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1984 के सिख दंगे कॉन्ग्रेस की साजिश, 2002 के गुजरात दंगे स्वाभाविक: राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष तरलोचन सिंह बोले – नरेंद्र मोदी ने राज्य को जलने से बचाया

पूर्व राज्यसभा सांसद तरलोचन सिंह ने 1984 के सिख दंगों को कॉन्ग्रेस की प्रायोजित साजिश बताया, जबकि 2002 के गुजरात दंगों को गोधरा कांड के बाद लोगों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया करार दिया। उन्होंने कहा कि 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में 59 कारसेवकों की हत्या के बाद भड़की हिंसा में सरकार की कोई भूमिका नहीं थी।

राज्यसभा के पूर्व सांसद और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष सरदार तरलोचन सिंह ने अपने बयान में साफ कहा है कि 2002 में गुजरात में जो कुछ हुआ, वह ‘स्वाभाविक प्रतिक्रिया’ थी, जबकि 1984 के सिख दंगे पूरी तरह ‘सरकार प्रायोजित साजिश’ थे। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा कि दिल्ली में सिखों पर जो हुआ, वह पहले से तय था, लेकिन गुजरात में गोधरा कांड के बाद जो हिंसा भड़की, उसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं थी।

मोदी का साहसिक फैसला

तरलोचन सिंह ने कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस समय बड़ा कदम उठाया था। गोधरा अग्निकांड में मारे गए 59 कारसेवकों के शवों को गाँव ले जाने की माँग उठ रही थी। लेकिन मोदी ने इसकी अनुमति नहीं दी और वहीं अंतिम संस्कार का आदेश दिया। अगर ये शव गाँव पहुँच जाते तो पूरा गुजरात जल उठता।

तरलोचन ने कहा, “मोदी जी ने गुजरात को बचा लिया। इस फैसले ने दंगों को सीमित रखा और हालात बेकाबू नहीं होने दिए।”

पूर्व सांसद ने जोर देकर कहा कि गुजरात दंगे वह त्वरित प्रतिक्रिया थी उस घटना के होने के बाद। उन्होंने कहा, “मैं उस समय राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष था और सबसे पहले गुजरात पहुँचा। मैंने जाँच की और एक बुकलेट भी लिखी। उसमें साफ लिखा कि दिल्ली दंगे प्रायोजित थे, जबकि गुजरात दंगे लोगों की सामान्य प्रतिक्रिया थे। सरकार का इसमें कोई रोल नहीं था।” तरलोचन सिंह ने बताया कि उस बुकलेट की 500 कॉपियाँ खुद मोदी ने छपवाकर बांटने का आदेश दिया था।

मुस्लिम नेताओं के साथ बैठक और दिल्ली बनाम गुजरात

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष सरदार तरलोचन सिंह ने यह भी खुलासा किया कि उन्होंने 30 बड़े मुस्लिम नेताओं और मोदी की बैठक कराई थी। तीन घंटे चली उस मीटिंग में मोदी ने सभी नेताओं की बातें सुनीं और उनकी माँगें मान लीं। उन्होंने महिलाओं के लिए सिर्फ महिला अधिकारियों वाले थाने खोलने जैसे फैसले भी किए।

तरलोचन सिंह ने सबसे बड़ा अंतर बताते हुए कहा, “दिल्ली का दंगा प्रायोजित था, गुजरात स्वाभाविक। दिल्ली में कॉन्ग्रेस सरकार के संरक्षण में सिखों का कत्लेआम हुआ, जबकि गुजरात में गोधरा कांड के बाद लोगों की प्रतिक्रिया सामने आई। मोदी ने हालात संभाले और पूरे राज्य को जलने से बचाया।”

गोधरा कांड

27 फरवरी 2002 का दिन भारतीय इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। उस दिन गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगा दी गई। इस कोच में अयोध्या से लौट रहे कारसेवक सवार थे।

अचानक भीड़ ने ट्रेन पर हमला किया और डिब्बे पर पेट्रोल डालकर आग के हवाले कर दिया। इस भयावह घटना में महिलाओं और बच्चों समेत 59 कारसेवकों की दर्दनाक मौत हो गई।

गोधरा कांड की खबर फैलते ही पूरे गुजरात में तनाव की लहर दौड़ गई। अहमदाबाद, वडोदरा, पंचमहल और अन्य जिलों में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। कई दिनों तक चले इन दंगों में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों को अपने घर छोड़ने पड़े। अदालतों ने इस मामले में सख्त सजा भी सुनाई और सुप्रीम कोर्ट तक ने दोषियों की सजा बरकरार रखी।

‘संघ में आओगे तो कुछ मिलेगा नहीं, जो है वो भी चला जाएगा…’ देश और समाज की सेवा में मिलता है स्वयंसेवकों को सुकून: RSS प्रमुख बोले – हिंदुत्व धर्म नहीं, जीवन जीने का तरीका

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली में हिंदुत्व, भारतीयता और धर्म के मोल को लेकर गहरी बातें कही। उन्होंने संघ के 100 साल पूरे होने के मौके पर दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में लगातार दूसरे दिन अपने विचार रखे। भागवत ने साफ कहा कि संघ का रास्ता लालच या पुरस्कार का नहीं, बल्कि सत्य, प्रेम और राष्ट्रहित का है। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व और भारतीयता का असली मतलब है अपने देश और समाज को मजबूत करना, लेकिन दुनिया से कटना नहीं।

सात्त्विक प्रेम और समर्पण संघ का आधार

मोहन भागवत ने कहा कि 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने विजयदशमी के दिन संघ की नींव रखी थी। उनका सपना था कि हिंदू समाज संगठित हो और हर व्यक्ति राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे।

भागवत ने बताया कि संघ का काम सात्त्विक प्रेम और आत्मीयता पर टिका है। इसमें कोई लालच नहीं है। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा, “संघ में आओगे तो कुछ मिलेगा नहीं, जो है वो भी चला जाएगा।” यानी स्वयंसेवक सिर्फ इसलिए काम करते हैं क्योंकि उन्हें अपने देश और समाज की सेवा में सुकून मिलता है। उनका ध्येय है – “आत्मनो मोक्षार्थं जगत् हिताय च,” यानी अपनी आत्मा की मुक्ति और विश्व कल्याण के लिए।

संघ का लक्ष्य पूरे हिंदू समाज को एकजुट करना है। भागवत ने कहा कि यह काम आसान नहीं है। इसके लिए हर व्यक्ति को उसकी स्थिति के हिसाब से देखना होगा – चाहे वह दोस्ती का भाव हो, करुणा का या फिर उपेक्षा का। संघ का हर स्वयंसेवक बिना किसी पुरस्कार की उम्मीद के काम करता है। यही भावना संघ को खास बनाती है। भागवत ने साफ किया कि संघ का काम सिर्फ हिंदुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज और विश्व के कल्याण के लिए है।

स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत

भागवत ने स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए कहा कि भारत को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम दुनिया से रिश्ते तोड़ दें। उन्होंने कहा, “अंतरराष्ट्रीय व्यापार जरूरी है, लेकिन वह दबाव में नहीं, स्वेच्छा से होना चाहिए।”

स्वदेशी का मतलब है अपने देश में बनी चीजों को तरजीह देना। अगर हमारे देश में कार बनती है, तो बाहर से क्यों खरीदें? जो चीजें देश में उपलब्ध हैं, उन्हें आयात करने की जरूरत नहीं।

उन्होंने यह भी कहा कि हमारे घरों में भाषा, खान-पान, वेशभूषा और पूजा-पद्धति भारतीय होनी चाहिए। यह हमारी संस्कृति और पहचान को मजबूत करता है। लेकिन उन्होंने साफ चेतावनी दी कि अगर कोई धार्मिक अपमान होता है, तो हिंसा या टायर जलाना इसका हल नहीं है। ऐसी स्थिति में कानून और प्रशासन का सहारा लेना चाहिए। भागवत ने समाज में बढ़ रहे सात सामाजिक पापों का भी जिक्र किया, जैसे बिना मेहनत के धन कमाना और सिद्धांतों के बिना राजनीति करना। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत ही सशक्त भारत का आधार बनेगा।

दुनिया में बढ़ता तनाव और तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा

मोहन भागवत ने वैश्विक हालात पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भी दुनिया में शांति नहीं आई। संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन भी स्थाई समाधान नहीं दे पाए। आज दुनिया कट्टरपन और असहिष्णुता की चपेट में है। भागवत ने कहा कि तीसरा विश्वयुद्ध भले ही पुराने युद्धों जैसा न हो, लेकिन माहौल उतना ही खतरनाक है। कट्टर सोच वाले लोग न सिर्फ अपने विरोधियों को दबा रहे हैं, बल्कि ‘कैंसिल कल्चर’ को भी बढ़ावा दे रहे हैं। इससे समाज और देशों के बीच खाई बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि दुनिया के बड़े नेता भी इस स्थिति से चिंतित हैं। चर्चाएँ तो बहुत होती हैं, लेकिन कोई स्थाई हल नहीं निकलता। भागवत ने जोर देकर कहा कि अगर सभी लोग सिर्फ उपभोग और स्पर्धा के पीछे भागेंगे, तो दुनिया नष्ट होने की कगार पर पहुंच जाएगी। उन्होंने भारतीय दृष्टिकोण को दुनिया की जरूरत बताया, जिसमें ‘सबका भला’ की सोच है।

धर्म का असली मतलब और विश्व शांति

मोहन भागवत ने धर्म की सही परिभाषा बताई। उन्होंने कहा, “धर्म का मतलब सिर्फ पूजा-पाठ नहीं है। धर्म वह मार्ग है, जो इंसान को संतुलन और मोक्ष की ओर ले जाता है।” उन्होंने साफ किया कि धर्म में कन्वर्जन या धर्म परिवर्तन का कोई स्थान नहीं है। धर्म का काम है समाज को जोड़ना, न कि बाँटना। भागवत ने कहा कि भारतीय दृष्टिकोण ही दुनिया को एकजुट कर सकता है। अगर विश्व को स्थायी शांति चाहिए, तो धर्म के संतुलन को अपनाना होगा।

उन्होंने कहा कि भारत एक प्राचीन देश है। इसके नागरिकों को ऐसा जीवन जीना होगा कि दुनिया के लोग भारत से जीवन का ज्ञान लेने आएं। यही भारत का असली योगदान है। भागवत ने जोर देकर कहा कि हिंदुत्व का आधार सत्य और प्रेम है। यह सात्त्विक प्रेम ही संघ का मूल है, और यही सोच विश्व को शांति दे सकती है।

हिंदुत्व और भारतीयता का संदेश

भागवत ने हिंदुत्व को भारतीयता का पर्याय बताया। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व सिर्फ एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। यह सत्य, प्रेम और करुणा पर आधारित है। हिंदुत्व का मतलब है सभी को साथ लेकर चलना, न कि किसी को दबाना। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति हमेशा से समावेशी रही है। यही वजह है कि संघ का काम सिर्फ हिंदुओं तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे समाज और विश्व के कल्याण के लिए है।

भागवत ने यह भी कहा कि आज दुनिया में जो तनाव और अशांति है, उसका जवाब भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व में है। भारत का दर्शन ‘वसुधैव कुटुंबकम’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, को मानता है। यह सोच ही दुनिया को जोड़ सकती है। उन्होंने स्वयंसेवकों से आह्वान किया कि वे अपने काम में और मेहनत करें, ताकि भारत न सिर्फ आत्मनिर्भर बने, बल्कि विश्व को शांति और समृद्धि का रास्ता दिखाए।

संघ का भविष्य और चुनौतियाँ

मोहन भागवत ने यह भी कहा कि संघ को हमेशा से विरोध का सामना करना पड़ा है। फिर भी यह संगठन 100 सालों से मजबूती से खड़ा है। उन्होंने स्वयंसेवकों से कहा कि वे अपने ध्येय पर अडिग रहें। संघ का काम सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ना चाहिए। भागवत ने कहा कि अगर भारत मजबूत होगा, तो दुनिया को भी एक नई दिशा मिलेगी।

उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे संघ के विचारों को समझें और समाज में फैली बुराइयों को दूर करने में योगदान दें। भागवत ने यह भी कहा कि भारत को अपनी संस्कृति और परंपराओं पर गर्व करना चाहिए, लेकिन यह गर्व अहंकार में नहीं बदलना चाहिए। हमें दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना है, लेकिन अपनी पहचान को बनाए रखते हुए।

कभी अमेरिका कभी पाकिस्तान, लेकिन भारत पर राहुल गाँधी को नहीं है ऐतबार: बिहार में फिर बने विदेशी तोता, बदतमीजी भरे लहजे में कहा- ट्रंप के बोलते ही 5 घंटे में PM मोदी ने रोकी लड़ाई

सरकार के बार-बार कहने, संसद में बयान देने, सेना के खुले तौर पर बताने के बावजूद कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को भरोसा है, तो सिर्फ अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप पर, जो बार-बार सीजफायर का श्रेय लेने के लिए बेताब हैं। ट्रंप 40 से ज्यादा बार दुनिया को ये बता चुके हैं कि उन्होंने ही भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर कराया है, लेकिन भारत शुरू से ही कह रहा है कि पाकिस्तान ताबड़तोड़ हमले के बाद नाक रगड़ते हुए सीजफायर के लिए भारत से गुहार लगाई थी।

संसद के अंदर और बाहर सरकार स्थिति कर चुकी है साफ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संसद में आधिकारिक रूप से दो टूक कहा था कि सीजफायर के लिए सिर्फ पाकिस्तान के डीजीएमओ का फोन आया था। इसको लेकर किसी भी देश से कोई बात नहीं हुई। पीएम मोदी ने संसद में एक और खुलासा किया था कि 9 मई की रात जेडी वैंस का कई बार फोन आया था। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान भारत पर बहुत बड़ा हमला करने वाला है। पीएम मोदी ने उन्हें बता दिया था कि पाकिस्तान ऐसा करता है, तो वो बहुत बड़ी गलती करेगा। इसके बाद जो हुआ वो सबको पता है, बात खत्म।

राहुल गाँधी ने ट्रंप के दावे को दोहराया

लेकिन राहुल गाँधी की बात है जो खत्म ही नहीं होती। ट्रंप के बयान के बाद राहुल गाँधी का दावा सामने आ जाता है। बिहार में ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ के दौरान एक रैली में फिर उन्होंने दावा किया, “ट्रंप ने आज कहा कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था, तो मैंने फोन उठाया और नरेंद्र मोदी को बताया और कहा कि वह जो कुछ भी कर रहे हैं उसे 24 घंटे के भीतर बंद कर दें। नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे नहीं, बल्कि पाँच घंटे में सब कुछ बंद कर दिया।” उनके बोलने का अंदाज और भाषा शैली पर भी सवाल उठ रहे हैं।

राहुल गाँधी ने कहा, “ट्रंप ने मोदी से कहा- सुन जो तू ये कर रहा है, इसे 24 घंटे में बंद कर। जिसको नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे में बल्कि पाँच घंटों में बंद कर दिया।”

ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही राहुल गाँधी और उनकी कॉन्ग्रेस ट्रंप- ट्रंप का रट लगाए हुए है। उन्हें सेना के बयान पर भी विश्वास नहीं है। सेना ने खुले तौर पर कहा कि दोनों सेनाओं के डीजीएमओ स्तर पर बातचीत हुई और पाकिस्तान के कहने पर भारत ने हमले रोके।

हर आतंकी हमले को भारत मानेगा युद्ध

ये वही कॉन्ग्रेस है जिसके राज में मुंबई सीरियल ब्लास्ट, 26/11 जैसी घटनाएँ घटी, लेकिन डोजियर देने के अलावा कुछ नहीं कर सकी कॉन्ग्रेस सरकार। पाकिस्तान के प्रति सख्ती 2014 के बाद दिखलाई दी और पीएम मोदी ने पिछले 11 सालों में दुनिया को दिखाया कि भारत बदल गया है। अब तो मोदी सरकार ने ये भी घोषणा कर दी है कि पाकिस्तान की ओर से होने वाले आतंकी हमलों को भारत युद्ध की तरह मानेगा। यानी अगर अब आतंकी हमला होता है, तो भारत उसे छोड़ेगा नहीं।

ट्रंप का भारत-पाक युद्ध रुकवाने पर फिर बयान

बुधवार (27 अगस्त 2025) को अपनी कैबिनेट बैठक में रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के साथ बैठे डोनाल्ड ट्रंप ने बताना शुरू किया कि कैसे उन्होंने यूक्रेन-रूस संघर्ष में एक विश्व युद्ध को उन्होंने टाल दिया था और फिर बात को मोड़कर भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी से बातचीत होने का जिक्र किया।

ट्रंप ने कहा, “मैं एक शानदार व्यक्ति की बात कर रहा था, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। मैंने पूछा कि पाकिस्तान के साथ क्या चल रहा है। नफरत काफी थी और ये कई सालों से चल रहा है।”

ट्रंप ने अपना बात में आगे कहा, “मैंने उनसे कहा कि मैं आपके साथ कोई ट्रेड डील नहीं करूंगा। आप परमाणु युद्ध में उलझ जाएँगे। मैंने कहा, मुझे कल फोन करना। मैं आपके साथ कोई डील नहीं करूँगा या फिर इतना ज्यादा टैरिफ लगा दूँगा कि आपका सिर चकरा जाएगा।”

ट्रंप के मुताबिक, “भारत और पाकिस्तान के बीच जो स्थिति थी, उससे न्यक्लियर वॉर हो सकती थी। उन्होंने पहले ही 7 जेट मार गिराए थे, हालात बेहद खतरनाक थे। तब मैंने उनसे कहा – क्या आप व्यापार करना चाहते हैं? अगर आप लड़ाई जारी रखते हैं, तो अमेरिका आपके साथ कोई व्यापार या सहयोग नहीं करेगा। आपके पास इसे सुलझाने के लिए सिर्फ 24 घंटे हैं।” अगर ट्रंप की माने तो बातचीत के 5 घंटे के अंदर ही भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर हो गया।

ट्रंप का ये बयान उस समय आया है जब भारत पर नए टैरिफ नियम लागू हो गया है। इसके साथ ही अब भारतीय सामानों के आयात पर 50% टैरिफ लागू हो गया है। यानी व्यापार की जो धमकी देने का दावा ट्रंप कर रहे हैं, वह भारत पर नहीं चला। सरकार ने कई बार साफ किया है कि वो किसानों, पशुपालकों के हितों के खिलाफ कोई समझौता नहीं करेगी। अगर व्यापार के नाम पर सीजफायर होता, तो भारत अमेरिका के सामने अपनी शर्तों पर इस तरह अडिग नहीं रहता।

इस बीच दावा ये भी किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कई फोन कॉल्स को नजरअंदाज कर दिया। 50% टैरिफ दरों को लेकर भारत ने ‘अनुचित, अन्यायपूर्ण और अव्यवहारिक’ बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है। साथ ही अमेरिका को बार-बार यह संकेत दिया है कि वह रूस के साथ अपने संबंध बनाए रखेगा।

गौरतलब है कि पीएम मोदी जापान के दौरे पर हैं। इसके बाद वो चीन जाने वाले हैं जहाँ चीनी राष्ट्रपति शी जिंगपिंग के अलावा रूस के राष्ट्रपति पुतिन से भी मुलाकात होगी। इनकी बैठक पर दुनिया की नजर है। ये बैठक ट्रंप के टैरिफ को ‘फुस्स’ कर सकता है।

बरेली में फेल हुआ अब्दुल-सलमान, आरिफ-फहीम गैंग का इस्लामी खेल, नेत्रहीन प्रभात का खतना कर बना रहे थे ‘हामिद’: छांगुर के भी निकले बाप, कइयों का कराया धर्मांतरण

उत्तर प्रदेश के बरेली से एक सुनियोजित और संगठित धर्मांतरण गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। इस गिरोह ने नेत्रहीन प्रोफेसर प्रभात उपाध्याय को निकाह और बेहतरीन जिंदगी का लालच देकर फँसा लिया था। मदरसे में खतने की प्रक्रिया के दौरान ही पुलिस ने दबिश देकर उन्हें गैंग की साजिश नाकाम की। पुलिस ने 4 आरोपितों को गिरफ्तार किया है। आरोपितों के पास से ज़ाकिर नाइक की सीडी, धर्मांतरण प्रमाणपत्र, 22 बैंक खातों में संदिग्ध ट्रांजैक्शन और विदेशी फंडिंग से जुड़े सुराग मिले हैं।

पुलिस जाँच में सामने आया है कि गिरोह का नेटवर्क देश के कई राज्यों और 13 से ज्यादा प्रदेशों तक फैला है। गिरोह की सोशल मीडिया, कट्टरपंथी प्रचार और ‘हनी ट्रैप‘ हथकंडे भी सामने आए हैं।

कैसे खुला ये पूरा मामला?

सारा मामला तब सामने आया जब अलीगढ़ की एक महिला ने पुलिस में शिकायत की थी कि एक गिरोह ने उसके नेत्रहीन बेटे प्रभात उपाध्याय को बहकाकर अपने जाल में फँसा लिया है। इसके अलावा शादी और पैसे का लालच देकर अपने साथ ले गए है। प्रभात एक प्रोफेसर हैं।

जाँच के दौरान पुलिस को पता चला कि उसे बरेली के एक मदरसे में ले जाया गया था, जहाँ उसका जबरन खतना कराकर नाम ‘हामिद’ रखा जा रहा था। माँ की शिकायत पर पुलिस ने समय रहते छापा मारा और प्रभात को बचा लिया।

कैसे काम करता था यह गिरोह?

पुलिस ने मौके से अब्दुल मजीद, सलमान, आरिफ और फहीम को गिरफ्तार किया है। पूछताछ में पता चला कि यह गिरोह बहुत ही सोचे-समझे तरीके से काम करता था। पुलिस ने मौके से अब्दुल मजीद, सलमान, आरिफ और फहीम को गिरफ्तार किया है। पूछताछ में पता चला कि यह गिरोह बहुत ही सोचे-समझे तरीके से काम करता था। पहले ये कमजोर लोगों को निशाना बनाता है, जिसमें तलाकशुदा, परेशान या अकेले रहने वाले लोग शामिल होते हैं।

फिर उन लोगों को शादी, नौकरी या पैसों का लालच दिया जाता है। ये लोग सोशल मीडिया ग्रुप्स में जाकिर नाइक और दूसरे कट्टरपंथी मौलवियों के वीडियो और ऑडियो शेयर करते है। जब पीड़ित पूरी तरह से उनके जाल में फँस जाता है, तो उसे मदरसे में ले जाकर जबरन खतना और निकाह कराकर उसका धर्म परिवर्तन कर देते है।

पुलिस को इस गैंग के पास से मजहबी किताबें, जाकिर नाइक की सीडी और धर्मांतरण से जुड़े कई दस्तावेज भी मिले हैं। यह भी खुलासा हुआ है कि इस गिरोह ने पहले बृजपाल साहू और उनके परिवार का भी धर्मांतरण कराया था।

विदेशी फंडिंग का शक

गिरफ्तार किए गए आरोपितों के कुल 21 बैंक खाते मिले हैं। इनमें से अकेले सलमान के 12 बैंक खाते हैं, जिनमें उसकी हैसियत से कहीं ज़्यादा पैसे मिले हैं। अब्दुल मजीद के 5 खातों में 2,000 से ज़्यादा संदिग्ध लेनदेन पाए गए हैं।

पुलिस का मानना है कि ये लोग अलग-अलग राज्यों से चंदा इकट्ठा करते थे और इसी पैसे से धर्मांतरण का धंधा चलाते थे। इस बड़े लेन-देन को देखते हुए एजेंसियाँ पाकिस्तान समेत अन्य देशों से फंडिंग की संभावना की जाँच कर रही हैं।

एसपी साउथ अंशिका वर्मा ने बताया कि इस गिरोह का नेटवर्क सिर्फ बरेली तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई राज्यों में फैला हुआ है।

उन्होंने कहा कि पुलिस इस मामले में और भी लोगों को गिरफ्तार करेगी। इस घटना ने एक बार फिर से इस तरह के धर्मांतरण रैकेटों की गंभीरता को उजागर कर दिया है, जो हमारे समाज के लिए एक बड़ा खतरा हैं।

देवी हुईं प्रकट, महिषासुर का किया वध… सनातन से ही जुड़ा है उस ‘चामुंडेश्वरी पहाड़ी’ का इतिहास, जिस पर कर्नाटक के कॉन्ग्रेस नेता बोले- ये जगह सिर्फ हिंदुओं की नहीं…

कर्नाटक की राजनीति इन दिनों एक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन को लेकर गहराई तक हिल गई है। विश्व प्रसिद्ध मैसूर दशहरा महोत्सव, जो सदियों से आस्था और परंपरा का प्रतीक माना जाता है, अब सियासी बयानबाजी और धार्मिक विवाद का केंद्र बन गया है।

अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ लेखिका बानू मुश्ताक को दशहरा पूजा के उद्घाटन के लिए आमंत्रित करने और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के विवादास्पद बयान ने माहौल को राजनीतिक रूप दे दिया है।

डीके शिवकुमार ने दिया विवादित बयान

इसी बीच उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार का बयान विवाद को और गहरा ले गया। डीके ने कहा “चामुंडी पहाड़ी और चामुंडेश्वरी देवी केवल हिंदुओं की नहीं बल्कि सभी समुदायों की हैं। मंदिर किसी एक धर्म की संपत्ति नहीं है। यहाँ हर धर्म के लोग आकर अपनी श्रद्धा प्रकट कर सकते हैं। जिस तरह मैं गिरजाघरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों में जाता हूँ, वैसे ही किसी को भी हिंदू मंदिर आने से रोका नहीं जाता। अयोध्या राम मंदिर में भी ऐसा कोई नियम नहीं है कि केवल हिंदू ही जा सकते हैं।”

चामुंडी पहाड़ी और मंदिर का महत्व

मैसूर की चामुंडी पहाड़ी और यहाँ स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर का इतिहास एक हजार साल से भी पुराना माना जाता है। यह मंदिर शक्तिपीठ के रूप में दक्षिण भारत में विशेष पहचान रखता है। माना जाता है कि देवी चामुंडेश्वरी ने इसी स्थान पर महिषासुर का वध किया था और तभी से यह पहाड़ी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

मैसूर का दशहरा उत्सव चामुंडी देवी की पूजा से ही प्रारंभ होता है। यह परंपरा वाडियार शाही परिवार के शासनकाल से चली आ रही है और आज भी बड़ी श्रद्धा से निभाई जाती है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं और देवी की आराधना के साथ जंबू सवारी के भव्य जुलूस को देखते हैं। इस जुलूस में सजे-धजे हाथियों के साथ देवी की मूर्ति मैसूर महल से लेकर बन्नीमंतप तक ले जाई जाती है।

बानू मुश्ताक को न्योता भेजना बना विवाद कारण

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने घोषणा की कि इस बार 22 सितंबर 2025 को दशहरा महोत्सव का उद्घाटन बुकर पुरस्कार विजेता बानू मुश्ताक करेंगी। 77 साल की लेखिका मूल रूप से कर्नाटक के हासन की रहने वाली हैं और उनकी कृति हार्ट लैंप (अनुवाद: दीपा भाष्थी) को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है।

इस घोषणा ने राजनीतिक विवाद को जन्म दिया। भाजपा और हिंदू संगठनों का कहना है कि देवी चामुंडेश्वरी के पूजन जैसे धार्मिक अनुष्ठान में किसी ऐसे व्यक्ति को आमंत्रित करना उचित नहीं है जो हिंदू धर्म का पालन न करता हो। भाजपा का तर्क है कि यह आस्था और परंपरा से खिलवाड़ है, सरकार इस पवित्र आयोजन को तुष्टिकरण की राजनीति में बदल रही है।

भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया

राज्य भाजपा अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने शिवकुमार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस हिंदू परंपराओं का अपमान कर रही है। उन्होंने कहा की “पहले तुम कुत्ते की तरह भौंकते थे, अब मेंढक बन गए हो। अगर चामुंडी माता से खिलवाड़ करोगे तो राजनीतिक रूप से राख हो जाओगे।”

केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे ने भी कॉन्ग्रेस सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि दशहरा कोई राजनीतिक मंच नहीं बल्कि देवी चामुंडेश्वरी की भक्ति और परंपरा का पर्व है। किसी ऐसे व्यक्ति से पहली पूजा करवाना, जिसका देवी में विश्वास ही नहीं है, भक्तों की आस्था का अपमान है।

मैसूर के पूर्व सांसद और भाजपा नेता प्रताप सिम्हा ने भी सवाल उठाया कि क्या बानू मुश्ताक देवी चामुंडी में विश्वास करती हैं? अगर नहीं, तो उन्हें उद्घाटन के लिए आमंत्रित करना परंपरा के खिलाफ है।

मैसूर के सांसद और शाही परिवार के सदस्य यदुवीर कृष्णदत्त चामराज वाडियार ने भी शिवकुमार की टिप्पणी को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि चामुंडी मंदिर सदियों पुरानी आस्था और परंपरा का प्रतीक है।

इसे राजनीतिक विवाद में घसीटना इस धार्मिक विरासत की गरिमा को ठेस पहुँचाता है। वाडियार ने स्पष्ट किया कि दशहरा मूल रूप से हिंदू परंपराओं से जुड़ा उत्सव है और इसमें हस्तक्षेप से बचना चाहिए।

कॉन्ग्रेस सरकार का बचाव

विवाद गहराने के बाद कॉन्ग्रेस सरकार के मंत्री सामने आए। गृह मंत्री जी परमेश्वर ने कहा “दशहरा केवल धर्म का आयोजन नहीं, बल्कि एक राजकीय उत्सव भी है। अतीत में निसार अहमद और मिर्जा इस्माइल जैसे गैर-हिंदू भी दशहरा उद्घाटन में शामिल रहे हैं। इसमें राजनीति करना गलत है।”

मंत्री एच के पाटिल ने भी कहा कि दशहरा सभी समुदायों के लिए खुला उत्सव है। इसे किसी एक धर्म तक सीमित करना कर्नाटक की सांस्कृतिक विविधता के साथ अन्याय होगा। कॉन्ग्रेस का कहना है कि भाजपा इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर रही है।

कॉन्ग्रेस सांसद सैयद नसीर हुसैन ने कहा, “बानू मुश्ताक एक साहित्यिक हस्ती हैं। उन्हें बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। वह हमारे राज्य की प्रगतिशील लेखिकाओं में से एक हैं। अगर उन्हें किसी कार्यक्रम के उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया जाता है, तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मेरा मानना है कि जो लोग उन पर टिप्पणी कर रहे हैं, वे केवल उनके मजहबी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर ऐसा कर रहे हैं।”

इसके राजनीतिक असर की बात करे तो कर्नाटक में दशहरा उत्सव हमेशा से सांस्कृतिक गर्व और धार्मिक परंपरा का प्रतीक रहा है। लेकिन इस बार बानू मुश्ताक को आमंत्रित करने और डीके शिवकुमार के बयानों ने इसे राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। भाजपा जहाँ इसे हिंदू आस्था पर हमला बताकर आक्रामक हो गई है, वहीं कॉन्ग्रेस इसे सभी के लिए खुला राजकीय आयोजन बताकर बचाव कर रही है।

6000 वोट, जमानत जब्त, जनता को नहीं उतारनी चाहिए थी ऐसी आरती: पुराना वीडियो शेयर कर ट्रोल कर रही थी कॉन्ग्रेस की ‘FLOP’ नेत्री रागिनी नायक, पत्रकार चित्रा त्रिपाठी ने याद दिला दी ‘औकात’

हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर पत्रकार चित्रा त्रिपाठी और कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब रागिनी नायक ने चित्रा पर आरोप लगाते हुए एक पुराना वीडियो शेयर किया और उसमें बीजेपी का एजेंडा सेट करने वाला बताया। अब इस पोस्ट से शुरु हुआ विवाद ‘एंटरटेनमेंट विद पॉलिटिक्स’ बन गया है।

विवाद की शुरुआत

विवाद की शुरुआत होती है कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक के एक पुराने वीडियो पोस्ट से, जो उन्होंने 24 अगस्त 2025 को ‘X’ पोस्ट किया था। इस पोस्ट में रागिनी नायक ने आजतक चैनल के पुराने डिबेट का वीडियो डाला था। रागिनी नायक ने चित्रा त्रिपाठी पर ‘भाजपा का एजेंडा सेट करने’ और डिबेट में ‘भाजपा को कवर फायर देने‘ का आरोप लगाया गया था।

इसके जवाब में ABP की पत्रकार चित्रा त्रिपाठी ने 25 अगस्त 2025 को पोस्ट डाला। चित्रा त्रिपाठी ने पोस्ट में लिखा, “आपके कितने बुरे दिन आ गए हैं रागिनी जी, मुझे ट्रोल करने के लिये सालों पुराना वीडियो निकालना पड़ रहा है। मैं तो रोज डिबेट करती हूँ”

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक ने भी तुरंत पलटवार किया और कहा, “भाजपा के चरणचुंबक पत्रकारों को अब जनता खुद ही ट्रोल कर रही है।” इसके अलावा रागिनी नायक ने यह भी कहा कि वह चित्रा की डिबेट में बार-बार आकर उनके ‘संघी एजेंडे’ को उजागर करती रहेंगी।

बहस में राजनीति और चुनाव का ज़िक्र

यह बहस यहीं नहीं रुकी। 27 अगस् 2025 को चित्रा त्रिपाठी ने रागिनी नायक पर फिर से तंज कसा। चित्रा त्रिपाठी ने ‘X’ पर पोस्ट किया कि ट्रोलर्स के कारण ही रागिनी को वज़ीरपुर विधानसभा चुनाव में केवल 6,000 वोट मिले थे और उनकी जमानत जब्त हो गई थी।

फिलहाल, दोनों में से किसी ने इस बहस को खत्म करने का संकेत नहीं दिया है और मामला अब न्यूज डिबेट से ज्यादा सोशल मीडिया शो बनता जा रहा है।

आलोचना और सवालों से ऊपर क्यों रहना चाहते हैं मिलॉर्ड… आप भगवान तो नहीं: लोकतंत्र में जवाबदेही सबकी बनेगी, अमित शाह के बयान के बाद किया जा रहा था जस्टिस रेड्डी का बचाव

गृहमंत्री अमित शाह ने इंडी गठबंधन की ओर से उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार जस्टिस (रि) बी सुदर्शन रेड्डी को लेकर टिप्पणी की थी। इसके बाद कई पूर्व जजों और कार्यकर्ताओं की टोली जस्टिस (रि) बी सुदर्शन रेड्डी के बचाव में उतर आई थी। हालाँकि अब कुछ रिटायर्ड जजों के एक ग्रुप ने 26 अगस्त 2025 को चिट्ठी लिखकर साफ कर दिया है कि अमित शाह को निशाने पर लेने और रेड्डी के समर्थन में उतरने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि अमित शाह के बयान से न्यायपालिका खतरे में पड़ने नहीं जा रही।

ताज़ा पत्र में इन पूर्व जजों ने अपने साथियों को याद दिलाया कि जैसे ही कोई जज चुनावी मैदान में उतरता है, उसकी आलोचना होना स्वाभाविक है। इस जवाबी पत्र ने एक बड़ा सवाल उठाया कि आखिर मिलॉर्ड्स लोकतंत्र में आलोचना से ऊपर क्यों रहना चाहते हैं?

अमित शाह ने क्या कहा और क्यों?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 22 अगस्त 2025 को कोच्चि में मलयालम न्यूज़ चैनल मनोरमा के कार्यक्रम में पहुँचे थे। वहाँ उन्होंने कॉन्ग्रेस पर वामपंथी दबाव में झुककर जस्टिस रेड्डी को उपराष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने का आरोप लगाया। शाह ने इस फैसले को रेड्डी के उस अतीत से जोड़ा, जब उन्होंने जस्टिस एसएस निज्जर के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ में माओवादियों के खिलाफ तैनात सलवा जुडूम को भंग किया था।

अमित शाह ने कहा, “विपक्ष (कॉन्ग्रेस) के उपराष्ट्रपति उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी वही शख्स हैं, जिन्होंने वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद के समर्थन में सलवा जुडूम का फैसला दिया। अगर ऐसा नहीं हुआ होता, तो 2020 तक वामपंथी उग्रवाद खत्म हो गया होता।” उन्होंने केरल के लोगों को याद दिलाया कि उनका राज्य भी नक्सलवाद और उग्रवाद का दंश झेल चुका है। शाह ने तर्क दिया कि कॉन्ग्रेस ने अपने वामपंथी सहयोगियों के दबाव में ऐसे व्यक्ति को ऊँचा पद दिया, जिससे उसका असली वैचारिक झुकाव ज़ाहिर होता है।

शाह का हमला न्यायपालिका के खिलाफ कोई आम राग नहीं था। यह एक प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार के रिकॉर्ड पर सटीक राजनीतिक आलोचना थी, जो लोकतांत्रिक चुनावों में बिल्कुल सामान्य है।

जानें उस फैसले के बारे में, जिसकी बात हो रही है

आलोचना से जजों और कार्यकर्ताओं के समूह को इतनी चोट क्यों लगी, इसे समझने के लिए 2011 के सलवा जुडूम फैसले को देखना ज़रूरी है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस रेड्डी और निज्जर की बेंच ने छत्तीसगढ़ सरकार की उस नीति को रद्द कर दिया, जिसमें आदिवासी युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाकर माओवादियों से लड़ने के लिए हथियार दिए गए थे। नंदिनी सुंदर और अन्य वामपंथियों ने राज्य सरकार के इस फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। कोर्ट ने याचिका पर कार्रवाई की और सरकार को आदेश दिया कि वह इस बल को भंग करे, सभी हथियार वापस ले और युवाओं को माओवादी जवाबी हमलों से बचाए।

फैसले में यह भी कहा गया कि सलवा जुडूम या कोया कमांडो कहलाने वालों द्वारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघन और अपराधों की जाँच हो। बेंच ने साफ किया कि कोई भी समूह कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता या संविधान से बाहर काम नहीं कर सकता।

बेंच ने कहा था, “किसी बल की प्रभावशीलता यह तय करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती कि वह संवैधानिक रूप से जायज़ है।” उसने जोड़ा कि भले ही एसपीओ माओवादियों से लड़ने में कुछ हद तक प्रभावी थे, लेकिन इन ‘संदिग्ध फायदों’ की कीमत संवैधानिक उल्लंघनों और सामाजिक व्यवस्था को भारी नुकसान के रूप में चुकानी पड़ी।

यह फैसला राज्य सरकार और केंद्र के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि तमाम खामियों के बावजूद सलवा जुडूम माओवादियों के गढ़ में उनका मुकाबला करने का एकमात्र तरीका था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने सुरक्षा बलों को कमज़ोर कर दिया। शाह का तर्क सीधा है – अगर न्यायपालिका ने दखल न दिया होता, तो नक्सलवाद के खिलाफ जंग 2020 तक खत्म हो सकती थी।

मिलॉर्ड रेड्डी के बचाव में उतरे कई मिलॉर्ड

शाह के बयान के दो दिन बाद 24 अगस्त को कुछ रिटायर्ड जजों और कार्यकर्ताओं ने एक पत्र जारी कर शाह पर हमला बोला। उन्होंने शाह पर फैसले को ‘गलत तरीके से पेश करने’ का आरोप लगाया और ज़ोर देकर कहा कि उस फैसले ने कभी नक्सलवाद का समर्थन नहीं किया। उन्होंने नसीहत दी कि ऊँचे पदों के लिए प्रचार गरिमा के साथ और विचारधारा पर सवाल उठाए बिना करना चाहिए।

साभार: LegallySpeakingTarun/X

पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जैसे मदन लोकुर, जे. चेलमेश्वर, कुरियन जोसेफ, अभय ओका और एके पटनायक साथ ही हाई कोर्ट के पूर्व जज और कार्यकर्ता जैसे संजय हेगड़े और मोहन गोपाल शामिल थे। पत्र का लहजा काफी कड़ा था – कि एक नेता की हिम्मत कैसे हुई कि वो मिलॉर्ड के फैसले पर बयान दे दे। उन्होंने चेतावनी दी कि शाह के शब्दों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर ‘ठंडा असर’ पड़ सकता है। दूसरे शब्दों में मिलॉर्ड्स ने आलोचना से छूट माँगी, भले ही उनका एक साथी राजनीति के गंदे खेल में उतर चुका हो।

जवाबी प्रतिक्रिया में उतरे जज, जो सच देखते हैं

लेकिन जवाब जल्दी आया। रेड्डी के बचाव में उतरे जजों के काम से नाखुश कुछ और रिटायर्ड जज मैदान में उतने और अपना बयान जारी किया। उन्होंने कुछ रिटायर्ड जजों की उस आदत को उजागर किया, जिसमें वे न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आड़ में पक्षपात छिपाते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि जैसे ही जस्टिस रेड्डी ने उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ने का फैसला किया, वे राजनीति में उतर गए और उन्हें अपने रिकॉर्ड का बचाव करना होगा, जैसे बाकी उम्मीदवार करते हैं।

यह जवाबी बयान इसलिए अहम है, क्योंकि इसने यह धारणा तोड़ दी कि शाह की आलोचना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है। उन्होंने तर्क दिया कि आलोचना से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा नहीं होता। असल नुकसान तब होता है, जब रिटायर्ड जज बार-बार पक्षपातपूर्ण राजनीतिक बयान देते हैं, जिससे लगता है कि पूरी संस्था ही किसी एक राजनीतिक पक्ष के साथ खड़ी है।

साभार: X/Amit Malviya

एक तीखी बात में उन्होंने कहा कि कुछ जजों की गलती की वजह से पूरी जजों की बिरादरी को पक्षपातपूर्ण गिरोह के रूप में देखा जाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह न तो न्यायपालिका के लिए अच्छा है और न ही लोकतंत्र के लिए।

जजों की आलोचना लोकतंत्र का अपमान नहीं

यही असली मुद्दा है। रिटायर्ड या मौजूदा जज भगवान नहीं हैं। वे पैगंबर नहीं हैं। वे इंसान हैं, जिनके फैसलों ने लाखों लोगों की ज़िंदगी पर असर डाला। ऐसे फैसले खासकर जो राष्ट्रीय सुरक्षा नीति को बदल दें, ज़रूर उनकी आलोचना होगी। यही लोकतंत्र का सार है।

लेकिन भारत में मिलॉर्ड्स को लगता है कि वे ऐसी किसी भी आलोचना से परे हैं। उन्हें लगता है कि उनके फैसलों की आलोचना संविधान पर हमला है। इससे ज़्यादा अलोकतांत्रिक कुछ हो ही नहीं सकता। अगर राजनेता, नौकरशाह, जनरल और मीडिया की सार्वजनिक आलोचना होती है, तो राजनीति में उतर चुके जज को आलोचना से छूट चाहिए ही क्यों? फिर भी वो इसकी उम्मीद करते हैं।

अभिव्यक्ति की आज़ादी कोर्टरूम के दरवाज़े पर खत्म नहीं होती। बल्कि लोकतंत्र की माँग है कि नागरिकों की सुरक्षा पर असर डालने वाले फैसलों की खुलकर आलोचना हो। शाह का बयान भले ही राजनीतिक रूप से तीखा था, लेकिन यह माओवादी उग्रवाद के रास्ते पर एक पुराने फैसले के प्रभाव पर जायज़ टिप्पणी थी।

इसे ‘गलत व्याख्या’ या ‘ठंडा असर’ कहना, व्याख्या पर एकाधिकार की माँग है, जैसे कि केवल न्यायपालिका को ही अपने शब्दों को समझाने का हक है। यह पाखंड तब और साफ हो जाता है, जब रिटायर्ड जज खुद न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आड़ में राजनीतिक घोषणापत्र जारी करते हैं। एक तरफ किसी एक राजनीतिक खेमे के साथ पूरी तरह जुड़े पत्रों पर हस्ताक्षर करना और दूसरी तरफ यह शिकायत करना कि किसी राजनेता की आलोचना पक्षपातपूर्ण है – यह दोहरा खेल है और जनता भी इसे समझने लगी है।

लोकतंत्र का मतलब है सभी के लिए जवाबदेही

यह विवाद सिर्फ अमित शाह बनाम जस्टिस रेड्डी का नहीं है। यह लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका के बारे में है। जैसे ही जज राजनीति में कदम रखते हैं, उन्हें स्वीकार करना होगा कि उनके रिकॉर्ड की जाँच होगी। उनके फैसलों, खासकर जो राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों को बदलते हैं, की पड़ताल होगी और उनके वैचारिक झुकाव को जनता के सामने उजागर किया जाएगा। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला नहीं, बल्कि जवाबदेही की कीमत है।

न्यायपालिका सम्मान की हकदार है, लेकिन तभी जब वह राजनीति से ऊपर रहे। जब इसके रिटायर्ड सदस्य राजनीतिक किरदार की तरह व्यवहार करते हैं, तो वे आलोचना से छूट नहीं माँग सकते। अगर लोकतंत्र का कोई मतलब है, तो वह यह कि कोई भी संस्था या व्यक्ति सवालों से परे नहीं है।

तो मिलॉर्ड्स… जो लोग भी आलोचना होते ही हाय-तौबा मचाने लग जाते हैं, उन्हें याद दिला दिया जाए कि ‘आप भगवान नहीं हैं’ और न ही आप सवालों से परे हैं। क्योंकि लोकतंत्र आपके हिसाब से काम नहीं करता, बल्कि वो जनता के हिसाब से काम करता है।

इस लेख को मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें। इसका अनुवाद श्रवण शुक्ल ने किया है।

वित्तीय धोखाधड़ी के लिए ओडिशा ट्रस्ट का इस्तेमाल, कॉर्पोरेट दलालों को फायदा पहुँचाने के लिए पूछे सवाल: पूर्व सांसद पिनाकी मिश्रा के खिलाफ 2 शिकायतें दर्ज, पढ़ें सारी डिटेल

पूर्व सांसद और वरिष्ठ वकील पिनाकी मिश्रा के खिलाफ दो शिकायतें 25 अगस्त 2025 को ऑपइंडिया के हाथ लगी। ये गृह मंत्रालय और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) में दर्ज की गई थी। ये राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है। एक शिकायत में वित्तीय अनियमितताओं और संपत्ति के लेन-देन का ब्यौरा था, जबकि दूसरी शिकायत में संसद में उनके आचरण को लेकर जानकारी दी गई थी।

संसद में उन्होंने देश की सबसे संवेदनशील रक्षा संपत्तियों पर बार-बार सवाल पूछे थे। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि ये मामले राष्ट्रीय सुरक्षा और कॉर्पोरेट हितों के टकराव से जुड़े हैं। शिकायत दो भागों में है। एक में संपत्तियों की खरीद-फरोख्त और वित्तीय लेन-देन में कथित अनियमितता की बात कही गई है। जबकि दूसरी शिकायत संसद में मिश्रा के पूछे गए सवालों और उनकी गतिविधियों से जुड़ा है। संसद में उन्होंने भारत की परमाणु पनडुब्बियों, मिसाइल प्रणालियों और प्रमुख रक्षा सौदों से जुड़े कई सवाल पूछे थे।

इन दोनों मामलों को मिला कर देखा जाए, तो ये बेहद संगीन नजर आता है। इसकी जाँच की जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि दोनों शिकायतों को संबंधित अधिकारियों ने स्वीकार कर लिया है और इन मामलों में आगे की जाँच शुरू कर दी गई है। शिकायतकर्ता ने पिनाकी मिश्रा और उनकी पत्नी महुआ मोइत्रा के गलत कार्यों के बीच समानताएँ भी बताई हैं। महुआ मोइत्रा पर संसद में व्यवसायी गौतम अडानी को निशाना बनाकर सवाल पूछकर एक दूसरे व्यवसायी की मदद करने का आरोप था।

वित्तीय अनियमितता, संपत्ति अधिग्रहण का मामला

शिकायतकर्ता ने मिश्रा के वित्तीय लेन-देन और संपत्ति अधिग्रहण पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने उनके पिछले संबंधों, खास कर चंद्रास्वामी को लेकर सवाल पूछे हैं।

शिकायतकर्ता ने बताया कि कैसे दिल्ली के गोल्फ लिंक्स और जोर बाग स्थित दो प्रमुख संपत्तियों को हासिल किया गया। इन संपत्तियों को खरीदा नहीं गया, बल्कि कंपनी के शेयरों की खरीद के जरिए हासिल किया गया। बताया जाता है कि बंगलों को सीधे रिजिस्ट्री कराने के बजाय, मिश्रा ने होल्डिंग कंपनियों, जुपिटर एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड और व्हाइट लिली एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड का अधिग्रहण कर लिया। ये तीनों नरेंद्रजीत कोली नाम के एक ही व्यक्ति से खरीदा गया था।

शिकायतकर्ता ने इसके पीछे की मंशा को लेकर कहा कि संपत्तियों की खरीब-फरोख्त इस तरह से की गई, ताकि मिश्रा जाँच से बच जाएँ। इनकी खरीद की टाइमिंग पर सवाल खड़े करते हुए कहा गया है कि उस वक्त मिश्रा अपेक्षाकृत युवा वकील थे। दिल्ली हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक उनकी संपत्ति कम थी और आय कुछ लाख रुपए थी।

2017 में मिश्रा और उनकी पूर्व पत्नी संगीता मिश्रा से जुड़े इनकम टैक्स के मामले में, कोर्ट ने पाया कि उनकी घोषित आय से इतनी महँगी संपत्ति खरीदना तर्कसंगत नहीं लगता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इनकम टैक्स अधिकारियों ने हांगकांग के एक व्यक्ति द्वारा संगीता मिश्रा के खाते में भेजे गए 3,05,000 अमेरिकी डॉलर के धन का पता चला। इसे ‘प्रेम और स्नेह’ से दिए गए ‘गिफ्ट’ के तौर पर दिखाया गया था। जिस पर टैक्स नहीं लगा था।

शिकायतकर्ता ने तर्क दिया कि कोई विदेशी, बगैर व्यावसायिक लाभ के इतनी बड़ी रकम क्यों किसी को देगा? उससे कोई सीधा पारिवारिक संबंध भी नहीं था। ये स्थिति असंभव तो नहीं, लेकिन संदिग्ध जरूर है। ‘गिफ्ट’ को सही ठहराने के लिए दायर हलफनामे ने संदेह और गहरा गया। ये कोई साधारण अनियमितता या तकनीकी खामी नहीं थीं, बल्कि ऐसे लेन-देन थे, जिनकी आधिकारिक जाँच बेहद जरूरी था।

शिकायत में मिश्रा के चंद्रास्वामी के साथ लंबे समय से जुड़े होने का भी जिक्र किया गया है । 1980 और 1990 के दशक में चंद्रास्वामी का संबंध राजनेताओं, व्यापारियों और अंतरराष्ट्रीय हस्तियों से था। विवादास्पद हथियार डीलर अदनान खशोगी से भी उनके करीबी रिश्ते थे। ऑपइंडिया को शिकायतकर्ता के दर्ज कराए गए दस्तावेज की कॉपी मिली है। इससे पता चलता है कि मिश्रा 1983 में स्नातक होने के तुरंत बाद चंद्रास्वामी के वकील बन गए और एक दशक से भी ज्यादा समय तक उनके साथ जुड़े रहे।

शिकायतकर्ता के अनुसार, मिश्रा ने चंद्रास्वामी के साथ कम से कम 22 विदेश यात्राएँ की। इनमें लंदन और न्यूयॉर्क की यात्राएँ शामिल हैं, जहाँ चंद्रास्वामी के वित्तीय लेन-देन और विवादास्पद व्यक्तियों के साथ मेलजोल होता था।

शिकायतकर्ता ने 1996 में पड़े इनकम टैक्स छापे का भी जिक्र किया। इसमें मिश्रा से साबित नहीं कर पाए कि उन्होंने विदेश यात्राएँ अपने कानूनी काम के लिए की थी। लगभग उसी समय, मिश्रा के चाचा रंगनाथ मिश्रा भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। मिश्रा ने खुद दावा किया था कि उन्होंने कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के विशेष कार्य अधिकारी के रूप में काम किया था। पारिवारिक प्रभाव, पेशेवर संबंधों और बेहिसाब संपत्ति के इस गठजोड़ ने शिकायतकर्ता के संदेह को और बढ़ा दिया।

अपने संस्मरणों में, पूर्व सीबीआई अधिकारी निर्मल कुमार सिंह ने चंद्रास्वामी के खिलाफ जाँच में बाधा डालने में मिश्रा की कथित भूमिका के बारे में बताया है। इसमें अधिकारियों को आश्रम में प्रवेश करने से रोकना, केस फाइलें हासिल करना और गवाहों को धमकाना जैसी बातें शामिल हैं। शिकायतकर्ता ने जाँच में बाधा डालने से लेकर इनकम टैक्स और संपत्तियों का मालिकाना हक और अदालती रिकॉर्ड की जानकारी, यह तर्क देने के लिए दिया है कि मिश्रा के पूरे करियर में संदिग्ध वित्तीय और व्यावसायिक लेन-देन एक पैटर्न रहा है।

संसद में मिश्रा के पूछे गए सवाल

दूसरी शिकायत मिश्रा की सांसद के रूप में भूमिका पर केन्द्रित है। इसमें लोकसभा में उनके चार कार्यकालों में उठाए गए छह सौ से ज्यादा सवालों का रिकॉर्ड शामिल है। इनमें से काफी सवाल भारत की सैन्य तैयारियों और रक्षा खरीद से जुड़े थे। हालाँकि सांसदों द्वारा सरकार से शासन, बजट और विकास के बारे में सवाल पूछना आम बात है, लेकिन मिश्रा के सवाल बेहद संवेदनशील क्षेत्रों से जुड़े तकनीकी जानकारियों से भरे थे।

शिकायतकर्ता ने मिश्रा द्वारा पूछे गए उन सवालों का उदाहरण दिया, जिनमें उन्होंने आईएनएस अरिहंत और आईएनएस चक्र सहित भारत की परमाणु ऊर्जा संचालित पनडुब्बियों की परिचालन स्थिति के बारे में जानकारी माँगी थी। एक सवाल में उन्होंने आईएनएस अरिहंत को हुए नुकसान, मरम्मत की अनुमानित लागत और इसे समुद्र में चलने लायक बनाने की समय-सीमा के बारे में पूछा था। इसका सरकार ने ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के आधार पर उत्तर देने से इनकार कर दिया था। एक अन्य प्रश्न में, उन्होंने आईएनएस चक्र के बारे में भी ऐसी ही जानकारी मांगी थी।

इसके अलावा, उन्होंने फ्रांस के साथ राफेल सौदा, वियतनाम के साथ सुखोई-30 विमानों के पायलट प्रशिक्षण कार्यक्रम और पुराने रक्षा उपकरणों के कथित उपयोग पर भी सवाल पूछे थे। शिकायत के अनुसार, इन सवालों की विशिष्टता से पता चलता है कि ये व्यापक नीतिगत स्पष्टीकरण प्राप्त करने के बजाय संवेदनशील जानकारी प्राप्त करने के लिए तैयार किए गए थे। इसलिए, शिकायतकर्ता ने तर्क दिया कि ये संवेदनशील जानकारी प्राप्त करने का प्रयास था।

रक्षा प्रश्न और कथित रूस-विरोधी झुकाव

ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त किए गए डॉसियर से पता चलता है कि संसद में मिश्रा ने एक तरह के सवाल ज्यादा पूछे। कई प्रश्न रूस से प्राप्त रक्षा प्रणालियों पर केंद्रित थे। इससे रूस-विरोधी रुझान का पता चलता है। उन्होंने बार-बार पट्टे पर ली गई पनडुब्बी आईएनएस चक्र को लेकर सवाल, एटीवी कार्यक्रम की स्थिति, रूस से प्राप्त किए गए एस-400 वायु रक्षा प्रणाली के बारे में सवाल पूछे।

उन्होंने ये भी पूछा कि क्या अमेरिका ने भारत द्वारा एस-400 प्रणाली की खरीद पर आपत्ति जताई थी? एक अन्य प्रश्न में, उन्होंने सौदे से जुड़ी जानकारी माँगी। इसमें किश्तें और कितना भुगतान किया गया, यह भी शामिल था। शिकायतकर्ता ने बताया कि पूछताछ का तरीका अमेरिकी हथियार निर्माताओं की माँग के अनुरूप था। ये लोग भारत को THAAD और पैट्रियट जैसी प्रणालियाँ बेचना चाहते थे।

इसके अलावा, बजटीय आवंटन के बारे में भी सवाल थे। उदाहरण के लिए, उन्होंने पूछा कि क्या भारत के रक्षा बजट में पिछले हथियार सौदों के भुगतान को शामिल किया गया है? और नए हथियारों की खरीद के लिए कितनी राशि बची है। शिकायतकर्ता ने तर्क दिया कि अगर ऐसे सवालों के विस्तार से जवाब दिए जाएँ, तो विदेशी ताकतों को भारत की खरीद प्राथमिकताओं का रोडमैप मिल सकता है। बार-बार पूछे गए ये सवाल ये दर्शाते हैं कि आगे जाँच जरूरी है।

कॉर्पोरेट संबंध और सवाल

शिकायतकर्ता ने कॉर्पोरेट हितों के टकराव का भी आरोप लगाया है। मिश्रा जब कोयला, बिजली और इस्पात क्षेत्रों की कई संस्थाओं के जब वकील थे, उस वक्त संसद में कोयला भंडारों, बिजली संयंत्रों और सरकारी खदानों में कोयला माफियाओं की भूमिका पर सवाल पूछे थे।

2015 और 2017 के बीच, मिश्रा ने कोयला खदानों के आधुनिकीकरण, लोडिंग-अनलोडिंग के दौरान चोरी और कोयला प्रबंधन में माफिया तत्वों के हस्तक्षेप के बारे में सवाल उठाए। शिकायतकर्ता ने कहा कि ये सवाल उन मामलों से काफी मिलते-जुलते हैं , जिन पर वह कोर्ट में जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड सहित इस क्षेत्र की कंपनियों के वकील के रूप में बहस कर रहे थे।

ये बात सिर्फ कोयले तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने विमानन क्षेत्र से जुड़े कई सवाल भी पूछे, जिनमें एयरलाइन रूट, हवाई अड्डों का विस्तार और सीप्लेन को बढ़ावा देना शामिल था। वहीं दूसरी ओर वह ब्रैडी एयर प्राइवेट लिमिटेड और ब्रैडी एंड मॉरिस इंजीनियरिंग जैसी कंपनियों के निदेशक के रूप में भी काम किया। इन कंपनियों की विमानन और बुनियादी ढाँचे में हिस्सेदारी थी।

शिकायतकर्ता ने दावा किया कि सांसद और कॉर्पोरेट के प्रतिनिधि के रूप में दोहरी भूमिका, संसदीय विशेषाधिकारों का दुरुपयोग है।

शिकायतकर्ता द्वारा उठाए गए प्रश्न

शिकायतकर्ता ने मिश्रा के खिलाफ अपने आरोपों के समर्थन में 13 सवाल उठाए। शिकायतकर्ता के अनुसार, मिश्रा ने अपने संसदीय पद का इस्तेमाल करके संवेदनशील जानकारी हासिल करने की शुरुआत अपने पहले संसदीय कार्यकाल से ही शुरू कर दिया था।

अगस्त 1996 में, उन्होंने लोकसभा में गृह मंत्री से उस वर्ष जून में दिल्ली में बरामद आरडीएक्स और हथियारों के बारे में पूछा था। सरकार ने एके-56 राइफलों, ग्रेनेड, टाइमर और आरडीएक्स सहित बरामदगी की जानकारी दी और पुष्टि की कि गिरफ्तारियाँ की गईं और कानूनी कार्रवाई की गई। शिकायतकर्ता ने उनके इस इरादे पर सवाल उठाया, क्योंकि मिश्रा उस वक्त चल रही आतंकवाद-रोधी जाँच की जानकारी माँग रहे थे। ऐसी जानकारी आम तौर पर संवेदनशील मानी जाती है। एजेंसियाँ न्यायिक कार्यवाही पूरी होने तक इसका खुलासा नहीं करती हैं।

उसी साल जुलाई में, मिश्रा ने प्रधानमंत्री से यह भी पूछा था कि क्या सरकार ने दाभोल बिजली परियोजनाओं के लिए एनरॉन के साथ संशोधित समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं और उससे जुड़ी विस्तृत जानकारी भी दी है। हालाँकि सरकार ने जानकारी उपलब्ध करा दी थी, लेकिन शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया कि पुरी का एक सांसद महाराष्ट्र की एक विवादास्पद बिजली परियोजना पर सवाल क्यों कर रहा है?

2017 की बात करें, तो मार्च में मिश्रा ने रक्षा मंत्रालय से पूछा था कि क्या वियतनामी लड़ाकू पायलटों को भारत में सुखोई-30 एमकेआई विमानों पर प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्होंने प्रशिक्षित किए जाने वाले पायलटों की संख्या, प्रशिक्षण की अवधि पर सवाल पूछा। साथ ही पूछा कि क्या भारतीय लड़ाकू पायलटों को विदेश में उन जेट विमानों पर प्रशिक्षित किया जाएगा जिन्हें सरकार खरीदने का प्रस्ताव रखती है। हालाँकि सरकार ने जानकारी दी थी कि भारत और वियतनाम, वियतनामी वायु सेना के कर्मियों को सुखोई-30 विमानों पर प्रशिक्षण देने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने पर सहमत हो गए हैं। लेकिन, शिकायतकर्ता ने चिंता जताई कि मिश्रा के प्रश्न में प्रशिक्षण की संख्या और अवधि सहित सटीक परिचालन विवरण मांगा गया था। ऐसी जानकारी संवेदनशील होती है और आमतौर पर संसद में नहीं उठाई जाती।

फरवरी 2018 में, पिनाकी मिश्रा ने विदेश मंत्रालय से पूछा था कि क्या उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण के बाद भारत पर अमेरिका का दबाव था कि वह प्योंगयांग के साथ अपने संबंधों को कम करे। उन्होंने आगे पूछा था कि क्या सरकार ने उत्तर कोरिया से अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को वापस लेने का आग्रह किया था, क्या भारत इस मुद्दे को सुलझाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से बातचीत कर रहा था। इसके क्या रिजल्ट थे।

सरकार ने जवाब दिया कि भारत उत्तर कोरिया की गतिविधियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंताओं से सहमत है। सरकार ने यह भी कहा कि भारत ने उत्तर कोरिया से ऐसी कार्रवाइयों से बचने का आह्वान किया है। शिकायतकर्ता ने चिंता जताई कि मिश्रा की पूछताछ का उद्देश्य उत्तर कोरिया, अमेरिका और वैश्विक परमाणु अप्रसार ढाँचे से जुड़ी संवेदनशील वार्ताओं में भारत की कूटनीतिक स्थिति की जाँच करना था, जो कुल मिलाकर रणनीतिक रूप से अहम हैं।

मार्च 2018 में, मिश्रा ने रक्षा मंत्रालय से पूछा था कि क्या आईएनएस चक्र को भारी नुकसान पहुँचा है और उसे ड्राई-डॉक में रखा गया है। उन्होंने आगे यह भी पूछा कि क्या नुकसान का आकलन किया गया है, उसकी सीमा क्या है, मरम्मत की अनुमानित लागत कितनी है, और पनडुब्बी कब तक फिर से समुद्र में उतरने के लिए तैयार हो जाएगी।

मार्च 2018 में ही, उन्होंने मंत्रालय से आईएनएस अरिहंत को हुए नुकसान के बारे में फिर से पूछा। उन्होंने विशेष रूप से मरम्मत की अनुमानित लागत और उस समय-सीमा का विवरण माँगा जिसके भीतर पनडुब्बी की मरम्मत की जाएगी और उसे पूरी परिचालन क्षमता के साथ फिर से सेवा में लाया जाएगा। मंत्रालय ने दोनों ही सवालों का जवाब नहीं दिया और कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में ऐसी जानकारी का खुलासा नहीं किया जा सकता। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि अगर सरकार ने जवाब दिया होता, तो यह जानकारी विरोधी शक्तियों के लिए बहुत मूल्यवान हो सकती थी। एक तरह से, मिश्रा ने वैध संसदीय निगरानी से कहीं आगे जाकर गोपनीय रक्षा क्षमता के क्षेत्रों में भी दखल दिया।

फिर अप्रैल 2018 में, मिश्रा ने रक्षा मंत्रालय से 2018-19 के बजट में नई हथियार प्रणालियों और आधुनिकीकरण के लिए बजटीय आवंटन का विवरण मांगा । उन्होंने आगे यह भी पूछा कि क्या इस आवंटन में पहले के हथियार सौदों की किश्तें शामिल हैं और यदि हाँ, तो उसका विवरण भी। साथ ही पूछा कि भारतीय सेना के लिए नई खरीद के लिए कितने पैसे बचे हुए हैं। सरकार ने ये जानकारी दी, लेकिन शिकायतकर्ता ने दावा किया कि भारत की रक्षा खरीद योजना के सटीक आंकड़ों की जानकारी माँगने वाले ऐसे प्रश्न संवेदनशील हैं और हमारी प्राथमिकताओं को बताते हैं। ये जानकारियाँ विदेशी हथियार आपूर्तिकर्ताओं और विरोधी संस्थाओं के लिए काम की हो सकती हैं।

जुलाई 2018 में, उन्होंने रक्षा मंत्रालय से पूछा था कि क्या आधुनिकीकरण के लिए 86,488 करोड़ रुपए सहित बजट में 6% की वृद्धि से रक्षा तैयारियाँ ठप हो जाएँगी। उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या चीन का रक्षा बजट भारत के बजट से लगभग तिगुना है और सरकार सीमित वृद्धि के साथ सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण की योजना कैसे बना रही है। इसकी जानकारी भी उपलब्ध कराई गई थी। शिकायतकर्ता ने जोर देकर कहा कि प्रश्न इस तरह से तैयार किए गए थे कि उन्हें एक संवेदनशील राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दा माना जा सकता है।

अगस्त 2015 में, मिश्रा और अन्य सांसदों ने रक्षा मंत्रालय से पिछले तीन वर्षों और चालू वर्ष में उग्रवाद, आतंकवाद और सीमा पार गोलीबारी में मारे गए सुरक्षाकर्मियों की संख्या के बारे में पूछा था। उन्होंने आगे यह भी पूछा कि क्या सरकार ने इन हताहतों के कारणों का विश्लेषण किया है, क्या परिवारों को मुआवज़ा दिया गया है, कारगिल युद्ध के बाद से कितने रक्षा सौदे किए गए हैं, और घुसपैठ और आतंकवाद से निपटने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। सरकार ने इनकी जानकारियाँ भी दी थी। शिकायतकर्ता ने कहा कि इस तरह के प्रश्नों में विस्तृत खरीद आवश्यकताओं और परिचालन कमजोरियों के बारे में पूछा गया था। अगर पूरी जानकारी का खुलासा किया जाए, तो इससे भारत की कमियों का पता चल सकता है और रक्षा लॉबिस्टों को इससे मदद मिल सकती है।

अगस्त 2016 में, मिश्रा और दो अन्य सांसदों ने रक्षा मंत्रालय से पूछा था कि क्या फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए मूल्य निर्धारण और संबंधित मुद्दों पर बातचीत पूरी हो गई है। उन्होंने वर्तमान स्थिति, बातचीत पूरी होने और विमानों की आपूर्ति की समय-सीमा और भारतीय वायु सेना में फाइटर विमानों की कमी को दूर करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी माँगी। इसे भी सरकार ने उपलब्ध कराया। लेकिन, शिकायतकर्ता ने दावा किया कि ऐसे सवालों से भारत की बातचीत की स्थिति और विरोधियों के सामने उसकी परिचालन क्षमताएँ उजागर हो सकती थीं।

मार्च 2018 में, मिश्रा और अन्य सांसदों ने जहाजरानी मंत्रालय से पूछा था कि क्या ईरान में चाबहार बंदरगाह के चालू होने से भारत के व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। किन देशों के साथ भारत के व्यापार विस्तार की संभावना है। उन्होंने आगे उन उत्पादों का विवरण माँगा जिनसे लाभ होने की उम्मीद है। हालाँकि जानकारी प्रदान की गई थी, लेकिन शिकायतकर्ता ने कहा कि इस तरह के विस्तृत खुलासे, अगर दुरुपयोग किए गए, तो भारत की रणनीतिक कमजोरियों को उजागर कर सकते हैं और लॉबिंग के हितों को बढ़ावा दे सकते हैं।

जुलाई 2019 में, मिश्रा और तीन सांसदों ने पूछा था कि क्या सरकार रूस की एस-400 प्रणाली खरीदने की योजना बना रही है और इसकी लागत और अन्य देशों द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं जैसे विवरण मांगे थे। हालाँकि जानकारी प्रदान की गई थी, और सरकार ने यह भी कहा था कि भारत खतरे की आशंका, परिचालन और तकनीकी पहलुओं के आधार पर संप्रभु निर्णय लेता है। शिकायतकर्ता ने कहा कि किसी रणनीतिक खरीद से जुड़ी लागत और तीसरे देश के दबाव के विवरण जैसे प्रश्न, विदेशी आपत्तियों को बढ़ा सकते हैं।

दिसंबर 2019 में, मिश्रा ने महत्वपूर्ण हथियारों के स्वदेशीकरण, रक्षा निर्यात को बढ़ावा देने की योजनाओं और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करने के उपायों के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के बारे में पूछा था । सरकार ने जानकारी उपलब्ध कराई। हालाँकि, शिकायतकर्ता ने दावा किया कि इस तरह के विस्तृत खुलासे से हथियारों की खरीद फरोख्त की प्राथमिकताओं का पता चल सकता है।

दिसंबर 2022 में, मिश्रा ने खान मंत्रालय से पूछा था कि क्या खनिजों की रॉयल्टी दरों की समीक्षा के लिए गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है, उस पर क्या कार्रवाई की गई है, क्या सरकार ने रॉयल्टी दरों में संशोधन के लिए कोई समय-सीमा तय की है, और यदि नहीं, तो इसके क्या कारण हैं। सरकार ने यह जानकारी उपलब्ध कराई थी। हालाँकि, शिकायतकर्ता ने दावा किया कि कोयला और खनिज रॉयल्टी संशोधन पर उनके द्वारा माँगी गई विस्तृत जानकारी कोर्पोरेट को फायदा पहुँचाने की तरकीब थी, क्योंकि वह प्रमुख खनन कंपनियों के वकील के रूप में भी पेश हुए थे।

विद्या ज्योति ट्रस्ट और मनी लॉन्ड्रिंग का मामला

कटक में दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस) कलिंगा का संचालन करने वाले विद्या ज्योति ट्रस्ट के संबंध में आयकर महानिदेशालय (डीजीआईटी) को दी गई अपनी शिकायत में शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि ट्रस्ट को आय कर अधिनियम की धारा 12ए के तहत छूट प्राप्त है, लेकिन इसका उपयोग कर चोरी और काले धन को वैध बनाने के लिए किया गया है।

इस ट्रस्ट की स्थापना 2001 में महिमानंद मिश्रा और माला मिश्रा ने की थी। इसके ट्रस्टी पिनाकी मिश्रा, उनकी पूर्व पत्नी संगीता मिश्रा और महिमानंद मिश्रा के बेटे चर्चित और चंदन मिश्रा थे। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि वित्त वर्ष 2015-16 और वित्त वर्ष 2024-25 के बीच स्कूलों के बैंक खातों में सालाना 1 करोड़ रुपये से लेकर 12 करोड़ रुपये तक की बड़ी नकदी जमा की गई। गौरतलब है कि नोटबंदी वाले साल, वित्त वर्ष 2016-17 में लगभग 8 करोड़ रुपये जमा किए गए थे, जिसके बारे में शिकायतकर्ता ने तर्क दिया कि यह बेहिसाब धन को सफेद करने की जानबूझकर की गई मंशा को दर्शाता है।

लगभग 3,000 छात्रों के नामांकन वाले इस स्कूल की वार्षिक फीस प्रति बच्चा 1.2-2 लाख रुपए है। यानी इसका औसत कारोबार 40-50 करोड़ रुपये प्रति वर्ष है। हालाँकि, शिकायत में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि घोषित आय लगातार 40 करोड़ रुपये से कम रही, जो पैसों को छिपाने और ट्रस्टियों के लाभ के लिए धन के दुरुपयोग का दर्शाता है। इसमें आगे आरोप लगाया गया है कि ट्रस्ट ने वेतन, विज्ञापन और रखरखाव जैसे खर्चों के लिए आय के उपयोग का दावा किया, लेकिन एक दशक तक सालाना 20-30 करोड़ रुपए के भुगतान पर टीडीएस नहीं काटा गया।

शिकायतकर्ता ने तर्क दिया कि ट्रस्टी माला और संगीता को “पेशेवर शुल्क” के रूप में सीधे पैसे ट्रांसफर किए गए थे। शिकायत में इन्हें अधिनियम की धारा 13(3) का उल्लंघन बताते हुए फर्जी लेनदेन बताया गया है।

इसके अलावा, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि पिनाकी मिश्रा ने इनकम टैक्स की घोषणाओं में संपत्तियों का कम मूल्यांकन कर, संदिग्ध तरीकों से 300 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की संपत्तियां और कलाकृतियाँ अर्जित कीं। इसमें विशेष रूप से 80 करोड़ रुपए की कलाकृतियों की ओर इशारा किया गया, लेकिन उनकी कीमत केवल 6-8 करोड़ रुपये बताई गई। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि वित्त वर्ष 2020-21 में, मिश्रा ने अपने बेटे धनराज मिश्रा के नाम पर लंदन में एक संपत्ति खरीदने के लिए हवाला के माध्यम से पैसे भेजने के लिए जोर बाग की एक संपत्ति बाजार मूल्य से कम पर बेच दी।

ये शिकायतें दर्शाती हैं कि मामला सिर्फ वित्तीय या कॉर्पोरेट विवादों का नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। भारत की परमाणु संपत्तियों, मिसाइल प्रणालियों और रक्षा सौदों पर बार-बार ध्यान केंद्रित करना इस बात का सबूत है कि संसदीय विशेषाधिकार का दुरुपयोग किया गया है।

(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

गाजीपुर मंडी से गया ‘सड़ा’ मांस होता है जम्मू-कश्मीर के रेस्टोरेंट्स में इस्तेमाल, केमिकल पोतकर दिखाते हैं फ्रेश: FDA ने 12000 किलो मीट पकड़ा, दुकान-होटलों के लाइसेंस रद्द

जम्मू-कश्मीर में खाने-पीने की चीजों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। यहां सड़ा हुआ मांस, नकली पनीर और एक्सपायर मिठाइयाँ बेची जा रही थीं। कुछ दिन पहले प्रशासन ने भारी मात्रा में सड़ा और बासी मांस जब्त किया था। ये मांस त्योहारों के मौके पर होटलों और रेस्टोरेंट्स में सप्लाई किया जाना था।

अगस्त की शुरुआत से अब तक जम्मू-कश्मीर की फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने 12,000 किलो से ज़्यादा एक्सपायर मछली और चिकन पकड़ा है। इन सभी को नष्ट कर दिया गया है। यह मामला सामने आने के बाद लोगों में गुस्सा है और प्रशासन पर सवाल उठ रहे हैं।

इस घटना के बाद खाने की चीजों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा हो गई है। अब स्थानीय लोग और पर्यटक रेस्टोरेंट में मांस से बनी चीजें जैसे वजवान खाना छोड़ रहे हैं। इसकी जगह लोग अब डोसा, राजमा चावल जैसी शाकाहारी चीजें खाना पसंद कर रहे हैं। पहले होटल वाले मांस वाले खाने से अच्छा मुनाफा कमाते थे। लेकिन सड़े हुए मांस का मामला सामने आने के बाद लोगों में गुस्सा है। अब ज़्यादातर लोग मांस से दूरी बना रहे हैं।

कैसे हुआ सड़े हुए मांस का खुलासा?

कश्मीर में सड़े हुए मांस की सप्लाई पर कार्रवाई अगस्त 2025 की शुरुआत में शुरू हुई। एक मांस कारोबारी ने एक लोकल न्यूज चैनल को इसकी जानकारी दी। उसने बताया कि दिल्ली की गाज़ीपुर मंडी से खराब मांस जम्मू-कश्मीर के बाजारों में भेजा जा रहा है। गाज़ीपुर मंडी एशिया की सबसे बड़ी पशु मंडी मानी जाती है।

इस सूत्र ने बताया कि जो मांस रेस्तरां वाले लेने से मना कर देते हैं, उसे मांस माफिया खरीद लेते हैं। ये मांस FSSAI के नियमों के मुताबिक ठीक नहीं होता। माफिया इस सड़े मांस को केमिकल्स से धोता है। इसमें क्लोराइड, अमोनियम हाइड्रॉक्साइड और नाइट्रेट जैसे खतरनाक रसायन मिलाए जाते हैं। इससे मांस बाहर से ताजा और लाल दिखने लगता है।

इसके बाद उस मांस को आइस बॉक्स में पैक किया जाता है। फिर ट्रकों के जरिए जम्मू-कश्मीर के बाजारों में भेजा जाता है। वहां यह मांस खाने-पीने का सामान बेचने वाले व्यापारियों को दिया जाता है। ये लोग इसे होटल, रेस्टोरेंट और ढाबों को बेचते हैं। फिर ग्राहक, चाहे वो स्थानीय हों या पर्यटक, बिना कुछ जाने वही मांस खा लेते हैं। उन्हें लगता है कि मांस ताजा और सेहतमंद है, लेकिन असल में वो सड़ा हुआ और केमिकल से रंगा होता है।

जब यह मामला सामने आया तो फूड डिपार्टमेंट हरकत में आया। रेस्टोरेंट, होटल, ढाबों और ठेलों पर छापेमारी शुरू हुई। जाँच में सामने आया कि सड़े मांस का यह धंधा बहुत बड़े स्तर पर चल रहा था।

कुछ ही समय में पुलिस ने हजारों किलो सड़ा मांस बरामद किया। ये मांस बिना किसी लेबल के था और ऊपर से सिंथेटिक रंग चढ़ाया गया था ताकि यह ताजा लगे। जैसे-जैसे कार्रवाई तेज हुई, कुछ दुकानदारों ने सड़ा हुआ मांस पानी में फेंकना शुरु कर दिया, ताकि पकड़े न जाएँ। कई जगहों पर नालों और तालाबों में खराब मांस तैरता मिला। पुलिस की सख्ती से घबराकर दुकानदार माल छिपाने लगे।

इस बीच मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने फूड सेफ्टी अधिकारियों के साथ एक अहम बैठक की। उन्होंने जरूरी निर्देश जारी किए। पुलिस उन लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रही है जो सड़ा हुआ मांस बेच या जमा कर रहे हैं।

अब राज्य की सीमाओं के पास लैब बनाए गए हैं जहाँ मांस की जाँच की जा रही है। इसके अलावा बाजारों में मोबाइल फूड टेस्टिंग वैन भी लगाई गई हैं। इन वैनों से होटल और ढाबों में बिकने वाले मांस की जाँच की जा रही है।

इस घटना के बाद अब मांस बाजार को ज़्यादा व्यवस्थित और पारदर्शी बनाया जा रहा है। सरकार ने मांस बेचने वालों, सप्लायरों और व्यापारियों को रजिस्ट्रेशन कराने का आदेश दिया है। अब बिना रजिस्ट्रेशन कोई मांस नहीं बेच सकेगा।

फूड डिपार्टमेंट ने कहा है कि पैक किए गए मांस पर साफ-साफ जानकारी होनी चाहिए। उस पर बनने की तारीख, बैच नंबर, खत्म होने की तारीख और बनाने वाली कंपनी का नाम लिखा होना ज़रूरी है। इसके अलावा फ्रोजन मांस को -18 डिग्री तापमान में रखना अनिवार्य किया गया है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि नियम तोड़ने वालों को भारी जुर्माना देना होगा। यह जुर्माना 5 से 10 लाख रुपए तक हो सकता है या फिर 6 साल तक की जेल भी हो सकती है।

फूड सेफ्टी कश्मीर के असिस्टेंट कमिश्नर हिलाल अहमद मीर के मुताबिक, सिर्फ एक हफ्ते में गांदरबल, पुलवामा और श्रीनगर से 3000 किलो से ज्यादा सड़ा मांस बरामद किया गया है। उन्होंने बताया कि अब सड़ा मांस सड़कों के किनारे, नालों और नदी-नालों में भी मिल रहा है। जैसे ही निगरानी बढ़ी तो गलत काम करने वाले लोग मांस को छिपाने लगे और उसे इधर-उधर फेंकने लगे।

सिर्फ सड़ा मांस ही नहीं, फूड सेफ्टी विभाग ने 2500 कबाब भी जब्त किए हैं। ये कबाब ऐसे फ्रोजन मांस से बनाए गए थे, जिसमें गलत और खतरनाक रंग मिलाया गया था। श्रीनगर में 150 किलो मटन के गोले (गुश्ताबा) भी नष्ट किए गए हैं। यह सारा माल लोगों की सेहत के लिए खतरनाक था।

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने लिया संज्ञान

26 अगस्त 2025 को जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया। कोर्ट ने वकील मीर उमर द्वारा दायर की गई याचिका के लिए वरिष्ठ वकील जहाँगीर इकबाल गनई को कोर्ट का सहायक नियुक्त किया। यह याचिका एडवोकेट मीर उमर ने दायर की थी। याचिका में यह आरोप लगाया गया कि जम्मू-कश्मीर, खासकर कश्मीर घाटी में सड़ा, गंदा और बीमार मांस और पोल्ट्री लंबे समय से तस्करी के जरिए लाया जा रहा है।

कोर्ट ने इस याचिका और उसमें दिए गए तथ्यों को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा कि सड़े मांस और पोल्ट्री के साथ-साथ बिना निगरानी के बिकने वाले अन्य खाद्य पदार्थ भी जनता की सेहत के लिए खतरा हैं। यह मामला सीधे आम लोगों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि 2017 में कश्मीर के डिविजनल कमिश्नर ने एक आदेश जारी किया था। उस आदेश में सड़ा हुआ मांस और पोल्ट्री घाटी में लाने पर पूरी तरह से रोक लगाने को कहा गया था। लेकिन इसके बावजूद कई सालों से गंदा और बीमार मांस गैरकानूनी तरीके से लाया जा रहा है। कोर्ट के आदेश होने के बावजूद ज़िम्मेदार अधिकारी कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए हैं।

याचिका में यह भी कहा गया कि विभाग में कर्मचारियों और संसाधनों की भारी कमी है। इस वजह से फूड सेफ्टी के नियमों को ठीक से लागू नहीं किया जा पा रहा है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार ने भी इस मामले में लापरवाही बरती है। खासकर फूड सेफ्टी ऑफिसरों की भर्ती के मामले में सरकार ने ज़रूरी कदम नहीं उठाए।

इस बीच जम्मू-कश्मीर की फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन की कमिश्नर स्मिता सेठी ने कोर्ट को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि त्योहारों से पहले लगातार छापे मारे जा रहे हैं। इन छापों में 12,000 किलो मांस जब्त किया गया है। इसके अलावा 21 क्विंटल नकली पनीर और 440 क्विंटल एक्सपायर रसगुल्ला भी पकड़ा गया है। यह सारी कार्रवाई लोगों की सेहत को ध्यान में रखकर की जा रही है।

स्मिता सेठी ने बताया कि 25 अगस्त 2025 को जम्मू में एक बड़ी रेड की गई थी। 26 अगस्त 2025 को करीब 100 किलो नकली पनीर जब्त किया गया। अब तक कुल 12,000 किलो मांस, 21 क्विंटल नकली पनीर और 440 क्विंटल एक्सपायर रसगुल्ले जब्त किए जा चुके हैं। रसगुल्ले एक्सपायर थे, फटे हुए टिन में रखे गए थे और उन पर कोई पैकिंग या लेबल नहीं था। ये ठंडे गोदामों में बिना सही तरीके से रखे गए थे और बाजार में बेचने की तैयारी थी। चूंकि इन्हें ठीक से स्टोर नहीं किया गया था, इसलिए सब नष्ट कर दिए गए।

जिन दुकानों या फैक्ट्रियों ने नियमों का उल्लंघन किया और सड़ा मांस बेचा, उनके लाइसेंस सस्पेंड कर दिए गए हैं। इनमें श्रीनगर की अल-तक़वा फूड्स, आरिफ एंटरप्राइजेस, सनशाइन फूड्स, अनमोल फूड्स, और अनंतनाग की डोमिनोज़ पिज्जा, शौन शाही बिरयानी, शान फिश फ्राई, बिस्मिल्लाह स्वीट्स और खंडे पोल्ट्री शामिल हैं। अधिकारियों ने साफ कहा है कि ऐसे काम करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

छापेमारी के बाद भोजनालयों में ग्राहकों की कमी

इस साल 22 अप्रैल 2025 में पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित इस्लामी आतंकियों ने बड़ा हमला किया था। इस हमले में 26 हिंदू पर्यटकों की बेरहमी से गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। आतंकियों ने सिर्फ इसलिए उन्हें निशाना बनाया क्योंकि वे हिंदू थे। उस समय जम्मू-कश्मीर में पर्यटन तेजी से बढ़ रहा था और विकास हो रहा था। लेकिन इस हमले के बाद होटल बुकिंग और यात्राएँ बड़ी संख्या में रद्द होने लगीं। इससे पर्यटन को बड़ा झटका लगा, जबकि कश्मीर की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा पर्यटन पर ही टिका है।

धीरे-धीरे हालात सामान्य हुए और पर्यटक फिर से घाटी आने लगे। लेकिन अब सड़े मांस का मामला सामने आने से पर्यटन की छवि को फिर से नुकसान पहुँचा है। इससे पर्यटकों के मन में डर और अविश्वास पैदा हुआ है। इस गिरते भरोसे को दोबारा पाने के लिए कश्मीर के रेस्टोरेंट्स अब फेमस फूड व्लॉगर्स की मदद ले रहे हैं। ये व्लॉगर्स यह दिखाते हैं कि मांस कहाँ से लाया जा रहा है और सफाई के क्या-क्या इंतजाम किए गए हैं।

कॉन्ग्रेस की जिन सैयदा हमीद को भारत में बसाने हैं ‘घुसपैठिए’, उन्हीं के आगे जोर-जोर से लगे ‘बांग्लादेशी बाहर निकालो’ के नारे: ‘जय श्रीराम’ सुन मुँह बनाती दिखीं, देखें वीडियो

दिल्ली के संसद मार्ग स्थित कॉन्स्टिट्यूशनल क्लब में आयोजित ‘असम नागरिक सम्मेलन’ के कार्यक्रम के दौरान उस वक्त माहौल गरमा गया, जब हिंदू सेना के सदस्यों ने सैयदा हामिद के खिलाफ बांग्लादेशी घुसपैठियों को समर्थन में बयान देने के लिए जमकर नारेबाजी की। इस दौरान ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम’, ‘जय श्री राम’, ‘बांग्लादेशियों को बाहर निकालो’ जैसे नारे लगे। ये हंगामा कॉन्ग्रेस सरकार की योजना आयोग की पूर्व सदस्य सैयदा हमीद की उपस्थिति में हुआ, जिनके हालिया बयान में उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठियों के भारत में रहने का समर्थन किया था। नारेबाजी के दौरान सैयदा हमीद मुँह बनाती हुई देखी गई।

बीजेपी नेताओं की कड़ी प्रतिक्रिया

सैयदा हमीद के बयान पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा, “सैयदा हमीद जैसे लोग, जो गाँधी परिवार के करीबी माने जाते हैं, अवैध घुसपैठियों को वैध ठहराते हैं, जैसे वे जिन्ना का सपना पूरा करना चाहते हों-असम को पाकिस्तान का हिस्सा बनाना।” उन्होंने इस बयान को असम की पहचान को खत्म करने की सोची-समझी साजिश बताया।

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और अन्य बीजेपी नेताओं ने भी सैयदा हमीद की आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह बयान घुसपैठियों को बढ़ावा देने और देश की सुरक्षा को खतरे में डालने जैसा है। वहीं, भाजपा नेता और लेखक राकेश सिन्हा ने कहा कि ‘इससे बड़ा देश विरोधी बयान नहीं हो सकता। अगर सैयदा हमीद को इतना ही प्यार है तो 7 दिन बांग्लादेश में रहकर देखें।’

सैयदा हमीद का विवादित बयान

यह पूरा मामला सैयदा हमीद के असम दौरे से शुरू हुआ, जहाँ उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठियों के पक्ष में बयान दिया था। सैयदा हमीद ने कहा था कि बांग्लादेशी भी इंसान हैं और उन्हें भारत में रहने का पूरा हक है। सैयदा ने यह भी कहा कि असम में मु्स्लिमों पर जुल्म हो रहा है और सरकार बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ गलत तरीके से कार्रवाई कर रही है।

सैयदा हमीद के अनुसार, “अगर वे (घुसपैठिए) बांग्लादेशी भी हैं तो इसमें गलत क्या है? बांग्लादेशी भी इंसान हैं। धरती इतनी बड़ी है, बांग्लादेशी यहाँ भी रह सकते हैं।” सैयदा हमीद ने यह भी दावा किया कि अवैध घुसपैठियों के कारण नागरिकों के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि यह बात ‘भ्रामक’ है।

सैयदा हमीद ने यह बयान ‘असम नागरिक सम्मेलन’ नामक एक मंच के निमंत्रण पर दिए थे, जिसमें उनके साथ जाने-माने वामपंथी नेता प्रशांत भूषण, हर्ष मंदर और जवाहर सरकार भी शामिल थे।