Home Blog Page 219

सेलिब्रिटी के लिए अलग नियम नहीं हो सकते: गुजरात HC ने यूसुफ पठान के सरकारी जमीन पर कब्जे को बताया ‘अवैध’, जानें क्या है वडोदरा में TMC सांसद के प्लॉट हड़पने का मामला

गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में पूर्व क्रिकेटर और टीएमसी सांसद यूसुफ पठान की जमीन विवाद से जुड़ी याचिका खारिज कर दी। जस्टिस मौना भट्ट की सिंगल बेंच ने पठान को सरकारी जमीन पर अतिक्रमणकारी घोषित किया।

दरअसल, वडोदरा नगर निगम ने यूसुफ पठान को सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करने के आरोप में नोटिस भेजा था। इसके बाद पठान ने नगर निगम के नोटिस और राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

ऑपइंडिया के पास मौजूद आदेश की कॉपी में कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि यूसुफ पठान द्वारा सरकारी जमीन पर कब्जा करना अवैध और जबरदस्ती है और इसे किसी भी हालत में वैध नहीं माना जा सकता।

मामले का इतिहास

यह मामला 2012 से शुरू हुआ। यूसुफ पठान ने अपने बंगले के पास 978 वर्ग मीटर का प्लॉट नंबर 90 को 99 साल की लीज पर लेने के लिए वडोदरा नगर निगम में आवेदन दिया। नगर आयुक्त और निगम की स्थायी समिति ने इसे मंजूरी दी। 8 जून 2012 को निगम की आम सभा ने भी प्रस्ताव मंजूर कर लिया।

चूँकि यह जमीन बिना सार्वजनिक नीलामी के दी जानी थी, इसलिए इसे राज्य सरकार के पास भेजा गया। सरकार ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इसके बावजूद यूसुफ पठान ने जमीन पर कब्जा कर लिया।

वीएमसी ने तुरंत कार्रवाई नहीं की लेकिन 2024 में विवाद फिर चर्चा में आया और निगम ने पठान को नोटिस भेजकर जमीन खाली करने को कहा। इसके बाद यूसुफ पठान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

यूसुफ पठान के क्या हैं तर्क?

पठान के वकील ने कहा कि नगर निगम एक स्वतंत्र निकाय है और अधिनियम 1949 के तहत निगम आयुक्त को जमीन पट्टे पर देने का अधिकार है। राज्य सरकार की मंजूरी लेना आवश्यक नहीं है। उन्होंने संविधान के 74वें संशोधन का हवाला देते हुए कहा कि नगर निगम जैसे स्थानीय निकायों में राज्य का हस्तक्षेप उचित नहीं है।

यूसुफ पठान ने यह भी कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर और सांसद हैं, जमीन का मौजूदा बाजार मूल्य चुकाने को तैयार हैं और निगम ने 12 साल तक कोई आपत्ति नहीं जताई, इसलिए उनका कब्जा वैध मानना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विवादित जमीन उनके बंगले के पास है, इसलिए सुरक्षा का मामला भी है।

सरकार और निगम का तर्क

नगर निगम और सरकार के वकील ने कहा कि किसी को भी सरकारी या निगम की जमीन पर कब्जा करने का अधिकार नहीं है। जमीन बिना नीलामी के दी जानी थी, इसलिए राज्य सरकार की मंजूरी जरूरी थी। पठान ने चारदीवारी बनाकर कब्जा कर लिया जबकि कोई औपचारिक आदेश नहीं था।

सरकार ने यह भी कहा कि पठान ने निगम को एक भी रुपया नहीं दिया और सुरक्षा का कोई सबूत भी नहीं पेश किया। निगम ने अदालत से कहा कि अगर पठान सचमुच जमीन चाहते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक नीलामी में हिस्सा लेना चाहिए, जैसा हर नागरिक करता है।

हाई कोर्ट का फैसला

जस्टिस मौना भट्ट ने कहा कि 9 जून 2014 को राज्य सरकार ने जमीन का प्रस्ताव खारिज कर दिया था। इसके बाद यूसुफ पठान का कोई कानूनी अधिकार नहीं बचा। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने से किसी को भी जमीन पर अधिकार नहीं मिल जाता।

कोर्ट ने पठान के बाजार मूल्य चुकाने की दलील भी खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि यूसुफ पठान जैसी हस्तियाँ और सांसद समाज के आदर्श होते हैं और उनसे आम नागरिकों से अधिक कानून का पालन करने की उम्मीद होती है। कानून तोड़ने के बाद भी विशेष सुविधाएँ मिलें, तो समाज को गलत संदेश जाएगा।

अदालत ने यह भी कहा कि निगम की लापरवाही यूसुफ पठान को लाभ नहीं पहुँचा सकती। अंतिम आदेश में याचिका खारिज कर दी गई और कहा गया कि जमीन पर अवैध कब्जा तुरंत हटाना चाहिए। नगर निगम को आदेश दिया गया कि कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाए। यूसुफ पठान का कब्जा अवैध था और इसे कोई भी विशेष दलील वैध नहीं बना सकती। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रसिद्धि या पद से कानून पर अलग नियम नहीं हो सकते हैं।

UP में किसानों की डिजिटल क्रांति, योगी सरकार सोशल मीडिया से सीधे अन्नदाताओं तक पहुँचाएगी खेती से जुड़ी जानकारी: ‘रूफ टॉप गार्डनिंग योजना’ को भी मिली मंजूरी

उत्तर प्रदेश सरकार अब राजस्थान की तरह इंटरनेट मीडिया का उपयोग कर किसानों को तकनीकी जानकारी, मौसम की जानकारी, कृषि सलाह और बाजार की स्थिति जैसे जरूरी अपडेट देने की तैयारी में है।

राजस्थान में वाट्सऐप, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग करके कृषि से जुड़ी जानकारी सीधे किसानों तक पहुँचाई जा रही है। वहाँ किसानों के वाट्सएप ग्रुप बनाए गए हैं जिनमें स्थानीय अधिकारी और कृषि विशेषज्ञ भी जुड़े होते हैं। इससे किसानों की समस्याओं का तुरंत समाधान किया जा रहा है।

वहीं, यूट्यूब चैनल के जरिए किसानों को नई तकनीकें और उपकरणों का लाइव प्रदर्शन दिखाकर जानकारी दी जाती है, जिससे वे आधुनिक खेती के तरीकों को आसानी से सीख सकें।

फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर किसानों को उपभोक्ताओं से सीधे जोड़ने की कोशिश हो रही है। इससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होती है और किसानों को अपनी उपज का सीधा और ज्यादा मुनाफा मिलता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मॉडल की जानकारी देने के लिए हाल ही में राजस्थान के कृषि अधिकारी उत्तर प्रदेश आए थे और उन्होंने कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही को अपनी योजना की प्रस्तुति दी। मंत्री ने इस मॉडल को प्रदेश में लागू करने के निर्देश दिए हैं।

अब यूपी कृषि विभाग राजस्थान के मॉडल का अध्ययन कर उसकी तर्ज पर योजना बना रहा है और जल्द ही इसके लिए एक टीम राजस्थान भेजने की तैयारी कर रहा है।

‘रूफ टॉप गार्डनिंग योजना’ को भी मिली मंजूरी

दूसरी ओर उत्तर प्रदेश सरकार अब शहरी इलाको में भी खेती को बढ़ावा देने के लिए काम कर रही है। उद्यान राज्य मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने हाल ही में एक बैठक में ‘रूफ टॉप गार्डनिंग योजना’ (छत पर बागवानी) की घोषणा की है। इस योजना के तहत लोग अपने घर की छतों पर सब्जियाँ, फल, मसाले और औषधीय पौधे उगा सकेंगे।

इससे शहरी इलाकों में हरियाली बढ़ेगी, पर्यावरण को फायदा होगा और लोगों को जैविक फल-सब्जियाँ घर पर ही मिलेंगी। यह तरीका खासतौर पर सीमित जगह वाले घरों के लिए बहुत फायदेमंद है। इस योजना को पहले लखनऊ, वाराणसी और गोरखपुर जैसे शहरों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया जाएगा।

इसके लिए आईआईवीआर वाराणसी से तकनीकी मदद ली जा रही है और योजना को भारत सरकार से अनुमोदन दिलाने की तैयारी चल रही है। लोगों को फ्री किट और प्रशिक्षण भी दिए जाएँगे ताकि वे आसानी से इस योजना से जुड़ सकें। बैठक में अपर मुख्य सचिव बीएल मीणा और उद्यान निदेशक डॉ बीपी राम सहित कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।

झूठी कहानी, उत्पीड़न का रोना और विक्टिम कार्ड: कनाडा में शरणार्थी बनने के लिए खालिस्तानी लगातार कर रहे प्रयास, प्रदीप सिंह के आवेदन को ओंटारियो कोर्ट ने नकारा

कनाडा के टोरंटो (ओंटारियो) स्थित फेडरल कोर्ट ने शनिवार (6 सितंबर 2025) को भारतीय नागरिक प्रदीप सिंह का शरण का दावा खारिज कर दिया। दरअसल, प्रदीप सिंह नवंबर 2024 में वर्क परमिट खत्म होने के बाद कनाडा में रुकने के लिए शरण दिए जाने का दावा कर रहा था।

कोर्ट के दस्तावेजों के अंश साझा करने वाले पत्रकार OnTheNewsBeat के अनुसार, प्रदीप सिंह फरवरी 2023 में ‘स्पाउस वर्क परमिट’ पर कनाडा पहुँचा था।

वर्क परमिट खत्म होने के बाद प्रदीप ने एक्सटेंशन के लिए आवेदन करने के बजाय शरण का दावा किया। लेकिन उसका आवेदन ‘इमीग्रेशन एंड रिफ्यूजी प्रोटेक्शन एक्ट’ के तहत खारिज कर दिया गया था।

गौरतलब है कि 2014 से 2019 के बीच वह ऑस्ट्रेलिया में भी शरण लेने की कोशिश कर चुका था। सिंह ने इस बार भी वही चाल चलने की कोशिश की और खालिस्तान कार्ड खेलते हुए दावा किया कि भारत लौटने पर उसे उत्पीड़न का सामना करना पड़ेगा।

16 नवंबर 2024 को दाखिल किया गया शरण का यह दावा पहले की कोशिशों के आधार पर तुरंत खारिज कर दिया गया। फरवरी 2025 में प्रदीप सिंह को Pre-Removal Risk Assessment (PRRA) के लिए आवेदन करने की सूचना दी गई।

यह प्रक्रिया कनाडा में निर्वासन का सामना कर रहे लोगों को आखिरी अवसर देती है कि वे नए सबूत पेश करें और साबित करें कि अपने देश लौटने पर उन्हें जान का खतरा, यातना या अमानवीय व्यवहार झेलना पड़ेगा।

प्रदीप सिंह ने PRRA का विकल्प अपनाया लेकिन 15 अगस्त 2025 को उनका आवेदन भी खारिज हो गया। 25 अगस्त को कनाडा बॉर्डर सर्विस एजेंसी (CBSA) ने उसे सूचना दी कि 8 सितंबर 2025 को निर्वासित कर दिया जाएगा।

प्रदीप सिंह ने अदालत में Application for Leave and Judicial Review (ALJR) दाखिल कर निर्वासन टालने की कोशिश की लेकिन 2 सितंबर 2025 को यह भी खारिज कर दिया गया।

कोर्ट ने नोट किया कि प्रदीप सिंह ने अपने पक्ष में हलफनामे और दस्तावेज जमा किए थे। यहाँ तक कि उनके माता-पिता ने भी संयुक्त हलफनामा दिया। लेकिन अधिकारियों ने पाया कि इसमें किसी भी ठोस घटना, कथित धमकियों या गिरफ्तारी की परिस्थितियों का ब्योरा नहीं था।

इसके बजाय, कनाडाई अधिकारियों ने सोशल मीडिया से जुटाए सबूत पेश किए, जिनसे पता चला कि सिंह भारत में किसान आंदोलन से जुड़ा था और कनाडा में लगातार खालिस्तान समर्थक गतिविधियों में शामिल था। यही कारण रहा कि अदालत ने उसके हलफनामों को महत्व न देकर ऑनलाइन गतिविधियों और सार्वजनिक संबंधों को निर्णायक माना।

पुराना है कथित शरणार्थियों का यह पैटर्न

प्रदीप सिंह के दावे को खारिज किए जाने से एक पुराना और परिचित तरीका फिर सामने आया है। बहुत से पंजाबी युवक, जो स्किल्ड कैटेगरी में कानूनी रूप से विदेश नहीं जा पाते, वे शरण (asylum) का रास्ता चुनते हैं। इसके लिए वे अक्सर तथाकथित खालिस्तान कार्ड का इस्तेमाल करते हैं।

इस रणनीति के दो रूप होते हैं। कुछ लोग खुद को बाहर से खालिस्तान समर्थक दिखाते हैं ताकि यह साबित कर सकें कि भारत में उन्हें धार्मिक और राजनीतिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, कुछ वास्तव में खालिस्तानी विचारधारा के समर्थक होते हैं और उसी आधार पर शरण पाने की कोशिश करते हैं।

इसका तर्क सीधा है वे खुद को खालिस्तान आंदोलन से जुड़े उत्पीड़न का शिकार बताते हैं और पश्चिमी देशों से सहानुभूति की उम्मीद करते हैं, क्योंकि ये देश अक्सर खुद को अल्पसंख्यकों का रक्षक बताते हैं।

कई बार ये दावे सफल भी हो जाते हैं, जैसे कि मारे गए खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर के मामले में हुआ। लेकिन सिंह का केस यह दिखाता है कि हर कोशिश कामयाब नहीं होती। अगर कोई बार-बार अलग-अलग देशों में दावा करे, सबूत न दे पाए या सोशल मीडिया पर उसकी गतिविधियाँ उसके असली इरादों को उजागर कर दें और यह लगे कि वह सिर्फ मौके का फायदा उठाना चाहता है, तो उसकी पूरी कहानी तुरंत कमजोर पड़ जाती है।

‘खालिस्तान कार्ड’ और उसके समर्थक

शरण लेने की प्रक्रिया का दुरुपयोग करना कोई नई बात नहीं है। पंजाब में तो यह एक तरह की इंडस्ट्री बन चुकी है। यहाँ के एजेंट युवाओं को सिखाते हैं कि किस तरह उत्पीड़न की झूठी कहानी तैयार करनी है, कौन-से शब्द इस्तेमाल करने हैं, विदेशों में किन संगठनों से संपर्क करना है, और कैसे हलफनामे (affidavits) जुटाने हैं।

इसके बाद कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में वकील इन्हें शरण याचिका (asylum petition) में बदल देते हैं और इसके लिए मोटी रकम वसूलते हैं।

यह समस्या दो तरफा है। एक तरफ तो झूठे दावों के जरिए विदेशी धरती पर टिकने का रास्ता बनाया जाता है और दूसरी तरफ खालिस्तान आंदोलन के असली समर्थक जिनमें से ज्यादातर या तो घोषित आतंकवादी हैं या आतंक के हमदर्द भारत की कानून व्यवस्था से बचकर कनाडा जैसे देशों में पनाह पा जाते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि अपराधियों को सौंपने (extradition) की संधि होने के बावजूद कनाडा ने भारत की बार-बार की गई माँगों को खालिस्तान समर्थकों के मामले में नजरअंदाज़ किया है।

सोशल मीडिया पर कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले कई युवा खुलेआम खालिस्तानी आतंकियों की प्रशंसा करते हैं, अलगाववादी प्रोपेगेंडा चलाते हैं और सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ) जैसे संगठनों की विचारधारा को बढ़ावा देते हैं, जिसे भारत में आतंकी संगठन घोषित किया गया है। इसके बावजूद, इन देशों की सरकारें अक्सर इन्हें सुरक्षा देती हैं, जबकि यह उनके लिए भी खतरे का कारण बन सकता है।

शरण की व्यवस्था और उसका दुरुपयोग

सिद्धांत के तौर पर देखें तो शरण देने का उद्देश्य उन लोगों की रक्षा करना है जिन्हें अपने देश में सचमुच उत्पीड़न, हिंसा, यातना या मौत का खतरा हो। यह अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित एक मानवीय व्यवस्था है। लेकिन जब इस सिस्टम का बार-बार दुरुपयोग किया जाता है, तो यह कमजोर पड़ने लगता है।

झूठे दावों के कारण असली पीड़ितों को सुरक्षा मिलने में देरी होती है। साथ ही, जब शरण लेने की कहानी उग्रवादी विचारधारा पर आधारित हो, तो यह मेजबान देश के लिए भी सुरक्षा का बड़ा खतरा बन जाता है। कनाडा इसका ताजा उदाहरण है।

खालिस्तानी आंदोलन को समर्थन देकर उसने न सिर्फ अपनी सुरक्षा को जोखिम में डाला है, बल्कि भारत जैसे दोस्ताना देश के साथ अपने कूटनीतिक रिश्ते भी खराब कर लिए हैं। इस तरह के फैसलों का असर सिर्फ घरेलू स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर परिणाम लेकर आता है।

कनाडा में पंजाबी युवाओं के शरण लेने के दावे

कनाडा को सालों से बड़ी संख्या में पंजाबी युवाओं के शरण से जुड़े दावों का सामना करना पड़ा है। ये दावे अक्सर इस आधार पर किए जाते हैं कि उन्हें खालिस्तान समर्थक होने के शक में भारत में उत्पीड़न झेलना पड़ सकता है। कई मामलों में ये दावे सफल भी हो जाते हैं।

पूर्व संगरूर सांसद सिमरनजीत सिंह मान ने तो यहाँ तक दावा किया था कि उन्होंने हजारों लोगों को आश्रय के लिए समर्थन पत्र जारी किए। कहा जाता है कि इनमें से कई पत्र पैसे लेकर दिए गए थे। इन पत्रों में आवेदकों को सरकारी दमन का संभावित शिकार दिखाया जाता था, ताकि उनका दावा मजबूत लगे और कागजी सबूत भी तैयार हो जाएँ।

प्रदीप सिंह का मामला एक चेतावनी

प्रदीप सिंह का मामला कोई अनोखा नहीं है, बल्कि वही पुराना पैटर्न दोहराता है, अस्थायी वीजा पर आना, वीजा की अवधि खत्म होने के बाद शरण का दावा करना, खालिस्तान कार्ड का इस्तेमाल करना और अंत में दावे का खारिज होना।

हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं कि फेडरल कोर्ट हमेशा इन दावों को पूरी तरह नकार देती है। कई बार तकनीकी वजहों से कुछ मामले बच भी जाते हैं। हाल ही में टोरंटो फ़ेडरल कोर्ट ने कई केसों में अलग-अलग फैसले दिए हैं, जैसे गुरचरण सिंह के मामले को मौखिक गवाही में खामियों के चलते दोबारा सुनवाई के लिए भेजा गया, इकबाल सिंह ढिल्लोंवाल का केस CBSA की अहम रिपोर्ट नजरअंदाज होने के कारण वापस भेजा गया, जबकि अमनदीप सिंह और कंवलदीप कौर के खालिस्तान-आधारित दावे को झूठा मानते हुए खारिज कर दिया गया।

इन उदाहरणों से साफ है कि खालिस्तान से जुड़े दावों की कहानी अब भी जिंदा है और हर मामले में नतीजा अलग-अलग निकल सकता है। पर्दीप सिंह के मामले में कनाडाई अधिकारियों ने यह भी बताया कि उसने पहले ऑस्ट्रेलिया में भी आश्रय का दावा किया था, जिससे यह साफ हो गया कि उसकी कोशिश कोई एक बार की नहीं थी, बल्कि एक पैटर्न का हिस्सा थी। अब उसके हिस्से में डिपोर्टेशन आया है, लेकिन खालिस्तानी समर्थक उसके मामले को बहाना बनाकर नीतियों में बदलाव के लिए दबाव बनाने की कोशिश जरूर करेंगे।

निष्कर्ष

पर्दीप सिंह का असफल आश्रय दावा केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। पिछले दो महीनों में ही इसी तरह के तीन मामलेन सामने आए हैं, जो दिखाते हैं कि आज की प्रवासन (migration) राजनीति में  खालिस्तान कार्ड  एक रणनीति भी बन गया है और एक बोझ भी। कई लोग अलग-अलग देशों में बार-बार शरण का दावा करते हैं, अलगाववादी कहानियों का सहारा लेते हैं और खुद को उत्पीड़ित दिखाने की कोशिश करते हैं। यह अब एक जाना-पहचाना पैटर्न बन चुका है।

दिक्कत यह है कि जब ऐसे लोग सिस्टम से खिलवाड़ करते हैं, तो असली पीड़ित, जिन्हें सचमुच जान का खतरा है और जिन्हें सुरक्षा की जरूरत है, उनकी आवाज दब जाती है और उनका हक पीछे छूट जाता है।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है जिसे विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

भारतीय की निर्मम हत्या पर US मीडिया को सूंघा साँप, चार्ली किर्क से जोड़कर नेटिजन्स ने उठाए सवाल: अमेरिकी ने धड़ से काटकर कूड़ेदान में फेंका था चंद्र मौली का सिर

अमेरिका के टेक्सास में भारतीय मूल के चंद्र मौली ‘बॉब’ नागमल्लैया की गला काटकर हत्या कर दी गई। वह मूलरूप से कर्नाटक का रहने वाला था और डैलस के डाउनटाउन सूट्स मोटल में मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत था। होटल में उनके सहकर्मी योडार्निस कोबोस-मार्टिनेज ने किसी बात को लेकर हुए विवाद के बाद चाकू से हमला कर दिया था। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया।

भारतीय नागरिक की बेरहमी से हत्या की यह घटना सोशल मीडिया पर छाई हुई है। इसके बावजूद अमेरिकी मीडिया ने घटना को लेकर खास कवरेज नहीं दी, जिससे नेटिजन्स नाराज हैं। इसके अलावा घटना के बाद अमेरिका की अप्रवासन नीतियों पर सवाल उठ रहे हैं।

परिवार के सामने सिर धड़ से किया अलग

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 53 वर्षीय चंद्र मौली नागमल्लैया पर बुधवार (10 सितंबर 2025) सुबह टूटी हुई वॉशिंग मशीन के इस्तेमाल को लेकर हुए विवाद के बाद हमला किया गया। आरोपित 37 वर्षीय योर्डानिस कोबोस-मार्टिनेज ने एक चाकू निकाला और नागमल्लैया पर कई वार किए, फिर उसकी पत्नी और बेटे के सामने सिर धड़ से अलग कर दिया।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, नागमल्लैया के बेटे ने अपने पिता को बैट दिखाकर बचाने की कोशिश की लेकिन हमलावर को रोक नहीं सका। हमलावर ने बाद में कटे हुए सिर को लात मारकर पार्किंग के कूड़ेदान में डाल दिया। डलास पुलिस ने घटना के तुरंत बाद खून से लथपथ शर्ट पहने कोबोस-मार्टिनेज को गिरफ्तार कर लिया।

अमेरिकी मीडिया की चुप्पी पर उठे सवाल

इस घटना की सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचना की गई और कई लोगों ने अमेरिकी मीडिया पर घटना को लेकर चुप्पी साधने के भी आरोप लगाए। ऋचा लखेरा नाम की एक एक्स यूजर ने लिखा, “इरीना जारुत्स्का और चार्ली किर्क की हत्याओं को तो खूब कवरेज मिली लेकिन भारतीय मूल के नागमल्लैया की सार्वजनिक रूप से हुई सबसे निर्मम और अमानवीय हत्या को नजरअंदाज कर दिया गया।”

ऋचा लखेरा के कमेंट का स्क्रीनशॉट

एक अन्य एक्स यूजर, इंडियन ब्रॉन्सन ने सीधे तौर पर कॉन्ग्रेसी रो खन्ना को दोषी ठहराया और उन पर आव्रजन नीतियों के परिणामों को स्वीकार करने में विफल रहने का आरोप लगाया।

इंडियन ब्रॉन्सन के कमेंट का स्क्रीनशॉट

एक अन्य यूजर प्रेमानंद जॉन ने लिखा, “परिवार को अपूरणीय क्षति… मानसिक पीड़ा जीवन भर रहेगी। यह हत्या एक व्यक्तिगत त्रासदी और राजनीतिक मुद्दा दोनों बन गई है, जिसने अमेरिका में आव्रजन प्रवर्तन, अपराध और मीडिया की खामियों को उजागर किया है।”

भारतीय मूल के ‘पीड़ित’ को नहीं दिया महत्व

कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिका के बड़े मीडिया संस्थान किसी भी अपराध को दिखाने से पहले अपराधी और पीड़ित की नस्ल देखते हैं। शायद उनके लिए भारतीय नागरिक की हत्या कोई बड़ा अपराध नहीं थी, वो भी तब जब अपराधी एक अमेरिकन हो। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि आरोपित का पहले भी अपराधिक रिकॉर्ड रह चुका है। इसके बावजूद मीडिया ने खबर को महत्व नहीं दिया।

ना भौंकते हैं कुत्ते, ना गरजते हैं बादल, ना ही कड़कती है बिजली: जानिए बद्रीनाथ धाम की शांति का रहस्य, भगवान विष्णु के लिए यहाँ प्रकृति भी रहती है मौन

उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित बद्रीनाथ धाम भारत के सबसे पवित्र और प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। यह धाम चारधाम यात्रा और हिमालयी छोटे चारधाम का भी हिस्सा है। यह स्थान भगवान विष्णु को समर्पित है, जो यहाँ ध्यान मुद्रा में विराजमान हैं। इसका सम्मान यहाँ के जीव-जंतु भी रखते हैं। यहीं वजह है कि यहाँ कभी कुत्तों को भी भौंकते हुए नहीं देखा गया है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने यहाँ बदरी वृक्ष के नीचे कठोर तपस्या की थी। इसी कारण इस स्थान का नाम बद्रीनाथ पड़ा। बद्रीनाथ मंदिर की वास्तुकला नागर शैली में बनी हुई है और यह समुद्र तल से लगभग 3,000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।

मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की शालिग्राम शिला से बनी काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है, जो पद्मासन में और चार भुजाओं के साथ दिखाई देती है।

बद्रीनाथ की अनोखी विशेषताएँ

बद्रीनाथ धाम से जुड़ी कुछ ऐसी अद्भुत और रहस्यमयी बातें हैं, जो इसे और भी खास बनाती हैं। पहली ये कि यहाँ कभी कुत्ते भौंकते नहीं हैं। दूसरी ये कि बिजली चमकती है लेकिन कभी कड़कती नहीं और तीसरी ये कि बादल बरसते हैं लेकिन कभी गरजते नहीं।

इन घटनाओं के पीछे कई मान्यताएँ हैं। माना जाता है कि भगवान विष्णु यहाँ ध्यान मुद्रा में हैं और प्रकृति भी उनके ध्यान में बाधा नहीं डालती। न बिजली की कड़क, न बादलों की गर्जना, न ही कुत्तों का भौंकना। सब कुछ शांत है, ताकि भगवान की तपस्या में कोई विघ्न न आए।

मोटिवेशनल स्पीकर और भागवताचार्य देशमुख वशिष्ठ महाराज भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह बातें बिल्कुल सच हैं। बद्रीनाथ में कोई भी कुत्ता भौंकते हुए नहीं देखा गया है।

पौराणिक मान्यताएँ:

एक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने कुत्तों को श्राप दिया था कि वे इस पवित्र स्थान पर कभी नहीं भौंकेंगे। वहीं दूसरी मान्यता यह कहती है कि यहाँ के कुत्ते भगवान के सेवक हैं और उन्हें शांति से रहने का आदेश मिला हुआ है।

इसलिए बद्रीनाथ धाम न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि प्राकृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी एक अद्वितीय स्थान है। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वे प्रकृति और वातावरण का पूरा सम्मान करें और इस शांति का हिस्सा बनें। स्पष्ट रूप से कहें तो बद्रीनाथ धाम वास्तव में एक ऐसा स्थान है, जहाँ हर जीव और प्रकृति भी भगवान की तपस्या में सहभागी है।

नेपाल की PM कार्की ने प्रदर्शन में जताई ‘साजिश’ की आशंका, 72 मृतकों को दिया शहीद का दर्जा और ₹10-10 लाख का मुआवजा: हिंसा में 1.5 साल के बजट के बराबर नुकसान

नेपाल में GenZ प्रदर्शन के बाद अब हालात समान होने लगे हैं। देश में अंतरिम सरकार बन गई है, जिसकी प्रधानमंत्री सुशीला कार्की को बनाया गया है। कार्यभार संभालने के दूसरे दिन रविवार (14 सितंबर 2025) को प्रधानमंत्री ने हिंसा में जान गवाने वाले 72 लोगों को ‘शहीद’ का दर्जा दिया और उनके परिवार को ₹10 लाख मुआवजे का ऐलान किया है।

अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने कहा, “8 सितंबर 2025 की घटना में मारे गए सभी लोगों को शहीद घोषित किया गया है और उन्हें दस-दस लाख रुपए दिए जाएँगे। घायलों का खर्च सरकार उठाएगी और उन्हें मुआवजा भी दिया जाएगा। शवों को काठमांडू से दूसरे जिलों में भेजने की व्यवस्था सरकार करेगी।”

उन्होंने आगे कहा, “हम आर्थिक संकट में हैं। हमें पुनर्निर्माण पर चर्चा और काम करना चाहिए। निजी संपत्तियाँ भी जला दी गईं। हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे। सरकार उन्हें कुछ मुआवजा देने के उपायों पर काम करेगी। यह आसान ऋण या किसी अन्य उपाय के माध्यम से हो सकता है।”

इसके अलावा अंतरिम पीएम ने देश के युवाओं की माँग को ध्यान में रखते हुए भ्रष्टाचार मिटाने को लेकर भी अपनी सरकार को सजग होकर काम करने के आदेश दिए हैं।

GenZ प्रदर्शन में हुई हिंसा की होगी जाँच

प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने GenZ प्रदर्शन को नेपाल के इतिहास में सबसे दुर्भाग्य घटना बताया। उन्होंने कहा कि इसकी पीछे कोई गहरी साजिश हो सकती है। अंतरिम पीएम ने इस हिंसा के पीछे की साजिश को उजागर करने के लिए जाँच के भी आदेश दिए हैं।

सुशीला कार्की ने कहा, “अगर इसके पीछे नेपाली लोग हैं तो हमें शर्म आनी चाहिए। यह किसी बड़ी साजिश का नतीजा हो सकता है। तोड़फोड़ की घटना में शामिल लोगों की जाँच की जाएगी। मैं और मेरी टीम यहाँ सत्ता का स्वाद चखने नहीं आए हैं। हम छह महीने से ज्यादा नहीं रुकेंगे। हम नई संसद को जिम्मेदारी सौंप देंगे। आपके सहयोग के बिना हम सफल नहीं हो पाएँगे…।”

नेपाली सरकार ने माना हिंसा में हुई 72 मौत

नेपाल की सरकार ने पुष्टि की कि GenZ प्रदर्शन के दौरान 72 लोगों की मौत हुई हैं। मुख्य सचिव एकनारायण आर्यल ने देश की अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान यह आँकड़ा पेश किया।

आर्यल ने यह भी कहा कि प्रदर्शन में घायल 191 लोगों का अस्पताल में इलाज चल रहा है।

हिंसा में ₹3 लाख करोड़ का हुआ नुकसान

नेपाल में हुए GenZ प्रदर्शन की हिंसा में देश को ₹3 लाख करोड़ का नुकसान हुआ है। नेपाली अर्थशास्त्री ने बताया कि यह आँकड़ा देश के 1.5 साल के बजट के बराबर है। नेपाल के अर्थशास्त्री चंद्र मणि अधिकार ने कहा, “हमारे मोटे अनुमान के अनुसार, इस वित्तीय वर्ष में आर्थिक वृद्धि दर 1 प्रतिशत से कम रहेगी।”

उन्होंने यह भी कहा कि यह नुकसान नेपाल में हाल ही में पड़े ‘सूखे’ से भी कहीं ज्यादा है। इसके अलावा मार्च 2026 में होने वाले चुनावों समय से दो साल पहले होने जा रहे हैं, इसमें भी ₹3000 करोड़ खर्च होने की उम्मीद है।

UAPA में जमानत पर बाहर ‘पत्रकार’ सिद्दीकी कप्पन पर केरल में FIR, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के खिलाफ पोस्ट करने वाली शीबा के समर्थन में कर रहा था रैली: 10 अन्य लोगों पर भी केस दर्ज

केरल की कोच्चि पुलिस ने पत्रकार सिद्दीकी कप्पन और 10 अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। इन लोगों पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर विवादित टिप्पणी करने वाली रीजास एम शीबा सिद्दीकी की गिरफ्तारी के खिलाफ बिना अनुमति के प्रदर्शन करने का आरोप है।

यह प्रदर्शन ‘रीजास सॉलिडेरिटी फोरम’ द्वारा आयोजित किया गया था और कप्पन इसमें मुख्य वक्ता था। यह कार्यक्रम हाई कोर्ट जंक्शन के पास आयोजित किया गया था।

पुलिस के अनुसार, इन सभी पर गैरकानूनी सभा, सार्वजनिक रास्ते में बाधा डालना, शांति भंग करना और पुलिस से झड़प करने के आरोप लगाए गए हैं। पुलिस का कहना है कि इस सभा के लिए न तो अनुमति ली गई थी और न ही साउंड सिस्टम के इस्तेमाल की मंजूरी ली गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस प्रदर्शन में लगभग 30 लोग शामिल थे, जिन्होंने रीजास के समर्थन में नारेबाजी की। जब पुलिस ने उन्हें हटने को कहा तो कथित तौर पर झड़प हो गई और पुलिस ने बल प्रयोग करके भीड़ को हटाया। इसमें दो लोगों को हिरासत में लिया गया, जबकि अन्य मौके से फरार हो गए। FIR में जिन लोगों का नाम है, उनमें एडवोकेट प्रमोद पुझनकरा, सीपी राशिद, साजिद खालिद, डॉ हरी, भाबुराज भगवती, अम्बिका, मृदुला भवानी शामिल हैं।

इससे पहले बीजेपी नेताओं ने पुलिस से शिकायत की थी कि सिद्दीकी कप्पन ने अपनी जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है और इस कार्यक्रम को रोका जाना चाहिए। पूर्व DGP और बीजेपी समर्थक टी पी सेनकुमार ने फेसबुक पर लिखा, “जो राजनीतिक पार्टी इस तरह के कार्यक्रमों का विरोध करना चाहिए, वो चुप है क्योंकि कप्पन से करीबी एक व्यक्ति उस पार्टी के मुख्यालय में है। फिर ऐसे उग्रवादियों से हमें सुरक्षा कहाँ से मिलेगी?”

रीजास एम शीबा सिद्दीकी, एक छात्र कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार है, जिसे महाराष्ट्र ATS ने मई 2025 में नागपुर से गिरफ्तार किया था। उस पर ऑपरेशन सिंदूर और ऑपरेशन कगार (जो एक विरोधी-माओवादी अभियान है) के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट करने और भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप है।

सिद्दीकी कप्पन को अक्टूबर 2020 में हाथरस गैंगरेप केस की रिपोर्टिंग के लिए जाते समय यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया था और उसके खिलाफ UAPA लगाया गया था। वो वर्तमान में जमानत पर बाहर हैं।

EC ने मतदाता सूची में सुप्रीम कोर्ट के दखल को बताया ‘शक्तियों का उल्लंघन’, हलफनामा दायर कर कहा- वोटर लिस्ट में बदलाव का अधिकार सिर्फ हमारा

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ा दावा किया है। आयोग ने एक हलफनामा दायर कर कहा है कि किसी भी चुनाव से पहले मतदाता सूचियों में सुधार (Revision) करने का पूरा अधिकार सिर्फ EC के पास है। यह चाहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) हो या सामान्य पुनरीक्षण, इसका निर्णय चुनाव आयोग ही करेगा, कोई और नहीं। आयोग ने कहा कि अगर कोर्ट इस मामले में दखल देता है तो यह उसकी कानूनी शक्तियों का उल्लंघन होगा।

क्यों दाखिल किया गया हलफनामा?

यह हलफनामा (Affidavit) सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय की एक जनहित याचिका (PIL) के जवाब में दायर किया गया है। उपाध्याय ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से माँग की थी कि वह चुनाव आयोग को सभी राज्यों में, खासकर जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठ ज्यादा होती है, नियमित रूप से मतदाता सूचियों में सुधार करने का निर्देश दे।

इसके जवाब में चुनाव आयोग ने कहा कि समय-समय पर मतदाता सूची में सुधार करने का अधिकार सिर्फ उसके पास है और इस मामले में कोर्ट का कोई भी निर्देश उसकी विशेष शक्तियों में दखल होगा। आयोग ने बताया कि मतदाता सूचियों में सुधार करना उसका दायित्व है और यह हर आम चुनाव, विधानसभा चुनाव या उपचुनाव से पहले पूरा किया जाता है।

मतदाता सूची में सुधार का अधिकार और कानून

चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 25 का हवाला दिया। आयोग ने कहा कि इन नियमों के तहत, उसे यह तय करने का पूरा अधिकार है कि वोटर लिस्ट में गहन या सामान्य सुधार कब और कैसे किया जाए।

आयोग ने यह भी बताया कि 1 जुलाई 2025 को उसने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य चुनाव अधिकारियों को वोटर लिस्ट में सुधार की तैयारी शुरू करने का निर्देश दिया है, जिसमें 1 जनवरी 2026 को कट-ऑफ तारीख माना गया है।

आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह वोटर लिस्ट की शुद्धता और अखंडता बनाए रखने के अपने दायित्व को लेकर पूरी तरह से जागरूक है और इस दिशा में लगातार काम कर रहा है।

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी कहा कि उसकी याचिका खारिज की जाए, क्योंकि नियमित समय-समय पर वोटर लिस्ट में सुधार करने का निर्देश देना उसके अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन होगा।

‘विधायक हो तो क्या, अलग से नहीं होगा ट्रायल’: नूहँ हिंसा केस में कॉन्ग्रेस MLA मामन खान को सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा, HC के फैसले पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में यह साफ कर दिया है कि किसी राजनेता को सिर्फ उसके पद के आधार पर कोई विशेष सुविधा नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें हरियाणा कॉन्ग्रेस विधायक मामन खान के लिए अलग से ट्रायल चलाने की बात कहीं गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विधायक होना अलग ट्रायल का आधार नहीं हो सकता। कानून की नजर में सभी बराबर हैं।

नूहँ हिंसा मामले में हुआ था अलग ट्रायल का आदेश

यह मामला 2023 की नूहँ हिंसा से जुड़ा है, जिसमें छह लोगों की मौत हुई थी। इस हिंसा को भड़काने के आरोप में विधायक मामन खान और अन्य लोगों पर केस दर्ज किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने विधायक खान के लिए अलग से सुनवाई का आदेश दिया, जिसे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया था।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले को पलट दिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि सिर्फ राजनीतिक पद के आधार पर किसी को अलग से ट्रायल की अनुमति देना संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।

क्यों नहीं हो सकता अलग ट्रायल?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कुछ अहम बातें बताईं हैं। कोर्ट ने कहा कि सभी आरोपित कानून के सामने बराबर हैं। विधायक होना अलग ट्रायल का आधार नहीं हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में विधायक खान और अन्य आरोपितों के खिलाफ सबूत एक जैसे हैं। अलग-अलग ट्रायल चलाने से गवाहों को बार-बार बुलाना पड़ेगा, जिससे बेवजह देरी होगी और विरोधाभासी फैसले आने का खतरा भी रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही विधायकों से जुड़े मामलों का जल्द निपटारा होना चाहिए, लेकिन यह निष्पक्ष सुनवाई की कीमत पर नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी आरोपित को केवल राजनीतिक पद के कारण अलग ट्रायल की अनुमति देना सही नहीं है। इस फैसले के बाद, विधायक मामन खान का मामला दोबारा ट्रायल कोर्ट को भेज दिया गया है, जहाँ विधायक का ट्रायल अब बाकी आरोपितों के साथ ही होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने तय किए जॉइंट ट्रायल के प्रिंसिपल

सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले में कुछ जॉइंट ट्रायल के प्रिंसिपल भी तय किए है। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि आमतौर पर हर आरोपित का ट्रायल अलग-अलग होता है, लेकिन अगर अपराध एक ही घटना का हिस्सा हों, तो जॉइंट ट्रायल हो सकता है। यह फैसला जज की बुद्धिमानी पर निर्भर करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि जॉइंट या अलग ट्रायल का फैसला शुरुआत में ही किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि फैसला लेते समय यह देखना जरूरी है कि क्या जॉइंट ट्रायल से किसी आरोपित को कोई नुकसान हो सकता है या इससे सुनवाई में देरी होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि एक ट्रायल में जिन सबूतों का इस्तेमाल किया गया है, वहीं सबूत दूसरे ट्रायल में इस्तेमाल नहीं हो सकते हैं। इसलिए, अलग-अलग ट्रायल से कानूनी प्रक्रिया में दिक्कतें आ सकती हैं।

कोर्ट ने कहा कि कोई भी फैसला सिर्फ इसलिए रद्द नहीं किया जाएगा कि जॉइंट या अलग ट्रायल संभव था। कोर्ट तभी दखल देगा जब आरोपित असलियत में कोई नुकसान हुआ हो।

‘अपने लिए जहर निगल लेता हूँ, किसी का अपमान नहीं सहा जाता’: भूपेन हजारिका के अनादर को लेकर कॉन्ग्रेस पर बरसे PM मोदी, असम को दी ₹18530 करोड़ की सौगात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (14 सितंबर 2025) को असम में 18,530 करोड़ रुपए की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया है। इनमें मेडिकल से लेकर ऊर्जा क्षेत्र की कई परियोजनाएँ शामिल हैं। इस दौरान पीएम मोदी ने दरांग में एक जनसभा को भी संबोधित किया और कॉन्ग्रेस पर जमकर हमला बोला है।

कॉन्ग्रेस पर बरसे पीएम मोदी

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में भूपेन हजारिका को भारत रत्न दिए जाने पर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के बयान का जिक्र कर कॉन्ग्रेस को खूब खरी-खरी सुनाई। पीएम मोदी ने कहा, “जिस दिन भारत सरकार ने इस देश के महान सपूत और असम के गौरव भूपेन दा हजारिका जी को भारत रत्न से सम्मानित किया, उसी दिन कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष ने बयान दिया था कि मोदी ‘नाचने-गाने वालों को’ भारत रत्न दे रहा है।”

उन्होंने कहा, “1962 में चीन के साथ जो युद्ध हुआ था, उसके बाद पंडित नेहरू ने जो कहा था, नॉर्थ-ईस्ट के लोगों के वे घाव आज भी भरे नहीं हैं और उस घाव पर कॉन्ग्रेस की वर्तमान पीढ़ी भी नमक छिड़कने का काम कर रही है।”

मैं सारा जहर निगल लेता हूँ: PM

पीएम मोदी ने कहा, “आम तौर पर मुझे कितनी भी गालियाँ दें, मैं तो भगवान शिव का भक्त हूँ, सारा जहर निगल लेता हूँ लेकिन जब बेशर्मी के साथ किसी और का अपमान होता है, तब मुझसे रहा नहीं जाता।”

उन्होंने कहा, “मैं जानता हूँ, कॉन्ग्रेस का पूरा इकोसिस्टम आज मुझ पर टूट पड़ेगा कि मोदी फिर से रोना रोने लगा। मेरे लिए तो जनता-जनार्दन ही मेरा भगवान है, और मेरे भगवान के पास जाकर मेरी आत्मा की आवाज नहीं निकलेगी तो और कहाँ निकलेगी।” पीएम ने कहा, “यही मेरे मालिक हैं, यही मेरे पूजनीय हैं, यही मेरा रिमोट कंट्रोल हैं और कोई मेरा रिमोट कंट्रोल नहीं है।”

पीएम मोदी ने कहा, “21वीं सदी के 25 साल बीत चुके हैं। अब 21वीं सदी का ये अगला हिस्सा ईस्ट का है, नॉर्थ ईस्ट का है।”

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में मिला माँ कामाख्या का आशीर्वाद: PM मोदी

पीएम मोदी ने अपने भाषण के दौरान कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के बाद कल मेरी असम की पहली यात्रा थी। माँ कामाख्या के आशीर्वाद से ऑपरेशन सिंदूर बहुत बड़ी सफलता रही।” उन्होंने कहा, “आज माँ कामाख्या की इस धरती पर आकर मुझे एक अलग ही पवित्र अनुभूति हो रही है और ये भी सोने पे सुहागा है कि आज इस क्षेत्र में जन्माष्टमी भी मनाई जा रही है।”

उन्होंने आगे कहा, “लाल किले से मैंने कहा था, मुझे चक्रधारी मोहन याद आए। मुझे श्री कृष्ण याद आए, और मैंने भविष्य की सुरक्षा नीति में एक सुदर्शन चक्र का विचार लोगों के सामने रखा है।”

पाकिस्तान के साथ खड़ी होती है कॉन्ग्रेस: PM

पीएम मोदी ने कॉन्ग्रेस पर पाकिस्तान के साथ खड़े होने का आरोप लगाते हुए कहा, “जब कॉन्ग्रेस सत्ता में थी, तब पूरा देश आतंक से लहूलुहान होता था और कांग्रेस चुपचाप खड़ी रहती थी।”

उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस के लोग हमारी सेना की बजाय आतंकियों को पालने वालों के एजेंडों को आगे बढ़ाते हैं। पाकिस्तान का झूठ कॉन्ग्रेस का एजेंडा बन जाता है। इसलिए आपको कॉन्ग्रेस के प्रति हमेशा सतर्क रहना चाहिए।”

पीएम मोदी ने किन परियोजनाओं की दी सौगात?

पीएम मोदी ने जिन परियोजनाओं का शिलान्यास किया उनमें दरांग मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, जीएनएम स्कूल और बीएससी नर्सिंग कॉलेज शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने गुवाहाटी रिंग रोड परियोजना और ब्रह्मपुत्र नदी पर कुरुवा-नरेंगी पुल परियोजना का शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने गोलाघाट के नुमालीगढ़ में नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड (एनआरएल) में असम बायोएथेनॉल संयंत्र का उद्घाटन किया है।