Home Blog Page 173

काशी में ‘स्वर्ग से उतरेंगे देवता’, लाखों दीपों से जगमगाएँगे घाट: जानिए कैसे 2 कनस्तर तेल से शुरू हुई ‘देव दीपावली’ बनी विश्व का अनोखा दीपोत्सव

कार्तिक पूर्णिमा की वह पावन तिथि आ चुकी है। भगवान शिव की नगरी काशी (वाराणसी) एक अलौकिक ऊर्जा और सौंदर्य से सराबोर होने को तैयार है। बुधवार (5 नवंबर 2025) की शाम, जैसे ही सूर्य देव अस्त होंगे, पतित पावनी माँ गंगा के ऐतिहासिक घाटों पर दीपों की अनगिनत कतारें जल उठेंगी और वह शुभ क्षण आ जाएगा जब धरती पर देवताओं की दीपावली- देव दीपावली मनाई जाती है। यह गहरा विश्वास है कि इस रात स्वयं देवता स्वर्ग से काशी में उतरकर दीप प्रज्ज्वलित करते हैं, और संपूर्ण वाराणसी क्षण भर के लिए देवलोक का रूप ले लेती है।

पौराणिक काल की विजयगाथा: त्रिपुरासुर का वध

देव दीपावली का इतिहास स्कंद पुराण और शिव पुराण के पन्नों में दर्ज है। यह कथा भगवान शिव की एक महान विजय से जुड़ी है। दैत्य त्रिपुरासुर ने अपनी तपस्या से ब्रह्मा जी से वरदान पा लिया था। वरदान के अनुसार, उसे केवल उसी समय मारा जा सकता था जब सूर्य, चंद्र और अग्नि का दुर्लभ संयोग (जिसे त्रिपुर संयोग कहा गया) बने। इस शक्ति के अहंकार में त्रिपुरासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया।

देव दीपावली मनाते हुए बनारस के घाट की तस्वीर (फोटो साभार : Aajtak)

तब, स्वयं भोलेनाथ ने अपने प्रचंड पिनाक धनुष से केवल एक बाण चलाकर, उसके तीन अभेद्य नगरों- स्वर्ण, रजत और लौह के त्रिपुरों का नाश कर दिया। भगवान शिव की इस अजेय विजय से देवताओं का भय दूर हुआ। इस खुशी में, सभी देवताओं ने मिलकर काशी में दीप जलाए और शिव की आराधना की। तभी से यह दिन ‘देव दीपावली’ के रूप में मनाया जाने लगा।

दो कनस्तर तेल से निकले दीपोत्सव की आधुनिक शुरुआत

भले ही यह पर्व सदियों पुराना है, लेकिन इसे आज के भव्य रूप में लाने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। यह आधुनिक परंपरा वर्ष 1984 में शुरू हुई, जब पंडित विजय उपाध्याय ने अकेले सिंधिया घाट पर केवल दो कनस्तर तेल से दीप जलाकर इस भव्य दीपोत्सव की नींव रखी। अगले ही वर्ष, काशी के तत्कालीन नरेश डॉ विभूति नारायण सिंह भी इस अभियान से जुड़े, जिससे आयोजन को जन समर्थन मिला और सहयोग के लिए दुकानों पर दान-पात्र रखवाए गए।

साल 1986 में केंद्रीय देव दीपावली महासमिति का गठन हुआ और धीरे-धीरे यह आयोजन केवल घाटों तक सीमित नहीं रहा। 1990 के दशक तक, दीपों की यह श्रृंखला कुंडों, तालाबों और संपूर्ण नगर में फैल गई, जिससे आज यह काशी का सबसे बड़ा उत्सव बन गया है।

श्रद्धा और भव्यता का महासंगम

आज रात, वाराणसी के सभी प्रमुख घाटों- जिनमें अस्सी, दशाश्वमेध, पंचगंगा, नमो और चेतसिंह घाट शामिल है, पर लाखों दीप प्रज्वलित होंगे। सभी घाट समितियों ने दीपक और तेल का वितरण पहले ही पूरा कर लिया है।

वाराणसी के घाट पर पटाखों की बौछार (The Quint)

इस बार चेतसिंह किला मुख्य आकर्षण का केंद्र रहेगा, जहाँ 25 मिनट का भव्य लेजर शो दिखाया जाएगा। इस शो में शिव-पार्वती की कथाओं, गंगा अवतरण, लक्ष्मी-नारायण की कहानियों के साथ-साथ काशी के गौरवशाली इतिहास, संत कबीर, तुलसीदास और बीएचयू की झलकियाँ दिखाई जाएँगी। यह शो रात 8:15, 9:00 और 9:35 बजे प्रदर्शित किया जाएगा।

अस्सी स्थित पुष्कर तालाब पर एक विशेष दीपदान किया जाएगा, जहाँ महामना पंडित मदनमोहन मालवीय, उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ, विदुषी गिरिजा देवी और प्रो वीरभद्र मिश्र जैसी काशी की महान विभूतियों की स्मृति में दीप जलाए जाएँगे।

गंगा का जलस्तर ऊँचा होने के बावजूद, कलाकार और छात्र मिलकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ थीम पर विशेष दीप डिजाइन तैयार कर रहे हैं, जो काशी की कलात्मकता और श्रद्धा का अद्भुत प्रतीक है। गंगा पार रेत पर ग्रीन क्रैकर्स की आतिशबाजी और संगीत की धुन पर नाचती रोशनी पूरे आकाश को रंगीन कर देगी।

जब गंगा के तट लाखों दीपों से आलोकित होते हैं, तो यह पर्व केवल दीयों की रोशनी का नहीं, बल्कि भक्ति, सौंदर्य और शिव की विजय का उत्सव बन जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र दिन गंगा में दीपदान करने से सभी पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

देव दीपावली काशी के हृदय में बसे उस शाश्वत और शाश्वत संदेश को दोहराती है: ‘जहाँ प्रकाश है, वहीं शिव हैं और जहाँ शिव हैं, वहाँ सृष्टि का उत्सव है।’

QS रैंकिंग में 10 साल में दस गुना बढ़ी भारत की भागीदारी, संस्थान के VP ने कहा- साफ दिख रहा है NEP 2020 का असर: जानें मोदी सरकार ने कैसे बदले उच्च शिक्षा के हालात?

हाल ही में, क्यूएस (QS) नाम की संस्था ने एशिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों की लिस्ट जारी की है, जिसका नाम है क्यूएस एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2026। इस लिस्ट में भारत ने कमाल कर दिया है। एशिया के टॉप 100 सबसे बेहतरीन कॉलेजों में भारत के कुल 7 बड़े शिक्षण संस्थान शामिल हुए हैं। इनमें पाँच बड़े आईआईटी, IIT दिल्ली, IIT मद्रास, IIT बॉम्बे, IIT कानपुर, और IIT खड़गपुर शामिल हैं। अन्य दो में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु और दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU)।

IIT दिल्ली को इस साल 59वीं रैंक मिली है और यह लगातार पाँचवीं बार भारत का नंबर-1 संस्थान बना है। सिर्फ टॉप 100 ही नहीं, बल्कि टॉप 200 में भारत के 20 कॉलेज और टॉप 500 में 66 कॉलेज शामिल हैं। क्यूएस के मुताबिक, भारत में PhD किए हुए टीचरों की संख्या पूरे एशिया में सबसे अच्छी है। इसका मतलब है कि हमारे कॉलेज गुणवत्ता के मामले में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। पिछली बार की तुलना में, भारत के 36 कॉलेजों ने अपनी रैंक सुधारी है, जबकि 105 कॉलेज नीचे चले गए हैं। क्यूएस ने बताया कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस बार रैंकिंग में बहुत सारे नए कॉलेजों को शामिल किया गया था, जिससे रिजल्ट में थोड़ा बदलाव आया है।

आईआईटी, आईआईएससी की बढ़ती धाक और नई शिक्षा नीति का कमाल

हमारे देश के बड़े-बड़े शिक्षण संस्थान, जैसे कि आईआईटी (IITs) और आईआईएससी (IISc), अब सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया में खूब चमक रहे हैं। क्यूएस एशिया रैंकिंग 2026 के जो नंबर आए हैं, वे बताते हैं कि पिछले दस सालों में भारत ने एशिया की टॉप यूनिवर्सिटी की लिस्ट में अपनी जगह दस गुना ज्यादा पक्की कर ली है। इसका मतलब है कि हमारे कॉलेज अब टेक्नोलॉजी, रिसर्च और अच्छी पढ़ाई के मामले में दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं। यह दिखाता है कि भारत अब शिक्षा की दुनिया में एक बड़ा नाम बन रहा है।

इस बड़ी कामयाबी के पीछे एक बड़ी वजह है राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020। इस नई शिक्षा नीति ने पढ़ाई के तरीकों को काफी बदल दिया है। अब पढ़ाई में अलग-अलग विषयों को जोड़कर पढ़ाया जा रहा है, रिसर्च यानी खोजबीन पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है और विदेशी यूनिवर्सिटी से दोस्ती (अंतरराष्ट्रीय सहयोग) बढ़ाई जा रही है। क्यूएस ने खुद कहा है कि पूरे एशिया के कॉलेजों का नाम दुनिया में बढ़ रहा है और भारत इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है। यह नीति हमारे छात्रों और रिसर्च करने वालों को नए मौके दे रही है और कॉलेजों को और ताकतवर बना रही है।

क्यूएस (QS) के वाइस प्रेसिडेंट की प्रतिक्रिया

क्यूएस संस्था के वाइस प्रेसिडेंट, मैटेओ क्वाककेरेली ने भारत की इस कामयाबी पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पिछले दस सालों में भारत ने शिक्षा में बहुत बड़ा बदलाव किया है, जैसे रिसर्च (खोजबीन) को बढ़ाना और नए-नए तरीके अपनाना। उनकी बात से पता चलता है कि रैंकिंग में भारत के कॉलेज दस गुना बढ़ गए हैं, जो एशिया की शिक्षा में भारत के बढ़ते योगदान को दिखाता है।

क्यूएस संस्था के वाइस प्रेसिडेंट मैटेओ क्वाककेरेली ने भारत की तारीफ की

उन्होंने यह भी कहा कि नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के कारण यह असर दिख रहा है, क्योंकि यह नीति कॉलेजों को मजबूत बना रही है और सहयोग के नए रास्ते खोल रही है। उन्होंने माना कि एशिया के कॉलेज दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं, और क्यूएस इस बदलाव में सबको मदद करता रहेगा।

पीएम मोदी ने की सराहना

भारत के नेताओं ने इस उपलब्धि पर बहुत खुशी जताई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि क्यूएस रैंकिंग में भारतीय कॉलेजों की संख्या में हुई इतनी बड़ी बढ़ोतरी देखकर उन्हें बहुत खुशी हुई है। उन्होंने साफ किया कि सरकार चाहती है कि हमारे युवाओं को सबसे अच्छी पढ़ाई मिले, इसलिए उनका ध्यान रिसर्च और इनोवेशन (नई खोजों) पर है।

पीएम मोदी ने कहा कि सरकार देश भर में नए शिक्षण संस्थान खोलकर उनकी ताकत बढ़ा रही है। वहीं, (भारतीय) उपराष्ट्रपति ने भी भारतीय कॉलेजों की इस प्रगति की तारीफ करते हुए इसे शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी जीत बताया। इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि भारत अब शिक्षा और रिसर्च में पूरे एशिया में सबसे आगे निकलने की राह पर है।

भारत की शिक्षा में बड़ा बदलाव: NEP 2020 का असर

पीआईबी की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने ‘विद्या लक्ष्मी योजना’ (2024) शुरू की, जिसके तहत 860 बड़े कॉलेजों के गरीब छात्रों को बिना कुछ गिरवी रखे ₹2,358 करोड़ का लोन दिया गया है, ताकि वे आसानी से पढ़ सकें। इसके अलावा, हमारी IITs अब विदेश में भी खुल रही हैं, जैसे जंजीबार, अबू धाबी और दुबई। साथ ही, ऑस्ट्रेलिया के डेकिन और वोलोंगोंग जैसे बड़े विदेशी कॉलेज भी अब भारत आकर कैंपस खोल रहे हैं। यह सब दिखाता है कि भारतीय शिक्षा अब ग्लोबल हो रही है।

ऑनलाइन पढ़ाई और संस्थानों को मजबूती

ऑनलाइन पढ़ाई के लिए भी बहुत काम हुआ है। ‘स्वयं’ पोर्टल पर 5 करोड़ से ज़्यादा लोगों ने नाम दर्ज कराया है, जिसमें वे ऑनलाइन पढ़कर अपनी डिग्री का क्रेडिट (अंक) कॉलेज में जोड़ सकते हैं। ‘वर्चुअल लैब्स’ ने 900 से ज़्यादा ऑनलाइन प्रयोगशालाएँ बनाई हैं, और ‘डिजिटल लाइब्रेरी’ में 8 करोड़ से ज़्यादा किताबें मौजूद हैं। इसके अलावा, ‘पीएम-ऊषा’ स्कीम के तहत 35 विश्वविद्यालयों को ₹100-100 करोड़ दिए गए हैं, ताकि वे अपनी पढ़ाई की गुणवत्ता सुधार सकें और खुद को आधुनिक बना सकें। ये सारे कदम नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के लक्ष्यों को पूरा कर रहे हैं।

लक्ष्य और कॉलेज का नया ढाँचा

नई शिक्षा नीति (NEP 2020) का सबसे बड़ा लक्ष्य 2035 तक ज्यादा से ज्यादा छात्रों को कॉलेज तक पहुँचाना है (50% GER)। इसके लिए, सरकार चाहती है कि 2040 तक सभी कॉलेज ऐसे बनें जहाँ कई विषय एक साथ पढ़े जा सकें (जैसे साइंस के साथ आर्ट्स)। 2030 तक हर जिले में कम से कम एक बड़ा कॉलेज (HEI) खोलने का भी प्लान है। इसके साथ ही, ‘राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन’ बनाया जा रहा है ताकि रिसर्च (खोजबीन) को बढ़ावा मिले। कॉलेजों को उनके काम के हिसाब से रिसर्च या सिर्फ पढ़ाने वाले कॉलेज में बाँटा जाएगा, ताकि उनकी जिम्मेदारी और अच्छी पढ़ाई की गारंटी बढ़ सके।

छात्रों को आजादी और ऑनलाइन पढ़ाई

इस नीति से छात्रों को पढ़ाई में पूरी आजादी मिल रही है। छात्र अब अपनी जरूरत के हिसाब से बीच में पढ़ाई छोड़ सकते हैं और बाद में फिर से शुरू कर सकते हैं (मल्टीपल एंट्री एंड एग्जिट)। साथ ही, ‘अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ शुरू हुआ है, जिससे छात्र कहीं भी पढ़ें, उनके अंक (क्रेडिट) सुरक्षित रहेंगे। ऑनलाइन पढ़ाई को भी खूब बढ़ावा मिला है, अब छात्र ऑनलाइन कोर्स (जैसे स्वयं MOOCs) से अपनी डिग्री के 40% तक अंक कॉलेज में जोड़ सकते हैं। इससे देश भर के करीब 19 लाख से ज्यादा छात्र ऑनलाइन कोर्स और दूरस्थ शिक्षा (Distance Learning) का फायदा उठा रहे हैं।

अमेरिकी दबाव का नहीं हुआ असर, अक्टूबर में रूस से भारत ने खरीदा ज्यादा कच्चा तेल: जानें भारत की तेल आपूर्ति पर किन चीजों का पड़ा असर

रूस से भारत आने वाले तेल को लेकर अमेरिकी दबाव के बीच अक्टूबर महीने में तेल आयात में उछाल देखी गई है। हालाँकि अमेरिकी प्रतिबंध लागू होने के बाद अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में इसमें गिरावट दर्ज की गई। रूस से तेल खरीद को मुद्दा बना कर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत पर 25% अतिरिक्त शुल्क समेत कुल 50% टैरिफ लगा दिया था। व्हाइट हाउस और उसके अधिकारियों ने नई दिल्ली पर दबाव बनाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए, लेकिन भारत टस से मस नहीं हुआ।

ट्रम्प ने यहाँ तक दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने उन्हें आश्वासन दिया था कि वह मास्को से तेल आयात करना बंद कर देंगे। हालाँकि, विदेश मंत्रालय ने इसका खंडन करते हुए कहा कि दोनों नेताओं के बीच इस मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं हुई। केप्लर (Kpler) की ओर से जारी शिप ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, अक्टूबर में रूस से भारत का कच्चा तेल आयात पिछले महीने की तुलना में बढ़ा है, जो वाशिंगटन के लगातार दबाव के बावजूद मोदी सरकार के दृढ़ इच्छाशक्ति का एक और सबूत है।

केप्लर के आँकड़ों के अनुसार, भारत में रूसी तेल की खपत सितंबर में 1.44 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) से बढ़कर अक्टूबर में लगभग 1.48 मिलियन बीपीडी हो गई है। ऑयलएक्स के मुताबिक, सितंबर में आयात 1.43 मिलियन बैरल प्रति दिन था। इन आँकड़ों में कजाकिस्तान के रास्ते रूस से आने वाले तेल को शामिल नहीं किया गया।

मीडिया हाउस के अनुसार, भारत के प्रमुख रिफाइनरी में रूसी तेल की खपत फिर से शुरू हो गई है। दिसंबर में ऐसी कंपनियाँ जिनपर प्रतिबंध नहीं लगे हैं, उनसे 5 कार्गो दिए गए हैं। देश की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी) ने दिसंबर में पूर्वी भारत के एक बंदरगाह पर डिलीवरी के लिए दुबई से समान कीमतों पर लगभग 3.5 मिलियन बैरल ईएसपीओ (पूर्वी साइबेरिया-प्रशांत महासागर) कच्चा तेल खरीदा।

आईओसी के वित्त प्रमुख अनुज जैन ने पहले बताया था कि रूसी तेल दुबई के रास्ते भारतीय बंदरगाहों तक लाने में सस्ता पड़ रहा है क्योंकि इसके परिवहन पर बाज़ार में 2 से 3 डॉलर प्रति बैरल की छूट मिल रही है।

उन्होंने कहा, “हमने रूसी कच्चे तेल की खरीद कभी नहीं रोका। हम अक्टूबर और नवंबर के लिए पहले से ही खरीद रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा, “अक्टूबर के अंतिम हफ्ते में खरीद में गिरावट इसलिए आई क्योंकि हमारा स्टॉक ज़्यादा था, इसलिए हम अपने स्टॉक के स्तर को भी बेहतर बनाना चाहते थे।”

रूसी तेल की खरीद में मासिक बदलाव आया

रूसी तेल की खरीद का पैटर्न हर महीने बदलता रहा है। आँकड़ों के मुताबिक अक्टूबर के पहले हफ्ते में आयात में बढ़ोतरी हुई, जिससे जुलाई से सितंबर तक तीन महीनों में तेल आपूर्ति में कमी को दूर कर दिया। त्योहारी माँग को पूरा करने के लिए रिफाइनरियों ने जोर शोर से तेल खरीदा।

जून में आयात 20 लाख बैरल प्रतिदिन से घटकर सितंबर में 16 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था। हालाँकि, अक्टूबर के शुरुआती विश्लेषण में सुधार की ओर इशारा किया गया था क्योंकि पश्चिमी बाजारों में कमज़ोर माँग के बीच शिपिंग में दी गई आकर्षक छूट का असर पड़ा और भारत आने वाले यूराल सहित रूसी ग्रेड के तेलों की शिपमेंट में वृद्धि हुई।

वैश्विक व्यापार विश्लेषण करने वाली कंपनी केप्लर के मुताबिक, अक्टूबर में शिपमेंट लगभग 18 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो पिछले महीने की तुलना में लगभग 2,50,000 बैरल प्रतिदिन अधिक है। इसके अलावा, भारतीय रिफाइनरियों ने पुष्टि की है कि उन्हें सरकार से रूसी तेल का आयात बंद करने का आदेश कभी नहीं मिला।

अगस्त में रूसी तेल की आपूर्ति बढ़कर 20 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया, क्योंकि रिफाइनरियों ने अधिक तेल की माँग की। वैश्विक रीयल-टाइम डेटा और केप्लर के अनुसार, अगस्त के पहले पखवाड़े में प्रतिदिन आयात किए गए 52 लाख बैरल कच्चे तेल में रूस का हिस्सा 38% तक था। जुलाई में आयात 16 लाख बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 20 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया।

ट्रम्प प्रशासन के 50% तक टैरिफ इसी महीने लागू हुआ। इसमें रूसी तेल लेने के ‘जुर्म’ में 25% अतिरिक्त शुल्क भी शामिल था। हेलसिंकी स्थित सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के अनुसार, भारत को अगस्त में रूस से 2.9 बिलियन यूरो का कच्चा तेल प्राप्त हुआ, जबकि जुलाई में यह 2.7 बिलियन यूरो था।

आईओसी के अध्यक्ष अरविंदर सिंह साहनी ने बताया, “न तो हमें खरीदने के लिए कहा जा रहा है और न ही न खरीदने के लिए। हम रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी बढ़ाने या घटाने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं कर रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा, “अप्रैल-जून में आईओसी द्वारा संसाधित कच्चे तेल में रूसी तेल का हिस्सा लगभग 22% था और निकट भविष्य में भी इसकी मात्रा समान रहने की उम्मीद है।”

आँकड़ों से पता चला है कि बारिश के मौसम में ईंधन की माँग आमतौर पर भारत में कम हो जाता है। इसलिए जुलाई में देश का रूसी तेल आयात गिर गया, जबकि पिछले महीने कुछ रिफाइनरों ने कम छूट के कारण खरीदारी स्थगित कर दी थी। जुलाई में भारत ने प्रतिदिन 1.5 मिलियन बैरल रूसी तेल खरीदा, जो पिछले महीने की तुलना में 24.5% कम है।

जुलाई में भारत के कुल आयात 4.44 मिलियन बैरल प्रतिदिन में से 34% हिस्सा रूस से आया। दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स की संचालक रिलायंस ने जुलाई में रूसी तेल की अपनी खरीद में पिछले महीने के मुकाबले 19% की कटौती की।

रूसी तेल आयात में आया कुछ समय से उछाल

रूसी तेल आयात में पिछले कुछ समय से लगातार वृद्धि देखी जा रही है। विश्लेषकों के अनुसार, इजराइल और ईरान के बीच तनाव और युद्ध को देखते हुए घरेलू रिफाइनरी कंपनियों ने अपना स्टॉक बढ़ाया। इसलिए जून में रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात 11 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया। केप्लर वेसल ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, भारत में रूसी तेल आयात जून में जुलाई 2024 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर था, जो कुल 2.08 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) था।

1 से 19 जून के बीच यह 2.1 और 2.2 मिलियन बैरल प्रति दिन के बीच रहा। इस दौरान भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 35% से ऊपर बनी रही।

यूरोपीय थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ के मुताबिक, “जून में भारत के कच्चे तेल के वैश्विक आयात में 6% की गिरावट आई, जबकि रूस से आयात की मात्रा में महीने-दर-महीने 8% की वृद्धि देखी गई, जो जुलाई 2024 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गई,”

द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मानकों से कम कीमत पर रूसी कच्चा तेल लगातार भारत को मिल रहा है, इसलिए मई में भारत का आयात 10 महीने के उच्चतम स्तर 1.96 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर पहुँच गया था। रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। कुल आयात का 38% हिस्सा रूस से पूरा होता है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में भारत को रूसी तेल आपूर्ति नौ महीने के उच्चतम स्तर पर रही। केप्लर ने बताया कि भारत का रूसी तेल आयात अप्रैल में मार्च की तुलना में 2.1% बढ़कर 19.2 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया, जबकि कुल तेल आयात 7.3% घटकर 48.8 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। भारत के तेल आयात में रूसी कच्चे तेल का हिस्सा मार्च के 35.7% से बढ़कर अप्रैल में 39.3% हो गया।

रॉयटर्स के मुताबिक, केप्लर के आँकड़ों से पता चलता है कि भारत का रूसी तेल का आयात मार्च में 15.4 लाख बैरल प्रतिदिन था, जो पिछले तीन महीनों में घटकर 11 लाख से 12 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था। सूत्रों ने बताया कि तुर्की की सबसे बड़ी तेल रिफाइनर कंपनी ने रूसी तेल का आयात बंद कर दिया है। इससे एशियाई बाजारों में तेल की आपूर्ति बढ़ गई है।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने बताया कि भारत समुद्री रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है। 2025 के पहले 9 महीनों में प्रतिदिन 1.9 मिलियन बैरल या 2022 के यूक्रेन युद्ध पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस के कुल निर्यात का लगभग 40% समुद्र के रास्ते भारत आता था। घरेलू रिफाइनरियाँ फिर इस कच्चे तेल को पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन में बदल देती हैं।

तेल आपूर्ति पर दो युद्धों का पड़ा असर

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय जर्नल फॉर मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च के अनुसार, 2024-2025 में रूस भारत का कच्चे तेल का शीर्ष आपूर्तिकर्ता होगा, जो कुल आयात में लगभग 36% का योगदान देगा। हालाँकि, हमेशा ऐसा नहीं था क्योंकि 2009-10 में भारत को कच्चा तेल निर्यात करने वाले देशों में रूस का अनुपात 1% से भी कम था।

(साभार-इंटरनेशनल जर्नल)

2021-2022 में भी रूस से कच्चे तेल का आयात केवल 2% से अधिक रहा। इस बदलाव के 2 अहम कारण थे। पहला, ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध। भारत के कुल तेल आयात में ईरान का प्रतिशत इसकी वजह से तेजी से गिरा। दूसरा कारण 2022 में शुरू हुआ रूस और यूक्रेन का युद्ध रहा। इसकी वजह से कूटनीति, तेल व्यापार में बदलाव आया।

पूर्वोक्त कारण रूस से भारत के ऊर्जा अधिग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। इसी प्रकार, वाणिज्यिक, रसद और भू-राजनीतिक कारक रूसी तेल की भारत की मासिक खरीद में उतार-चढ़ाव में योगदान करते हैं, जिसमें भारतीय रिफाइनरियों के आर्थिक विचार प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

भारत के विदेश मंत्रालय ने विश्व तेल बाजार में बदलती गतिशीलता को देखते हुए रूसी कच्चे तेल के आयात पर जवाब दिया। उनका कहना है कि भारत के कच्चे तेल के आयात पर इसका प्रभाव पड़ता है। नई दिल्ली अपने 1.4 अरब लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ऊर्जा खरीद में लचीलेपन पर ज़ोर देता रहा है।रूसी तेल कंपनियों पर हाल ही में लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के असर पर भी विचार किया जा रहा है। उचित मूल्य पर अलग अलग स्रोतों से तेल आपूर्ति मोदी सरकार की रणनीति का हिस्सा है।

आईओसी प्रमुख साहनी ने जोर देकर कहा कि रूसी कच्चा तेल आर्थिक कारणों से खरीदा जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया, “हम पूरी तरह से आर्थिक कारणों से खरीदना जारी रखते हैं, यानी अगर कच्चे तेल की कीमत और विशेषताएँ हमारी योजना के मुताबिक हों, तो हम खरीदते हैं।”

इसके अलावा, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) के निदेशक (वित्त) वेत्सा रामकृष्ण गुप्ता के अनुसार, कीमतों में कटौती घटकर 1.5 डॉलर प्रति बैरल रह गई है, जिसके परिणामस्वरूप जुलाई में आयात कम हुआ है। अगस्त में यह छूट 40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई थी, लेकिन अब यह घटकर 2.70 डॉलर प्रति बैरल रह गई है।

साहनी ने बताया कि यूराल जैसे रूसी कच्चे तेल के ग्रेड पर छूट से खरीद की मात्रा में मासिक उतार-चढ़ाव हो सकता है और इस बात पर ज़ोर दिया कि इंडियन ऑयल को अमेरिकी टैरिफ के जवाब में खरीद में कटौती या वृद्धि करने के लिए नहीं कहा गया है। यह स्पष्ट है कि अमेरिकी टैरिफ ने कोई भूमिका नहीं निभाई। हालाँकि रूसी तेल कंपनियों पर मौजूदा प्रतिबंधों का असर पड़ सकता है।

कच्चे तेल की आपूर्ति को प्रभावित करने वाली वजहें

भारतीय तेल रिफाइनरियों में टर्नराउंड या आवधिक रखरखाव किया जाता है, जिससे उनकी प्रसंस्करण क्षमता और कच्चे तेल की खपत अस्थायी रूप से कम हो सकती है। इन रखरखाव कार्यक्रमों के कारण रूसी कच्चे तेल की कुल माँग में भी उतार-चढ़ाव आता है।

अस्थायी सरकारी आँकड़ों से पता चलता है कि अगस्त में भारतीय रिफाइनरियों का कच्चे तेल का उत्पादन महीने-दर-महीने 4.4% घटकर 5.27 मिलियन बैरल प्रति दिन (22.29 मिलियन मीट्रिक टन) रह गया।

निवेश सूचना एवं क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (आईसीआरए) के उपाध्यक्ष प्रशांत वशिष्ठ ने कहा, “जुलाई की तुलना में अगस्त में रिफाइनरी उत्पादन में गिरावट आई है। इसका मुख्य कारण बारिश का मौसम, निर्धारित रखरखाव और एक रिफाइनरी का जरूरत के मुताबिक कम उत्पादन करना है।”

सरकार के पेट्रोलियम नियोजन एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (पीपीएसी) के आंकड़ों के अनुसार, मानसून के कारण अपेक्षाकृत कम माँग के साथ-साथ निर्धारित रिफाइनरी रखरखाव के कारण बंद होने के कारण, भारत ने जुलाई में 18.6 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) कच्चे तेल का आयात किया, जो पिछले वर्ष के 19.4 एमएमटी से कम है।

भारतीय रिफाइनर अपने कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता ला रहे हैं। ऊर्जा विश्वसनीयता और अनुकूलन क्षमता में सुधार के लिए दुनिया के अन्य क्षेत्रों के विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। इससे तेल आपूर्तिकर्ताओं की संख्या बढ़ रही है। इसका असर रूसी तेल के आयात पर भी पड़ रहा है।

भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, दुनिया के अस्थिर बाजार में भारतीय ग्राहकों के हितों की रक्षा करना नई दिल्ली की सर्वोच्च प्राथमिकता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने घोषणा की, “स्थिर ऊर्जा मूल्य और सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करना हमारी ऊर्जा नीति के दो अहम लक्ष्य रहे हैं। इसमें हमारी ऊर्जा स्रोतों का व्यापक आधार बनाना और बाजार की स्थितियों के अनुसार विविधता लाना शामिल है।”

तेल के लिए अनुबंध आमतौर पर डिलीवरी से चार से छह और यहाँ तक कि आठ हफ़्ते और महीनों पहले तय हो जाते हैं। हफ़्तों बाद आने वाला सौदा इस वक्त की स्थितियों पर निर्भर नहीं करता। ये पहले तय किए गए कीमतों और शर्तों पर आधारित होते हैं, जिससे आयात में मासिक असमानता बढ़ती है।

भारत में रूसी तेल की अलग-अलग मात्रा में आने के पीछे ये सभी पहलू और परिस्थितियाँ निर्णायक रहे हैं।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

न्यूयॉर्क का मेयर बना जोहरान ममदानी, हिंदू-भारत विरोधी रही है छवि: अब्बू महमूद करता था ‘आत्मघाती हमलावरों’ का बचाव

न्यूयॉर्क सिटी को नया मेयर जोहरान ममदानी बन गया है। 34 वर्षीय डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट ममदानी ने पूर्व गवर्नर एंड्रयू क्यूमो और रिपब्लिकन उम्मीदवार कर्टिस स्लिवा को हराकर इस पद को हासिल किया है। युगांडा में जन्मे और भारतीय मूल के ममदानी ने जून 2025 के चुनाव में जीत हासिल कर न्यूयॉर्क के पहले भारतीय-अमेरिकी मुस्लिम मेयर बनने का रिकॉर्ड बनाया। लेकिन उनकी जीत जितनी बड़ी है, विवाद उतने ही गंभीर हैं, खासकर भारत और हिंदू धर्म को लेकर उनके बयानों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

कौन हैं जोहरान ममदानी?

जोहरान ममदानी मशहूर फिल्मकार और हिंदू माँ, मीरा नायर और युगांडा मूल के लेखक-प्रोफेसर महमूद ममदानी के बेटे हैं। ममदानी ने प्रतिष्ठित ब्राउन यूनिवर्सिटी से हायर एजुकेशन प्राप्त की और साल 2020 में न्यूयॉर्क स्टेट असेंबली के सदस्य के रूप में राजनीति में कदम रखा। खुद को वे एक ‘डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट’ कहते हैं और गरीबों के हित में मुफ्त बस सेवा, किराया नियंत्रण और सस्ती चाइल्डकेयर जैसी नीतियों को आगे बढ़ाने की बात करते हैं।

लेकिन ममदानी की राजनीतिक छवि का दूसरा पहलू भी उतना ही चर्चित है। ममदानी के विवादित और हिंदू-विरोधी बयानों ने न केवल भारतवंशी समुदाय को नाराज किया है, बल्कि उन्हें धर्म के आधार पर विभाजन फैलाने वाला नेता भी बना दिया है।

क्यों हैं जोहरान ममदानी हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी विवादों के केंद्र में?

मेयर जोहरान ममदानी का राजनीतिक करियर उनके प्रगतिशील वादों के साथ-साथ उनके तीखे और विवादास्पद बयानों के कारण भी चर्चा में रहा है। आलोचकों और हिंदू समुदाय के बड़े वर्ग द्वारा उन्हें ‘हिंदू-विरोधी’ और ‘भारत-विरोधी’ कहने के मुख्य कारण हैं। ममदानी ने सार्वजनिक रूप से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘वॉर क्रिमिनल‘ (युद्ध अपराधी) कहकर संबोधित किया और उन्हें 2002 के गुजरात दंगों के लिए दोषी ठहराया। यह बयान तब दिया गया, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पीएम मोदी को दंगों के संबंध में पहले ही क्लीन चिट दी जा चुकी है।

ममदानी ने दावा किया था कि ‘गुजरात में अब कोई मुसलमान नहीं बचा है’, जो कि पूरी तरह से झूठा और भड़काऊ बयान है। यह दावा गुजरात की मुस्लिम आबादी के मौजूदा आँकड़ों के विपरीत है और इसे विभाजनकारी राजनीति के रूप में देखा जाता है।

ममदानी ने अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को ‘मस्जिद के विध्वंस का उत्सव’ और ‘हिंदुत्व फासीवाद’ का प्रतीक बताया। यह बयान भारत के लोकतांत्रिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नकारता है और करोड़ों हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचाता है। जनवरी 2024 में, ममदानी न्यूयॉर्क में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के खिलाफ आयोजित प्रदर्शनों में शामिल हुए। इन रैलियों के दौरान कथित तौर पर हिंदुओं के खिलाफ अपमानजनक नारे लगाए गए थे।

इन सभी बयानों से यह स्पष्ट है कि ममदानी केवल राजनीतिक आलोचना तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सीधे तौर पर एक समुदाय की धार्मिक भावनाओं और राष्ट्रीय प्रतीकों को निशाना बनाया, जिससे उन्हें हिंदू और भारत-समर्थक समुदायों के बीच एक अत्यधिक विवादास्पद छवि वाला नेता बना दिया।

कट्टरपंथी समूहों का साथ

जोहरान ममदानी के विवाद सिर्फ उनके बयानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका जुड़ाव कुछ ऐसे संगठनों और व्यक्तियों से भी रहा है, जिन पर गंभीर आरोप हैं। इसके अलावा, पश्चिमी मीडिया के एक वर्ग ने भी उनकी विवादास्पद छवि को ढकने का प्रयास किया है।

ममदानी ने हाल ही में इमाम सिराज वहाज से मुलाकात की थी, जिस पर 1993 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बम धमाके के साजिशकर्ताओं से संबंध रखने के गंभीर आरोप लगे थे। इस मुलाकात के लिए उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प समेत कई नेताओं की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा।

जोहरान ममदानी इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) जैसे संगठनों से भी जुड़े बताए जाते हैं। इन समूहों पर भारत-विरोधी प्रचार चलाने, हिंदू समूहों पर ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ का आरोप लगाकर डर और अविश्वास का माहौल बनाने का आरोप है।

वॉशिंगटन पोस्ट जैसे कुछ पश्चिमी मीडिया हाउसों ने ममदानी के स्पष्ट हिंदू-विरोधी बयानों को केवल ‘मोदी की कड़ी आलोचना’ बताकर हल्का करने की कोशिश की थी। आलोचकों का मानना है कि इस तरह से मीडिया एक निर्वाचित अधिकारी के घृणास्पद प्रचार को ‘राजनीतिक असहमति’ का जामा पहनाकर सही ठहरा रहा है।

गौरतलब है कि अतीत में इन्हीं मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने 2008 के मालेगाँव बम धमाके जैसे मामलों में ‘हिंदू आतंकवाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था, जिससे वैश्विक स्तर पर हिंदू समुदाय की छवि को गहरी चोट पहुँची थी। आज यही मीडिया ममदानी की आलोचनाओं को दबाकर, हिंदू समुदाय की चिंताओं को पूरी तरह से अनदेखा कर रहा है।

अब्बू महमूद ममदानी: चरमपंथी विचारधारा का वैचारिक समर्थन?

जोहरान ममदानी के विवादित विचारों की जड़ें उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि तक जाती हैं। ममदानी के अब्बू, युगांडा मूल के प्रसिद्ध लेखक और प्रोफेसर महमूद ममदानी पर भी गंभीर वैचारिक आरोप लगे हैं। महमूद ममदानी पर आरोप है कि उन्होंने अपनी पुस्तकों और व्याख्यानों के माध्यम से इस्लामी चरमपंथ और हिंसा को वैचारिक रूप से ‘जायज’ (Justify) ठहराने की कोशिश की।

अपनी एक पुस्तक में ममदानी ने पाकिस्तान के निर्माण को ‘धार्मिक एकता की जरूरत‘ के रूप में चित्रित किया। आलोचकों के अनुसार, उन्होंने जिन्ना और इस्लामी उलेमा के विभाजनकारी व चरमपंथी रवैये पर पर्दा डालने की कोशिश की, यहाँ तक कि विभाजन के दौरान हिंदुओं के नरसंहार को भी वैचारिक रूप से हल्का दिखाने का प्रयास किया।

जोहरान ममदानी का अब्बू आतंकियों का समर्थक

महमूद ममदानी ने यह दावा भी किया कि इस्लाम में ‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा नहीं है, बल्कि यह एक ‘उम्माह’ (एक वैश्विक मुस्लिम समुदाय) है, जिसे सीमाओं में नहीं बाँटा जा सकता। कई आलोचकों और भारतीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि यह विचार परोक्ष रूप से ‘गजवा-ए-हिंद’ (संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप को इस्लाम के अधीन लाने की चरमपंथी भविष्यवाणी) जैसी घातक और अतिवादी सोच को बढ़ावा देता है।

भारतीय बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों का एक वर्ग यह मानता है कि महमूद ममदानी ने अपने लेखन में इस्लामी हिंसा और आतंक को वैचारिक रूप से सही ठहराने का प्रयास किया, जो अब उनके बेटे जोहरान ममदानी की विवादास्पद राजनीति में भी दिखाई देता है।

भारतीय-अमेरिकी समुदाय में आक्रोश और ममदानी के एजेंडे पर सवाल

जोहरान ममदानी की जीत के बाद न्यूयॉर्क सिटी में भारतीय-अमेरिकी और हिंदू समुदाय के बड़े वर्ग ने उनके विभाजनकारी बयानों पर गहरा रोष व्यक्त किया है। सिख समुदाय के नेता और मानवाधिकार वकील जसप्रीत सिंह ने ममदानी की कड़ी आलोचना करते हुए कहा, “हमारे शहर में नफरत के लिए कोई जगह नहीं है… लेकिन जोहरान अपने मंच का इस्तेमाल हिंदू विरोधी बयानबाजी को बढ़ावा देने और हमें धर्म के आधार पर विभाजित करने के लिए कर रहे हैं।”

न्यूयॉर्क के कई हिंदू संगठनों ने ममदानी के बयानों को ‘धार्मिक घृणा का एजेंडा’ बताते हुए उनके इस्तीफे की माँग की है। समुदाय का कहना है कि हिंदुओं को ‘फासीवाद’ से जोड़ना और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करना बेहद आपत्तिजनक है।

राजनीतिक विश्लेषकों और आलोचकों का मानना है कि ममदानी की राजनीति ‘प्रगतिशील’ टैग के पीछे छिपी हुई एक खतरनाक विचारधारा को दर्शाती है। विश्लेषकों के अनुसार, ममदानी की ‘समाजवादी और प्रगतिशील’ छवि के पीछे उनका असली मकसद कट्टरपंथी राजनीति को वैध बनाना है। वह हिंदू धर्म को ‘फासीवाद’ और भारत को ‘धार्मिक तानाशाही’ बताकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की छवि खराब करने में सक्रिय रूप से जुटे हैं।

जोहरान ममदानी का न्यूयॉर्क का मेयर बनना केवल एक राजनीतिक जीत नहीं है। जिस तरह से ममदानी ने बार-बार हिंदू धर्म, भारत और मोदी सरकार पर झूठे, अपमानजनक और भ्रामक आरोप लगाए हैं, उससे यह साफ है कि उनकी राजनीति घृणा और भ्रम फैलाने पर आधारित है। जब उनके अब्बू महमूद ममदानी के लेखन में भी इस्लामी आतंक समर्थक झुकाव दिखता है, तो यह परिवार एक विचारधारात्मक खतरे का प्रतीक बन जाता है, जहाँ ‘प्रगतिशीलता’ के नाम पर भारत और हिंदुओं के खिलाफ नफरत को जायज ठहराया जा रहा है।

OpIndia Exclusive: लाल आतंक के खिलाफ मोदी सरकार ने पुलिस सिस्टम पर खर्च किए ₹630 करोड़+, RTI ने साफ की पूरी तस्वीर

ऑपइंडिया की ओर से दाखिल आरटीआई के जवाब में गृह मंत्रालय की गृह मंत्रालय की लेफ्ट विंग एक्स्ट्रीमिज्म (एलडब्ल्यूई) विंग ने बताया कि माओवादी प्रभावित राज्यों को स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम (एसआईएस) के तहत 630 करोड़ रुपये से ज्यादा की फंडिंग दी गई है। ये स्कीम पुलिस फोर्स को आधुनिक बनाने वाली अंब्रेला स्कीम (एमपीएफ) का मुख्य हिस्सा है।

ये आरटीआई जवाब उस तस्वीर को और मजबूत करता है जो पहले की जानकारी से बनी थी। उसमें गृह मंत्रालय के डेटा से पता चला था कि मई 2014 से, जब पीएम नरेंद्र मोदी ने पहली बार कमान संभाली, तब से हजारों लाल आतंकी सरेंडर कर चुके हैं या मारे जा चुके हैं। साथ ही रिकॉर्ड एंटी-नक्सल ऑपरेशन भी हुए हैं।

दोनों जवाब मिलकर दिखाते हैं कि मोदी सरकार का प्लान जमीन पर सख्ती के साथ राज्यों की पुलिस को सिस्टमेटिक तरीके से ताकतवर बनाना रहा है।

आरटीआई के जवाब में क्या है खास?

गृह मंत्रालय ने जवाब में कहा, “पुलिस फोर्स मॉडर्नाइजेशन की अंब्रेला योजना के तहत माओवाद आतंक से प्रभावित राज्यों को स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम (एसआईएस) के तहत राज्यवार और सालवार फंडिंग की डिटेल्स एननेक्सर ‘ए’ में संलग्न हैं। फंडिंग राज्यों को मंजूर प्रोजेक्ट पूरे होने और बिल जमा करने के बाद ही दी जाती है, रीइंबर्समेंट के आधार पर। एसआईएस स्कीम में राज्यों से यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट जमा करने का कोई कॉन्सेप्ट नहीं है।”

राज्यवार फंडिंग एसआईएस के तहत (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिविजन)

इसें दस राज्यों की डिटेल्स दी गई हैं, जिनमें सबसे ज्यादा प्रभावित छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।

छत्तीसगढ़, झारखंड को सबसे ज्यादा फायदा

डेटा से पता चलता है कि ज्यादातर पैसा छत्तीसगढ़ (₹158.18 करोड़) और झारखंड (₹121.83 करोड़) को गया। ये दोनों राज्य ऐतिहासिक रूप से माओवादी गतिविधियों के हॉटस्पॉट रहे हैं। फंडिंग का पैटर्न जमीन पर ऑपरेशन की तीव्रता से मैच करता है, जहाँ इन राज्यों में सबसे ज्यादा सरेंडर और एनकाउंटर हुए हैं।

लगातार फंडिंग से स्पेशल टास्क फोर्स, ट्रेनिंग सेंटर और दूरदराज इलाकों में कम्युनिकेशन नेटवर्क मजबूत हुए हैं। इससे सेंट्रल और स्टेट सिक्योरिटी एजेंसीज के बीच तालमेल बेहतर हुआ है।

प्रोजेक्ट पूरा होने पर रीइंबर्समेंट के आधार पर फंडिंग

गृह मंत्रालय ने साफ किया कि एसआईएस के तहत फंडिंग तभी रिलीज होती है जब राज्य मंजूर प्रोजेक्ट को पूरे कर बिल जमा करें। इससे जवाबदेही बनी रहती है और फंडिंग इंप्लीमेंटेशन पर आधारित होती है, न कि पहले ही दे दी जाती।

साल दर साल गृह मंत्रालय द्वारा जारी रकम (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिविजन)

मंत्रालय ने ये भी कन्फर्म किया कि एसआईएस स्कीम में यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं, क्योंकि फंडिंग प्रोजेक्ट वेरिफिकेशन के बाद ही जाती है। ये मॉडल तेजी से काम करने में मदद करता है और ब्यूरोक्रेटिक देरी से बचाता है, जो अक्सर सेंट्रल स्कीम्स में होती है।

स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम क्या है?

एसआईएस का मकसद एलडब्ल्यूई प्रभावित राज्यों में पुलिस और ऑपरेशनल इंफ्रा को मजबूत करना है। इसमें मॉडर्न हथियार, फोर्टिफाइड थाने, मोबिलिटी, कम्युनिकेशन इक्विपमेंट और एंटी-माओवादी ऑपरेशन के लिए स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग शामिल है।

लोकसभा में गृह मंत्रालय की दी गई जानकारी के मुताबिक, एसआईएस फंड शेयरिंग पर चलती है, जिसमें 60% सेंट्रल गवर्नमेंट देती है और बाकी का 40% स्टेट गवर्नमेंट। ये ‘मॉडर्नाइजेशन ऑफ पुलिस फोर्स’ की सब-स्कीम है।

रिलीज फंडिंग टोटल 638.85 करोड़ है, लेकिन मंत्रालय की वेबसाइट पर साफ है कि 1,741 करोड़ के प्रोजेक्ट मंजूर हुए हैं। इनमें 306 फोर्टिफाइड थाने शामिल हैं, जिनमें से 210 बन चुके हैं।

ये डेटा उस फैक्ट से मैच करता है कि पेमेंट प्रोजेक्ट पूरे होने पर ही होती है। एसआईएस ने राज्यों की तैयारी को मजबूत किया है, खासकर गहरे जंगलों और हाई-रिस्क जोन में लाल आतंकी हमलों के खिलाफ।

खत्म होने की कगार पर दशकों पुरानी जंग

गृह मंत्री अमित शाह ने कई बार कहा है कि ऑपरेशन कागड़ के तहत मार्च 2026 तक माओवाद का खात्मा हो जाएगा। ऑपइंडिया को मिले आरटीआई डेटा सरेंडर से लेकर लगातार मॉडर्नाइजेशन फंडिंग तक, दिखाते हैं कि सरकार तेजी से लक्ष्य की ओर बढ़ रही है।

खास बात ये कि शाह ने सीजफायर या बातचीत के अनुरोधों को साफ इनकार किया है। उन्होंने कहा कि लाल आतंकियों को या तो सरेंडर करना है या एनकाउंटर में ढेर होना है। इससे उनके हथियारबंद आंदोलन के लिए कोई जगह नहीं बची।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित की गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

‘इस्लामी गैंग से कराओ गैंगरेप’: बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार को उजागर करने वाली महिला पत्रकार को धमका रहे कट्टरपंथी, पति पर हमला; OpIndia से बोलीं- यूनुस की पुलिस भी कर रही प्रताड़ित

बांग्लादेश में मोहम्मद युनूस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार बनने के बाद से ही हिंदू लगातार इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर है। बांग्लादेश में एक महिला पत्रकार जो हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों पर रिपोर्ट करती थी उससे कट्टरपंथी इतने चिढ़ गए हैं कि उन्होंने हिंदू महिला पत्रकार का गैंगरेप करने की धमकी दी है। महिला पत्रकार के पति के साथ भी मारपीट की गई है और पुलिस आरोपितों को खोजने के बजाय हिंदुओं को ही धमकाने में लगी है।

प्रोमिथिआस चौधरी और उनकी पत्नी त्रिना रॉय चौधरी बांग्लादेश में TheNewse.com नाम से न्यूज पोर्टल चलाते हैं। प्रोमिथिआस इसके एडिटर और पब्लिशर हैं तो वहीं त्रिना पोर्टल की न्यूज एडिटर हैं। दोनों राजधानी ढाका से करीब 150 किलोमीटर दूर बेरिसाल जिले के वेस्ट गोइल गाँव में रहते हैं। कपल ने आनंद लोक नाम से एक आश्रम भी बनाया हुआ है जिसके जरिए वह आस-पास के हिंदुओं की मदद भी करते हैं। इनकी पत्रकारिता और हिंदुओं के मदद के चलते ही इस्लामी कट्टरपंथियों को इनसे चिढ़ होने लगी है।

पत्रकार त्रिना रॉय ने बताई कट्टरपंथियों की कहानी

त्रिना रॉय चौधरी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा है कि आस-पास के कट्टरपंथियों से अक्सर उनका विवाद होता रहता है लेकिन बीते 29 अक्टूबर को बात मारपीट और रेप की धमकी पर आ गई। त्रिना रॉय ने बताया, “बीते 29 अक्टूबर की दोपहर को मेरे पति प्रोमिथिआस को नाजिम मुल्ला ने अपनी दुकान पर बुलाया था।”

उन्होंने कहा, “नाजिम और प्रोमिथिआस साथ ही पढ़े थे, दोस्त थे तो उन्हें लगा कि सामान्य बातचीत के लिए बुला रहे होंगे लेकिन जब वह दुकान पर पहुँचे तो नाजिम का शाहीन से पैसों को लेकर झगड़ा हो रहा था। नाजिम, शाहीन से अपने 3.5 लाख टका उधार माँग रहा था।”

उन्होंने कहा, “जब प्रोमिथिआस वहाँ पहुँचे तो दोनों उनसे ही भिड़ गए। नाजिम-शाहीन कहने लगे कि ‘तू पैसा देगा हमें, ISKCON का है तू’। जब प्रोमिथिआस ने इसका विरोध किया तो उनके साथ मारपीट की गई। उन्हें थप्पड़ लगाए गए और उनके साथ मारपीट की गई।” त्रिना रॉय बताती हैं, “जब प्रोमिथिआस ने उनसे कहा कि ‘मैं तुम्हारा दोस्त हूँ’ तो दोनों उनसे बोले ‘तू काफिर हिंदू है, दोस्त कैसे हो सकता है। बांग्लादेश हमारा है, तुझे दया करके रहने दे रहे हैं। बांग्लादेश से निकल जा’।”

त्रिना रॉय ने आगे कहा, “दोनों ने मेरा गैंगरेप करने की धमकी भी दी। मेरे पति से बोले कि ‘तुम्हारी पत्नी अधिक खतरनाक है, वो हमें पसंद नहीं करती है। उसका मुस्लिमों से गैंगरेप कराओ तो हमें पसंद करने लगेगी और उसे समझ आ जाएगा कि हम क्या हैं’।”

बात यही खत्म नहीं हुई। प्रोमिथिआस से मारपीट कर एक स्टांप पेपर पर साइन ले लिए गए और एक चेक छीन लिया गया। फखरुल इस्लाम मौके पर मौजूद था और उसने निर्देश दिए थे कि प्रोमिथिआस को कैसे प्रताड़ित किया जाए।

क्यों चिढ़े हुए हैं इस्लामी कट्टरपंथी?

त्रिया बताता हैं कि इस्लामी कट्टरपंथियों की उनसे और उनके पति से पुरानी चिढ़ है। पिछले दिनों नवरात्रि के दौरान भी उनकी मुस्लिमों से झड़प हो गई थी। उन्होंने कहा, “मुस्लिम मंदिर के पास आकर सिगरेट पीने लगे थे, उनसे जब मना किया तो वो मारपीट और धमकी पर उतर आए। बाद में पुलिस के हस्तक्षेप के बाद यह मामला खत्म हुआ था।”

साथ ही, हिंदुओं के लिए किए जाने वाले दोनों के कामों को लेकर भी आस-पास के इस्लामी कट्टरपंथी उनसे चिढ़े रहते हैं। त्रिया के मुताबिक, पत्रकार होने के नाते वो बांग्लादेश में होने वाली इस्लामी कट्टरपंथियों की ज्यादती पर खुलकर लिखती हैं। इसके अलावा जिस तरह हिंदुओं का दमन किया जाता है, उसे भी वो खुलकर बताते हैं, रिपोर्टिंग करते हैं जिससे कट्टरपंथी चिढ़े रहते हैं। त्रिया और प्रोमिथिआस ने कई ऐसी खबरें की हैं जिससे कट्टरपंथियों की कलई खुली है और वे उनसे बदला लेने का बहाना ढूँढ रहे हैं।

पुलिस भी नहीं कर रही है मदद: त्रिया

त्रिया बताती हैं कि उन्होंने 29 अक्टूबर को ही पुलिस को इसकी रिपोर्ट दी थी लेकिन अब तक पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की है उल्टा उन्हें ही धमकाया जा रहा है। त्रिया बताती हैं, “थाने का इंचार्ज मुस्लिम है, तो वो हमारे ऊपर ही दबाव बना रहा है। जब हमने ISKCON वाली बात शिकायत में डाली तो कहा गया कि इससे दंगा भड़क सकता है इसे मत लिखो।”

प्रोमिथिआस द्वारा दी गई शिकायत (फोटो: त्रिया रॉय)

त्रिया रॉय ने बताया कि पुलिस ने शिकायत पर कार्रवाई करने के बजाय अब उन्हें ही धमकी दी है कि वे उनके पति के खिलाफ झूठा आरोप लगाएँगे। उन्होंने कहा, “पुलिस ने प्रोमिथिआस से कहा कि ‘हम तुम्हारे खिलाफ ही केस दर्ज कर देंगे, कह देंगे कि मस्जिद तोड़ने के लिए लोगों को बुला रहा है’। यह धमकी इसलिए दी गई है कि हम चुप हो जाएँ, इस्लामी कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग ना करें।”

त्रिया ने कहा कि बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। वो और उनकी पूरा परिवार डरा हुआ है क्योंकि कट्टरपंथी उनके घर पर नजर रखे हुए हैं। उनके पास आने-जाने वाले लोगों की निगरानी की जा रही है। 31 अक्टूबर को जब कुछ पत्रकार साथी उनसे मिलने आ रहे थे तो उन्हें भी कट्टरपंथियों ने रोक लिया। उन्हें भी धमकी दी गई। पत्रकारों से कहा गया कि तुम जिनके घर जा रहे हो उनके घर में हम तोड़फोड़ कर देंगे।

इस घटना के बाद से लगातार बांग्लादेश में अलग-अलग जगहों पर पत्रकार प्रदर्शन कर रहे हैं और आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग कर रहे हैं लेकिन पुलिस का कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही है। त्रिया का कहना है कि उनका बांग्लादेश में रहना मुश्किल हो गया है। बांग्लादेश में बीते कुछ समय में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमले, रेप और हत्याओं के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति दिन-ब-दिन और बदतर होती जा रही है।

इतना टैक्स कि पैड खरीद ही नहीं पा रहीं खातून, पाकिस्तान में 40% ‘Period Tax’ के खिलाफ मामला पहुँचा सुप्रीम कोर्ट: जानें Menstrual Hygiene में कितना पीछे है इस्लामी मुल्क?

पाकिस्तान में महिलाओं को हर महीने एक स्वाभाविक प्रक्रिया माहवारी (पीरियड) का सामना करना पड़ता है। लेकिन इस स्वाभाविक प्रक्रिया को देखने का समाज-व्यवस्था और सरकार का रवैया अक्सर आसान नहीं रहा। हाल में 25 वर्षीय वकील और कार्यकर्ता महनूर ओमर ने सरकार के सामने ‘पीरियड टैक्स’ नामक एक बड़ी चुनौती उठाई है। वकील महनूर ने कोर्ट में याचिका दायर की है कि सैनिटरी पैड्स पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर (टैक्स और कस्टम ड्यूटी) लगभग 40 प्रतिशत तक पहुँच जाते हैं, जिससे गरीब और ग्रामीण महिलाएँ इन तक पहुँच नहीं पातीं।

सरकार ने इस बात पर अभी तक प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं कि मासिक धर्म गृहस्थी का हिस्सा है, न कि कोई ‘लक्जरी’ चीज। पैड पर टैक्स लगने का अर्थ है- ‘महिलाओं को अपनी बॉडी बायोलॉजी पर अर्थव्यवस्था का बोझ देना’ और यह सामाजिक और आर्थिक असमानता को बढ़ावा देता है।

पीरियड्स टैक्स और इसे लग्जरी मानने का विवाद

पाकिस्तान में माहवारी प्रबंधन का सबसे बड़ा रोड़ा उच्च कर यानि हाई टैक्स हैं। जबकि दुनिया के कई देश, जैसे केन्या, भारत, UK, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, कोलंबिया और दक्षिण अफ्रीका, इस ‘पिंक टैक्स’ को समाप्त कर चुके हैं, पाकिस्तान सरकार सैनिटरी पैड्स को ‘आवश्यक वस्तु’ नहीं मानती है।

इसके विपरीत, सरकार गाय के वीर्य (cattle semen), दूध और पनीर जैसी चीजों को टैक्स-मुक्त रखती है, जबकि पैड्स को इत्र और कॉस्मेटिक्स जैसे ‘लग्जरी सामान’ की श्रेणी में रखकर उन पर भारी टैक्स लगाती है।

सरकार का यह फैसला कि सैनिटरी पैड जरूरी चीज नहीं, बल्कि लग्जरी (ऐश-आराम की चीज) है, पूरी तरह बेतुका है। यह असल में महिलाओं के साथ एक तरह का छिपा हुआ भेदभाव है। एक्टिविस्ट महनूर ओमर ने इसी बात पर सरकार को कोर्ट में घसीटा है। उनका कहना है कि जो चीज हर महीने महिलाओं के लिए जिंदगी की जरूरत है, उस पर टैक्स लगाना उनकी इज्जत (गरिमा) छीनने जैसा है।

सोचिए, एक महिला अपने जीवन के 6 से 7 साल तक पीरियड्स में रहती है। ऐसे में, इन जरूरी चीजों पर टैक्स लगाना दिखाता है कि नीतियाँ बनाते समय सरकार महिलाओं की जरूरतों को नजरअंदाज कर रही है। इसे ही ‘लिंग-अंध नीति‘ कहते हैं यानी ऐसी नीतियाँ जो सिर्फ पुरुषों या आम जनता को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। इसीलिए महनूर ओमर और ‘माहवारी जस्टिस’ जैसे ग्रुप इस गलत टैक्स को खत्म करवाने के लिए लड़ रहे हैं।

आँकड़े बताते हैं दर्द भरी कहानी: सेहत और पढ़ाई पर कैसा असर

ये सारे सरकारी नियम (टैक्स) कितने खराब हैं, ये जानने के लिए हमें इन बड़े आँकड़ों को देखना होगा। टैक्स लगने की वजह से सैनिटरी पैड इतने महँगे हो जाते हैं कि लाखों गरीब महिलाएँ उन्हें खरीद ही नहीं पातीं। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि पैड पर इतना ज्यादा टैक्स लगता है कि उनकी कीमत बाजार में 40% तक बढ़ जाती है। इस महँगाई का सीधा हमला महिलाओं की सेहत पर होता है।

पैड महँगे होने के कारण, खासकर गाँवों में, बहुत कम महिलाएँ पैड इस्तेमाल कर पाती हैं, सिर्फ 16.2% महिलाएँ। जब पैड नहीं मिलते, तो मजबूरन लड़कियाँ और महिलाएँ पुराने कपड़े या दूसरे गंदे/खराब सामान इस्तेमाल करती हैं। इससे उन्हें भयानक संक्रमण (Infection) होने और लंबे समय तक प्रजनन अंगों (Reproductive Health) में बड़ी समस्या होने का खतरा दोगुना हो जाता है। 2022 की बाढ़ जैसी मुश्किल घड़ी में, जब सब कुछ बह गया था, तब तो महिलाओं को और भी गंदी चीजें इस्तेमाल करनी पड़ी थीं।

यह समस्या लड़कियों की पढ़ाई भी बर्बाद कर रही है। जब पीरियड्स शुरू होते हैं, तो हर पाँच में से एक लड़की स्कूल नहीं जाती या स्कूल छोड़ देती है, क्योंकि उनके पास पैड नहीं होते और उन्हें शर्म आती है। 79% महिलाएँ कहती हैं कि वे पीरियड्स के दौरान सामाजिक गतिविधियों या काम में भाग नहीं ले पातीं। इसका मतलब है कि वे अपनी पढ़ाई का पूरा एक साल तक खो देती हैं। दुख की बात यह भी है कि लगभग 41% लड़कियों को तो पहली बार पीरियड्स आने से पहले पता ही नहीं होता कि यह क्या है, क्योंकि कोई उनसे बात ही नहीं करता। यह दिखाता है कि हमें न सिर्फ पैड सस्ते करने हैं, बल्कि सही जानकारी भी देनी है।

शर्म की दीवार और सरकार की अनदेखी

टैक्स की मुश्किल अपनी जगह है, लेकिन पाकिस्तान में एक और बहुत बड़ी रुकावट है, वह है पीरियड्स के बारे में फैली हुई चुप्पी और शर्म (Taboo)। माहवारी को आज भी समाज में ‘गंदा’ और ‘छुपकर बात करने वाला’ विषय माना जाता है। इस वजह से कोई भी इस पर खुलेआम बात नहीं करना चाहता। जब लोग बात नहीं करते, तो सरकार भी इस पर ध्यान नहीं देती।

इसी अनदेखी का नतीजा है ‘नीतिगत शून्यता‘। इसका सीधा मतलब है कि पाकिस्तान की सरकार के पास माहवारी स्वास्थ्य प्रबंधन (MHH) को सुधारने के लिए कोई राष्ट्रीय योजना, कोई बड़ा कानून या कोई साफ रणनीति ही नहीं है। जब कोई सरकारी प्लान नहीं होता, तो समस्या वैसी की वैसी बनी रहती है और लाखों महिलाएँ अपनी सेहत से जुड़ी इस सबसे जरूरी चीज के लिए जूझती रहती हैं।

लेकिन अच्छी बात यह है कि बदलाव की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। ‘माहवारी जस्टिस’ जैसे नौजवानों के संगठन इस चुप्पी को तोड़ रहे हैं। ये लोग गरीब और पिछड़ी जगहों पर माहवारी के बारे में सही जानकारी दे रहे हैं और जरूरी सामान (पैड्स) भी बाँट रहे हैं। इसके अलावा, सिंध प्रांत में एक अच्छा काम हुआ है। उन्होंने स्कूलों के रिकॉर्ड सिस्टम में ‘माहवारी सुविधाओं’ को शामिल करना शुरू कर दिया है ताकि पता चल सके कि स्कूलों में लड़कियों के लिए कितनी सुविधाएँ हैं।

वहीं, UNICEF जैसी संस्थाएँ सरकार से कह रही हैं कि टैक्स कम करो ताकि पैड सस्ते और आसानी से मिल सकें। ये सारे प्रयास और महनूर ओमर की कानूनी लड़ाई इस बात पर जोर देती है कि पीरियड्स का सही इंतजाम करना सिर्फ सफाई की बात नहीं है, बल्कि यह हर महिला का बुनियादी स्वास्थ्य अधिकार (Basic Health Right) है।

यह मामला सिर्फ पैसे का नहीं, बल्कि हक और सम्मान का है

पीरियड्स पर टैक्स क्यों नहीं लगना चाहिए?- पहला और सबसे जरूरी विचार यह है कि माहवारी यानी पीरियड्स एक कुदरती काम है। यह कोई शौक या लग्जरी (ऐश-आराम) की चीज नहीं है जिसके लिए औरतों को ज़्यादा टैक्स भरना पड़े। सैनिटरी पैड महिलाओं की बुनियादी जरूरत है, जैसे रोटी, कपड़ा और मकान। यह चीज उनकी सेहत, सफाई और इज्जत (गरिमा) से जुड़ी है। जब सरकार इस पर टैक्स लगाती है, तो वह इसे एक जरूरी चीज मानने से मना कर देती है। यह साफ तौर पर दिखाता है कि यहाँ भेदभाव हो रहा है।

टैक्स का बोझ, औरतों की जिंदगी पर असर- दूसरा बड़ा विचार यह है कि यह भारी टैक्स असमानता को बढ़ाता है। अगर पैड की कीमत में 40% हिस्सा टैक्स का है, तो सोचिए कि गरीब घरों की और गाँव की लड़कियाँ इसे कैसे खरीदेंगी? जब वे पैड नहीं खरीद पातीं, तो उन्हें गंदे और असुरक्षित तरीके अपनाने पड़ते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि उनकी सेहत खराब होती है, उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ता है और उनका आत्म-विश्वास कम हो जाता है। यानी, टैक्स सीधे तौर पर लैंगिक असमानता (Gender Inequality) को बढ़ावा दे रहा है।

सरकार की नीतियाँ क्यों ‘अंधी’ हैं?- तीसरा विचार यह है कि हमारी नीतियाँ बनाने वाले लोग, अक्सर पुरुषों की नजर से सोचते हैं। जब वे कोई टैक्स नियम बनाते हैं, तो वे बस यह देखते हैं कि सरकार की कितनी कमाई होगी, वे यह नहीं देखते कि उस टैक्स का बोझ किस पर पड़ेगा। इसीलिए महनूर ओमर ने कहा, “जब महिलाएँ मंत्री और बड़ी नेता हैं, तब भी ऐसी नीतियाँ बिना किसी सवाल के पास हो जाती हैं।” यह दिखाता है कि सरकार की सोच अभी भी ‘लिंग-अंधी’ (Gender Blind) है, जो महिलाओं की खास जरूरतों को नजरअंदाज कर देती है।

सिर्फ टैक्स हटाना काफी नहीं- चौथा अहम विचार यह है कि सिर्फ टैक्स हटा देने से समस्या खत्म नहीं होगी। हमें समाज को भी बदलना होगा। माहवारी पर खुलकर बात करनी होगी, स्कूलों-कॉलेजों में लड़कियों को सही जानकारी देनी होगी और सबसे जरूरी, हर स्कूल और पब्लिक जगह पर साफ-सुथरे, अलग शौचालय, पानी और पैड की सुविधा देनी होगी। कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि पाकिस्तान के बहुत से स्कूलों में लड़कियों के लिए अभी भी ये बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं।

गुजरात में बेमौसम बारिश से नष्ट हुईं किसानों की फसलें, AAP ने शुरू की राजनीति: व्यापारियों की ‘ऋण माफी’ के नाम पर फैला रही झूठ: वोट के लिए ‘किसान हितैषी’ होने का ढोंग

कवि दुष्यंत कुमार की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं,

“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए”

गुजरात की राजनीति में कदम रखने की चाहत रखने वाले नए ‘क्रांतिकारियों’ के लिए अगर लिखना हो तो कहा जा सकता है कि इन लोगों का मकसद ‘बस हंगामा खड़ा करना’ है। अधिकतर समय इन्हें नतीजों से कोई मतलब नहीं होता। ‘हम ये करेंगे, वो करेंगे’ के वादे करके पार्टी की स्थापना हुई तो उसने इन्हीं वादों के बल पर दिल्ली की सत्ता हासिल की लेकिन एक दशक बाद भी हालात जस के तस रहे तो 2025 के विधानसभा चुनाव में जनता ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब पिछले कुछ सालों से पार्टी गुजरात की राजनीति में भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है।

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में जी-तोड़ मेहनत के बाद भी AAP (आम आदमी पार्टी) को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। जाहिर है कि पाँच सीटों पर जीत भी पार्टी के झंडे पर नहीं बल्कि उम्मीदवारों की व्यक्तिगत जीत थी। उसके बाद संगठन भी ज्यादातर निष्क्रिय रहा और स्थानीय चुनावों के साथ-साथ लोकसभा चुनावों में भी कुछ खास हासिल नहीं हो सका। अब जबकि विधानसभा चुनाव सिर्फ दो साल दूर हैं, तब AAP ने गुजरात में कुछ नया करने के इरादे से फिर से कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं लेकिन इस बार ‘रणनीति’ थोड़ी बदली हुई है।

आम आदमी पार्टी पिछले कुछ सालों से कुछ विशेष समूहों और समुदायों को निशाना बनाकर राजनीति कर रही है। यह सच्चाई है कि पाटीदार समुदाय गुजरात के हर चुनाव में ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाता है और यह आँकड़ों से भी स्पष्ट होता राजनीतिक दलों की राजनीति के लिए ऐसा ही एक और समुदाय है- किसान।

हाल ही में आम आदमी पार्टी ने बोटाद APMC में ‘कड़ा प्रथा’ का मुद्दा बनाकर खूब हंगामा किया और किसान महापंचायत का नाटक किया, जो आखिर में हिंसा में बदल गया। किसानों का ‘मसीहा’ बनने का नारा देकर अपराध करने वाले नेता फिलहाल जेल में हैं। ‘क्रांति’ के नारे के साथ तथाकथित आंदोलन में शामिल हुए आम नागरिक अब जमानत माँग रहे हैं। बाद में जब बेमौसम बारिश हुई, तब भी पार्टी ने आपदा में अवसर तलाश लिया।

आम आदमी पार्टी के नेताओं को किसानों (या किसी भी समुदाय) का मसीहा बनने में तो बहुत दिलचस्पी है लेकिन असली समस्याओं का समाधान ढूँढने में नहीं। पार्टी इस समय जिस तरह से राजनीति कर रही है उससे साफ है कि उनका असली मकसद किसानों की समस्याओं को मुद्दा बनाकर अपनी राजनीति चमकाना है। उन्हें किसानों की असली समस्याओं के समाधान में कोई दिलचस्पी नहीं है।

अक्टूबर 2025 के आखिर में गुजरात के कई हिस्सों में बेमौसम बारिश हुई। कई जगहों पर चक्रवातों का असर भी देखने को मिला और किसानों की फसलों को भारी नुकसान हुआ। यह पहली घटना नहीं है, पहले भी बेमौसम बारिश हुई हैं, किसानों को नुकसान हुआ है और सरकार ने इसके लिए कदम उठाए हैं। क्योंकि यही सरकार का काम है।

बेमौसम बारिश के बाद किसानों को मुआवजा दिया जाता है। यही एक तय प्रक्रिया है। यह सालों से चली आ रही है। इस बार भी बीजेपी सरकार ने बेमौसम बारिश के बाद एक सर्वे शुरू करवाया है। गुजरात के सभी 34 जिलों में ये सर्वे होगा, जिसमें गाँव-गाँव का दौरा करने और किसानों की फसलों को हुए नुकसान का जायजा लेने में कुछ समय लग सकता है। यह सब रातोंरात नहीं होता।

फिलहाल पूरे प्रदेश में सर्वे का काम जारी है। सभी जिलों के मंत्रियों ने दौरे किए हैं। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल खुद भी जगह-जगह जाकर किसानों की फसलों को हुए नुकसान का जायजा ले रहे हैं। सरकार पहले ही कह चुकी है कि फसल नुकसान का सर्वे पूरा होने और रिपोर्ट सरकार तक पहुँचने के बाद किसानों के लिए तुरंत राहत और सहायता पैकेज की घोषणा की जाएगी।

सरकार ने पूरे गुजरात में किसानों की फसलों को हुए नुकसान का सर्वे कराने का आदेश दिया है, जिसकी निगरानी की जिम्मेदारी हर जिले के प्रभारी मंत्रियों को दी गई है। अधिकारी इस समय गाँव-गाँव जाकर सर्वे कर रहे हैं। अधिकारी गाँवों में जाकर वहाँ के सरपंचों और नेताओं के साथ सर्वे कर रहे हैं। इस सर्वे के पूरा होने के बाद सभी जिलों की रिपोर्ट राज्य सरकार को जाएगी। सरकार की कैबिनेट की बैठक होगी और उसमें राहत पैकेज की राशि तय की जाएगी। किसानों को कैसे मदद की जाए, इस पर निर्णय लिया जाएगा। सरकार यह सब कर रही है।

दूसरी ओर विपक्ष बैठी आम आदमी पार्टी क्या कर रही है? रोज प्रेस कॉन्फ्रेंस करके हंगामा खड़ा कर रही है। अगर इससे भी काम न चले तो तथ्यों को तोड़-मरोड़कर, दुष्प्रचार करके ये साबित कर रही है कि सरकार पूरी तरह निष्क्रिय बैठी है और अगर गुजरात में AAP न होती तो किसानों की आवाज न सुनी जाती, न ही राहत पैकेज की बात होती। सच तो ये है कि जब गुरात में AAP में A भी नहीं था, तब भी फसलों के नुकसान का सर्वे इसी तरह चल रहा था और राहत पैकेज भी घोषित किए जा रहे थे।

रोजाना AAP नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं और बात का लहजा यही है कि सरकार किसानों के मुद्दों पर ध्यान नहीं दे रही है। वे पूछ रहे हैं कि पैकेज की घोषणा क्यों नहीं हो रही है? उन्हें तुरंत नतीजे चाहिए। वहीं अगर सरकार बिना सर्वे के अनुमान के आधार पर पैकेज की घोषणा कर देती तो यही लोग प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चिल्लाते कि सरकार ने सर्वे कराने और जमीनी हालात जानने की जहमत तक नहीं उठाई।

इसके साथ ही प्रोपेगेंडा का भी सहारा लिया जा रहा है। हाल ही में विशाखापट्टनम से विधायक बने गोपाल इटालिया ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बचकाना तर्क दिया कि पिछले 10 सालों में जब उद्योगपतियों का 16 लाख करोड़ रुपए माफ किया गया तो कोई सर्वे नहीं हुआ लेकिन किसानों को पैकेज देने के लिए सर्वे कराना पड़ रहा है।

असलियत यह है कि 16 लाख करोड़ रुपए का कर्ज ‘राइट-ऑफ’ किया गया था। राइट-ऑफ का मतलब लोन माफ करना नहीं होता है। इसकी सीधा सा मतलब है कि बैंक को नजदीकी भविष्य में उस कर्ज की रकम वसूल होने की उम्मीद नहीं हैं, इसलिए उसे नफा-नुकसान गणना से अलग कर दिया जाता है। इसके बाद भी बैंक कानूनी और अन्य तरीकों से उस कर्ज की वसूली कर सकती है और बैंक ऐसा करता भी है।

जिस वित्त मंत्री के लोकसभा में दिए गए जवाब का हवाला देकर गोपाल इटालिया ने यह बात कही थी उसी जवाब में वित्त मंत्री ने साफ कहा था कि इसका मतलब यह नहीं कि कर्ज माफ किया गया है। बैंक अन्य तरीकों से वसूली की प्रक्रिया जारी रखेंगे। लेकिन गोपाल अगर यह सब बता भी दें तो भी उनका धंधा नहीं चलेगा।

इसके बाद एक और फालतू मुद्दा खोज निकाला गया। गणदेवी से विधायक नरेश पटेल, जो हाल ही में मंत्री बने हैं। वे नरेश पटेल एक गाँव में फसल नुकसान का जायजा लेने गए थे। गाँव में नुकसान देखकर मंत्री नरेश पटेल ने सहज भाव से कहा, “फसलों से कितनी बदबू आ रही है।” यहाँ उनका आशय किसानों की परेशानी और नुकसान के प्रति सहानुभूति दिखाने का था।

लेकिन AAP के प्रचार के लिए यूट्यूब पर बैठे स्वयंभू पत्रकारों ने मंत्री के बयान की क्लिप को काटकर यह पेश किया मानों गुजरात सरकार के मंत्री को किसानों की फसल से ही ‘विकर्षण’ है। इसके बाद गोपाल इटालिया ने उस पर एक वीडियो बना दिया और फिर वही वीडियो यूट्यूब चैनलों पर फैलाया गया और कहा कि सरकार के मंत्रियों को किसानों की तकलीफ की परवाह नहीं है। यही है इन लोगों की इकोसिस्टम की काम करने की शैली।

ये सारी बातें इस ओर इशारा करती हैं कि किसी भी तरह आम आदमी पार्टी ये साबित करने की कोशिश कर रही है कि अगर इस पूरे मामले में किसानों के असली हितैषी हैं तो वो AAP के नेता हैं और किसी को किसानों से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि सच्चाई ये है कि सरकार अभी सर्वे करा रही है और यह उनका काम है। इस प्रक्रिया में थोड़ा समय लगना स्वाभाविक है। दूसरी ओर AAP के नेताओं के पास करने को कुछ खास नहीं है, इसीलिए वे प्रेस कॉन्फ्रेंस करके हंगामा मचा रहे हैं और ‘सरकार ये क्यों नहीं करती, वो क्यों नहीं करती’ चिल्लाकर वक्त काट रहे हैं। कल सरकार राहत पैकेज का ऐलान करेगी तो ये लोग सबसे पहले श्रेय लेने के लिए यही लोग दौड़ेंगे, चाहे तो इसे अभी से लिखकर रख सकते हैं!

(मूलरूप से यह रिपोर्ट गुजराती भाषा में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

US में भगवान मुरुगन के मंदिर के विरोध में उतरे ईसाई कट्टरपंथी, रिपब्लिकन नेता बोला- ‘ईसाई राष्ट्र’ में कैसे बन रही मूर्ति?: जानें सोशल मीडिया पर कैसे चलाया जा रहा हिंदूफोबिया?

टेक्सास में हनुमान प्रतिमा और गणेश चतुर्थी समारोह के विरोध के बाद अब अमेरिका के केरोलिना में बन रही मुरुगन मंदिर ‘हिन्दु घृणा’ का केन्द्र बन गया है। अमेरिका के ‘रेसिस्ट’ नहीं पचा पा रहे हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा भगवान मुरुगन यानी ‘युद्ध देवता’ का भव्य मंदिर यहाँ बनाया जा रहा है। इसको लेकर तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं।

90 के दशक में बनी मंदिर निर्माण की योजना

मुरुगन मंदिर निर्माण की योजना 90 के दशक में बनाई गई। इस योजना पर अमल करते हुए 2018 में दुनिया का सबसे ऊँचा मुरुगन भगवान की प्रतिमा के लिए भूमि तय की गई। इस भूमि पर भव्य मंदिर और भगवान मुरुगन की प्रतिमा के अलावा तमिल संस्कृति से जुड़ा संग्रहालय और एक तमिल लाइब्रेरी बनाई जा रही है।

अमेरिका में भगवान मुरुगन को समर्पित ये पहला मंदिर होगा। ये वाशिंगटन डीसी से करीब 5 मील दूर मैरीलैंड के लैनहम में स्थित है। यहाँ हर हिन्दू तीज-त्यौहारों, खास कर तमिल त्यौहारों पर कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। 35 फुट के चबूतरे के साथ इस प्रतिमा की कुल ऊंचाई 190 फुट होगी। 

करीब 130 एकड़ के आवासीय जमीन पर बन रहे 155 फीट ऊँचे हिन्दू भगवान की प्रतिमा बनाए जाने पर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं। अमेरिका में इतनी ‘बड़ी जमीन’ दिए जाने से लेकर फंडिंग तक पर सोशल मीडिया में सवाल पूछे गए हैं। कहा जा रहा है कि मंदिर निर्माण की इजाजत किसने दी?

मंदिर निर्माण के लिए इजाजत की जरूरत नहीं

जानकारी के मुताबिक मंदिर बनाने के लिए किसी अनुमोदन की जरूरत नहीं है। दूसरे पूजा स्थलों की तरह यहाँ मंदिर निर्माण किया गया है। काउंटी के अध्यादेशों के तहत ऐसा किया गया है। सोशल मीडिया एक्स पर एक यूजर ने लिखा, “यह भूमि R-1 आवासीय क्षेत्र में है, जिसका अर्थ है कि मंदिर को, अन्य पूजा स्थलों की तरह, काउंटी के अध्यादेशों के तहत काउंटी के योजना बोर्ड या आयुक्त बोर्ड से अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है।”

एक स्वतंत्र पत्रकार स्टीफन हॉन ने आरोप लगाया है कि मंदिर का निर्माण अभी जारी है। इस बीच आयोजकों ने ‘आशीर्वाद’ के रूप में साड़ी बाँटकर फंड जमा करना शुरू कर दिया है।

“हिंदुओं ने एक विशाल मंदिर के लिए सौ एकड़ से ज्यादा जमीन हासिल कर ली है। तमिलों की योजना यहाँ दुनिया के सबसे बड़े ‘युद्ध भगवान मुरुगन’ की प्रतिमा बनाने की है, जो स्टेट्यू ऑफ लिबर्टी से ऊँची होगी”

हॉन का कहना है कि कोरोलीना मुरुगन मंदिर क्षेत्र काफी अविकसित है। हालाँकि आयोजक लाखों डॉलर जुटाने के लिए कई तरह के कार्यक्रम कर रहा है। ‘आशीर्वाद साड़ी’ भी उनमें से एक है।

अमेरिका के जाने माने वैज्ञानिक और पूर्व न्यूक्लियर साइंटिस्ट मैट वैन भी आश्चर्य व्यक्त करते हुए कह रहे हैं कि यह प्रतिमा स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से ऊँची होगी।

अमेरिका की हकीकत ये है कि यहाँ 150 फीट से ज्यादा ऊँची कई चर्च मौजूद हैं। उनका भव्य परिसर है जो सैकड़ों एकड़ में फैला हुआ है। इसकी तुलना स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से नहीं की जाती, लेकिन भव्य मंदिर पर अमेरिका के कट्टरपंथी संगठनों और रेसिस्टों की नजर टेढ़ी हो गई है।

एक्स पर एक यूजर ने मंदिर का समर्थन करते हुए लिखा कि अमेरिका में ऐसे दर्जनों 150 फीट से ज्यादा लंबी मेगा चर्च हैं और इनकी पार्किंग एयरपोर्ट से ज्यादा बड़ी है। एक हिन्दू देवता की बड़ी प्रतिमा बनाई जा रही है और भव्य मंदिर बनाया जा रहा है। इसका इतना विरोध क्यों। धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सबके लिए है।

हनुमान मंदिर का हुआ विरोध

अमेरिका के टेक्सस में 90 फीट के हनुमान प्रतिमा बनने का भी विरोध हुआ था। यहाँ तक कि रिपब्लिकन नेता एलेक्जेंडर डंकन ने महाबली हनुमान को ‘झूठा हिंदू भगवान’ कहा। उन्होंने यहाँ तक दावा किया कि अमेरिका जैसे ‘ईसाई देश’ में मूर्तियाँ नहीं बननी चाहिए। रिपब्लिकन नेता के इस बयान का हिन्दू संगठनों ने जमकर विरोध किया।

अमेरिका को ‘ईसाई राष्ट्र’ कहने पर लोगों ने राष्ट्रपति ट्रंप की पार्टी के इस नेता के खिलाफ कार्रवाई का दबाव भी बनाया।

उपराष्ट्रपति वेंस जता चुके हैं हिन्दू पत्नी के ‘धर्मपरिवर्तन’ की इच्छा

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पत्नी उषा वेंस के हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाइयत स्वीकार करने को लेकर बयान दिया था। ट्रंप के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति पद के दावेदार माने जाने वाले जेडी वेंस के बयान के बाद ये चर्चा दुनियाभर में छिड़ी हुई है कि अमेरिका की ‘फर्स्ट लेडी’ का ईसाई होना जरूरी है क्या?

जेडी वेंस ने अपने राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के मद्देनजर पत्नी के हिन्दू रीति रिवाज मानने पर सवाल खड़े किए और भविष्य में ईसाइयत स्वीकार कर लें, ऐसी इच्छा जताई। 29 अक्टूबर को मिसिसिपी के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि उषा वेंस ईसाइयत स्वीकार कर लेंगी। उन्होंने कहा कि उन्हें उषा के आस्था से कोई समस्या नहीं है। लेकिन उषा उनके साथ हर रविवार को चर्च जाती हैं। जैसे जेडी चर्च जाते-जाते ईसाइयत की गोस्पेल की ओर आकर्षित हुए, उसी तरह से उनकी पत्नी भी ईसाइयत को मान लेंगी और हिन्दू धर्म छोड़ देंगी।

अमेरिका के हिन्दू संगठनों ने इसका जमकर विरोध किया। हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन ने कहा कि जेडी वैंस को अगर उनकी पत्नी ने उनके धर्म से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया, तो वे ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये वही जेडी वेंस हैं, जिन्होंने पूरे हिन्दू रीति-रिवाज से ऊषा से 2014 में शादी की थी। हालाँकि जेडी वेंस की छवि एक रूढ़िवादी ईसाई नेता की रही है। लेकिन इंटरफेथ मैरिज कर उन्होंने सबको चौंकाया था।

भारत के लोग दिखा रहे आईना

भारत की चर्चा करते हुए एक यूजर ने बताया है कि यहाँ सभी धर्मों को समान अधिकार है। वक्फ बोर्ड के पास रेलवे के बाद सबसे ज्यादा जमीनें है, वही चर्च और ईसाइयत का प्रचार करने वाली संस्था के पास मंदिर से ज्यादा जमीनें हैं। तमिलनाडु के सलेम में मौजूद 65 फीट के जीसस की तस्वीर शेयर कर यूजर ने कहा कि भारत में प्रेम और भाईचारा फैलाया जाता है, आप भी प्रेम औ भाईचारा फैलाएँ।

अमेरिका में हिन्दू धर्म के खिलाफ जहर फैलाने की कोशिश लगातार हो रही है। कभी ‘हनुमान प्रतिमा’ के नाम पर तो कभी मुरुगन प्रतिमा को लेकर कट्टरपंथियों के निशाने पर हिन्दू समुदाय है।

जेल में बंद उम्मीदवार के समर्थन में लालू का रोड शो, जानें कौन हैं RJD विधायक रीतलाल यादव जो तीन बार जेल से लड़ा है चुनाव

पटना की सड़कों पर एक अजीबोगरीब दृश्य देखने को मिला। जिधर देखिए, हरे झंडे लहरा रहे थे और भीड़ में एक पुराना करिश्माई चेहरा, लालू प्रसाद यादव, अपनी बंद गाड़ी से जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे। यह रोड शो किसी समाज सुधारक या आम नेता के लिए नहीं था। लालू यादव खुद मैदान में उतरे थे, ताकि बाहुबली कहे जाने वाले उम्मीदवार रीतलाल यादव को जिता सकें।

यह चुनावी प्रचार कम और अपराध के महिमामंडन जैसा ज्यादा लगा, क्योंकि लालू यादव उस उम्मीदवार के लिए वोट माँग रहे थे जो खुद गंभीर आपराधिक आरोपों के चलते जेल में बंद है। यह घटना बिहार की राजनीति के एक गहरे सच को उजागर करती है। अपराध और राजनीति का गठजोड़। आईए एक बार आपको भी वाकिफ करा देते हैं रीतलाल यादव की आपराधिक हिस्ट्री।

लालू यादव ने रीतलाल यादव के लिए किया रोड शो

लालू यादव ने पटना के दानापुर विधानसभा क्षेत्र में 3 नवंबर 2025 को करीब 15 किलोमीटर लंबा रोड शो किया। इसका मकसद था- RJD के उम्मीदवार और सिटिंग विधायक रीतलाल यादव को जीताना।

लेकिन रीतलाल यादव जेल में हैं। हाँ, आपने सही पढ़ा- जेल में बंद उम्मीदवार के लिए रोड शो। रीतलाल 17 अप्रैल से बिल्डर कुमार गौरव से 50 लाख रुपए की रंगदारी माँगने और धमकी देने के मामले में जेल में हैं। चुनावी नियम के कारण वे खुद प्रचार में नहीं उत सकता था। हालाँकि, रीतलाल यादव ने नामांकन के लिए कोर्ट से अनुमति माँगी, जो नहीं मिली। अब रीतलाल का परिवार ही चुनाव प्रचार संभाल रहा है।

रोड शो का कारण?

लालू यादव का दानापुर में उतरना महज रीतलाल की सीट बचाने की कोशिश नहीं थी, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीतिक चाल थी, जिसका मुख्य उद्देश्य विरोधियों को हराना और अपना वोट बैंक सुरक्षित करना था।

दानापुर विधानसभा क्षेत्र, लालू के दामाद रामकृपाल यादव (जो अब भाजपा में हैं) को हराने वाली मीसा भारती के पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। रीतलाल की जीत मीसा भारती के भविष्य के रास्ते को आसान बनाएगी। लालू का आना यह स्पष्ट संदेश देता है कि परिवार के वर्चस्व के लिए किसी भी कीमत पर सीट जीतनी है, भले ही उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि का हो।

इसके अलावा, दानापुर में यादव वोटर करीब 22% हैं। इसके बाद करीब 20% फॉरवर्ड, करीब 15% दलित, 20-25% EBC और 6-8% मुस्लिम हैं। NDA के उम्मीदवार रामकृपाल यादव (जो खुद लालू के पूर्व शिष्य रहे हैं) की छवि ‘सॉफ्ट’ है। इस इलाके में यादव वोटर बँट सकते थे। खुद को यादवों का सबसे बड़ा नेता मानने वाले लालू यादव ने सड़क पर उतरकर यह सुनिश्चित किया कि यादव वोट एकजुट होकर केवल रीतलाल को ही मिलें। यह एकजुटता अपराध की पृष्ठभूमि को दरकिनार कर केवल जातीय आधार पर वोट डालने का संकेत है।

लालू के करीबी रामकृपाल यादव, 2014 में टिकट न मिलने पर बीजेपी में चले गए थे और उन्होंने मीसा भारती को हराया था। लालू यादव अपने पुराने शिष्य को हराने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। लालू का रोड शो, रामकृपाल के यादव वोटों को अपनी तरफ खींचने के प्रयास को विफल करने की रणनीति का हिस्सा है।

कौन हैं रीतलाल यादव?

रीतलाल यादव, जिन्हें मीडिया में ‘बाहुबली‘ कहा जाता है, लालू यादव के पुराने संपर्क वाले हैं। रीतलाल का राजनीतिक सफर 2003 में लालू यादव की ‘तेल पिलावन, लाठी घुमावन‘ रैली के दौरान शुरू हुआ था। एक दौर ऐसा भी कहा जाता है कि जब दानापुर डिवीजन से रेलवे के जितने भी टेंडर निकलते थे, वो रीतलाल यादव ही डील करते थे।

रीतलाल 50 लाख रुपए की रंगदारी माँगने और धमकी देने के मामले में जेल में बंद हैं। यह मामला बिल्डर कुमार गौरव से जुड़ा है। रीतलाल के चुनावी हलफनामे के अनुसार, उन पर हत्या, रंगदारी, वसूली और धमकी देने जैसे कुल 11 आपराधिक मामले लंबित हैं।

रीतलाल तब चर्चा में आए जब उन पर भाजपा नेता सत्यनारायण सिन्हा की हत्या का आरोप लगा। 2010 में विधानसभा चुनाव से पहले रीतलाल ने सरेंडर कर दिया था। रीतलाल ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जेल से ही चुनाव लड़ा और हारे। हालाँकि, रीतलाल को भाजपा नेता सत्यनारायण सिन्हा की हत्या मामले में हाल ही में जमानत मिली, लेकिन वे रंगदारी के मामले में फिर जेल में गए और पुलिस की हिरासत में नामांकन करने पहुँचे।

एक ऐसे उम्मीदवार के लिए, जिस पर संगीन आरोप हैं और जो चुनाव प्रचार की अनुमति के बावजूद जेल से बाहर नहीं आ सका, खुद पार्टी सुप्रीमो का प्रचार के लिए उतरना यह दिखाता है कि पार्टी की प्राथमिकता ‘अपराधमुक्त छवि’ नहीं, बल्कि ‘वोट बैंक की जीत’ है। यह सीधे तौर पर एक बार फिर से ‘जंगलराज’ और आपराधिक तत्वों को राजनीति में संरक्षण देने की मानसिकता को दर्शाता है।

अपराधी को टिकट: ‘दोहरी सोच’ की राजनीति

यह घटना लालू यादव की ‘दोहरी सोच‘ को उजागर करती है। एक तरफ, उनके परिवार के सदस्य (जैसे तेजस्वी यादव) अक्सर आपराधिक छवि वाले नेताओं पर बयान देते हैं, लेकिन जब दानापुर में रीतलाल यादव जैसे जेल में बंद उम्मीदवार की बात आती है, तो वे खुद प्रचार में उतर आते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लालू के लिए नैतिकता या कानून मायने नहीं रखता, बल्कि केवल चुनाव जीतना मायने रखता है। एक ऐसे उम्मीदवार को मैदान में उतारना, जो गंभीर आरोपों में फँसा है और जिसके लिए खुद पार्टी मुखिया को उतरना पड़े, यह दिखाता है कि RJD की राजनीति में अपराध और राजनीति को अलग-अलग मानने की सोच है। यदि कोई नेता बीजेपी का हो तो वह अपराधी है, लेकिन अगर RJD का हो, तो उसे ‘साजिश का शिकार’ बताकर उसे समर्थन दिया जाता है।