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PM धन-धान्य कृषि योजना से ग्रामीण महिलाएँ होंगी सशक्त, ट्रेनिंग से लेकर तकनीक और बाजार तक सीधी पहुँच: आत्मनिर्भर भारत की दिशा में मोदी सरकार का बड़ा कदम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार (11 अक्तूबर 2025) नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) में विशेष कृषि कार्यक्रम में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने देशभर के किसानों से संवाद किया और कई नई योजनाओं की शुरुआत की ।

पीएम मोदी ने 35,440 करोड़ रुपए की दो प्रमुख योजनाओं का शुभारंभ किया।  24,000 करोड़ रुपए की प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना और 11,440 करोड़ रुपए के दलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता मिशन।

इन योजनाओं का उद्देश्य फसल विविधीकरण, भंडारण क्षमता बढ़ाना, सिंचाई सुविधाओं में सुधार और दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना है। इसके अलावा प्रधानमंत्री कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन और खाद्य प्रसंस्करण से जुड़ी 5,450 करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाओं का उद्घाटन और 815 करोड़ रुपए की नई परियोजनाओं की आधारशिला रखेंगे।

इनमें देशभर में कोल्ड चेन, आईवीएफ लैब, मछली चारा संयंत्र और डेयरी से जुड़ी परियोजनाएँ शामिल हैं। कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी किसानों को प्रमाण पत्र भी वितरित किया और विभिन्न योजनाओं से लाभान्वित दलहन किसानों से सीधा संवाद किया।

क्या है प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PMDDKY)

भारत सरकार ने किसानों की आमदनी बढ़ाने और खेती को आधुनिक, टिकाऊ और लाभदायक बनाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PMDDKY) की शुरुआत की है। यह योजना 1 फरवरी 2025 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा केंद्रीय बजट 2025-26 में घोषित की गई थी और 16 जुलाई 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसे मंजूरी दी।

इस योजना का मुख्य उद्देश्य भारत के उन 100 पिछड़े जिलों में कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाना है, जहाँ खेती से जुड़ी समस्याएँ जैसे कम उत्पादन, पानी की कमी, संसाधनों की कमी और किसानों की आर्थिक तंगी सबसे ज्यादा हैं।

इस योजना के तहत सरकार ने 2025-26 से 2030-31 तक कुल छह साल के लिए 1.44 लाख करोड़ रुपए  का बजट निर्धारित किया है। हर साल 24,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँगे ताकि देशभर के लगभग 1.7 करोड़ किसानों को इसका लाभ मिल सके। इनमें से अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है। यह वर्ग भारत के कुल किसानों का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा है।

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना की खासियत यह है कि यह 36 अलग-अलग कृषि योजनाओं को एक साथ जोड़ती है, ताकि किसानों को एक ही मंच पर सभी सुविधाएँ मिल सकें। इन योजनाओं में प्रमुख रूप से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN), प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) शामिल हैं। अब किसानों को बीमा, सिंचाई, ऋण, प्रशिक्षण और बाजार तक पहुँच जैसी सभी सुविधाएँ एक ही जगह मिलेंगी, जिससे योजना का असर ज्यादा व्यापक और प्रभावी होगा।

यह योजना नीति आयोग के आकांक्षी जिलों के कार्यक्रम से प्रेरित है, जिसने देश के पिछड़े जिलों को शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत ढाँचे में सुधार करके आगे बढ़ाया। उसी तर्ज पर PMDDKY उन जिलों पर ध्यान केंद्रित करेगा जहाँ फसल उत्पादन राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। जैसे कि जिन जिलों में गेहूँ की पैदावार 3.5 टन प्रति हेक्टेयर से कम है या जहाँ खेती का तीव्रता अनुपात 155 प्रतिशत से कम है, वहाँ यह योजना विशेष रूप से काम करेगी।

भारत में लगभग 46 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है, लेकिन अब भी किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई जिलों में मिट्टी की गुणवत्ता खराब है, सिंचाई की व्यवस्था सीमित है और किसान पारंपरिक खेती पद्धति अपनाते हैं जिससे पैदावार कम होती

भारत में करीब 52 प्रतिशत खेती अब भी मानसून पर निर्भर है। बारिश कम या ज्यादा होने पर किसानों की फसलें बर्बाद हो जाती हैं। किसानों के पास आधुनिक खेती के साधन और संसाधन भी नहीं हैं।

बहुत से किसान उच्च गुणवत्ता वाले बीज, जैविक खाद या ट्रैक्टर-हार्वेस्टर जैसी मशीनें नहीं खरीद पाते। इसके अलावा, भंडारण की कमी के कारण लगभग 20 प्रतिशत फसलें खराब हो जाती हैं, जिससे हर साल लगभग 50,000 करोड़ रुपए का नुकसान होता है। मंडियों में बिचौलियों के कारण किसानों को फसल का उचित दाम भी नहीं मिल पाता।

इन सभी समस्याओं को देखते हुए सरकार ने PMDDKY के तहत किसानों को सीधी आर्थिक सहायता, फसल बीमा, सिंचाई और भंडारण सुविधाएँ, कृषि ऋण, प्रशिक्षण, और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है।

इस योजना के तहत एक राष्ट्रीय संचालन समिति, राज्य स्तरीय निगरानी समिति, और जिला धन-धान्य समितियाँ बनाई गई हैं, जो स्थानीय जरूरतों के हिसाब से योजना को लागू करेंगी। सभी गतिविधियों की निगरानी एक डिजिटल डैशबोर्ड के माध्यम से की जाएगी जिसमें 117 प्रमुख इंडेक्स होंगे, जैसे फसल उत्पादन, ऋण वितरण और भंडारण उपयोग।

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना की शुरुआत अक्टूबर 2025 में रबी सीजन से की जाएगी, जबकि इसके लिए आवेदन प्रक्रिया सितंबर 2025 में शुरू किया जा चुका है। इसके लिए किसानों को ऑनलाइन आवेदन करने की सुविधा भी मिलेगी।

महिला किसानों को मिलेगा फायदा

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PMDDKY) में महिलाओं को सशक्त बनाने पर विशेष जोर दिया गया है। इसके तहत 10,000 महिला उत्पादक समूह बनाए जा रहे हैं, जो डेयरी, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन और जैविक खेती जैसे कार्यों में जुड़ी महिलाओं को प्रशिक्षण, ऋण और बाजार की सुविधा देंगे। जुलाई 2025 तक 5,000 समूह बन चुके हैं और दिसंबर तक बाकी 5,000 पूरे होंगे, जिससे लगभग 5 लाख महिलाओं को सीधा लाभ मिलेगा।

महिलाओं को आधुनिक खेती, खाद्य प्रसंस्करण (जैसे पनीर या जैम बनाना) और व्यवसाय चलाने की मुफ्त ट्रेनिंग दी जा रही है। साथ ही, 10,000 से 1 लाख तक के माइक्रो लोन आसान ब्याज दर पर दिए जा रहे हैं, ताकि वे छोटे व्यवसाय शुरू कर सकें।

ऐप और सहकारी समितियों के जरिए महिलाएँ अपने उत्पाद सीधे बाजार में बेच पाती हैं, जिससे उन्हें 20–50% ज्यादा दाम मिलते हैं। जिलास्तरीय समितियों में भी महिलाओं को नेतृत्व का मौका दिया गया है, जिससे वे नीतियों में भागीदारी कर सकें।

योजना में बड़े किसानों और निजी कंपनियों को भी जोड़ा गया है। आईटीसी, महिंद्रा और गोदरेज जैसी कंपनियाँ बीज, मशीनें और बाजार उपलब्ध कराने में साझेदारी कर रही हैं। बड़े किसानों को 1-10 लाख रुपए  तक के ऋण, भंडारण सुविधा, और आधुनिक तकनीक जैसे ड्रोन व सेंसर दिए जा रहे हैं।

सिंचाई सुधार के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम से 30-50% पानी की बचत और 20% तक पैदावार बढ़ाने का लक्ष्य है। 50-80% सब्सिडी के साथ यह तकनीक बुंदेलखंड और सीमांचल जैसे सूखे इलाकों में लागू होगी। स्मार्ट सिंचाई सिस्टम मिट्टी की नमी मापकर पानी की सही मात्रा तय करेगा, जिससे खेती अधिक उत्पादक और टिकाऊ बनेगी।

तालिबान का मंत्री, अफगानिस्तान की एंबेसी और चुनिंदा पत्रकार: PC में महिलाओं के एंट्री बैन पर भारत सरकार क्यों दे जवाब? क्या कॉन्ग्रेसी भूल गए वियना कन्वेंशन और शाहबानो केस

भारत दौरे पर आए तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने नई दिल्ली में अफगानिस्तान के दूतावास में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, जिसमें करीब 20 पत्रकारों को बुलाया गया। लेकिन इसमें एक भी महिला पत्रकार नहीं थी।

ये फैसला अफगानी अधिकारियों का था और भारत सरकार का इसमें कोई रोल नहीं था। फिर भी कॉन्ग्रेस पार्टी ने इसे भारत सरकार के खिलाफ मोड़ दिया और महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिश की।

दरअसल, अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी इन दिनों भारत दौरे पर हैं। उनका ये दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत ने अभी तक तालिबान शासन को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है। फिर भी दोनों देशों के बीच बातचीत हो रही है, खासकर पाकिस्तान को काउंटर करने के लिए।

मुत्ताकी ने यहाँ से पाकिस्तान को ललकारा और भारत के साथ दोस्ती बढ़ाने की बात की। लेकिन इसी दौरे के दौरान एक विवाद खड़ा हो गया, जिसे भारत के अंदर सियासी तूफान बनाने की कोशिश हो रही है।

ये घटना शुक्रवार (10 अक्टूबर 2025) को हुई, जब मुत्ताकी ने भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की। बैठक के कुछ घंटों बाद दूतावास में प्रेस मीट हुई। तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि वहाँ सिर्फ पुरुष पत्रकार ही थे। मुत्ताकी से जब महिलाओं की स्थिति पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने सीधा जवाब देने से बचते हुए कहा कि हर देश के अपने रीति-रिवाज होते हैं।

ये बात सही है कि तालिबान अफगानिस्तान में महिलाओं पर कई पाबंदियाँ लगाता है – जैसे शिक्षा, नौकरी और सार्वजनिक जगहों पर। लेकिन ये प्रेस कॉन्फ्रेंस अफगान दूतावास में हुई, जो तकनीकी रूप से अफगानिस्तान की सोवरेन टेरिटरी मानी जाती है। वहाँ अफगान नियम लागू होते हैं और भारत सरकार अंदर की गतिविधियों में दखल नहीं दे सकती। सिर्फ बाहर की सुरक्षा का जिम्मा भारत का है। अगर कोई गलत काम हो, तो ज्यादा से ज्यादा भारत उस दूतावास के लोगों को ‘परसोना नॉन ग्राटा’ घोषित कर देश से बाहर कर सकता है। अंतर्राष्ट्रीय कानून यही कहते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय कानून (वियना कन्वेशन 1961) के मुताबिक एंबेसीज यानी दूतावासों के पास कई अहम अधिकार होते हैं, जैसे-

  • संप्रभुता: स्थानीय पुलिस या अधिकारी बिना अनुमित के दूतावास के अंदर भी नहीं जा सकते।
  • सुरक्षा: इसकी जिम्मेदारी मेजबान देश की होती है। अधिकारियों और उनके परिवार को विशेष सुरक्षा (डिप्लोमेटिक इम्यूनिटी) हासिल होती है, इसके तहत उन पर स्थानीय कानूनों के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती।
  • तलाशी या जब्ती: दूतावास की इमारत, उसमें रखे दस्तावेज या सपंत्ति की तलाशी-जब्ती नहीं की जा सकती।
  • संबंध खराब होने पर भी सुरक्षा: दूतावास के अंदर की संपत्ति और दस्तावेजों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी मेजबान देश की होती है।

अंतर्राष्ट्रीय नियमों को नजरअंदाज कर कॉन्ग्रेस ने की सियासी लाभ लेने की कोशिश

ये बात जानना अहम है कि वियना कन्वेशन 1961 एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जो डिप्लोमेटिक मिशनों और कर्मचारियों के अधिकार और कर्तव्यों को तय करता है। फिर भी कॉन्ग्रेस ने इस पर हंगामा मचा दिया। प्रियंका गाँधी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, कृपया साफ करें कि तालिबान प्रतिनिधि की प्रेस कॉन्फ्रेंस से महिला पत्रकारों को क्यों हटाया गया। अगर महिलाओं के अधिकारों पर आपकी बातें सिर्फ चुनावी दिखावा नहीं हैं, तो देश की काबिल महिलाओं का अपमान हमारे देश में कैसे होने दिया?”

राहुल गाँधी ने इसे शेयर करते हुए लिखा, “मोदी जी, जब आप महिला पत्रकारों को बाहर करने की अनुमति देते हैं, तो आप भारत की हर महिला को बता रहे हैं कि आप उनके लिए खड़े होने में कमजोर हैं। महिलाओं को हर क्षेत्र में समान अधिकार है, और आपकी चुप्पी ‘नारी शक्ति’ के नारों के खोखलेपन को दिखाती है।”

इन दोनों भाई-बहन ने इसे सीधे मोदी सरकार से जोड़ दिया, जैसे कि ये भारत की मिट्टी पर हुआ कोई अपमान हो। पूर्व मंत्री पी चिदंबरम ने तो यहाँ तक कह दिया कि पुरुष पत्रकारों को बहिष्कार करना चाहिए था। उन्होंने लिखा, “मैं हैरान हूँ कि अफगानिस्तान के अमीर खान मुत्ताकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस से महिलाओं को बाहर किया गया। पुरुष पत्रकारों को बाहर निकल जाना चाहिए था।”

हालाँकि सच्चाई ये है कि सरकार के सूत्रों ने साफ कहा है कि “विदेश मंत्रालय का इस प्रेस वार्ता में कोई रोल नहीं था।” भारतीय पक्ष ने तो महिला पत्रकारों को शामिल करने का सुझाव भी दिया था, लेकिन तालिबान ने माना नहीं।

कॉन्ग्रेस को याद करना चाहिए शाहबानो केस

अब सवाल ये उठता है कि कॉन्ग्रेस ये हंगामा क्यों मचा रही है? क्या ये वाकई महिलाओं के अधिकारों की चिंता है या सिर्फ राजनीतिक मौका तलाशना?

सबसे पहले तो ये समझना जरूरी है कि कॉन्ग्रेस का इतिहास महिलाओं के अधिकारों पर कैसा रहा है। याद कीजिए शाहबानो केस को। 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो नाम की एक मुस्लिम महिला को तलाक के बाद गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया। ये फैसला मुस्लिम महिलाओं के हक में था। लेकिन राजीव गाँधी के नेतृत्व में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने इस फैसले को पलटने के लिए मुस्लिम वुमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स) एक्ट पास कर दिया।

क्यों? क्योंकि कुछ कट्टर मुस्लिम नेताओं ने शरिया कानून का हवाला देकर विरोध किया। कॉन्ग्रेस ने महिलाओं के अधिकारों को ‘इस्लामिक वैल्यूज’ के आगे झुका दिया। आज वही कॉन्ग्रेस तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर चीख रही है, जहाँ महिलाओं को नहीं बुलाया गया- जो कि शरिया की ही माँग है। ये दोहरापन नहीं तो क्या है?

शरिया वालों के साथ उठना-बैठना, लेकिन तालिबान…

और सिर्फ इतना ही नहीं। कॉन्ग्रेस अक्सर उन तत्वों के साथ गठबंधन करती है जो शरिया की वकालत करते हैं। जैसे कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के साथ केरल में उनका गठजोड़। IUML शरिया को बढ़ावा देने वाले विचार रखती है। कॉन्ग्रेस के नेता दिन भर ऐसे लोगों के साथ उठते-बैठते हैं, हज सब्सिडी देते हैं, लेकिन जब तालिबान जो शरिया लागू करता है अपनी एंबेसी में महिलाओं को नहीं बुलाता, तो इसे पूरे भारत से जोड़ देते हैं। ये दोगलापन साफ दिखता है।

अगर कॉन्ग्रेस को महिलाओं के हक की इतनी फिक्र है, तो क्यों नहीं वे अपने सहयोगियों से पूछते कि शरिया में महिलाओं की क्या स्थिति है? तालिबान तो शरिया का चरम रूप है, लेकिन भारत में भी कई जगहों पर ऐसी सोच फैली है और कॉन्ग्रेस चुप रहती है।

केरल को तालिबानी राज में बदलने की कोशिशों पर कॉन्ग्रेस की चुप्पी

अब असली सवाल ये है कि कॉन्ग्रेस वाले खुद कब तालिबान जैसे नियमों का समर्थन करते हैं? या शरिया कानून के कट्टर समर्थकों के साथ गठजोड़ करते हैं? देखिए, केरल का हाल। वहाँ वामपंथी और कॉन्ग्रेस बारी-बारी सत्ता संभालते हैं। हाल ही में कासरगोड के एक कॉलेज में गाजा पर डिबेट हुई। विषय था- “गाजा से विज्ञान और मजहब तक।” लेकिन नजारा अफगानिस्तान जैसा। वहाँ छात्र और छात्राओं के बीच पर्दा लगा दिया गया। हिजाब पहनी मुस्लिम छात्राओं को पर्दे के पीछे बिठा दिया गया। मंच पर चढ़ा इस्लामी कट्टरपंथी डॉ. अब्दुल्ला बेसिल सीपी। ये वही बेसिल है, जो हिजाब का प्रचार करता है।

एक वीडियो में एक छात्रा ने हिजाब के खिलाफ तर्क दिया कि लड़कियाँ अच्छे कपड़े और मेकअप से आत्मविश्वास पाती हैं, न कि किसी को रिझाने के लिए। लेकिन बेसिल ने बेतुके तर्क देकर उसे चुप करा दिया – कहा कि सादगी ही असली आत्मविश्वास है। Umasking Anomalies जैसे संगठन ने इसकी तारीफ की और इसे प्रोपेगैंडा बनाया।

ये संगठन केरल के युवाओं को हिजाब और इस्लामी कट्टरता सिखाने में लगा है। कॉलेज में ऐसे कार्यक्रम चल रहे हैं, जहाँ लड़कियों को पर्दे के पीछे छिपा दिया जाता है।

भारत विश्व गुरु बनने का सपना देख रहा है, लेकिन केरल में अफगानिस्तान जैसी प्रथा? और कॉन्ग्रेस चुप। न राहुल बोले, न प्रियंका। क्यों? क्योंकि वहाँ उनके साथी वामपंथी शासन कर रहे हैं, जो कट्टर तत्वों को बढ़ावा देते हैं। लेकिन तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर हल्ला मचाना आसान है, क्योंकि वो मोदी को घेरने का बहाना देता है।

भारत की डिप्लोमेसी को चोट पहुँचा रही कॉन्ग्रेस

ये घटना सिर्फ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की नहीं है, बल्कि ब्रॉडर डिप्लोमेसी और राजनीति की है। भारत-अफगानिस्तान संबंध पाकिस्तान को ध्यान में रखकर बहुत जरूरी हैं। तालिबान ने पाकिस्तान को ललकारा, जो भारत के लिए अच्छा है। भारत ने तालिबान को मान्यता नहीं दी, लेकिन बातचीत जारी है। झंडे का मुद्दा भी उठा – बैठक में किसका झंडा लगेगा? लेकिन ये सब डिप्लोमेटिक प्रोटोकॉल हैं।

कॉन्ग्रेस इसे महिलाओं के अपमान से जोड़कर जनता को बरगलाने की कोशिश कर रही है। अगर वे इतने ही महिलावादी हैं, तो क्यों नहीं अफगान महिलाओं के लिए कुछ करते? भारत ने तो अफगानिस्तान में महिलाओं की मदद के लिए कई प्रोजेक्ट चलाए हैं, जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य। लेकिन कॉन्ग्रेस का फोकस सिर्फ मोदी को बदनाम करने पर है।

अब अपनी तरफ से सोचें तो ये साफ लगता है कि कॉन्ग्रेस का ये स्टैंड पॉलिटिकल ऑपर्च्युनिज्म है। चुनाव नजदीक हैं, तो महिलाओं का मुद्दा उठाकर वोट बटोरना चाहते हैं। लेकिन जनता अब समझदार हो गई है। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं – “राहुल जी, केरल में पर्दा क्यों नहीं दिखता आपको?” या “शाहबानो को क्यों भूल गए?”

कॉन्ग्रेस की कथनी और करनी में फर्क साफ है। एक तरफ वे सेकुलरिज्म का ढोल पीटते हैं, दूसरी तरफ कट्टर तत्वों से हाथ मिलाते हैं। तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं को न बुलाना गलत है, लेकिन इसे भारत सरकार से जोड़ना और भी गलत। ये डिप्लोमेसी को कमजोर करता है। अगर भारत हर एंबेसी में दखल देने लगे, तो क्या होगा? रूस, चीन या अमेरिका की एंबेसी में भी वही नियम लागू होंगे।

गहराई में जाएँ तो ये मुद्दा भारत की विदेश नीति को भी छूता है। तालिबान के साथ डीलिंग जरूरी है, क्योंकि अफगानिस्तान में भारत के हित हैं – जैसे चाबहार पोर्ट, व्यापार और आतंकवाद रोकना। पाकिस्तान तालिबान को इस्तेमाल करता है, लेकिन मुत्ताकी ने पाक को ललकारा, जो भारत के लिए पॉजिटिव है। महिलाओं के अधिकारों पर भारत चुप नहीं है – हमने UN में तालिबान की आलोचना की है। लेकिन डिप्लोमेसी में बैलेंस रखना पड़ता है।

कॉन्ग्रेस इसे समझती है, लेकिन राजनीति के लिए नजरअंदाज कर रही है। केरल जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि भारत में भी इस्लामी कट्टरता फैल रही है और कॉन्ग्रेस चुप है क्योंकि वो उनके सहयोगी हैं। डॉ. बेसिल जैसे लोग युवाओं को प्रभावित कर रहे हैं, हिजाब और पर्दे को बढ़ावा दे रहे हैं। ये अफगानिस्तान जैसा नजारा है, लेकिन घरेलू। कॉन्ग्रेस को पहले अपने backyard साफ करना चाहिए।

कॉन्ग्रेस का दोहरापन समझने की जरूरत

कुल मिलाकर ये विवाद कॉन्ग्रेस की हिप्पोक्रेसी को उजागर करता है। वे महिलाओं के हक की बात करते हैं, लेकिन जब सरकार इस्लामिक वैल्यूज पर महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता देती है जैसे UCC या ट्रिपल तलाक पर, तो विरोध करते हैं। ट्रिपल तलाक बैन पर कॉन्ग्रेस ने कहा था कि ये मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल है। लेकिन अब तालिबान पर चीख रहे हैं। ये दोहरा मापदंड जनता देख रही है।

कॉन्ग्रेस का ये ड्रामा सिर्फ शोर है, कोई ठोस मुद्दा नहीं। जनता को सच्चाई पता होनी चाहिए – ये राजनीति है, इसमें कॉन्ग्रेस की तरफ से महिलाओं की कोई खास चिंता नहीं है। ये विशुद्ध पॉलिटिकल स्टंटबाजी के सिवाय और कुछ नहीं है।

अमेरिका ने खारिज की AMRAAM मिसाइल देने की खबर, पाकिस्तान को सिर्फ F-16 रखरखाव की ‘भीख’: भारत के एयर डिफेंस सिस्टम के आगे पंगु ही रहेगा दुश्मन मुल्क

अमेरिका ने शुक्रवार (10 अक्टूबर 2025) को साफ कर दिया कि पाकिस्तान को नई AMRAAM मिसाइलें देने की कोई बात नहीं है। कुछ न्यूज़ चैनल और वेबसाइट्स ने दावा किया था कि अमेरिका पाकिस्तान को एडवांस्ड मीडियम-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (AMRAAM) दे रहा है, जो उसके पुराने F-16 जेट्स को और ताकतवर बना सकती हैं। लेकिन अमेरिकी दूतावास ने इसे ‘झूठी खबर‘ बताया।

दरअसल, सितंबर 30 को हुए एक कॉन्ट्रैक्ट में सिर्फ पुराने सिस्टम्स के रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स की बात है, न कि नई मिसाइलों की। मतलब पाकिस्तान को ‘भीख’ तो मिली, लेकिन सिर्फ अपने पुराने हथियारों को ठीक करने के लिए। कोई नया हथियार नहीं।

ये खबर भारत के लिए क्यों अहम है? क्योंकि AMRAAM वही मिसाइल है, जिसने 2019 में बालाकोट स्ट्राइक के बाद विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान के मिग-21 को मार गिराया था। अगर इसका एडवांस्ड वर्जन पाकिस्तान के पास पहुँचता, तो थोड़ा टेंशन हो सकता था। लेकिन अमेरिका ने साफ कर दिया कोई अपग्रेड नहीं। फिर भी कुछ मीडिया हाउस और कॉन्ग्रेस ने इस खबर को उछालकर मोदी सरकार को नीचा दिखाने की कोशिश की।

चलिए इस पूरी कहानी को आसान तरीके से समझते हैं कि कैसे पाकिस्तान को कुछ मिले या न मिले, भारत का एयर डिफेंस और हथियार इतने तगड़े हैं कि वो कुछ बिगाड़ नहीं सकता। साथ ही जानेंगे कि कैसे भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को धूल चटाई और क्यों उसकी F-16 और AMRAAM मिसाइलें बेकार साबित होंगी।

AMRAAM मिसाइल और उसका इतिहास

AMRAAM यानी AIM-120 मिसाइल एक बियोंड विजुअल रेंज (BVR) मिसाइल है। आसान भाषा में, ये ऐसी मिसाइल है जो पायलट को दुश्मन का विमान देखे बिना, 100 किलोमीटर तक दूर से टारगेट को मार सकती है। इसका रडार खुद दुश्मन को ढूँढ लेता है। पाकिस्तान ने 2007 में अमेरिका से करीब 700 ऐसी मिसाइलें खरीदी थीं, जो सिर्फ उसके F-16 जेट्स पर काम करती हैं।

साल 2019 में बालाकोट स्ट्राइक के बाद, जब भारतीय वायुसेना ने PoK में जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर हमला किया, तो पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई में F-16 से AMRAAM दागी थी। उसने अभिनंदन का मिग-21 मार गिराया, लेकिन भारत ने भी एक F-16 को ढेर कर दिया था।

तब से भारत ने अपनी ताकत कई गुना बढ़ा ली है। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर इसका सबूत है। लेकिन उससे पहले ये समझें कि हाल की खबरों ने क्यों हंगामा मचाया।

मीडिया और कॉन्ग्रेस ने मचाया फर्जी का हल्ला

कुछ न्यूज़ चैनल्स और वेबसाइट्स ने दावा किया कि अमेरिका पाकिस्तान को नई AMRAAM मिसाइलें दे रहा है। कहा गया कि ये ‘मिग-21 किलर’ मिसाइलें पाकिस्तान के F-16 को और खतरनाक बनाएँगी। ये खबरें तब और हवा पकड़ीं, जब पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ असीम मुनीर ने पिछले महीने वॉशिंगटन में डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की। कुछ ने लिखा कि ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान को ताकत दे रहा है, क्योंकि रिश्ते सुधर रहे हैं।

कॉन्ग्रेस ने इस मौके को लपक लिया। 8 अक्टूबर को जयराम रमेश ने एक्स पर पोस्ट किया, जिसमें अमेरिकी वॉर डिपार्टमेंट (पहले डिफेंस डिपार्टमेंट) के दो नोटिफिकेशन्स शेयर किए। पहला मई 7 2025 का, जिसमें कनाडा, ताइवान, जापान जैसे देशों को AMRAAM देने की बात थी। दूसरा सितंबर 30 का, जिसमें पाकिस्तान का नाम भी था।

रमेश ने लिखा, “कूटनीति कितनी जल्दी बदलती है और असफलताएँ कितनी जल्दी जमा हो जाती हैं!” उनका कहना था कि मोदी सरकार की विदेश नीति फेल हो रही है और अमेरिका अब पाकिस्तान को तरजीह दे रहा है।

लेकिन 10 अक्टूबर को अमेरिकी दूतावास ने सारी हवा निकाल दी। उसने कहा, “ये खबरें झूठी हैं। कोई नई AMRAAM मिसाइल नहीं मिल रही। सिर्फ पुराने सिस्टम्स के लिए स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस की बात है।” ये $41.7 मिलियन का कॉन्ट्रैक्ट रेथियॉन को मिला है, जो $2.5 बिलियन के फॉरेन मिलिट्री सेल्स (FMS) प्रोग्राम का हिस्सा है। इसमें 30 से ज्यादा देश हैं और पाकिस्तान को सिर्फ अपने पुराने F-16 और मिसाइलों को चलाने के लिए पार्ट्स मिल रहे हैं। कोई नया हथियार नहीं।

कॉन्ग्रेस और कुछ मीडिया हाउस बिना तथ्य चेक किए उछल पड़े। ये वही लोग हैं, जो ऑपरेशन सिंदूर की कामयाबी पर चुप रहे। अब जरा देखते हैं कि भारत ने कैसे पाकिस्तान को हवाई जंग में मात दी और क्यों AMRAAM हो या कोई और हथियार, भारत का कुछ नहीं बिगड़ेगा।

ऑपरेशन सिंदूर में टूट चुका है पाकिस्तान का हौसला

मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर ने दुनिया को दिखा दिया कि भारतीय वायुसेना (IAF) अब पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर है। 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले (26 नागरिकों की मौत) के जवाब में भारत ने 7 मई को PoK और पाकिस्तान में 9 आतंकी ठिकानों पर मिसाइल स्ट्राइक्स कीं।

पाकिस्तान ने जवाब में ड्रोन और मिसाइलें दागीं, लेकिन भारत के S-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने अमृतसर, जम्मू, और जैसलमेर में सभी 8 मिसाइलें मार गिराईं। IAF ने राफेल, सुखोई-30 MKI और ब्रह्मोस मिसाइलों से 11 पाकिस्तानी एयरबेस नूर खान, रफीकी, मुरीद, सुक्कुर, सियालकोट आदि—पर सटीक हमले किए। चार दिन बाद पाकिस्तान ने सीजफायर माँग लिया।

इस जंग में पाकिस्तान ने अपने F-16 से AMRAAM मिसाइलें दागीं, लेकिन वो ऊँचाई ही नहीं ले पाए, जहाँ से मिसाइलें असरदार हों। हिसार में एक चीनी PL-15 मिसाइल का मलबा मिला, जो पाकिस्तान के JF-17 जेट से दागी गई थी। इसकी रेंज 145 किमी थी, लेकिन इतनी दूर से लॉन्च होने की वजह से कोई नुकसान नहीं हुआ।

भारत के S-400 और आकाश सिस्टम ने इसे आसानी से इंटरसेप्ट कर लिया। और सबसे बड़ा झटका? भारत ने 314 किमी दूर पाकिस्तान के AWACS (Saab 2000 Erieye) को S-400 से मार गिराया। ये AWACS हवा में ‘आँख’ की तरह काम करता है यानी रडार, सर्विलांस, कमांड-कंट्रोल का सेंटर। पाकिस्तान के 9 AWACS में से एक खत्म। पूर्व पाकिस्तानी एयर मार्शल मसूद अख्तर ने माना कि भोलारी एयरबेस पर ब्रह्मोस स्ट्राइक ने AWACS को हेलंगर में तबाह कर दिया।

ये ऑपरेशन दिखाता है कि भारत का एयर डिफेंस और अटैक सिस्टम इतना मज़बूत है कि पाकिस्तान की कोई भी मिसाइल AMRAAM हो या PL-15 कामयाब नहीं हो सकती।

भारत के हथियारों के सामने बेबस है पाकिस्तान बेबस

पाकिस्तान के पास 76 F-16 जेट्स हैं, जो AMRAAM (100 किमी रेंज) दाग सकते हैं। लेकिन भारत के पास इनका जवाब देने के लिए कई गुना बेहतर सिस्टम हैं। चलिए एक-एक करके देखते हैं:

राफेल और मेटियोर मिसाइल: भारत के 36 राफेल जेट्स मेटियोर BVR मिसाइल (रेंज 150+ किमी) से लैस हैं। इसका ‘नो-एस्केप जोन’ 60 किमी है, यानी दुश्मन का जेट भाग भी नहीं सकता। ऑपरेशन सिंदूर में राफेल ने SCALP क्रूज मिसाइल से 11 पाकिस्तानी बेस तबाह किए। राफेल का SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम दुश्मन के रडार को जाम कर देता है। F-16 के पुराने ALQ पॉड्स इसके सामने बेकार हैं।

सुखोई-30 MKI और अस्त्र मिसाइल: भारत के पास 272 सुखोई-30 MKI जेट्स हैं, जो स्वदेशी अस्त्र Mk-1 मिसाइल (रेंज 110 किमी) से लैस हैं। 2019 के बाद IAF ने 550+ अस्त्र इंडक्ट कीं, जो रूसी R-77 को रिप्लेस कर रही हैं। आस्त्रा Mk-2 (160 किमी रेंज) का टेस्ट भी हो चुका है, जो PL-15 का जवाब है।

S-400 ट्रायम्फ: ये रूसी एयर डिफेंस सिस्टम 400 किमी तक के टारगेट को मार सकता है। एक साथ 80 टारगेट ट्रैक करता है। ऑपरेशन सिंदूर में इसने PL-15, ड्रोन्स, और क्रूज मिसाइलें रोकीं। इसकी 40N6 मिसाइल हाइपरसोनिक टारगेट भी ढेर कर सकती है। इसे भारत में सुदर्शन नाम दिया गया है।

आकाश-NG और SPYDER: आकाश मिसाइल (70 किमी रेंज) ने ड्रोन्स को खत्म किया। SPYDER लो-लेवल SAM है, जो UAVs और क्रूज मिसाइलों के लिए खास है।

ब्रह्मोस और NIRBHAY: ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल (350 किमी रेंज) ने AWACS को हिट किया। NIRBHAY स्टेल्थ क्रूज मिसाइल है, जो लैंड, समुद्र, या हवा से लॉन्च हो सकती है।

पाकिस्तान के पास चीनी HQ-9B और HQ-16 SAM सिस्टम्स हैं, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर में ये बेकार साबित हुए। JF-17 जेट्स (PL-15E) की रेंज F-16 से कम है। अगर AMRAAM का नया वर्जन भी मिल जाए, तो F-16 को ऊँचाई चाहिए, जो भारत का नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर (AWACS, रडार, डेटालिंक) कभी नहीं देगा।

पाकिस्तान की हकीकत ‘भीख’ पर चलने वाले मुल्क की

पाकिस्तान का F-16 बेड़ा पुराना है। अमेरिका इसे सिर्फ काउंटर-टेरर ऑपरेशन्स के लिए सपोर्ट करता है। शहबाज शरीफ और असीम मुनीर की ट्रंप से मुलाकातों का बस इतना मतलब है कि ‘स्पेयर पार्ट्स की भीख’ मिलती रहे। लेकिन नई ताकत? वो सपना ही रहेगा। ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने दिखाया कि पाकिस्तान का AWACS, एयरबेस या मिसाइल लॉन्चर कुछ भी सुरक्षित नहीं। भारत का इंटीग्रेटेड बैटल मैनेजमेंट सिस्टम (IBMS) और डीआरडीओ की रिवर्स इंजीनियरिंग (PL-15 मलबे से) ने हमें और मजबूत किया।

राजनीतिक शोर तो उठा, लेकिन जनता समझदार है

कॉन्ग्रेस और कुछ मीडिया ने AMRAAM खबर को उछालकर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की। लेकिन अमेरिकी खंडन ने सबकी बोलती बंद कर दी। भारत-अमेरिका रिश्ते मजबूत हैं – 2024 में 31 MQ-9B ड्रोन डील इसका सबूत है। मोदी सरकार की नीति ‘सर्जिकल स्ट्राइक्स’ से लेकर इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स ने भारत को अजेय बनाया। DRDO की अस्त्र Mk-2, राफेल, S-400 जैसे सिस्टम्स सुनिश्चित करते हैं कि पाकिस्तान की कोई मिसाइल, चाहे AMRAAM हो या PL-15, भारत का बाल बाँका न कर सके।

भारत का आसमान अजेय

पाकिस्तान को AMRAAM मिले या न मिले, भारत का एयर डिफेंस और अटैक सिस्टम इतना तगड़ा है कि दुश्मन की हिम्मत टूट जाएगी। ऑपरेशन सिंदूर में 350 किमी दूर AWACS मारना, PL-15 का मलबा इकट्ठा करना ये भारत की ताकत है। पाकिस्तान की ‘भीख’ से कुछ नहीं होगा। भारत का स्काई क्लियर रहेगा और हम हर लॉन्चिंग पैड को ध्वस्त कर देंगे।

मुनंबम जमीन विवाद में केरल HC ने वक्फ बोर्ड को दिया झटका, कहा- साधारण डीड से नहीं कर सकते कब्जा: जानें- कैसे 600 परिवारों की रिहाइश पर किया था दावा

केरल हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि केरल वक्फ बोर्ड का 2019 में मुनंबम की विवादित जमीन को वक्फ संपत्ति घोषित करने का फैसला गलत था। जस्टिस एसए धर्माधिकारी और जस्टिस श्याम कुमार वीएम की डिवीजन बेंच ने यह बात तब कही, जब उन्होंने एकल जज के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें राज्य सरकार द्वारा 600 परिवारों के अधिकारों की जाँच के लिए बनाए गए आयोग को खारिज किया गया था। ये परिवार मुनंबम में जमीन को वक्फ घोषित करने के बाद बेदखली का सामना कर रहे थे।

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि मोहम्मद सिद्दीक सैट द्वारा 1950 में फारूक कॉलेज मैनेजमेंट कमिटी के पक्ष में बनाया गया एंडोमेंट डीड वक्फ डीड नहीं था, बल्कि एक साधारण गिफ्ट डीड था। कोर्ट ने कहा कि इस दस्तावेज में कहीं भी यह नहीं दिखाया गया कि संपत्ति को हमेशा के लिए अल्लाह के नाम पर समर्पित किया गया था। इसलिए इसे वक्फ संपत्ति नहीं कहा जा सकता।

जस्टिस सुष्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस श्याम कुमार वी एम ने की खंडपीठ यह फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की दो याचिकाओं को स्वीकार कर लिया और सिंगल बेंच के पुराने आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सरकार द्वारा गठित जाँच आयोग को अवैध बताया गया था।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वक्फ की परिभाषा में ‘स्थायी समर्पण’ (Permanent Dedication) का होना आवश्यक है। इसका मतलब यह होता है कि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति का स्वामित्व पूरी तरह से और हमेशा के लिए अल्लाह के नाम कर दे, ताकि उस संपत्ति का उपयोग केवल मजहबी, पाक या परोपकारी उद्देश्यों के लिए ही हो।

कोर्ट ने पाया कि सिद्दीक सैट द्वारा फारूक कॉलेज को दी गई संपत्ति में कॉलेज को यह अधिकार दिया गया था कि वह जमीन को बेच सकता है, लीज पर दे सकता है या अन्य किसी तरह उपयोग में ला सकता है। जब किसी संपत्ति को बेचने या ट्रांसफर करने की अनुमति दी जाती है, तो वह संपत्ति वक्फ नहीं रह जाती, बल्कि वह सार्वजनिक चैरिटेबल संपत्ति के रूप में मानी जाती है।

कोर्ट ने कहा कि 1950 का यह दस्तावेज स्थाई समर्पण की भावना को प्रदर्शित नहीं करता, बल्कि इसमें संपत्ति के पुनः वापसी (Reversion) का प्रावधान था। इसमें लिखा था कि अगर संपत्ति का कोई हिस्सा बचा रह जाता है तो वह वापस दाता या उसके वारिसों को लौटाया जा सकता है। कोर्ट ने इसे वक्फ की मूल भावना के विपरीत बताया और कहा कि यह सिर्फ एक साधारण उपहार था, जिसे फारूक कॉलेज के प्रबंधन के लिए दिया गया था।

इस फैसले में कोर्ट ने केरल वक्फ बोर्ड की 2019 की कार्रवाई को भी कठोर शब्दों में फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि लगभग 69 साल तक न तो सिद्दीक सैट के वारिसों ने और न ही फारूक कॉलेज ने इस संपत्ति को वक्फ माना था।

इसके बावजूद वक्फ बोर्ड ने 2019 में एकतरफा तरीके से इसे वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया, जो पूरी तरह मनमानी और अवैध कार्रवाई थी। कोर्ट ने इसे ‘भूमि हड़पने की कोशिश’ यानी ‘Land Grabbing Tactic’ बताया। जजों ने टिप्पणी की कि वक्फ बोर्ड ने बिना किसी विधिक जाँच या सभी हितधारकों को शामिल किए बिना यह कदम उठाया, जो न केवल अव्यवहारिक बल्कि असंवैधानिक भी है।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि राज्य सरकार को मुनम्बम भूमि विवाद की जाँच के लिए आयोग गठित करने का पूरा अधिकार है। यह आयोग एक तथ्य खोजने वाली संस्था (Fact-Finding Commission) होगी, जिसका मकसद विवाद का समाधान निकालना है, न कि स्वामित्व या टाइटल पर फैसला देना। राज्य सरकार ने 27 नवंबर 2024 को रिटायर्ड जस्टिस सी एन रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में यह आयोग गठित किया था, ताकि इस लंबे समय से चल रहे विवाद का स्थायी समाधान निकाला जा सके।

मामला क्या है?

मुनंबम भूमि विवाद केरल के एर्नाकुलम जिले में करीब 404 एकड़ जमीन से जुड़ा है। इस इलाके में लगभग 600 हिंदू और ईसाई परिवार दशकों से रह रहे हैं। वक्फ बोर्ड का दावा है कि यह जमीन 1950 में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज की गई थी, जबकि स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने यह जमीन फारूक कॉलेज से कानूनी रूप से खरीदी थी।

यह विवाद अब एक राजनीतिक मुद्दे में बदल गया है। भाजपा नेताओं ने वक्फ बोर्ड पर सार्वजनिक और निजी जमीनों पर कब्जा करने का आरोप लगाया है। केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने इसे ‘बर्बरता’ कहा और कहा कि संसद में ऐसे कदमों को रोकने के लिए नया कानून लाया जाएगा। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी सरकार मुनम्बम के लंबे समय से रह रहे लोगों के साथ है और उनकी संपत्ति की सुरक्षा के लिए काम कर रही है।

दरअसल, वक्फ विवाद कोई नया विषय नहीं है। देशभर में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ वक्फ बोर्ड ने निजी या सरकारी संपत्तियों पर दावा ठोका है। इसमें तमिलनाडु के कुछ गाँव, सूरत की सरकारी इमारतें, बेंगलुरु का ईदगाह मैदान, हरियाणा का जठलाना गाँव और हैदराबाद का एक पाँच सितारा होटल तक शामिल हैं।

वक्फ द्वारा जमीनों पर कब्जा करने के तीन सामान्य तरीके हैं। किसी जमीन को कब्रिस्तान बताना, उस पर मजार या दरगाह बनाना और सार्वजनिक भूमि पर नमाज पढ़ना शुरू करना। जब किसी स्थान पर लगातार मजहबी गतिविधियाँ होने लगती हैं, तो वक्फ बोर्ड उस जगह को ‘वक्फ संपत्ति’ के रूप में पंजीकृत करने की माँग कर देता है।

क्या कहता है वक्फ कानून

वक्फ कानून के अनुसार, एक बार अगर कोई संपत्ति वक्फ घोषित हो जाती है, तो वह हमेशा वक्फ रहती है। इसका अर्थ यह है कि उस पर फिर से दावा करना या उसे बेच पाना लगभग असंभव हो जाता है। कई मामलों में वक्फ बोर्ड बिना किसी ठोस दस्तावेज के भी संपत्तियों पर दावा कर देता है। यह न केवल संपत्ति अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि इससे सांप्रदायिक तनाव भी पैदा होता है।

केंद्र सरकार अब वक्फ कानून में सुधार लाने की तैयारी में है। नए प्रावधानों के तहत किसी भी निजी या सरकारी संपत्ति को वक्फ घोषित करने से पहले संपत्ति मालिक की सहमति और राजस्व विभाग की विस्तृत जाँच आवश्यक होगी। साथ ही वक्फ बोर्ड को अपने दावे का पूरा दस्तावेज़ी प्रमाण देना होगा। इन कदमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय की भूमि पर अनुचित या झूठा दावा न किया जा सके।

केरल हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक जमीन विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक बड़ी कानूनी मिसाल है। कोर्ट  ने साफ कहा कि वक्फ तभी बनता है जब संपत्ति स्थाई रूप से और बिना वापसी की शर्त के अल्लाह के नाम समर्पित की जाए। अगर संपत्ति के ट्रांसफर, बिक्री या रिवर्शन का प्रावधान है, तो वह वक्फ नहीं बल्कि एक साधारण चैरिटेबल गिफ्ट है। इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारें वक्फ बोर्ड के एकतरफा निर्णयों के खिलाफ जाँच कर सकती हैं और नागरिकों के संपत्ति अधिकारों की रक्षा करना उनका वैधानिक दायित्व है।

यह निर्णय न केवल मुनंबम के हजारों परिवारों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि उन तमाम नागरिकों के लिए भी एक उम्मीद की किरण है, जिनकी संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड ने वर्षों बाद दावा ठोका है। कोर्ट ने अपने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कानून की आड़ में भूमि हड़पने की कोई भी कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह फैसला इस दिशा में एक मजबूत कदम है कि भारत में हर नागरिक की संपत्ति सुरक्षित रहे, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से जुड़ा हो।

₹36.04 लाख कैश, 2.6 किलो सोना, 5.5 किलो चाँदी… PWD के रिटायर्ड अधिकारी के ठिकानों से मिला 17 टन शहद: जानें- छापेमारी में मिली इस अकूत दौलत का क्या करेगी सरकार

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। लोकायुक्त पुलिस ने लोक निर्माण विभाग (PWD) के रिटायर्ड चीफ इंजीनियर जीपी मेहरा के ठिकानों पर छापा मारा। यह छापा आय से अधिक संपत्ति के मामले में मारा गया।

भोपाल और नर्मदापुरम जिले के चार ठिकानों पर एक साथ यह कार्रवाई हुई। छापे में करोड़ों रुपए की नकदी, सोना, लग्जरी गाड़ियाँ मिली हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि उनके फार्महाउस से 17 टन शहद का विशाल भंडार मिला।

क्या-क्या मिला?

छापेमारी के दौरान मेहरा के ठिकानों से करोड़ों का खजाना जब्त किया गया। इसमें कुल ₹36.04 लाख कैश, लगभग ₹3.05 करोड़ का 2.6 किलो सोना, और 5.5 किलो चाँदी शामिल है। मेहरा के परिवार के नाम पर फोर्ड एंडेवर, स्कोडा स्लाविया समेत चार लग्जरी कारें भी मिली हैं। इसके अलावा, ₹56 लाख की एफडी, शेयर और इंश्योरेंस पॉलिसी के महत्वपूर्ण दस्तावेज भी जब्त किए गए।

मेहरा की सबसे बड़ी संपत्ति नर्मदापुरम में स्थित उनका विशाल फार्महाउस है, जहाँ 17 टन शहद का भंडार, 6 ट्रैक्टर, और 39 कॉटेज (7 तैयार और 32 निर्माणाधीन) मिले हैं। गोविंदपुरा स्थित एक फैक्ट्री को उनका बिजनेस फ्रंट माना जा रहा है। जाँच एजेंसियों का अनुमान है कि अंतिम मूल्यांकन के बाद अवैध संपत्ति की कुल कीमत कई

जब्त की गई संपत्ति का क्या होता है?

भ्रष्टाचार से जुड़ी करोड़ों की संपत्ति जब्त होने के बाद यह सवाल उठता है कि कानून के तहत इन संपत्तियों का आखिर क्या होता है। देश में ऐसी कार्रवाई मुख्य रूप से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 और धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत की जाती है।

जाँच के दौरान, संदेह होने पर संपत्ति को CRPC की धारा 102 या PMLA की धारा 5 के तहत जब्त किया जाता है। जब्त किया गया कैश, सोना और जेवर को बैंकों या सरकारी एजेंसियों के गोदाम में सुरक्षित रखा जाता है। जब तक यह मामला कोर्ट में चल रहा होता है, तब तक इन संपत्तियों को बेचा या निपटाया नहीं जाता है।

कोर्ट का फैसला आने के बाद

अगर कोर्ट में आरोपित पर भ्रष्टाचार के आरोप साबित हो जाते हैं, तो जब्त की गई संपत्ति पूरी तरह सरकार की हो जाती है। इसके बाद सरकार कानूनी प्रक्रिया के तहत इन संपत्तियों को नीलामी के जरिए बेच सकती है। नीलामी से जो पैसा मिलता है, वह सीधे सरकारी खजाने में जमा होता है। इस राशि का उपयोग सरकारी योजनाओं और जनकल्याण के कामों में किया जाता है। कई बार जब्त किए गए वाहन या अन्य सामानों को सरकारी उपयोग में भी लिया जा सकता है।

लेकिन अगर अदालत में आरोप साबित नहीं होते, तो जब्त की गई संपत्ति आरोपित को वापस कर दी जाती है। हालाँकि, इसके लिए आरोपित को यह साफ करना होता है कि उसने वह संपत्ति कैसे और किस स्रोत से कमाई थी।

कुल मिलाकर, जब्त की गई संपत्ति कोर्ट की निगरानी में रहती है। फैसला आने तक न तो उसे बेचा जा सकता है और न ही उसका इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार की यह भी जिम्मेदारी होती है कि वह जब्त किए गए हर सामान का पूरा लेखा-जोखा अदालत के सामने पेश करे। आरोप सिद्ध होने पर ही वह संपत्ति हमेशा के लिए सरकारी हो पाती है।

बिहार 2025: जनादेश की उलझन या राजनीतिक धैर्य की परीक्षा?

जब नीतीश कुमार फिर से नई भूमिका में लौटे हैं, भाजपा निर्णायक वापसी की तैयारी में है और राजद अब भी अतीत की विरासत और वंशवाद से बाहर नहीं निकल पा रही है। बिहार की राजनीति इस बार फिर से किसी महाकाव्य जैसी लग रही है जिसमें कथानक पुराना है, पात्र वही हैं, पर गठबंधन और नारों के नाम पर मंच नए बना दिए गए हैं। 

अक्तूबर-नवंबर 2025 में होने वाले विधानसभा चुनाव एक बार फिर यह तय करेंगे कि बिहार नई दिशा में बढ़ेगा या फिर पुराने राजनीतिक समीकरणों के दलदल में ही फँसा रहेगा। 

2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को 125 सीटों के साथ मामूली बहुमत मिला था, लेकिन तब से बिहार की राजनीति इतनी बार पलटी खा चुकी है कि जनता अब गिनती भूल चुकी है। अगस्त 2022 में नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़कर राजद-कॉन्ग्रेस गठबंधन का दामन थामा था। 

लेकिन जनवरी 2024 में उन्होंने एक बार फिर पलटी मारते हुए एनडीए में वापसी कर ली। यह उनका शायद चौथा बड़ा ‘यूटर्न’ था जिसने उन्हें भारतीय राजनीति का सबसे ‘लचीला’ नेता बना दिया है। उनका तर्क वही पुराना है ‘बिहार के विकास के लिए।’

लेकिन जनता अब इस जुमले को सुनसुनकर थक चुकी है। वास्तविक विकास के आँकड़े ठहरे हुए हैं, पर राजनीतिक बयानबाजी अब भी वही है। 

भाजपा की चुनौती धैर्य की भी परीक्षा 

भाजपा के लिए यह चुनाव सिर्फ बिहार की सरकार पाने का अवसर नहीं है, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक लड़ाई भी है। सवाल यह है कि क्या भाजपा बिहार में स्थायी रूप से वैकल्पिक नेतृत्व स्थापित कर सकती है, या फिर हमेशा किसी गठबंधन की ‘मजबूरी’ बनकर रह जाएगी? 

नीतीश कुमार की वापसी भाजपा के लिए रणनीतिक मजबूरी थी। पार्टी जानती है कि कुर्मी-कोयरी और कुछ अन्य ओबीसी समूह अब भी जेडीयू के साथ हैं। लेकिन भाजपा का कार्यकर्ता वर्ग, जो वर्षों से नीतीश के ‘पलटी मॉडल’ से आहत रहा है, अब उत्साह खो चुका है।

इसलिए 2025 में भाजपा की रणनीति साफ है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और केंद्र की योजनाओं पर जोर, जबकि स्थानीय स्तर पर नीतीश की मशीनरी से जातीय समीकरण संभलेंगे। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की तरह बिहार भाजपा के लिए वह राज्य है जहाँ अब तक पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिला। बिहार का जनादेश हमेशा गठबंधन की आदत से बंधा रहा है  जनता स्थिरता चाहती है,पर स्थिर नेतृत्व को पूरा भरोसा देने में अब भी हिचकती है। 

राजद की उलझन – विरासत और नेतृत्व के बीच 

राजद के लिए 2025 अस्तित्व का चुनाव है। तेजस्वी यादव, जिन्हें कभी ‘युवा विकल्प’ के रूप में प्रस्तुत किया गया था, अब वैचारिक अस्पष्टता और संगठनात्मक कमजोरी के शिकार दिखते हैं। उनका ‘माई’ (मुस्लिम–यादव) समीकरण अब 1990 के दशक जितना प्रभावी नहीं रहा। नई पीढ़ी के वोटर, जो विकास और रोजगार की भाषा समझते हैं, अब ‘सामाजिक न्याय’ की पुरानी कहानी से प्रभावित नहीं होते। 

तेजस्वी ने खुद को प्रशासनिक रूप से सक्षम और आधुनिक नेता दिखाने की कोशिश की, लेकिन लालू यादव की 

‘जंगलराज’ वाली छवि अब भी उनके सिर पर साया बनकर मौजूद है। 2005 के बाद जन्मे लाखों युवा मतदाता उस दौर को याद नहीं करते वे सिर्फ सुनते हैं कि तब बिहार में अराजकता और भय का वातावरण था। 

राजद की कॉन्ग्रेस और वामदलों के साथ गठबंधन भी किसी वैचारिक सामंजस्य का नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा का परिणाम है। उनका एकमात्र एजेंडा ‘भाजपा हटाओ’ है, पर ‘क्या लाओ’ इसका कोई उत्तर नहीं। 

जाति समीकरण अब भी निर्णायक 

बिहार की राजनीति चाहे कितनी भी बदलती दिखे, पर जाति समीकरण अब भी चुनाव परिणामों की रीढ़ है। भाजपा लगातार अति पिछड़े वर्गों (EBC) और दलितों को केंद्र की योजनाओं के माध्यम से जोड़ने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला, हर घर जल, पीएम किसान इन योजनाओं ने बिहार के ग्रामीण मतदाता को भाजपा से सीधे जोड़ा है।

वहीं जेडीयू अब भी अपने पारंपरिक कुर्मी–कोयरी आधार पर निर्भर है, और राजद यादव मुस्लिम वर्ग में प्रभाव बनाए हुए है। कॉन्ग्रेस ऊपरी जातियों और मुसलमानों के सहारे जीवित है, पर प्रभाव सीमित। 

चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और उपेंद्र कुशवाहा के आरएलएसपी गुट जैसे छोटे दल कुछ सीटों पर असर डाल सकते हैं। चिराग की ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ लाइन युवाओं को आकर्षित करती है, और भाजपा इसे एक ‘साइलेंट सैटेलाइट’ सहयोगी के रूप में इस्तेमाल कर सकती है जहाँ जेडीयू एंटी-इनकम्बेंसी झेल रही हो। 

भाजपा की बड़ी बाजी – मोदी का चेहरा और वेलफेयर पॉलिटिक्स 

भाजपा की 2025 रणनीति दो स्तंभों पर आधारित है मोदी का नेतृत्व और कल्याण योजनाओं की विश्वसनीयता। भाजपा इस चुनाव को ‘विकसित भारत, विकसित बिहार’ के नारे के साथ लड़ना चाहती है। 

मोदी की रैलियों में संदेश साफ होगा ‘बिहार ने भारत को ताकत दी, लेकिन भारत ने बिहार को उसका हक कब दिया?’ इस भावनात्मक प्रश्न के साथ भाजपा बिहार को सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दों से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आकांक्षा से जोड़ना चाहती है। 

भाजपा का अभियान राष्ट्रवाद, विकास और आत्मसम्मान का मिश्रण है एक तरफ ‘लालू–नीतीश मॉडल’ की अस्थिरता, दूसरी तरफ मोदी युग की स्थिरता और डिलीवरी। यही विरोधाभास 2025 के चुनाव को रोचक बनाएगा। 

जनादेश की थकान या निर्णायक मोड़? 

बिहार की जनता इस बार जिस मनोस्थिति में है, उसे ‘जनादेश की थकान’ कहा जा सकता है। हर कुछ साल पर गठबंधन बदलने, नारे बदलने और “विकास” के अधूरे वादों ने मतदाताओं को संदेहग्रस्त बना दिया है। 

क्या जनता एक बार फिर नीतीश कुमार की राजनीतिक कलाबाज़ियों को माफ करेगी?​क्या भाजपा अब सचमुच बिहार में अकेली पहचान बनाना चाहेगी, या फिर समझौते के रास्ते पर चलेगी?​

क्या राजद अपने सामाजिक आधार से आगे बढ़ पाएगा? 

प्रारंभिक सर्वेक्षणों के मुताबिक़, एनडीए थोड़ा आगे है मुख्यतः मोदी फैक्टर के कारण। पर बिहार की राजनीति में आखिरी क्षणों का समीकरण हमेशा अप्रत्याशित रहा है। एक छोटा जातीय ध्रुवीकरण या स्थानीय असंतोष पूरा खेल पलट सकता है। 

संभावना है कि नतीजे फिर से अधूरे बहुमत की ओर झुकें, जिससे ‘मजबूरी का गठबंधन’ एक बार फिर बने। और यही बिहार की सबसे बड़ी त्रासदी है जनता बदलाव चाहती है, पर परिवर्तन के जोखिम से अब भी डरती है। 

अंत में 

बिहार 2025 का चुनाव सिर्फ एक राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि धैर्य की परीक्षा है जनता के धैर्य की, भाजपा के धैर्य की और शायद नीतीश कुमार की भी। यह चुनाव यह तय करेगा कि क्या बिहार अब भी गठबंधन की अनिश्चितता में विश्वास रखता है, 

या वह अब स्थायित्व और साफ़ नेतृत्व की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाने को तैयार है। राजनीति में धैर्य एक गुण होता है, पर बिहार की जनता अब शायद धैर्य खोने लगी है। 

‘न झुकूँगा-न डरूँगा, खजुराहो जाकर अनशन करूँगा’: CJI पर जूता फेंकने वाले वकील बोले- भगवान ने 100 करोड़ लोगों में से मुझे चुना, Video

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार (6 अक्टूबर 2025) को कार्यवाही के दौरान CJI पर जूता फेंकने के आरोपित वरिष्ठ वकील राकेश किशोर ने अब कहा, ”मैं बेहद गौरवान्विंत हूँ कि भगवान ने इसके काम के लिए 100 करोड़ हिंदुओं में से सिर्फ मुझे चुना, मैं न झुकूँगा न डरूँगा, भगवान विष्णु के लिए खजुराहो जाकर अनशन करूँगा। मेरी तैयारी पूरी है इसके लिए मुझे भगवान से आदेश प्राप्त हो गया है।“

घटना से बाद से ही हम आरोपित वकील का इंटरव्यू करने के प्रयास में थे लेकिन तीसरे दिन (गुरुवार 9 अक्टूबर) आरोपित वकील डॉ. राकेश किशोर से उनके मयूर विहार स्थित आवास पर मुलाकात हुई इससे पहले सोसायटी के गेट पर सुरक्षाकर्मी ने पूरी जाँच पड़ताल और वकील से बात कराने के बाद ही हमें अंदर जाने दिया।

दरवाजे पर घँटी बजाने पर बाहर आए वकील डॉ. राकेश किशोर ने जालीदार गेट के अंदर से पूरा परिचय और उद्देश्य जानने के बाद ही हमें अंदर बुलाया। इसके बाद उनकी पत्नी और वहाँ पहले से मौजूद एक उनके दोस्त ने हमारी पूरी पड़ताल के बाद ही कैमरे पर हमसे बात करने के लिए तैयार हुए।

हाल चाल पूछने पर वकील डॉ. राकेश किशोर अपनी जान पर खतरा बताते हुए कहते हैं कि कुछ लोग हमेशा सर तन से जुदा करने में दिलचस्पी रखते हैं। मुझ पर कभी भी अटैक हो सकता है मुझे लगातार धमकियाँ मिल रही हैं हो भी सकता है कि सनातन की आवाज हमेशा के लिए बंद हो जाए। मैंने डर के कारण बाहर जाना यहां तक कि बाहर टहलना भी बंद कर दिया है, लेकिन भगवान पर भरोसा रखते हुए एक शेर सुनाते हैं…

फानूस बनकर जिसकी हिफाजत हवा करे,

वो चिराग क्या बुझे जिसकी हिफाजत खुदा करे।।

आगे डॉ. किशोर कहते हैं कि भगवान के आदेश से मैं खजुराहो अनशन के लिए जा रहा हूँ तैयारी पूरी कर ली है। अपने भगवान विष्णु की प्रतिमा को फिर से स्थापित कराने के लिए मैं जान भी देने के लिए तैयार हूँ। इस जन्म में यह काम नहीं हुआ तो एक-दो जन्म लेकर करूँगा।

डॉ. राकेश किशोर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की कथन-करनी में अंतर आ गया है। नुपूर शर्मा की जिंदगी आज तबाह हो गई है। वो अंडर ग्राउंड है। वो कहाँ है उसका परिवार कहाँ है किसी को नहीं पता ऐसी जिंदगी कौन जीना चाहेगा? ये सब एक सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के कारण हुआ। कोर्ट ने नुपूर शर्मा को तो फटकार लगा दी, लेकिन जिन लोगों ने सर तन से जुदा की धमकी दी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। वो(नुपूर शर्मा) बेचारी मर-मर के जी रही है। उधर कन्हैयालाल की हत्या करके हत्यारों ने वीडियो बनाया, लेकिन उसके हत्यारे आज भी आजाद घूम रहे हैं।

इससे साफ है कि बात सनातन की कोर्ट में आती है तो जज साहब टिप्पणी करते हैं और बात जब सर तन से जुदा वालों की आती है तो चुप्पी साध लेते हैं। हिम्मत है तो दूसरे लोगों के लिए टिप्पणी करके देखिए, लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा।

डॉ. राकेश किशोर ने कहा कि इस देश में सनातन की आज ये जो हालत है वह इसलिए कि हम सनातन के अपमान पर आज तक चुप रहे और सिर्फ लेख लिखते रहे कभी कोई कदम नहीं उठाया।

डॉ. राकेश किशोर ने कहा, “वो(मुस्लिम) गजवा ए हिंद की तैयारी कर रहे हैं। वह भारत को ईरान की तरह बनाना चाहते हैं। इसकी एक झलक मैंने अपनी आँखों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और झारखंड में देखी है। 1947 में मुस्लिम देशों की संख्या 10-12 थी लेकिन आज उनकी संख्या 57 हो गई है। ये अब देश के युवाओं की चिंता है कि अगर कल को भागना पड़े तो वह भारत से कहाँ जाएँगे?”

माफ करने पर CJI को नहीं कहूँगा शुक्रिया

‘जूता कांड’ के बाद CJI बीआर गवई द्वारा खुद को माफ करने पर डॉ. किशोर कहते हैं, “मैं उन्हें शुक्रिया अदा नहीं करूँगा क्योंकि उन्होंने मुझे इसलिए माफ किया है कि वह नवंबर माह में सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसके बाद वह मेरी तरह सामान्य वकील हो जाएँगे। जब मैं अपना केस लड़ते हुए इनसे कोर्ट में सवाल करूँगा तो वह मेरे सवालों का सामना नहीं कर पाएँगे। उन्हें पता है कि मैं एक ईमानदार हूँ और मैं इनकी(CJI) की कलई खोल सकता हूँ। हालाँकि मुझे फँसाने और गिरफ्तार किए जाने के लिए नए तरीके से प्रयास हो रहे हैं। मेरे खिलाफ कर्नाटक में भी मुकदमा लिखवाया गया है, लेकिन मैं इनसे डरने वाला नहीं हूँ। मैं गिरफ्तारी देने के लिए तैयार हूँ।”

भरूच धर्मांतरण केस में गुजरात HC ने FIR रद्द करने से किया इनकार, कहा- इस्लाम अपनाने वाले दूसरों को मजबूर करने के आरोप से नहीं हो सकते बरी: विदेशी फंडिंग का भी खेल

गुजरात हाईकोर्ट ने 1 अक्टूबर 2025 को हिंदुओं के इस्लाम में धर्म परिवर्तन से जुड़े एक मामले में आरोपितों द्वारा FIR रद्द करने के लिए दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोपितों के खिलाफ पहली नजर में (Prima Facie) अपराध बनते हैं।

जस्टिस निर्जर एस देसाई की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। आरोपितों ने 2021 में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की माँग की थी। यह एफआईआर आईपीसी की धारा 120(बी), 153(ए)(1), 153(बी)(1)(सी), 295(ए), 506(2), 466, 467, 468, 471, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(5-ए), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 84(सी) और गुजरात धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2003 की धाराओं के तहत दर्ज की गई थी।

अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि चूँकि आरोपित खुद किसी और धर्म से इस्लाम में आए हैं, इसलिए उन्हें इस मामले में आरोपित नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वे पीड़ित नहीं बल्कि दूसरों पर धर्म परिवर्तन का दबाव डालने वाले लोग हैं।

मामले में तीन आरोपित ऐसे हैं जो पहले हिंदू थे और बाद में इस्लाम अपनाया। आरोप है कि इन लोगों ने भरूच जिले के आमोद क्षेत्र के हिंदू ग्रामीणों को धर्म बदलने के लिए नए मकान, अनाज, नकद और नौकरी का लालच दिया।

भरूच धर्मांतरण का क्या है पूरा मामला

भरूच जिले के आमोद पुलिस स्टेशन में 14 नवंबर 2021 को प्रवीन भाई वसंत भाई वसावा नामक व्यक्ति की शिकायत पर धर्म परिवर्तन का मामला दर्ज किया गया। शुरू में एफआईआर में 9 लोगों को आरोपित बनाया गया था, लेकिन जाँच के बाद आरोपितों की संख्या बढ़कर 16 हो गई।

प्रवीन भाई वसावा ने शिकायत में बताया कि साल 2018 में उन्हें लालच देकर इस्लाम धर्म में बदलवाया गया और उनका नाम बदलकर सलमान वसंत पटेल कर दिया गया। उन्होंने कहा कि अब्दुल अजीज पटेल नाम का व्यक्ति उन्हें एक सरकारी परिसर में बने इबादतगाह में ले जाकर कलमा पढ़ना सिखाता था। एक दिन उसे सूरत ले जाया गया, जहाँ झूठे बहाने से एक कागज पर उसका अँगूठा लगवाया गया और बाद में उसके आधार कार्ड पर नाम बदल दिया गया।

शिकायत के अनुसार, शब्बीर भाई बेकरीवाला और समद भाई बेकरीवाला ने अजितभाई छगनभाई वसावा (जिसका नाम बदलकर अब्दुल अजीज पटेल कर दिया गया) को आर्थिक मदद और मकान बनवाने का लालच देकर इस्लाम में धर्म परिवर्तन कराया। इसके बाद अजितभाई ने दो अन्य हिंदू पुरुषों, महेंद्र जीवनभाई वसावा (नाम बदला गया यूसुफ जीवन पटेल) और रमन बरकत वसावा (नाम बदला गया अय्यूब बरकत पटेल) को भी धर्म परिवर्तन के लिए राजी किया।

इसके बाद ये तीनों, शब्बीर और समदभाई के साथ मिलकर गाँव के अन्य हिंदू लोगों को भी नए घर, राशन और नकद पैसे का लालच देकर इस्लाम में धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करने लगे।

शिकायतकर्ता ने बताया कि अब्दुल अजीज पटेल को धर्म परिवर्तन के लिए हसन तिसली नाम के व्यक्ति से आर्थिक सहायता मिलती थी। हसन तिसली, अब्दुल अजीज पटेल और एक विदेशी नागरिक फेफड़ावाला हाजी अब्दुल्ला ने मिलकर करीब 37 हिंदू परिवारों के लगभग 100 लोगों का इस्लाम में धर्म परिवर्तन कराया।

प्रवीनभाई ने यह भी बताया कि अब्दुल अजीज पटेल ने सरकारी सहायता से बने अपने घर को तोड़कर उसकी जगह इबादतगाह बनाई थी, जहाँ वह लोगों को कलमा सिखाता था। उनका आरोप है कि आरोपित  देशभर में हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने की साजिश का हिस्सा हैं और उन्हें इसके लिए विदेशों से भारी आर्थिक मदद मिलती है। जब प्रवीनभाई ने इसका विरोध किया, तो आरोपितों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी, जिसके बाद उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

उच्च न्यायालय ने आरोपितों को धर्म परिवर्तन का ‘पीड़ित’ मानने से इनकार कर दिया

आरोपितों ने एफआईआर को चुनौती देते हुए कहा कि वे खुद धर्म परिवर्तन के शिकार हैं, अपराधी नहीं। उनका दावा था कि शिकायतकर्ता और अन्य लोगों ने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था, किसी दबाव या लालच में नहीं। इसलिए उन पर कोई अपराध नहीं बनता।

लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजों और गवाहों के बयानों से यह साफ दिखता है कि धर्म परिवर्तन के बाद उन्हीं लोगों ने दूसरों पर भी धर्म बदलने का दबाव डाला और उन्हें लालच दिया। आरोप है कि उन्होंने लगभग 37 हिंदू परिवारों के करीब 100 लोगों का इस्लाम में धर्म परिवर्तन कराया।

कोर्ट ने कहा कि यह आरोप पहली नजर में सही लगते हैं (prima facie offence बनता है)। इसलिए यह मानना गलत होगा कि जो लोग पहले हिंदू थे और बाद में इस्लाम में गए, वे इस मामले में पीड़ित हैं।

कोर्ट ने कहा कि “एफआईआर और गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट है कि आरोपितों ने अन्य लोगों को इस्लाम अपनाने के लिए प्रभावित किया, दबाव डाला और लालच दिया। जाँच में मिले सबूत और चार्जशीट से यह साबित होता है कि उनके खिलाफ Prima Facie मामला बनता है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि वे खुद धर्म परिवर्तन के शिकार हैं।”

इस आधार पर अदालत ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया और कहा कि ट्रायल जारी रहेगा।

जाँच में सहयोग न करने के आधार पर एक आरोपी का आवेदन खारिज कर दिया गया

गुजरात हाईकोर्ट ने आरोपित फेफड़ावाला की याचिका खारिज कर दी, जो यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) में रहता है। अदालत ने कहा कि फेफड़ावाला ने जाँच में सहयोग नहीं किया, इसलिए उसकी याचिका केवल उसके व्यवहार के आधार पर ही खारिज की जाती है, मामले के मेरिट पर नहीं।

कोर्ट ने बताया कि फेफड़ावाला इस मामले के दर्ज होने से पहले भारत में 25 बार आया था, लेकिन एफआईआर के बाद उसने एक बार भी भारत की यात्रा नहीं की। पुलिस ने उसे जाँच में शामिल होने और सहयोग करने के लिए बुलाया, लेकिन उसने आने से इनकार कर दिया।

अदालत ने कहा कि आरोपित ने न तो अग्रिम जमानत (anticipatory bail) की कोई अर्जी लगाई, न ही किसी भी समय जाँच में शामिल होने की इच्छा दिखाई। उसे सीआरपीसी की धारा 41-ए के तहत समन भी भेजा गया था, जिसका उसने जवाब तो दिया, लेकिन जाँच में उपस्थित नहीं हुआ।

कोर्ट ने कहा कि उसके इस रवैये को देखते हुए याचिका को खारिज किया जाता है, क्योंकि उसने जाँच में कोई सहयोग नहीं किया और खुद को जाँच से दूर रखा।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

‘जजों को कम बोलना चाहिए’: जिस ‘ओरल ऑब्जर्वेशन’ से बचने की पूर्व CJI काटजू दे रहे नसीहत, जानिए उसके नाम पर कैसे हिंदुओं और PM मोदी को बनाया गया ‘निशाना’

भारत की न्यायपालिका को लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ माना जाता है, लेकिन हाल के सालों में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की कोर्ट रूम में की गई मौखिक टिप्पणियाँ (ओरल ऑब्जर्वेशंस) विवादों का केंद्र बन गई हैं। ये टिप्पणियाँ अक्सर फैसले का हिस्सा नहीं होतीं, लेकिन इनके कारण पूरे देश में हंगामा मच जाता है। ताजा उदाहरण है मौजूदा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बी.आर. गवई की एक टिप्पणी, जिसने हिंदू समाज को आहत किया और एक वकील को इतना गुस्सा दिलाया कि उसने कोर्ट में ही जूता फेंक दिया।

पूर्व सीजेआई मार्कंडेय काटजू ने इस पर अपनी राय देते हुए कहा है कि जजों को कोर्ट में कम बोलना चाहिए और सिर्फ कानूनी पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि अनावश्यक बयानबाजी करनी चाहिए।

पूर्व सीजेआई मार्कंडेय काटजू ने अपने एक लेख में लिखा है कि जजों का काम सुनना है, फैसला देना है, न कि लेक्चर देना। वे कहते हैं, “एक ज्यादा बोलने वाला जज एक बेसुरे बाजे की तरह होता है।” यह बात उन्होंने इंग्लैंड के पूर्व लॉर्ड चांसलर सर फ्रांसिस बेकन के हवाले से कही।

काटजू ने गवई की टिप्पणी को अनुचित बताया और कहा कि अगर कोई जज मस्जिद के मामले में पैगंबर मोहम्मद से जाकर प्रार्थना करने की बात कहे, तो क्या होगा? शायद ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे लगने लगें। यह बात सोचने वाली है कि क्या जजों की ऐसी टिप्पणियाँ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती हैं और समाज में अशांति फैलाती हैं?

आइए, पहले इस ताजा मामले को विस्तार से समझते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में कुछ समय पहले एक याचिका आई थी, जिसमें मध्य प्रदेश के खजुराहो में भगवान विष्णु की क्षतिग्रस्त मूर्ति को बहाल करने की माँग की गई थी। याचिकाकर्ता ने खुद को विष्णु भक्त बताया। सुनवाई के दौरान सीजेआई गवई ने कहा, “तुम कहते हो कि तुम विष्णु के कट्टर भक्त हो। जाओ और खुद देवता से कहो कि कुछ करे। जाओ और प्रार्थना करो।”

यह टिप्पणी केस के कानूनी मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं रखती थी, लेकिन इसने हिंदू समाज में गुस्सा भड़का दिया। कई लोगों ने इसे सनातन धर्म पर हमला माना। नतीजा? एक गुस्साए वकील ने कोर्ट में ही गवई पर जूता फेंक दिया। काटजू ने जूता फेंकने की निंदा की, लेकिन कहा कि जज की अनावश्यक बातों ने यह न्योता खुद दिया।

यह पहली बार नहीं है जब जजों की मौखिक टिप्पणियों ने देश में अव्यवस्था पैदा की हो। पिछले कुछ सालों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ जजों ने हिंदू धर्म से जुड़े मुद्दों पर ऐसी टिप्पणियाँ कीं, जो फैसले में शामिल नहीं हुईं, लेकिन समाज में तूफान ला दिया। आइए, इनमें से कुछ प्रमुख मामलों पर नजर डालते हैं।

इसी साल 2025 में पूर्व जस्टिस रोहिंटन नरीमन की ‘डिवाइन ऑर बोवाइन इंटरवेंशन‘ वाली टिप्पणी को ही रख लीजिए। नरीमन ने एक कार्यक्रम में पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा या चंद्रचूड़ के राम मंदिर फैसले पर प्रार्थना करने के संदर्भ में कहा कि अगर कोई जज फैसला ‘डिवाइन इंटरवेंशन’ (दैवीय हस्तक्षेप) से देता है, तो वह अपनी शपथ का उल्लंघन करता है। उन्होंने मजाक में कहा, ‘चाहे डिवाइन हो या बोवाइन (गाय जैसा) इंटरवेंशन।’

लोगों ने इसे हिंदू धर्म का मजाक उड़ाना माना, क्योंकि ‘बोवाइन’ गाय से जुड़ा है, जो हिंदुओं के लिए पवित्र है। इस टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी और कई ने इसे एंटी-हिंदू बताया। नरीमन की बात का मकसद शायद न्यायपालिका की निष्पक्षता पर जोर देना था, लेकिन शब्दों का चुनाव गलत साबित हुआ।

दूसरा मामला 2022 का है, जब सुप्रीम कोर्ट ने नूपुर शर्मा पर टिप्पणी की। उस समय बीजेपी की प्रवक्ता रही नूपुर शर्मा ने एक टीवी डिबेट में पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी की थी। इसके बाद देश में हिंसा भड़क गई, जिसमें उदयपुर में एक हिंदू दर्जी कन्हैयालाल की सरेआम हत्या कर दी गई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में नूपुर की याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्या कांत और जेबी पारदीवाला ने कहा कि नूपुर की ‘लूज टंग’ ने पूरे देश को आग लगा दी। उन्होंने कहा, “वह उदयपुर हत्याकांड के लिए जिम्मेदार हैं” और “उन्हें पूरे देश से माफी माँगनी चाहिए।”

ये टिप्पणियाँ फैसले का हिस्सा नहीं थीं, लेकिन इन्होंने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया। बीजेपी समर्थकों ने जजों की आलोचना की, जबकि विपक्ष ने इसे सही ठहराया। नूपुर को पार्टी से सस्पेंड कर दिया गया, और समाज में धार्मिक तनाव बढ़ गया। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी टिप्पणियाँ ट्रायल से पहले किसी को दोषी ठहराने जैसी हैं, जो न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।

तीसरा मामला साल 2008 का है। इसमें दिल्ली हाई कोर्ट में एम.एफ. हुसैन पर मामला चल रहा था। मशहूर पेंटर एम.एफ. हुसैन पर हिंदू देवी-देवताओं की नग्न पेंटिंग्स बनाने के आरोप थे। कई जगहों पर उनके खिलाफ केस दर्ज हुए। दिल्ली हाई कोर्ट ने इन केसों को खारिज करते हुए कहा कि शिकायतकर्ताओं की सोच “प्यूरिटनिज्म” (कट्टर नैतिकता) वाली है।

जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा, “हमें उन विचारों की आजादी देनी चाहिए जिनसे हम नफरत करते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब तब तक नहीं अगर अपमान करने की आजादी न हो।” इस टिप्पणी को कई हिंदुओं ने अपनी धार्मिक भावनाओं का अपमान माना। हुसैन को देश छोड़ना पड़ा और हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन किए। हालाँकि कोर्ट का फैसला कला की आजादी के पक्ष में था, लेकिन मौखिक टिप्पणी ने विवाद बढ़ाया।

ये चार मामले (दो 2025 के, एक 2022 का, एक 2008 का) दिखाते हैं कि जजों की टिप्पणियाँ कैसे हिंदू भावनाओं को ठेस पहुँचाती हैं और देश में अशांति फैलाती हैं। लेकिन बात सिर्फ हिंदू-विरोधी टिप्पणियों तक सीमित नहीं। अब देखते हैं गुजरात दंगों से जुड़े चार मामलों को, जहाँ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर कड़ी टिप्पणियाँ कीं। ये टिप्पणियाँ भी मौखिक थीं और फैसलों में शामिल नहीं हुईं, लेकिन इन्होंने राजनीतिक माहौल गरमा दिया।

पहला साल 2004 का सुप्रीम कोर्ट का ‘मॉडर्न-डे नीरोज‘ वाला बयान। 2002 के गुजरात दंगों में बेस्ट बेकरी केस में सभी आरोपित बरी हो गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए गुजरात सरकार को ‘मॉडर्न-डे नीरोज’ कहा। नीरो रोमन सम्राट थे, जो शहर जलते देखते रहे। कोर्ट ने कहा, “जब निर्दोष बच्चे और असहाय महिलाएँ जल रही थीं, तो सरकार ने आँखें फेर लीं।” इस टिप्पणी ने मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। कॉन्ग्रेस और विपक्ष ने इसे मोदी के खिलाफ हथियार बनाया। हालाँकि बाद में 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को क्लीन चिट दी, लेकिन 2004 की टिप्पणी का असर सालों तक रहा।

दूसरा मामला 2003 का है, जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजरात सरकार में कोई विश्वास नहीं है। दंगों की जाँच पर सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार निष्पक्ष जाँच नहीं कर रही। अभियोजन और राज्य के बीच नेक्सस (साँठगाँठ) की बात कही गई। इसने दंगों की जाँच को सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में डाल दिया। विपक्ष ने इसे मोदी की विफलता बताया और देश में बहस छिड़ गई कि क्या राज्य सरकार दंगों में शामिल थी?

तीसरा मामला सितंबर 2003 का है, जहाँ एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार पर टिप्पणी की थी कि उसमें कोई भरोसा नहीं। यह दंगों के कई केसों की जाँच से जुड़ा था। कोर्ट ने एसआईटी गठित की, क्योंकि राज्य की जाँच पर शक था। इस टिप्पणी ने राजनीतिक पार्टियों को हमले का मौका दिया और मोदी की छवि पर विपरीत असर पड़ा।

चौथा मामला फरवरी 2012 का है, जब गुजरात हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार की अपर्याप्त प्रतिक्रिया और निष्क्रियता के कारण दंगे दिनों तक चले। यह ‘अराजक स्थिति’ वाली टिप्पणी थी। हाई कोर्ट ने सरकार की आलोचना की कि उसने दंगों को रोकने में ढिलाई बरती। यह टिप्पणी भी फैसले का हिस्सा नहीं थी, लेकिन मीडिया में सुर्खियाँ बनी और विपक्ष ने मोदी को घेरा।

ऐसा ही एक मामला किसान आंदोलन के समय का है, जब सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में कहा कि सरकार ने कानून बनाते समय सही तरीके से राय तक नहीं ली। जबकि सरकार इस मामले में अपना पक्ष विस्तार से रख चुकी थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का देश में गलत मतलब से इस्तेमाल किया गया।

ये मामले दिखाते हैं कि मौखिक टिप्पणियाँ कैसे समाज को बाँटती हैं। कानूनी रूप से इनका कोई महत्व नहीं होता, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में कहा है कि हाई कोर्ट मौखिक निर्देश नहीं दे सकते, सिर्फ लिखित आदेश बाध्यकारी होते हैं। एक केस में कोर्ट ने कहा, “जजों को अपने फैसलों से बोलना चाहिए, मौखिक बातें रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं।” लेकिन व्यावहारिक रूप से ये टिप्पणियाँ मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए फैलती हैं और जनता की राय बनाती हैं।

जैसे गुजरात मामलों में मोदी को सालों तक ‘दंगाई’ कहा गया, जबकि बाद में क्लीन चिट मिली। इसी तरह नूपुर शर्मा को ट्रायल से पहले दोषी ठहराया गया।

अब बात करते हैं सोशल मीडिया की भूमिका की। आज के दौर में सोशल मीडिया ने सबकी जवाबदेही तय कर दी है। चाहे सीजेआई हो या कोई नेता, अगर कोई गलत बोलता है, तो जनता तुरंत प्रतिक्रिया देती है। गवई की टिप्पणी का मामला देखिए। जैसे ही यह बात बाहर आई, एक्स (पूर्व ट्विटर) पर #ImpeachTheCJI और #GavaiMustResign जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।

हजारों यूजर्स ने गुस्सा जाहिर किया। एक यूजर ने लिखा, “यह हिंदू आस्था का अपमान है, क्या मुस्लिम पिटीशनर से ऐसा कहते?” दूसरा बोला, “मोदी सरकार क्यों चुप है? सॉलिसिटर जनरल ने तो बचाव किया!” कई ने इसे ‘टू-टियर ज्यूडिशियरी’ कहा, मतलब हिंदुओं के लिए अलग न्याय।

सोशल मीडिया ने गुस्से को पनपाया। लोग वीडियो शेयर करने लगे मीम्स बने, और बहस छिड़ गई। पूर्व आईपीएस अधिकारी भास्कर राव ने जूता फेंकने वाले वकील की हिम्मत की तारीफ की, हालाँकि गलत बताया। काटजू का ट्वीट वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने जजों को कम बोलने की सलाह दी।

सोशल मीडिया की वजह से सीजेआई जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को भी सोच-समझकर बोलना पड़ता है। पहले ऐसी टिप्पणियां कोर्ट रूम तक सीमित रहती थीं, लेकिन अब लाइव स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया से तुरंत फैल जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने खुद सोशल मीडिया को ‘बेलगाम’ कहा है।

जस्टिस पारदीवाला ने एक कार्यक्रम में कहा कि सोशल मीडिया पर जजों पर व्यक्तिगत हमले खतरनाक हैं, इससे जज कानून की बजाय मीडिया की सोचते हैं। लेकिन सवाल यह है कि अगर जज अनावश्यक टिप्पणियाँ करेंगे, तो जनता चुप क्यों रहे? गवई मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सोशल मीडिया अतिरंजित प्रतिक्रिया दे रहा है, लेकिन क्या यह सही है?

हिंदू समाज ने महसूस किया कि उनकी आस्था का मजाक उड़ाया गया। सोशल मीडिया ने इसे आवाज दी और अब सरकार से इम्पीचमेंट की माँग हो रही है।

कुल मिलाकर जजों की मौखिक टिप्पणियाँ न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं। ये समाज में अव्यवस्था पैदा करती हैं, क्योंकि ये राजनीतिक और धार्मिक भावनाओं को भड़काती हैं। कानून कहता है कि सिर्फ लिखित फैसले मायने रखते हैं, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में मौखिक बातें भी महत्वपूर्ण हो गई हैं। जरूरत है कि जज संयम बरतें, जैसा काटजू साहब कहते हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ऐसी घटनाएँ बढ़ेंगी और न्यायपालिका पर जनता का भरोसा कम होगा। क्या समय आ गया है कि कोर्ट रूम में बोलने के लिए गाइडलाइंस बनें? यह विचार करने का समय है।

मैथिली ठाकुर, पवन सिंह, रितेश पांडेय, खेसारी लाल यादव… सब बनेंगे ‘माननीय’ तो क्या कार्यकर्ता घास छीलेंगे?

पवन सिंह, रितेश पांडे, अक्षरा सिंह, मैथिली ठाकुर, खेसारी लाल यादव, छैला बिहारी, भरत शर्मा व्यास, रचना झा…ऐसा लगता है कि बिहार के इस विधानसभा चुनाव में बिहार से जुड़े सभी कलाकारों में खुद को माननीय बनाने की होड़ लगी हुई है। इसे लेकर जनता के बीच भी भारी विरोध देखा जा रहा है।

खासकर जब से मैथिली ठाकुर ने चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। 25 साल की लोक गायिका मैथिली ठाकुर ने खुद बेनीपट्टी से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। बिहार बीजेपी के बड़े नेताओं से उनकी मुलाकात, पार्टी में शामिल होने की संभावनाओं ने चुनावी माहौल को गर्म कर दिया है।

विरोध करने वालों का पहला और सबसे बड़ा तर्क यह है कि मैथिली ठाकुर अब बिहार की जमीन से कट चुकी हैं। उनका परिवार लंबे समय से दिल्ली में रहता है, वहीं से उन्होंने अपनी शिक्षा और करियर दोनों बनाए हैं। उनका मधुबनी या दरभंगा से सीधा जुड़ाव अब सिर्फ सरकारी या सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित रह गया है।

कई लोगों का तर्क है कि लोकप्रियता को संस्कृति के लिए योगदान से ऊपर नहीं रखा जा सकता है। उनकी पहचान मैथिली गायिका के रूप में जरूर है, पर उन्होंने स्थानीय स्तर पर कलाकारों के लिए कोई संस्थागत काम नहीं किया है। लोगों का कहना है कि अगर अगर बात मैथिली संस्कृति को सम्मान देने की है, तो ऐसे कलाकारों को मौका देना चाहिए जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी मैथिली के लिए समर्पित की है।

मैथिली क्षेत्र में ऐसे कई कलाकार हैं जिन्होंने अपना जीवन मैथिली संस्कृति को बचाने में लगा दिया। पूनम मिश्रा, माधव राय, विजय विकास, रचना झा जैसे लोग गाँव-गाँव घूमकर कार्यक्रम करते हैं। इन कलाकारों की पहचान भले ही राष्ट्रीय स्तर पर न हो लेकिन वे आज भी अपने लोगों के बीच रहते हैं, उन्हीं के दुख-दर्द में शामिल होते हैं।

मैथिली ठाकुर के नाम के साथ जो विरोध जुड़ा है, उसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि लोग इसे लोकप्रियता की राजनीति मान रहे हैं। कई लोगों को लगता है कि राजनीतिक दल उनके नाम को सिर्फ वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।

मैथिली ठाकुर कोई अकेला नाम नहीं है। भोजपुरी स्टार रितेश पांडेय को करगहर से अपना उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा भोजपुरी सिनेमा के चमकते सितारे पवन सिंह, अक्षरा सिंह, रचना झा और खेसारी लाल यादव के भी इस सियासी जंग में उतरने की पूरी संभावनाएँ नजर आ रही हैं।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इन कलाकारों ने अपने क्षेत्र की भाषा और कला को पहचान दिलाई है। भोजपुरी सिनेमा में पवन सिंह, खेसारी लाल यादव जैसे कलाकारों का योगदान भी कम नहीं रहा उनकी लोकप्रियता अपार है, उनका फैनबेस जबरदस्त है। पर चुनाव जीतने के लिए फैनबेस से ज्यादा जमीनी कार्यकर्ताओं की जरूरत होती है।

पवन सिंह पहले बीजेपी से आसनसोल से उम्मीदवार बने लेकिन वहाँ से उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। इसके बाद वह बिहार के काराकाट से चुनाव लड़े, पवन सिंह खूब फेमस होने के बाद भी काराकाट से चुनाव नहीं जीत सके बल्कि उन्होंने NDA के उम्मीदवार को हराने का काम ही किया। यानी जिस राजनीतिक विचार से आज वह जुड़ना चाहते हैं उसके प्रति उनकी निष्ठा कितनी रही है या है यह भी एक सवाल है।

याद कीजिए जब मनोज तिवारी ने राजनीति में कदम रखा था, ‘ससुरा बड़ा पइसावाला’ के हिट होने के बाद वह भोजपुरी सिनेमा के बड़े सुपरस्टार बन गए थे। उनकी कैसेट ब्लैक में बिकने लगी थी। इस बीच जब 2009 में मनोज तिवारी सपा के टिकट पर गोरखपुर से चुनाव लड़े तो उनकी हार हुई

भोजपुरी सिनेमा के ही एक और बड़े सुपर स्टार हैं रवि किशन, उनकी गिनती उन अभिनेताओं में होती है जिन्होंने भोजपुरी सिनेमा को फिर से खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई है। अपनी लोकप्रियता के वाबजूद जव वह चुनावी मैदान में उतरे तो हालता खस्ता हो गई। 2014 में उन्होंने जौनपुर से कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें केवल 4.25% वोट ही मिल सके। रवि किशन फिलहाल गोरखपुर से बीजेपी के सांसद है।

ऐसे स्टार्स से लिस्ट लंबी है जो राजनीति में आए लेकिन फ्लॉप हो गए। कुछ ऐसे भी हैं जो आए चुनाव जीते और फिर क्षेत्र से गायब हो गए। हर दल में ऐसे स्टार्स आपको दिख जाएँगे। अमिताभ बच्चन से लेकर जया प्रदा और धर्मेंद्र तक राजनीति में कदम रखने वाले स्टार्स की लंबी फेहरिस्त है।

राजनीति हमेशा से जनसेवा का मंच कही जाती रही है और मंच के सितारों का राजनीति में आना कोई नई घटना भी नहीं है। इसके साथ-साथ एक सवाल जो उठता है वो ये कि क्या ऐसे समय में जो कार्यकर्ता वर्षों से दशकों से पार्टी का झंडा ढो रहा है, दरी-चादर बिछा रहा है, जो हर चुनाव में पोस्टर चिपकाता, भीड़ जुटाता और गलियों में नारे लगाता है, क्या उसका कोई हक नहीं बचा है?

राजनीति में विचार और वैचारिक प्रतिबद्धता हमेशा से एक ताकत रही है। जब कलाकारों और सेलेब्रिटीज को सिर्फ उनकी लोकप्रियता के दम पर टिकट दिए जाते हैं, तो वो विचारधारा के प्रति समर्पित नहीं होते हैं। कई बार वे खुद नहीं जानते कि जिस दल से लड़ रहे हैं, उसकी विचारधारा क्या है, उसकी नीतियाँ क्या हैं या उस क्षेत्र की वास्तविक समस्याएँ क्या हैं।

अब जब ये स्टार्स चुनाव में उतरते हैं तो इन चेहरों के आने का सीधा असर पड़ता है जमीनी कार्यकर्ता पर, खासतौर पर यूपी या बिहार जैसे राज्यों में। जिन्हें राजनीतिक तौर पर ज्यादा एक्टिव माना जाता है। ऐसी जगहों पर जब कार्यकर्ता अपने खून-पसीने से पार्टी की पहचान बनाते हैं, वहाँ जब कोई स्टार अचानक टिकट लेकर आ जाता है, तो कार्यकर्ता का मन टूट जाता है।

उसे लगता है कि उसका संघर्ष, उसकी मेहनत सब बेकार गई। वह जो बरसों तक अपने इलाके में पार्टी का चेहरा रहा, जनता के सुख-दुख में साथ रहा, अब उसे कोई पूछने वाला नहीं। राजनीति की ताकत हमेशा कार्यकर्ता से आती है, सितारों से नहीं। पार्टी का ढांचा उसी नींव पर टिका होता है जो गाँव-गाँव जाकर जनसंपर्क करते हैं, पोस्टर लगाते हैं, बूथ संभालते हैं। अगर उस नींव को ही कमजोर कर दिया गया, तो उसके ऊपर बना महल भर-भराकर गिर ही जाएगा।

राजनेताओं और राजनीतिक दलों को यह सच्चाई भी समझनी चाहिए, भले ही ऐसे उम्मीदवारों की संख्या 1-2 हो लेकिन यही लोकप्रियता इनके लिए इस मामले में मुसीबत बन जाती है। यह चर्चा लोगों तक पहुँचने लगती है कि पार्टी में हवा-हवाई उम्मीदवारों को टिकट दिया जा रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों को कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को समझ, जमीनी लोगों को आगे बढ़ाने की जरूरत हैं।

राजनीति का उद्देश्य हमेशा सेवा और जनहित रहा है, न कि लोकप्रियता और चमक। लेकिन जब कलाकारों और गायकों को सिर्फ इसलिए उतारा जाता है क्योंकि उनके लाखों फॉलोअर्स हैं या वे वोटों को influence कर सकते हैं, तो राजनीति विचार और मूल्यों से खाली हो जाती है।

धीरे-धीरे जनता को यह महसूस होने लगा है कि राजनीति अब जनता की आवाज नहीं बल्कि चुनावी ब्रांडिंग की मशीन बन चुकी है। जो लोग राजनीति के लिए पूरी तरह समर्पित होकर इस क्षेत्र में काम करना भी चाहते होंगे उन्हें भी लगने लगेगा कि स्टार बन जाया तो राजनेता बनने का रास्ता साफ हो जाएगा।

इन्हीं, कारणों के चलते राजनीति से वही सुचिता कम हो रही है और लोगों के प्रति जवाबदेही में भी कमी आ रही है। राजनीति की सुचिता को बचाने के लिए जरूरी है कि पूर्ण कालिक लोग राजनीति में आएँ जो इसे साइड बिजनेस ना मानकर पूर्ण कालिक काम मानें।