Home Blog Page 3

‘प्रतिरोध की राजनीति’ से ‘सड़क की लोकतांत्रिक राजनीति’ तक: योगेंद्र यादव, ये भीड़-तंत्र को सामान्यीकृत करने की खतरनाक कोशिश

कई वर्षों से योगेंद्र यादव खुद को लोकतंत्र, संवैधानिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति प्रतिबद्ध एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में पेश करते रहे हैं। लेकिन उनके राजनीतिक हस्तक्षेप लगातार लोकतांत्रिक राजनीति की एक अलग ही अवधारणा को सामने रखते हैं।

यह ऐसी सोच है, जिसमें संसदीय प्रक्रियाओं से अधिक महत्व लगातार आंदोलनों को दिया जाता है, चुनावों से मिली वैधता से ऊपर सड़क पर होने वाली लामबंदी (Mobilization) को रखा जाता है और सरकारों को चुनौती देने तथा बदलने के लिए संविधान के सामान्य लोकतांत्रिक तरीकों के बजाय ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को प्राथमिकता दी जाती है।

NEET पेपर लीक को लेकर हुए आंदोलन पर उनका हालिया लेख केवल एक विरोध प्रदर्शन के बारे में नहीं है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक व्यापक राजनीतिक रणनीति सामने आती दिखाई देती है। योगेंद्र यादव ने तर्क दिया है कि विपक्ष को चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर जाना चाहिए।

उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए हिंसक आंदोलन को इस नई राजनीति के एक मॉडल के रूप में भी प्रस्तुत किया है।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

इस तर्क की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए, खासकर 2026 में पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत और उसके बाद शुभेंदु अधिकारी का राज्य के पहले BJP मुख्यमंत्री बनना केवल एक और विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं था। यह उस राजनीतिक धारणा के टूटने का संकेत था, जिसमें BJP के वैचारिक विरोधी पश्चिम बंगाल को भगवा दल के लिए आखिरी बड़ा राजनीतिक गढ़ मानते थे।

लंबे समय तक पश्चिम बंगाल को वामपंथी-उदारवादी राजनीति, क्षेत्रीय प्रतिरोध और BJP विरोधी वैचारिक एकजुटता का केंद्र बताया जाता रहा। ऐसे में राज्य में BJP की जीत ने सिर्फ चुनावी समीकरण ही नहीं बदले, बल्कि भारतीय राजनीति की मनोवैज्ञानिक तस्वीर भी बदल दी।

BJP विरोधी खेमे का लंबे समय से मानना था कि जैसे ही पार्टी की राजनीतिक रफ्तार कमजोर होगी, उसका सामाजिक गठबंधन बिखरेगा या कुछ मजबूत राज्य उसके विस्तार को रोक देंगे, वैसे ही उसे चुनाव में हराया जा सकेगा।

लेकिन BJP ने बार-बार यह दिखाया कि वह बदलते हालात के अनुसार खुद को ढाल सकती है, अपना जनाधार बढ़ा सकती है, राष्ट्रवाद को अपने मुख्य आधार के रूप में बनाए रख सकती है, सुशासन के मुद्दों को चुनावी समर्थन में बदल सकती है और उन इलाकों में भी अपनी जगह बना सकती है जिन्हें कभी उसके लिए पूरी तरह प्रतिकूल माना जाता था।

पश्चिम बंगाल के नतीजों ने इस पूरी बहस की दिशा बदल दी। ऐसे में कुछ कार्यकर्ताओं और वैचारिक समूहों के बीच लगातार सार्वजनिक आंदोलनों के प्रति बढ़ते उत्साह को केवल ‘लोकतांत्रिक असहमति’ के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसे चुनावी राजनीति की सीमाओं से पैदा हुई निराशा के रूप में भी समझा जा सकता है।

इसका यह मतलब नहीं है कि हर प्रदर्शनकारी या कार्यकर्ता की सोच एक जैसी है या फिर हर सार्वजनिक आंदोलन गलत है। लेकिन इससे एक अहम सवाल जरूर उठता है कि जब चुनावी राजनीति बार-बार मनचाहा राजनीतिक परिणाम देने में असफल रहती है और राजनीतिक आंदोलनों पर वही पुराने चेहरे हावी हो जाते हैं, तो क्या सड़क को निर्णायक राजनीतिक मैदान बनाने का आकर्षण बढ़ने लगता है? योगेंद्र यादव के हालिया बयान भी इसी तरह के बदलाव की ओर इशारा करते दिखाई देते हैं।

फिर से आ गया पेशेवर प्रदर्शनकारी

पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हुए शायद ही किसी बड़े आंदोलन में ऐसा हुआ हो, जिसमें योगेंद्र यादव किसी न किसी रूप में सक्रिय भागीदार, टिप्पणीकार या वैचारिक समर्थक के तौर पर नजर न आए हों।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और शाहीन बाग धरने से लेकर किसान आंदोलन और अब परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन तक, योगेंद्र यादव लगातार ऐसे आंदोलनों के साथ खड़े दिखाई दिए हैं, जिनका उद्देश्य मोदी सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाना रहा है।

सिर्फ इससे उन्हें अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। किसी भी सार्वजनिक बुद्धिजीवी को किसी मुद्दे या आंदोलन का समर्थन करने का अधिकार है। लेकिन एक पैटर्न लगातार दिखाई देता है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है, जब जनता के गुस्से को भड़काने और उन्हें हिंसा की ओर उकसाने की कोशिश की जाती है।

हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो में योगेंद्र यादव कहते नजर आए कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा। इस बयान को कई लोगों ने हिंसक और टकराव वाली राजनीति को समर्थन देने वाला बताया।

यही राजनीतिक तरीका बार-बार सामने आता दिखाई देता है। किसी एक विशेष शिकायत को पूरे संस्थागत ढाँचे पर आरोप में बदल दिया जाता है। किसी सरकारी नीति पर मतभेद को लोकतंत्र के पूरी तरह विफल हो जाने का प्रमाण बताया जाता है। एक विरोध प्रदर्शन को चुनी हुई सरकार की वैधता पर नैतिक जनमत-संग्रह की तरह पेश किया जाता है।

और धीरे-धीरे जवाबदेही की भाषा की जगह हिंसा और टकराव की भाषा लेने लगती है। CJP का आंदोलन इसी बदलाव का ताजा उदाहरण माना जा सकता है।

NEET परीक्षा में हुई अनियमितताओं की निष्पक्ष और गंभीर जाँच होना जरूरी था। परीक्षा में गड़बड़ियों या पेपर लीक से प्रभावित छात्रों को न्याय मिलना चाहिए और प्रशासनिक लापरवाही से परेशान परिवारों के प्रति जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी भी सरकार को ऐसी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

लेकिन प्रशासनिक सुधार की माँग करने और हर सार्वजनिक शिकायत को हिंसक सड़क आंदोलन में बदल देने के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। यह अंतर तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब कुछ कार्यकर्ता जनता के गुस्से को केवल सुधार की माँग के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक टकराव का आधार बनाने की कोशिश करने लगते हैं।

‘ऑक्युपाई इंडिया’ को खड़ा करना

अपने Indian Express के लेख में योगेंद्र यादव ने जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को भारत का ‘ऑक्युपाई मोमेंट’ बताया। उन्होंने इस आंदोलन के बड़े पैमाने, इसमें शामिल विभिन्न वर्गों की भागीदारी और इसकी स्वतःस्फूर्त प्रकृति की सराहना करते हुए इसे ऐसा ‘स्वाभाविक जन आंदोलन’ कहा, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों की व्यवस्था से अलग खड़ा हुआ।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विपक्ष को अब अपनी राजनीति का केंद्र चुनावों से आगे बढ़ाकर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर ले जाना चाहिए।

यहाँ इस्तेमाल की गई भाषा महत्वपूर्ण है।

‘प्रतिरोध की राजनीति’ सुनने में तब तक सामान्य लग सकती है, जब इसका इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध और लोकतांत्रिक असहमति के समर्थन में किया जाए। किसी भी लोकतंत्र में नागरिकों का अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, विरोध करना और सरकार से जवाबदेही माँगना जरूरी होता है। लेकिन यही शब्द तब कहीं अधिक गंभीर अर्थ लेने लगते हैं, जब इनके जरिए यह संकेत दिया जाए कि प्रतिनिधिक लोकतंत्र और चुनावी राजनीति अब पर्याप्त नहीं रह गई है।

योगेंद्र यादव का तर्क इस धारणा पर आधारित है कि भारत उस दिशा में बढ़ रहा है, जिसे वह ‘चुनावी निरंकुशता’ (Electoral Autocracy) कहते हैं। इस सोच के अनुसार चुनाव तो होते रहते हैं, लेकिन चुनावी व्यवस्था को इस तरह पेश किया जाता है मानो वह अब वास्तविक लोकतांत्रिक बदलाव लाने में सक्षम नहीं रह गई हो।

इसका राजनीतिक संदेश साफ है।

अगर चुनावों को पर्याप्त नहीं माना जाएगा, तो फिर सड़क पर होने वाले आंदोलन नैतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण माने जाने लगेंगे। वे केवल लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रहेंगे, बल्कि राजनीति का एक वैकल्पिक मंच बन जाएँगे। संसद की भूमिका पीछे छूटने लगेगी, चुनावी जनादेश पर सवाल उठाए जाएंगे और सार्वजनिक प्रदर्शन ही राजनीतिक वैधता का नया आधार बनने लगेंगे।

यही वह बिंदु है, जहाँ खतरा पैदा होता है।

भारत ऐसा देश नहीं है, जहाँ चुनाव खत्म हो गए हों। यहां आज भी सरकारें चुनाव जीतती और हारती हैं। कई राज्यों में विपक्ष की सरकारें हैं। अदालतें सार्वजनिक विवादों में हस्तक्षेप करती हैं। संसद काम कर रही है और चुनावी मुकाबले लगातार होते रहते हैं। पश्चिम बंगाल में BJP की जीत भी, चाहे उसका राजनीतिक आँकलन कुछ भी हो, यह दिखाती है कि भारतीय राजनीति में चुनावों के जरिए बदलाव की पूरी संभावना बनी हुई है।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि बीजेपी राजनीतिक रूप से मजबूत है या नहीं। वह है।

असल सवाल यह है कि इस राजनीतिक बढ़त का जवाब नए जनसमर्थन और चुनावी प्रतिस्पर्धा के जरिए दिया जाना चाहिए या फिर लगातार आंदोलनों की ऐसी स्थायी राजनीति के जरिए, जिसका उद्देश्य बैलट बॉक्स के बाहर चुनी हुई सरकार की वैधता को कमजोर करना हो।

बंगाल और हताशा की राजनीति

पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उसने एक लंबे समय से बनी वैचारिक धारणा को झटका दिया है।

कई वर्षों तक BJP के आलोचक पश्चिम बंगाल को एक प्रतीकात्मक सीमा के रूप में देखते रहे। उनका मानना था कि यह ऐसा राज्य है, जहाँ हिंदुत्व की राजनीति चुनावी स्तर पर सीमित रहेगी, जहाँ की राजनीतिक संस्कृति भगवा दल के विस्तार को रोक देगी और जहाँ वामपंथी-उदारवादी विचारधारा की जड़ें सबसे मजबूत बनी रहेंगी।

लेकिन अब यह धारणा टूट चुकी है।

पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने केवल पार्टी को एक और राज्य नहीं दिया, बल्कि उन लोगों की सोच को भी बड़ा झटका दिया, जो मानते थे कि चुनावी राजनीति अंततः BJP के विस्तार की एक स्वाभाविक सीमा तय कर देगी। शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के साथ BJP अब उस राजनीतिक क्षेत्र में पहुँच चुकी है, जिसे कभी उसके लिए लगभग असंभव माना जाता था।

बदले हुए इसी राजनीतिक माहौल में योगेंद्र यादव का ‘प्रतिरोध की राजनीति’ पर जोर और अधिक महत्वपूर्ण नजर आता है।

इसकी एक व्याख्या यह हो सकती है कि योगेंद्र यादव और उनके जैसे वैचारिक समूह अब यह महसूस करने लगे हैं कि पारंपरिक चुनावी राजनीति के जरिए BJP को हराना उनकी अपेक्षा से कहीं अधिक कठिन है। लगातार आलोचनाओं, सत्ता विरोधी माहौल की कोशिशों और राजनीतिक हमलों के बावजूद BJP ने अपना व्यापक जनसमर्थन बनाए रखा है और उन राज्यों में भी विस्तार किया है, जिन्हें कभी उसके लिए वैचारिक रूप से बंद माना जाता था।

ऐसे में CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन को केवल परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों की प्रतिक्रिया के रूप में ही नहीं, बल्कि BJP विरोधी वैचारिक समूहों के लिए एक नए राजनीतिक मंच के रूप में भी देखा जा सकता है। ऐसा मंच, जिसकी नींव जन असंतोष, गुस्से, कैंपस आधारित लामबंदी, सोशल मीडिया पर वायरल अभियानों और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आंदोलनों पर टिकी हो।

इसका यह अर्थ नहीं है कि इस आंदोलन में शामिल हर छात्र या प्रतिभागी राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है। कई छात्रों की चिंताएँ पूरी तरह वास्तविक और जायज हो सकती हैं। लेकिन जब प्रभावशाली वैचारिक समूह ऐसे आंदोलनों से जुड़ते हैं, तो वे केवल निष्पक्ष पर्यवेक्षक बनकर नहीं आते। वे अपने साथ राजनीतिक सोच, संगठनात्मक अनुभव और दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य भी लेकर आते हैं।

योगेंद्र यादव द्वारा इस आंदोलन का खुलकर समर्थन करना यह संकेत देता है कि वह इसे केवल परीक्षा सुधार के अभियान के रूप में नहीं देखते। उनकी नजर में यह भविष्य की राजनीति का एक संभावित मॉडल या खाका हो सकता है।

जब विरोध धीरे-धीरे ‘सड़क पर वीटो’ का रूप लेने लगता है

विरोध प्रदर्शन और ‘सड़क के जरिए वीटो’ (Street Veto) के बीच का अंतर केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। एक विरोध प्रदर्शन सरकार से अपनी बात सुनने और उस पर विचार करने की मांग करता है। वहीं स्ट्रीट वीटो की सोच यह मानकर चलती है कि सरकार को सड़क पर जुटी भीड़ के दबाव के आगे झुकना ही होगा।

विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य सरकार की नीतियों को प्रभावित करना हो सकता है, लेकिन स्ट्रीट वीटो का लक्ष्य लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता पर सवाल खड़े करना होता है।

कोई भी विरोध प्रदर्शन तेज, असुविधाजनक या व्यापक हो सकता है, लेकिन यदि वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहता है तो वह लोकतंत्र का हिस्सा माना जाता है। स्ट्रीट वीटो की स्थिति तब पैदा होती है, जब कोई संगठित समूह यह दावा करने लगे कि संसद के बाहर उसकी मौजूदगी और उसका जनसमर्थन, संसद के भीतर मौजूद चुनावी जनादेश से अधिक वैध और महत्वपूर्ण है।

इसी वजह से योगेंद्र यादव का वह वायरल वीडियो चिंता का विषय माना जा रहा है, जिसमें वह कहते हैं कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा।

संसद कोई सामान्य संस्था नहीं है। यह जनता की संप्रभुता की संवैधानिक अभिव्यक्ति है। सांसदों को अपनी वैधता सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के जरिए मिले जनादेश से प्राप्त होती है। सरकारें जनता के वोट से चुनी जाती हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से जवाबदेह बनाई जाती हैं और चुनावों के जरिए ही बदली जाती हैं।

भारतीय संविधान शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से एकत्र होने तथा विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है, लेकिन वह कानून बनाने या शासन चलाने का अधिकार उस समूह को नहीं देता, जो सबसे बड़ी या सबसे शोरगुल वाली भीड़ जुटा ले।

अगर संसद से ऊपर सड़क को रखा जाने लगे, तो लोकतांत्रिक राजनीति धीरे-धीरे टकराव और अवरोध की प्रतिस्पर्धा में बदल सकती है। तब चुनाव हारने वाला हर राजनीतिक दल या समूह मतपेटी के बजाय सड़क जाम, घेराव, दबाव और लगातार आंदोलनों के जरिए दूसरा जनादेश हासिल करने की कोशिश करेगा।

यह लोकतंत्र को मजबूत करने का रास्ता नहीं है। बल्कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का खतरा पैदा करता है, जिसके आधार पर लोकतंत्र कायम रहता है।

हिंसा के सवाल को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज

यह चिंता इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि CJP का आंदोलन केवल भाषणों, तख्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा।

मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस के अनुसार, जंतर-मंतर के पास प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई, जिसमें पुलिसकर्मी भी घायल हुए। अधिकारियों का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया और सुरक्षा बलों पर हमला किया, जबकि प्रदर्शनकारियों और विपक्ष ने इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।

इन दोनों पक्षों के दावों की निष्पक्ष जाँच और जहाँ आवश्यक हो, न्यायिक प्रक्रिया के जरिए सत्य सामने आना चाहिए। लेकिन एक बात केवल इसलिए विवाद का विषय नहीं बननी चाहिए क्योंकि इस आंदोलन के इर्द-गिर्द राजनीति हो रही है। पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा को लोकतांत्रिक प्रतिरोध कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

पथराव को संवैधानिक असहमति नहीं कहा जा सकता और सुरक्षा बलों पर हमला लोकतांत्रिक भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकता। जो भी आंदोलन नैतिक आधार पर खुद को सही ठहराने का दावा करता है, उसे ऐसी हिंसक घटनाओं की बिना किसी शर्त के निंदा करनी चाहिए। यही कारण था कि महात्मा गाँधी हिंसक प्रदर्शनों के सख्त विरोधी थे।

हालाँकि आज जो लोग खुद को गाँधी की वैचारिक परंपरा का प्रतिनिधि बताते हैं, वे कई बार तथाकथित ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शनों’ के दौरान हुई हिंसा की उतनी स्पष्ट आलोचना करते नजर नहीं आते। यहीं पर योगेंद्र यादव की भाषा और बयान महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जब कोई सार्वजनिक बुद्धिजीवी लगातार किसी सरकार को तानाशाही प्रवृत्ति वाला, संसद को अपर्याप्त और ‘प्रतिरोध’ को लोकतंत्र का सबसे बड़ा माध्यम बताने लगे, तो ऐसा माहौल बन सकता है जिसमें टकराव और उग्रता राजनीतिक रूप से उचित या सार्थक दिखाई देने लगें।

हो सकता है कि वे सीधे तौर पर हिंसा का आह्वान न करें, लेकिन ऐसी भाषा, जो हर राजनीतिक विवाद को अत्याचार के खिलाफ लड़ाई के रूप में पेश करती है, लोगों को यह महसूस करा सकती है कि टकराव नैतिक रूप से उचित है। क्योंकि शब्द कभी भी शून्य में अस्तित्व नहीं रखते, उनके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी होते हैं।

अंबेडकरवादी विरोधाभास

योगेंद्र यादव और उनके वैचारिक समर्थक अक्सर डॉ भीमराव आंबेडकर, संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा की बात करते हैं। लेकिन डॉ आंबेडकर की संवैधानिक सोच इस विचार पर आधारित नहीं थी कि भीड़ प्रतिनिधिक संस्थाओं की जगह ले ले।

इसके विपरीत, उनका स्पष्ट मानना था कि जब भारत ने राजनीतिक बदलाव के लिए संवैधानिक रास्ते अपना लिए हैं, तब नागरिकों और राजनीतिक दलों को सत्ता परिवर्तन के लिए संविधान से बाहर के तरीकों को सामान्य नहीं बनाना चाहिए। संविधान किसी भी सरकार को चुनौती देने के लिए कई लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ते उपलब्ध कराता है।

नागरिक चुनाव में वोट दे सकते हैं। विपक्षी दल चुनाव लड़ सकते हैं। अदालतों में याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं। संसद में कानूनों पर बहस हो सकती है। मीडिया सरकार की कार्यप्रणाली की जाँच और आलोचना कर सकता है। वहीं, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन भी जनमत को प्रभावित करने का एक लोकतांत्रिक माध्यम है।

लेकिन इनमें से कोई भी संवैधानिक व्यवस्था यह नहीं कहती कि किसी निर्वाचित सरकार की वैधता को लगातार सड़क पर होने वाले आंदोलनों या भीड़ के दबाव के भरोसे रखा जाए।विडंबना यह है कि जो लोग खुद को संविधान का रक्षक बताते हैं, वही कई बार उसके सबसे मूल सिद्धांत को कमजोर करते हुए दिखाई देते हैं।

संविधान का मूल सिद्धांत यही है कि राजनीतिक सत्ता और उसकी वैधता संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से संचालित होनी चाहिए, न कि वैचारिक दबाव बनाने वाले ऐसे आंदोलनों के जरिए जिनका उद्देश्य शासन को प्रभावी ढंग से चलने से रोकना हो।

लोकतंत्र में विरोध जरूरी, लेकिन इसे विरोध के जरिए नहीं चलाया जा सकता

भारत को असहमति की जरूरत है। देश को ऐसे छात्र आंदोलन, नागरिक समाज संगठन, विपक्षी दल और सार्वजनिक बुद्धिजीवी चाहिए, जो सत्ता से सवाल पूछ सकें और सरकार को जवाबदेह बना सकें। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि लोकतांत्रिक दबाव और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश के बीच का अंतर स्पष्ट बना रहे।

पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने इस अंतर को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।

इस जीत ने दिखाया कि BJP का राजनीतिक विस्तार अब केवल उसके पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि उसके विरोधी लंबे समय तक इस उम्मीद पर निर्भर नहीं रह सकते कि चुनावी राजनीति अपने आप उनके पसंदीदा वैचारिक संतुलन को वापस ले आएगी।

संभव है कि यही कारण हो कि लगातार आंदोलनों की राजनीति कुछ वर्गों को अधिक आकर्षित करने लगी है। भारत के सामने चुनौती यह है कि चुनावी नतीजों से असंतोष कहीं चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास में न बदल जाए।

योगेंद्र यादव ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को लोकतंत्र को मजबूत करने का माध्यम बताकर पेश कर सकते हैं। लेकिन जब इसे लगातार उग्र सड़क आंदोलनों के महिमामंडन, संसद के प्रति अविश्वास और हर सार्वजनिक शिकायत को सरकार की वैधता के संकट में बदलने की कोशिशों के साथ देखा जाता है, तो यह एक अलग तरह की राजनीति का रूप लेती दिखाई देती है।

ऐसी राजनीति, जो लोकतांत्रिक अधिकार का केंद्र जनता के वोट और चुनावी जनादेश से हटाकर सड़कों पर होने वाले राजनीतिक प्रदर्शनों की ओर ले जाने का प्रयास करती है।

यह एक बेहद जोखिम भरा विचार माना जा सकता है। योगेंद्र यादव के हस्तक्षेप का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह नहीं है कि वह विरोध प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन करते हैं। शांतिपूर्ण विरोध किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है।

असली चिंता यह है कि उनकी अवधारणा सड़क पर होने वाले आंदोलनों को केवल लोकतांत्रिक अधिकार तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें राजनीतिक वैधता के समानांतर स्रोत के रूप में स्थापित करती दिखाई देती है। ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की वकालत और यह कहना कि लोकतंत्र ‘संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा’, ऐसी राजनीतिक सोच को सामने रखता है, जो भारतीय गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था के साथ सहज मेल नहीं खाती।

भारतीय संविधान के अनुसार सर्वोच्च राजनीतिक अधिकार जनता में निहित है, जो चुनावों और प्रतिनिधिक संस्थाओं के माध्यम से लागू होता है। विरोध प्रदर्शन इसलिए संरक्षित है क्योंकि वह लोकतंत्र को मजबूत करता है, न कि इसलिए कि वह उन संस्थाओं की जगह ले सकता है, जिनके जरिए लोकतांत्रिक सत्ता संचालित होती है।

लोकतंत्र विरोध प्रदर्शनों को दबाने से मजबूत नहीं होता। वह तब मजबूत होता है, जब विरोध प्रदर्शन संविधान के दायरे में रहकर जनमत को प्रभावित करने का माध्यम बने, न कि जनता की संप्रभुता और चुनावी जनादेश का विकल्प।

सड़कों पर उठने वाली आवाज सुनी जानी चाहिए, लेकिन संप्रभुता का अंतिम स्रोत सड़क नहीं, बल्कि जनता का लोकतांत्रिक जनादेश और संविधान ही होना चाहिए।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

राहुल गाँधी का ‘पुलिस भी सरकार हटाना चाहती है’ दावा: क्या संस्थानों में अविश्वास फैलाकर रची जा रही है ‘सत्ता परिवर्तन’ की साजिश?

लोकसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने उन्हें प्रधानमंत्री आवास के पास प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने के बाद दिल्ली पुलिस के जवानों को लेकर विवादित बयान दिया है। राहुल गाँधी ने कहा कि मंगलवार (21 जुलाई 2026) को जब उन्हें 7 लोक कल्याण मार्ग से हटाया जा रहा था तब सुरक्षा कर्मियों ने निजी तौर पर उनसे मौजूदा सरकार को हटाने की बात कही। राहुल गाँधी के मुताबिक, पुलिसकर्मियों ने उनके कान में कहा, “इनको हटाइए।”

राहुल गाँधी ने दावा किया कि इस दौरान उनकी पुलिसकर्मियों से अलग-अलग बातचीत हुई। उन्होंने कहा, “एक पुलिसकर्मी ने कहा कि मैं राजस्थान से हूँ, हम तो सिर्फ वर्दी पहने हुए हैं। दूसरे ने कहा कि मैं हरियाणा से हूँ, इन्हें हटाइए। यानी ऐसी भावना मौजूद है और सब सच्चाई जानते हैं।”

उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मी अपने आदेश का पालन करने के लिए मजबूर हैं लेकिन उनमें से कई मौजूदा स्थिति से खुश नहीं हैं। राहुल गाँधी ने दावा किया, “उन्हें आदेश मानना पड़ता है, इसलिए वे अपना काम कर रहे हैं। लेकिन पुलिस भी जो हुआ है उससे खुश नहीं है। संवेदनशील पुलिसकर्मी मानते हैं कि यह देश के भविष्य के साथ अपराध है। वे इसमें अपने बच्चों का भविष्य भी देखते हैं।”

प्रदर्शन में अपनी मौजूदगी पर राहुल गाँधी ने कहा कि वह छात्रों के आंदोलन के साथ मजबूती से खड़े हैं। उन्होंने पुलिस के साथ हुई धक्का-मुक्की को मामूली बताते हुए कहा कि छात्रों के लिए खड़े होने की कीमत अगर ‘एक-दो मुक्के’ भी हैं तो यह बड़ी बात नहीं है।

यह घटना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर प्रदर्शन के दौरान हुई। राहुल गाँधी के साथ प्रियंका गाँधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खरगे, केसी वेणुगोपाल और पवन खेड़ा समेत कई कॉन्ग्रेस नेता मौजूद थे। इस धरने की जानकारी अंतिम समय तक कॉन्ग्रेस के कई सांसदों को भी नहीं थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियों और एसपीजी को भनक न लगे इसलिए यह योजना राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी वाड्रा और केसी वेणुगोपाल ने बनाई थी।

संस्थानों में अविश्वास पैदा करने की कोशिश

राहुल गाँधी का पुलिस की कथित नाराजगी पर जोर देना देश के संस्थानों के भीतर विभाजन पैदा करने की कोशिश है। पुलिसकर्मियों के निजी तौर पर सरकार के खिलाफ होने का दावा करके उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि सुरक्षा बल और पुलिस मौजूदा सरकार से असंतुष्ट हैं।

राज्य संस्थानों के भीतर मतभेद पैदा करना व्यापक राजनीतिक रणनीति का एक तरीका माना जाता है। सुरक्षा बलों की निष्ठा पर सवाल खड़े करने से सरकारी व्यवस्था को कमजोर करने और बड़े स्तर पर अस्थिरता का माहौल बनाने की कोशिश की जाती है। इतिहास में भी सुरक्षा बलों का मनोबल गिराने या उन्हें मौजूदा सरकार के खिलाफ करने की कोशिश को शासन परिवर्तन की रणनीतियों का हिस्सा माना गया है। जब राज्य संस्थानों की एकजुटता कमजोर पड़ती है तो किसी देश की राजनीतिक व्यवस्था भी अस्थिर हो सकती है।

सैन्य तख्तापलट (Military coup) वह स्थिति होती है जब किसी देश की सेना अचानक और गैरकानूनी तरीके से सत्ता पर कब्जा कर नागरिक सरकार को हटा देती है। इसमें लोकतांत्रिक चुनाव या संवैधानिक प्रक्रिया के बजाय बल या बल की धमकी के जरिए शासन अपने हाथ में लिया जाता है। दक्षिण एशिया के कई देशों में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं।

बांग्लादेश का मामला: अंदरूनी विश्वासघात की एक मिसाल

पड़ोसी देशों की हालिया राजनीतिक घटनाएँ दिखाती हैं कि राजनीतिक अस्थिरता और सरकारी संस्थानों के भीतर अविश्वास किस तरह सत्ता परिवर्तन का कारण बन सकता है। बांग्लादेश इसका एक बड़ा उदाहरण है जहाँ सेना के भीतर की परिस्थितियों ने सरकार गिरने में अहम भूमिका निभाई।

बांग्लादेश के राजनीतिक घटनाक्रम पर 15 नवंबर 2025 को प्रकाशित किताब ‘Inshallah Bangladesh: The Story of an Unfinished Revolution’ के बाद चर्चा तेज हुई। दीप हलदर, जयदीप मजूमदार और शहीदुल हसन खोखोन द्वारा लिखी गई इस किताब में बताया गया है कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को कैसे सत्ता से हटाया गया। किताब में हसीना सरकार के पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल ने सरकार गिरने को लेकर कई दावे किए हैं।

दिल्ली में लेखकों से बातचीत के दौरान खान कमाल ने सत्ता परिवर्तन को ‘CIA की पूरी तरह से रची गई साजिश’ बताया, जिसे लंबे समय तक तैयार किया गया। उन्होंने दावा किया कि बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान ने इसमें अहम भूमिका निभाई। कमाल ने कहा, “हमें नहीं पता था कि सीआईए ने वाकर को अपने प्रभाव में ले लिया था।” उन्होंने यह भी कहा कि डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस (DGFI) और नेशनल सिक्योरिटी इंटेलिजेंस (NSI) जैसी एजेंसियाँ प्रधानमंत्री को पहले से आगाह नहीं कर सकीं।

फोटो साभार: HINDU E SHOP

खान कमाल ने बांग्लादेश में विदेशी दिलचस्पी के दो प्रमुख कारण बताए। पहला, उनका दावा था कि वॉशिंगटन दक्षिण एशिया में एक साथ कई मजबूत नेताओं को सत्ता में देखना नहीं चाहता था। उन्होंने इसके उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और शेख हसीना का नाम लिया। दूसरा कारण उन्होंने बंगाल की खाड़ी में म्यांमार के तट के पास स्थित सेंट मार्टिन द्वीप का रणनीतिक महत्व बताया। पद छोड़ने से पहले शेख हसीना ने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि उन पर राजनीतिक समर्थन के बदले सेंट मार्टिन द्वीप तक पहुँच देने का दबाव बनाया गया था, जिसे उन्होंने देश की संप्रभुता के खिलाफ बताते हुए ठुकरा दिया।

लेखकों ने यह भी लिखा कि देश के भीतर सक्रिय कट्टरपंथी समूहों ने बाहरी खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर काम किया। खान कमाल के मुताबिक, पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) ने जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश के साथ मिलकर जन आंदोलन को भड़काया। उन्होंने कहा कि विदेशी प्रशिक्षण प्राप्त लोगों द्वारा पुलिस को निशाना बनाए जाने की चेतावनी मिलने के बावजूद जनरल वाकर ने शेख हसीना को भरोसा दिलाया कि सेना बिना पुलिस की मदद के हालात संभाल लेगी।

4 अगस्त 2024 की शाम गोनोभबन में हुई उच्चस्तरीय सुरक्षा बैठक में खान कमाल ने सुझाव दिया कि पुलिस ढाका में प्रवेश के सभी रास्तों को अपने नियंत्रण में ले। लेकिन जनरल वाकर ने यह प्रस्ताव खारिज कर दिया। उनका कहना था कि जनता को पुलिस पर भरोसा नहीं है और सेना ही स्थिति संभालेगी। कमाल ने कहा, “उस शाम उन्होंने उन पर भरोसा किया।” लेकिन 5 अगस्त 2024 की सुबह तक सेना के सीधे दबाव में शेख हसीना को इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा।

म्यांमार संकट: संवैधानिक तख्तापलट और सैन्य शासन

म्यांमार दक्षिण एशिया का एक और उदाहरण है, जहाँ सेना ने सीधे हस्तक्षेप कर चुनी हुई नागरिक सरकार को सत्ता से हटा दिया। 1 फरवरी 2021 को म्यांमार की सेना (तातमदाव) ने सत्ता पर कब्जा कर लिया, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को हटा दिया और उसके प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया।

1948 में स्वतंत्रता मिलने के बाद से म्यांमार की राजनीति पर सेना का गहरा प्रभाव रहा है। 1962 में पहला सैन्य तख्तापलट हुआ। हालाँकि, 2008 में नागरिक शासन की ओर बढ़ने के लिए नया संविधान लागू किया गया लेकिन उसमें सेना को व्यापक अधिकार दिए गए। संसद की 25 प्रतिशत सीटें सेना के लिए आरक्षित रखी गईं, 3 प्रमुख सुरक्षा मंत्रालयों का नियंत्रण सेना के पास रहा और आपातकाल की ऐसी व्यवस्था बनाई गई जिसे कई विश्लेषक पहले से मौजूद तख्तापलट की व्यवस्था मानते हैं। इसके तहत राष्ट्रीय संकट की स्थिति में सत्ता सेना को सौंपी जा सकती थी।

नवंबर 2020 के संसदीय चुनाव के बाद नागरिक सरकार और सेना के बीच तनाव बढ़ गया। आंग सान सू की की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) को स्पष्ट बहुमत मिला जबकि सेना समर्थित यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद वरिष्ठ जनरल मिन आंग ह्लाइंग के संसदीय प्रक्रिया से राष्ट्रपति बनने की संभावना खत्म हो गई। सेना ने बड़े पैमाने पर चुनावी गड़बड़ी का आरोप लगाया। हालाँकि, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय चुनाव पर्यवेक्षकों ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। इसके बावजूद सेना ने दोबारा चुनाव कराने और संसद की पहली बैठक टालने की माँग की।

जब सरकार ने 1 फरवरी 2021 को संसद की बैठक बुलाने का फैसला बरकरार रखा, तो सेना ने तुरंत तख्तापलट कर दिया। राष्ट्रपति विन म्यिंत, स्टेट काउंसलर आंग सान सू की और कई सांसदों को हिरासत में ले लिया गया। पूर्व सैन्य अधिकारी और उपराष्ट्रपति म्यिंत स्वे कार्यवाहक राष्ट्रपति बने और संविधान के अनुच्छेद 417 और 418 का इस्तेमाल करते हुए आपातकाल घोषित कर दिया। इसके साथ ही कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की सभी शक्तियाँ वरिष्ठ जनरल मिन आंग ह्लाइंग को सौंप दी गईं।

इस सत्ता परिवर्तन के बाद पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन, अशांति और हड़तालें शुरू हो गईं। इसके जवाब में नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट नाम की एक समानांतर सरकार बनाई गई और कई सशस्त्र प्रतिरोध समूह भी सामने आए। सत्ता बनाए रखने के लिए सेना की कार्रवाई ने म्यांमार को लंबे गृह संघर्ष में धकेल दिया, जिससे अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल गई।

ऐतिहासिक उदाहरण: भारत में आपातकाल से पहले का दौर

भारत के राजनीतिक इतिहास में पुलिस और सशस्त्र बलों की निष्ठा को प्रभावित करने की कोशिशों जैसी बातें पूरी तरह नई नहीं हैं। 1975 में आपातकाल लागू होने से पहले भी इसी तरह की बातें सामने आई थीं।

25 जून 1975 को विपक्ष के नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक सभा को संबोधित किया। अपने करीब 80 मिनट के भाषण में जेपी ने पुलिस, सशस्त्र बलों और सरकारी अधिकारियों से कहा कि वे सरकार के उन आदेशों का पालन न करें जिन्हें वे ‘गैरकानूनी और अनैतिक’ मानते हैं। जेपी ने इसे अहिंसक सविनय अवज्ञा का हिस्सा बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की तानाशाही प्रवृत्तियों के खिलाफ लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना है।

सभा में जेपी ने तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश एएन रे से भी अपील की कि वे इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ इंदिरा गाँधी की अपील की सुनवाई न करें, जिसमें उनके चुनाव को अमान्य ठहराया गया था। हालाँकि, उन्होंने कहा कि वह मुख्य न्यायाधीश की ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा रहे हैं लेकिन उनका तर्क था कि क्योंकि एएन रे की नियुक्ति तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को नजरअंदाज कर की गई थी, इसलिए जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है। लोकतंत्र पर खतरे की बात करते हुए जेपी ने कहा कि भारत न तो बांग्लादेश है और न ही पाकिस्तान, जहाँ मनमानी शासन को बिना विरोध स्वीकार कर लिया जाएगा।

इस रैली के बाद विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे की माँग को लेकर एक सप्ताह का सत्याग्रह शुरू किया और देशभर में आंदोलन चलाने के लिए लोक संघर्ष समिति (LSS) का गठन किया। बढ़ते राजनीतिक दबाव और सरकारी तंत्र से की जा रही अपीलों के बीच इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने 25 जून 1975 की रात देशभर में आपातकाल लागू कर दिया। इसके बाद मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए और कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले लिया गया।

मीडिया और ‘तख्तापलट’ की कहानी

मीडिया और राजनीतिक वर्ग द्वारा सेना की बगावत या तख्तापलट जैसी आशंकाओं को लेकर कहानी गढ़ने की प्रवृत्ति नई नहीं है। कॉन्ग्रेस के शासनकाल में भी सामान्य संस्थागत गतिविधियों को तख्तापलट की कोशिश बताने वाली खबरों का राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर कड़ा विरोध हुआ था।

इसका एक प्रमुख उदाहरण पत्रकार शेखर गुप्ता का 2012 में द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख था, जिसका शीर्षक था, ‘The January night Raisina Hill was spooked: Two key army units move towards Delhi without notifying govt’। इस रिपोर्ट में बिना सरकार को सूचना दिए सेना की दो प्रमुख टुकड़ियों के दिल्ली की ओर बढ़ने को संभावित तख्तापलट जैसी स्थिति के संकेत के रूप में पेश किया गया था।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

इस रिपोर्ट की उस समय खूब आलोचना हुई थी। सिर्फ तत्कालीन सरकार ने ही नहीं बल्कि कॉन्ग्रेस के कई आलोचकों ने भी इस कथित साजिश की कहानी को सनसनी फैलाने वाला बताया। उनका कहना था कि यह पाठकों का ध्यान खींचने के लिए गढ़ी गई कहानी थी। इसी वजह से कुछ लोगों ने मजाक में शेखर गुप्ता को ‘कूप्टा’ (Coupta) भी कहना शुरू कर दिया।

ऐसे गैर-जिम्मेदाराना ‘तख्तापलट’ वाले दावे सशस्त्र बलों की छवि को तो नुकसान पहुँचाते ही हैं साथ ही साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे को कमजोर करते हैं। यह ऐतिहासिक उदाहरण दिखाता है कि सेना या पुलिस की कथित नाराजगी के आधार पर सत्ता परिवर्तन की कहानी गढ़ना लंबे समय से जिम्मेदार राजनीति या पत्रकारिता नहीं बल्कि सनसनी फैलाने का तरीका माना जाता रहा है।

इसी तरह, राहुल गाँधी का हालिया दावा कि पुलिसकर्मियों ने उनसे सरकार हटाने की बात कही वो भी इसी तरह की रणनीति का हिस्सा लगता है जिसमें सरकारी संस्थानों के भीतर असंतोष का संकेत देकर अस्थिरता की कहानी खड़ी करने की कोशिश हो रही है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)

सोनम वांगचुक ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग से बनाई दूरी, CJP में फूट के बाद क्या अब आंदोलन की उलटी गिनती हो गई है शुरू?

पेपर लीक को लेकर जंतर मंतर पर चल रहा कॉकरोच जनता पार्टी और इस मुद्दे को लेकर आमरण अनशन करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की माँग क्या अलग अलग हो गई है। ये हम नहीं कर रहे, बल्कि जंतर मंतर पर अभी भी डेरा जमाए कॉकरोच जनता पार्टी के बयान और गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती सोनम वांगचुक के खुले पत्र से पता चलता है।

क्या है सोनम वांगचुक के खुले पत्र में

अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल कर सोनम वांगचुक ने अपने खुले पत्र में सरकार से माँग की है कि पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई न की जाए, उनके खिलाफ दायर एफआईआर वापस ले ली जाए। नीट यूजी 2026 पेपर लीक की वजह से आत्महत्या करने वाले बच्चों के परिजनों को मुआवजा दी जाए।

पेपर लीक करने के मुद्दे पर जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए संसद में सार्थक चर्चा करना, अगर इन मुद्दों पर सरकार तैयार हो जाती है तो वे अनशन तोड़ने के लिए तैयार हैं यानी उनकी माँगों में कही भी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे पर जोर नहीं है, जबकि सीजेपी का कहना है कि शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे से कम हमें कुछ नहीं चाहिए और वार्ता जंतर मंतर या किसी ‘न्यूट्र्ल जगह’ पर होनी चाहिए। इसी पर सरकार से वार्ता भी अटकी हुई है।

सीजेपी ने क्या माँग रखी है

कॉकरोच जनता पार्टी के नेता अभिजीत दीपके धमकी भरे लहजे में कहते हैं, “मोदी जी, मैं एक बार फिर आपसे रिक्वेस्ट करता हूँ कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार करें। नहीं तो, मामला सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक ही सीमित नहीं रहेगा, यह आपके इस्तीफे तक भी आएगा… याद रखें: भारत में कोई भी आपको चुनाव में वोट नहीं देगा…।” साफ है कि उनकी माँग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से शुरू होती है।

लेकिन सरकार सीजेपी के जंतर मंतर पर बातचीत करने और शिक्षा मंत्री के इस्तीफा वाली माँग को मानने वाली नहीं है। हालाँकि सरकार लगातार प्रदर्शनकारी कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से बातचीत की अपील करती रही है। सरकार की तरफ से छात्रों और सोनम वांगचुक से बातचीत की अगुवाई करने वाले केन्द्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेन्द्र सिंह ने विनम्र निवेदन की है कि वार्ता के मेज पर ही समाधान निकाला जा सकता है। सरकार हर वक्त सभी मुद्दों पर बातचीत करने के लिए तैयार है। सरकार की तरफ से कोई ‘पूर्व शर्त’ भी नहीं रखी गई है।

धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे पर वांगचुक और सीजेपी एकमत नहीं

ये तो हुई सरकार की बात, लेकिन क्या शिक्षा मंत्री के इस्तीफा के मुद्दे पर सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी के बीच मतभेद हो गया है। सोनम वांगचुक से लगातार दोनों केन्द्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेन्द्र सिंह अस्पताल जाकर वार्ता कर रहे हैं। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि वांगचुक जल्दी ही अपना अनशन तोड़ देंगे।

अगर वांगचुक भूख हड़ताल खत्म करते हैं तो छात्र आंदोलन का चेहरा कौन होगा? आखिर वांगचुक का चेहरा ही इस आंदोलन में सेलिब्रिटी को जोड़ने का जरिया रहा है। सोशल मीडिया पर भी वांगचुक के भूख हड़ताल पर जबरदस्त प्रतिक्रिया देखी गई। वांगचुक के अस्पताल जाते ही यह मंच पर कई चेहरे दिखने लगे।

निंहगों से लेकर योगेन्द्र यादव तक अपने अपने तरह से आंदोलन में कूदते नजर आए। संसद मार्च के दौरान हुआ हुडदंग और हिंसा भी इस आंदोलन का चेहरा बन गया। ऐसे में वांगचुक की भूख हड़ताल के खत्म होते ही इस आंदोलन के दिशाहीन होने की आशंका है।

छात्र आंदोलन के नेतृत्व को हाईजैक करने की कोशिश तो विपक्षी राजनीतिक पार्टियाँ भी कर रही है। इसी तरफ एक कदम आगे बढ़ते हुए लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी पीएम आवास के सामने धरना पर बैठ गए और अपनी माँगों को बदलते रहे। पहले उन्होंने संसद में चर्चा कराने की माँग रखी, जिसे सरकार के नुमाइंदे केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने तुरंत मान लिया। लेकिन तुरंत उन्होंने शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का मुद्दा जोड़ दिया।

शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग कर रहे विपक्ष ने मानसून सत्र का पहला हफ्ता बर्बाद कर दिया। शिक्षा मंत्री पहले इस्तीफा दें, तब सदन में पेपर लीक पर चर्चा होगी। विपक्ष इस पर अड़ा हुआ है, वही सरकार पेपर लीक समेत हर मुद्दे पर सदन में पहले चर्चा करना चाहती है।

रवीश कुमार तुम ही पत्रकारों की पिटाई के जिम्मेदार हो, खुद ‘गोदी’ में बैठ करते रहे पत्रकारिता… अब चला रहे ‘गोदी मीडिया’ वाला प्रोपेगेंडा

कहावत है कि जब इंसान के सिर पर अहंकार का चश्मा चढ़ जाता है, तो उसे दूसरों का दर्द और अपनी भड़ास के बीच का अंतर दिखना बंद हो जाता है। खुद को लोकतंत्र का आखिरी पहरेदार और देश का सबसे बड़ा निष्पक्ष पत्रकार बताने वाला रवीश कुमार आज इसी मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है।

वर्षों से ‘गोदी मीडिया-गोदी मीडिया’ का राग अलापकर खुद को दूध का धुला साबित करने वाले प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार अब इस खोखले नैरेटिव के पीछे अपनी नफरती सोच को बिल्कुल छिपा नहीं पाए। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान जब सड़कों पर गुंडों और उपद्रवियों ने महिला और पुरुष पत्रकारों को निशाना बनाया, दौड़ा-दौड़ाकर पीटा और उनके कपड़े तक फाड़ दिए, तब रवीश कुमार का ‘न्यायप्रिय’ जमीर पूरी तरह से सो गया।

उनकी यह चुप्पी और उसके बाद आया उकसाने वाला बयान साबित करता है कि उनके लिए साथी पत्रकारों की सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती, बल्कि अपनी राजनीतिक खुन्नस निकालना और मोदी सरकार को किसी भी कीमत पर कटघरे में खड़ा करना ही उनका एकमात्र एजेंडा बन चुका है।

सड़क पर लहूलुहान होते पत्रकार और स्टूडियो में बैठ नफरत को जायज ठहराते रवीश

राजधानी की सड़कों पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन चल रहा था। प्रदर्शनकारियों का चोला ओढ़कर आए उपद्रवियों ने वहाँ मौजूद रिपोर्टरों और कैमरामैनों पर हमला कर दिया। 10 से 15 पत्रकारों के साथ सरेआम मारपीट और बदसलूकी की गई। हद तो तब हो गई जब खुद रवीश कुमार के पूर्व साथी रवीश रंजन शुक्ला को निशाना बनाया गया। कई युवा पत्रकारों के कपड़े फाड़े गए, उनके माइक तोड़ दिए गए और महिला पत्रकारों के साथ ऐसी अभद्रता की गई जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान का सर शर्म से झुक जाए।

उपद्रवियों ने केवल मीडिया पर ही नहीं, बल्कि शांति व्यवस्था बनाए रखने में जुटी पुलिस पर भी पथराव किया। प्रधानमंत्री को खुलेआम गंदी-गंदी गालियाँ दी गईं और देश विरोधी माहौल बनाने का प्रयास किया गया। लेकिन इन सब गंभीर और शर्मनाक घटनाओं पर रवीश कुमार के मुँह से एक शब्द नहीं निकला।

पुलिस पर हमले पर मौन, पत्रकारों के लहूलुहान होने पर मौन, देश के प्रधानमंत्री को दी गई भद्दी गालियों पर मौन और देश की अखंडता को चुनौती देने वाली विदेशी ताकतों की घुसपैठ पर भी पूरी तरह मौन… इस पूरे घटनाक्रम में प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार की भूमिका किसी मूकदर्शक की नहीं, बल्कि उस सोच के समर्थक की रही जो हिंसा को जायज ठहराती है। उन्होंने हिंसा की निंदा करने का महज एक औपचारिकता भरा ‘बैलेंसिंग एक्ट’ किया, लेकिन उसकी अगली ही लाइन में पत्रकारों पर हो रहे हमलों और मॉब लिंचिंग जैसी मानसिकता को सही ठहराने का कुतर्क गढ़ दिया।

‘गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है’: हिंसा का समर्थन

22 जुलाई को अपने आधिकारिक X (ट्विटर) हैंडल पर रवीश कुमार ने जो लिखा, वह सिर्फ एक विचार नहीं बल्कि सड़क पर घूम रही हिंसक भीड़ को उकसाने वाला एक खुला फरमान था। उन्होंने लिखा, “मूल बात क्या है? मूल बात है कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है। आप अगर-मगर के सहारे इससे नहीं बच सकते। कुछ अच्छे लोग हमेशा हैं, रहेंगे। उन्हें निशाना मत बनाइये, हिंसा और हुड़दंग नहीं होनी चाहिए। तब भी गोदी मीडिया की सच्चाई नहीं बदल जाएगी। जनता को हर दिन जागना होगा। आज इस मीडिया पर आप गर्व नहीं कर सकते। इसके न्यूज़ रूम के लोग भी शर्म से सहमे रहते हैं। अभी भी ज़रूरत है कि देश की हर पंचायत में पोस्टर लगना चाहिए कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है। हर पार्टी के दफ्तर के बाहर यह पोस्टर लिखा होना चाहिए। एयरपोर्ट पर स्पेस ख़रीद कर यह नारा लिखा जाना चाहिए। लोगों को अपनी कार के पीछे लिखना चाहिए। इस गोदी मीडिया ने लोकतंत्र के हर कोने में सड़न पैदा कर दी है। इसके कारण कुर्सी पर बैठा हर शख़्स ख़ुद को ख़ुदा समझ बैठा है। सांसद तक लूटे जा रहे हैं। विपक्षी पार्टियाँ लूट ली जा रही हैं। वोट का अधिकार छीना गया है। इसी मीडिया के सामने। इसलिए मूल बात है कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है।”

जरा इस बयान की भाषा और समय को समझिए। जब जमीन पर रिपोर्टिंग कर रहे युवा पत्रकारों को भीड़ पीट रही थी, तब रवीश कुमार लोगों से कह रहे थे कि पंचायतों से लेकर एयरपोर्ट्स तक और गाड़ियों के पीछे पोस्टर लगाओ कि ‘गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है’। क्या यह बयान उस उग्र भीड़ को थपकी देने जैसा नहीं है? जब आप किसी समूह को सरेआम ‘हत्यारा’ घोषित कर देंगे, तो सड़क पर उतरी उग्र भीड़ उस समूह के प्रतिनिधियों को सामने पाकर क्या करेगी? जाहिर है, वह उन पर हमला ही करेगी। रवीश कुमार यही चाहते हैं। वे एसी स्टूडियो में बैठकर नफरत का ऐसा माहौल बना रहे हैं जिससे ग्राउंड पर काम करने वाले रिपोर्टरों की लिंचिंग सुनिश्चित हो सके।

रवीश कुमार की नजर में निष्पक्षता की परिभाषा पूरी तरह सड़ चुकी है। उनके तय पैमानों के मुताबिक ‘सच्चा और ईमानदार पत्रकार’ सिर्फ वही है, जो उनके एजेंडे, उनकी राजनीतिक सोच और उनकी कुंठा का समर्थन करे।

अगर कोई ग्राउंड रिपोर्टर किसी आंदोलन या प्रदर्शन के भीतर छिपे हिंसक तत्वों को बेनकाब करता है, अगर कोई पत्रकार पुलिस पर पथराव करने वाले उपद्रवियों की फुटेज दिखाता है, या कोई मीडियाकर्मी भीड़ द्वारा खुद उस पर किए गए हमले की सच्चाई देश के सामने लाता है, तो रवीश कुमार जी के हिसाब से वह ‘गोदी मीडिया’ का दलाल बन जाता है। और चूँकि रवीश ने उसे ‘लोकतंत्र का हत्यारा’ घोषित कर दिया है, इसलिए सड़क पर घूम रही हिंसक भीड़ को उस पर हमला करने का नैतिक अधिकार मिल जाता है। यह सोच पत्रकारिता की नहीं, बल्कि चरमपंथी मानसिकता की प्रतीक है।

पत्रकार बिरादरी का फूटा गुस्सा: ‘आप उस हिंसक भीड़ के मसीहा हैं’

प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार के इस गैर-जिम्मेदाराना, भड़काऊ और दोहरा चरित्र उजागर करने वाले रवैये से पूरी पत्रकार बिरादरी में गहरा आक्रोश फैल गया है। वरिष्ठ पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर रवीश कुमार को आईना दिखाते हुए उनकी नफरती पत्रकारिता की धज्जियाँ उड़ाई हैं।

वरिष्ठ पत्रकार सैयद सुहैल ने रवीश कुमार को टैग करते हुए सीधे शब्दों में लिखा, “पत्रकारों के खिलाफ इस भीड़ को हिंसा के लिए आप सालों से उकसा रहे हैं। मुबारक हो आप उस भीड़ के मसीहा हैं… जो सड़क पर पत्रकारों को पीट रही है। एन्जॉय कीजिये यही आप चाहते थे.. खुद की ईमानदारी की झूठी दुकान चलाने के लिए आपने पत्रकारों के खिलाफ लोगों को भड़काया है।”

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने पत्रकारिता के गिरते स्तर और रवीश जैसे लोगों द्वारा फैलाई जा रही नफरत पर दुख जताते हुए लिखा, “मैंने पत्रकारिता में एकजुटता का वह दौर भी देखा है जब देश के किसी हिस्से में पत्रकारों पर हमला होने पर विरोध में सब साथ आ जाते थे। आशुतोष जी पर बीएसपी नेताओं के हमले के विरोध में प्रेस क्लब से नॉर्थ ब्लॉक तक मार्च किया गया था जिसमें प्रिंट और टीवी के उस समय के सारे दिग्गज संपादक शामिल थे। कुछ रिपोर्टर को एंट्री न मिलने पर सारे रिपोर्टर प्रेस कॉन्फ्रेंस का बायकॉट कर देते थे। यह एकजुटता थी। अब वह दौर है जब पत्रकार ही भीड़ को पत्रकारों की लिंचिंग के लिए उकसा रहे हैं।”

ABP न्यूज की वरिष्ठ पत्रकार चित्रा त्रिपाठी ने भी रवीश कुमार को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने X पर रवीश के एक पोस्ट पर जवाब देते हुए लिखा, “ये व्यक्ति पत्रकारों के खिलाफ भीड़ को ‘लिचिंग’ के लिए भड़का रहा है। एक पॉलिटिकल पार्टी की राजनीतिक यात्रा में हिस्सा लेकर अपनी पत्रकारिता बेच देने वाला शख्स पत्रकारिता सिखाने में लगा हुआ है।”

चित्रा जिस यात्रा की बात कर रही हैं वो राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ है। खुद को न्यूट्रल दिखाने को ढोंग करने वाले रवीश कुमार की असलियत बार-बार अलग-अलग रूप में सामने आती रही है। दिवंगत पत्रकार रोहित सरदाना की वो टिप्पणी भी याद करिए जो उन्होंने रवीश कुमार के लिए की थी।

रोहित ने कहा था, “वैसे भी कोई उसे देखता नहीं है और वह अपनी मनमानी करता रहता है और खुद को संतुष्ट करने के लिए दूसरे चैनलों को गोदी मीडिया कहता है।” उन्होंने कहा था, “अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएँगे कि वह खुद किसी की गोद में बैठा है और दूसरे मीडिया को गोदी मीडिया कहकर अपनी ही नीची भावना को दूसरों पर थोप रहा है।”

पत्रकारों की ये टिप्पणियाँ यह साबित करने के लिए काफी हैं कि रवीश कुमार ने अपनी खोखली वाहवाही और निजी खुन्नस के चक्कर में पूरी पत्रकार बिरादरी की सुरक्षा को दाँव पर लगा दिया है।

यूट्यूब पर अपने आलीशान और AC स्टूडियो में बैठकर घंटों लंबे वीडियो ज्ञान देने वाले रवीश कुमार को अब ज़मीनी हकीकत का कोई अहसास नहीं रह गया है। वे भूल चुके हैं कि कड़कती धूप, बारिश और उग्र भीड़ के बीच जाकर रिपोर्टिंग करना क्या होता है। स्टूडियो के ठंडे और सुरक्षित माहौल में बैठकर प्रोपेगेंडा गढ़ना बहुत आसान होता है, लेकिन जब कोई युवा रिपोर्टर हाथ में माइक लेकर किसी उग्र भीड़ के बीच खड़ा होता है, तो उसकी जान हर पल जोखिम में होती है।

रवीश कुमार आज अहंकार की उस पराकाष्ठा पर हैं, जहाँ वे अपने से छोटे पत्रकारों, समकालीनों और अपने पुराने सहयोगियों के अस्तित्व और उनकी सुरक्षा को पूरी तरह नकार देते हैं। अपनी ‘महानता’ और ‘ईमानदारी’ का झूठा मुखौटा पहने रखने के लिए वे अपने ही साथियों की बलि चढ़ाने से भी नहीं हिचकते।

देश विरोधी एजेंडे और मौन का कड़वा सच

यह पहला मौका नहीं है जब रवीश कुमार का ऐसा संदिग्ध और चुनिंदा रुख सामने आया है। जब भी देश में किसी आंदोलन की आड़ में अराजकता फैलाई जाती है, जब भी विदेशी ताकतें भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश करती हैं, या जब भी देश की संवैधानिक संस्थाओं पर हमले होते हैं- रवीश कुमार हमेशा देशविरोधी या उपद्रवी तत्वों की ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं।

मोदी सरकार के प्रति अपनी नफरत में वे इतने अंधे हो चुके हैं कि उन्हें देश का हित-अहित दिखना बंद हो गया है। प्रधानमंत्री को दी जाने वाली गालियाँ उनके लिए ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ बन जाती हैं, और पत्रकारों पर होने वाले जानलेवा हमले ‘जनता का गुस्सा’। रवीश कुमार की यह मौकापरस्ती सिर्फ एक व्यक्ति का पतन नहीं है, बल्कि यह उस विचार का पतन है जो खुद को ‘पत्रकारिता’ कहकर जनता को गुमराह करता रहा है।

अगर रवीश कुमार में जरा सी भी पत्रकारिता की नैतिकता, बची हुई इंसानियत या आत्मसम्मान बाकी है, तो उन्हें अपने भीतर झांकना चाहिए। उन्हें यह समझना होगा कि नफरत की जिस फसल को वे इतने सालों से सींच रहे हैं, उसकी जद में कल कोई भी आ सकता है। दूसरों को लोकतंत्र का हत्यारा बताने से पहले रवीश को यह मान लेना चाहिए कि साथी पत्रकारों के खून से सने उपद्रवियों के हाथों को नैतिक समर्थन देकर वे खुद पत्रकारिता के सबसे बड़े हत्यारे बन चुके हैं।

CJP का मंच बना ‘मोदी विरोधी बैटलग्राउंड’… जानें- वामपंथी और विपक्षी दल कैसे कर रहे छात्रों के आंदोलन का इस्तेमाल, विदेशी फंडिंग और खालिस्तानी कनेक्शन पर भी सवाल

राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर एक बार फिर तमाशे, उपद्रव और घिनौनी राजनीति का गवाह बन रहा है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम के शुरू हुए एक व्यंग के मंच और तथाकथित छात्र संगठन के बैनर तले जो कुछ भी पिछले दिनों से रचा जा रहा है, उसने देश के जागरूक नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

परीक्षा सुधारों, रोजगार और छात्रों के निष्पक्ष भविष्य की जिन माँगों को लेकर यह आंदोलन शुरू होने का दावा किया गया था, वह असली मुद्दा अब बहुत पीछे छूट चुका है।

आज जंतर-मंतर का मंच छात्रों की समस्याओं का समाधान खोजने की जगह विपक्षी दलों का ‘राजनीतिक लॉन्चपैड’ और ‘मोदी विरोधी बैटलग्राउंड’ बन गया है। लोकतंत्र में जनता द्वारा बार-बार खारिज की जा चुकी और अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने की हताशा में झुलस रही कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) जैसी पार्टियाँ इस मंच का इस्तेमाल केवल अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए कर रही हैं।

इतना ही नहीं, बांग्लादेश, कतर से लेकर खालिस्तानी आतंकी संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) जैसे भारत विरोधी तत्वों का इस आंदोलन में दिलचस्पी लेना और वित्तीय सहायता फंडिंग का ऐलान करना यह साफ दिखाता है कि इस पूरे ड्रामे के तार कितने खतरनाक और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े हुए हैं।

पृष्ठभूमि और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का उभार: व्यंग्य से शुरू हुआ खेल अब अराजकता का औजार

शुरुआत में जिस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को सोशल मीडिया पर एक मजाकिया या व्यंग्यात्मक ग्रुप की तरह पेश किया गया था, वह रातों-रात विरोध प्रदर्शन का चेहरा कैसे बन गई? इस संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके और उनके सहयोगियों ने जब NEET परीक्षा में गड़बड़ियों का मुद्दा उठाकर जंतर-मंतर पर धरना देना शुरू किया, तो पूरे देश के आम छात्रों को लगा कि शायद यह उनकी आवाज है। लेकिन महज कुछ ही दिनों में इस पूरे आंदोलन की दिशा मोड़ दी गई।

छात्रों के जायज सवालों को किनारे करके मंच से नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ भड़काऊ नारेबाजी, राजनीतिक भाषणबाजी और व्यवस्था को अपाहिज बनाने की धमकियाँ दी जाने लगीं। व्यंग्य का चोला पहनकर उतरी CJP दरअसल वामपंथी इकोसिस्टम और मोदी विरोधी लॉबी का ही नया अवतार बनकर उभरी है, जिसका मकसद केवल देश में अशांति और अस्थिरता का माहौल बनाना है।

जो छात्र केवल निष्पक्ष परीक्षाओं और रोजगार के अवसर तलाश रहे थे, उन्हें समझने ही नहीं दिया गया कि उनके पीछे से एक सुनियोजित राजनीतिक और विचारधारात्मक एजेंडा चलाया जा रहा है।

राजनीति चमकाने की होड़: कॉन्ग्रेस, आप, सपा और TMC ने छात्रों के मंच पर डाला डेरा

जैसे ही जंतर-मंतर पर भीड़ जुटने लगी, वैसे ही अपनी खोई साख तलाश रहे विपक्षी दलों ने इस मौके को भुनाने में जरा भी देर नहीं की। शिक्षा और छात्रों के हित का ढोंग रचने वाली राजनीतिक पार्टियों में इस बात की होड़ मच गई कि कौन जंतर-मंतर जाकर CJP का सबसे बड़ा हमदर्द दिखेगा।

कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी और उनके तमाम नेताओं ने संसद में काले कपड़े पहनने से लेकर सड़कों पर प्रदर्शन का नाटक करके इस मुद्दे को तुरंत भुनाने की कोशिश की और इसे अपनी डूबती नैया पार लगाने का जरिया बना लिया।

इसी होड़ में समाजवादी पार्टी भी पूरे तामझाम के साथ कूद पड़ी। मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव खुद जंतर-मंतर पहुँचीं और CJP के प्रदर्शनकारियों के बीच बैठकर अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई।

यही नहीं अखिलेश यादव और सपा के अन्य बड़े नेताओं से लेकर सपा छात्र सभा के कार्यकर्ताओं तक, पूरी पार्टी ने CJP के इस आंदोलन को खुला राजनीतिक और नैतिक समर्थन देने का ऐलान कर दिया।

जो समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में लगातार चुनावों में हार के बाद अपनी जमीन तलाश रही है, उसने छात्रों के इस मंच का इस्तेमाल केवल केंद्र की मोदी सरकार पर हमला बोलने और अपनी पार्टी का राजनीतिक कद चमकाने के लिए किया।

उधर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और उनके नेता खुद को चमकाने सीधे जंतर-मंतर के मंच पर पहुँच गए। जो आम आदमी पार्टी दिल्ली के युवाओं को रोजगार देने और अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने में नाकाम रही, वही आज छात्रों के कंधे पर हाथ रखकर सरकार को घेरने की नाकाम कोशिश कर रही है।

वहीं दूसरी ओर बंगाल में चुनावी हिंसा पर मौन रहने वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और महुआ मोइत्रा जैसी नेताओं ने भी इस मंच का पूरा इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया।

इन तमाम राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े चेहरों का अचानक जंतर-मंतर पर जमावड़ा होना यह साबित करता है कि इन्हें छात्रों के भविष्य की जरा भी चिंता नहीं है, बल्कि इन्हें केवल अपने चुनाव के लिए एक गरमा-गरम मुद्दा चाहिए।

भटक गया असली मुद्दा: छात्रों का दर्द पीछे छूटा, एजेंडा हावी हुआ

जो छात्र दूर-दराज के इलाकों से इस उम्मीद में दिल्ली आए थे कि उनकी परीक्षाओं की निष्पक्षता, NEET लीक मामलों और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया पर सरकार से गंभीर संवाद होगा, वे आज खुद को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

राजनीतिक नेताओं की एंट्री होते ही पूरा ध्यान छात्रों की वास्तविक माँगों से हटकर अरविंद केजरीवाल के भाषणों, राहुल गाँधी के आरोपों और ममता बनर्जी के समर्थनों पर केंद्रित हो गया। मंच से अब परीक्षा प्रणाली में सुधार की नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को उखाड़ फेंकने, संसद घेरने और प्रशासनिक व्यवस्था को ठप करने की धमकियाँ दी जा रही हैं।

वास्तविक और निर्दोष छात्र अब इस भीड़ में पूरी तरह गायब हो चुके हैं और उनकी जगह पेशेवर प्रदर्शनकारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के नए चेहरों ने ले ली है। छात्रों के कंधों को ढाल बनाकर अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करना और असली मुद्दों को दबा देना ही इन राजनीतिक आकाओं का असली मकसद बन चुका है।

विदेश से फंडिंग और ऑनलाइन सप्लाई: कतर, बांग्लादेश और खालिस्तानी एंगल

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम पर चल रहे इस तथाकथित ‘गरीब और पीड़ित छात्र आंदोलन’ का असली चेहरा तब बेनकाब हुआ, जब इसके पीछे चल रहे संदिग्ध फंडिंग और सप्लाई नेटवर्क की परतें खुलीं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जंतर-मंतर पर विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के लिए बांग्लादेश और कतर जैसे अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों के संदिग्ध खातों से भारी मात्रा में ऑनलाइन खाना और महंगे फूड डिलीवरी ऑर्डर्स भेजे गए। सवाल उठता है कि विदेशों में बैठे इन आकाओं को भारत के छात्रों के खाने-पीने की इतनी चिंता क्यों अचानक सताने लगी?

आंदोलन की देशविरोधी साँठगाँठ उस समय पूरी तरह उजागर हो गई जब अमेरिका में बैठे प्रतिबंधित खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) ने CJP आंदोलनकारियों के लिए 1 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता देने का खुला ऐलान कर दिया। यह सीधे तौर पर भारत में खालिस्तानी एजेंडे को घुसाने और युवाओं को भड़काकर हिंसा फैलाने की अंतर्राष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है।

यह साबित करने के लिए काफी है कि यह आंदोलन केवल भारत के अंदर की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत विरोधी वैश्विक ताकतें इसे ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) की टूलकिट के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं।

 हिंसा, बैरिकेडिंग तोड़ना और पुलिस पर हमला: ‘बांग्लादेशी मॉडल’ की खतरनाक पुनरावृत्ति

जंतर-मंतर पर हो रही गतिविधियों की तुलना अगर आप पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए तख्तापलट से करेंगे, तो आपको एक जैसा पैटर्न साफ दिखाई देगा। बांग्लादेश में भी इसी तरह छात्रों के आंदोलन की आड़ में उग्र तत्वों ने हिंसा फैलाकर चुनी हुई सरकार को निशाना बनाया था और अराजकता पैदा की थी।

जंतर-मंतर पर CJP के उपद्रवियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नकाब उतारकर जब ‘चलो संसद’ का आह्वान किया, तो दिल्ली पुलिस के लगाए बैरिकेड्स को तोड़ा गया और कानून-व्यवस्था में तैनात सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी और बोतलें फेंकी गईं।

इस हिंसा में उत्तरी दिल्ली के DCP, पंजाबी बाग के ACP समेत 118 से अधिक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। जब-जब पुलिस और प्रशासन स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कानून के मुताबिक कदम उठाते हैं, तब-तब यह पूरा राजनीतिक इकोसिस्टम ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने लगता है।

ऑन-ड्यूटी जवानों और महिला पुलिसकर्मियों का खून बहाने वाले उग्र तत्वों के बचाव में उतरना यह दिखाता है कि इस आंदोलन का उद्देश्य संवाद नहीं, बल्कि केवल हिंसा और टकराव है।

लाइमलाइट बटोरने की होड़: छात्रों के दर्द पर अभिनय करते फिल्मी कलाकार

राजनीतिक दलों के साथ-साथ इस आंदोलन में खुद को ‘क्रांतिकारी’ दिखाने और खोई हुई लाइमलाइट वापस पाने की होड़ फिल्मी गलियारों के कुछ चुनिंदा चेहरों में भी साफ देखी जा रही है।

स्वरा भास्कर, इमरान खान,हुमा कुरैशी, सोनाक्षी सिन्हा और प्रकाश राज जैसे अभिनेता, जिनका फिल्मी करियर लंबे समय से ढलान पर है या जो मुख्यधारा के सिनेमा से लगभग गायब हो चुके हैं, वे अब जंतर-मंतर के इस मंच को अपने पब्लिसिटी स्टंट का जरिया बना रहे हैं।

सोशल मीडिया पर लंबे-चौड़े ज्ञान देने वाले ये कलाकार अब छात्रों के हक की आड़ में अपनी ढहती साख को बचाने की नाकाम कोशिशों में जुटे हैं। प्रकाश राज और स्वरा भास्कर जैसे चेहरे, जो हर सरकारी नीति के विरोध में कूदने के लिए जाने जाते हैं, वे एक बार फिर ‘मोदी विरोध’ के अपने पुराने एजेंडे को चमकाने आ गए हैं।

वहीं लंबे समय से बड़े पर्दे से दूर इमरान खान और हाल ही में सुर्खियों में रहने की कोशिश कर रहीं सोनाक्षी सिन्हा जैसे लोग भी छात्रों की वास्तविक समस्याओं से दूर, केवल कैमरे के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर खुद को ‘जनता का मसीहा’ साबित करने का खेल खेल रहे हैं।

मोदी विरोध की आड़ में देश को अस्थिर करने का टूलकिट: युवाओं को होना होगा सावधान

शाहीन बाग से लेकर लाल किले पर हिंसा वाले किसान आंदोलन और अब जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से जारी यह प्रदर्शन सब एक ही सिक्के के पहलू हैं। जब-जब देश में मोदी सरकार के खिलाफ जनता का जनादेश नहीं मिलता, तब-तब ये हताश ताकतें सड़कों पर अराजकता का माहौल बनाकर देश को बंधक बनाने की रणनीति अपनाती हैं।

निजी स्वार्थों से प्रेरित राजनीतिक दल अपनी चमक खो चुकी राजनीति को चमकाने के लिए मासूम छात्रों को ह्यूमन शील्ड बना रहे हैं। देश का युवा अगर आज भी यह नहीं समझ पाया कि परीक्षा सुधार के नाम पर उसके कंधों का इस्तेमाल खालिस्तानी समर्थकों, विदेशी फंडिंग एजेंसियों और मोदी-विरोधी नेताओं द्वारा देश विरोधी मंसूबों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

देश के छात्रों को इस राजनीतिक टूलकिट से खुद को तुरंत अलग कर लेना चाहिए ताकि उनका भविष्य, उनकी मेहनत और देश की सुरक्षा तीनों सुरक्षित रह सकें।

पेपर लीक पर PM मोदी का बड़ा ऐलान, फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी सुनवाई

इन सब के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट ऐलान किया है कि पेपर लीक के सभी मामलों में दोषियों को जल्द से जल्द और सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स का गठन किया जाएगा।

PM मोदी ने सोशल मीडिया पर संदेश जारी कर कहा कि युवाओं का कल्याण और उनका भविष्य हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इस दिशा में तुरंत आवश्यक कदम उठाने के निर्देश जारी कर दिए हैं। प्रधानमंत्री ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि देश के युवाओं का हित और उनका भविष्य सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। सरकार विद्यार्थियों के हितों की सुरक्षा के लिए लगातार फैसले ले रही है।

पीएम मोदी ने कहा कि पेपर लीक के मामलों में शामिल लोगों को जल्द से जल्द सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएँगे। इससे मामलों का जल्दी निपटारा होगा और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

पीएम मोदी ने अपने संदेश में साफ कहा कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त रुख अपनाएगी।

उन्होंने आगे कहा कि संबंधित विभागों और अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। सरकार चाहती है कि छात्रों का भरोसा परीक्षा व्यवस्था पर बना रहे।

मैदान में CM योगी, बूथ तक सक्रिय संगठन और भ्रम में विपक्ष… UP में BJP ऐसे कर रही 2027 में जीत की हैट्रिक लगाने की तैयारी

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने में करीब 9 महीने बाकी हैं लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा ने अपनी संगठनात्मक मशीनरी को अभी से चुस्त-दुरुस्त करना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ वर्षों में भाजपा की चुनावी रणनीति का सबसे बड़ा आधार उसका संगठन रहा है और इस बार भी पार्टी उसी मॉडल पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। हाल ही में प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर एक साथ आयोजित बूथ सम्मेलन इस बात का संकेत है कि भाजपा ने चुनावी मशीनरी को समय से पहले सक्रिय कर दिया है।

बूथ स्तर से शुरुआत

भाजपा ने 22 जुलाई को उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर एक साथ बूथ स्तरीय सम्मेलन आयोजित किए। पार्टी के अनुसार, यह प्रदेश में अब तक का सबसे बड़ा बूथ-स्तरीय संगठनात्मक अभियान था जिसमें राज्य के 1,77,516 मतदान केंद्रों को कवर किया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में तो बरेली में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और शाहजहाँपुर में ब्रजेश पाठक ने बूथ अध्यक्षों के सम्मेलन को संबोधित किया। पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता भी अलग-अलग जिलों में पहुँचे हैं।

भाजपा के लिए बूथ केवल मतदान का केंद्र नहीं बल्कि पूरे चुनाव अभियान की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। यही कारण है कि बूथ अध्यक्षों, शक्ति केंद्र प्रमुखों और मंडल स्तर के पदाधिकारियों को लगातार प्रशिक्षण, संवाद और समीक्षा बैठकों के माध्यम से सक्रिय किया जा रहा है। पार्टी का प्रयास है कि प्रत्येक बूथ पर ऐसा कार्यकर्ता तंत्र तैयार हो जो अपने क्षेत्र के मतदाताओं से लगातार संपर्क बनाए रखे, नए मतदाताओं तक पहुँचे और सरकार की योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुँचाए। भाजपा का संगठन वर्षों से इसी मॉडल पर काम करता आया है और 2027 के चुनाव में भी यही उसकी पहली प्राथमिकता दिखाई दे रही है।

कमजोर सीटों पर खास फोकस

पार्टी की रणनीति सिर्फ मजबूत इलाकों तक सीमित नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स की माने तों राष्ट्रीय स्तर पर तैयार किए जा रहे चुनावी खाके में प्रदेश की सभी 403 सीटों को 4 श्रेणियों में बाँटा गया है और खास नजर उन करीब 61 विधानसभा सीटों पर है जहाँ भाजपा पिछले तीन विधानसभा चुनावों 2012, 2017 और 2022 में जीत दर्ज नहीं कर सकी।

इन सीटों पर नए सिरे से बूथ प्रबंधन, जातीय समीकरण का आकलन, लाभार्थी संपर्क अभियान और संभावित उम्मीदवारों का सर्वे कराए जाने की योजना है। पार्टी का लक्ष्य इन कमजोर सीटों पर संगठन को बिल्कुल नए सिरे से खड़ा करना है ताकि लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का रास्ता और पुख्ता हो सके।

कुछ दिनों पहले ही बदले थे क्षेत्रीय अध्यक्ष

पिछले कुछ महीनों में केवल बूथ सम्मेलन ही नहीं हुए बल्कि संगठन के भीतर भी बड़े बदलाव किए गए हैं। अभी करीब महीनेभर पहले ही भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपने सभी छह क्षेत्रीय अध्यक्ष बदल दिए थे। राजनीतिक दृष्टि से यह केवल पदों का परिवर्तन नहीं माना था बल्कि इसे सामाजिक समीकरणों और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश थी। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि हर क्षेत्र में ऐसा नेतृत्व सामने आए जो स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ बेहतर तालमेल बनाकर चुनावी तैयारी को और मजबूत कर सके।

सरकार और संगठन साथ-साथ

यह भी गौर करने वाली बात है कि यह पूरी कवायद सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार प्रदेश के विभिन्न जिलों का दौरा कर विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास कर रहे हैं। CM योगी एक-एक दिन में कई शहरों को कवर कर रहे हैं। सैकड़ों करोड़ की सौगात दे रहे हैं। कुल मिलाकर कहें तो सरकार का कामकाज और संगठन का विस्तार दोनों मोर्चों पर एक साथ काम हो रहा है।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार जिन विकास परियोजनाओं, एक्सप्रेसवे, मेडिकल कॉलेज, धार्मिक पर्यटन, निवेश, कानून-व्यवस्था और बुनियादी ढाँचे के कार्यों को आगे बढ़ा रही है और संगठन उन्हें लोगों तक पहुँचाने का काम कर रहा है। भाजपा यह मानकर चल रही है कि यदि सरकार के काम का संदेश सीधे मतदाता तक पहुँचेगा तो उसका राजनीतिक लाभ भी मिलेगा। इसलिए कार्यकर्ताओं को केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रखा जा रहा बल्कि उन्हें लाभार्थियों से संपर्क और जनसंवाद की जिम्मेदारी भी दी जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि BJP अपने करीब 2.5 करोड़ प्राथमिक सदस्यों का एक डेटाबेस तैयार कर रही है और इसका मकसद हर एक वोटर तक पहुँचना है। इसके लिए प्रदेश पदाधिकारियों को जिलों में, जिला पदाधिकारियों को मंडलों में और मंडल स्तर के पदाधिकारियों को बूथों का दौरा कर सत्यापन रिपोर्ट प्रदेश कार्यालय भेजने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही वृक्षारोपण अभियान, डिजिटल प्रशिक्षण और कारगिल विजय दिवस जैसे आयोजनों के जरिए भी कार्यकर्ताओं को लगातार सक्रिय बनाए रखने की कोशिश हो रही है।

विदेश घूम रहे विपक्षी, नहीं मिल रहे मुद्दे

इन सबके बीच बड़ा सवाल विपक्ष की भूमिका को लेकर भी खड़ा होता है। क्योंकि चुनाव के बाद वोट चोरी से लेकर EVM हैकिंग जैसे आरोप राजनीतिक दल लगाते हैं तो आज वो दल क्या कर रहे हैं। एक तरफ भाजपा बूथ से लेकर मंडल और जिले तक पूरे संगठन को मैदान में उतार चुकी है तो वहीं दूसरी तरफ विपक्ष अभी तक प्रदेश में ठोस राजनीतिक एजेंडा ही तलाशता नजर आ रहा है।

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी दोनों हाल ही में विदेश यात्राओं से छुट्टी मनाकर लौटे हैं और अब उनके पास कोई ऐसा मुद्दा नहीं नजर आ रहा है जिसके दम पर योगी सरकार को लगातार घेरा जा सके।

एक असलियत यह भी है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय विपक्ष के लिए सरकार को घेरना पहले जितना आसान नहीं दिख रहा। कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भाजपा लगातार अपनी सख्त छवि पेश कर रही है। एक्सप्रेसवे, मेडिकल कॉलेज, निवेश, औद्योगिक परियोजनाएंँ धार्मिक पर्यटन और बुनियादी ढाँचे के विकास को सरकार अपनी उपलब्धियों के तौर पर सामने रख रही है।

भाजपा का संगठन इन्हीं उपलब्धियों को घर-घर तक पहुँचाने में लगा है। ऐसे में विपक्ष के पास फिलहाल ऐसा कोई बड़ा नैरेटिव नजर नहीं आता, जो इन दावों का प्रभावी राजनीतिक जवाब बन सके। केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया पोस्ट या सरकार विरोधी बयान चुनावी जमीन तैयार नहीं करते बल्कि उसके लिए बूथ स्तर तक सक्रिय संगठन और जनता के बीच लगातार मौजूदगी भी चाहिए। राजनीति में मैदान कभी खाली नहीं रहता… जो जमीन पर उतरता है, अक्सर बढ़त भी वही बना लेता है।

न POK की फिक्र, न बलूचिस्तान की चिंता! दिन-रात बस भारत में ‘सत्तापलट’ के सपने देख रहा पाकिस्तान, जानिए CJP प्रदर्शन में कैसे दी जा रही पल-पल की अपडेट

चाहे पाकिस्तान के पास खाने के लिए रोटी हो या न हो, पीने के लिए पानी हो या न हो या बेशक साँस लेने के लिए ऑक्सीजन ही न हो… पर ‘आतंकी मुल्क’ कभी भारत के मामलों में दखल देने से बाज नहीं आता। खुद चारों ओर से दुश्मनों से घिरा हुआ है, लेकिन पाकिस्तान को बात भारत की आंतरिक राजनीति पर करनी है। मुल्क की मीडिया की तर्जी भी भारत ही है, वह अपने देश के मुद्दों पर बोलने से ज्यादा भारत की नकारात्मक छवि बनाने में तुली रहती है। हाल फिलहाल में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) प्रदर्शन के कवरेज में भी यही हुआ।

जंतर-मंतर पर चल रहे CJP के प्रदर्शन की कवरेज पाकिस्तान की मीडिया जितनी कर रही है, शायद उतनी भारत की मीडिया भी न कर पा रही हो। क्योंकि प्रदर्शन में देखा गया कि ‘कॉकरोचों’ ने अपनी मीडिया के साथ क्या बदसलूकी की। पर उसी समय पाकिस्तान की मीडिया में जब इस प्रदर्शन की वाहवाही हो रही है, भारत का नाम बदनाम किया जा रहा है, अपने मंसूबे पूरे करने के लिए मोदी को सत्ता से गिराने की साजिशें रची जा रही हैं… तब भारत की मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ बोलने वाले इन ‘कॉकरोचों’ को शायद फर्क नहीं पड़ रहा।

गौरतलब है कि पिछले एक महीने से जंतर-मंतर पर CJP के नेतृत्व छात्र देश में NEET पेपर लीक और शिक्षा से जुड़े अन्य मुद्दों को लेकर बैठे हैं, शुरुआत में उनकी प्रमुख माँग शिक्षा मंत्री धर्मेंद प्रधान का इस्तीफा थी, जो अब बढ़कर पीएम मोदी के इस्तीफे तक पहुँच गई है। इसे बड़े स्तर पर ले जाने के लिए 20 जुलाई को CJP ने संसद मार्च का आह्वान किया था, इस मार्च से ठीक पहले प्रदर्शन में वामपंथी, आंदोलनजीवी, विपक्षी दल, हिंदू-विरोधी, दलिते-हितैषी, इस्लामी कट्टरपंथी जैसे सारे चेहरे देखने को मिले थे.. इन सबमें कॉमन यह था कि ये लोग मोदी सरकार के खिलाफ थे और नतीजा यह हुआ कि संसद मार्च के दौरान इनके समर्थकों ने सीजेपी के प्रदर्शन में हिंसा फैलाई।

पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की गई, पत्थर फेंके गए, लाठियाँ चलाई गईं, गालियाँ बकी गईं… जिसने शायद एक ‘असल छात्र’ को निराश किया और उसका इस प्रदर्शन से विश्वास हटा दिया। और अब यही अराजक तत्व पिछले तीन दिनों से सेंट्रल दिल्ली में रोजाना हिंसा फैला रहे हैं। बुधवार (22 जुलाई 2026) देर रात को ही इन हिंसक प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाबलों को सड़कों पर घसीटा और भीड़ में हिंसा की। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि सरकार पहले ही CJP के नेतृत्व से बातचीत कर माँगों को पूरा करने का आश्वासन दे चुकी है और अब पीएम मोदी ने भी युवाओं से फास्ट-ट्रैक बनाने का वादा किया है। बावजूद, जंतर-मंतर से भीड़ हटने का नाम नहीं ले रही।

पाकिस्तानी के प्रमुख मीडिया संस्थान CJP प्रदर्शन की रख रहे पल-पल की अपडेट

पाकिस्तान के प्रमुख मीडिया संस्थानों में जंतर-मंतर पर चल रहे CJP के प्रदर्शन की पल-पल की अपडेट रख रही है। मीडिया चैनलों पर लंबी-लंबी डिबेट हो रही हैं, भारत की इकोनॉमी पर बात की जा रही है… विश्लेषकों को बिठाकर प्रदर्शन के मुद्दे पर भारत की मोदी सरकार को नीचा दिखाने की कोशिश की जा रही है।

तीखी और आक्रामक हेडलाइन के साथ प्रदर्शन की कवरेज की जा रही है। हैरानी की बात यह है कि कवरेज भी केवल एकतरफा नैरेटिव के साथ की जा रही है, जो आज देश में हर वामपंथी द्वारा गड़ा जा रहा है। केवल पुलिस का प्रदर्शनकारियों पर बर्बरता, प्रदर्शन में शामिल भारी जनसंख्या, मोदी-विरोधी पोस्टर दिखाए जा रहे हैं।

नीचे इस फोटो कोलाज में DAWN की CJP प्रदर्शन की कवरेज के स्क्रीनशॉट हैं। DAWN की कवरेज में भी वही एकतरफा नैरेटिव दिखाई दे रहा है। थंबनेल, हेडलाइन और फीचर फोटो का कमाल दिखाकर पाठक को पहली नजर में ही भारत के खिलाफ करने की कोशिश की गई है।

(फोटो साभार: Dawn)

DAWN की कुछ प्रमुख खबरों की हेडलाइंस:

  • ‘कॉकरोच’ आंदोलन के विरोध-प्रदर्शनों के बाद बढ़ते दबाव के बीच, भारत के शिक्षा मंत्री ने सुधार और बहस का किया वादा (Under soaring pressure after ‘cockraoch’ movement protests, India’s education minister promises reforms, debate)
  • ‘कॉकरोच’ आंदोलन से बढ़े दबाव के बीच शिक्षा मंत्री ने सुधार और व्यापक चर्चा का किया वादा (India protest give opposition a rare opening against Modi)
  • “दिल्ली में संसद घेराव, प्रदर्शनकारियों ने की मोदी के इस्तीफे की माँग” (Parliament siege in delhi, Protestors Demand Modi’s Resignation)
  • “क्या यह भारत की GenZ क्रांति है?” (Is this India’s GenZ revolution?)
  • “मोदी सरकार पर बढ़ते दबाव के बीच भारत में युवा आंदोलन ने पकड़ी रफ्तार” (India’s Youth Movement Intensifies As Pressure Mounts on Modi Government)
  • “खाने, आक्रोश और दूर बैठे समर्थकों के सहारे जिंदा है भारत का आंदोलन” (Food, fury and supporters and far keep India protest alive)

नीचे दिखाया गया है फोटो कोलाज भी पाकिस्तान के ही प्रमुख मीडिया संस्थान Geo News की खबरों के स्क्रीनशॉट से बनाया गया है। इनके थंबनेल, कवर फोटो और हेडलाइंस को देखें, तो ‘झुकी हुई मोदी सरकार’, ‘पुलिस का प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज’, ‘राहुल गाँधी का संघर्ष’, ‘प्रदर्शन में शामिल हुए वामपंथी’ ही दिखाई देंगे, जिससे दर्शक देखते ही यह निष्कर्ष निकालेगा कि भारत की ‘मोदी सरकार कितनी अत्याचारी’ है।

(साभार: Geo News)

Geo News की कुछ प्रमुख खबरों की हेडलाइंस

  • “भारतीय सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों पर किया लाठीचार्ज” (Indian Security Forces Lathicharge Protestors)
  • “पूरे भारत में फैला छात्रों का विरोध-प्रदर्शन, नई दिल्ली धरना जारी” (Student Protests Spread Across India, Sit-in Continue in New Delhi)
  • “जंतर-मंतर पर CJP का विरोध प्रदर्शन: मोदी सरकार पर बढ़ता तनाव” (CJP Protest at Jantar Mantar: Modi Government Faces Growing Pressure)
  • “पुलिस कार्रवाई से बढ़ा गुस्सा, छात्र आंदोलन फैला; प्रदर्शनकारी पीएम मोदी के आवास तक पहुँचे” (Crackdown Ignites Anger: Student Protest Spread, Demonstrators Reach PM Modi’s Residence)
  • “खाने, आक्रोश और दूर बैठे समर्थकों के सहारे जिंदा है भारत का आंदोलन” (Food, fury and supporters and far keep India protest alive)
(साभार: ARY News)

ARY News की कुछ प्रमुख खबरों की हेडलाइंस:

  • “बढ़ते तनाव के बीच मोदी सरकार पर दबाव” (Modi Govenment Under Pressure Amid Rising Tensions)
  • “भारत में मोदी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन जारी” (Protest against Modi government continues in India)
  • “भारत में युवाओं के नेतृत्व वाला आंदोलन तेज, मोदी पर बढ़ा दबाव” (India’s Youth-Led Protests intensify, Pressure Mounts on Modi)
  • “भारत में युवाओं के नेतृत्व वाला ‘कॉकरोच’ आंदोलन पुलिस की सख्ती के बावजूद जारी” (India’s Youth-Led Cockroach Movement Defies Police Crackdown)
  • “भारत का युवा आंदोलन पकड़ रहा रफ्तार, राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी” (Indian Youth Movement Gains Momentum, Political Unrest Intensifies)

सिर्फ यही कुछ प्रमुख संस्थान नहीं, बल्कि पाकिस्तान की स्थानीय मीडिया और यूट्यूब चैनल भी भारत के CJP प्रदर्शन पर नजरें गढ़ाए बैठे हैं। ये मीडिया बड़ी-बड़ी डिबेट कर घंटों-घंटों तक CJP प्रदर्शन पर बात कर रही है। पैनलिस्ट में भी कोई आम आदमी नहीं बैठा है, बल्कि देश के पूर्व राजनयिक से लेकर बड़े-बड़े प्रोफेसर तक भारत के खिलाफ बोलने के लिए अपना समय दे रहे हैं।

(साभार: Youtube)

पाकिस्तानी मीडिया में CJP प्रदर्शन की कवरेज के मायने

पाकिस्तान के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने भारत में चल रहे CJP प्रदर्शन की कवरेज को प्राइम टाइम में जगह दी है। इससे साफ है कि उनके लिए पाकिस्तान की मीडिया भारत की आंतिरक राजनीति में खूब दखल देती है। इन कवरेज में यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की गई है कि ‘कॉकरोचों’ के आंदोलन के दबाव में भारत की मोदी सरकार झुकने को तैयार हो गई है, जबकि ऐसा नहीं हुआ है। सरकार ने ‘असल छात्रों’ की माँगों को ध्यान में रखते हुए कार्रवाई का आश्वासन दिया है। और यह वही नैरेटिव है जो 20 जुलाई को भी गढ़ा गया था, जब CJP के सौरव दास और आशुतोष रांका केंद्रीय मंत्री जेपी नेड्डा से मिलने पहुँचे थे।

मीडिया ने हेडलाइन का खेल करते हुए ही मोदी सरकार को इस छात्र आंदोलन का विलेन करार दिया है, जबकि सरकार ने हमेशा समाधान की बात की है। NEET पेपर लीक के बाद तुरंत RE-NEET की घोषणा कराई गई, और अब इस परीक्षा के रिजल्ट में साफ झलक रहा है कि असल छात्र दोबारा बिना गड़बड़ी के हुई NEET परीक्षा से खुश हैं, जबकि वामपंथी और विपक्षी दलों के विचारधारा से भड़के हुए छात्र के चेहरे में छिपे अराजक तत्व अब भी जंतर-मंतर पर ‘हिंसा के लिए उतारू’ हैं।

यह भी साफ हो गया है कि भारत में छोटे-से उथल-पुथल से पाकिस्तान कितना खुश हो रहा है। डिबेटों में भारक की इकोनॉमी पर चिंता जताई जा रही है, शिक्षा व्यवस्था पर बहसें हो रही हैं, पुलिस की प्रदर्शनकारियों पर बर्बरता पर संवेदनाएँ जताई जा रही हैं, भारत में बेरोजगारी की बातें हो रही हैं, और तो और यह बात तक हो रही है कि पीएम मोदी इसीलिए धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से नहीं हटा रहे हैं, क्योंकि ऐसा करने पर वे चुनाव हार जाएँगे।

निष्कर्ष: ‘कंगाल’ पाकिस्तान बना भारत का ‘हमदर्द’

असल विडंबना यह है कि जो पाकिस्तान की मीडिया भारत में एक छात्र आंदोलन पर घंटों को प्राइम टाइम में जगह दे रहा है, वही खुद अपने घर में नहीं झाँक रहा है। जब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में पिछले महीने से जारी प्रदर्शनों में दर्जनों नागरिकों को शहबाज सरकार की पुलिस गोलियों से भून देती है, तब इस मीडिया के लिए वो डिबेट का विषय नहीं बनती।

पूरी दुनिया जानती है कि अब PoK में प्रदर्शनों में 58 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1460 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है या वे लापता हैं। जो पाकिस्तानी मीडिया भारत के लिए एकतरफा खबरें चलाते हुए सिर्फ पुलिस का लाठीचार्ज को ‘अत्याचार’ बनाकर दिखाती है, उस मुल्क को PoK में प्रदर्शनकारियों पर तरस नहीं आता है क्या?

आर्थिक हालत की बात करें तो पाकिस्तान की हकीकत किसी से छिपी नहीं है। देश में करीब 40 प्रतिशत आबादी गरीबी में जी रही है, आर्थिक वृद्धि दर महज 3 प्रतिशत के आसपास सिमटी हुई है और लदभग एक तिहाई- बच्चे कुपोषण के चलते शारीरिक विकास में पिछड़ रहे हैं। यह वही मुल्क है जो 1958 से अब तक IMF से 24वां बेलआउट ले चुका है और कर्जों के चक्र से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं ढूँढ पा रहा है।

इस साल भी पाकिस्तान ने विदेशी कर्ज और रोलओवर के जरिए करीब 27.2 अरब डॉलर जुटाए, जिसमें से ज्यादातर हिस्सा नए कर्ज चुकाने में ही खप गया। यानी जो देश खुद अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा, वह भारत को आर्थिक नसीहत देने में जुटा है।

ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में खूब शांति है, मुल्क की शहबाज सरकार के खिलाफ चारों ओर प्रदर्शन और विद्रोह जारी है। एक तरफ बलूचिस्तान में BLA लड़ाकों का उभार, दूसरी तरफ TTP के हमले, तीसरी तरफ PoK में जनता का गुस्सा, और अब विपक्ष भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। पर मीडिया यह दिखाने से परहेज करता है, क्योंकि असल में अपनी भीतर की आग से जनता का ध्यान भटकाने के लिए भारत को निशाना बनाता है।

वही मीडिया भारत में एक प्रदर्शन को ‘जनक्रांति’ बताने वाली पाकिस्तानी मीडिया अपने घर में उठ रही आवाजों को ‘देशद्रोही’ करार देकर कुचल देती है। यही दोहरा रवैया पाकिस्तान की असली पहचान है।

कुल मिलाकर, जो मुल्क खुद रोटी, पानी और आर्थिक स्थिरता के लिए मोहताज है, वह भारत का ‘हमदर्द’ बनने का स्वाँग रचकर असल में अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक प्रदर्शन सरकार से बातचीत और सुधार तक पहुँच जाता है, जबकि पाकिस्तान में वही आवाजें गोलियों और गिरफ्तारियों में दब जाती हैं। यही फर्क है भारत और पाकिस्तान की सच्चाई में।

मस्जिद का किया बखान, हनुमान मंदिर पर हमले की छिपाई बात: CJP की हिंसक भीड़ को पनाह न मिलने पर राणा अय्यूब जैसों की निकली कुंठा, पढ़िए कैसे नफरत फैलाई

दिल्ली के जंतर-मंतर पर जून 2026 से जारी कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन में भूख हड़ताल, सोशल मीडिया अभियान, राजनीति और खुलेआम हिंदू-विरोधी भावना दिख रही है। इस्लामी-वामपंथी ग्रुप हिंदुओं को खलनायक के तौर पर पेश करने में लगे हुए हैं। उनका दावा है कि 20 जुलाई को हुई हिंसा के दौरान मस्जिद- गुरुद्वारे ने तो सीजेपी प्रदर्शनकारियों को शरण देने के लिए अपने द्वार खोल दिए, लेकिन हनुमान मंदिर ने ऐसा नहीं किया।

यह दावा किया गया है कि गुरुद्वारा बंगला साहिब और उससे नजदीक मौजूद मस्जिद ने सीजेपी के प्रदर्शनकारियों को उस वक्त शरण दी, जब दिल्ली पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया था, लेकिन प्राचीन हनुमान मंदिर का दरवाजा बंद था। दरअसल मामला उस वक्त शुरू हुआ जब कई राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं सहित ‘प्रदर्शनकारियों’ ने पत्थर फेंके थे।

कई इस्लामी-वामपंथियों ने दावा किया कि कनॉट प्लेस के पास विरोध स्थल के नजदीक होने के बावजू प्राचीन हनुमान मंदिर ने सीजेपी के कोकरोचों को शरण नहीं दी।

‘पत्रकार’ नेहा दीक्षित ने X पर लिखा, “मध्य दिल्ली के गुरुद्वारे और मस्जिद ने घायल प्रदर्शनकारियों के लिए अपने द्वार खोल दिए। पास स्थित हनुमान मंदिर ने इसके बजाय अपने द्वार क्यों बंद कर दिए?”

क्राउडफंडिंग घोटाले के आरोपी इस्लामी-वामपंथी राणा अय्यूब ने दीक्षित के पोस्ट पर व्यंग्य करते हुए कहा कि ‘गलती से कोई दलित ना चला जाए’। ये जातिगत टिप्पणी थी

एक वीडियो में सीजेपी के कुछ प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि उन्हें प्रवेश करने से रोकने के लिए मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए गए थे।

इस वीडियो पर कुख्यात इस्लामी समर्थक तरुण गौतम ने भी कमेंट किया। उसने लिखा, “घायल प्रदर्शनकारियों को देखकर पुजारियों ने मंदिर का द्वार बंद कर दिया, वहीं गुरुद्वारों ने न केवल छात्रों को अंदर आने दिया, बल्कि उनकी रक्षा की। उन्हें भोजन कराया और उन्हें आश्रय दिया।”

सोशल मीडिया पर इस तरह की कई पोस्ट भरी पड़ी हैं, जिनमें यह झूठी कहानी फैलाई जा रही है कि प्राचीन हनुमान मंदिर ने सीजेपी प्रदर्शनकारियों के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए, जबकि ‘धर्मनिरपेक्षता और मानवता के प्रतीक’ मस्जिद और गुरुद्वारों ने अपने द्वार खोल दिए।

इस्लामी-वामपंथियों ने हिंदू मंदिर के खिलाफ जम कर बयानबाजी की, लेकिन इन लोगों ने ‘असली वजह’ नहीं बताई। ऑपइंडिया ने जब जमीनी सच्चाई का पता लगाया तो एक अलग पहलू उजागर हुआ।

ऑपइंडिया से बातचीत में प्राचीन हनुमान मंदिर प्रशासन ने बताया कि मंदिर के द्वार दस मिनट के लिए बंद कर दिए गए थे, ताकि मंदिर के अंदर मौजूद श्रद्धालुओं को हिंसा से बचाया जा सके। इन इलाकों में ही पत्थरों से भरे बैग लाए गए थे, जिनका इस्तेमाल हिंदू मंदिर पर और उसके आसपास किया जा रहा था।

इसके अलावा, दिल्ली पुलिस के निर्देश पर मंदिर के द्वार बंद कर दिए गए थे। लेकिन, किसी को भी मंदिर में जाने से नहीं रोका गया था।

जबकि इस्लामी-वामपंथी हिंदू मंदिर को कॉकरोचों को शरण न देने के लिए निशाना बना रहे हैं, उनमें से किसी ने भी यह कहने की जुर्रत नहीं की कि इसी मंदिर और उसके आसपास के क्षेत्र पर नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया।

20 जुलाई को प्राचीन हनुमान मंदिर के आसपास सीजेपी समर्थकों ने पत्थरबाजी की और इसका भी वीडियो मौजूद हैं। ऐसे हालात में मंदिर प्रशासन अपने परिसर को उपद्रवी दंगाइयों के लिए खुला क्यों छोड़ेगा ताकि वे मंदिर पर हमला करें, तोड़फोड़ करें और निर्दोष लोगों को निशाना बनाएँ?

मंदिर अधिकारियों ने बुनियादी सुरक्षा और आत्मरक्षा के उपाय के तौर पर द्वार बंद कर दिए, क्योंकि परिसर पर और उसके आसपास भारी पथराव हो रहा था। हिंसक भीड़ को प्रवेश की अनुमति देना एक तरह से तोड़फोड़, अपवित्रता को बुलावा देने जैसा था। ऐसे में उन लोगों के जीवन भी खतरे में पड़ जाते जिनका विरोध प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं था और वे मंदिर में पूजा करने पहुँचे थे।

हिंदू मंदिर में पत्थर फेंकने वालों या ‘विरोध’ के नाम पर पत्थर फेंकने वालों का समर्थन करने वालों को किसी भी हालत में जगह नहीं दी जानी चाहिए। ‘शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शन’ का पूरा मुखौटा उस क्षण धराशायी हो गया, जब सीजेपी के प्रदर्शनकारियों ने पत्थर फेंके और पुलिस पर हमला किया। इसकी वजह से हिंसा हुई और पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और आँसू गैस के गोले दागने पड़े।

इस्लामी-वामपंथी गुट का पाखंड हिंदुओं को खलनायक के रूप में पेश करना और उन्हें दोषी ठहराना हास्यास्पद है। वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वैज्ञानिक सोच आदि के नाम पर हिंदुओं के खिलाफ हमेशा जहर उगलते हैं और हिंदू धर्म का उपहास करते हैं और मदद की उम्मीद भी करते हैं।

इस्लामी-वामपंथी जिन गुरुद्वारों और मस्जिदों को ‘अल्पसंख्यक धार्मिक स्थलों द्वारा दिखाई गई मानवता’ बताकर उनकी सराहना कर रहे हैं, उन पर कोई हमला नहीं हुआ। गुरुद्वारे या किसी मस्जिद पर या उसके आसपास पत्थर नहीं फेंके गए।

इसके अलावा, मुस्लिम का एक बड़ा हिस्सा भाजपा विरोधी है और मोदी सरकार के पतन की कामना करता है। वास्तव में, इस्लामी कट्टरपंथी खुलेआम कहते हैं कि ‘निजाम’ बदलेगा। अयोध्या राम मंदिर को ध्वस्त करके बाबरी मस्जिद का पुनर्निर्माण किया जाएगा। राम मंदिर को वे मोदी सरकार द्वारा निर्मित मानते हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि किसी मस्जिद ने उन लोगों को पनाह दी हो जो सड़कों पर उतरकर केंद्र सरकार का हिंसक विरोध कर रहे हैं।

इस्लामी-वामपंथियों को भी तलवारें लहराते निहंगों के सीजेपी विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन अगर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने हथियारों के साथ जवाबी विरोध प्रदर्शन किया होता, तो हिंदू-विरोधी गुट उन्हें ‘भगवा आतंकवादी’ करार दे देता।

वामपंथी-लिबरल ग्रुप ने बड़ी चालाकी से प्राचीन हनुमान मंदिर पर और उसके आसपास पत्थरबाजी के बड़े मुद्दे से ध्यान हटाकर, उसी मंदिर पर निशाना साधना शुरू कर दिया, जिसमें प्रदर्शनकारियों को शरण नहीं दी गई थी।

चाहे वह बांग्लादेश हो, जहाँ सरकार विरोधी ‘छात्र विरोध प्रदर्शन’ हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हमले में परिणत हुए, या सीजेपी का ‘चलो संसद’ विरोध प्रदर्शन हो, किसी न किसी तरह हिंदू और हिंदू धर्म को ही निशाना बनाया जाता है।

सीजेपी का विरोध प्रदर्शन एनईटी पेपर लीक, परीक्षा अनियमितताओं और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर था। लेकिन सीजेपी की अगुवाई इस्लामी-वामपंथी ग्रुप ने की, जो हिंदू विरोधी नफरत फैलाने के लिए कुख्यात हैं।

अभिनेता प्रकाश राज सीजेपी के समर्थन में इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। यूँ भी वो सनातन धर्म (हिंदू धर्म) को मिटाने की बात करते हैं। जेएनयू की पूर्व प्रोफेसर निवेदिता मेनन ने सीजेपी का समर्थन किया। उन्होंने ‘लव जिहाद’ और इससे पीड़ित हिंदुओं का मजाक उड़ाया था। ‘कॉमेडियन’ कुणाल कामरा ने सीजेपी के विरोध प्रदर्शन मंच से माता सीता के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की। बर्गर खाने को लेकर सीजेपी से निष्कासित सदस्य विजेता दहिया ने हिंदू विरोधी टिप्पणी की। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिता नारायण ने ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ गाया और पाकिस्तानी कवि फैज अहमद फैज की इस्लामी वर्चस्ववादी और मूर्ति तोड़ने वालों को महिमामंडित करने वाली कविता ‘हम देखेंगे’ की तारीफ की। वहीं वामपंथी छात्र ग्रुप ‘आजादी-आजादी’ और ‘ब्राह्मणवाद से आजादी’ जैसे आपत्तिजनक नारे लगाए।

एक ओर जहाँ एक कॉकरोच ने अपमानजनक टिप्पणी करते हुए कहा, ‘राम मारे हुए हैं’, वहीं दूसरे ने कहा ‘राम मंदिर या जो भी बकवास हो…’।

एक सीजेपी प्रदर्शनकारी ने तो यहाँ तक ​​कह दिया कि ‘मुस्लिम हिंदुओं से एक लाख गुना बेहतर हैं’।

अब निष्कासित हो चुकी सीजेपी नेता विजेता दहिया से लेकर सीजेपी के कई भ्रष्ट नेताओं तक, सभी ने खुलेआम हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति अपनी नफरत जाहिर की है। फिर भी मंदिरों से शरण की उम्मीद रखते हैं।

इसी बीच राणा अय्यूब जैसे ऑनलाइन इस्लामी-वामपंथियों ने चतुराई से जाति आधारित व्यंग्य कर हिन्दुओं को और बदनाम करने की कोशिश की। उसकी मंशा हिन्दुओं को जातियों में विभाजित करने की ही लगती है।

इससे साफ है कि वामपंथी उदारवादी उतने ही ‘धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु’ हैं, जितना कि सीजेपी का विरोध प्रदर्शन ‘गैर-राजनीतिक और शांतिपूर्ण’ है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

चेहरे चमक गए, पर मुद्दे धुंधले पड़े: CJP की अंदरूनी लड़ाई ने आंदोलन की साख पर उठाए सवाल, छात्रों के टूटते भरोसे की कहानी

नीट पेपर लीक विवाद और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले छात्र दिल्ली की सड़कों पर उतरे, तो यह आंदोलन कुछ ही दिनों में चर्चा का विषय बन गया। अभिजीत दिपके, सौरव दास, विजेता दहिया जैसे चेहरों और सोनम वांगचुक के अनशन से प्रभावित हो कई युवा जंतर-मंतर पहुँचने लगे।

लेकिन अब जब इस प्रदर्शन को चलते हुए करीब 25 दिन हो गए हैं तो वे छात्र खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। पार्टी के भीतर आंतरिक कलह मच गई है, भरोसा टूट रहा है और नेता इन युवाओं को बस उकसाने में लगे हैं।

CJP में हुई पहली बड़ी टूट की शुरुआत एक वायरल वीडियो से हुई। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता विजेता दहिया का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे संसद मार्च के दौरान प्रदर्शन स्थल से हटकर बर्गर खाते नजर आए। यह वीडियो ठीक उसी वक्त वायरल हुआ, जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प चल रही थी और कई छात्र आँसू गैस व कथित लाठीचार्ज का सामना कर रहे थे। CJP ने इसे ‘असंवेदनशील आचरण’ बताते हुए विजेता दहिया को इस प्रदर्शन से अलग कर दिया।

अब यह आंदोलन छात्रों की समस्या से कहीं हटकर इन लोगों को खुद को चमकाने का मौका लग रहा था, तो ऐसे में अलग होने पर दहिया भी उखड़ गए। उन्होंने भी एक वीडियो जारी कर दिपके को आड़े हाथों लिया। दहिया ने अब अपनी वीडियो में कहा है कि उन्हें बर्गर खाने के लिए निकाल दिया गया लेकिन उन्होंने दिपके का कचौड़ी खाने पर बचाव किया था।

दहिया ने कहा, “अभी भी लोग कह रहे हैं कि अभिजीत ट्रक पर चढ़ गया, उस पर मैंने तेरा बचाव किया है कि थप्पड़ भी तो उसे ही लगा था। मेरे साथियों ने ही ‘बलि का बकरा’ बना दिया तो थोड़ा बुरा तो लगा।” दहिया बेशक इसे थोड़ा बुरा लगना बता रहे हैं लेकिन उनके वायरल वीडियो दिखा रहे हैं कि मामला ज्यादा गंभीर है।

दहिया ने एक चैनल से बातचीत में कहा, “अभिजीत को लगा कि नहीं विजेता आंदोलन के लिए सही है कि आप इस्तीफा दे तो। तो मैंने कहा कि देखो इस्तीफा तो मैं नहीं दूँगा, ऐसा करो कि तुम ही मुझे निकाल दो, फिर उन्होंने ऐसा ही किया।”

असल में जब कोई ऐसा आंदोलन अचानक बड़ा रूप ले लेता है, तो नेतृत्व, अनुशासन और जवाबदेही को लेकर भीतर ही भीतर टकराव शुरू हो जाता है। डिजिटल स्टारडम हासिल करना आसान है लेकिन जमीन पर संगठन और नैतिक जवाबदेही बनाए रखना कहीं ज्यादा मुश्किल परीक्षा साबित होती है। यही कारण है कि यह घटना केवल एक व्यक्ति को निकालने की खबर नहीं है बल्कि CJP के भीतर मौजूद महत्वाकांक्षाओं का पहला सार्वजनिक विस्फोट है।

जिस तरह इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल से लेकर वामपंथी पार्टियों, सपा और TMC के नेता पहुँचे हैं उससे साफ लग रहा है कि यह अब छात्रों का आंदोलन नहीं रहा है बल्कि एक राजनीतिक आंदोलन बन गया है। जो भीड़ ‘आम छात्रों’ के नाम पर जंतर-मंतर और संसद मार्च में जुटी उसमें सपा, AAP, आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता और जेएनयू-डीयू-जामिया जैसे संस्थानों के वामपंथी छात्र संगठन भी बड़ी संख्या में शामिल थे। इसके बाद जो इस आंदोलन में बदलाव देख रहे थे वो भी निराश होने लगे हैं।

इनमें से कुछ छात्र जो असल में परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पेपर लीक पर जवाबदेही जैसे मुद्दों पर आए थे उन्हें अब दिखने लगा है कि चर्चा का केंद्र बिंदु धीरे-धीरे शिक्षा से हटकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, नेताओं की मौजूदगी, प्रवक्ता के निष्कासन और हिंसा की घटनाओं पर सिमटता चला गया है।

वीरू भाई नामक एक युवक एक आंदोलन में लंबे समय तक सक्रिय था लेकिन अब उसने निराशा में खुद को इस आंदोलन से अलग कर लिया है। वीरू भाई का कहना है कि पुलिस के साथ झड़प के समय कोई भी बड़ा नेता आगे नहीं आया। आयोजकों ने खुद पीछे रहकर महिला प्रदर्शनकारियों को सबसे आगे धकेल दिया। इसी कारण भटके नौजवानों और युवाओं ने पहली बार आंदोलन में भाग लिया और अंत में उन्हें परेशानी का सामना खुद करना पड़ा।

उनका सीधा आरोप है कि खुद को गैर-राजनीतिक बताने वाली सीजेपी असल में आम आदमी पार्टी (AAP) की ‘बी-टीम’ की तरह काम कर रही है। उन्होंने आंदोलन में असामाजिक तत्वों के घुसने का भी दावा किया है। यह निराशा केवल वीरू की नहीं है, दर्जनों ऐसे वीरू हैं जिनके वीडियो सोशल मीडिया पर भरे पड़े हैं।

जब आंदोलन के भीतर से ही अनुशासनहीनता, आपसी अविश्वास और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगें तो जमीन पर मौजूद आम प्रदर्शनकारी के मन में यह सवाल उठता ही है कि क्या यह नेतृत्व वाकई उनके मुद्दों के प्रति गंभीर है या यह वो सिर्फ अपनी डिजिटल लोकप्रियता की मौज ले रहे हैं।

किसी भी जन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी नैतिक साख और उसका मूल उद्देश्य होता है। CJP के मामले में यह दोनों चीजें एक साथ खतरे में हैं। एक तरफ नेतृत्व के भीतर अनुशासन और जवाबदेही को लेकर उठे सवाल संगठन की आंतरिक मजबूती पर सवाल खड़ा करते हैं। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी और उससे जुड़े आरोप इस आंदोलन की ‘स्वतंत्र छात्र आंदोलन’ वाली पहचान को धुँधला कर दिया है।

सोशल मीडिया के दौर में किसी आंदोलन को रातों-रात लोकप्रियता और डिजिटल समर्थन मिल सकता है लेकिन उसे लंबे समय तक अनुशासित, केंद्रित और राजनीति से दूर रखना बहुत मुश्किल काम है। इन सबमें सबसे ज्यादा नुकसान उन आम छात्रों का हुआ है, जो ईमानदारी से अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद लेकर सड़कों पर उतरे थे।

ये बात सही है कि सिस्टम में खामियाँ हैं, पेपर लीक हुए हैं। और अगर परीक्षा प्रणाली में खामियाँ हैं तो उनका समाधान राजनीतिक टकराव से नहीं बल्कि सिस्टम में सुधारों से ही निकलेगा। वरना ऐसे आंदोलनों के नाम पर भीड़ इकट्ठा हो तो जाएगी लेकिन उसका फायदा नेता बस अपनी नेतागिरी के लिए उठाएँगे और आम जन केवल ठगे जाएँगे।

CJP प्रोपेगेंडा आपकी टाइमलाइन तक कैसे पहुँच रहा? समझिए Meta का एल्गोरिदम और मॉडरेशन कैसे साध रहे ग्लोबल लेफ्ट का नैरेटिव

पिछले कुछ दिनों में कई सोशल मीडिया यूजर्स ने शिकायत की है। उनका कहना है कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनों से जुड़े वीडियो और पोस्ट जबरन उनके फीड पर दिखाए जा रहे हैं। यह कंटेंट उन लोगों को भी दिखाई दे रहा है जो CJP के अकाउंट्स को फॉलो नहीं करते हैं। ऐसे लोग जो इस तरह का राजनीतिक कंटेंट नहीं देखते या जिन्होंने हाल ही में अपने अकाउंट बनाए हैं, उन्हें भी ये पोस्ट दिख रहे हैं।

X (ट्विटर) की एक यूजर मोहिनी ने अपनी पोस्ट में इस बात को उठाया है। उन्होंने लिखा, “पिछले कुछ दिनों में मेटा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर CJP के नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए एल्गोरिदम के साथ चालाकी की गई है। खासतौर पर इंस्टाग्राम पर युवा पीढ़ी के बीच अराजकता और अशांति फैलाने के लिए एक स्पॉन्सर्ड कैंपेन चलाया जा रहा है।”

एक अन्य यूजर ‘ऑलवेज4राइट’ ने कहा, “इंस्टाग्राम पूरी तरह से हाईजैक हो चुका है। इस पर ज्यादातर पुलिस विरोधी और सरकार विरोधी बातों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसकी वजह से पुलिस के खिलाफ हिंसा का माहौल बन रहा है।”

‘अश्विनी’ नाम के X यूजर ने लिखा, “इंस्टाग्राम पर CJP प्रदर्शन के समर्थन वाले कंटेंट को जबरदस्ती आगे बढ़ाया जा रहा है।” उन्होंने सरकार से इस पर तुरंत कार्रवाई करने की माँग की।

वहीं ‘Shush’ नाम के एक और यूजर ने कहा, “इंस्टाग्राम ने CJP प्रदर्शनों के हक में एल्गोरिदम के जरिए पूरा प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया है। भारत को नेपाल या बांग्लादेश जैसा बनाने की योजना चालू हो चुकी है। इसका बहुत गंभीरता से जवाब देने की जरूरत है।”

‘रिवोल्यूशनमोंक’ नाम के यूजर ने अपनी डिटेल्ड पोस्ट्स में पूरी बात समझाई है। उन्होंने बताया कि अगर लोग किसी CJP अकाउंट को फॉलो या लाइक नहीं भी करते, तब भी उनके फीड में ये रील्स लगातार आ रही हैं। उन्होंने लिखा, “इसकी वजह यह है कि CJP के पास राज्य स्तर के सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर्स का एक बड़ा नेटवर्क है। ये लोग इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर्स के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।” उन्होंने आगे बताया कि 5,000 रुपए से शुरुआत करके पैसे देकर ऐसे पोस्ट करवाए जा रहे हैं।

अपनी अगली पोस्ट्स में उन्होंने कई इंस्टाग्राम अकाउंट्स के स्क्रीनशॉट्स भी शेयर किए। इन स्क्रीनशॉट्स में एक जैसा कंटेंट दिख रहा था, जिससे उनकी बात को बल मिलता है।

अब फेसबुक, इंस्टाग्राम और यहाँ तक कि X पर एक ही राजनीतिक नैरेटिव का बार-बार दिखना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। सवाल यह है कि क्या यह कंटेंट सिर्फ इसलिए वायरल हो रहा है क्योंकि लोग इसे देखना चाहते हैं? या फिर सोशल मीडिया का एल्गोरिदम खुद इसे नए और अनजान लोगों तक जबरदस्ती पहुँचा रहा है?

इसका जवाब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के काम करने के तरीके में छुपा है। फेसबुक और इंस्टाग्राम सिर्फ वही पोस्ट नहीं दिखाते जिन्हें यूजर फॉलो करता है। मेटा खुद यह तय करता है कि कौन सा राजनीतिक कंटेंट लोगों को दिखाया जाए। वही तय करता है कि गैर-फॉलोअर्स को किसकी पोस्ट दिखेगी और कौन से इशारे यह बताने के लिए काफी हैं कि यूजर किसी राजनीतिक अभियान में दिलचस्पी रख रहा है।

कंपनी ने इन नियमों को कई बार बदला है। इससे भी अहम बात यह है कि खुद मेटा ने माना है कि वह अब सीधे और अप्रत्यक्ष इशारों के आधार पर ज्यादा राजनीतिक कंटेंट रिकमेंड कर रहा है। आसान शब्दों में कहें तो किसी पोस्ट को ‘लाइक’ करना एक सीधा इशारा है। वहीं किसी वीडियो को सिर्फ ‘रुककर देखना’ एक अप्रत्यक्ष इशारा माना जाता है।

इसी वजह से किसी यूजर के लिए CJP का समर्थक होना, उसके अकाउंट फॉलो करना या प्रदर्शन के बारे में खोजना जरूरी नहीं है। अगर कोई यूजर सिर्फ एक नाटकीय वीडियो देखने के लिए भी रुक जाता है, तो मेटा उसके फीड में वैसे ही कंटेंट की भरमार शुरू कर देता है।

मेटा ने खुद माना है कि वह यूजर्स को राजनीतिक कंटेंट रिकमेंड करता

साल 2021 में मेटा ने अपने प्लेटफॉर्म्स पर दिखने वाले राजनीतिक और नागरिक मामलों से जुड़े कंटेंट को कम करना शुरू किया था। बाद में उसने राजनीतिक पोस्ट की रैंकिंग तय करते समय कमेंट्स और शेयर्स को दी जाने वाली अहमियत भी घटा दी थी। कंपनी का कहना था कि यूजर्स नहीं चाहते कि उनके फीड पर राजनीतिक बातें छाई रहें।

जनवरी 2025 में यह स्थिति पूरी तरह बदल गई। मेटा ने ऐलान किया कि वह एक ‘ज्यादा पर्सनल तरीके’ से फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर राजनीतिक कंटेंट को वापस लाना शुरू करेगा। उसने कहा कि पोस्ट को लाइक करने जैसे सीधे इशारों और किसी पोस्ट को सिर्फ देखने जैसे अप्रत्यक्ष इशारों के आधार पर कंटेंट की रैंकिंग होगी। मेटा ने यह भी कहा कि वह इन इशारों के आधार पर ज्यादा राजनीतिक कंटेंट रिकमेंड करेगा।

मेटा ने साल 2025 में जो कहा था, वह यह समझने के लिए बेहद जरूरी है कि CJP के वीडियो अनजान खातों तक कैसे और क्यों पहुँच रहे हैं।

हो सकता है कि कोई इंसान वीडियो इसलिए देखे क्योंकि उसमें पुलिस पर हमला हो रहा हो। दूसरा इंसान प्रदर्शनकारियों के बर्ताव से हैरान होकर उसे देख सकता है। कोई तीसरा इंसान यह जानने के लिए रुक सकता है कि घटना कहाँ हुई है। मेटा का सिस्टम यह सही-सही तय नहीं कर सकता कि हर इंसान ने वह क्लिप क्यों देखी। वह सिर्फ इतना दर्ज करता है कि उस कंटेंट ने यूजर का ध्यान खींचा है।

जैसे ही कोई यूजर रुकता है, वीडियो देखता है, कमेंट सेक्शन खोलता है या उस अकाउंट पर जाता है, प्लेटफॉर्म को कई इशारे मिल जाते हैं। इसके बाद वह यूजर को दूसरा प्रदर्शन वाला वीडियो दिखा सकता है। फिर उसी मुद्दे पर बात करने वाला कोई और अकाउंट भी सामने ला सकता है।

मेटा का अपना हेल्प सेंटर भी यही कहता है। इंस्टाग्राम पर सजेस्टेड पोस्ट्स यूजर की पुरानी एक्टिविटी, उसके कनेक्शंस, पोस्ट की जानकारी और शेयर करने वाले अकाउंट की लोकप्रियता देखकर चुनी जाती हैं। यह खास तौर पर यह भी देखता है कि दूसरे लोग उस पोस्ट के साथ कैसे जुड़ रहे हैं। यह सजेस्टेड कंटेंट आपके मेन फीड, एक्सप्लोर सेक्शन और रील्स में दिख सकता है।

आसान शब्दों में कहें तो, CJP के वायरल कंटेंट को लोगों के ढूँढने का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। मेटा खुद इसे सीधे उनके सामने लाकर परोस देता है।

AI से बनाई गई तस्वीर

एल्गोरिदम यह नहीं समझता कि यूजर प्रदर्शन का समर्थन कर रहा है या उसकी निंदा कर रहा है

सोशल मीडिया कंपनियाँ अक्सर अपने रिकमेंडेशंस को यूजर की दिलचस्पी का एक निष्पक्ष जवाब मानती हैं। लेकिन यहाँ ‘दिलचस्पी’ की परिभाषा बहुत ज्यादा बड़ी और खतरनाक है। अगर कोई यूजर CJP के वीडियो पर गुस्से में कमेंट कर रहा है, तो वह भी एक कमेंट ही है। अगर कोई इंसान प्रदर्शनकारियों की निंदा करने के लिए क्लिप शेयर कर रहा है, तो वह भी शेयर ही कर रहा है। कोई व्यक्ति क्या हुआ यह समझने के लिए हिंसा का वीडियो बार-बार देख रहा है, तो वह भी उसका वॉच टाइम ही बढ़ा रहा है।

रिकमेंडेशन सिस्टम के लिए ये सभी काम यह दर्शाते हैं कि वह पोस्ट बाकी लोगों को दिखाने लायक और काम की है।

साल 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान एक रिसर्च की गई थी। इसमें फेसबुक और इंस्टाग्राम के एल्गोरिदम वाले फीड की जगह समय के हिसाब से (क्रोनोलॉजिकल) फीड दिया गया था। इससे यूजर्स का प्लेटफॉर्म पर बिताया जाने वाला समय और उनकी एक्टिविटी काफी कम हो गई। इसके साथ ही उनके सामने आने वाले राजनीतिक कंटेंट का तरीका भी पूरी तरह बदल गया। शोधकर्ताओं को राजनीतिक सोच में तो तुरंत कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि एल्गोरिदम यह तय करता है कि यूजर्स क्या देखेंगे और वे प्लेटफॉर्म पर कैसा बर्ताव करेंगे।

20.8 करोड़ फेसबुक यूजर्स के डेटा पर की गई एक और स्टडी में भी बड़ी बात सामने आई। जैसे-जैसे शोधकर्ताओं ने देखा कि यूजर क्या देख सकता था, एल्गोरिदम ने उसे असल में क्या दिखाया और फिर उसने किस चीज पर क्लिक किया, वैसे-वैसे लोगों के बीच वैचारिक दूरी और बँटवारा बढ़ता चला गया।

मुद्दा एकदम साफ और सीधा है। मेटा का एल्गोरिदम सिर्फ राजनीतिक माहौल को दिखाता भर नहीं है। वह यह खुद तय करता है कि किस कंटेंट को ज्यादा से ज्यादा लोग देखेंगे और इस तरह वह पूरे माहौल को ही बदल देता है।

CJP का प्रोपेगेंडा भले ही उसके आयोजकों और समर्थकों से शुरू होता हो। लेकिन इस नाटक और उग्रता वाले वीडियो को शुरुआत में जैसे ही थोड़ा अटेंशन मिलता है, रिकमेंडेशन सिस्टम इसे पकड़ लेता है और बहुत बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचा देता है।

मेटा खुद एल्गोरिदम तैयार करता है और वह राजनीतिक नतीजों को बदल सकता है

‘एल्गोरिदम’ को एक ऐसी स्वतंत्र मशीन की तरह देखना गलत होगा जिस पर मेटा का कोई नियंत्रण नहीं है।

मेटा खुद यह तय करता है कि कौन से इशारे उसके लिए मायने रखते हैं। वही यह फैसला करता है कि कमेंट्स, शेयर्स, देखने का समय, नेगेटिव फीडबैक या सर्वे के जवाब राजनीतिक रिकमेंडेशंस को प्रभावित करेंगे या नहीं। इसके साथ ही वह यह भी तय करता है कि किस तरह का कंटेंट उन लोगों तक पहुँचना चाहिए जो मूल अकाउंट को फॉलो नहीं करते हैं।

साल 2022 में मेटा ने कहा था कि उसने वैश्विक स्तर पर राजनीतिक कंटेंट पर कमेंट्स और शेयर्स को दी जाने वाली अहमियत कम कर दी है। साल 2023 तक कंपनी ने कहा कि वह एंगेजमेंट पर आधारित रैंकिंग से हटने की कोशिश कर रही है। उसने उन सर्वे को ज्यादा अहमियत देने की बात कही जिनमें यूजर्स बताते हैं कि उनके लिए क्या जानकारीपूर्ण या अर्थपूर्ण है।

साल 2024 में मेटा ने इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर अनफॉलो किए गए अकाउंट्स से राजनीतिक कंटेंट के सीधे रिकमेंडेशन को सीमित कर दिया था। इसके बाद साल 2025 में उसने अपना फैसला बदल दिया और राजनीतिक रिकमेंडेशंस को ज्यादा पर्सनल बना दिया। वर्तमान में फेसबुक पर पॉलिटिकल-कंटेंट कंट्रोल डिफ़ॉल्ट रूप से चालू रहता है। यानी अगर कोई यूजर कम राजनीतिक कंटेंट देखना चाहता है, तो उसे खुद सेटिंग्स में जाकर इसे बदलना होगा।

ये सारे बदलाव साबित करते हैं कि राजनीतिक कंटेंट का ज्यादा दिखना सिर्फ लोगों की दिलचस्पी की वजह से नहीं है। यह पूरी तरह से कंपनी की अपनी नीतियों और फैसलों का नतीजा है।

मेटा को यह आदेश देने की जरूरत बिल्कुल नहीं है कि CJP को प्रमोट किया जाए। उसे बस इसके वीडियोज को रिकमेंडेशन के लायक राजनीतिक कंटेंट की कैटेगरी में डालना होता है। इसके बाद एंगेजमेंट के इशारे खुद-ब-खुद इन वीडियोज को अनजान लोगों के फीड में धकेल देते हैं।

पुलिस को हमलावर दिखाने वाले फुटेज को अपने आप ही ज्यादा फायदा क्यों मिलता है, ये है वजह

इस विवाद की एक और गहरी परत है। हिंसा की एक ही घटना को अलग-अलग तरीके से देखा जा सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हिंसा कौन कर रहा है और पोस्ट को कैसे पेश किया गया है।

अगर किसी वीडियो में पुलिस प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग करती दिखती है, तो उसे पुलिस की बर्बरता, नागरिक अधिकारों के हनन या सरकारी दमन के रूप में पेश किया जा सकता है। इसलिए ऐसे वीडियो को खबर के लिहाज से जरूरी मानकर आसानी से दिखाया जाता है।

दूसरी तरफ, अगर किसी फुटेज में प्रदर्शनकारी पुलिस पर हमला करते नजर आते हैं, तो उसे हिंसक कंटेंट की कैटेगरी में डाल दिया जाता है। अगर वीडियो में कोई अलगाववादी या चरमपंथी संगठन दिखता है, तो बात और ज्यादा बिगड़ जाती है। तब इसे किसी खतरनाक संगठन के समर्थन, महिमामंडन या प्रदर्शन के दायरे में मान लिया जाता है।

मेटा की ‘डेंजरस ऑर्गनाइजेशन एंड इंडिविजुअल्स’ पॉलिसी ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग, निंदा और निष्पक्ष चर्चा की इजाजत देती है। इसके बावजूद, सही रिपोर्टिंग और महिमामंडन के बीच के फर्क को ऑटोमेटेड सिस्टम और मानव रिव्यूअर्स अक्सर गलत समझ बैठते हैं।

मेटा के ओवरसाइट बोर्ड ने ऐसा ही एक मामला देखा था। यह मामला तालिबान से जुड़ी उर्दू अखबार की एक रिपोर्ट का था। मेटा के सिस्टम ने उस पोस्ट को हटा दिया था। दो ह्यूमन रिव्यूअर्स ने भी इसे नियमों का उल्लंघन माना था। इसके बाद प्लेटफॉर्म ने पेज को स्ट्राइक दी और एडमिन के फीचर्स भी सीमित कर दिए।

इस केस को गलत तरीके से हटाई गई पोस्ट्स की जाँच करने वाले सिस्टम में भेजा गया था। लेकिन वहाँ इसकी कभी समीक्षा ही नहीं हो सकी। इसकी वजह यह थी कि उस लिस्ट के लिए मेटा के पास 50 से भी कम उर्दू भाषी रिव्यूअर्स थे। कंपनी ने इस पोस्ट को ज्यादा जरूरी भी नहीं माना था। मेटा ने इसे तब जाकर वापस रिस्टोर किया जब ओवरसाइट बोर्ड ने इस केस को खुद चुना। तब जाकर कंपनी ने माना कि वह खबर के लिहाज से सही रिपोर्टिंग थी।

यह उदाहरण इस दावे को पूरी तरह खारिज करता है कि संदर्भ से जुड़ी छूट हमेशा सही तरीके से लागू होती है। नियम भले ही आतंकवाद या राजनीतिक हिंसा पर पत्रकारिता की इजाजत देते हों। लेकिन उन नियमों को लागू करने वाली मशीनें और रिव्यूअर्स आतंकवादी के बजाय पत्रकार को ही सजा दे बैठते हैं।

AI से बनाई गई तस्वीर

मेटा ने खुद माना है कि उसके सिस्टम ने सही और कानूनी राजनीतिक बयानों को भी सेंसर किया

कंपनी ने यह बात स्वीकार की है कि उसकी मॉडरेशन व्यवस्था न केवल अधूरी थी, बल्कि उसने अपनी सीमाओं को भी पार किया। जनवरी 2025 में मेटा ने कहा कि सामाजिक और राजनीतिक दबाव के चलते उसने बेहद जटिल सिस्टम बना लिए थे। उसने माना कि यह तरीका बहुत आगे निकल गया था। कंपनी के अनुसार, बहुत सारे बेकसूर कंटेंट को रोक दिया गया और कई निर्दोष यूजर्स पर गलत तरीके से नियम थोप दिए गए।

मेटा ने आगे यह खुलासा किया कि दिसंबर 2024 में उसने हर दिन लाखों कंटेंट हटाए। कंपनी का अनुमान है कि की गई हर दस में से एक या दो कार्रवाइयां गलत हो सकती हैं।

ये कोई छोटी-मोटी गलतियाँ नहीं हैं, खासकर तब जब रोज लाखों फैसले लिए जा रहे हों। अगर कंपनी के कम वाले अनुमान को भी देखें, तो भी इसका मतलब यह है कि बहुत सारे सही और जायज कंटेंट पर गलत कार्रवाई हुई।

मेटा ने यह भी माना कि थर्ड-पार्टी फैक्ट-चेकिंग की वजह से सही राजनीतिक बयानों पर भी अनुचित लेबल लग गए और उनकी पहुँच कम हो गई। कंपनी ने कहा कि यह प्रोग्राम अक्सर सेंसरशिप का जरिया बन गया, क्योंकि फैक्ट-चेकर्स ने काम के दौरान अपने पूर्वाग्रह और निजी नजरिए को शामिल कर लिया था।

इसीलिए, वैचारिक पक्षपात के आरोपों को कोई मनगढ़ंत कहानी बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। मेटा का बचाव अब यह नहीं है कि गलत तरीके से पाबंदियाँ नहीं लगाई गईं। बल्कि उसका बचाव यह है कि वह अब इसे कम करने की कोशिश कर रहा है।

एल्गोरिदम अकेले काम नहीं करता। इंसान भी इस नैरेटिव को गढ़ने का काम करते हैं

सोशल मीडिया का यह पूरा सिस्टम सिर्फ ऑटोमेटेड मशीनों से नहीं चलता। मेटा ने साल 2024 में बताया था कि उसके पास फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर काम करने वाले लगभग 15,000 कंटेंट रिव्यूअर्स हैं। ये लोग 80 से ज्यादा भाषाओं में काम करते हैं। इसके अलावा राजनीतिक फैसलों में पॉलिसी टीमें, इंजीनियर, कानूनी विभाग, पब्लिक-पॉलिसी अधिकारी और चुनाव विशेष ऑपरेशन्स सेंटर भी शामिल होते हैं।

इंसान ही यह तय करते हैं कि कोई पोस्ट हिंसा की निंदा कर रही है या उसका महिमामंडन कर रही है। वे ही यह फैसला करते हैं कि संदर्भ किसी पत्रकारिता का है, सामाजिक कार्यकर्ता का है, व्यंग्य (सटायर) का है या समर्थन का है। वे भारतीय भाषाओं में लिखे गए कैप्शन्स का मतलब भी निकालते हैं, जिनमें ऐसी राजनीतिक बातें हो सकती हैं जिन्हें देश से बाहर बैठे रिव्यूअर्स समझ ही नहीं पाते।

इस पूरी प्रक्रिया में हर स्तर पर पक्षपात आ सकता है। यह नियम (पॉलिसी) बनाते समय आ सकता है। यह किसी संगठन को खतरनाक संगठनों की सूची में डालते समय आ सकता है। यह तब आ सकता है जब कोई रिव्यूअर किसी रिपोर्ट के लहजे का गलत मतलब निकाल ले। या फिर यह तब भी आ सकता है जब संगठित यूजर्स अपने विरोधी विचार वाले कंटेंट को बार-बार रिपोर्ट करते हैं।

मेटा के अपने तालिबान वाले केस ने साफ दिखा दिया था कि दो इंसानी रिव्यूअर्स भी एक पूरी तरह से गलत फैसले को सही ठहरा सकते हैं। उसने यह भी दिखाया कि किसी भाषा के रिव्यूअर्स की कमी होने पर गलत तरीके से हटाई गई पोस्ट को ठीक करना कितना मुश्किल हो जाता है।

ऑपइंडिया (OpIndia) झेल चुका मेटा की इस भेदभाव भरी कार्रवाई

ऑपइंडिया के लिए पक्षपातपूर्ण कार्रवाई का यह सवाल सिर्फ किताबी या सैद्धांतिक नहीं है।

साल 2020 में ऑपइंडिया ने दिखाया था कि उसके फेसबुक पेज की रीच रोजाना करीब 20 लाख से घटकर लगभग 1.71 लाख रह गई थी। फेसबुक ने कंटेंट की क्वालिटी का हवाला दिया। उसने दावा किया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) यह तय करता है कि पोस्ट नियमों का उल्लंघन करती है या नहीं। हालाँकि, ऑपइंडिया के पेज से जो रिपोर्ट हटाई गई थी, वही रिपोर्ट उसी तस्वीर के साथ दूसरी वेबसाइट पर आसानी से उपलब्ध थी।

सितंबर 2024 में फेसबुक ने यूजर्स को विकिपीडिया पर बनी ऑपइंडिया की 187 पन्नों की रिपोर्ट शेयर करने से रोक दिया। प्लेटफॉर्म ने इसे स्पैम बता दिया। उसने ऑपइंडिया पर व्यूज पाने के लिए भ्रामक तरीके अपनाने का आरोप लगाया। जबकि उस रिपोर्ट में न तो पेज लाइक करने की शर्त थी, न कोई धोखा देने वाला पॉप-अप था और न ही कोई छिपा हुआ लिंक था।

मार्च 2026 में मेटा ने ऑपइंडिया का एक वीडियो हटाया। यह वीडियो BBC के उस दावे को चुनौती दे रहा था, जिसमें दिल्ली में मकान ढूँढ रही एक कश्मीरी पत्रकार के साथ कथित भेदभाव की बात कही गई थी। ऑपइंडिया के मुताबिक, फेसबुक पर अपलोड होते ही इस वीडियो को चंद सेकंडों के भीतर बैन कर दिया गया।

इसके अलावा, ऑपइंडिया द्वारा खालिस्तानी संगठनों, पंजाब के उग्रवाद और खालिस्तानी आतंकवादियों से जुड़ा कंटेंट पोस्ट करने पर उसे अक्सर ब्लॉक या डिलीट कर दिया जाता है।

इन सभी घटनाओं को अगर एक साथ मिलाकर देखें, तो साफ हो जाता है कि पोस्ट का हटाया जाना, रीच कम होना और रिकमेंडेशन में जाना राजनीति से अलग नहीं है। यही चीजें तय करती हैं कि कौन सी राजनीतिक बात जनता तक पहुँचेगी और कौन सी बात लोगों तक पहुँचने से पहले ही गायब कर दी जाएगी।

मेटा के ओवरसाइट बोर्ड पर उठते सवाल

मेटा के ओवरसाइट बोर्ड की निष्पक्षता पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। इस बोर्ड के राजनीतिक झुकाव को लेकर लोगों के मन में गहरी चिंताएँ हैं। ऑपइंडिया ने साल 2020 में एक बड़ा खुलासा किया था। एक जाँच से पता चला कि बोर्ड के 20 में से 18 सदस्य किसी न किसी तरह जॉर्ज सोरोस की संस्था से जुड़े थे। वे सोरोस के ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस’ द्वारा फंड किए गए संगठनों के साथ काम कर चुके थे। इसके अलावा, बोर्ड सदस्य तवक्कुल करमान का नाम भी विवादों में रहा है। उनके संबंध यमन की एक ऐसी पार्टी से पाए गए, जिसे मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन हासिल था।

यह काफी चिंताजनक है कि जिस बोर्ड को अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाला बताया गया था, उसके ज्यादातर सदस्य एक ही छोटे लिबरल इंटरनेशनल नेटवर्क से जुड़े संस्थानों से चुने गए थे। यह मुद्दा तब और ज्यादा गंभीर हो जाता है जब यही बोर्ड यह तय करने में भूमिका निभाता है कि अलग-अलग देशों में राजनीतिक बयानों, राष्ट्रवाद, अलगाववाद, इस्लामी संगठनों और सरकारी कार्यवाहियों का क्या मतलब निकाला जाए।

यह बात हैरान करने वाली है कि जिस बोर्ड को निष्पक्ष और हर तरह की सोच का प्रतिनिधि बताया गया, उसके ज्यादातर सदस्य एक ही विचारधारा के नेटवर्क से आते हैं। वे सभी एक खास लिबरल सोच वाले अंतरराष्ट्रीय समूह का हिस्सा रहे हैं। मामला तब और गंभीर हो जाता है, जब यही लोग यह फैसला करते हैं कि किस देश में क्या सही है और क्या गलत। राष्ट्रवाद, अलगाववाद, कट्टरपंथी संगठनों और सरकारों के कदमों पर फैसला यही बोर्ड लेता है। इस वजह से इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजमी है।

जुकरबर्ग का सच: सरकारी दबाव में हटाए गए पोस्ट

मेटा के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने खुद एक बड़ा सच स्वीकार किया। अगस्त 2024 में अमरीकी संसद को लिखे एक खत में उन्होंने यह बात मानी। उन्होंने बताया कि अमरिकी सरकार के बड़े अधिकारियों ने कोविड के समय मेटा पर भारी दबाव बनाया था। वे चाहते थे कि महामारी से जुड़े पोस्ट हटा दिए जाएँ। इस चक्कर में हल्के-फुल्के मजाक और व्यंग्य वाले पोस्ट भी डिलीट करवा दिए गए। जुकरबर्ग ने माना कि ऐसा दबाव बनाना बिल्कुल गलत था। उन्हें इस बात का अफसोस है कि मेटा उस समय इसके खिलाफ खुलकर नहीं बोला।

जुकरबर्ग का यह कबूलनामा बहुत कुछ साफ कर देता है। इससे साबित होता है कि सरकारें और नेता इन सोशल मीडिया कंपनियों पर अपना दबाव बनाते हैं। मेटा जैसी बड़ी कंपनियाँ भी इस दबाव के आगे झुक जाती हैं और अपने फैसले बदल देती हैं। यह बात किसी बाहरी आलोचक ने नहीं, बल्कि खुद मेटा के मालिक ने कही है। ऐसे में यह मान लेना बेवकूफी होगी कि फेसबुक या इंस्टाग्राम पर पोस्ट का दिखना या गायब होना सिर्फ एक कंप्यूटर कोड का निष्पक्ष खेल है।

AI से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर

बिग टेक की असली ताकत: बिना कहे फैलाया जाने वाला एजेंडा

मेटा को CJP के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए उससे हाथ मिलाने की कोई जरूरत नहीं है। भले ही कंपनी ने इस प्रोपेगेंडा को फैलाने का कोई सीधा आदेश न दिया हो, लेकिन उसका सिस्टम ही कुछ ऐसा बना है। यह सिस्टम उन्हीं पोस्ट्स को आगे बढ़ाता है जो लोगों को रोककर रखती हैं। इसके नियम इतने उलझे हुए हैं कि पुलिस की सख्ती वाले वीडियो अधिकार की बात बताकर फैल जाते हैं। दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों की हिंसा वाले वीडियो पर रोक लग जाती है। CJP के वीडियो पर गुस्से में किया गया कमेंट भी उसकी रीच बढ़ाता है। उसे देखने में बिताया गया हर एक मिनट एल्गोरिदम को वैसा ही दूसरा वीडियो दिखाने के लिए उकसाता है।

मेटा भले ही इसे ‘यूजर की पसंद’ का नाम दे, लेकिन आम इंसान के लिए यह जबरदस्ती की परोसन ही है। अगर किसी ने यह कंटेंट माँगा ही नहीं, तो उसकी फीड में यह बार-बार क्यों आ रहा है? दरअसल, यही इन बड़ी टेक कंपनियों की असली और खतरनाक ताकत है। इन्हें किसी राजनीतिक दल या आंदोलन का खुलकर समर्थन करने की जरूरत नहीं होती। ये बस अपने सिस्टम से चुपचाप तय कर देती हैं कि किसे जनता की नजरों में बनाए रखना है और किसे पूरी तरह गायब कर देना है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)