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भारत के मुस्लिमों को साथ नहीं ले जाना चाहता था जिन्ना, अनशन और RSS को रोक कर गाँधी-नेहरू ने सफल किया उसका प्लान: पाकिस्तानी विश्लेषक से सुनिए मजहब के नाम पर बना मुल्क कैसे बचा

भारत के 79वें स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें पाकिस्तानी-स्वीडिश लेखक और राजनीतिक विश्लेषक इश्तियाक अहमद यह दावा कर रहे हैं कि 1947 में भारत के बंटवारे के समय महात्मा गाँधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने न केवल पाकिस्तान को बचाया, बल्कि गाँधी  ने इसके लिए अपनी जान तक गंवा दी।

वीडियो में अहमद कहते हैं कि अगर गाँधी और नेहरू ने हस्तक्षेप न किया होता तो भारत से करीब 3.5 करोड़ मुस्लिम पाकिस्तान चले जाते, जिससे नव-निर्मित पाकिस्तान पूरी तरह ढह सकता था क्योंकि उस समय पाकिस्तान की कुल आबादी ही सिर्फ 3.39 करोड़ थी और हालात इतने खराब थे कि लिखने के लिए कागज तक नहीं था, संसाधनों की तो बात ही छोड़ दीजिए।

उनका कहना है कि गाँधी ने दिल्ली में दंगे रोकने के लिए आमरण अनशन किया और मुस्लिमों की सुरक्षा सुनिश्चित की, जबकि नेहरू ने आरएसएस और हिंदू महासभा जैसी ताकतों को मुस्लिमों को जबरन निकालने से रोका। इस वजह से करोड़ों मुस्लिम भारत में ही रुक गए।

अहमद ने यह भी कहा कि जिन्ना खुद नहीं चाहते थे कि भारत के मुस्लिम पाकिस्तान आएँ, बल्कि वे चाहते थे कि पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू और सिख भारत चले जाएँ, लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें वहाँ टिकने नहीं दिया और जबरन निकाला, जिससे भयंकर हिंसा हुई, खासकर पंजाब, सिंध और बंगाल जैसे इलाकों में।

अहमद ने आगे बताया कि बिहार से लगभग 50 लाख मुस्लिम पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश चले गए, लेकिन इसके बावजूद करीब 3 करोड़ मुस्लिम भारत में ही रह गए, जो गाँधी और नेहरू की नीतियों के बिना संभव नहीं था।

उन्होंने कहा कि अगर ये 3 करोड़ लोग भी पाकिस्तान चले जाते तो देश एक गंभीर जनसंख्या संकट में घिर जाता और संभवतः बिखर जाता। अहमद ने डॉ भीमराव अंबेडकर का भी ज़िक्र किया, जिन्होंने उस समय जनसंख्या की पूरी अदला-बदली की वकालत की थी और चेतावनी दी थी कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो पाकिस्तान को भविष्य में समस्याएँ झेलनी पड़ेंगी।

अहमद का साफ कहना है कि गाँधी और नेहरू ने जो किया, उससे न सिर्फ भारत में मुस्लिमों को सुरक्षा मिली, बल्कि पाकिस्तान को भी उस वक्त की सबसे बड़ी मानवीय और प्रशासनिक तबाही से बचा लिया गया।

गाँधी और नेहरू ने पाकिस्तान को बचाए रखा, लेकिन भारत को सांप्रदायिक जख्मों के साथ छोड़ गए

इश्तियाक अहमद की यह टिप्पणी एक ऐसी विडंबना को सामने लाती है जिसे इतिहास में अक्सर नजरअंदाज किया गया है। आमतौर पर पाकिस्तान की स्थापना की कहानी गाँधी , नेहरू और कॉन्ग्रेस के विरोध के रूप में पेश की जाती है, लेकिन इस वीडियो में खुद एक पाकिस्तानी विद्वान यह बात कबूल करते हैं कि अगर महात्मा गाँधी और पंडित नेहरू ने 1947 के समय कुछ अहम फैसले न लिए होते, तो पाकिस्तान अपनी शुरुआत में ही बिखर सकता था।

गाँधी और नेहरू ने उस समय भारत में रहने वाले करोड़ों मुस्लिमों को पाकिस्तान जाने से रोकने की कोशिश की थी। अगर ये सभी मुस्लिम पाकिस्तान चले जाते, तो पाकिस्तान पर जनसंख्या का इतना भारी बोझ पड़ता कि वह उसे संभाल नहीं पाता। उस वक्त पाकिस्तान के पास न तो ज़रूरी संसाधन थे, न प्रशासनिक ढाँचा, और न ही हालात इतने मजबूत थे कि वो इतनी बड़ी संख्या को संभाल सके।

भारत के नेताओं ने यह फैसला लेकर कि भारत के मुस्लिम यहीं रहें, एक तरह से पाकिस्तान की मदद ही की और उसका जनसंख्या संतुलन बिगड़ने से बचा लिया। वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों को जबरदस्ती निकाला गया, उन पर हिंसा हुई और उन्हें वहां टिकने नहीं दिया गया।

आज पाकिस्तान के आधिकारिक इतिहास में यह बात शायद ही कभी मानी जाती है कि उसका शुरुआती अस्तित्व भारत के संयम और गाँधी -नेहरू की नीतियों से भी जुड़ा था। वहां बंटवारे को पूरी तरह जिन्ना की दूरदर्शिता और जीत के रूप में दिखाया जाता है।

दूसरी तरफ, भारत में भी इस सच्चाई पर ज्यादा चर्चा नहीं होती। आजादी के बाद की कई सरकारों ने गाँधी और नेहरू को स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े नेता के रूप में सामने रखा, लेकिन इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया कि जैसा डॉ भीमराव अंबेडकर ने कहा था, ‘सांप्रदायिक समस्या’ को अगर उस समय पूरी तरह हल किया गया होता, तो शायद आज 80 साल बाद भी ये मुद्दा देश को परेशान न कर रहा होता।

इस तरह यह पूरी कहानी हमें दिखाती है कि इतिहास सिर्फ दो तरफा नहीं होता, बल्कि उसके कई पहलू होते हैं, जिन्हें समझना और स्वीकार करना जरूरी है।

पुश्तैनी हवेली से शरणार्थी शिविर तक… विभाजन ने कैसे बदली मेरे परिवार की किस्मत, जीवनभर नहीं बना पाए अपना आशियाना

ये कहानी है मेरे नाना-नानी की, जिनकी पुश्तैनी हवेली बंटवारे के वक्त बांग्लादेश में रह गई और उन्हें शरणार्थी शिविर में शरण लेना पड़ा। पूरा जीवन संघर्ष करने के बावजूद वे लोग न तो घर बना पाए और न ही जमीन का टुकड़ा खरीद पाए।

मेरे नाना जी यानी नरेश रंजन गुप्ता रॉय विभाजन के वक्त बांग्लादेश के सिलहट डिवीजन के सुनामगंज में शिक्षक थे। उनकी पुश्तैनी हवेली ‘रॉय भिट्टा बारी’ में वह अपने परिवार के साथ रहते थे। उनकी हवेली के प्रांगण में हर साल दुर्गा पूजा का आयोजन होता था और आसपास के इलाकों से हिन्दू श्रद्धालु आते थे।

कलकत्ता के प्रतिष्ठित प्रेसीडेंसी कॉलेज में उन्होंने अपनी शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की थी और अपने गृहनगर में जीवन बिताने की इच्छा उनकी रही। 1946 में उन्होंने मेरी नानी यानी उषा गुप्ता से शादी की।

उस वक्त तक मजहबी आधार पर पाकिस्तान बनाने की माँग मुस्लिम लीग ने तेज कर दी थी। मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पार्टी ने कलकत्ता और नोआखली में हिन्दुओं का नरसंहार करवाया। इस दौरान पूर्वी बंगाल के हिन्दू इस मुस्लिम बहुल क्षेत्र में काफी परेशान थे।

जुलाई 1947 में सिलहट के अन्य क्षेत्रों की तरह सुनामगंज में भी जनमत संग्रह हुआ और अधिकांश लोगों ने पूर्वी पाकिस्तान में शामिल होने के पक्ष में मतदान किया ।

सिलहट में हुआ रेफरेंडम

उस इलाके के हिन्दुओं को मुस्लिम भीड़ से बचने के लिए घर- बार छोड़ना पड़ा। मेरे नाना-नानी भी उनमें से एक थे। किसी तरह अपनी जान बचाकर और पुश्तैनी घर-बार छोड़कर ये लोग वहाँ से भागे। इस दौरान मेरी नानी अपने साथ महज कुछ सोने के गहने और साड़ी साथ ले आई थीं। इनलोगों ने शरणार्थी शिविर में आश्रय लिया। रातों रात इनकी जिंदगी बदल चुकी थी।

मुस्लिम लीग की भड़काई आग में अंग्रेजों द्वारा किए गए ‘भारत विभाजन’ को कॉन्ग्रेस का साथ मिला। इसने मेरे नाना-नानी समेत लाखों लोगों का सब कुछ छीन लिया।

दादाजी की डायरी: 1 फरवरी 1961, जब उन्होंने बतौर शिक्षक बच्चों को पढ़ाई थी मैकबेथ

कुछ महीनों बाद नाना नरेश रंजन गुप्ता रॉय असम में शिक्षक बने , फिर तीन महीने बाद त्रिपुरा जाकर शिक्षक के रूप में काम करने लगे। पूरा जीवन संघर्ष करने के बाद भी वो न तो जमीन का एक टुकड़ा खरीद पाए और न ही अपना घर बना सके। रॉय दंपति की तीन बेटियाँ बड़ी हो रही थीं। उनकी जिम्मेदारी, पढ़ाई-लिखाई भी काफी अहम था।

असम और त्रिपुरा में उस वक्त की जातीय हिंसा और भ्रष्टाचार की वजह से समय पर उन्हें वेतन भी नहीं मिलता था। इसलिए पूरा जीवन गरीबी में बीता।

नरेश रॉय ने हार नहीं मानी। उनका मानना था कि शिक्षा की वह माध्यम है जिसके दम पर अपने पैरों पर खड़ा हुआ जा सकता है। पुश्तैनी संपत्ति तो नहीं मिल सकती लेकिन आगे जीवन आसान बनाया जा सकता है। ये सही बात थीं

आज उनके नाती-नातिन के पास घर है। वे आगे बढ़ गए हैं। नरेश गुप्ता रॉय 1975 में सेवानिवृत हुए और 28 जून 1981 में उनका निधन हुआ। उनसे पढ़ने वाले छात्र आज काफी आगे बढ़ गए हैं। वे रॉय सर के पुस्तक प्रेम को याद करते हैं। मेरी माँ के मुताबिक हर दिन कम से कम दो घंटे वो पढ़ते थे। अपने निधन से एक सप्ताह पहले तक उन्होंने दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं किया। उनके सिखाए रास्ते पर चल कर ही परिवार की किस्मत बदली

भारत विभाजन खूनों से सना ऐसा दर्द है जिसने लाखों परिवारों को कभी न भूलने वाला दर्द दिया। इसमें लाखों लोग मारे गए और करीब 2 करोड़ लोग स्थायी तौर पर विस्थापित हो गए।

14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ ऐसे ही लोगों को याद करने का दिन है जिनका सब कुछ विभाजन की आग में जल गया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपने लिए एक नया रास्ता तलाशा।

नोट: इस दर्दनाक कहानी को आप मूल रूप से यहाँ पढ़ सकते हैं।

‘मेड इन इंडिया’ सेमीकंडक्टर चिप से जेट इंजन तक…लाल किले से पीएम मोदी के 8 बड़े ऐलान, युवाओं के रोजगार के लिए ₹1 लाख करोड़ की योजना हुई शुरू

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (15 अगस्त 2025) को लाल किले से अपना 12वाँ संबोधन दिया। जहाँ एक और इस मंच से पीएम मोदी ने पाकिस्तान को कड़ा संदेश दिया तो देश के विकास से जुड़े कई सूत्र भी साझा किए हैं।

पीएम मोदी के इस संदेश में सेमीकंडक्टर चिप से लेकर जेट इंजन बनाने के लक्ष्यों तक का जिक्र किया गया है। पीएम मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित भारत बनाने का लक्ष्य रखा है और इस संदेश में उससे जुड़ी कई चीजों का जिक्र किया गया था।

पीएम मोदी के भाषण की बड़ी बातें

सेमीकंडक्टर पर पीएम का बड़ा ऐलान

पीएम मोदी ने अपने संबोधन के दौरान कहा कि हमारे देश में 50-60 वर्ष पहले सेमीकंडक्टर को लेकर फैक्ट्री का विचार शुरु हुआ था। उन्होंने कहा, “आज जो सेमीकंडक्टर दुनिया की ताकत बन गया है, उसकी फाइलें 50-60 वर्ष अटक गई थीं। सेमीकंडक्टर के विचार की भ्रूण हत्या हो गई थी।”

पीएम ने कहा कि अब सेमीकंडक्टर के काम को मिशन मोड में आगे बढ़ाया जा रहा है। सेमीकंडक्टर की 6 यूनिट्स जमीन पर उतर रहे हैं और 4 नए यूनिट्स को मंजूरी दी गई है। पीएम मोदी ने ऐलान किया कि इस साल के अंत तक भारत अपनी पहली ‘मेड इन इंडिया’ चिप लॉन्च कर देगा।

युवाओं के लिए 1 लाख करोड़ की योजना हुई शुरू

पीएम मोदी ने लाल किले से युवाओं को बड़ा तोहफा देते हुए नौजवानों के लिए एक लाख करोड़ रुपए की योजना की आज से ही शुरुआत की है। इस ‘प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना’ के तहत 3.5 करोड़ युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बनाए जाएँगे।

इस योजना के तहत निजी क्षेत्र में पहली नौकरी पाने वाले नौजवान को 15,000 रुपए सरकार की तरफ से दिए जाएँगे। वहीं, नए रोजगार के अवसर देने वाली कंपनियों को भी प्रोत्साहन राशि दी जाएगी।

2047 तक 10 गुना से अधिक बढ़ेगी परमाणु ऊर्जा क्षमता

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में बताया कि भारत 10 नए परमाणु रिएक्टरों पर तेजी से काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत ने 2047 तक अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को 10 गुना से अधिक बढ़ाने का संकल्प लिया है। साथ ही, इस क्षेत्र में निजी कंपनियों के लिए भी दरवाजे खोल दिए गए हैं।

$10 ट्रिलियन के भारत के लिए ‘टास्क फोर्स’ का गठन

भारत को 2047 तक 10 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए पीएम मोदी ने एक स्पेशल ‘रिफॉर्म टास्क फोर्स’ के गठन की घोषणा की है। यह आर्थिक विकास को तेज करने, लालफीताशाही को खत्म करन कर शासन को आधुनिक बनाने और भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने का काम करेगी।

दिवाली पर मिलेगा GST सुधारों का गिफ्ट

पीएम मोदी ने बताया कि देश को इस दिवाली पर अगले पीढ़ी के GST सुधारों से जुड़ा एक बहुत बड़ा तोहफा मिलने वाला है। उन्होंने कहा, “पिछले 8 वर्षों में हमने GST का रिफॉर्म किया, पूरे देश में टैक्स का भार कम किया। 8 वर्षों के बाद समय की माँग है कि इस बार हम इसे रिव्यू करेंगे, एक हाई पावर कमिटी ने इसका रिव्यू किया है। आम आदमी की जरूरतों के टैक्स को भारी मात्रा में कम किया जाएगा।”

जनसंख्या असंतुलन से निपटने के लिए ‘डेमोग्राफी मिशन’

अपने संबोधन के दौरान पीएम मोदी ने डेमोग्राफी बदलने पर भी चिंता जताई है। पीएम मोदी ने कहा, “साजिश के तहत देश की डेमोग्राफी को बदला जा रहा है। नए संकट के बीज बोेए जा रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “घुसपैठिए देश की नौजवानों की रोजी-रोटी लूट रहे हैं, हमारी बहन-बेटियों को निशाना बना रहे हैं, वे हमारे आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं।” पीएम ने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में डेमोग्राफी बदलने से राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा पैदा होता है।

पीएम मोदी ने ‘हाई-पावर्ड डेमोग्राफी मिशन’ के शुरुआत की घोषणा की है। यह मिशन देश की एकता, अखंडता और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करेगा।

ऊर्जा स्वतंत्रता के लिए शुरू होगा ‘समुद्र मंथन’

पीएम मोदी ने बताया कि देश के बजट का एक बड़ा हिस्सा अभी भी पेट्रोल, डीजल और गैस के आयात में खर्च होता है। पीएम मोदी ने इस स्थिति को बदलने के लिए ‘नेशनल डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन मिशन’ की शुरुआत का ऐलान किया है।

इस मिशन के तहत ऊर्जा जरूरतों के लिए समुद्री संसाधनों की तलाश पर बल दिया जाएगा। साथ ही, उन्होंने सोलर, हाइड्रोजन, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा में बड़े विस्तार की भी घोषणा की।

भारत में बनाए जाएँगे जेट इंजन

पीएम मोदी ने लाल किले की प्राचीर से फाइटर जेट के लिए भारत का अपना जेट इंजन बनाने का आह्वान किया है। पीएम मोदी ने कहा कि जैसे भारत ने कोविड काल में वैक्सीन बनाई और डिजिटल भुगतान के लिए UPI डेवलप किया वैसे ही अब जेट इंजन भी अब भारत को खुद बनाने चाहिए। पीएम ने युवा वैज्ञानिकों, प्रतिभाशाली युवाओं, इंजीनियरों, पेशेवरों और सरकार के सभी विभागों से ‘मेड इन इंडिया’ जेट इंजन में जुटने का आह्वान किया है।

हिंदू बन फँसाता, सेक्स कर कहता- मुस्लिम बनो: शरफ रिजवी ने ‘सम्राट-अजय-विजय’ बन 3 राज्य में 12 लड़कियों से की शादी, ‘लव जिहाद’ के लिए इस्लामी संगठन देता था पैसा

वाराणसी में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें फर्रुखाबाद के मोहम्मद शरफ रिजवी ने अपनी पहचान छिपाकर एक-दो नहीं, बल्कि 12 हिंदू लड़कियों से निकाह किया। पुलिस ने उसे सारनाथ से गिरफ्तार किया है। पुलिस की जाँच में यह बात सामने आई है कि रिजवी ने मैट्रिमोनियल साइट और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके इन लड़कियों को अपने जाल में फँसाया।

मोहम्मद शरफ रिजवी हिंदू लड़कियों से पैसे ऐंठता और बाद में अपनी असली पहचान बताकर उन पर धर्मांतरण का दबाव बनाता था। पुलिस को अब तक उत्तर प्रदेश और दो अन्य राज्यों की 12 लड़कियों की जानकारी मिली है, जिनसे संपर्क किया जा रहा है।

फर्जी पहचान का जाल

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस की पूछताछ में शरफ रिजवी ने बताया कि उसने हिंदू नामों से तीन फेसबुक अकाउंट बनाए थे, जिनके नाम थे- सम्राट सिंह, अजय कुमार और विजय कुमार। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसकी असली पहचान (मुस्लिम नाम) वाले अकाउंट से उसे कम दोस्त बनते थे। इन फर्जी अकाउंट्स के जरिए उसने कई लड़कियों से दोस्ती की।

इसके बाद उसने ‘शादी डॉट कॉम’ जैसी मैट्रिमोनियल साइट पर भी ‘सम्राट सिंह‘ के नाम से प्रोफाइल बनाई। यहाँ उसने खुद को एक बड़ा निर्यातक (exporter) और अमीर व्यक्ति बताया। उसने कई लड़कियों को शादी का प्रस्ताव भेजा और 100 से ज़्यादा लड़कियों से संपर्क किया।

शादी के बहाने धोखाधड़ी

शरफ रिजवी लड़कियों से मिलने के लिए उनके शहरों में जाता था। वह महंगी गाड़ियाँ किराए पर लेता, महंगे कपड़े पहनता और अपनी झूठी अमीरी का दिखावा करता था। इससे लड़कियों और उनके परिवार वालों पर उसका अच्छा प्रभाव पड़ता था।

एक बार जब वह लड़की के परिवार का भरोसा जीत लेता तो शादी की तैयारियों या किसी और बहाने से उनसे पैसे ले लेता। सारनाथ की एक लड़की से उसने शादी के नाम पर 5 लाख रुपए ऐंठे थे। इसके अलावा, वह लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध भी बनाता था।

धर्मांतरण और धमकी

जब कोई लड़की उस पर शादी के लिए ज़्यादा दबाव डालती तो वह अपनी असली मुस्लिम पहचान और नाम बताता। वह लड़की से कहता कि अगर शादी करनी है तो इस्लाम कबूल करना पड़ेगा।

जब लड़कियाँ इससे इनकार करतीं तो वह पैसे वापस माँगने पर उन्हें जान से मारने की धमकी देता था। पुलिस के अनुसार, इस तरह उसने 12 लड़कियों को धर्मांतरण के लिए मजबूर करने की कोशिश की थी।

इस्लामिक संगठन की भूमिका- पुलिस जाँच में एक इस्लामिक संगठन का नाम भी सामने आया है, जो रिजवी को कथित तौर पर फंडिंग कर रहा था। पुलिस इस संगठन की पूरी जानकारी जुटा रही है, लेकिन अभी तक उसका नाम सार्वजनिक नहीं किया गया है। रिजवी ने बताया कि वह कई इस्लामिक ग्रुप्स से जुड़ा था, जहाँ उसे इन कामों के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।

कैसे पकड़ा गया शरफ रिजवी

रिजवी को सारनाथ की एक युवती की शिकायत पर गिरफ्तार किया गया। उसने इस युवती से 5 लाख रुपए और शारीरिक संबंध बनाए थे। जब उसने उस पर धर्मांतरण का दबाव बनाना शुरू किया तो युवती ने पुलिस को सूचना दी।

रिजवी जब उस युवती से मिलने आ रहा था, तभी पुलिस ने उसे आशापुर पुलिस चौकी के पास से गिरफ्तार कर लिया। पुलिस को उसके पास से 50 हजार रुपए नकद, तीन आईफोन, आधार कार्ड और पैन कार्ड भी मिला है। पुलिस ने उसके खिलाफ धोखाधड़ी, धर्मांतरण का दबाव और धमकी देने जैसी कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।

सूरत में रामनगर के ‘पाकिस्तानी मोहल्ले’ का बदला नाम, अब कहलाएगा हिंदुस्तानी: दुश्मन देश से आए शरणार्थियों के कारण बदला था नाम, शर्म से गर्व पर आए स्थानीय

गुजरात के सूरत में देश के बँटवारे के समय बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत आए। उन्हें एक कॉलोनी में बसाया गया। बाद में इसके एक हिस्से को पाकिस्तानी मोहल्ला कहा जाने लगा। अब स्थानीय निवासियों और विधायक की मदद से इसका नाम बदला जा सका है।

जानकारी के अनुसार, रामनगर नाम की इस कॉलोनी का नाम बदलकर ‘हिंदुस्तानी मोहल्ला’ रखा गया है। यहाँ रहने वाले लगभग 5000 लोगों के आधार कार्ड पर पते को अब अपडेट किया जाएगा। 79वें स्वतंत्रता दिवस पर अब रामनगर कॉलोनी के लोगों को अपनी कॉलोनी के नाम से असली आजादी मिली है।

दरअसल भारत के बँटवारे के समय बड़ी संख्या में लोग पाकिस्तान से हिन्दुस्तान आए थे। इनमें सिंधी समाज के लाखों लोग देश के कई हिस्सों में बस गए। इसी तरह सूरत के रामनगर इलाके में भी बड़ी संख्या में सिंधी लोग आकर रहने लगे थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 600 शरणार्थी परिवारों ने यहाँ शरण ली। तभी से इस इलाके को लोग ‘पाकिस्तानी मोहल्ला’ कहने लगे थे। फिर धीरे-धीरे ये नाम आधिकारिक रूप से यहाँ के लोगों के दस्तावेजों पर भी आ गए।

स्थानीय लोगों का कहना है कि लंबे समय से वे इस नाम से छुटकारा पाना चाहते थे, क्योंकि इस नाम की वजह से उन्हें शर्मिंदगी महसूस होती था। इसकी वजह ये थी कि यह नाम दुश्मन मुल्क का है। यहाँ के लोगों का कहना है कि पहले भी इसका नाम बदलने का प्रयास किया गया, लेकिन कोई सफलता हासिल नहीं हुई। उन्होंने बताया कि एक चौराहे का नाम हेमु कल्याणी चौक किया गया था, लेकिन यह चर्चित नहीं हो सका। लोग इसे पाकिस्तानी मोहल्ले के नाम से ही जानते रहे।

पाकिस्तानी मोहल्ले का नाम बदलकर हिन्दुस्तानी मोहल्ला किए जाने के मौके पर स्थानीय विधायक पूर्णेश मोदी भी उपस्थित रहे। उन्होंने कहा, “बँटवारे के बाद बड़ी संख्या में सिंधी समाज के लोग यहाँ आकर बसे थे और एक हिस्से का नाम पाकिस्तान मोहल्ला हो गया। मैंने इसका नाम बदलने की पहल की। कुछ साल पहले मैंने म्यूनिसिपल रिकॉर्ड में नाम बदलकर हिन्दुस्तानी मोहल्ला करने के लिए जरूरी कदम उठाए और अब इसे मंजूरी मिल चुकी है।”

इस दौरान उन्होंने लोगों को अपने आधार कार्ड पर अब नया पता अपडेट कराने को कहा है। न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, मोहल्ले में रहने वाली 70 साल की रतन चावड़ा ने कहा, “दशकों से इस जगह को पाकिस्तान मोहल्ला कहा जाता था और यही नाम चलन में आ गया था। अब मैं आधार कार्ड में नया नाम दर्ज कराने का इंतजार कर रही हूँ। मुझे बहुत खुशी है कि अब मेरे पते पर हिंदुस्तानी मोहल्ला लिखा जाएगा।”

न्यूक्लियर ब्लैकमेल नहीं अब भारत का डायरेक्ट एक्शन: 1990 से अमेरिका की गोद में बैठ भारत को ‘चुराए’ न्यूक्लियर हथियारों का डर दिखाता रहा है पाकिस्तान, पीएम मोदी ने निकाल दी हेकड़ी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से यह साफ कर दिया कि भारत कोई न्यूक्लियर ब्लैकमेल नहीं सहेगा। यह सीधे तौर पर उस न्यूक्लियर गीदड़भभकी का जवाब था जो कुछ दिनों पहले पाकिस्तानी फौज के मुखिया आसिम मुनीर ने अमेरिका की गोद में बैठकर दी थी।

परमाणु हथियारों के दम पर पाकिस्तान खुद को इस्लामिक मुल्कों का अब्बा समझता आया है और भारत को धमकाने की कोशिश करता रहा है। अतीत में उसकी धमकियाँ सफल भी हुईं लेकिन अब भारत की नीति बदल गई है। अब भारत ने नया ‘न्यू नॉर्मल’ बना लिया है, जिसमें किसी परमाणु ब्लैकमेल की कोई जगह नहीं है।

पाकिस्तान तक कैसे पहुँचे परमाणु हथियार

माना जाता है कि पाकिस्तान के परमाणु सपने की शुरुआत 1953 से ही हो गई थी जब Pakistan Atomic Energy Committee (PAEC) की स्थापना की गई। बड़ी संख्या में वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित किया जाने लगा। 1965 में जब भारत के साथ युद्ध में पाकिस्तान की हार हुई तो पाकिस्तान परमाणु हथियारों के लिए बिलबिलाने लगा।

चीन ने अक्टूबर 1964 में अपना पहला परमाणु परीक्षण कर न्यूक्लियर पावर बन गया तो मार्च 1965 में पाकिस्तान ने चीन से भी परमाणु हथियार बनाने के लिए मदद माँगी लेकिन पाकिस्तान को कोई सहयोग नहीं मिल पाया।

मार्च 1965 में पाकिस्तानी के तत्कालीन विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने कहा था, “अगर भारत परमाणु बम बनाता है तो हम घास-पत्ते खा लेंगे, भूखे रहेंगे लेकिन हमें अपना परमाणु बम बनाना ही होगा।”

दिसंबर 1971 में पाकिस्तान के दो हिस्से हो गए और बांग्लादेश का जन्म हुआ। इसके बाद पाकिस्तान की जग हँसाई होने लगी। देशी और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में पाकिस्तान की खूब खिल्ली उड़ाई गई। न्यूयॉर्क टाइम्स में तो यहाँ तक लिखा गया कि यह सैन्य अपमान उस मुस्लिम राष्ट्र के लिए बेहद दर्दनाक था जो भारतीयों को ‘मूर्ति पूजक, गौ-प्रेमी‘ कहकर घृणा करता है।

इसके कुछ ही समय बाद ही 18 मई 1974 को भारत ने राजस्थान के पोकरण में अपनी पहला सफल परमाणु परीक्षण ‘स्माइलिंग बुद्धा‘ भी कर दिया। यह ना केवल पाकिस्तान के लिए झटका था बल्कि अमेरिका भी इससे तिलमिला गया।

1974 के सितंबर में अब्दुल कादिर खान ने भुट्टो को पत्र लिखकर कहा कि उसके पास परमाणु बम बनाने के सारे ब्लूप्रिंट हैं। 1972 से ए.क्यू. खान सेंट्रीफ्यूज बनाने वाली नीदरलैंड्स की फिजिक्स डायनेमिक्स रिसर्च लेबोरेटरी में काम कर रहा था। दिसंबर 1974 में भुट्टो से मुलाकात के बाद ए.क्यू. खान यूरेनियम संवर्धन और सेंट्रीफ्यूज से जुड़े डॉक्यूमेंट्स और ब्लूप्रिंट्स चुराने लगा।

इस बीच नीदरलैंड्स की एजेंसियों को शक हुआ तो खान की निगरानी होने लगी और जाँच एजेंसियाँ इससे पहले उसे पकड़ पाती वो दिंसबर 1975 में पाकिस्तान पहुँच गए। खान उन सप्लायर्स की लिस्ट भी लेकर आए जो न्यूक्लियर बॉम्ब बनाने में इस्तेमाल होने वाले रॉ मटेरियल से लेकर टेक्निकल चीजें तक बेचते थे।

खान ने 1976 में Pakistan Atomic Energy Commission (PAEC) के साथ काम करना शुरू किया लेकिन इसके मुखिया मुनीर अहमद खान के साथ उनके मतभेद हो गए। मुनीर दरअसल प्लूटोनियम पर काम करना चाहते थेक जबकि अब्दुल के पास ब्लूप्रिंट यूरेनियम के थे।

1976 में भुट्टो ने अब्दुल के लिए इस्लामाबाद से 50 किमी दूर कहुटा में इंजीनियरिंग रिसर्च लेबोरेटरी यानी ERL शुरू की जहाँ यूरेनियम पर काम होने लगा था। 1978 आते-आते में पाकिस्तान ने यूरेनियम एनरिचमेंट का काम लगभग कर लिया और वो बम बनाने ही वाला था।

इस बीच अप्रैल 1979 में दुनिया को जब खबर लगी तो अमेरिका ने पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगा दिए। हालाँकि, यह प्रतिबंध सिर्फ दिखावे के लिए थे। वहीं, 1983 में एक डच अदालत ने अब्दुल को 4 साल की कैद की सजा सुनाई लेकिन किन्हीं ताकतों ने अब्दुल को जेल जाने से बचा लिया।

1986 में पाकिस्तान-ईरान के बीच न्यूक्लियर कोऑपरेशन अग्रीमेंट साइन हो गया। खबरें आईं कि पाकिस्तान ने वेपन ग्रेड यूरेनियम मटिरियल बना लिया है। कहा जाता है कि 1985-1990 के बीच पाकिस्तान के पास परमाणु बम के लिए जरूरी अत्यधिक संवर्द्धित यूरेनियम था।

इस बीच पाकिस्तान ने इराक, लीबिया, केन्या, माली, सूडान, मोरक्को, जैसों देशों के आतंकी संगठनों को कथित तौर पर सेंट्रीफ्यूज बेचकर मोटा पैसा कमाया था। इस बीच जब खुद को दुनिया का ‘बॉस’ समझने वाले अमेरिका को पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने चाहिए थे तो वो पाकिस्तान के समर्थन में दिख रहा था।

1990 की एक अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि पाकिस्तान ने एक परमाणु बम बना लिया था लेकिन इसका परीक्षण नहीं किया था। अक्टूबर 1990 मे अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा कि ‘अब अमेरिका ये नहीं कहेगा कि पाकिस्तान के पास न्यूक्लियर हथियार नहीं हैं’।

इसके बाद आया 1998, भारत ने 11 और 13 मई को पोकरण रेंज में 5 परमाणु परीक्षण किए। इसके 15 दिन बाद ही 28-30 मई को पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण किया और वह पहला परमाणु शक्ति संपन्न इस्लामिक देश बन गया।

पाकिस्तान की 1990 की परमाणु धमकी

पाकिस्तान के पास आधिकारिक तौर पर परमाणु बम 1998 में आया था लेकिन उसकी परमाणु धमकियों की शुरुआत 1990 से ही हो गई थी। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश को मई 1990 में यकीन हो गया था कि पाकिस्तान, भारत पर परमाणु हमला करने वाला है।

व्हाइट हाउस से सीआईए के सीनियर एजेंट रॉबर्ट गेट्स को भारत-पाकिस्तान की यात्रा पर भेजा गया। 21 मई 1990 को अमेरिका ने दुनिया को बतया कि उसने भारत और पाकिस्तान के बीच न्यूक्लियर युद्ध रुकवा दिया है।

1990 का दशक वही था जब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन देना शुरू कर दिया था। हिंदुओं को घरों से भगाया जा रहा था और हिंदू बेटियों का रेप-हत्या आम बात हो गई थी। उधर, पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो कश्मीर की आजादी का राग आलाप रही थी।

उस समय की कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि भारत ने अपने 2 लाख सैनिक, 5 अटैक यूनिट और टैंकों को पाकिस्तान के बॉर्डर पर तैनात कर दिया है। पाकिस्तान में इसे युद्ध की तैयारी के तौर पर देखा जाने लगा था। लेकिन तभी आया पहला ‘न्यूक्लियर बल्फ’। अमेरिका ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया और कथित तौर पर भारत-पाकिस्तान के न्यूक्लियर वॉर को टलवा दिया।

इसके 3 साल बाद 1993 मे The New Yorker newspapaer मे ‘On the Nuclear Edge’ नाम से एक रिपोर्ट छपी जिसमें दावा किया गया कि पाकिस्तान हमला करने वाला था। कहा गया कि बेनजीर भुट्टो इस प्लान में शामिल नहीं थी लेकिन राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान और फौज के प्रमुख मिर्जा असलम बेग बस न्यूक्लियर बटन दबाने ही वाले थे।

हालाँकि, कभी इस बात की पुष्टि नहीं हुई कि भारत ने एक गोली भी नहीं चलाई थी फिर भी पाकिस्तान अचानक से तमाम एस्कलेशन लैडर को पार करके सीधे न्यूक्लियर हमले तक क्यूँ और कैसे पहुँच गया। अमेरिका के अलावा किसी और जगह की खुफिया एजेंसी को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी? और मामले सामने आने पर पाकिस्तान के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

कारगिल में न्यूक्लियर वॉर की गीदड़भभकी

मई 1999 में, भारतीय सेना को कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ की सूचना मिली। शुरू में इसे कबायली आतंकवादियों की घुसपैठ माना गया लेकिन बाद में यह स्पष्ट हुआ कि इसमें पाकिस्तानी फौजी शामिल थे। भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया, जिसका उद्देश्य घुसपैठियों को हटाना और नियंत्रण रेखा (LoC) की स्थिति बहाल करना था।

उस समय CIA में काउंटर टेररिज्म के विशेषज्ञ रहे ब्रूस रीडेल ने अपनी किताब Avoiding Armageddon में इसका दावा किया है कि कारगिल युद्ध भी परमाणु हमले तक पहुँचने वाला था। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को संकेत मिलने लगे थे कि पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियारों को तैनात करने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।

नवाज शरीफ इसके बाद एक बिना पूर्व निर्धारित यात्रा पर अमेरिका पहुँचे। नवाज शरीफ अमेरिका से ये चाहते थे कि उनकी सरकार को भारत के आगे झुककर शांति समझौते की माँग ना करनी पड़े। इसके बाद इस युद्ध को न्यूक्लियर धमकी की आड़ में रूकवा दिया गया। जिससे भारत पाकिस्तान के खिलाफ और कड़ी कार्रवाई ना कर पाए।

भारत की कार्रवाई रोकने के लिए पाकिस्तान का न्यूक्लियर बल्फ

2008 में मुंबई पर पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकियों ने हमला किया। इसमें सैकड़ों लोगों की जान गई और भारत को इस पर जवाबी कार्रवाई करने की जरूरत थी। डेविड हेडली से लेकर कसाब तक, पाकिस्तान आर्मी और वहाँ के आतंकी इको-सिस्टम से जुड़े लोग इसमें शामिल थे। भारत के पास पाकिस्तान के खिलाफ सबूत भी थे।

उसी समय भारत ने अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील साइन की थी। इसके कई फायदे बताए जाते हैं लेकिन इस पर कई सवाल भी हैं। इस डील के बाद भारत के न्यूक्लियर हथियार टेस्ट करने, यूरेनियम एनरिचमेंट करने जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर एक अमेरिकी कैप लग गई। इस हमले के बाद पाकिस्तान पर भारत को अडवांटेज मिलता उससे पहले ही भारत के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर अमेरिकी नजर आकर टिक गईं।

इंडियान काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (ICWA) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारतीय संसद पर हमला (2001), 26/11 मुंबई हमला (2008), उरी हमला (2016) और पुलवामा हमला (2019) जैसी घटनाओं में पाकिस्तान भारत की जवाबी कार्रवाई को रोकने के लिए परमाणु हमले को ढाल के रूप में इस्तेमाल करता है।

ऑपरेशन सिंदूर में भी न्यूक्लियर बल्फ लेकिन भारत ने दिया मुँहतोड़ जवाब

पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू कर पाकिस्तान और PoK में आतंकी ठिकानों को तबाह किया। भारत की इस जवाबी कार्रवाई से पाकिस्तान बौखला गया और फिर सीधा डोनाल्ड ट्रंप के पास पहुँचा।

ट्रंप ने इस युद्ध में मध्यस्थता का दावा करते हुए बार-बार कहा कि उन्होंने परमाणु युद्ध टाल दिया है। भारत ने इस हमले के बीच कभी भी परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी नहीं दी थी। अमेरिकी फिर वही पुरानी चाल के जरिए भारत पर पाकिस्तान के न्यूक्लियर बमों का दबाव बनाना चाहता है। पाकिस्तान की फौज का मुखिया आसिम मुनीर, ट्रंप की गोद में बैठकर भारत को परमाणु युद्ध की गीदड़भभकी दे रहा है।

भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान की न्यूक्लियर ब्लैकमेल को अब भारत नहीं सहेगा। अगर पाकिस्तान कोई हमला करने की कोशिश करता है तो भारत पूरी ताकत से उसकी जवाब देगा।

क्या है पाकिस्तान की परमाणु धमकियों का मकसद?

ICWA की रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान लंबे समय से भारत के खिलाफ परमाणु हमले की धमकी को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा है। इस रणनीति के पीछे उसके तीन मुख्य उद्देश्य हैं, जो ना केवल भारत को दबाव में लाने के लिए बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ध्यान खींचने के लिए भी बनाए गए हैं।

पाकिस्तान का पहला उद्देश्य है जिया-उल-हक के उस ‘काले सपने’ को जारी रखना, जिसमें उन्होंने ‘भारत को हजार जख्म देकर लहूलुहान करने’ की बात कही थी। यह पूरी योजना परमाणु हथियारों की ढाल के तहत चलाई जाती है ताकि पाकिस्तान बिना बड़े युद्ध में उलझे भारत को लगातार नुकसान पहुँचा सके।

दूसरा उद्देश्य है भारत को किसी भी तरह की सैन्य जवाबी कार्रवाई से रोकना। इसके लिए पाकिस्तान बार-बार परमाणु हमले की धमकी देता है, जिससे भारत दबाव में आकर अपनी आक्रामक नीति बदल दे।

तीसरा उद्देश्य है दुनिया में परमाणु युद्ध की संभावनाओं पर चर्चा को हवा देना। इससे अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और बड़े देश भारत-पाकिस्तान के मुद्दे पर दखल देने आएँ। जिससे भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहुँचाया जा सके।

पेट चीरे, स्तन काटे, नंगा कर घुमाया… पंजाब से पूर्वोत्तर तक महिलाओं के शरीर पर बनाए चाँद-तारे का निशान, रेप-धर्मांतरण की वे अनकही दास्ताँ जो हैं विभाजन का स्याह सत्य

कभी-कभी यह सवाल परेशान करता है कि अगर विभाजन इतना खूनी होना था, तो हुआ ही क्यों? जमीन के टुकड़ों का बँटवारा कैसे अचानक नरसंहार और जातीय हिंसा में बदल गया? क्या हासिल करना था और क्या हासिल हुआ?

1947 का भारत विभाजन सिर्फ राजनीतिक नक्शे की लकीर नहीं था, बल्कि इतिहास का एक भयानक अध्याय था। 2 करोड़ से ज्यादा लोग बेघर हुए, करीब 20 लाख लोग सिर्फ दो महीनों में मारे गए और अनगिनत घर, गाँव, रिश्ते, और समुदाय टूट गए। लेकिन इस त्रासदी का एक और सच है, वो है औरतों पर हुई सुनियोजित और संगठित हिंसा।

उस समय 75,000 से 1,00,000 तक की संख्या में महिलाओं का अपहरण हुआ। यह हिंसा अचानक नहीं, बल्कि जानबूझकर, धार्मिक नफरत और पितृसत्तात्मक सोच से प्रेरित थी। हिंदू और सिख महिलाओं का मुस्लिम गिरोहों ने जबरन अपहरण किया। उनका रेप किया गया, गर्भवती किया गया, विरोध करने पर मार डाला गया, जलाया गया, जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया, निकाह पढ़ा दिया गया, और कई को सेक्स स्लेव बनाकर रखा गया। गर्भवती महिलाओं के पेट चीर दिए गए और भ्रूण को मार दिया गया।

ट्रेनों को रोका गया, महिलाओं की लाशें नग्न अवस्था में, विकृत हालत में, पटरियों पर फेंकी गईं। अमृतसर और लाहौर में महिलाओं को सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र घुमाया गया, जिंदा जलाया गया, उनके जननांग काट दिए गए। इतना ही नहीं हिंदू महिलाओं के शरीर पर इस्लामी चाँद-तारे के निशान बना दिए गए।

जब पंजाब में इस हिंसा की खबरें फैलीं, तो कई सिख परिवारों ने सामूहिक आत्महत्या और ‘ऑनर किलिंग’ का रास्ता अपनाया। रावलपिंडी के थुआ खालसा गाँव में पूरी-की-पूरी महिलाओं ने कुएँ में कूदकर जान दे दी, ताकि बलात्कार से बच सकें। कई पिता, भाई और चाचा ने अपने घर की बेटियों और बहनों की गला काटकर हत्या कर दी।

बंगाल, असम और त्रिपुरा ज्यादा चर्चा में नहीं आए, लेकिन वहाँ भी हालात उतने ही भयावह थे। बंगाल में, खासकर बरिसाल और खुलना में, जमींदार घरानों की लड़कियों का अपहरण हुआ। बिनादास नाम की एक महिला ने बताया कि कैसे उन्हें और उनकी बहन को उठा लिया गया। उनकी बहन कभी वापस नहीं मिली।

15 साल से कम उम्र की लड़कियों को घरेलू नौकर या सेक्स वर्कर बनाकर सीमा पार ले जाया गया, कुछ को चिटगाँव और रंगपुर तक बेच दिया गया। एक और महिला, अनीमा चक्रवर्ती, 1951 में ढाका के एक कोठे में पाई गई। कई लड़कियों का दिन में 40–60 बार रेप किया जाता था।

1947 के सिलहट जनमत संग्रह के बाद हिंदू बंगाली अचानक ‘विदेशी’ हो गए। मुस्लिम लीग के गुंडों ने हिंदू घरों पर हमले किए, औरतों को निशाना बनाया। करीमगंज की एक बुजुर्ग महिला ने कहा, “हम भूसे के ढेर में छुप गए, लेकिन वे लड़कियों को उठा ले गए।” एक और महिला ने गवाही दी, “हम सिर्फ दो कपड़ों के साथ निकले थे, लेकिन बॉर्डर पर मेरी बहन छिन गई।”

1950 में ढाका, बरिसाल, और चिटगाँव में फिर दंगे हुए। मंदिरों में औरतों का सामूहिक बलात्कार, अंग-भंग, और जबरन धर्म परिवर्तन किया गया। कई महिलाएँ असम के शरणार्थी कैंपों में आईं। कुछ गर्भवती थीं, कुछ का शरीर काटा-पीटा गया था। बहुत सी महिलाओं ने अपनी चुप्पी कभी नहीं तोड़ी।

त्रिपुरा और चकमा जनजाति की औरतें, जो कोमिल्ला और चिटगाँव से भागकर आईं, वो रास्ते में गैंग रेप की शिकार हुईं। अगरतला के पास के शरणार्थी कैंप में एक 13 साल की चकमा लड़की ने गवाही दी कि उसके पिता ने उसे जहर देने की कोशिश की ताकि वह हमलावरों के हाथ न लगे, वह बच गई, लेकिन उसके पिता मर गए।

इन औरतों की कहानियाँ अक्सर इतिहास की किताबों में नहीं मिलतीं। लेकिन उनका मौन आज भी सबसे ऊँची आवाज में यह याद दिलाता है कि विभाजन सिर्फ सीमाओं का बँटवारा नहीं था, यह औरतों के शरीर पर लिखा गया खून का इतिहास था।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में मीता नाथ बोरा ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

भारत विभाजन के वक्त RSS ने जमीन पर निभाई भूमिका: सरदार पटेल ने भी की थी काम की तारीफ, लाखों हिंदुओं के खून से सना है इतिहास

14 अगस्त, 1947 भारत के इतिहास का वह काला दिन, जो लाखों भारतीयों के खून से रंगा है। यह भारत के विभाजन का समय था। भारत को ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ के कारण धर्म के आधार पर विभाजित किया गया था।

मुस्लिमों ने एक अलग राष्ट्र की माँग की थी, लेकिन इसकी आग में हजारों हिंदू झुलस गए। पाकिस्तान के रूप में जब मुस्लिम राष्ट्र अस्तित्व में आया, तो हजारों हिंदुओं के शव पाकिस्तान से आने वाली ट्रेनों में लाद दिए गए। यही नहीं हजारों हिन्दू महिलाओं के साथ रेप किया गया, बच्चों को अनाथ बना दिया गया।

स्थिति इतनी गंभीर थी कि वर्तमान पाकिस्तान में रहने वाले लाखों हिंदू खतरे में थे। इस विभाजन ने न केवल जमीन पर लाइन खींची, बल्कि लाखों हिंदुओं के दिलों को भी छलनी कर दिया। इन अत्याचारों के खिलाफ हिंदुओं की पुकार सुनने वाला कोई नहीं था।

हिंदू मर रहे थे और अपने पूर्वजों की भूमि से पलायन कर रहे थे। ऐसी कठिन परिस्थिति में हिन्दुओं के साथ अगर कोई खड़ा था तो वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस था। न तो सरकार को और न ही कॉन्ग्रेस को इसकी परवाह थी।

विभाजन के दौरान संघ के स्वयंसेवकों की भूमिका

विभाजन के समय, संघ और उसके स्वयंसेवकों ने पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर कड़ी नज़र रखी। जब दंगे भड़के और नेहरू सरकार पूरी तरह से बैकफुट पर आ गई, तो संघ ने आगे आकर पाकिस्तान से आए लाखों हिंदू शरणार्थियों के लिए तीन हजार से ज्यादा राहत शिविरों की व्यवस्था की।

आरएसएस ने पाकिस्तान में रह रहे हिंदुओं को सुरक्षित भारत लाने का बीड़ा उठाया था। आरएसएस को एक साथ दो मोर्चों पर लड़ना था। एक पाकिस्तान से हिंदुओं को किसी भी कीमत पर बाहर निकालना और दूसरा देश के अंदर हिन्दू विरोधी दंगों से लड़ना। ये दंगे मुस्लिम लीग करा रहा था।

संघ पर काम कर चुके प्रोफेसर डॉ. हरेंद्र सिंह ने एक लेख में लिखा है कि देश के विभाजन के वक्त मुस्लिम लीग ने भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक जमा कर लिए थे। दिल्ली में इन हथियारों और विस्फोटकों को रखने की व्यवस्था की गई थी। इतना ही नहीं, कई मस्लिम कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित भी किया गया। साथ ही भारत में रहने वाले हिंदुओं और सिखों के नरसंहार की साजिश भी रची।

ऐसे समय में संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी जान जोखिम में डालकर इस षड्यंत्र का पर्दाफाश किया। संघ के कुछ नेता और स्वयंसेवक जहाँ देश के भीतर हिंदुओं की रक्षा कर रहे थे, वहीं कई बड़े नेता और स्वयंसेवक पाकिस्तान में हिंदुओं की स्थिति पर नज़र बनाए हुए थे।

लेख में कहा गया है कि विभाजन के समय, आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक गुरुजी ने स्वयं कहा था, “जब तक वहाँ (पाकिस्तान में) एक भी हिंदू है, उसे वहाँ मत छोड़ो।” उनके आह्वान पर, लाखों स्वयंसेवकों ने पाकिस्तान से करीब दो करोड़ हिंदुओं को सुरक्षित निकाल कर ले आए। पाकिस्तान में हिन्दुओं की मदद के साथ-साथ आधुनिक बांग्लादेश में फँसे हिंदुओं के जीवन को बचाने में भी आरएसएस लगा रहा।

पाकिस्तान के पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, लाहौर, कराची जैसे क्षेत्रों में तत्कालीन सरसंघचालक गुरुजी और संघ के बड़े नेता लगातार मेहनत कर रहे थे और वहाँ हिन्दूओं की सुरक्षा का इंतजाम किया जा रहा था।

संघ ने वीर सावरकर जैसे क्रांतिकारियों और बाला साहेब देवरसजी जैसे नेताओं को पंजाब भेजा। राष्ट्र सेविका समिति की संचालिका सिंधुताई हिन्दू महिलाओं को संगठित करने के लिए तीन हफ्ते तक कराची से लाहौर तक जागरुकता अभियान चलाया।

हिन्दुओं की जान आरएसएस ने बचाया

पाकिस्तान में हिन्दुओं के जीवन और सम्मान की रक्षा का जिम्मा आरएसएस ने उठाया था। संघ ने लाहौर में 80 और पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में 300 से ज्यादा शिविर स्थापित किए। इसके अलावा भारत के जम्मू, दिल्ली, अमृतसर, कोलकाता में हिन्दू रक्षा समिति, पंजाब राहत समिति समेत कई राहत शिविरों की स्थापना की, जहाँ विस्थापितों को रखा गया था।

संघ ने बिछड़े हुए भाई-बहनों, माता-पिता, पति-पत्नी को मिलाया। घायलों के इलाज की व्यवस्था और जरूरत पड़ने पर रक्तदान तथा रक्तदान शिविरों की आयोजन किया। हर दिन 20 से 25 हजार लोगों को भोजन कराने और कपड़े, बर्तन, खाद्य सामग्री आदि उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई। देश के कई शहरों के स्कूलों, धर्मशालाओं में विस्थापितों के रहने की व्यवस्था की गई।

सरदार पटेल ने की थी आरएसएस के कार्यों की तारीफ

सरदार वल्लभभाई पटेल ने विभाजन के समय में स्वयंसेवकों के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा था, “इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि संघ के वीर स्वयंसेवकों ने अनगिनत निर्दोष महिलाओं और बच्चों की जान बचाई। वे उन्हें दूर-दूर से बचाकर यहाँ लाए।” हालाँकि यह भी एक सच्चाई है कि संघ के इस वीरतापूर्ण कार्य पर बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया।

जब महात्मा गाँधी नोआखली में बैठे थे और हिंदू मर रहे थे, बच्चों के अंग-भंग हो रहे थे और महिलाओं को लूटा जा रहा था। उस वक्त केवल संघ के कार्य ही जमीन पर हो रहे थे। संघ के हजारों स्वयंसेवकों ने बिना किसी प्रचार के पीड़ितों की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था।

इस्लामिक जिहाद के शिकार बने लाखों हिन्दू

भारत और पाकिस्तान दोनों ही जगहों पर हिंदू हिंसा के सबसे ज्यादा शिकार हुए। लगभग 20 लाख लोग मारे गए और दो करोड़ लोगों को अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़नी पड़ी। बेटियों के साथ उनके बाप के सामने बलात्कार किया गया। पूरे-पूरे परिवार जला दिए गए। मंदिरों और गुरुद्वारों को निशाना बनाया गया और छोटे बच्चों, बुज़ुर्गों और यहाँ तक कि महिलाओं को भी मुस्लिम भीड़ ने मार डाला।

सबसे भीषण हिंसा सिंध, हैदराबाद, पंजाब, बंगाल और कश्मीर में हुई। कश्मीर में कबायली वेश में पाकिस्तानियों ने हिंदुओं का कत्लेआम किया। सिंध, बंगाल और पंजाब में हिंदू और सिख परिवारों को जिंदा जला दिया गया और बच्चों को प्रताड़ित करके मार डाला गया। हिंदू महिलाओं और बच्चियों के साथ बलात्कार और सामूहिक बलात्कार आम बात थी। लाखों लोग इस अत्याचार को कभी नहीं भूल पाएँगे।

ऐसी भयानक, क्रूर और बर्बर घटनाओं को इतिहास से मिटा दिया गया। इतिहास में ऐसी घटनाओं का कोई जिक्र नहीं है। इसमें मुंशी, सावरकर, सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे लोग शामिल हैं। करोड़ों हिंदुओं के दर्द को याद करने और आने वाली पीढ़ी को सच्चाई से रूबरू कराने का यही काम प्रधानमंत्री मोदी विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के माध्यम से कर रहे हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन में आरएसएस की भूमिका

एक सोची-समझी साजिश के तहत वामपंथियों और कॉन्ग्रेस ने ये दुष्प्रचार किया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वतंत्रता संग्राम में निष्क्रिय रहा। सच तो यह है कि संघ ने न सिर्फ महान स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका निभाई, बल्कि जरूरत पड़ने पर स्वंयसेवकों ने अपनी जान भी दी।

उमाकांत कड़िया जैसे संघ स्वयंसेवकों ने गांधीजी के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में भाग लिया। ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में पहली गोली खाने वाले वह पहले क्रांतिकारी थे।

हकीकत यह है कि जब देश को जरूरत पड़ी, संघ ने आगे आकर मदद की। जब तत्कालीन नेहरू सरकार बैकफुट पर थी, तब इसी संघ के स्वयंसेवकों ने पाकिस्तानी सेना और मुस्लिम लीग की गतिविधियों का पर्दाफाश करके सरकार की मदद की। इस स्वतंत्रता संग्राम में अनेक स्वयंसेवकों ने भाग लिया और देश के लिए अपने प्राणों की आहुति तक दे दी।

इसके अलावा, जब हिंदू समुदाय अलग-थलग पड़ गया, तब केवल संघ के स्वयंसेवक ही उनके साथ खड़े रहे। उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर हिंदू समुदाय के लिए संघर्ष किया और लाखों लोगों की जान भी बचाई। उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार पटेल ने भी कहा था कि संघ के हजारों बहादुर स्वयंसेवक लाखों लोगों की जान बचाने और महिलाओं के खिलाफ हो रही बर्बरता को रोकने के लिए सबसे आगे थे।

इसलिए, कांग्रेस और वामपंथी इतिहासकारों-गिरोह का यह दावा कि आरएसएस स्वतंत्रता संग्राम में शामिल नहीं था, निराधार है और जानबूझकर एक षडयंत्र के तहत फैलाया गया है। प्रकृति का नियम है कि सत्य को चाहे कितना भी दबाया जाए, सही समय पर वह सामने आ ही जाता है। यही सही समय है।

(मूल रूप से गुजराती में ये रिपोर्ट लिखी गई है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

भारत के किसानों, मछुआरे, पशुपालकों से जुड़ी कोई भी अहितकारक नीति के आगे दीवार बनकर खड़ा है मोदी, कोई भी समझौता स्वीकार नहीं: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार 12वीं बार लालकिले पर ध्वजारोहण किया। वे लालकिले की प्रचीर से देश को संबोधित कर रहे हैं। इस दौरान पीएम मोदी ने कहा,”भारत के मछुआरे, पशुपालकों से जुड़ी कोई भी अहितकारक नीति के आगे मोदी दीवार बनकर खड़ा है।”

पीएम मोदी ने कहा, “हम खेती के मामले में वे जिले जो दूसरों से पीछे रह गए, जहाँ खेती अपेक्षाकृत कम है। इसके लिए हमने पीएम धनधान्य कृषि योजना को आरंभ किया है। हमने ऐसे 100 जिलों की पहचान की है, जहाँ खेती कमजोर है। इस योजना के जरिए हम उन 100 जिलों में खेती को बेहतर कराने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के मछुआरे, पशुपालकों से जुड़ी कोई भी अहितकारक नीति के आगे मोदी दीवार बनकर खड़ा है। भारत अपने किसानों अपने पशुपालकों और अपने मछुआरों के संबंध में कभी भी कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा।”

प्रधानमंत्री ने कहा,”पीएम मोदी ने कहा कि सरकार फाइलों में नहीं होनी चाहिए। सरकार लोगों की लाइफ में होनी चाहिए। कुछ लोगों को लगता है कि सरकार की योजनाएँ तो पहले भी आती थीं, लेकिन हम सरकार की योजना को जमीन पर लाते हैं।”

उन्होंने कहा, “कोई हकदार छूटे नहीं और सरकार उनके घर तक जाए, ऐसी हमारी कोशिश रही। जनधन अकाउंट से आम व्यक्ति को यह विश्वास मिला था कि बैंक के दरवाजे हमारे लिए बंद नहीं हैं और मैं भी बैंक जा सकता हूँ।”

‘अब नहीं सहेंगे न्यूक्लियर ब्लैकमेल’: PM मोदी की लाल किले से पाकिस्तान को सीधी चेतावनी, कहा – Operation Sindoor से Pak की नींद अभी भी उड़ी हुई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (15 अगस्त 2025) को 79वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया। इसके बाद पीएम मोदी ने अपने संबोधन के दौरान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में शामिल जवानों का अभिनंदन किया है। पीएम मोदी ने कहा, “हमारे वीर जवानों ने दुश्मनों को उनकी कल्पना से परे सजा दी है।”

पीएम मोदी ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले को लेकर कहा, “पहलगाम में सीमा पार से आए आतंकियों ने जैसा कत्लेआम किया, धर्म पूछ पूछ-कर लोगों का मारा, पत्नियों के सामने, बच्चों के सामने लोगों के मारा। पूरा हिंदुस्तान आक्रोश से भरा हुआ था और पूरा विश्व इस संहार से चौंक गया था। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ उसी आक्रोश की अभिव्यक्ति है।”

सेना ने वो किया जो दशकों तक नहीं हुआ: पीएम मोदी

पीएम मोदी ने बताया कि 22 तारीख के बाद सेना को खुली छूट दे दी गई थी। पीएम मोदी ने कहा, “रणनीति वो तय करें, लक्ष्य वो तय करें और समय भी वो चुनें। हमारी सेना ने वो करके दिखाया, जो कई दशकों तक कभी हुआ नहीं था। सैकड़ों किमी दुश्मन की धरती में घुसकर आतंकी हेडक्वार्टर को मिट्टी में मिला दिया। आतंकी इमारतों को खंडहर बना दिया।”

पाकिस्तान की नींद अभी भी उड़ी हुई है: पीएम मोदी

पीएम मोदी ने अपने संबोधन के दौरान कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद अभी भी पाकिस्तान की नींद उड़ी हुई है। पीएम मोदी ने कहा, “पाकिस्तान में हुई तबाही इतनी बड़ी है कि रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं, नई-नई जानकारी आ रही है।”

नहीं सहेंगे न्यूक्लियर ब्लैकमेल: पीएम मोदी

पीएम मोदी ने लाल किले की प्राचीर से कहा कि हमारा देश कई दशकों से आतंक को झेलता आया है। उन्होंने कहा, “देश के सीने को छलनी कर दिया गया है लेकिन अब हमने न्यू नॉर्मल प्रस्थापित किया है।”

उन्होंने कहा, “आतंक और आतंकियों को पालने-पोसने वालों को, आतंकियों को ताकत देने वालों को अब हम अलग-अलग नहीं मानेंगे। वो मानवता के समान दुश्मन हैं, उनके बीच कोई फर्क नहीं है। भारत ने तय कर लिया है कि न्यूक्लियर की धमकियों को हम सहने वाले नहीं है। न्यूक्लियर ब्लैकमेल लंबे समय से चला आया, अब ब्लैकमेल नहीं सहेंगे।”

आगे भी मुँहतोड़ जवाब देंगे: पीएम मोदी

पीएम मोदी ने स्पष्ट कर दिया की अगर आगे कोई आतंकी हमले जैसी कोशिश हुई तो भारत उसका मुँहतोड़ जवाब देगा। पीएम मोदी ने कहा, “आगे भी अगर दुश्मनों ने ये कोशिश जारी रखी, हमारी सेना तय करेगी, सेना की शर्तों पर, सेना जो समय तय करे उस समय पर, सेना जो तौर-तरीके तय करे उस तौर-तरीके से, सेना जो लक्ष्य तय करे उस लक्ष्य को अब हम अमल में लाने वाले हैं। हम मुँहतोड़ जवाब देंगे।”

खून और पानी एकसाथ नहीं बहेंगे: पीएम मोदी

पीएम मोदी ने पाकिस्तान से साथ अब स्थगित कर दिए गए सिंधु जल समझौते को लेकर कहा कि भारत ने तय कर लिया है कि खून और पानी एकसाथ नहीं बहेंगे।

पीएम ने कहा, “देश को पता लग गया है कि सिंधु जल समझौता कितना अन्यायपूर्ण और एकतरफा है। भारत से निकलती नदियों का पानी दुश्मन के खेतों को सींच रहा है। मेरे देश के किसान, मेरे देश की धरती पानी के बिना प्यासी है।”

उन्होंने कहा, “पानी और यह कैसा समझौता था, जिसने पिछले 7 दशक से देश के किसानों का अकल्पनीय नुकसान किया है। हिंदुस्तान के हक के पानी पर अधिकार हिंदुस्तान और यहाँ के किसानों का है। भारत ने सिंधु समझौते के जिस स्वरूप को दशकों तक सहा है, उसे आगे नहीं सहा जाएगा। किसान हित में, राष्ट्र हित में यह समझौता हमें मंजूर नहीं है।”