्टन के स्टेडियम में जहां कनाडा का सामना होने जा रहा था टूर्नामेंट की मजबूत टीमों में शुमार मोरक्को से। गौरतलब है कि पिछले विश्व कप के ग्रुप चरण में भी यह दोनों आपस में भिड़ती नजर आई थीं।

मैच शुरू होता है। शुरुआती क्षणों से ही कोच जेस्से मार्श्च की कनाडा लगातार मोरक्को पर दबाव बनाए हुई थी। यह देखना वाकई आश्चर्यजनक था कि कैसे कनाडा मोरक्को को, जो पिछले कुछ सालों में एक सशक्त टीम बन कर उभरे हैं, यूं पछाड़ रही थी। कनाडाई टीम निरंतर मोरक्को के खिलाड़ियों को प्रेस किए जा रही थी व मैदान में उनकी एक भी न चलने दे रही थी। वह शुरुआती पलों में मोरक्को के गोलपोस्ट पर कुछ वाकई बेहद घातक हमले भी करते नजर आते हैं, परन्तु गोलपोस्ट पर खड़े अनुभवी गोलकीपर यासीन बोनू लगातार बेहतरीन बचाव किए जा रहे थे। इससे एटलस लायंस को कनाडा द्वारा दिए जा रहे शुरुआती झटकों से उबरने में मदद मिलती है। पहले हाफ में कनाडा शुरू से अंत तक मोरक्को पर भीषण दबाव बनाए रखती है। परन्तु वह गोल स्कोर करने में नाकाम रहते हैं। सो, पहले हाफ की समाप्ति पर स्कोर 0-0 ही रहता है।

दूसरे हाफ की शुरुआत होती है। एटलस लायंस के कोच बदली रणनीति के साथ अपनी टीम को मैदान पर उतारते हैं। और, अब तो खेल पूरी तरह बदल जाता है। अनुभवी मोरक्को कनाडा को अपने शिकंजे में कस लेती है। मैच के पचासवें मिनट में कनाडाई गोलपोस्ट की दाईं ओर मोरक्को को एक फ्री किक मिलती है, जिसे अचरफ हाकिमी और अज़्ज़ेदीन ऊनाही ने मिलकर एक सेट-पीस मूव के जरिए अंजाम दिया, जहाँ मौका पाते ही ऊनाही ने कनाडाई बॉक्स के बाहर से गोलपोस्ट के बॉटम राइट कॉर्नर की ओर एक ताकतवर राइट फुटर किक दाग गोल स्कोर कर लिया। मोरक्को अंततः मैच में बढ़त बना लेती है। फिर, बयासिवें मिनट में ब्राहीम डियाज़ के पास पर दुबारा अज़्ज़ेदीन ऊनाही एक गोल दाग स्कोर 2-0 कर देते हैं। फिर 90+8 मिनट में मोरक्को एक गोल और दागते हुए मैच 3-0 से जीत जाती है।

पिछले विश्व कप में सेमीफाइनल तक का सफर तय करने वाले एटलस लायंस इस जीत के संग क्वार्टर फाइनल में जगह बना लेते हैं। कनाडाई टीम, विश्व कप के इतिहास में इस बार पहली दफा नॉकआउट चरण में कोई मुकाबला जीतने के पश्चात, अच्छा खेल दिखाते हुए टूर्नामेंट को अलविदा कहने के लिए मजबूर थे।

देर रात अगला मैच फ्रांस और पेराग्वे के मध्य फिलाडेल्फिया में खेला गया। यहां भीषण गर्मी तो थी ही, परन्तु मैदान के भीतर भी गरमा-गरमी देखने को मिली। पेराग्वे 5-4-1 की फॉर्मेशन के साथ एक अति-रक्षात्मक खेल खेलने मैदान में उतरा था। मैच में लगभग छिहत्तर प्रतिशत वक्त गेंद फ्रेंच टीम के कब्जे में थी। मगर बेहद सजग तरीके से डिफेंसिव फुटबॉल खेल रही पेराग्वे फ्रेंच टीम को अटैक करने के मौके ही नहीं दे रही थी। गुजरे दिन हमने अर्जेंटीना को काबो वर्दे के खिलाफ संघर्ष करते देखा था। फ्रांस भी आज बाकी मैच-डेज़ की भांति विपक्षी बॉक्स में खतरा पैदा करती नजर नहीं आ रही थी।

मगर, मैच के सतत्तरवें मिनट में फ्रांस को एक पेनाल्टी मिल जाती है जिसे उनके स्टार खिलाड़ी कीलिएन एमबाप्पे सफलतापूर्वक गोल में तब्दील कर देते हैं।

एक नॉकआउट चरण के मुकाबले में कौन अच्छा खेला इससे ज्यादा यह मायने रखता है कि मैच समाप्ति पर किसने ज्यादा गोल मार कर बढ़त हासिल की हुई थी। इस एक गोल की बढ़त के दम पर लेस ब्ल्यूज़ क्वार्टर फाइनल में जगह बना लेती है जहां अब उनका सामना होगा एटलस लायंस से। यह दोनों ही टीमें बहुत अच्छे खेल का प्रदर्शन कर रही हैं। फीफा की वैश्विक रैंकिंग में शीर्ष-10 में शामिल मोरक्को अंततः तक हार नहीं मानती और लड़ती रहती है, जूझती रहती है। उसका हर खिलाड़ी मैदान में अपना सबकुछ झोंक देता है। वहीं, फ्रांस एक बेहद ही घातक अटैकिंग फोर्स बनकर उभरी है, जो अपने घातक अटैक जितनी ही मजबूत रक्षापंक्ति लेकर इस टूर्नामेंट में उतरे हैं। निश्चित रूप से यह एक बड़ा मुकाबला होने जा रहा है।

खैर, अब, आज रात डेढ़ बजे न्यूयॉर्क के न्यूजर्सी स्टेडियम में खेला जाएगा एक महामुकाबला। आज ब्राजील अपने राउंड ऑफ 16 मुकाबले में नॉर्वे के खिलाफ मैदान में उतरेगी। ब्राजील की टीम, कुछ अहम खिलाड़ियों के चोटिल होने के बावजूद, अच्छी फॉर्म में नजर आई है। वहीं, नॉर्वे के पास एक तुरुप का पत्ता है – अर्लिंग हालांड। नॉर्वे हालांड के साथ साथ एंटोनियो नूसा व एलेक्सैन्डर सोरलोथ से गोल स्कोर करने की उम्मीदें लगाए होगी। मिडफील्ड में एक दफा फिर कप्तान ओद्देगार्द मौजूद होंगे जो अंत तक मैदान में अपना सर्वस्व झोंक देंगे। तमाम पंडितों का कहना है कि ब्राजील यह मैच 2-1/3-0 से जीत जाएगी, मगर क्योंकि यह एक नॉकआउट मुकाबला है, कोई भी टीम यहां कुछ भी कर सकती है।

फिर, कल सुबह साढ़े पांच बजे अपने गढ़ ऐज़्टेका स्टेडियम में मेक्सिको इंग्लैंड से दो-दो हाथ करती नजर आएगी। मेक्सिको अबतक इस विश्व कप में अविजित रही है। काबो वर्दे से प्रेरणा लेकर वह जरूर एक बड़ा उलटफेर करना चाहेंगे। सबकी नजरें एक बार फिर युवा गिल्बर्टो मोरा पर टिकी होंगी। वहीं इंग्लैंड एक बार फिर अपने कप्तान हैरी केन के नेतृत्व में वापस एकजुट होकर एक शानदार जीत दर्ज कर क्वार्टर फाइनल के लिए क्वालीफाई करना चाहेंगे।

यह विश्व कप हमें नित नई कहानियां परोस रहा है। हर रोज़ एक सांसें थाम देने वाला रोमांचक मैच होता है। और जब लगता है कि इससे बेहतरीन क्या ही हो सकेगा, अगले ही पल एक और ज्यादा रोमांचक मैच हो जाता है। हर दिन कोई खिलाड़ी अपने शानदार खेल के दम पर पूरे विश्व के खेलप्रेमियों का दिल जीत रहा है। कभी अयुब बउदादी, तो कभी वोजिन्हा। कभी, गिल्बर्टो मोरा तो कभी सिडनी लोपेज़ काबराल। हमें नित नए सितारे जगमगाते हुए दिख रहे हैं। इन खिलाड़ियों को खेलते देखना बेहद सुखद अहसास देता है। कल का दिन रहा अज़्ज़ेदीन ऊनाही के नाम‌। ऊनाही ने कल दो बेहद शानदार गोल जड़ते हुए, कनाडाई कोच जेस्से मार्श्च का ख्वाब तोड़ कर, अपनी टीम को क्वार्टर फाइनल में पहुंचाया। उनके दोनों ही गोल ऐसे हैं जिन्हें आप यूट्यूब पर जाकर कई बार देख सकते हैं।

गौरतलब है कि जब 2022 विश्व कप के राउंड ऑफ 16 के अपने मुकाबले में मोरक्को ने पेनाल्टी शूटआउट में यूरोपीय जाएंट्स स्पेन को 3-0 से हरा कर बाहर किया था तो एक पत्रकार ने मैच पश्चात होने वाली प्रेस-वार्ता में जब स्पेन के कोच लुई एनरिके को पूछा कि उन्हें मोरक्को के किस खिलाड़ी ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया तो सभी को लगा था कि वह पेनाल्टी शूटआउट में शानदार प्रदर्शन करने वाले गोलकीपर यासीन बोनू का नाम लेंगे, मगर उन्होंने जो नाम लिया था वह नाम था अज़्ज़ेदीन ऊनाही का। उन्होंने कहा था कि मुझे यकीन ही नहीं हुआ वह कितना बेहतरीन खेला। मुझे माफ़ करिए मुझे उनका नाम नहीं पता, मगर, मोरक्को के लिए आठ नम्बर की जर्सी पहना खिलाड़ी पूरे मैच के दौरान बिन रुके दौड़ता रहा। वह एक पल के लिए भी रुकता नहीं था। उसने अकेले स्पेन के मिडफील्ड के नाक में दम कर के रख दिया।

उस रोज़ स्पेनिश कोच लुई एनरिके उस आठ नम्बर की जर्सी पहने खिलाड़ी का नाम नहीं जानते थे। आज उस खिलाड़ी का नाम सारी दुनिया जान गई। वह खिलाड़ी हैं अज़्ज़ेदीन ऊनाही। सिग्मंड फ्रॉएड ने सच ही तो कहा था कि एक दिन वर्षों का संघर्ष बहुत खूबसूरत तरीके से तुमसे टकराएगा।

हर छोटा कदम, तुम्हें एक बड़ी मंजिल की ओर पहुंचा रहा होता है। कौन जाने, क्या पता रातें पिघला कर ऑपइंडिया के लिए विश्व कप की यह मैच-रिपोर्ट्स लिखना भी शायद कोई ऐसा ही कदम हो।

बने रहिएगा साथ। फुटबॉल के किस्से जारी रहेंगे।

ग्लोबल टाइम्स के ‘टैप वॉटर’ से आगे की कहानी: भारत-जापान कैसे बदल रहे हैं एशिया का भविष्य

हैदराबाद हाउस की सीढ़ियों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची (Sanae Takaichi) की मुलाकात सिर्फ एक औपचारिक कूटनीतिक तस्वीर नहीं थी। जब प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें अपनी ‘छोटी बहन’ कहा, तो यह दोनों देशों के बीच बढ़ते भरोसे और रिश्ते का प्रतीक बन गया। आज भारत और जापान की ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक एंड ग्लोबल पार्टनरशिप’ सिर्फ कागजों तक सीमित ना होकर एशिया की बदलती राजनीति में एक मजबूत साझेदारी के रूप में सामने आ रही है। मगर इस मुलाकात ने बीजिंग के गलियारों में ब्लड प्रेशर की समस्या को और गंभीर कर दिया।

इस मुलाकात ने सबसे ज्यादा बेचैनी चीन में पैदा की। इसकी झलक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के सरकारी मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ की रिपोर्टिंग में साफ दिखाई दी। जापान के प्रधानमंत्री के भारत दौरे को ‘नल के पानी’ (Tap Water) जैसे मामूली, हास्यास्पद और बेबुनियाद विवाद से जोड़ने की कोशिश यह बताती है कि चीन का सरकारी मीडिया अब गंभीर पत्रकारिता से ज्यादा सोशल मीडिया ट्रोल की तरह व्यवहार करने लगा है।

ग्लोबल टाइम्स का प्रोपेगैंडा, चीनी पत्रकारिता का ‘डाउनफॉल’

ग्लोबल टाइम्स ने दावा किया कि जापानी प्रतिनिधिमंडल ने भारत में नल का पानी नहीं पिया और कुल्ला करने के लिए भी बोतलबंद पानी का इस्तेमाल किया। लेकिन यह रिपोर्ट एक तथ्य से ज्यादा प्रोपेगैंडा और नैरेटिव बनाने की कोशिश लगती है। ऐसे हिट जॉब का इस्तेमाल चीन का सरकारी मीडिया पहले भी कई बार करता रहा है।

असलियत यह है कि किसी विदेशी प्रतिनिधिमंडल का अपना पानी या विशेष भोजन साथ रखना कोई असामान्य बात नहीं है। यह अक्सर सुरक्षा, स्वास्थ्य और तय प्रोटोकॉल का हिस्सा होता है। इसे किसी देश का अपमान मानना सही नहीं है।

इतिहास भी इसका उदाहरण देता है। साल 1902 में महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय जब लंदन गए थे, तब वे दो विशाल चाँदी के कलशों में करीब 4,000-4,000 लीटर गंगाजल साथ लेकर गए थे। उन्होंने ऐसा अपनी धार्मिक आस्था के कारण किया था, न कि ब्रिटेन का अपमान करने के लिए। इसे दुनिया ने उनकी सांस्कृतिक निष्ठा के रूप में देखा था।

ऐसे में जापानी प्रतिनिधिमंडल के पानी को लेकर विवाद खड़ा करना एक कमजोर तर्क है। इससे भारत की छवि पर कोई सवाल नहीं उठता, बल्कि यह जरूर दिखता है कि ग्लोबल टाइम्स ने एक सामान्य प्रोटोकॉल को राजनीतिक विवाद में बदलने की कोशिश की।

ग्लोबल टाइम्स ने यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की कि जापानी प्रधानमंत्री ने नल का पानी नहीं पीकर भारत का अपमान किया। लेकिन यह दावा न तो पत्रकारिता की कसौटी पर खरा उतरता है और न ही सामान्य समझ पर।

असल में किसी विदेशी प्रतिनिधिमंडल का अपनी सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े तय प्रोटोकॉल का पालन करना दुनिया भर में एक सामान्य बात है। इसे किसी देश के सम्मान या अपमान से जोड़ना तथ्यों से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश लगता है।

यही वजह है कि ग्लोबल टाइम्स की यह रिपोर्ट पत्रकारिता से अधिक प्रोपेगैंडा प्रतीत होती है। यह चीन की उस साम्यवादी सोच को भी दिखाती है, जिसमें किसी व्यक्ति की पसंद, संस्थागत प्रोटोकॉल या सुरक्षा संबंधी फैसले को भी राजनीतिक संदेश के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती है। ऐसी रिपोर्टिंग का उद्देश्य सूचना देना कम और एक खास धारणा बनाना अधिक दिखाई देता है।

चीन की बेचैनी की असली वजह क्या है?

चीन की नाराजगी सिर्फ एक कूटनीतिक मुलाकात की वजह से नहीं है। असली कारण यह है कि भारत और जापान के रिश्ते अब केवल दोस्ती तक सीमित नहीं रहे। दोनों देश रक्षा, तकनीक, अर्थव्यवस्था और इंडो-पैसिफिक की रणनीति में तेजी से साथ काम कर रहे हैं। यही साझेदारी चीन के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।

रक्षा और रणनीति: चीन की चुनौती बढ़ रही है

भारत और जापान समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में पहले से कहीं ज्यादा करीब आ रहे हैं। दोनों देशों ने भारतीय नौसेना के लिए ‘यूनिकॉर्न’ (UNICORN – Unified Complex Radio Antenna) नेवल रेडियो एंटीना सिस्टम विकसित करने का फैसला किया है। माना जा रहा है कि इससे भारतीय नौसेना की क्षमताएँ और मजबूत होंगी, खासकर स्टील्थ (Stealth) ऑपरेशन में।

इसके साथ ही भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ (Act East) नीति और जापान का ‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ (FOIP) विजन एक-दूसरे के पूरक बन रहे हैं। इस नीति का उद्देश्य केवल दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से बेहतर रिश्ते बनाना नहीं, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को एशिया की आर्थिक और रणनीतिक गतिविधियों से जोड़ना भी है। इसी लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए एक्ट ईस्ट फोरम (Act East Forum – AEF) बनाया गया, जिसके माध्यम से जापान असम, मेघालय और मिजोरम जैसे राज्यों में सड़क, पुल और अन्य कनेक्टिविटी परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण ब्रह्मपुत्र नदी पर बन रहा धुबरी-फुलबारी पुल है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना पूर्वोत्तर भारत की आर्थिक तस्वीर बदलने वाली पहल मानी जा रही है। इससे लोगों और सामान की आवाजाही तेज होगी, व्यापार बढ़ेगा और पूरे क्षेत्र में निवेश के नए अवसर पैदा होंगे।

लेकिन इसकी अहमियत केवल आर्थिक नहीं है। बेहतर सड़क और कनेक्टिविटी नेटवर्क के जरिए भारत का पूर्वोत्तर सीधे दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ सकेगा। इससे भारत की एक्ट ईस्ट नीति को नई गति मिलेगी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी रणनीतिक मौजूदगी भी पहले से अधिक मजबूत होगी।

दोनों देशों का साझा उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत करना है। ऐसे माहौल में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर स्वाभाविक रूप से दबाव बढ़ता है।

भारत और जापान की सुरक्षा चिंताएँ अलग-अलग जरूर हैं, लेकिन उनका स्रोत काफी हद तक एक ही है; चीन का लगातार आक्रामक होता रवैया।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की सैन्य गतिविधियाँ और सीमा पर बढ़ता दबाव है। वहीं जापान के लिए पूर्वी चीन सागर में स्थित सेनकाकू द्वीप (Senkaku Islands) की सुरक्षा एक बड़ा रणनीतिक मुद्दा है, जहाँ चीन लगातार अपना दावा और मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करता रहा है।

यही कारण है कि दोनों देशों के सुरक्षा हित अब एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं। भारत और जापान समझते हैं कि हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में शांति और नियम-आधारित व्यवस्था तभी कायम रह सकती है, जब क्षेत्रीय देशों के बीच मजबूत रणनीतिक सहयोग हो।

इसी सोच के तहत क्वॉड (QUAD) में भारत और जापान की भूमिका लगातार मजबूत हुई है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर यह समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त, सुरक्षित और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था का समर्थन करता है। चीन इसे अपने बढ़ते समुद्री प्रभाव और क्षेत्रीय दावों के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती के रूप में देखता है। इसलिए क्वॉड आज केवल एक कूटनीतिक मंच नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन बनाए रखने का महत्वपूर्ण सुरक्षा ढाँचा भी बन चुका है।

सेमीकंडक्टर और सप्लाई चेन: चीन की पकड़ कमजोर करने की कोशिश

तकनीक के क्षेत्र में भी भारत और जापान तेजी से सहयोग बढ़ा रहे हैं। दोनों देश सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे अहम क्षेत्रों में साथ काम कर रहे हैं ताकि सप्लाई चेन सिर्फ चीन पर निर्भर न रहे

गुजरात के साणंद में रेनेसास इलेक्ट्रॉनिक्स का करीब ₹7,600 करोड़ का सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट और भारत के उत्तर-पूर्व में जापानी निवेश इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अगर यह सहयोग सफल होता है, तो वैश्विक कंपनियों के पास चीन के अलावा एक मजबूत विकल्प तैयार हो सकता है।

अर्थव्यवस्था: एशिया का नया शक्ति केंद्र बनने की संभावना

भारत और जापान रुपए (INR) और येन (JPY) में व्यापार बढ़ाने जैसे विकल्पों पर भी चर्चा कर रहे हैं। इसका उद्देश्य आपसी कारोबार को आसान बनाना और आर्थिक सहयोग को मजबूत करना है।

डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए भारत और जापान के बीच रुपया-येन (INR-JPY) में सीधे व्यापार की संभावनाओं पर भी काम किया जा रहा है। यदि यह व्यवस्था मजबूत होती है, तो दोनों देशों को हर लेन-देन के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

यह कदम सिर्फ व्यापार को आसान बनाने तक सीमित नहीं है। इसका बड़ा रणनीतिक महत्व भी है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से दोनों देशों को विनिमय दर (Exchange Rate) के जोखिम कम करने, लेन-देन की लागत घटाने और अपनी आर्थिक संप्रभुता (Economic Sovereignty) को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

यही कारण है कि रुपया-येन डायरेक्ट ट्रेड को भारत की बढ़ती वैश्विक आर्थिक भूमिका और बदलती अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में उसकी मजबूत होती स्थिति के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

चीन के लिए चिंता की बात यह है कि एक तरफ भारत दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक है, तो दूसरी तरफ जापान उन्नत तकनीक और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में अग्रणी है। अगर दोनों देशों की ताकत एक साथ आती है, तो एशिया की आर्थिक और रणनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

भारत-जापान साझेदारी किन मजबूत स्तंभों पर खड़ी है?

भारत और जापान का रिश्ता अब सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है। यह निवेश, तकनीक, ऊर्जा और भविष्य की अर्थव्यवस्था जैसे कई क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यही वजह है कि इसे दोनों देशों की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारियों में गिना जाता है।

  • निवेश और अर्थव्यवस्था: दोनों देशों ने आने वाले वर्षों में आर्थिक सहयोग को नई ऊँचाई पर ले जाने का लक्ष्य रखा है। पहले जहाँ 5 ट्रिलियन जापानी येन के निवेश का लक्ष्य था, वहीं अब अगले दशक के लिए इसे बढ़ाकर 10 ट्रिलियन जापानी येन (करीब 68 अरब डॉलर) तक ले जाने की बात हो रही है। भारत में पहले से 11 जापानी इंडस्ट्रियल टाउनशिप (JIT) काम कर रही हैं। इससे साफ है कि जापानी कंपनियाँ भारत को सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि लंबे समय के मैन्युफैक्चरिंग और निवेश केंद्र के रूप में देख रही हैं।
  • स्वच्छ ऊर्जा में साझेदारी: ऊर्जा के क्षेत्र में भी दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। जापान ग्रीन हाइड्रोजन जैसी उन्नत तकनीकों में आगे है, जबकि भारत इस क्षेत्र में अपना राष्ट्रीय मिशन चला रहा है। अगर दोनों देशों का सहयोग इसी तरह बढ़ता रहा, तो स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐसा मॉडल तैयार हो सकता है, जो भविष्य में दुनिया के लिए भी अहम साबित हो।
  • तकनीक और डिजिटल भविष्य: समय के साथ तकनीकी और आर्थिक मोर्चे पर भी चीन की एकाधिकारवादी पकड़ कमजोर हो रही है। ऐसे में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका सॉफ्टवेयर इकोसिस्टम, इंजीनियरिंग प्रतिभा और डिजिटल क्षमता है। वहीं जापान हार्डवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स और हाई-प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। इन दोनों की ताकत एक साथ आने से एक ‘सॉवरेन एआई नेटवर्क’ (Sovereign AI Network) विकसित करने की संभावना बनती है। इसका मतलब है ऐसा एआई इकोसिस्टम, जो किसी एक विदेशी कंपनी या देश पर निर्भर न हो, बल्कि दोनों देशों की अपनी तकनीक, डेटा और कंप्यूटिंग क्षमता पर आधारित हो।

इसी सहयोग के जरिए भविष्य में ऐसे लार्ज लैंग्वेज मॉडल (Large Language Models – LLMs) विकसित किए जा सकते हैं, जो सिर्फ पश्चिमी डेटा पर निर्भर न हों, बल्कि एशियाई भाषाओं, संस्कृतियों, समाज और स्थानीय जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ सकें। इससे भारत और जापान तकनीक के उपभोक्ता भर नहीं रहेंगे, बल्कि AI के वैश्विक विकास में अपनी अलग पहचान भी बना सकेंगे।

इन दोनों क्षमताओं के साथ आने से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, 6G और एडवांस टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में बड़े अवसर पैदा हो सकते हैं। यही वजह है कि दोनों देश डिजिटल पार्टनरशिप को भी लगातार मजबूत कर रहे हैं।

हर बड़ी साझेदारी की तरह भारत और जापान के रिश्ते में भी कुछ चुनौतियाँ हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन, रूस को लेकर अलग-अलग विदेश नीति के नजरिए और रक्षा तकनीक के ट्रांसफर जैसे मुद्दों पर अभी भी काम होना बाकी है।

इसके बावजूद दोनों देश लगातार ऐसे तंत्र विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिनसे निवेश बढ़े, नई तकनीक साझा हो और उद्योगों के बीच सहयोग आसान बने। यही वजह है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह साझेदारी आने वाले वर्षों में और मजबूत होगी।

चीन के लिए कड़वी हकीकत

चीन शायद यह समझ नहीं पा रहा कि दुनिया अब एकध्रुवीय (Unipolar) नहीं रही। उसे यह समझ लेना चाहिए कि दुनिया अब मल्टीपोलर (Multipolar) है। भारत अब केवल एक बाजार नहीं रहा गया है; ये एक उभरती हुई बड़ी शक्ति है। ग्लोबल टाइम्स का यह ‘पानी विवाद’ उस छटपटाहट का संकेत है, जिसे चीन अपने गिरते प्रभाव को रोकने के लिए कर रहा है। भारत और जापान आज फ्रेंड-शोरिंग की रणनीति पर तेजी से काम कर रहे हैं। इसका मतलब है कि महत्वपूर्ण उद्योगों, सप्लाई चेन और निवेश को ऐसे भरोसेमंद देशों के बीच विकसित किया जाए, जिनके साथ राजनीतिक स्थिरता, पारदर्शिता और रणनीतिक विश्वास मौजूद हो।

कोविड-19 महामारी और वैश्विक तनावों ने दुनिया को यह सिखाया कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कितना बड़ा जोखिम बन सकती है। इसी अनुभव के बाद भारत और जापान मिलकर ऐसी सप्लाई चेन तैयार कर रहे हैं, जो अधिक सुरक्षित, विविध और संकट के समय भी भरोसेमंद बनी रहे।

जापान की बुलेट ट्रेन की रफ्तार और भारत के बढ़ते आर्थिक कद के सामने चीन का ब्लड प्रेशर स्वाभाविक है। भारत और जापान की यह जोड़ी न केवल चीन के विस्तारवाद एवँ उसकी एकध्रुवीय रणनीतियों को संतुलित करने की क्षमता रखती है, बल्कि भविष्य के वैश्विक एजेंडे को भी निर्धारित करेगी। यह व्यापारिक समझौता तो है ही, साथ ही साथ एशिया की सुरक्षा का नया ‘सुरक्षा कवच’ भी है।

चीन का सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स शायद यह समझ नहीं पा रहा कि एशिया की रणनीतिक तस्वीर तेजी से बदल रही है। भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसी के साथ उसकी वैश्विक भूमिका भी लगातार मजबूत हो रही है।

ऐसे समय में जब भारत और जापान रक्षा, अंतरिक्ष और उन्नत तकनीक जैसे क्षेत्रों में अपने सहयोग का दायरा बढ़ा रहे हैं, तो इसका असर पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर पड़ना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए, दोनों देश LUPEX (Lunar Polar Exploration Mission) के तहत चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों की संयुक्त खोज के लिए काम कर रहे हैं। वहीं सेमीकंडक्टर, एआई और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में भी उनका सहयोग लगातार गहरा हो रहा है।

यही वह बदलाव है जो चीन के लिए चिंता का कारण बनता है। यदि भारत और जापान मिलकर रक्षा, अंतरिक्ष, हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में मजबूत विकल्प खड़े करते हैं, तो कई ऐसे क्षेत्रों में चीन की वर्षों पुरानी बढ़त और प्रभुत्व को चुनौती मिल सकती है।

ऐसे में ‘पानी विवाद’ जैसे मुद्दों को उछालना कई विश्लेषकों को इस बात का संकेत लगता है कि चीन वास्तविक रणनीतिक और आर्थिक बदलावों पर चर्चा करने के बजाय ध्यान भटकाने वाले विवादों को अधिक महत्व दे रहा है।

साथ ही चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) को भी पिछले कुछ वर्षों में कई देशों में कर्ज, परियोजनाओं की व्यवहार्यता और भू-राजनीतिक प्रभाव को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। ऐसे माहौल में भारत-जापान की पारदर्शी, नियम-आधारित और तकनीक-केंद्रित साझेदारी एशिया में एक अलग विकास मॉडल के रूप में उभरती दिखाई दे रही है।

चुनौतियाँ: यथार्थवाद के आईने में

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत और जापान के रिश्ते दूध-शहद की तरह नहीं हैं। यहाँ पर कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ भी हैं; जैसे कि चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव आज भी दुनिया के सबसे बड़े वैश्विक इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय कार्यक्रमों में से एक है। पूँजी, निवेश और परियोजनाओं की संख्या के मामले में भारत और जापान अभी उसके बराबर नहीं हैं। रक्षा तकनीक के हस्तांतरण में कानूनी पेच हैं, व्यापार घाटा एक चुनौती है, लेकिन दोनों देशों की रणनीति भी BRI की नकल करना नहीं है। भारत और जापान का जोर ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल पर है, जो पारदर्शी हो, स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए टिकाऊ हो और देशों को कर्ज के जाल में न फँसाए।

पिछले कुछ वर्षों में BRI की कई परियोजनाओं को अत्यधिक कर्ज, लागत बढ़ने, राजनीतिक विरोध और सीमित आर्थिक लाभ जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में कई विकासशील देश अब सिर्फ बड़ी पूँजी नहीं, बल्कि भरोसेमंद, पारदर्शी और दीर्घकालिक साझेदार भी तलाश रहे हैं।

समय बदल चुका है और चीन को अपनी पुरानी रिवीजनिस्ट (Revisionist) नीतियों को त्यागकर भविष्य के इस नए तालमेल को स्वीकार करना ही होगा। यह सही है कि भारत और जापान की विदेश नीतियाँ पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं। जापान की सुरक्षा व्यवस्था लंबे समय से अमेरिका के साथ उसके गठबंधन पर आधारित रही है, जबकि भारत ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) की नीति अपनाता है और किसी एक शक्ति-गुट का हिस्सा बनने से बचता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर देखने को मिला।

लेकिन किसी रणनीतिक साझेदारी की सफलता का पैमाना यह नहीं होता कि दोनों देश हर वैश्विक मुद्दे पर एक जैसी राय रखें। असली कसौटी यह है कि क्या वे अपने साझा हितों पर लगातार साथ काम कर पा रहे हैं। भारत और जापान के मामले में यही तस्वीर दिखाई देती है। चीन की बढ़ती आक्रामकता, हिंद-प्रशांत में मुक्त और नियम-आधारित व्यवस्था, सुरक्षित सप्लाई चेन, सेमीकंडक्टर, उभरती तकनीक और विश्वसनीय आर्थिक साझेदारी जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के हित स्पष्ट रूप से एक-दूसरे से मेल खाते हैं।

यही कारण है कि रूस जैसे कुछ मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद रक्षा सहयोग, क्वाड, सेमीकंडक्टर, एक्ट ईस्ट फोरम, डिजिटल पार्टनरशिप और बुनियादी ढाँचे में दोनों देशों का सहयोग लगातार बढ़ा है। इसलिए यह साझेदारी किसी एक अंतरराष्ट्रीय संकट पर आधारित नहीं है, बल्कि साझा रणनीतिक हितों के कई मजबूत स्तंभों पर खड़ी है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

आतंकी को बताया ‘शहीद-ए-आजम’, कश्मीर पर बताया- ‘दमनकारी भारत’ का कब्जा… J&K की ‘सरकारी किताब’ में आतंकवाद का महिमामंडन: अब हो रही कार्रवाई

जम्मू-कश्मीर में एक सरकारी किताब में आतंकियों के महिमामंडन और भारत को लेकर उल्टा सीधा लिखने पर बवाल मचा हुआ है। इस किताब में जहाँ एक और मकबूल भट्ट जैसे आतंकी को शहीद बताया गया है तो वहीं अलगाववादियों की तारीफ की गई है। साथ ही, ‘भारत के कब्जे वाला कश्मीर’ जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया है। जम्मू और कश्मीर (J&K) प्रशासन ने ‘अलगाववाद’ को बढ़ावा देने वाली यह सामग्री मिलने के बाद शनिवार (4 जुलाई 2026) को 8 शिक्षा अधिकारियों को निलंबित और लेखकों-पब्लिशर्स को ब्लैकलिस्ट कर दिया है।

विवादित किताब में क्या लिखा गया है?

यह विवाद जम्मू-कश्मीर में सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई किताब को लेकर है। एक किताब Personalities and Legends of J&K (जम्मू-कश्मीर की हस्तियाँ और दिग्गज) है जिसे हिलाल अहमद और संतोष मीणा ने लिखा है। यह किताब समग्र शिक्षा, जम्मू-कश्मीर 2025-26 योजना के तहत स्कूलों के पुस्तकालयों के लिए चुनी गई थी।

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

इस पुस्तक में पेज 23 पर आतंकी मकबूल भट्ट का जिक्र शुरू होता है जिसमें उसे महिमामंडन करते हुए ‘शहीद’ बताया गया है। इसमें लिखा गया है, “मकबूल भट्ट के लिए ‘महान बलिदान’ की उस राह की शुरुआत तब हुई, जब वह सेंट जोसेफ कॉलेज में छात्र थे।”

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

मकबूल भट्ट से जुड़े हिस्से में की कश्मीर को लेकर भी आपत्तिजनक बातें कही गई हैं। इसमें कश्मीर को IHK (Indian-Held Kashmir) और IOK (Indian-occupied Kashmir) यानी भारत के कब्जे वाला कश्मीर कहा गया है। जम्मू-कश्मीर हमेशा से भारत का अभिन्न अंग रहा है लेकिन इस किताब में वही भाषा बोली गई है जो पाकिस्तान बोलता है।

इसमें लिखा गया है, “पहली बार वापस IHK में प्रवेश…10 जून 1966 को NLF सदस्यों का पहला समूह गुप्त रूप से भारतीय कब्जे वाले कश्मीर में पार गया। मकबूल बट ने अपने समूह के तीन सदस्यों के साथ तीन महीने तक भूमिगत काम किया और IOK में कई गुरिल्ला सेल स्थापित किए।”

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

किताब में मकबूल को शहीद बताते हुए लिखा गया है, “इस तरह आधुनिक कश्मीरी इतिहास के सबसे महान क्रांतिकारियों में से एक का जीवन समाप्त हो गया और वह जन्मा, जिसे कश्मीरी शहीद-ए-आजम यानी सबसे महान शहीद के रूप में याद करते हैं।”

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

इस पुस्तक मकबूल के महिमामंडन के साथ भारत को कब्जा करने वाला और दमनकारी राज्य बताया गया है। पुस्तक में लिखा गया है, “भारत को लोकतांत्रिक दुनिया में पृथ्वी का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है।”

आगे लिखा गया है, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में लोकतांत्रिक परंपराएँ और संस्थाएँ कहीं अधिक स्थापित हैं लेकिन जब बात कश्मीर की आती है तो भारत एक कब्जा करने वाले और दमनकारी राज्य से अधिक कुछ नहीं है, जो कश्मीर पर औपनिवेशिक ढाँचों और तानाशाही तरीकों से शासन करता है तथा लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की बहुत कम परवाह करता है। कश्मीर में भारतीय शासन का यह नव-औपनिवेशिक चेहरा अपने सबसे बुरे रूप में उस तरीके से सामने आया, जिस तरह मकबूल बट को फाँसी दी गई।” पुस्तक में मकबूल को रोमांटिक बताया गया है।

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

मकबूल भट्ट: अलगाववाद का खूनी चेहरा

कश्मीर के अलगाववादी इतिहास में मकबूल भट्ट को उसके समर्थक चाहे जितना ‘रोमांटिक क्रांतिकारी’ बताने की कोशिश करें, दस्तावेजों और घटनाओं की जमीन पर उसका चेहरा एक सजायाफ्ता आतंकी, हत्यारे और भारत-विरोधी सशस्त्र नेटवर्क के अगुवा का ही है।

मकबूल भट्ट पढ़ाई के बाद वह पाकिस्तान चला गया और वहीं से कश्मीर को भारत से अलग करने की हिंसक राजनीति में उतर गया। उसने नेशनल लिबरेशन फ्रंट यानी NLF से अपना रिश्ता बनाया, जिसे आगे चलकर JKLF की वैचारिक और संगठनात्मक जड़ माना गया। यही JKLF बाद में भारत-विरोधी हिंसा, अलगाववादी अभियान और कश्मीर में आतंकी गतिविधियों का अगुआ बना।

मकबूल भट्ट की असली खूनी फाइल 1966 से खुलती है। वह पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र से जम्मू-कश्मीर में घुसा और अपने साथियों के साथ गुप्त आतंकी सेल बनाने की कोशिश में लगा था। इसी दौरान CID/पुलिस इंस्पेक्टर अमर चंद को अगवा किया गया और उनकी हत्या कर दी गई।

यही वह अपराध था जिसने मकबूल भट्ट की ‘क्रांतिकारी’ छवि का नकाब उतार दिया। कोई आंदोलनकारी पुलिस अधिकारी को अगवा कर गोली नहीं मारता, यह काम आतंकी करते हैं। इसी हत्या केस में सेशन जज नीलकंठ गंजू ने अगस्त 1968 में मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई।

1984 में इस खूनी अध्याय का अंतरराष्ट्रीय चेहरा सामने आया। ब्रिटेन के बर्मिंघम में भारतीय राजनयिक रविंद्र हरेश्वर म्हात्रे का अपहरण किया गया। अपहरणकर्ताओं की माँग थी कि भारत मकबूल भट्ट को छोड़े। यानी एक सजायाफ्ता हत्यारे को बचाने के लिए भारतीय राजनयिक को निशाना बनाया गया। जब भारत झुका नहीं तो म्हात्रे की हत्या कर दी गई।

11 फरवरी 1984 को मकबूल भट्ट को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी गई। मकबूल भट्ट को रविंद्र म्हात्रे हत्या केस में फाँसी नहीं हुई थी। उसकी फाँसी 1966 के इंस्पेक्टर अमर चंद हत्या केस में मिली सजा के आधार पर हुई थी। ऐसे आतंकी को हीरो बनाकर बच्चों को पढ़ाया जा रहा है।

देश विरोधी अलगाववादी हीरो बना दिए गए हीरो

यह कहानी सिर्फ मकबूल भट्ट पर खत्म नहीं होती है। जम्मू-कश्मीर पीपल्स फोरम (JKPF) की ‘भारत का पैसा भारत के खिलाफ’ रिपोर्ट में बताया गया है कि इस किताब कथित अलगाववादियों का भी महिमामंडन किया गया है।

JKPF की रिपोर्ट कहती है कि किताब में कई अलगाववादी नेताओं का परिचय भी सहानुभूति भरे अंदाज में दिया गया है और कई जगह उनकी बातों को उन्हीं के शब्दों में रखा गया है। ये वे नेता हैं जिन्होंने कश्मीर पर भारत की संप्रभुता को खारिज किया, कश्मीर के पाकिस्तान में विलय की बात की और एक मामले में 2008 के मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकी हाफिज सईद की तारीफ भी की।

रिपोर्ट बताती है कि पुस्तक में आतंकवादी मकबूल भट्ट के साथ-साथ मसरत आलम भट्ट, सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारूक और शब्बीर शाह शामिल हैं। ये सभी खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन करते हैं। मसरत आलम भट्ट, शब्बीर शाह, मीरवाइज उमर फारूक, मीरवाइज मौलवी मोहम्मद फारूक और सैयद अली शाह गिलानी अलगाववादी नेता हैं जिनका नाम गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम के मामलों, संगठनों पर प्रतिबंध, उकसावे, हिरासत और प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाइयों से जुड़ा रहा है।

मसरत आलम

मसरत आलम को लेकर JKPF की रिपोर्ट में लिखा है, “किताब एक अलगाववादी के पाकिस्तान-समर्थक रिकॉर्ड को स्वीकृति-भाव से और बिना किसी खंडन के दोहराती है। उसके अपने शब्दों में ‘मैं बचपन से पत्थर फेंकने वाला हूँ’ और ‘यह हमारी जमीन है…हम इसी मिट्टी के बेटे हैं’।”

वहीं, इसी किताब में यह लिखा है कि आलम ने 2008 मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद का समर्थन किया और हिजबुल मुजाहिदीन प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन का पक्ष लिया ‘हाफिज सईद का क्या पैगाम…कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ के नारे लगाए थे। 15 अप्रैल 2015 को उसने अलगाववादी सैयद अली शाह गिलानी का स्वागत करने के लिए श्रीनगर की एक रैली में पाकिस्तानी झंडा फहराया था।

मसरत आलम के खिलाफ 8 जिलों में 47 मामले दर्ज है। मसरत एक खुले तौर पर आतंकी रहा है। 1990 में जब जम्मू-कश्मीर के कश्मीर क्षेत्र में आतंकवाद शुरू हुआ, वह आतंकी संगठन हिज्बुल्ला में शामिल हुआ था। उसे 2 अक्टूबर 1990 को बटमालू में गिरफ्तार किया गया, 11 महीने तक हिरासत में रखा गया और फिर रिहा कर दिया गया। अप्रैल 2015 में वह श्रीनगर में पाकिस्तानी झंडा फहराते और पाकिस्तान-समर्थक नारे लगाते पकड़ा गया और 16 अप्रैल 2015 को बडगाम में फिर गिरफ्तार किया गया। वह अब राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) के आतंकी मामले में तिहाड़ जेल में बंद है।

मीरवाइज उमर फारूक

किताब में मीरवाइज उमर फारूक का भी जिक्र है। मीरवाइज उमर फारूक ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (M) के मुखिया हैं और यह वह साझा संगठन है जिसके संविधान में (गिलानी प्रविष्टि में उद्धृत) कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के ‘जबरन और धोखाधड़ीपूर्ण कब्जे’ के रूप में पेश करने के लिए प्रतिबद्धता जताई गई है।

किताब में लिखा गया है, “उमर फारूक ने कश्मीर के 23 उग्रवादी संगठनों को ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (एपीएचसी) में एकजुट किया। यह 23 कश्मीरी अलगाववादी पार्टियों का एक ढीला-ढाला समूह था, जो खुद को क्षेत्र में कश्मीरियों की वैध आवाज बताता था और कश्मीर पर होने वाली किसी भी बातचीत में शामिल किए जाने की माँग करता था।”

इसमें आगे लिखा है, “वह यह मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के साथ बातचीत होनी चाहिए, बशर्ते कश्मीरियों की आकांक्षाओं को भी सुना जाए। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस कश्मीर में दक्षिणपंथी ताकतों का प्रतिनिधित्व करती है। युवा, आधुनिक और व्यावहारिक इस्लामी नेता उमर को कई लोग कश्मीर की आखिरी और सबसे बड़ी उम्मीद मानते हैं।”

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

कैसे बच्चों तक पहुँची किताबें?

JKPF ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि समग्र शिक्षा निदेशालय के एक आधिकारिक पत्र में दर्ज है कि इस किताब को एक निजी प्रकाशक से खरीदा गया था। इसे ‘विशेषज्ञ समिति द्वारा अनुशंसित’ बताया गया और शिक्षा मंत्रालय की नीति के तहत ‘बच्चों की उम्र के हिसाब से उपयुक्त’ प्रमाणित किया गया।

यानी जिस किताब में भारत को कब्जा करने वाला बताया गया, एक दोषसिद्ध आतंकवादी को शहीद की तरह पेश किया गया और अलगाववादी नेताओं को सम्मानजनक जगह दी गई, उसी किताब को बच्चों के लिए उपयोगी, प्रेरक और उम्र के हिसाब से सही पढ़ाई की श्रेणी में रख दिया गया।

जम्मू-कश्मीर के समग्र शिक्षा निदेशालय ने इन किताबों के लिए 24 फरवरी 2026 को जम्मू के मैसर्स ओबेरॉय बुक सर्विस को आर्डर दिया था। इसमें 550 रुपए मूल्य की इन 123 किताबों को खरीदे जाने का जिक्र है।

किताबें जिला स्तर पर संबंधित मुख्य शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में 9 अप्रैल 2026 तक या उससे पहले सप्लाई करने को कहा गया था। यह पत्र समग्र शिक्षा जम्मू-कश्मीर के कोऑर्डिनेटर फाजिल इमरान सिद्दीकी के नाम से है। इनमें से 72 किताबें जम्मू, 15 किताबें रामबन और 36 किताबें उधमपुर भेजी गई थीं।

समग्र शिक्षा निदेशालय का पत्र

प्रशासन ने की क्या कार्रवाई?

सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में अलगाववाद से जुड़ी विवादित सामग्री वाली किताबें पहुँचने के मामले में सरकार ने बड़ी कार्रवाई की है। स्कूल शिक्षा विभाग ने पहले दोनों किताबों को तत्काल वापस लेने का आदेश दिया और फिर 4 जुलाई 2026 को 8 अधिकारियों-कर्मचारियों को निलंबित कर दिया। यह किताबें समग्र शिक्षा योजना के तहत सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई थीं।

जिन लोगों को निलंबित किया गया है उनमें फाजिल इमरान सिद्दीकी, कोऑर्डिनेटर लाइब्रेरी, समग्र शिक्षा; गुरजीत सिंह, असिस्टेंट कोऑर्डिनेटर, समग्र शिक्षा; संजीव शर्मा, प्रिंसिपल, जीएचएसएस कोरे पन्नू, कठुआ; शाजिया कौसर, एकेडमिक ऑफिसर, एससीईआरटी जम्मू; इम्तियाज अहमद मीर, लेक्चरर, बीएचएसएस वाथूरा, बडगाम; निरंजन शर्मा, लेक्चरर, जीएचएसएस बधात, किश्तवाड़; रेणु मेंगी, लेक्चरर, डीआईईटी जम्मू; और राजमोहिनी, लेक्चरर, जीजीएचएसएस पुंछ शामिल हैं।

इन 8 लोगों को किया गया निलंबित

निलंबन की अवधि में ये सभी स्कूल शिक्षा विभाग के प्रशासनिक विभाग से अटैच रहेंगे। इसके अलावा कोऑर्डिनेटर लाइब्रेरी, समग्र शिक्षा की सहायता कर रहे संविदा कंप्यूटर असिस्टेंट शेख सुहेल अहमद को भी तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है।

पहली किताब का नाम ‘पर्सनैलिटीज एंड लीजेंड्स ऑफ जम्मू-कश्मीर’ है जिसे हिलाल अहमद और संतोष मीणा ने लिखा है। इसे जम्मू के ओबेरॉय बुक सर्विस ने प्रकाशित किया था। दूसरी किताब ‘ग्रेट पर्सनैलिटीज ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ है जिसे डॉ. सुशांत गिरि ने लिखा है और दिल्ली के अनुराग प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

सरकार ने दोनों किताबों को स्कूलों से वापस मँगाने के साथ-साथ इनके लेखकों और प्रकाशकों को जम्मू-कश्मीर में बैन और ब्लैकलिस्ट कर दिया है। आदेश में यह भी कहा गया है कि इन लेखकों या प्रकाशकों की कोई भी प्रकाशित सामग्री जम्मू-कश्मीर से वापस ली जाएगी।

मामले की जाँच के लिए आईएएस अधिकारी अश्विनी कुमार, वित्त आयुक्त/अतिरिक्त मुख्य सचिव, बिजली विकास विभाग को जाँच अधिकारी बनाया गया है। रोहित शर्मा, जेकेएएस, अतिरिक्त सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग को इस मामले में प्रेजेंटिंग ऑफिसर नियुक्त किया गया है। जाँच अधिकारी को 30 दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपनी होगी।

पंजाब में सत्ता के पीछे भाग रहे कॉन्ग्रेस के कई गुट, चन्नी से लेकर बाजवा-रंधावा सब नाराज: जानिए अमरिंदर राजा वडिंग के खिलाफ बगावत कैसे बनी राहुल गाँधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती

हाल के दिनों में पंजाब कॉन्ग्रेस की अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह पार्टी हाईकमान ने 2027 विधानसभा चुनाव से पहले संगठनात्मक जिम्मेदारियों का बंटवारा किया है, उसे माना जा रहा है। हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष नहीं बदला। कई नेताओं को उम्मीद थी कि चुनाव से पहले नया चेहरा लाया जाएगा, लेकिन हाईकमान ने अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग पर भरोसा कायम रखा। इससे अलग-अलग गुटों में असंतोष बढ़ गया।

हालाँकि पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष वडिंग ने शनिवार (4 जुलाई 2026) को गुटबाजी की बात को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा कि पार्टी की राज्य इकाई में कोई बगावत नहीं हुई है और जल्द ही वरिष्ठ नेता पूरे पंजाब में एक साथ प्रचार करते दिखेंगे। लेकिन ये बयान ही ‘दाल में कुछ काला’ होने के संकेत दे रही है। पार्टी के नेताओं में काफी बेचैनी महसूस की जा रही है, खास कर संगठनात्मक नियुक्तियों और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों की प्रतिक्रिया ने सारी बातें आम कर दी हैं।

अब पार्टी के सामने सवाल यह है कि क्या यह मामला कुछ समय के लिए उठा विवाद है या इसके पीछे कोई गहरी बात है। कहीं पिछले विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी में मची उथल-पुथल की तरह इस बार भी पार्टी बिखर न जाए। पिछली बार तो सत्ता गंवाई थी, इस बार सपने गंवाने पड़ेंगे।

पंजाब में नेताओं की नियुक्ति और प्रतिक्रिया

1 जुलाई 2026 को कॉन्ग्रेस पार्टी हाई कमान ने 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए वडिंग को पंजाब अध्यक्ष और प्रताप सिंह बाजवा को विपक्ष का नेता बनाए रखा। इस दौरान पूर्व सीएम चरणजीत सिंह चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष या दूसरी बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई, बल्कि उन्हें चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया गया।

इससे उनके समर्थकों ने चन्नी को दरकिनार किए जाने का संदेश गया। चन्नी एक दलित नेता हैं और राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उन्होंने नियुक्ति किए जाने पर आलाकमान को कोई ‘धन्यवाद’ भी नहीं किया, जो आमतौर पर नेतागण सोशल मीडिया के माध्यम से करते हैं और जनता को मैसेज देते हैं। इससे अटकलें लगने लगीं कि वह नाराज हैं। सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर कमेटी का प्रमुख बनाया गया, लेकिन बताया जा रहा है कि वह भी ‘खुश’ नहीं हैं। प्रताप सिंह बाजवा स्वयं नेता प्रतिपक्ष बने हुए हैं, इसलिए उन्होंने खुलकर विद्रोह नहीं किया। उनका रुख यह है कि संगठन में सभी वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चलना चाहिए।

हालाँकि बाजवा समर्थकों का मानना है कि चुनावी रणनीति और टिकट वितरण में उनकी भूमिका निर्णायक होनी चाहिए और पार्टी को गुटबाजी से बचना चाहिए। बाजवा फिलहाल सार्वजनिक टकराव से बचते दिख रहे हैं।

चन्नी की नाराजगी पार्टी को पड़ सकती है भारी

पूर्व सीएम चन्नी की नाराजगी से पंजाब कॉन्ग्रेस में टूट का खतरा पैदा हो गया है। बताया जा रहा है कि चन्नी पूर्व सांसद विजयइंदर सिंगला को प्रधान बनाने पर सहमत थे और उस वक्त वह कैंपेन कमेटी का प्रमुख बनने के लिए तैयार थे। लेकिन जब पार्टी आलाकमान सिंगला के नाम पर सहमत नहीं हुई, क्योंकि सिंगला हिन्दू नेता हैं।

इससे पहले भी सुनील जाखड़ को इसलिए कॉन्ग्रेस ने सीएम बनाने से इनकार किया था, क्योंकि वह हिन्दू नेता थे। ऐसी हालत में चन्नी ही एकमात्र दावेदार थे प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी के लिए, लेकिन आलाकमान ने वडिंग बनाए रखा, इससे चन्नी काफी खफा हैं। दरअसल 2027 में अगर कॉन्ग्रेस चुनाव जीतती है तो वड़िंग को मुख्यमंत्री की कुर्सी का अहम दावेदार माना जाएगा। इसके अलावा टिकट बंटवारे में भी प्रदेश अध्यक्ष की ज्यादा चलेगी। चुनाव में जीतने वाले विधायक भी वड़िंग के समर्थक ही ज्यादा होंगे, तो जाहिर है सीएम की कुर्सी के प्रबल दावेदार होंगे।

चन्नी गुट की मोरिंडा स्थित घर पर अहम बैठक हुई

रूपनगर में चन्नी के मोरिंडा स्थित आवास पर शुक्रवार (3 जुलाई 2026) को करीब 50 मौजूदा और पूर्व विधायक और दूसरे नेता जमा हुए। इनमें पूर्व डिप्टी सीएम ओपी सोनी, पूर्व मंत्री भारत भूषण आशु और गुरप्रीत कांगड़, पूर्व सांसद मोहम्मद सादिक और विधायक गुरकीरत सिंह कोटली शामिल थे। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक में चन्नी ने साफ कहा है कि हम राजा वेड़िंग के अध्यक्ष रहते हुए काम नहीं कर सकते। इस दौरान वहाँ मौजूद नेताओं ने हाथ उठा कर उनका समर्थन किया।

रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के सर्वे रिपोर्ट में चन्नी सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे। सर्वे में यह भी दावा किया गया कि चन्नी 13 में से 7 लोकसभा सीटों में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री भगवंत मान से ज्यादा लोकप्रिय हैं। इसको देखते हुए चन्नी को सीएम चेहरा घोषित करने की सिफारिश भी की गई, लेकिन पार्टी आलाकमान ने नहीं माना।

दरअसल आलाकमान को लगा कि इससे सारा पावर चन्नी के हाथों में चला जाएगा, इसलिए हाईकमान ने उन्हें कैंपेन कमेटी का चेयरमैन बनाया। दरअसल पंजाब में हर जिले और कस्बे में पार्टी का गठन किया गया है। इसमें गठन राजा वेड़िंग के नेतृ्त्व में हुई है। ऐसे में ज्यादातर लोग उनके गुट के ही हैं। ऐसे में अगर प्रदेश नेतृत्व में बदलाव होता, तो स्थानीय स्तर पर नाराजगी हो सकती थी।

वड़िंग ने बगावत की बात का खंडन किया

प्रदेश अध्यक्ष वड़िंग ने चन्नी के घर पर हुई बैठक को बगावत मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने पीटीआई से कहा, “कोई बगावत नहीं है।” उन्होंने कहा कि किसी साथी के घर पर नेताओं का मिलना एक आम बात है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग मेरे घर पर जमा होंगे, कुछ रंधावा के घर, तो कुछ चन्नी के घर। उन्होंने चन्नी को एक सम्मानित सीनियर नेता और ‘हमारे भाई’ बताया और कहा कि न तो चन्नी और न ही वहाँ मौजूद सीनियर नेताओं ने पार्टी के खिलाफ कुछ कहा।

उन्होंने कहा कि अगर एक-दो लोगों ने ऐसा किया भी, तो उसकी कोई खास अहमियत नहीं है। उन्होंने मतभेद को ‘मनगढ़ंत’ बताते हुए विरोधियों पर आरोप लगाया कि वे एक सामान्य मीटिंग को हाईकमान के लिए चुनौती के तौर पर पेश कर रहे हैं।

इस दौरान वड़िंग ने खुद को CM की रेस से बाहर बताया। उन्होंने कहा, “मैं सिर्फ एक ही दौड़ में शामिल हूँ और वह है कॉन्ग्रेस को सत्ता में लाना।” उन्होंने कहा कि अगर पार्टी चन्नी या किसी और को CM पद का उम्मीदवार या राज्य प्रमुख चुनती है, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह फैसला राहुल गाँधी और अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को करना है और वह ‘कॉन्ग्रेस के एक अनुशासित सिपाही’ के तौर पर उनके फैसले का समर्थन करेंगे।

अमित शाह से मिले रंधावा

चाहे वड़िंग कुछ भी कहें, लेकिन पार्टी के अंदर बेचैनी साफ दिख रही है और ये बेचैनी सिर्फ चन्नी के खेमे तक ही सीमित नहीं है। गुरदासपुर के सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और उनके समर्थक नाराज चल रहे हैं। शुक्रवार (3 जुलाई 2026) को दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। हालाँकि उन्होंने कहा कि यह बैठक पंजाब में कानून-व्यवस्था के बारे में थी, लेकिन नियुक्तियों को लेकर अपनी नाराजगी का इजहार भी कर दिया।

कॉन्ग्रेस सांसद मनीष तिवारी काफी वक्त से हाशिए पर हैं। उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में कोई भूमिका भी नहीं दी गई है। ऐसे हालात में कॉन्ग्रेस के अंदर घमासान साफ दिख रही है। अब सबका ध्यान इस ओर है कि चुनाव में कॉन्ग्रेस कोई सीएम चेहरा पेश करती है या नहीं। अगर पेश करती है तो कौन होगा कॉन्ग्रेस का सीएम चेहरा?

पार्टी में 2021 जैसी उथल-पुथल मची हुई है। इसका असर यह हुआ कि विधानसभा चुनाव 2022 में पार्टी को सत्ता गँवानी पड़ी। पार्टी मात्र 18 सीटों पर सिमट कर रह गई और आम आदमी पार्टी ने भगवंत मान के नेतृत्व में सत्ता पर काबिज हो गई। अगर कॉन्ग्रेस ने फिर से पार्टी के अंदरुनी कलह रोकने में सफल नहीं हुई, तो कॉन्ग्रेस के लिए पंजाब की सत्ता दूर की कौड़ी साबित होगी।

पार्टी अध्यक्ष वड़िंग भले ही एकजुट होने की बात कह रहे हों, लेकिन चन्नी, रंधावा, बाजवा का गुट आने वाले दिनों में क्या स्टेंड लेते हैं और गाँव-गाँव, शहर-शहर एकसाथ ‘लड़ाई लड़ते’ दिखाई देते हैं या नहीं, इस पर ही पार्टी का सपना टिका हुआ है।

विश्व विजेता अर्जेंटीना को आख़िरी मिनट तक किसने रुलाया?

“अपने हथियार डाल दो, लियोनिडास।” फ़ारस का सम्राट ज़र्क्सीस अपने सामने खड़े स्पार्टा के राजा से कहता है।

लियोनिडास बिना विचलित हुए उसकी ओर देखते हैं। उनके चेहरे पर न भय है, न संशय। फिर वह केवल चार शब्द कहते हैं- “आओ… और उन्हें ले जाओ।”

480 ईसा पूर्व।

पश्चिम की सभ्यता अपने सबसे कठिन इम्तिहान के सामने खड़ी थी।

फ़ारसी साम्राज्य अपने उत्कर्ष पर था। सम्राट ज़र्क्सीस लगभग दो से तीन लाख सैनिकों की विराट सेना लेकर संपूर्ण यूनान को अपने अधीन करने निकल पड़ा था। उसके सामने छोटे-छोटे यूनानी नगर-राज्यों के पास न उतनी सेना थी, न उतने संसाधन और न ही इतना समय कि वे उस महायुद्ध की तैयारी कर सकें, जो उनके अस्तित्व का निर्णय करने वाला था।

ऐसे समय में स्पार्टा का राजा लियोनिडास आगे बढ़ता है।

विजय की आशा लेकर नहीं, बल्कि अपने राष्ट्र के लिए समय खरीदने के संकल्प के साथ।

वह अपने मात्र तीन सौ स्पार्टन योद्धाओं और लगभग सात हजार यूनानी सैनिकों के साथ थर्मोपाइले के उस दुर्गम पहाड़ी दर्रे पर मोर्चा संभाल लेता है, जहाँ संख्या का अहंकार पहली बार भूगोल से टकराने वाला था।

दो दिनों तक यूनानी योद्धा फ़ारसी सेना को वहीं रोके रखते हैं। हर बीतता हुआ क्षण यूनान के लिए अमूल्य था। हर गिरता हुआ योद्धा अपने पीछे अपने राष्ट्र के लिए कुछ और समय छोड़ जाता था।

लेकिन इतिहास केवल वीरों से नहीं, विश्वासघात से भी लिखा जाता है।

एक देशद्रोही फ़ारसी सेना को वह गुप्त पहाड़ी मार्ग बता देता है, जिससे स्पार्टनों को पीछे से घेरा जा सकता था। उसी क्षण लियोनिडास समझ जाते हैं कि अब यह युद्ध जीता नहीं जा सकता।

मगर अभी भी एक विजय शेष थी- कर्तव्य की विजय।

वह अधिकांश यूनानी सैनिकों को तत्काल अपने-अपने नगर लौट जाने का आदेश देते हैं, ताकि आने वाले निर्णायक युद्ध के लिए यूनान जीवित रह सके। स्वयं पीछे हटने से इंकार कर देते हैं।

अपने तीन सौ स्पार्टन योद्धाओं के साथ वे अंतिम सांस तक रणभूमि में डटे रहते हैं। वे जानते थे कि सूर्य का अगला उदय शायद उनके लिए नहीं होगा। फिर भी किसी ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे।

उस दिन थर्मोपाइले में तीन सौ मनुष्य मरे थे…

लेकिन अमर हो गया था उनका साहस।

लियोनिडास और उनके तीन सौ स्पार्टन योद्धाओं ने संसार को यह सिखा दिया कि इतिहास केवल विजेताओं का नहीं होता; कभी-कभी इतिहास उन लोगों का भी होता है, जो पराजय निश्चित जानकर भी रणभूमि छोड़ने से इनकार कर देते हैं।

कुछ ऐसा ही दृश्य आज मियामी के हार्ड रॉक स्टेडियम में भी देखने को मिला।

सामने थी विश्व विजेता अर्जेंटीना। दूसरी ओर था छोटा-सा द्वीपीय देश; काबो वर्दे।

परिणाम अंततः अर्जेंटीना के पक्ष में गया, लेकिन उस रात दुनिया ने केवल एक विजेता नहीं देखा। उसने एक ऐसी टीम भी देखी, जिसने अपनी सीमित ताकत के बावजूद विश्व चैंपियन को आख़िरी क्षण तक संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया और अपने साहस से इतिहास में अपनी जगह हमेशा के लिए सुरक्षित कर ली।

मियामी में बीती रात सबकी चहेती अंडरडॉग टीम काबो वर्दे का सामना विश्व चैंपियन अर्जेंटीना से था। यह मुकाबला केवल दो टीमों का नहीं था; एक ओर फुटबॉल के महानायक लियोनेल आंद्रेस मेस्सी थे, तो दूसरी ओर काबो वर्दे के अनुभवी गोलकीपर वोजिन्हा, जिन पर आज पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं।

निर्धारित समय पर रेफरी ड्रू फिशर की सीटी के साथ मुकाबला शुरू होता है। अर्जेंटीना अपनी पारंपरिक अल्बीसेलेस्ते, हल्की नीली और सफेद धारियों वाली जर्सी, पहने मैदान में उतरती है। दूसरी ओर काबो वर्दे की टीम थी, जिसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था और पाने के लिए पूरा इतिहास।

सातवें मिनट में मैच का पहला अटैकिंग मूव काबो वर्दे की ओर से आता है। पंद्रहवें मिनट में लियोनेल मेस्सी पहली बार गोल पर निशाना साधते हैं, लेकिन उनका प्रयास लक्ष्य से दूर निकल जाता है।

पहले हाफ के हाइड्रेशन ब्रेक के बाद जैसे ही दोनों टीमें मैदान में लौटती हैं, लियोनेल मेस्सी अपना जादू बिखेर देते हैं। मैदान की हाफ लाइन के पास से डिफेंडर लिसांद्रो मार्टिनेज़ एक लंबा और बेहद सटीक पास डालते हैं। गेंद काबो वर्दे की डिफेंसिव लाइन और गोलकीपर के बीच आकर गिरती है। मेस्सी बिजली जैसी तेजी से गेंद तक पहुंचते हैं, शानदार फर्स्ट टच से उसे अपने नियंत्रण में लेते हैं और गोलकीपर संभल पाते, उससे पहले ही गेंद को नज़दीकी पोस्ट के पास से नेट में भेज देते हैं। अर्जेंटीना मुकाबले में 1-0 की बढ़त बना चुका था। यह ऐसा गोल था जिसे बार-बार देखा जा सकता था।

अधिकांश लोगों को उम्मीद थी कि काबो वर्दे की टीम आज केवल अनुशासित रक्षात्मक फुटबॉल खेलती दिखाई देगी। लेकिन हकीकत बिल्कुल अलग थी। सभी को चौंकाते हुए काबो वर्दे मौका मिलते ही अर्जेंटीना के बॉक्स की ओर तेजी से बढ़ने की कोशिश कर रही थी। अड़तीसवें मिनट में स्टीवन मोरेरा अर्जेंटीना के गोल पर हमला करते हैं, लेकिन उनका शॉट निशाने पर नहीं रहता। पैंतालीसवें मिनट में एंज़ो फर्नांदेज़ एक जोरदार शॉट लगाते हैं, मगर वोजिन्हा शानदार बचाव करते हुए गेंद को गोल में जाने से रोक देते हैं।

कुछ ही क्षण बाद पहले हाफ की समाप्ति की सीटी बजती है। अर्जेंटीना 1-0 की बढ़त के साथ ड्रेसिंग रूम की ओर लौटता है। हालांकि स्कोरबोर्ड अर्जेंटीना के पक्ष में था, लेकिन काबो वर्दे ने यह साफ कर दिया था कि वह केवल मुकाबला खेलने नहीं, बल्कि विश्व चैंपियन को हर गेंद के लिए संघर्ष करने पर मजबूर करने आई है।

दूसरे हाफ की शुरुआत होती है। काबो वर्दे पूरे आत्मविश्वास और अदम्य साहस के साथ मैदान में उतरती है। वह लगातार कभी कॉर्नर तो कभी तेज़ अटैकिंग मूव्स के ज़रिए अर्जेंटीना की रक्षापंक्ति पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही थी। चौवनवें मिनट में डिरोए दुआर्ते गोल पर निशाना साधते हैं, लेकिन उनका प्रयास सफल नहीं हो पाता।

मगर केवल पाँच मिनट बाद ही पूरा स्टेडियम स्तब्ध रह जाता है।

मैदान की बाईं ओर से काबो वर्दे के खिलाड़ी रयान मेंडेज़ अर्जेंटीना के बॉक्स में एक शानदार क्रॉस डालते हैं। डिरोए दुआर्ते अपने मार्कर को चकमा देते हुए गेंद तक पहुँचते हैं और बड़ी चपलता से उसे एमिलियानो मार्टिनेज़ के गोल में पहुंचा देते हैं। काबो वर्दे ने मुकाबला 1-1 से बराबर कर दिया था।

यह केवल एक गोल नहीं था। यह उस छोटे से द्वीपीय देश का एलान था कि वह विश्व विजेता के सामने झुकने नहीं आया है।

इस गोल के तुरंत बाद अर्जेंटीना के कोच लियोनेल स्कालोनी सक्रिय हो जाते हैं। वे अब तक अपेक्षाकृत शांत रहे अपने दो अटैकर्स, लाउतारो मार्टिनेज़ और थियागो अल्माडा, को बाहर बुलाकर उनकी जगह हूलियन अल्वारेज़ और नीको गोंज़ालेज़ को मैदान में भेजते हैं।

कुछ ही देर बाद एंज़ो फर्नांदेज़ एक बार फिर दूर से गोल पर निशाना साधते हैं, लेकिन गेंद पोस्ट से काफी दूर निकल जाती है। दूसरी ओर काबो वर्दे के कोच बूबिस्ता भी तुरंत जवाबी रणनीति अपनाते हुए दो नए खिलाड़ियों को मैदान में उतारते हैं।

तिहत्तरवें मिनट में मेस्सी एक शानदार शॉट लगाते हैं, लेकिन वोजिन्हा एक बार फिर दीवार बनकर सामने खड़े हो जाते हैं और गेंद को गोल में जाने से रोक देते हैं।

समय लगातार बीत रहा था।

अस्सी मिनट तक स्कोर 1-1 से बराबर था। अब यह पूरी तरह संभव दिखाई देने लगा था कि मुकाबला अतिरिक्त समय तक जाएगा। अपनी टीम में नई ऊर्जा भरने के लिए बूबिस्ता फिर दो और बदलाव करते हैं। दूसरी ओर छियासीवें मिनट में स्कालोनी भी दो नए खिलाड़ियों को मैदान में उतारते हैं।

अठ्ठासी मिनट का खेल पूरा हो चुका था।

स्कोर अब भी बराबरी पर था।

काबो वर्दे के खिलाड़ी पूरे साहस के साथ डटे हुए थे। अर्जेंटीना के खिलाड़ियों की बेचैनी अब साफ़ दिखाई देने लगी थी। विश्व चैंपियन की हर कोशिश का जवाब काबो वर्दे के खिलाड़ी पूरी ताकत से दे रहे थे। आज इस छोटी-सी टीम ने टूर्नामेंट के सबसे बड़े दावेदारों को खुलकर चुनौती दी थी।

90+5वें मिनट में मेस्सी एक शानदार हेडर लगाते हैं, लेकिन वोजिन्हा फिर एक असाधारण बचाव कर लेते हैं।

90+8 मिनट।

रेफरी ड्रू फिशर अंतिम सीटी बजाते हैं। निर्धारित नब्बे मिनट का खेल समाप्त हो चुका था। स्कोर 1-1 से बराबर था और अब मुकाबला अतिरिक्त समय में प्रवेश कर चुका था।

एक्स्ट्रा टाइम का पहला हाफ शुरू होता है।

दो मिनट के भीतर ही अर्जेंटीना को एक कॉर्नर मिलता है। लियोनेल मेस्सी गेंद लेने आगे आते हैं। उनका कॉर्नर सीधे बॉक्स के भीतर पहुँचता है। एलेक्सिस मैकएलिस्टर गेंद को हेडर से आगे बढ़ाते हैं और लिसांद्रो मार्टिनेज़ उसे बेहद करीब से गोल में पहुंचा देते हैं।

अर्जेंटीना एक बार फिर मुकाबले में बढ़त बना चुका था।

हार्ड रॉक स्टेडियम नीली और सफेद जर्सियों से गूंज उठता है। हजारों अर्जेंटीनी समर्थक राहत की सांस लेते हैं। पूरे स्टेडियम में जश्न का माहौल बन जाता है।

लेकिन काबो वर्दे अब भी हार मानने को तैयार नहीं था।

खेल दोबारा शुरू होता है। काबो वर्दे को भी एक कॉर्नर मिलता है, मगर वे उसका फायदा नहीं उठा पाते। इसके तुरंत बाद स्टीवन मोरेरा गोल की दिशा में एक और शॉट लगाते हैं, लेकिन गेंद लक्ष्य से बाहर निकल जाती है। दूसरी ओर मेस्सी भी तेज़ अटैक के बाद गोल पर निशाना साधते हैं, पर उनका प्रयास भी सफल नहीं होता।

कुछ ही देर बाद हूलियन अल्वारेज़ तेज़ रफ्तार से गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं और गोल पर शॉट लगाते हैं, मगर गेंद फिर पोस्ट के बाहर चली जाती है।

इसके बाद अर्जेंटीना लगातार दबाव बनाए रखती है। एक के बाद एक उसे कॉर्नर मिलते रहते हैं और काबो वर्दे की रक्षापंक्ति लगातार परीक्षा देती रहती है।

मगर मैच ने अभी अपना सबसे बड़ा रोमांच दिखाना बाकी रखा था।

102वाँ मिनट।

काबो वर्दे गेंद लेकर अर्जेंटीना के बॉक्स की ओर बढ़ती है। हाफ लाइन से कुछ आगे मैदान के मध्य में मौजूद यानिक सेमेडो एक लंबा पास मैदान की बाईं ओर दौड़ रहे अपने साथी खिलाड़ी सिडनी लोपेज़ काबराल की दिशा में भेजते हैं।

काबराल अपने सामने मौजूद अर्जेंटीनी डिफेंडर को शानदार तरीके से छकाते हैं और बॉक्स की सीमा से ही दाएं पैर से एक जोरदार शॉट लगाते हैं।

एमिलियानो मार्टिनेज़ पूरी ताकत से हवा में छलांग लगाते हैं, लेकिन गेंद उनकी पहुँच से बहुत दूर निकल चुकी थी।

गेंद सीधी नेट में समा जाती है।

काबो वर्दे ने एक बार फिर मुकाबला बराबरी पर ला दिया था।

पूरा स्टेडियम कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह जाता है। अर्जेंटीना के खिलाड़ियों के चेहरों पर तनाव साफ़ दिखाई देता है, जबकि काबो वर्दे के खिलाड़ी पूरे जोश के साथ अपने समर्थकों की ओर दौड़ पड़ते हैं। उस क्षण उन्होंने पूरी दुनिया को बता दिया था कि वे अंतिम सांस तक लड़ने वाले हैं।

कोच लियोनेल स्कालोनी तुरंत एक और दांव चलते हैं। वे पेनाल्टी विशेषज्ञ गोंज़ालो मोंटिएल को मैदान में उतारते हैं। मैदान में आते ही मोंटिएल विरोधी गोल की दिशा में तेज़ शॉट लगाते हैं, लेकिन उनका प्रयास भी निशाने से चूक जाता है।

इसके कुछ ही क्षण बाद एक्स्ट्रा टाइम का पहला हाफ समाप्त हो जाता है।

अब केवल पंद्रह मिनट शेष थे।

दूसरे अतिरिक्त हाफ की शुरुआत होती है।

गेंद का अधिकांश समय काबो वर्दे के हाफ में बीत रहा था। अर्जेंटीना लगातार हमले कर रही थी, जबकि काबो वर्दे हर अवसर पर जवाबी हमला करने की कोशिश कर रहा था।

111वाँ मिनट।

अर्जेंटीना को एक और कॉर्नर मिलता है।

मेस्सी गेंद को बॉक्स के भीतर भेजते हैं। क्रिस्टियन रोमेरो ऊँची छलांग लगाकर शानदार हेडर लगाते हैं। गेंद काबो वर्दे के डिफेंडर डाइनी बोर्जेस (Diney Borges) से डिफ्लेक्ट होकर दिशा बदल देती है और गोल में चली जाती है।

आधिकारिक रिकॉर्ड में यह गोल अर्जेंटीना के पक्ष में डाइनी बोर्जेस के ओन गोल के रूप में दर्ज किया गया।

अर्जेंटीना एक बार फिर 3-2 से आगे था।

इसके बाद काबो वर्दे ने हार नहीं मानी। उसने लगातार अर्जेंटीना के गोल पर हमले किए। कुछ क्षणों के लिए विश्व चैंपियन की टीम बैकफुट पर भी दिखाई दी। अंतिम मिनटों तक काबो वर्दे बराबरी की तलाश में पूरी ताकत से लड़ता रहा।

लेकिन 120+4 मिनट पर रेफरी ड्रू फिशर अंतिम सीटी बजा देते हैं।

अर्जेंटीना ने बेहद कठिन संघर्ष के बाद यह मुकाबला 3-2 से अपने नाम कर लिया था।

मैदान में कुल 64,478 दर्शक मौजूद थे, जिन्होंने आज कुछ ऐतिहासिक घटित होते देखा था। छोटे-से द्वीपीय देश काबो वर्दे ने विश्व विजेता अर्जेंटीना को ऐसी टक्कर दी कि एक समय के लिए स्वयं अर्जेंटीनी खिलाड़ियों को भी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मैदान पर हो क्या रहा है। उन्होंने पूरे साहस, अनुशासन और आत्मविश्वास के साथ मुकाबला खेला।

अर्जेंटीना ने पूरे मैच में 62 प्रतिशत समय गेंद पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। उसके खिलाड़ियों ने कुल 822 पास पूरे किए और विरोधी गोलपोस्ट की ओर 22 शॉट लगाए, जिनमें से 10 निशाने पर रहे। इतने आक्रामक खेल के बावजूद अर्जेंटीना केवल तीन गोल ही कर सकी। दूसरी ओर मजबूत इरादों के साथ मैदान में उतरी काबो वर्दे ने अर्जेंटीना के गोल पर कुल 15 शॉट लगाए, जिनमें से 5 निशाने पर रहे। यही नहीं, पिछले विश्व कप के गोल्डन ग्लव विजेता गोलकीपर एमिलियानो मार्टिनेज़ के खिलाफ वह दो गोल दागने में भी सफल रही। यह आँकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि काबो वर्दे ने विश्व चैंपियन को आख़िरी क्षण तक संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया था।

मैच समाप्त होने के बाद लियोनेल मेसी आगे बढ़कर वोजिन्हा को गले लगाते हैं और उनके शानदार प्रदर्शन की सराहना करते हैं। इसके बाद काबो वर्दे के खिलाड़ियों के आग्रह पर वह एक-एक कर सभी के साथ तस्वीरें भी खिंचवाते हैं। यह दृश्य अपने आप में बेहद भावुक था। जीत अर्जेंटीना की हुई थी, लेकिन सम्मान दोनों टीमों के हिस्से आया।

वोजिन्हा ने आज पूरे मैच में कुल आठ शानदार सेव किए, जिनमें से चार सीधे लियोनेल मेसी के प्रयासों पर थे। उन्होंने इससे पहले स्पेन और उरुग्वे जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ भी अपने बेहतरीन प्रदर्शन से सबका ध्यान खींचा था, लेकिन आज उन्हें फुटबॉल के महानतम खिलाड़ियों में से एक के सामने झुकना पड़ा। हार के बावजूद स्टेडियम में मौजूद 64,478 दर्शकों, विशेषकर अर्जेंटीनी समर्थकों, ने काबो वर्दे के खिलाड़ियों के लिए तालियाँ बजाईं। यह पल खेल भावना का एक सुंदर उदाहरण बन गया।

हमने पिछली मैच रिपोर्ट में घाना के स्वयंभू काले जादू के तांत्रिक नाना क्वाकू बोनसाम का जिक्र किया था। उन्होंने दावा किया था कि अर्जेंटीना काबो वर्दे के खिलाफ अपना मुकाबला हार जाएगी। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा था कि लियोनेल मेसी अब इस विश्व कप में कोई और गोल नहीं कर पाएंगे।

लेकिन मैदान पर कहानी बिल्कुल अलग लिखी गई।

मेसी ने न केवल शानदार गोल किया, बल्कि पूरे मुकाबले में अर्जेंटीना के आक्रमण का नेतृत्व किया, कई बेहतरीन मौके बनाए और अपनी टीम को लगातार आगे बढ़ाते रहे। उनके कॉर्नर से दूसरा गोल बना और पूरे मैच के दौरान उन्होंने अर्जेंटीना के हमलों की धुरी की भूमिका निभाई। नाना क्वाकू बोनसाम का दावा मैदान की वास्तविकता के सामने पूरी तरह ध्वस्त हो गया।

इस गोल के साथ लियोनेल मेसी अब विश्व कप के विभिन्न संस्करणों में कुल 20 गोल कर चुके हैं। इसके साथ ही वह विश्व कप इतिहास में लगातार आठ मैचों में गोल करने वाले पहले खिलाड़ी भी बन गए हैं। फुटबॉल के सबसे बड़े मंच पर उन्होंने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि अपने नाम दर्ज कर ली।

उधर, राउंड ऑफ 32 के दो अन्य मुकाबले भी खेले गए।

एक ओर मिस्र का सामना ऑस्ट्रेलिया से था। इमाम अशूर के गोल की बदौलत मिस्र ने मैच के तेरहवें मिनट में ही बढ़त बना ली थी। लेकिन दूसरे हाफ में एक आत्मघाती गोल के कारण उसकी बढ़त समाप्त हो गई और मुकाबला 1-1 की बराबरी पर पहुंच गया। निर्धारित समय के बाद भी कोई टीम बढ़त हासिल नहीं कर सकी, जिसके चलते मैच अतिरिक्त समय तक खिंच गया। एक्स्ट्रा टाइम की समाप्ति के बाद भी स्कोर 1-1 ही रहा और आखिरकार मुकाबले का फैसला पेनाल्टी शूटआउट से हुआ। वहां मिस्र ने शानदार प्रदर्शन करते हुए जीत हासिल की और राउंड ऑफ 16 में अपनी जगह पक्की कर ली। दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया भले ही टूर्नामेंट से बाहर हो गया, लेकिन पूरे अभियान के दौरान उसने जिस जुझारू फुटबॉल का प्रदर्शन किया, उसने निश्चित रूप से अपने देशवासियों का दिल जीत लिया। कंगारू टीम सिर ऊँचा करके अपने वतन लौटेगी।

दूसरे मुकाबले में कन्सास सिटी स्टेडियम में कोलंबिया का सामना घाना से हुआ। झॉन आरियास के गोल की बदौलत कोलंबिया ने यह मुकाबला 1-0 से अपने नाम कर लिया और राउंड ऑफ 16 में प्रवेश कर गया। अब सात जुलाई को उसका सामना स्विट्जरलैंड से होगा।

अब आज से विश्व कप के राउंड ऑफ 16 चरण के मुकाबलों का रोमांच शुरू होने जा रहा है।

आज रात भारतीय समयानुसार साढ़े दस बजे कनाडा अपने घरेलू समर्थकों के बीच एटलस लायंस यानी मोरक्को का सामना करेगी। कागज़ों पर मोरक्को इस मुकाबले की प्रबल दावेदार जरूर है, लेकिन कनाडा ने भी अब तक अपने प्रदर्शन से सभी को प्रभावित किया है। आज उसकी अब तक की सबसे कठिन परीक्षा होगी।

इसके बाद रात ढाई बजे लेस ब्ल्यूज़ यानी फ्रांस का सामना पराग्वे से होगा। आज के मुकाबले में गोल करने के बाद लियोनेल मेसी टूर्नामेंट में अपने गोलों की संख्या सात तक पहुंचा चुके हैं। ऐसे में कीलिएन एमबाप्पे निश्चित ही गोल्डन बूट की दौड़ में उनसे पीछे नहीं रहना चाहेंगे। एक ओर फ्रांस का विस्फोटक आक्रमण होगा, तो दूसरी ओर पराग्वे की दृढ़ रक्षापंक्ति। यह मुकाबला भी बेहद दिलचस्प रहने की पूरी उम्मीद है।

तो फिलहाल अगली मैच रिपोर्ट तक के लिए अनुमति दीजिए। फुटबॉल का महासमर पूरे रोमांच पर है। साथ बने रहिएगा।

हिंदू बन लॉरा फ्रांसिस ने मंदिर में किया विवाह, फिर भी तमिलनाडु सरकार ने गर्भगृह में पूजा से रोका: हाई कोर्ट ने दिया अधिकार, जानिए कैसे सनातन को बताया सबसे अलग

मद्रास हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता या उसका विदेशी नाम उसकी हिंदू आस्था का निर्धारण नहीं कर सकता। मामले में टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू धर्म उदार है और इसे अपनाने के लिए किसी औपचारिक समारोह या धर्मांतरण प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है। जस्टिस डी भरत चक्रवर्ती ने तंजावुर के श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर से जुड़े मामले में यह व्यवस्था दी।

यह मामला एक अमेरिकी नागरिक महिला, लौरा फ्रांसिस अयंगर (Laura Frances Iyengar) से जुड़ा है, जिन्हें तमिलनाडु के तंजावुर जिले में स्थित एक ऐतिहासिक मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने से सिर्फ इसलिए रोक दिया गया था क्योंकि प्रशासन ने उनके विदेशी नाम और अमेरिकी नागरिकता के आधार पर उन्हें ईसाई मान लिया था।

कोर्ट ने अपने आदेश में न केवल महिला के अधिकारों को बहाल किया, बल्कि हिंदू धर्म की व्यापकता, उदारता और इसकी ऐतिहासिक प्रकृति पर भी गहरी टिप्पणी की। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि लौरा ने पूरी निष्ठा और आचरण के साथ हिंदू धर्म को अपनाया है और उन्हें किसी अन्य हिंदू महिला भक्त की तरह ही मंदिर में पूजा-अर्चना करने का पूरा अधिकार है।

जानिए क्या है पूरा मामला और HC ने तमिलनाडु सरकार को क्यों लगाई फटकार

यह पूरा विवाद तमिलनाडु के तंजावुर जिले में स्थित श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर से शुरू हुआ। अमेरिकी नागरिक लौरा फ्रांसिस ने हिंदू धर्म के प्रति अपनी गहरी आस्था के कारण कई वर्ष पहले ही इस धर्म को अपना लिया था। सितंबर 2023 में उन्होंने इसी मंदिर में एक हिंदू व्यक्ति, वरधा बालाजी वेंकटकृष्णन से पूरे रीति-रिवाजों के साथ विवाह किया था।

विवाह के बाद भी वह लगातार वैष्णव संप्रदाय की धार्मिक प्रथाओं का पालन कर रही थीं और एक समर्पित हिंदू की तरह जीवन जी रही थीं। विवाद तब पैदा हुआ जब वर्ष 2024 में लौरा फ्रांसिस ने एक बार फिर इस मंदिर का दौरा किया। वहाँ मौजूद कुछ स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं ने उनके विदेशी रंग-रूप और नाम को देखकर आपत्ति जताई।

उनका मानना था कि वह हिंदू नहीं हैं और एक गैर-हिंदू को मंदिर के भीतर प्रवेश नहीं मिलना चाहिए। इस विरोध के बाद लौरा के पति वरधा बालाजी ने ‘तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती’ (HR&CE) विभाग के अधिकारियों को एक पत्र लिखा।

उन्होंने विभाग से अनुरोध किया कि उनकी पत्नी को एक हिंदू भक्त के रूप में मंदिर में बिना किसी रोक-टोक और भय के स्वतंत्र रूप से पूजा करने की अनुमति दी जाए। इसके जवाब में HR&CE विभाग ने 10 अगस्त 2024 को एक आधिकारिक आदेश जारी किया। विभाग ने अपने आदेश में लौरा फ्रांसिस को एक ‘अमेरिकी ईसाई महिला’ के रूप में पेश कर दिया।

विभाग का तर्क था कि अन्य भक्तों की धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुँचे, इसलिए लौरा को केवल मंदिर के बाहरी परिसर तक ही जाने की अनुमति दी जा सकती है, उन्हें मुख्य गर्भगृह या आंतरिक हिस्सों में जाने की अनुमति नहीं होगी। इसके बाद लौरा ने मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ का दरवाजा खटखटाया और विभाग को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की।

विदेशी नाम होने से कोई ईसाई नहीं हो जाता: HC ने हिंदू धर्म को बताया सबसे उदार

इस मामले की सुनवाई मद्रास हाई कोर्ट के जज जस्टिस डी भरत चक्रवर्ती की पीठ ने की। कोर्ट ने HR&CE विभाग के रुख को पूरी तरह से खारिज कर दिया और प्रशासन की कार्रवाई पर नाराजगी जाहिर की। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा कि चूँकि याचिकाकर्ता एक अमेरिकी नागरिक थीं, इसलिए अधिकारियों ने स्वतः ही यह मान लिया कि वह ईसाई होंगी।

जज ने इस तर्क को पूरी तरह से अतार्किक और तथ्यहीन बताते हुए कहा कि अधिकारियों का यह निष्कर्ष किसी भी पुख्ता सामग्री या सबूत पर आधारित नहीं था और केवल अमेरिकी होने से कोई ईसाई नहीं हो जाता और न ही विदेशी नाम होने से किसी की हिंदू आस्था कम हो जाती है। हिंदू धर्म को रेखांकित करते हुए जस्टिस डी भरत चक्रवर्ती ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

मद्रास हाई कोर्ट के आदेश का एक हिस्सा (साभार: लॉ बीट)

उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जो ऐतिहासिक रूप से अत्यंत समावेशी और उदार रहा है। अन्य मजहब और पंथों के विपरीत, हिंदू धर्म में किसी को अपने भीतर शामिल करने के लिए किसी अनिवार्य औपचारिक धर्मांतरण समारोह या किसी आधिकारिक धर्मांतरण प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती है।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इसे अपनाने के लिए ऐसी कोई पूर्व-शर्त लागू नहीं होती। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ‘पेरुमल नाडार बनाम पोन्नुस्वामी’ मामले का जिक्र किया। कोर्ट ने उस मामले में स्पष्ट किया था कि कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से और पूरी तरह से हिंदू बन सकता है, बशर्ते उसके भीतर इस धर्म को अपनाने का सच्चा इरादा हो।

कोर्ट ने कहा था कि व्यक्ति का आचरण भी समाज में ऐसा होना चाहिए जो उसकी इस धार्मिक निष्ठा को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता हो। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि हिंदू धर्म में शामिल होने के लिए किसी भी प्रकार के औपचारिक शुद्धिकरण या प्रायश्चित समारोह की कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि महिला का नाम ‘लौरा फ्रांसिस’ है, उन्हें एक हिंदू के रूप में मान्यता देने से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने HR&CE विभाग के 10 अगस्त 2024 के आदेश को उस सीमा तक अवैध और असंवैधानिक घोषित कर दिया जहाँ उन्हें ‘अमेरिकी ईसाई महिला’ कहा गया था।

कोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि उनके पति के दादा पहले उक्त मंदिर के न्यासी के रूप में कार्य कर चुके थे, जिससे हिंदू धर्म में उनका सामाजिक और धार्मिक एकीकरण सिद्ध होता है।

अंत में कोर्ट ने निर्देश दिया कि लौरा फ्रांसिस को पूरी तरह से एक हिंदू भक्त माना जाए और उन्हें वे सभी अधिकार और विशेषाधिकार प्राप्त होंगे जो किसी भी अन्य हिंदू महिला भक्त को मिलते हैं। मंदिर के रीति-रिवाजों, आगमों, परंपराओं और नियमों के दायरे में रहते हुए, उन्हें किसी भी हिस्से में जाने से नहीं रोका जा सकता।

महिला ने प्रस्तुत किए थे अपने हिंदू होने के प्रमाण

कोर्ट में मामले की पैरवी के दौरान लौरा फ्रांसिस अयंगर ने ऐसे कई ठोस सबूत पेश किए, जिससे यह साबित हुआ कि उनका हिंदू धर्म की ओर झुकाव कोई क्षणिक विचार नहीं था, बल्कि वह वर्षों से इस धर्म को जी रही थीं। लौरा ने कोर्ट को विस्तार से बताया कि उन्होंने किसी दबाव में नहीं, बल्कि स्वेच्छा से कई साल पहले हिंदू धर्म को आत्मसात किया था।

वह लंबे समय से लगातार हिंदू देवी-देवताओं की पूजा कर रही हैं और उनकी जीवनशैली सनातन धर्म के पूर्णतः अनुरूप है। सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में उन्होंने अपने सरकारी दस्तावेजों को पेश किया, जिसके तहत भारत आने के लिए दिए गए अपने वीजा आवेदनों में भी उन्होंने विवाह से पहले ही स्वयं को ‘हिंदू’ के रूप में घोषित किया था।

इसके साथ ही उन्होंने अपनी शादी से पहले और बाद में भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थित कई प्रसिद्ध और ऐतिहासिक हिंदू मंदिरों की यात्राएँ की थीं और हिंदू रीति-रिवाजों से तीर्थयात्राएँ संपन्न की थीं। एक हिंदू व्यक्ति से शादी करने के बाद, वह लगातार वैष्णव संप्रदाय के रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों और त्योहारों का श्रद्धापूर्वक पालन कर रही थी।

महिला का विवाह सितंबर 2023 में इसी श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। इन तमाम साक्ष्यों के आधार पर ही कोर्ट ने माना कि उनका आचरण और उनकी आस्था उनके हिंदू होने का प्रमाण हैं, जिसे महज एक विदेशी पासपोर्ट या नाम के आधार पर झुठलाया नहीं जा सकता।

श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर का इतिहास

तमिलनाडु के तंजावुर जिले के पसुपति कोइल में स्थित श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर लगभग 900 वर्ष पुराना है। यह मंदिर भगवान वरदराज पेरुमाल (भगवान विष्णु) को समर्पित है। इस मंदिर का इतिहास श्री रामानुजाचार्य, उनके गुरु पेरिया नंबी और उनके एक शिष्य से जुड़ी एक प्रसिद्ध घटना से संबंधित है।

मान्यता है कि चोल राजा कुलोत्तुंग ने अपने राज्य के लोगों को यह लिखकर देने का आदेश दिया कि भगवान शिव सबसे श्रेष्ठ हैं। जब श्री रामानुजाचार्य को दरबार में बुलाया गया, तब उनके एक शिष्य अपने गुरु का वेश धारण करके स्वयं दरबार में पहुँचे। उनके साथ श्री रामानुजाचार्य के गुरु पेरिया नंबी भी थे।

राजा ने दोनों से अपने आदेश पर हस्ताक्षर करने को कहा, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। राजा इस बात से बहुत क्रोधित हो गया और उसने उनकी आँखें निकालने का आदेश दे दिया। शिष्य ने किसी और से अपनी आँखें निकलवाने के बजाय स्वयं अपने नाखूनों से अपनी आँखें निकाल लीं।

वहीं सैनिकों ने 105 वर्षीय पेरिया नंबी की आँखें फोड़ दीं। इसके बाद पेरिया नंबी बड़ी कठिनाई से पसुपति कोइल पहुँचे। यहीं भगवान वरदराज पेरुमाल ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें मोक्ष प्रदान किया। मान्यता है कि इस घटना के बाद श्री रामानुजाचार्य ने इस स्थान पर भगवान वरदराज पेरुमाल के मंदिर का निर्माण कराया।

तभी से यह मंदिर भगवान के दिव्य दर्शन और पेरिया नंबी को प्राप्त मोक्ष के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

‘तमिलनाडु को अलग देश होना चाहिए’: मद्रास HC ने कहा- यह देशद्रोह नहीं, आज के दौर में ऐसा बयान देश/सरकार के खिलाफ नफरत फैलाना नहीं; जानिए क्या है मामला

मद्रास उच्च न्यायालय (मद्रास हाईकोर्ट) ने हाल ही में देशद्रोह (Sedition) के एक मामले को रद्द करते हुए बेहद महत्वपूर्ण और अनोखी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि आज के सामाजिक परिवेश में तमिलनाडु को भारत से अलग करके एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की बात कहना देशद्रोह का अपराध नहीं माना जाएगा, बल्कि ऐसा बयान देने वाले व्यक्ति को समाज में ‘मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं’ (Mental Health Issues) से पीड़ित माना जाएगा।

जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती की एकल पीठ ने ‘कीरा बनाम राज्य’ मामले की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में अगर कोई ऐसी बात कहता भी है, तो उससे आम जनता के मन में सरकार के प्रति कोई नफरत या असंतोष पैदा नहीं होगा, बल्कि लोग इसे एक फिजूल की बात मानकर नजरअंदाज कर देंगे। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या था, अदालत ने अपने फैसले में क्या-क्या महत्वपूर्ण दलीलें दीं और इस फैसले के बाद आम जनता के मन में किस तरह के सवाल उठ रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला साल 2014 का है, जब चेन्नई के आरकेवी प्रिव्यू थिएटर में एक किताब का विमोचन किया गया था। इस किताब के लेखक और संकलक ‘इलांगोवन’ नाम के व्यक्ति थे (जिनकी मामले की पेंडेंसी के दौरान ही मौत हो चुकी है)। इस किताब को प्रकाशित करने का आरोप दो प्रकाशकों कीरा उर्फ मूर्ति और थमिल बाला पर था, जो ‘कड़गम पथिपगम’ नाम का प्रकाशन गृह चलाते हैं।

अभियोजन पक्ष (सरकारी वकील) के अनुसार, इस किताब में साल 1967 के एक घटनाक्रम का जिक्र था। किताब में लिखा गया था कि 1967 में ‘तमिलारसन’ नाम के एक व्यक्ति ने कोयंबटूर में यह घोषणा की थी कि तमिलनाडु को भारत से अलग होकर एक स्वतंत्र राष्ट्र बनना चाहिए। आरोप यह भी था कि किताब में देश से अलग होने (Secession) के लिए गुरिल्ला युद्ध (Guerrilla Warfare) जैसी हिंसक पद्धतियों को अपनाने का संदर्भ दिया गया था।

इसी को आधार बनाकर पुलिस ने प्रकाशकों के खिलाफ तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124ए (देशद्रोह) के तहत मामला दर्ज किया था, जो सैदापेट के 23वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में लंबित था। दोनों प्रकाशकों ने इस मुकदमे को रद्द कराने के लिए मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

हाईकोर्ट ने फैसले में क्या-क्या कहा?

जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद प्रकाशकों के खिलाफ चल रहे देशद्रोह के मुकदमे को पूरी तरह से खारिज (Quash) कर दिया।

जस्टिस चक्रवर्ती ने मामले की गहराई से समीक्षा करते हुए प्रकाशकों के खिलाफ चल रहे इस मुकदमे को पूरी तरह से निरस्त कर दिया। उन्होंने अपने फैसले में दलील दी कि देशद्रोह के आरोपों को हमेशा वर्तमान सामाजिक परिदृश्य की रोशनी में देखा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि साल 1967 के दौर में जब तमिल लिबरेशन फ्रंट जैसी समूह सक्रिय थे, तब इस तरह के भाषण या प्रकाशन निश्चित रूप से भारत सरकार के खिलाफ नफरत भड़का सकते थे, लेकिन आज का भारत दिल और आत्मा से पूरी तरह एकीकृत हो चुका है।

इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस किताब में आज के समय में देश को तोड़ने का कोई नया आह्वान नहीं किया गया है, बल्कि यह सिर्फ दशकों पुरानी एक घटना का ऐतिहासिक रिकॉर्ड है और इतिहास में जो घटा उसे केवल दर्ज करना या लिखना अपराध की श्रेणी में नहीं आता।

अदालत ने अपने फैसले में कई बेहद अहम कानूनी और सामाजिक टिप्पणियाँ कीं-

समय और सामाजिक परिवेश का महत्व: अदालत ने कहा कि देशद्रोह के आरोपों की समीक्षा हमेशा वर्तमान सामाजिक ताने-बाने और माहौल को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। जस्टिस चक्रवर्ती ने कहा, “यह सच हो सकता है कि 1967 के दौर में जब तमिलारसन ने ‘तमिल लिबरेशन फ्रंट’ का गठन किया था, तब इस तरह के भाषण या प्रकाशन से भारत सरकार के खिलाफ नफरत या अवमानना भड़क सकती थी। लेकिन आज के परिदृश्य में भारत एक राष्ट्र के रूप में दिल और आत्मा से पूरी तरह एकीकृत (Unified) है।”

नफरत नहीं, सिर्फ खीझ पैदा होगी: अदालत ने कहा, “अगर आज कोई व्यक्ति तमिलनाडु को बाँटकर एक अलग देश बनाने की बात करता है, तो निश्चित रूप से उसे मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित व्यक्ति माना जाएगा। इससे आम जनता के बीच कोई नफरत पैदा नहीं होगी, बल्कि यह बात अधिक से अधिक लोगों में थोड़ी झुंझलाहट या खीझ (Annoyance) पैदा कर सकती है।”

इतिहास को दर्ज करना अपराध नहीं: हाईकोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि विवादित किताब में आज के समय में देश को तोड़ने या अलग होने का कोई नया आह्वान नहीं किया गया है। इसमें केवल दशकों पहले (1967 में) जो कुछ घटित हुआ था, उसका एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड दर्ज किया गया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जो कुछ इतिहास में हुआ, उसे महज दर्ज करना या लिखना, नफरत भड़काने की कोशिश के दायरे में नहीं आ सकता।”

मद्रास हाई कोर्ट के फैसले का हिस्सा

आम लोगों के मन में उठ सकते हैं अहम सवाल

मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला जहाँ एक तरफ अभिव्यक्ति की आजादी और इतिहास लेखन के अधिकार को सुरक्षा देता है, वहीं दूसरी तरफ इसने आम जनता और कानूनी जानकारों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस फैसले के बाद लोगों के मन में कई तरह के सवाल और चिंताएं कौंध रही हैं:

देशद्रोह की परिभाषा और दायरा क्या है?: आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि देशद्रोह या देश को तोड़ने की बात करने की सीमा रेखा कहां तय होती है? अगर देश के किसी हिस्से को अलग राष्ट्र बनाने की माँग को सिर्फ ‘मानसिक बीमारी’ कहकर छोड़ दिया जाएगा, तो संप्रभुता (Sovereignty) की रक्षा कैसे होगी? जनता के एक वर्ग का मानना है कि अलगाववाद (Separatism) से जुड़े बयानों को मानसिक स्वास्थ्य से जोड़ना कानूनी रूप से इसे बेहद हल्का बना सकता है।

क्या हिंसक संदर्भों को नजरअंदाज किया जा सकता है?: मामले में सरकार की तरफ से यह दलील दी गई थी कि किताब में अलगाव के लिए ‘गुरिल्ला युद्ध’ जैसे हिंसक रास्तों का जिक्र है। जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या केवल पुराना इतिहास होने के आधार पर देश के खिलाफ हथियार उठाने वाली विचारधारा के प्रचार को सुरक्षित माना जा सकता है? लोगों की चिंता यह है कि ऐसी ऐतिहासिक घटनाओं का बार-बार महिमामंडन आज के युवाओं को गुमराह कर सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य का कानूनी इस्तेमाल: कोर्ट द्वारा ‘मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं’ शब्द का इस्तेमाल किए जाने पर भी चर्चाएं तेज हैं। लोगों का सवाल है कि क्या भविष्य में देश विरोधी या भड़काऊ बयान देने वाले लोग इस अदालती टिप्पणी का हवाला देकर खुद को मानसिक रूप से अस्वस्थ बताकर बच निकलने का रास्ता नहीं ढूँढ लेंगे?

मद्रास उच्च न्यायालय ने इस फैसले के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि आज का भारत आंतरिक रूप से बेहद मजबूत और एकजुट है, जिसे किसी छिटपुट अलगाववादी बयान से खतरा नहीं हो सकता। हालाँकि कानूनी सख्ती और वैचारिक स्वतंत्रता के बीच का यह संतुलन आने वाले समय में भी बहस का एक बड़ा केंद्र बना रहेगा।

एक सैनिक, एक लॉन्चर और दुश्मन के टैंक पर अंतिम प्रहार: DRDO की स्वदेशी MPATGM को मिली हरी झंडी, जानें- कितनी ताकतवर है यह एंटी-टैंक मिसाइल

भारत की सेना को और मजबूत और आधुनिक बनाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में 3 जुलाई 2026 को रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) की बैठक हुई। इस बैठक में करीब 52000 करोड़ रुपए के रक्षा खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। इन प्रस्तावों का मकसद भारतीय सशस्त्र बलों की ताकत बढ़ाना और रक्षा क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाना है

इनमें सबसे महत्वपूर्ण फैसला स्वदेशी मैन पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (MPATGM) की खरीद को मंजूरी देना है। इसके अलावा भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए कई आधुनिक हथियार प्रणालियों और तकनीकों को भी मंजूरी मिली है। इससे सेनाओं की युद्ध क्षमता भी मजबूत होगी और रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी गति मिलेगी।

AoN क्या है और इसका क्या महत्व है?

रक्षा खरीद प्रक्रिया में एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (AoN) पहला औपचारिक चरण होता है। इसका मतलब यह नहीं होता कि हथियारों की खरीद पूरी हो गई है, बल्कि सरकार यह मंजूरी देती है कि संबंधित रक्षा उपकरण की आवश्यकता है। इसके बाद तकनीकी मूल्यांकन, टेंडर, मूल्य निर्धारण और अनुबंध जैसी प्रक्रियाएँ शुरू होती हैं।

3 जुलाई को 2026 DAC ने करीब 52 हजार करोड़ रुपए के जिन प्रस्तावों को AoN दिया है, वे भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं। इनमें बड़ी संख्या में स्वदेशी रक्षा प्रणालियाँ शामिल हैं, जिससे घरेलू रक्षा उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा।

MPATGM क्या है और भारतीय सेना के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?

DAC की बैठक का सबसे अहम फैसला मैन पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (MPATGM) की खरीद को मंजूरी देना है। यह पूरी तरह स्वदेशी एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल है, जिसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने विकसित किया है।

इसका उद्देश्य पैदल सेना को आधुनिक युद्धक्षेत्र में दुश्मन के टैंकों और बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ अधिक प्रभावी बनाना है। यह तीसरी पीढ़ी की फायर एंड फॉरगेट (Fire & Forget) मिसाइल है। यानी सैनिक लक्ष्य को लॉक कर मिसाइल दागने के बाद तुरंत अपनी स्थिति बदल सकता है और मिसाइल स्वयं लक्ष्य का पीछा करते हुए उसे नष्ट कर देती है।

इसमें Imaging Infrared (IIR) Homing Seeker, ऑल-इलेक्ट्रिक कंट्रोल एक्ट्यूएशन सिस्टम, फायर कंट्रोल सिस्टम, टैंडम वारहेड, स्वदेशी प्रोपल्शन सिस्टम और हाई-परफॉर्मेंस साइटिंग सिस्टम जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है।

इसका टैंडम वारहेड आधुनिक मुख्य युद्धक टैंकों पर लगे एक्सप्लोसिव रिएक्टिव ऑर्मर (ERA) को भी भेद सकता है। मिसाइल को ट्राइपॉड या सैन्य वाहन पर लगे लॉन्चर से दागा जा सकता है। इसके विकास में DRDO की कई प्रयोगशालाओं ने योगदान दिया है।

रिसर्च सेंटर इमारत (RCI), टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (TBRL), हाई एनर्जी मैटेरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी (HEMRL), इंस्ट्रूमेंट्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (IRDE) और डिफेंस लेबोरेटरी, जोधपुर ने इसके विभिन्न घटक विकसित किए।

जोधपुर की डिफेंस लेबोरेटरी ने थर्मल टारगेट सिस्टम भी तैयार किया, जिससे परीक्षण के दौरान दुश्मन के टैंक जैसी परिस्थितियाँ बनाई गईं। मिसाइल का IIR सीकर दिन और रात दोनों समय प्रभावी ढंग से काम करने में सक्षम है। भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) इसके विकास-सह-उत्पादन भागीदार हैं।

सफल परीक्षणों के बाद सेना में शामिल होने की दिशा में बढ़ा एक और कदम

MPATGM ने पिछले कुछ वर्षों में कई सफल परीक्षण पूरे किए हैं। जुलाई 2021 में इसकी न्यूनतम और अधिकतम मारक दूरी का सफल परीक्षण हुआ था। अप्रैल 2024 में पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में इसके वारहेड फ्लाइट ट्रायल सफल रहे, जहाँ आधुनिक टैंकों को भेदने की इसकी क्षमता साबित हुई।

11 जनवरी 2026 को महाराष्ट्र के अहिल्या नगर स्थित केके रेंज में इस मिसाइल का टॉप अटैक कैपिबिलिटी के साथ चल रहे लक्ष्य पर सफल परीक्षण किया गया। इस दौरान मिसाइल ने दिन और रात दोनों समय लक्ष्य भेदन क्षमता और ड्यूल-मोड सीकर कार्यक्षमता का भी सफल प्रदर्शन किया।

सफल परीक्षण के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO, उद्योग जगत और विकास एवं उत्पादन साझेदारों को बधाई देते हुए इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। वहीं DRDO के अध्यक्ष डॉ समीर वी कामत ने कहा कि इन सफल परीक्षणों के बाद यह हथियार प्रणाली भारतीय सेना में शामिल किए जाने की दिशा में महत्वपूर्ण चरण तक पहुँच गई है। DAC से खरीद की मंजूरी मिलने के बाद अब इसके सेना में शामिल होने का रास्ता और मजबूत हो गया है।

केवल MPATGM ही नहीं, सेना को मिलेंगे कई और अत्याधुनिक हथियार

रक्षा अधिग्रहण परिषद ने केवल MPATGM ही नहीं, बल्कि भारतीय सेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई अन्य आधुनिक हथियार प्रणालियों की खरीद को भी मंजूरी दी है। इनमें सबसे प्रमुख आकाश तरंग इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम है, जो दुश्मन के ड्रोन और अन्य मानव रहित हवाई वाहनों (UAV) से सेना की टुकड़ियों को सुरक्षा प्रदान करेगा।

यह केवल एंटी-ड्रोन प्रणाली नहीं, बल्कि हवाई खतरों का पता लगाने, उनकी निगरानी करने और आवश्यक होने पर उन्हें इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से निष्क्रिय करने में भी सक्षम है। इसके अलावा परिषद ने मिडियम रेंज सर्फेश टू एयर मिसाइल (MRSAM) प्रणाली की खरीद को मंजूरी दी है।

यह मध्यम दूरी से आने वाले लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, ड्रोन और मिसाइल जैसे हवाई खतरों से सुरक्षा प्रदान करेगी। वहीं वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (V-SHORADS) भी सेना की कम दूरी की हवाई सुरक्षा को मजबूत करेगी। मल्टी-स्पेक्ट्रल सेंसर से लैस यह प्रणाली कम ऊँचाई पर आने वाले हवाई खतरों का तेजी से पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने में सक्षम होगी।

परिषद ने टैंकों के लिए एक्टव प्रोटेक्शन सिस्टम (APS) की खरीद को भी मंजूरी दी है। यह प्रणाली टैंकों पर आने वाली एंटी-टैंक मिसाइलों और अन्य हमलों को निष्क्रिय कर उनकी सुरक्षा बढ़ाएगी। इसके साथ ही जेट आधारित कामिकाजे ड्रोन सिस्टम की खरीद को भी हरी झंडी मिली है।

ये ड्रोन लंबे समय तक हवा में रहकर लक्ष्य की निगरानी करते हैं और जरूरत पड़ने पर स्वयं लक्ष्य से टकराकर उसे नष्ट कर देते हैं। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, ये अधिक मारक क्षमता के साथ इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता भी बढ़ाएँगे और अपेक्षाकृत कम लागत वाला प्रभावी विकल्प साबित होंगे।

नौसेना और वायुसेना को भी मिलेगी नई ताकत

DAC ने भारतीय नौसेना के लिए मल्टी इंफ्लुएंस ग्राउंड माइन (MIGM), नवल शिपबॉर्न अनमैंड एरियल सिस्टम (NSUAS) और लैंड बेस्ड टेस्टिंग फैसिलिटी (LBTF) की स्थापना को भी मंजूरी दी है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, MIGM दुश्मन की समुद्री गतिविधियों और उसकी पैंतरेबाजी को रोकने में मदद करेगी।

वहीं अत्याधुनिक सेंसरों से लैस NSUAS नौसेना की समुद्री निगरानी और स्थितिजन्य जागरूकता को मजबूत करेगी। LBTF भारतीय नौसेना के इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम और उससे जुड़े उपकरणों के परीक्षण की जरूरतों को देश में ही पूरा करने में मदद करेगी।

भारतीय वायुसेना के लिए परिषद ने फिक्स्ड विंग हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट (FW-HAPS) की खरीद को भी मंजूरी दी है। यह प्रणाली लंबे समय तक ऊँचाई पर रहकर इंटेलिजेंस, सर्विलांस, रिकॉनिसेंस (ISR), दूरसंचार और रिमोट सेंसिंग जैसे महत्वपूर्ण मिशनों में वायुसेना की क्षमता को और मजबूत करेगी।

नई सैन्य नेतृत्व टीम की पहली DAC बैठक और आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा

यह रक्षा अधिग्रहण परिषद की पहली बैठक थी जिसमें नई सैन्य नेतृत्व टीम ने हिस्सा लिया। बैठक में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एन एस राजा सुब्रमणी, नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन और हाल ही में पदभार संभालने वाले थल सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ शामिल हुए।

जनरल धीरज सेठ पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भविष्य के युद्धों को देखते हुए भारतीय सेना का आधुनिकीकरण उनकी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा। केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद रक्षा बजट में 15 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी की थी।

वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए 7.85 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जिसमें 2.19 लाख करोड़ रुपए पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित किए गए हैं। इस राशि का उपयोग लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, युद्धपोत, पनडुब्बियाँ, मिसाइलें, स्मार्ट हथियार और विभिन्न मानव रहित प्रणालियों की खरीद में किया जाएगा।

DAC द्वारा MPATGM सहित विभिन्न स्वदेशी हथियार प्रणालियों को AoN दिया जाना इस बात का संकेत है कि भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

MPATGM के सेना में शामिल होने से विदेशी एंटी-टैंक मिसाइलों पर निर्भरता कम होगी, जबकि DRDO, भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और अन्य भारतीय रक्षा उद्योगों को भी बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा।

यानी DAC के इन फैसलों से भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना की मारक क्षमता, निगरानी, हवाई सुरक्षा और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।

स्किन-केयर बिजनेस में पाकिस्तानी दे रहे इंसानी गर्भनाल से सहयोग, चीन से वियतनाम तक फैला था गिरोह: जानिए एंटी-एजिंग और कॉस्मेटिक उत्पादों में कैसे होता था इस्तेमाल

पाकिस्तान में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न सिर्फ वहाँ की जाँच एजेंसियों को, बल्कि पूरी दुनिया के मेडिकल और कॉस्मेटिक सेक्टर को हैरान कर दिया है। पाकिस्तान की फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) ने देश की राजधानी इस्लामाबाद में एक बेहद बड़े अंतरराष्ट्रीय गिरोह का भंडाफोड़ किया है।

इस गिरोह पर आरोप है कि यह स्थानीय अस्पतालों से नवजात बच्चों की ‘प्लेसेंटा‘ यानी गर्भनाल को अवैध रूप से खरीदता था, फिर उसे गुपचुप तरीके से प्रोसेस करके महँगे एंटी-एजिंग इंजेक्शन और कॉस्मेटिक उत्पाद बनाने के लिए वियतनाम तस्करी कर रहा था।

यह कार्रवाई इसलिए भी गंभीर है क्योंकि अस्पतालों से निकलने वाले जिस जैविक हिस्से को सामान्य तौर पर कचरा मानकर नष्ट कर दिया जाता है, उसे ये लोग करोड़ों रुपए के काले कारोबार में तब्दील कर चुके थे। इस पूरे मामले ने मेडिकल वेस्ट के मैनेजमेंट और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

कैसे हुआ इस अंतरराष्ट्रीय गिरोह का पर्दाफाश?

यह पूरी कार्रवाई पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में खुफिया सूचनाओं के आधार पर की गई। FIA को खबर मिली थी कि शहर के रिहायशी इलाकों में मानव अंगों और जैविक सामग्रियों की अवैध प्रोसेसिंग की जा रही है।

इसके बाद जाँच एजेंसी ने सबसे पहले इस्लामाबाद के बेहद पॉश इलाके F-7/1 में एक घर पर निगरानी रखने के बाद छापा मारा। वहाँ अधिकारियों को कोई सामान्य घर नहीं, बल्कि एक पूरी तरह से काम कर रहा अवैध प्रोसेसिंग प्लांट मिला, जहाँ मानव प्लेसेंटा को साफ करने, सुखाने और पैक करने की पूरी व्यवस्था थी।

गिरफ्तार किए गए आरोपितों से पूछताछ के आधार पर इस्लामाबाद के ही E-11 सेक्टर में एक और घर पर छापा मारा गया, जहाँ भारी मात्रा में रेफ्रिजरेटर, प्रोसेसिंग मशीनें और कच्चा जैविक सामान बरामद हुआ।

ठीक उसी दिन इस्लामाबाद एयरपोर्ट पर वियतनाम भेजे जा रहे 100 किलोग्राम प्लेसेंटा के एक बड़े कंसाइनमेंट को भी अधिकारियों ने जब्त कर लिया। इस पूरी कार्रवाई में कुल पाँच लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें तीन चीनी नागरिक ली गेंगकई, वांग बाओ और पेंग फेई गुआ और दो पाकिस्तानी नागरिक वकास और कासिम हनीफ शामिल हैं।

शुरुआत में इन लोगों ने दावा किया था कि यह भेड़ का प्लेसेंटा है, लेकिन कड़ाई से पूछताछ करने पर उन्होंने कुबूल किया कि यह इंसानी गर्भनाल है।

आखिर प्लेसेंटा (गर्भनाल) क्या होता है?

आम बोलचाल में हम जिसे गर्भनाल या अपरा कहते हैं, वह गर्भावस्था के दौरान महिला के गर्भाशय में विकसित होने वाला एक अस्थायी अंग है। यह माँ और गर्भ में पल रहे शिशु के बीच एक जीवन रेखा की तरह काम करता है।

इसी के जरिए माँ के शरीर से बच्चे तक ऑक्सीजन, जरूरी पोषक तत्व, फैट और हार्मोन पहुँचते हैं। साथ ही यह बच्चे के खून से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का काम भी करता है।

जब बच्चे का जन्म होता है, तो उसके तुरंत बाद प्लेसेंटा भी माँ के शरीर से बाहर आ जाता है। इसके बाद इसका काम खत्म हो जाता है। सामान्य और कानूनी तौर पर इसे ‘बायो-मेडिकल वेस्ट’ यानी जैव-चिकित्सीय कचरा माना जाता है और अस्पतालों द्वारा इसे सुरक्षित तरीके से नष्ट कर दिया जाता है।

800 रुपए की खरीद और 7 लाख का इंजेक्शन: मुनाफे का गणित

इस अवैध धंधे के पीछे की सबसे बड़ी वजह अंधाधुंध मुनाफा था। FIA और पाकिस्तान की ह्यूमन ऑर्गन ट्रांसप्लांट अथॉरिटी की जाँच में सामने आया है कि यह गिरोह इस्लामाबाद और रावलपिंडी के सरकारी के साथ ही निजी अस्पतालों के कर्मचारियों से भी साँठगाँठ करके बेहद सस्ते दामों पर इसे खरीद लेता था।

अस्पतालों से प्रति पीस प्लेसेंटा को मात्र 800 पाकिस्तानी रुपए यानि (लगभग ढाई डॉलर) की मामूली कीमत पर खरीदा जाता था। इसके बाद इन अवैध फैक्ट्रियों में इसे सुखाकर पाउडर या अर्क के रूप में तैयार किया जाता था।

जब इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार जैसे वियतनाम या चीन में एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट के लिए भेजा जाता था, तो इससे तैयार होने वाले एक सिंगल इंजेक्शन की कीमत 7,00,000 पाकिस्तानी रुपए यानि (लगभग 2530 डॉलर) तक पहुँच जाती थी। इसी भारी मुनाफे के लालच में अस्पतालों के कचरा प्रबंधन विभाग से लेकर ऊपरी स्तर के लोग भी इस रैकेट में शामिल थे।

तस्करी का पैमाना: हर महीने 200 किलो की खपत

जाँच एजेंसियों के मुताबिक, यह कोई शुरुआती या छोटा नेटवर्क नहीं था, बल्कि यह गिरोह लंबे समय से इंडस्ट्रियल स्तर पर काम कर रहा था। यह गिरोह हर महीने इस्लामाबाद और रावलपिंडी के अलग-अलग अस्पतालों से लगभग 200 KG मानव प्लेसेंटा इकट्ठा कर रहा था।

दोनों अवैध फैक्ट्रियों से जाँच टीम ने कुल 500 KG से अधिक संदिग्ध मानव प्लेसेंटा और उससे तैयार उत्पाद बरामद किए हैं। जाँच एजेंसी द्वारा साझा की गई तस्वीरों में देखा जा सकता है कि एक आलीशान घर के कमरों को बकायदा कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट में बदल दिया गया था, जहाँ ट्रॉलियों पर बड़ी-बड़ी ट्रे में मानव प्लेसेंटा को सुखाने के लिए रखा गया था।

अब FIA को शक है कि इस गिरोह के तार सिर्फ इस्लामाबाद तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि लाहौर, पेशावर और रावलपिंडी जैसे बड़े शहरों में भी फैले हुए हैं। इस बात की भी गहन जाँच की जा रही है कि कैसे एयरपोर्ट के इमिग्रेशन और कस्टम अधिकारियों की आँखों के सामने से ‘She Placenta’ के फर्जी कमर्शियल लेबल के तहत इतने संवेदनशील जैविक कचरे को विदेश भेजा जा रहा था।

कॉस्मेटिक और वेलनेस इंडस्ट्री में इसकी माँग क्यों है?

आपके मन में यह सवाल उठ सकता है कि आखिर इस जैविक कचरे से ऐसा क्या बनता है जिसके लिए लोग लाखों रुपए देने को तैयार हैं। दरअसल प्लेसेंटा प्राकृतिक रूप से प्रोटीन, आयरन, विटामिन, स्टेम सेल्स और ग्रोथ फैक्टर्स से भरपूर होता है।

वैश्विक स्तर पर वेलनेस, कॉस्मेटिक और वैकल्पिक चिकित्सा के कुछ बाजारों में यह दावा किया जाता है कि मानव या पशु प्लेसेंटा के अर्क से बनी क्रीम, सीरम और इंजेक्शन का इस्तेमाल इंसानी त्वचा को दोबारा जवान कर सकता है। इसे झुर्रियों को मिटाने, स्किन को टाइट करने और ऊतकों के पुनर्निर्माण के लिए एक जादुई दवा की तरह प्रचारित किया जाता है।

चिकित्सा विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि कॉस्मेटिक उत्पादों या एंटी-एजिंग में मानव प्लेसेंटा के फायदों को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण बेहद सीमित और विवादास्पद हैं और कई देशों में इसके इस तरह के व्यावसायिक उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध है।

हालाँकि कानूनी तौर पर दुनिया के कई देशों में प्लेसेंटा का इस्तेमाल बेहद कड़े नियमों के तहत होता है। जब कोई माँ लिखित सहमति देती है, तो उसके प्लेसेंटा का उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान, गंभीर रूप से जले हुए मरीजों के इलाज, घावों को भरने और आँखों की कुछ विशेष सर्जरी के लिए किया जाता है। लेकिन यह सब सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त ऑर्गन प्रोक्योरमेंट संस्थाओं के जरिए ही हो सकता है, किसी गुप्त रिहायशी विला में नहीं।

कानून और स्वास्थ्य के लिहाज से यह कितना खतरनाक है?

अब सवाल उठता है की अस्पतालों से निकलने वाले प्लेसेंटा को सख्त नियमों के तहत नष्ट करना क्यों जरूरी है, इसके पीछे दो बड़े कारण हैं जिनमें पहला कानून और दूसरा जानलेवा संक्रमण का खतरा है।

पाकिस्तानी डॉक्टर के अनुसार, बच्चे के जन्म के बाद प्लेसेंटा को सामान्य कचरा नहीं माना जा सकता क्योंकि यह सीधे इंसानी खून और शारीरिक द्रव्यों के संपर्क में रहता है।

इस वजह से इसमें हेपेटाइटिस, HIV या अन्य संक्रामक बीमारियाँ फैलाने वाले वायरस और बैक्टीरिया मौजूद हो सकते हैं। अगर इसे सही तापमान पर वैज्ञानिक तरीके से डिस्पोज न किया जाए या इसकी अवैध प्रोसेसिंग बिना सुरक्षा उपकरणों के हो, तो यह समाज में बड़ी महामारी या गंभीर स्वास्थ्य संकट को जन्म दे सकता है।

अगर कानूनी पहलू की बात करें तो पाकिस्तान में मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 2010 के तहत किसी भी मानव अंग या जैविक हिस्से का व्यावसायिक इस्तेमाल या उसकी खरीद-फरोख्त पूरी तरह से गैर-कानूनी है।

इस कानून के तहत दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों को 10 साल तक की जेल और 10 लाख पाकिस्तानी रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। फिलहाल पकड़े गए पाँचों आरोपितों पर इसी कानून के तहत सख्त धाराएँ लगाई गई हैं।

पाकिस्तान में अँगों की तस्करी का पुराना इतिहास

मानव बायोलॉजिकल मटेरियल की तस्करी पाकिस्तान के लिए कोई नई बात नहीं है क्योंकि इससे पहले भी वहाँ अवैध रूप से किडनी निकालने और बेचने वाले कई बड़े गिरोहों का पर्दाफाश हो चुका है।

अक्सर गरीब मजदूरों या लाचार लोगों को पैसों का लालच देकर या उनका अपहरण करके अवैध बेसमेंट और निजी क्लीनिकों में उनकी किडनी निकाल ली जाती थी और उसे अमीर स्थानीय या विदेशी मरीजों को बेच दिया जाता था।

मानव भ्रूण (Human Embryo) की तस्करी और इसके पीछे का सच

प्लेसेंटा तस्करी के इस बड़े खुलासे के बीच चिकित्सा और सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान एक और बेहद संवेदनशील और गंभीर विषय की ओर गया है, जिसे ‘ह्यूमन एम्ब्रियो’ यानी मानव भ्रूण की तस्करी कहा जाता है।

भ्रूण दरअसल गर्भावस्था के शुरुआती चरण का वह रूप होता है जिससे आगे चलकर बच्चा विकसित होता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की जैविक सामग्रियों की तस्करी के पीछे दो सबसे बड़ी वजहें मानी जाती हैं, जिनमें पहली IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक और दूसरी स्टेम सेल रिसर्च है।

दुनिया के कई अमीर देशों में ऐसे संपन्न जोड़े जो प्राकृतिक रूप से माता-पिता नहीं बन पाते, वे संतान सुख के लिए अवैध सरोगेसी या बिना रिकॉर्ड वाले एम्ब्रियो की भारी माँग करते हैं।

इस माँग को पूरा करने के लिए तस्कर गिरोह विकासशील या गरीब देशों की लाचार महिलाओं को पैसों का लालच देकर उनके अंडे (Eggs) हासिल करते हैं और फिर लैब में भ्रूण तैयार कर उन्हें विदेशों में ऊँचे दामों पर बेच देते हैं।

इसके अलावा वैज्ञानिक जगत में स्टेम सेल थेरेपी को लेकर हो रहे शोध भी इसकी माँग बढ़ाते हैं, क्योंकि शुरुआती भ्रूण में मौजूद स्टेम कोशिकाओं में इंसानी शरीर के किसी भी अंग को दोबारा विकसित करने की क्षमता होती है।

कॉस्मेटिक और चिकित्सा के कुछ बाजारों में मानव भ्रूण के अर्क (Embryo Extract) को लेकर भी कई तरह के भ्रामक दावे किए जाते हैं। कुछ लोग मानते हैं  कि भ्रूण के तत्वों से बने उत्पाद त्वचा को हमेशा के लिए जवान रखने, असाध्य बीमारियों को ठीक करने और बढ़ती उम्र के असर को पूरी तरह रोकने में कारगर होते हैं।

वही चीन में लोग अपनी सेक्स क्षमता को बढ़ाने के लिए ह्यूमन एम्ब्रियो को कहते है, ऐसा ही साल 2000 की एक तस्वीर में देखने को मिलता है की एक चीनी नागरिक ह्यूमन एम्ब्रियो को कहा रहा है।

हालाँकि चिकित्सा विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने इस बात को पूरी तरह खारिज किया है और स्पष्ट किया है कि कॉस्मेटिक या एंटी-एजिंग उत्पादों में मानव भ्रूण के इस्तेमाल का कोई भी पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है।

दुनिया के अन्य देशों में भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

मानव प्लेसेंटा की अवैध खरीद-फरोख्त और चोरी का यह संकट सिर्फ किसी एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई अन्य कोनों में भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं।

चीन में समय-समय पर ऐसे कई ब्लैक मार्केट नेटवर्क पकड़े गए हैं जो आधिकारिक स्वास्थ्य चेतावनियों के बावजूद पारंपरिक दवाओं और हेल्थ सप्लीमेंट्स के लिए अस्पतालों से अवैध रूप से प्लेसेंटा खरीदते थे।

इसके अलावा अफ्रीका में ट्रेडिशनल मेडिसिन मार्केट, केन्या में आध्यात्मिक मान्यताओं और नाइजीरिया में पारंपरिक रीति-रिवाजों या आर्थिक लाभ के चलते अस्पतालों से प्लेसेंटा चोरी होने और उनकी अवैध बिक्री के मामले दर्ज किए जा चुके हैं।

वैश्विक स्वास्थ्य अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि प्लेसेंटा का उपयोग केवल स्वीकृत चिकित्सा अनुसंधान या फार्मास्युटिकल उद्देश्यों के लिए ही कानूनी माना जाता है, जिसके लिए मरीज की लिखित सहमति, नैतिक मंजूरी और कड़े सरकारी नियमों का पालन अनिवार्य है।

इसके विपरीत, बिना अनुमति के मानव प्लेसेंटा को इकट्ठा करना, बेचना या एक जगह से दूसरी जगह ले जाना पूरी दुनिया में गैर-कानूनी है। ऐसा करने पर मानव ऊतकों की चोरी, मेडिकल वेस्ट का अवैध प्रबंधन, धोखाधड़ी, जालसाजी और मानव जैविक सामग्री की तस्करी जैसे गंभीर आपराधिक मामलों के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई की जाती है।