IIT गाँधीनगर एक बार फिर से विवादों में आ गया है। इस बार सवाल वहाँ पर शिक्षकों की नियुक्तियों को लेकर उठे हैं। ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ यानी हितों के टकराव के आरोपों के साथ संस्थान से जवाब माँगा जा रहा है। हालाँकि अब तक संस्थान की ओर से अब तक इस पर किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई है।
जानकारी के अनुसार, संस्थान में 14 उन दंपतियों के बारे में पता चला है जो अलग-अलग और ऊँचे पदों पर कार्यरत हैं। कुछ शिक्षक और कर्मचारी ऐसे भी हैं जो पिता और पुत्री दोनों ही IIT गाँधीनगर में कार्यरत हैं। इसके अलावा इंटरनल कंप्लेंट कमिटी जैसे कुछ अहम पदों पर भी परिवार के ही सदस्य पदस्थ हैं।
ताजा मामला संस्थान के एक लेक्चरर से जुड़ा है। शिक्षक ने अपनी PhD छात्रा को ही संस्थान में नौकरी दिलाई और बाद में उससे शादी भी की। अब इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। शिकायत में पूछा गया है कि किस आधार पर स्कॉलर की नियुक्ति हुई है? साथ ही यदि संस्थान को इस तरह की नियुक्ति की जानकारी थी तो इसे रोका क्यों नहीं गया?
एक अन्य मामले में IIT गाँधीनगर के एक अन्य वरिष्ठ शिक्षक की कोरियाई पत्नी पहले संस्थान में विजिटिंग फैकल्टी थीं। अब उन्हें असिस्टेंट टीचिंग प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति मिल गई है।
A Korean/American citizen was just another English and Korean "tutor" in the USA.
But she is then made an "Assistant Teaching Professor" at Humanities Dept, IIT Gandhinagar.
Her husband? He was working–still works–in a top position at IIT Gandhinagar.
इन दोनों मामलों के बाहर आने के बाद संस्थान में नियुक्तियों को लेकर तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं।
लोगों के सवाल हैं कि ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ और ‘नेपोटिज्म’ यानी भाई-भतीजावाद जैसी स्थितियों से बचने के लिए संस्थान में क्या कोई नीति बनाई गई है? क्या नियुक्ति से पहले कोई जाँच की जाती है जिससे ऐसी समस्याएँ न उत्पन्न हों?
सवाल यह भी है कि यदि इंटरनल कंप्लेंट कमिटी में कोई शिक्षक हो और उसके पति-पत्नी के खिलाफ कोई शिकायत आए तो वह निष्पक्ष कैसे रह सकता है? और क्या टैक्सपेयर्स के पैसों से चलने वाला संस्थान ऐसी व्यवस्था को उचित ठहरा सकता है?
ऑपइंडिया से बातचीत में लेखक और कॉलमिस्ट हर्षिल मेहता कहते हैं, “संस्थान में लगभग 14 दंपति अलग-अलग पदों पर काम करते हैं। मुझे ऐसी कोई नीति नहीं दिखती जिसमें इसे लेकर कोई स्पष्टता नियम हों। अगर ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ की कोई नीति है तो IIT गाँधीनगर को उसे सार्वजनिक करना चाहिए। सवाल यह भी है कि क्या IIT गाँधीनगर कोई फैमिली रीयूनियन प्रोग्राम चला रहा है? अगर ऐसा है तो उसे आधिकारिक नीति के रूप में घोषित कर देना चाहिए।”
IIT Gandhinagar has so many appointments with conflict of interest and favouritism.
If husband is working as a professor, then on what basis his Korean wife is appointed as a visiting faculty?
I have identified 14 couples (husband-wife, father-daughter) from the same family…
वे कहते हैं, “संस्थान में शिक्षक प्राची थारेजा इंटरनल कंप्लेंट कमिटी में हैं। क्या संस्थान को पता है कि उनके पति भी वहीं नौकरी करते हैं? अगर उनके पति के खिलाफ कोई शिकायत आती है तो उस मामले में प्राची हितों के टकराव के साथ कैसे निर्णय लेंगी? बड़ी-बड़ी कंपनियों में भी हितों के टकराव से बचने के लिए नीतियाँ होती हैं। IIT गांधीनगर में ऐसी नीति कहाँ है?”
हर्षिल ने आगे कहा, “अगर ऐसा नहीं है तो फिर ऐसी गतिविधियों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं, यह शिक्षण संस्थान को स्पष्ट करना चाहिए।”
उन्होंने संस्थान के डायरेक्टर और पूर्व डायरेक्टर सुधीर जैन, जिनके कार्यकाल में ये नियुक्तियाँ हुईं, साथ ही अन्य अधिकारियों पर भी सवाल उठाए और सरकार और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से हस्तक्षेप की माँग की है। अब देखना यह है कि आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बाढ़ प्रभावित उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में 48 ट्रकों से भरे राहत सामान को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। ट्रक में बाढ़ पीड़ितों के लिए 19 हजार किट भरकर भेजे गए। इसके साथ सीएम ने हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को 5-5 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की भी घोषणा की।
आदरणीय प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी की 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' की अवधारणा के अनुरूप संकट की घड़ी में हम सब एकजुट होकर साथ खड़े हैं।
उत्तर प्रदेश की 25 करोड़ जनता की ओर से पंजाब, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखण्ड राज्य के बाढ़ पीड़ितों हेतु राहत सामग्री के वाहनों को माँ… pic.twitter.com/B1ReKn7qmn
दरअसल, सोमवार (08 सितंबर 2025) को सीएम योगी आदित्यनाथ सहारनपुर पहुँचे। यहाँ तीनों राज्यों के लिए राहत सामग्री से भरे 48 ट्रक रवाना किए। इस दौरान सीएम ने कहा कि पड़ोसी राज्यों की मदद के लिए यूपी सरकार हर समय तैयार है। सीएम ने श्रेष्ठ भारत को बढ़ावा देते हुए कहा कि यूपी के 25 करोड़ जनता की तरफ से बाढ़ पीड़ित भाई-बहनों के लिए भेजी गई सामग्री मानवीय संवेदना की कड़ी है।
मुख्यमंत्री ने कहा, “उत्तर प्रदेश में बाढ़ सबसे बड़ी पीड़ा रही है लेकिन इस बार निचले स्तर पर ही जलभराव हुआ है। वो भी सिर्फ सहारनपुर, बागपत, गौतमबुद्धनगर या उन जिलों में जहाँ से यमुना जा रही है। गंगा जी के मुहाने पर बिजनौर से लेकर बलिया तक हर जिले में पुख्ता व्यवस्था की गई है। बाणगंगा और हिंडन नदियों में ओवरफ्लो होने के कारण हुई हानि के बाद सरकार ने तुरंत राहत सामग्री पहुँचाने का काम किया।”
इसके साथ CM योगी ने आपदा राहत उपाय पर बात करते हुए कहा, “यूपी में जिन किसानों की फसल बाढ़ की चपेट में आई है, उनका सर्वे शुरू कर दिया गया है। जल्द ही सर्वे की रिपोर्ट मिल जाएगी और पीड़ित किसानों को मुआवजा राशि दी जाएगी। बारिश के मौसम में जानवर या सांप के काटने से सदस्यों को खोने वाले परिवारों को ₹4 लाख मुआवजा दिया जाएगा।”
CM योगी ने बताया, “आपदा से नष्ट हुए घरों के पुनर्निर्माण के लिए धनराशि उपलब्ध कराई जाती है और नदी कटाव से प्रभावित परिवारों को नए घर बनाने के लिए जमीन के पट्टे और वित्तीय सहायता दी जाती है। बाढ़ प्रभावित गाँवों में भोजन, बच्चों के लिए दूध, पशुओं के लिए चारा और राहत शिविरों तक सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था की जाती है।”
इसके अलावा CM योगी आदित्यनाथ ने प्राकृतिक आपदा के दौरान जनता से सतर्क रहने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि घर के आसपास इकट्ठे हुए पानी से डायरिया समेत अन्य बीमारियों हो सकती है और कहा कि पीने के लिए केवल उबला हुआ पानी ही इस्तेमाल करें।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (9 सितंबर 2025) को हिमाचल प्रदेश में बाढ़ और भारी बारिश से प्रभावित इलाकों का दौरा किया। उन्होंने सबसे पहले हवाई सर्वेक्षण किया ताकि बाढ़ और भूस्खलन से हुए नुकसान का जायजा ले सकें। इसके बाद काँगड़ा में एक बैठक में राहत और पुनर्वास के कामों की समीक्षा की।
इस दौरान पीएम मोदी ने हिमाचल के लिए 1500 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता की घोषणा की। इस राशि में राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) और पीएम किसान सम्मान निधि की दूसरी किश्त का अग्रिम भुगतान शामिल है।
हवाई सर्वेक्षण के जरिए हिमाचल प्रदेश में बाढ़ और लैंडस्लाइड की स्थिति का जायजा लिया। इस कठिन समय में हम प्रदेश के अपने भाई-बहनों के साथ पूरी मजबूती से खड़े हैं। इसके साथ ही प्रभावित लोगों की मदद के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। pic.twitter.com/PS0klVwo5c
प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रभावित इलाकों को फिर से बसाने के लिए हरसंभव मदद की जाएगी। उन्होंने पीएम आवास योजना के तहत घरों के पुनर्निर्माण, राष्ट्रीय राजमार्गों की मरम्मत, स्कूलों की बहाली और पशुपालकों के लिए मिनी किट जैसी योजनाओं पर जोर दिया। जिन किसानों के पास बिजली कनेक्शन नहीं है, उनके लिए विशेष मदद का ऐलान भी किया गया।
पीएम मोदी ने कहा कि बाढ़ से क्षतिग्रस्त घरों की सही जानकारी के लिए जियोटैगिंग की जाएगी, ताकि सहायता जल्दी और सही लोगों तक पहुँचे। स्कूलों में पढ़ाई सुचारू रखने के लिए समग्र शिक्षा अभियान के तहत क्षति की जानकारी जियोटैगिंग से ली जाएगी। इसके अलावा, भूजल स्तर बढ़ाने और पानी के बेहतर प्रबंधन के लिए रिचार्ज संरचनाओं का निर्माण होगा, जिससे बारिश का पानी जमा किया जा सके।
प्रधानमंत्री ने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने मृतकों के परिवारों के लिए 2 लाख रुपए और गंभीर रूप से घायल लोगों के लिए 50,000 रुपए की अनुग्रह राशि की घोषणा की। केंद्र सरकार ने नुकसान का जायजा लेने के लिए केंद्रीय दलों को भेजा है, जिनकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की सहायता दी जाएगी।
हिमाचल प्रदेश में भारी बाढ़ और लैंडस्लाइड से प्रभावित कुछ लोगों से बातचीत की। उनकी पीड़ा के साथ ही त्रासदी से हुआ नुकसान मन को व्यथित करने वाला है। खराब मौसम का संकट झेल रहे हर व्यक्ति तक राहत और सहायता पहुंचे, इसके लिए हम पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। pic.twitter.com/KfpyriuLwq
प्रधानमंत्री ने NDRF, SDRF, सेना और आपदा मित्र स्वयंसेवकों की तारीफ की, जिन्होंने राहत और बचाव कार्य में दिन-रात मेहनत की। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर इस मुश्किल समय में हिमाचल के लोगों का साथ देंगे। केंद्र सरकार ने आपदा प्रबंधन नियमों के तहत सभी तरह की सहायता देने का वादा किया है।
प्रधानमंत्री ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार हर कदम पर हिमाचल की मदद करेगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की माँगों और केंद्रीय दलों की रिपोर्ट के आधार पर और मदद दी जाएगी।
युद्ध से बचकर शांति की तलाश में अमेरिका आईं 23 साल की यूक्रेनी लड़की इरीना ज़ारुत्स्का की हत्या कर दी गई है। यह घटना 22 अगस्त 2025 को अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना में एक ट्रेन स्टेशन पर हुई। पुलिस ने बताया कि 34 वर्षीय डिकार्लोस ब्राउन जूनियर नाम के एक शख्स ने चाकू से कई बार हमला कर इरीना को मार डाला।
यह घटना सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई, लेकिन अमेरिकी मीडिया ने इस पर कोई खास कवरेज नहीं दी, जिससे लोगों में नाराजगी है। ऐसा लगा जैसे यह खबर उनके लिए सामान्य थी। शार्लेट-मेक्लेनबर्ग पुलिस विभाग के मुताबिक, इरीना की मौत ईस्ट/वेस्ट बुलेवार्ड लाइट रेल स्टेशन पर हुई।
14 बार जा चुका जेल अपराधी
हिंसक वारदातों में शामिल डिकार्लोस ब्राउन को इरीना की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। 34 साल के डिकार्लोस पर पहले भी कई आपराधिक आरोप लग चुके हैं। वह 2011 से अब तक चौदह बार गिरफ्तार हो चुका है। उस पर चोरी, लूटपाट और धमकी देने जैसे आरोप हैं। एक मामले में तो उसे पाँच साल की जेल भी हुई थी।
The murderer of Iryna Zarutska had been arrested FOURTEEN TIMES before.
It’s beyond ridiculous that this monster had not yet been permanently locked up.
डिकार्लोस ब्राउन पर 911 इमरजेंसी नंबर का गलत इस्तेमाल करने का भी आरोप है। एक बार उसने पुलिस को फोन करके कहा था कि उसके अंदर ‘कुछ इंसानों द्वारा बनाया हुआ सामान’ है, जिसकी जाँच होनी चाहिए। पुलिस ने बताया कि उसे एक मेडिकल समस्या है और वे उसकी मदद नहीं कर सकते। उस पर लगे कई पुराने आरोप कोर्ट ने हटा दिए थे।
लोगों ने मेनस्ट्रीम मीडिया की चुप्पी पर उठाए सवाल
इरीना की हत्या का वीडियो ऑनलाइन वायरल होने के बाद, लोगों ने आरोपित के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को ढूँढ निकाला। इस घटना पर, आरोपित के खिलाफ पुराने मामले हटाए जाने और अमेरिकी मीडिया की चुप्पी को लेकर सोशल मीडिया पर काफी गुस्सा है।
एक्स (पहले ट्विटर) पर एक यूजर ने लिखा, “इरीना ज़ारुत्स्का की हत्या पर मीडिया की चुप्पी झूठ का सबसे घिनौना रूप है, जिसे मैंने पहले भी देखा है। ये वही लोग है जिन्होंने डैनियल पेनी को लेकर लगातार नकारात्मक कवरेज किया था और वे ही इस मामले में चुप हैं। यह भी सच है कि आप मीडिया से उतनी नफरत नहीं करते जितनी करनी चाहिए।”
The media silence on Iryna Zarutska's murder is one of the most disgusting acts of lying by omission I've ever seen.
From the people who gave you the Daniel Penny wall-to-wall negative coverage and the BLM moral panic.
It's true what they say: you don't hate the media enough.
‘एंड वोकेनेस’ नाम के एक और यूज़र ने अमेरिका के बड़े मीडिया संस्थानों का नाम लेते हुए बताया कि किसी ने भी इस क्रूर हत्या को नहीं दिखाया। उन्होंने लिखा, “AP, पीबीएस, न्यूयॉर्क टाइम्स, एनपीआर, वाल स्ट्रीट जर्नल, BBC, सीएनएन, वाशिंगटन पोस्ट, रॉयटर्स और एमसएनबीसी में से किसी ने भी इस हमले पर एक भी खबर नहीं दी।”
0 AP stories on this deadly attack 0 PBS stories on this deadly attack 0 NYT stories on this deadly attack 0 NPR stories on this deadly attack 0 WSJ stories on this deadly attack 0 BBC stories on this deadly attack 0 CNN stories on this deadly attack 0 WAPO stories on this… pic.twitter.com/962qmFOBNm
टेस्ला और एक्स के मालिक एलन मस्क ने भी इस मामले में अपनी बात रखी। उन्होंने उन जजों की आलोचना की जिन्होंने पहले आरोपित डिकार्लोस पर लगे आरोप हटा दिए थे। मस्क ने कहा, “आइए कानून बदलें। तब तक उन जजों और वकीलों को शर्मिंदा करें जो हत्या, बलात्कार और डकैती को बढ़ावा देते हैं। और खासकर उन लोगों को शर्मिंदा करें जिन्होंने उनके चुनाव अभियानों को पैसा दिया। इससे सबसे बड़ा फर्क पड़ेगा।”
Let’s change the law.
Between now and then, name and shame the DAs and judges who enable murder, rape and robbery.
But especially shame those who funded the campaigns of the DAs and judges. That will make the biggest difference. https://t.co/SirIuQcs2S
एक और पोस्ट में मस्क ने अमेरिकी मीडिया पर इरीना की हत्या को नहीं दिखाने के लिए निशाना साधा। उन्होंने एक पोस्ट को शेयर किया जिसमें बताया गया था कि किसी भी बड़े मीडिया संस्थान ने इस पर कोई खबर नहीं लिखी। उन्होंने बस ‘जीरो’ (शून्य) लिखकर अपनी राय दी। यह साफ नहीं है कि अमेरिकी मीडिया ने इस खबर को क्यों नहीं दिखाया, जबकि विदेशी मीडिया ने इसे कवर किया। कुछ लोगों का मानना है कि यह इसलिए हुआ क्योंकि आरोपित एक काला बेघर व्यक्ति था और पीड़ित एक व्हाइट शरणार्थी थी।
इस बीच, शार्लेट शहर की मेयर, वी लाइल्स ने एक एक्स पोस्ट में मीडिया संस्थानों को धन्यवाद दिया कि उन्होंने इरीना की हत्या का वीडियो नहीं दिखाया। इस पर लोगों ने मेयर की आलोचना की। उनका कहना था कि मेयर को वीडियो के वायरल होने की चिंता है, न कि आरोपित और उन जजों पर कार्रवाई करने की जिन्होंने उसे कई आपराधिक आरोपों के बावजूद सड़कों पर रहने दिया।
The video of the heartbreaking attack that took Iryna Zarutska’s life is now public. I want to thank our media partners and community members who have chosen not to repost or share the footage out of respect for Iryna’s family.
कई लोग इस तरह की घटनाओं में एक जैसा पैटर्न देख रहे हैं। हाल ही में जर्मनी के फ्रीडलैंड शहर में एक यूक्रेनी लड़की को ट्रेन के आगे धक्का दिया गया था। यूक्रेन के द कीव इंडिपेंडेंट के मुताबिक, एक 31 साल के इराकी नागरिक ने 16 साल की यूक्रेनी शरणार्थी लड़की को ट्रेन की पटरी पर धकेल दिया, जिससे वह 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आ रही ट्रेन से टकरा गई। रिपोर्ट में बताया गया है कि आरोपित को सिज़ोफ्रेनिया नाम की मानसिक बीमारी है।
क्या अपराध की गंभीरता से ज्यादा, पीड़िता और अपराधी की नस्ल ज्यादा मायने रखती है?
कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिका के बड़े मीडिया संस्थान किसी भी अपराध को दिखाने से पहले अपराधी और पीड़ित की नस्ल देखते हैं। शायद उन्हें डर था कि अगर वे इस खबर को दिखाते तो लोग आरोपित की नस्ल, उसके पुराने अपराधों, पीड़ित के व्हाइट होने और शरणार्थी होने की बात पर जोर देते। ऐसा लगता है कि उनके लिए अपराध की खबर दिखाने से ज़्यादा उनका अपना ‘प्रगतिशील एजेंडा’ ज्यादा महत्वपूर्ण है।
अगर अपराधी गोरा होता और पीड़ित काली, तो ये मीडिया संस्थान अब तक हंगामा मचा चुके होते। वे ‘गोरे वर्चस्व’ और नफरत पर लेख लिखते। जैसा कि ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन के दौरान हुआ था, ठीक उसी तरह सड़कों पर प्रदर्शन होने लगते और मीडिया इसे दिन-रात दिखाता।
नेपाल में हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। भ्रष्टाचार और सरकार की नीतियों के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों ने अब हिंसक रूप ले लिया है। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल के निजी आवास पर कब्जा कर तोड़फोड़ की और आग लगा दी है। इसके अलावा प्रधानमंत्री केपी ओली के घर पर भी गोली चली है, जिसमें 2 लोग घायल हुए है। इस बीच नेपाल-काठमांडू इंटरनेशनल एयरपोर्ट बंद किए और उड़ाने रद्द कर दी है।
इस बढ़ती हिंसा के बीच पीएम केपी शर्मा ओली पर दबाव बढ़ गया है और वे इलाज के लिए दुबई जाने की तैयारी कर रहे हैं। पीएम केपी शर्मा ओली ने उपप्रधानमंत्री को कार्यवाहक जिम्मेदारी सौंप दी है। अब तक पाँच मंत्रियों समेत 21 सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है।
पाँच मंत्रियों ने दिया इस्तीफा, सांसदों ने भी छोड़ा साथ
इस राजनीतिक संकट के बीच अब तक पाँच मंत्री अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं, जिसमें गृह मंत्री रमेश लेखक और जल आपूर्ति मंत्री प्रदीप यादव भी शामिल हैं। मंत्री प्रदीप यादव ने कहा कि युवाओं की मौत के बाद सरकार में बने रहना उनके लिए सही नहीं है।
इसके अलावा, रवि लामिछाने के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के 21 सांसदों ने भी सामूहिक इस्तीफा देने का फैसला किया है। उनका मानना है कि मौजूदा संसद को भंग कर नए चुनाव कराए जाने चाहिए ताकि जनता को सही विकल्प मिल सके।
पीएम ओली ने बुलाई सर्वदलीय बैठक
बेकाबू होते हालात को देखते हुए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने मंगलवार (9 सितंबर 2025) शाम 6 बजे एक सर्वदलीय बैठक बुलाई है। उन्होंने जनता से शांति बनाए रखने की अपील की है, लेकिन राजधानी काठमांडू सहित कई शहरों में कर्फ्यू और सुरक्षा के सख्त इंतजामों के बावजूद प्रदर्शनों का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
प्रदर्शनकारी सड़कों पर सेना को भी दौड़ा-दौड़ाकर मार रहे हैं और उन पर पथराव कर रहे हैं। इस माहौल में पीएम ओली के घर के पास भी गोली चलने की घटना सामने आई है, जिसमें दो लोग घायल हुए हैं, जिससे स्थिति और भी तनावपूर्ण हो गई है।
#WATCH | Nepal: Protesters chase and pelt stones at security personnel in Kathmandu, as the demonstrations turn violent.
नेपाल में प्रदर्शनकारियों ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा के घर पर हमला कर दिया है। उन्होंने घर पर कब्जा कर आगजनी की और करीब छह गाड़ियों में आग लगा दी। इस घटना के बाद, पुलिस और सुरक्षा बल मौके पर पहुँच गए हैं। राजधानी काठमांडू में हालात अभी भी तनावपूर्ण बने हुए हैं।
उपराष्ट्रपति पद के लिए INDI गठबंधन के उम्मीदवार और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बी. सुदर्शन रेड्डी ने आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की थी जिसे लेकर लगातार हंगामा मचा हुआ है। इस बीच अलग-अलग हाई कोर्ट्स के 8 पूर्व जजों ने सामूहिक रूप से खुला पत्र लिखकर रेड्डी की इस मुलाकात पर कड़ी आपत्ति जताई है।
पूर्व जजों ने अपने पत्र में क्या कहा?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन पूर्व न्यायधीशों ने अपने पत्र में लिखा, “यह चिंता की बात है कि रेड्डी ने लालू प्रसाद यादव से निजी मुलाकात की। लालू यादव चारा घोटाले में दोषी करार दिए जा चुके हैं, जिसमें लगभग 940 करोड़ रुपए बिहार से गबन किए गए थे।”
उन्होंने आगे लिखा, “इस मुलाकात को चुनावी मजबूरी बताकर सही नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि लालू यादव न तो सांसद हैं और न ही उपराष्ट्रपति चुनाव के निर्वाचक मंडल में वोट डालने के योग्य हैं।”
पत्र में आगे कहा गया, “सुप्रीम कोर्ट के जज रहे रेड्डी जैसे शख्स का इस तरह संदिग्ध मुलाकात करना उनके निर्णय पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। न्यायिक पृष्ठभूमि रखने के बावजूद उन्होंने खुद को ऐसे व्यक्ति से जोड़ा, जिनके आपराधिक कृत्यों की पुष्टि भारतीय न्यायालयों द्वारा की गई है।”
उन्होंने लिखा, “इसमें कुछ गुटों की चुप्पी भी चौंकाने वाली है, वे सामान्य परिस्थितियों में छोटी-सी बात पर भी शोर मचाते हैं, इस मामले पर चुप्पी साधे बैठे हैं। यह साबित करता है कि संवैधानिक नैतिकता की दुहाई देने वाले ये तथाकथित संरक्षक दरअसल स्वार्थ और राजनीतिक सुविधा के लिए गंभीर खामियों को नजरअंदाज कर देते हैं।”
किन-किन जजों ने लिखा पत्र
जिन जजों ने यह पत्र लिखा है उसमें बॉम्बे हाई कार्ट के पूर्व जज जस्टिस एस एम खांडेपारकर और जस्टिस अंबादास जोशी, झारखंड हाई कार्ट के पूर्व जज जस्टिस आर के मार्थिया, इलाहाबाद हाई कार्ट के पूर्व जज जस्टिस देवेंद्र कुमार आहूजा, दिल्ली हाई कार्ट के पूर्व जज जस्टिस एस एन ढींगरा, पंजाब एवं हरियाणा हाई कार्ट के के पूर्व जज जस्टिस करम चंद पुरी, केरल हाई कार्ट के के पूर्व जज जस्टिस पी एन रवींद्रन, राजस्थान हाई कार्ट के पूर्व जज जस्टिस आर एस राठौर शामिल हैं।
मुलाकात पर रेड्डी ने क्या कहा?
बीजेपी के कई नेताओं ने भी इस पर सवाल उठाए हैं। लालू से मुलाकात को लेकर जब रेड्डी से सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ऐसी चीजों पर वह कोई कमेंट नहीं करते हैं। उन्होंने आगे कहा, “लालू कोई आम आदमी हैं क्या?”
पश्चिम बंगाल के बांकुरा में एक मुस्लिम फेरीवाले पर हमले की खबर को ‘द वायर’ ने तोड़-मरोड़कर सांप्रदायिक रंग देकर पेश किया और एक आर्टिक्ल छाप दिया। वेबसाइट ने लिखा कि 60 साल के मइमूर अली मंडल को ‘जय श्री राम’ बोलने के लिए मजबूर किया गया और मना करने पर चाकू मारा गया। लेकिन अब पुलिस की जाँच और आधिकारिक बयान से साफ हो गया है कि ‘द वायर’ की कहानी भ्रामक, तथ्यहीन और समाज में जहर घोलने वाली थी।
बांकुरा पुलिस ने खुद प्रेस नोट जारी कर कहा है कि घटना पूरी तरह ‘अपराध की श्रेणी’ में आती है, इसका ‘कोई धार्मिक या सांप्रदायिक पहलू नहीं’ है। हमलावर ने पैसों के लिए हमला किया और वो नशे की हालत में था। पुलिस ने आरोपित को एक घंटे के अंदर गिरफ्तार भी कर लिया। फिर भी ‘द वायर’ ने अपनी रिपोर्ट में पूरे मामले को ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ की शक्ल दे दी और एकतरफा बयानबाज़ी पर आधारित कहानी चला दी।
क्या है असली मामला?
6 सितंबर 2025 की दोपहर बांकुरा में एक मुस्लिम फेरीवाले मइमूर अली मंडल पर चाकू से हमला हुआ। आरोपित ने मंडल से ₹200 माँगे, जो फेरीवाले मइमूर ने देने से मना किया। इसके बाद आरोपित ने हमला कर दिया। पुलिस की शुरुआती जाँच में यह बात सामने आई कि आरोपित नशेड़ी है और उसका कोई पूर्व आपराधिक या सांप्रदायिक रिकॉर्ड नहीं है।
It has come to notice that some social media handles have posted that a hawker from Punisole was assaulted yesterday in Bankura town by someone and forced to chant religious slogans, portraying it as a communal incident. This is factually incorrect and misleading.
घटना के तुरंत बाद पुलिस ने मंडल की शिकायत पर केस दर्ज किया और तेजी से कार्रवाई करते हुए आरोपित समीर साहिस को गिरफ्तार कर लिया। आरोपित लोकपुर कद्मापाड़ा का रहने वाला है। बांकुरा और ओंदा पुलिस की संयुक्त टीम ने पूरे मामले को ट्रैक कर यह स्पष्ट किया कि घटना का कोई धार्मिक या ‘जय श्री राम’ जैसे नारे से संबंध नहीं है। पुलिस ने यह भी कहा कि सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश करने वाले किसी भी व्यक्ति से सख्ती से निपटा जाएगा।
‘द वायर’ का एजेंडा उजागर
पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि कुछ सोशल मीडिया हैंडल्स और रिपोर्ट्स ने घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की है, जो पूरी तरह गलत और भ्रामक है। ऐसी सूचनाएँ कानून व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुँचा सकती हैं। इसके बावजूद ‘द वायर’ ने न सिर्फ एकपक्षीय बयान छापा, बल्कि पूरे बांकुरा शहर की छवि खराब करने की कोशिश की। यह दर्शाकर कि वहाँ मुस्लिमों पर धार्मिक हमले हो रहे हैं।
हकीकत यह है कि मंडल खुद पिछले 32 सालों से बांकुरा में काम कर रहे हैं और स्थानीय लोगों से उनका हमेशा अच्छा व्यवहार रहा है। यह बात उन्होंने खुद अपने बयान में भी मानी है। लेकिन ‘द वायर’ ने उसे दरकिनार कर अपने ढर्रे के मुताबिक पूरे मामले को हिंदुत्व की आड़ में मुस्लिम विरोधी हमला बना दिया।
सोचिए, अगर पुलिस ने वक्त पर फैक्ट चेक न किया होता?
‘द वायर’ जैसी वेबसाइटों की यही चाल है- असत्य को सत्य की शक्ल में परोसना, ताकि समाज में अस्थिरता फैले और धार्मिक विभाजन गहराए। जब पुलिस की आधिकारिक जाँच और FIR यह साफ कह रही है कि ‘जय श्री राम’ बोलने का कोई ज़िक्र पुख़्ता रूप से साबित नहीं हुआ है, तब ‘द वायर’ का इस बात को बढ़ा-चढ़ाकर छापना क्या सिर्फ ‘खबर’ देना है? या फिर जानबूझकर समाज को गुमराह करना?
ये रिपोर्टिंग नहीं, प्रोपेगेंडा
बांकुरा पुलिस का कहना है कि ऐसे भ्रामक दावों को फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। सोशल मीडिया पर भी लोगों से अपील की गई है कि वे बिना जाँचे-परखे किसी भी खबर पर भरोसा न करें। इस मामले में सिर्फ एक नशेड़ी के हमले को सांप्रदायिक हिंसा बताकर ‘द वायर’ ने न सिर्फ अपनी पत्रकारिता की विश्वसनीयता खोई है, बल्कि उन लोगों की भावनाओं से खेला है जो पहले से ही समाज में असुरक्षित महसूस करते हैं।
सवाल ये है- क्या ‘द वायर’ अब इस गलत रिपोर्टिंग के लिए माफी माँगेगा? या फिर हमेशा की तरह, सच को दबाकर अपनी फर्जी नैरेटिव की दुकान चलाता रहेगा?
पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने कहा हो या न कहा हो कि ‘अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, अमेरिका का दोस्त होना ज्यादा घातक है।’ लेकिन यह भावना सच है। अमेरिका की दुश्मनी और दोस्ती, दोनों ही दूसरे देशों के लिए हानिकारक है। जापान और दक्षिण कोरिया इसका उदाहरण हैं कि कैसे वाशिंगटन की नीतियाँ दूसरे देशों की संप्रभुत्ता और स्थिरता के लिए नुकसानदायक हैं। फिर चाहे वे सहयोगियों हों या विरोधी।
7 सितंबर 2025 को, दक्षिण कोरियाई सरकार ने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के जॉर्जिया स्थित हुंडई प्लांट में छापा पड़ा और उसके 300 से ज्यादा कर्मचारियों को हिरासत में लिया गया। राष्ट्रपति के चीफ ऑफ स्टाफ कांग हून-सिक ने कहा कि सियोल और अमेरिकी अधिकारियों ने हिरासत में लिए गए कर्मचारियों की रिहाई पर बातचीत की है। रिपोर्टों के अनुसार, दक्षिण कोरिया अपने नागरिकों को स्वदेश वापस लाने के लिए एक चार्टर्ड विमान भेजेगा।
ICE has released a video of its raid on Hyundai–LG's Georgia battery plant site, showing Korean workers chained up and led away.
दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री चो ह्यून ने शनिवार को सियोल में एक आपात बैठक में इसकी पुष्टि की। उन्होंने कहा कि हिरासत में लिए गए 457 लोगों में से 300 से ज्यादा दक्षिण कोरियाई थे। चो ने कहा, “हम अपने नागरिकों की गिरफ्तारियों को लेकर बेहद चिंतित हैं और जिम्मेदारी महसूस करते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि विदेश मंत्रालय ने अपने प्रवासी नागरिक सुरक्षा कार्य बल को सक्रिय कर दिया है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिका में निवेश करने वाली दक्षिण कोरियाई कंपनियों की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। चो ने हिरासत में लिए गए लोगों को दूतावास से मदद देने का भी निर्देश दिया।
हिरासत में लिए गए कोरियाई कर्मचारी (फोटो साभार-CNN)
रिपोर्टों के अनुसार, दक्षिण कोरिया की प्रथम उप-विदेश मंत्री पार्क यून-जू ने अमेरिकी राजनीतिक मामलों की विदेश मंत्री एलिसन हुक से कहा कि यह छापेमारी ऐसे महत्वपूर्ण समय पर हुई है, जब दोनों नेताओं के बीच पहली शिखर वार्ता के दौरान बनी विश्वास और सहयोग की गति को बनाए रखना जरूरी है।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, हिरासत में लिए गए लोगों में वे लोग भी शामिल हैं, जो वीजा की अवधि समाप्त होने के बाद भी रुके थे। उन्हें काम करने से रोका गया है। उनमें से ज़्यादातर को जॉर्जिया के फोल्कस्टन स्थित एक हिरासत केंद्र में रखा गया है।
इस एक्शन को राष्ट्रपति ट्रंप ने सही ठहराया और गिरफ्तार लोगों को ‘अवैध विदेशी’ कहा। उन्होंने कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि अधिकारी ‘सिर्फ अपना काम कर रहे थे।’
अमेरिका में दक्षिण कोरियाई कर्मचारियों के साथ यह अपमानजनक व्यवहार ऐसे वक्त हुआ है, जब वाशिंगटन और सियोल के बीच बड़े व्यापार समझौते की घोषणा हो चुकी है। पिछले महीने, व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए, ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ हुए व्यापार समझौते को ‘ऐतिहासिक’ करार दिया था।
जुलाई में, ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका और दक्षिण कोरिया एक ‘पूर्ण और सम्पूर्ण व्यापार समझौते’ पर पहुँच गए हैं, जिसमें दक्षिण कोरियाई निर्यात पर 15 प्रतिशत टैरिफ, अमेरिकी परियोजनाओं में 350 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता और 100 अरब डॉलर की ऊर्जा खरीद शामिल है।
हालाँकि, अब ऐसा लगता है कि दक्षिण कोरिया की भारी निवेश प्रतिबद्धता के बावजूद ट्रंप प्रशासन का लालच खत्म नहीं हुआ है। यही वजह है कि ‘ऐतिहासिक’ व्यापार समझौते के बावजूद अमेरिका में दक्षिण कोरियाई नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। राष्ट्रपति ट्रंप की यह शायद दक्षिण कोरिया पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है।
उल्लेखनीय है कि 1950 के दशक के कोरियाई युद्ध के बाद से अमेरिका और कोरिया गणराज्य करीब आए। इनके बीच मजबूत सैन्य और व्यापारिक संबंध बने। अमेरिका ने आपसी रक्षा संधि के तहत दक्षिण कोरिया में लगभग 28,500 सैनिक तैनात किये हैं। ये सैन्य दृष्टि से अहम है।
जापान ने अपनी संप्रभुत्ता से किया समझौता
जापान के प्रधानमंत्री ने अमेरिका के साथ अपमानजनक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर होने के कुछ दिनों बाद इस्तीफ़ा दे दिया। ट्रम्प प्रशासन के ‘मित्रों को धमकाओ, सहयोगियों को अपमानित करो, अधिकतम लाभ निचोड़ो, कुछ भी पीछे मत छोड़ो’ की सोच ने जापान जैसे सहयोगी को अपमानित किया।
जापानी प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा ने 7 सितंबर 2025 को इस्तीफा देने की घोषणा की। हालाँकि उनका इस्तीफा घरेलू राजनीतिक उथल-पुथल और उच्च सदन के चुनावों में करारी हार के बाद आया। लेकिन, इशिबा का इस्तीफा अमेरिका के साथ एक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने और अमेरिका में 550 अरब डॉलर का निवेश करने का वादा करने के कुछ ही दिनों बाद आया।
इशिबा ने व्यक्तिगत रूप से सेमीकंडक्टर और ऊर्जा से लेकर दवा उत्पादन और बुनियादी ढाँचे में जापान के निवेश वाले अमेरिकी समझौते का समर्थन किया था। यह रणनीतिक आर्थिक प्रतिबद्धता हाल ही में अमेरिका-जापान व्यापार वार्ता के दौरान की गई थी। बदले में, अमेरिका ने जापानी ऑटोमोबाइल पर शुल्क कम कर दिया।
गौरतलब है कि ट्रम्प ने कहा है कि उनकी सरकार उन क्षेत्रों का फैसला करेगी, जहाँ निवेश किया जाएगा। दूसरे शब्दों में, जापान अपना पैसा अमेरिका को सौंप देगा, जो अपनी पसंद के क्षेत्रों और उद्योगों में निवेश करेगा। इस समझौते की जापान और दुनिया भर में व्यापक आलोचना हुई। इसे अमेरिका के सामने जापानी संप्रभुता के समर्पण की तरह लिया गया। एक तरीके से ट्रम्प ने टोक्यो को एक सम्मानित साझेदार से एक वित्तीय उपनिवेश में बदल दिया।
याद दिला दें कि 1951 की सैन फ्रांसिस्को संधि के बाद से जापान अमेरिका का एक प्रमुख साझेदार है। अमेरिका ने जापान में लगभग 54,000 सैनिक तैनात हैं, जिनमें योकोसुका जैसे प्रमुख अड्डे भी शामिल हैं। यहाँ अग्रिम मोर्चे पर तैनात एकमात्र अमेरिकी विमान वाहक पोत रोनाल्ड रीगन स्थित है। ओकिनावा में 26,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जिनमें कडेना एयर बेस जैसे प्रतिष्ठान भी शामिल हैं।
यह ‘व्यापार समझौता’ जापान के लिए इतना अपमानजनक है कि ट्रम्प प्रशासन के अधिकारी भी अपनी खुशी व्यक्त करने में खुद को नहीं रोक पाए। अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने कहा कि अमेरिका-जापान समझौता डोनाल्ड ट्रम्प को इस बात का ‘विवेकाधिकार’ देता है कि 550 अरब डॉलर का जापानी निवेश कहाँ जाएगा।
सीएनबीसी के एक शो में लुटनिक ने कहा, “अमेरिकी टैरिफ दर को कम करने के लिए, जापानियों ने राष्ट्रपति ट्रम्प को 550 अरब डॉलर दिए हैं, ताकि वे यह निर्देश दे सकें कि इन पैसों का अमेरिका में कहाँ और कैसे निवेश किया जाए। यह डोनाल्ड ट्रम्प को उनके शेष कार्यकाल के लिए एक साल की जीडीपी वृद्धि का आधा प्रतिशत है, जो उन्हें अमेरिका में राष्ट्रीय और आर्थिक सुरक्षा के निर्माण के लिए दिया गया है। डोनाल्ड ट्रम्प के लिए काम करना सबसे मज़ेदार है…”
ट्रंप के हमलावर तेवरों ने जिस तरह जापान का मज़ाक उड़ाया, उससे पता चलता है कि अमेरिका अपने सहयोगियों और व्यापारिक साझेदारों के साथ कैसा व्यवहार करता है। दरअसल, कोई साझेदार ही नहीं है। एक तरफ अमेरिका है, दूसरी तरफ उसका वित्तीय उपनिवेश।
वियतनाम ने झुककर ट्रंप से टैरिफ में कटौती हासिल की
यह सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन छोटा-सा वियतनाम, जिसने कभी अमेरिका को हराया था, अब डोनाल्ड ट्रंप के सामने नतमस्तक है। बदले में अमेरिका ने टैरिफ को 46 प्रतिशत से घटा कर 20 प्रतिशत कर दिया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने साल 2025 की शुरुआत में, वियतनाम पर 46 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की थी, हालाँकि, 2 अप्रैल को उन्होंने टैरिफ को घटाकर 20 प्रतिशत करने की घोषणा की। यह खबर दक्षिण पूर्व एशियाई देश में ट्रंप परिवार को एक भव्य गोल्फ कोर्स निर्माण को मंजूरी मिलने के बाद आई।
अमेरिका ने वियतनाम पर 20 प्रतिशत टैरिफ लगाई है, जबकि वियतनाम में अमेरिकी सामानों पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा। इस समझौते ने वियतनाम की अर्थव्यवस्था को अमेरिकी सामानों के लिए खोल दिया गया। ट्रंप के परिवार को एक गोल्फ़ कोर्स के लिए मंज़ूरी मिल गई, लेकिन इससे वियतनाम को कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। यहाँ तक कि अमेरिका ने वियतनाम को बाज़ार अर्थव्यवस्था के रूप में मान्यता नहीं दी और न ही उच्च तकनीक वाले निर्यात प्रतिबंधों को हटाया। वियतनाम की अमेरिकी बाजार पर निर्भरता, जो उसके निर्यात का लगभग 30 प्रतिशत है, और भारी टैरिफ के मंडराते ख़तरे ने वियतनाम को वाशिंगटन को रियायतें देने के लिए मजबूर किया।
ट्रंप के सामने यूरोपीय संघ का आत्मसमर्पण
ट्रंप के सामने यूरोपीय संघ के आत्मसमर्पण ने ट्रंप के इस विश्वास को और बढ़ा दिया कि वे टैरिफ़ को हथियार बनाकर देशों को अमेरिका समर्थक व्यापार समझौते करने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
जापान और दक्षिण कोरिया के अलावा, ट्रंप प्रशासन ने यूरोपीय संघ (ईयू) को भी नहीं बख्शा। दरअसल, यूरोपीय संघ के आत्मसमर्पण ने ही ट्रंप में यह विश्वास जगाया कि टैरिफ, धमकियों और आक्रामक रवैया अपना कर दूसरे देशों को घुटने टेकने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
यूरोपीय संघ ने 27 जुलाई 2025 को अमेरिका के साथ एक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए। ये समझौता ट्रम्प की टैरिफ धमकियों के आगे ईयू के समर्पण को दर्शाता है। यूरोपीय संघ ने अमेरिकी सामानों पर टैरिफ 27.5 प्रतिशत से घटाकर 15% कर दिया, जबकि यूरोपीय संघ को अमेरिकी निर्यात पर कोई टैरिफ छूट नहीं दी गई।
इसके अलावा, यूरोपीय संघ ने अमेरिका से लगभग 750 अरब डॉलर की ऊर्जा खरीद और 600 अरब डॉलर के निवेश, अमेरिकी सैन्य उपकरणों की खरीद में वृद्धि की प्रतिबद्धता जताई।
ट्रम्प ने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन पर एकतरफा शर्तों पर सहमत होने का दबाव डाला। हालाँकि, इसकी कीमत यूरोपीय उद्योगों, विशेष रूप से ऑटोमोटिव और फार्मास्यूटिकल्स को भारी नुकसान के तौर पर उठानी पड़ी।
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के विश्लेषण से पता चलता है कि वोक्सवैगन और मर्सिडीज-बेंज जैसे जर्मन ऑटोमोबाइल निर्माता, जो अपने वाहनों का 10% से अधिक अमेरिका को निर्यात करते हैं, उनके लाभ में 1.5-2 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वार्षिक कमी आएगी।
जैसा कि इस साल अप्रैल में भारत के मामले में देखा गया था, ट्रंप ने यूरोपीय संघ के लिए भी एक समय सीमा तय कर दी थी, जिसमें 1 अगस्त 2025 तक व्यापार समझौता न होने पर यूरोपीय उत्पादों पर 30% टैरिफ लगाने की धमकी दी गई थी। ट्रंप ने 1 अगस्त तक व्यापार समझौता न होने पर यूरोपीय दवा उत्पादों पर 200 प्रतिशत का भारी टैरिफ लगाने की भी धमकी दी थी।
भारत ने ट्रंप की धौंस के आगे झुकने से किया इनकार
जहां यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया को ट्रंप प्रशासन के हाथों अपमान सहना पड़ा, वहीं भारत, चीन और रूस जैसे देशों ने अमेरिका दबाव के आगे झुकने से इनकार करके वाशिंगटन को सोचने के लिए मजबूर किया।
डोनाल्ड ट्रंप ने इस साल की शुरुआत में भारत पर 25% टैरिफ लगाया, फिर भारत द्वारा रूस से तेल खरीद के लिए ‘दंड’ के रूप में 25 प्रतिशत का और टैरिफ लगाया। ट्रम्प ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना ‘मित्र’ कहा और फिर भारत की निंदा की। ट्रंप ने यहाँ तक कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था मरी हुई है। उन्होंने अपने खास ‘भारत विरोधी’ करीबियों पीटर नवारो, स्कॉट बेसेंट और हॉवर्ड लुटनिक को भारत को खलनायक बनाने और रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए नई दिल्ली को दोषी ठहराने के लिए आगे कर दिया।
ट्रंप के अड़ियल रवैये और मोदी द्वारा ट्रंप के अहंकार को संतुष्ट करने से इनकार करने के कारण, अमेरिका-भारत संबंध इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है। ट्रंप चाहते थे कि प्रधानमंत्री मोदी मई में भारत-पाकिस्तान विवाद को रोकने का श्रेय उन्हें दें। लेकिन भारत ने ट्रंप को कोई श्रेय नहीं दिया, हालाँकि पाकिस्तान ने झुककर ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ‘नामित’ कर दिया। ट्रंप ने अपने जीवन का लक्ष्य शायद नोबेल शांति पुरस्कार जीतना ही बना लिया है।
लेकिन भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सीजफायर में अमेरिका योगदान को नकार दिया। इसके बाद ट्रंप के लिए रूसी तेल खरीद बड़ा मुद्दा बन गया। एक ऐसा मुद्दा जिसकी पहले वह प्रशंसा कर चुका है।
बिना सोचे-समझे टैरिफ लगाने से लेकर, भारत पर रूस- यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा देकर मुनाफा कमाने का आरोप लगाने का कोई मतलब नहीं है। ये भी तब जबकि अमेरिका खुद सबसे बड़ा मुनाफ़ाखोर है, रूसी तेल खरीदना जारी रखने और चीन के साथ संबंध सुधारने के मोदी सरकार के फैसले की निंदा करना, ‘ब्राह्मणों’ पर हमला करना जैसी बातें सिर्फ इसलिए की जा रही हैं, ताकि भारत पर अपने विशाल कृषि और डेयरी बाज़ार को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने के लिए मजबूर किया जा सके।
हालाँकि, भारत ने ट्रंप प्रशासन को स्पष्ट कर दिया है कि नई दिल्ली अमेरिका के साथ कोई भी व्यापार समझौता तभी करेगा जब उसे एक समान और सम्मानित भागीदार माना जाएगा, न कि सिर्फ अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाली कामधेनू गाय। हाल ही में संपन्न शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में दिखी रूस चीन और भारत की गर्मजोशी ने अमेरिका को एक कड़ा संदेश दिया कि सभी देशों को टैरिफ, धमकियों और बेलगाम बयानबाजी से गुलामी के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
1946 के डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली दंगों में हिंदुओं के खिलाफ हुए नरसंहार की भयावहता को सामने लाने वाली फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ अब विकिपीडिया के अपमानजनक एजेंडा का निशाना बन गई है।
रिलीज के सिर्फ तीन दिन के भीतर ही इस फिल्म को तथाकथित ‘फ्री इनसाइक्लोपीडिया’ पर राजनीतिक रूप से प्रेरित एडिटर्स के एक संगठित प्रयास से ‘प्रोपेगेंडा’ बता दिया गया है।
करोड़ों लोग आज भी यह गलतफहमी पालते हैं कि विकिपीडिया भरोसेमंद सूचना का स्रोत है। इसलिए ‘द बंगाल फाइल्स’ को लेकर उनकी धारणा इस ऑनलाइन ‘इनसाइक्लोपीडिया’ पर बने फिल्म के पेज के जरिए प्रभावित हो सकती है।
‘द बंगाल फाइल्स’ के विकिपीडिया पेज का शुरुआती हिस्सा
विकिपीडिया के शुरुआती पैराग्राफ (आर्काइव) में दावा किया गया है कि ‘द बंगाल फाइल्स’ एक ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ है और यह गलत तरीके से कहती है कि डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली दंगों से जुड़े इतिहास के अध्यायों को ‘जानबूझकर दबाया या अनदेखा किया गया’।
विकिपीडिया पर दावा किया गया है, “फिल्म को आलोचकों से नेगेटिव समीक्षाएं मिलीं और इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए इसे खासा विरोध झेलना पड़ा।”
फिल्म की नकारात्मक छवि पूरे लेख में बनाई गई है, खासकर ‘रिसेप्शन’ सेक्शन में। ‘द बंगाल फाइल्स’ के विकिपीडिया पेज पर लिखा गया, “द बंगाल फाइल्स को आलोचकों से ज्यादातर नकारात्मक समीक्षाएं मिलीं।”
विकिपीडिया आर्टिकल के ‘टॉक पेज’ से हुआ दुर्भावनापूर्ण एडिटिंग का खुलासा
ऑपइंडिया ने फिल्म के विकिपीडिया पेज के टॉक पेज (आर्काइव) को देखा तो हमें नजर आया कि कुछ राजनीतिक रूप से प्रेरित एडिटर्स जानबूझकर इसमें छेड़छाड़ कर रहे थे।
‘द बंगाल फाइल्स’ को विकिपीडिया पर जिस तरह गलत ढंग से पेश किया गया, वह दरअसल फिल्मों की समीक्षाओं पर आधारित था। ये समीक्षाएँ दरअसल राय होती हैं, तथ्य आधारित खबरें नहीं लेकिन विकिपीडिया इन्हें ही ‘भरोसेमंद स्रोत’ मानता है।
उदाहरण के लिए, ‘द हिंदू’ अखबार को विकिपीडिया पर ‘भरोसेमंद स्रोत’ माना जाता है, जबकि यही अखबार रक्षा मंत्रालय के दस्तावेजों को गलत तरीके से पेश कर राफेल सौदे को ‘घोटाला’ बताने की कोशिश कर चुका है।
‘द बंगाल फाइल्स’ को ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ कहने की शुरुआत भी दरअसल ‘द हिंदू’ अखबार में छपी एक राय/समीक्षा से हुई थी।
विकिपीडिया के एक एडिटर जिसका यूजरनेम ‘EarthDude’ है, जो फिल्म के लेख में दुर्भावनापूर्ण बदलाव कर रहा था। वह एडिटर लगातार ‘द हिंदू’ और ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की राय को ‘सच्चाई’ बताकर पेश करता रहा।
जब एक दूसरे एडिटर ने यह दलील दी कि ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ (जो विकिपीडिया के हिसाब से भी भरोसेमंद स्रोत है) ने अपनी समीक्षा में ‘द बंगाल फाइल्स’ को कहीं भी ‘प्रोपेगेंडा’ नहीं कहा, तो उसकी बात को नजरअंदाज कर दिया गया।
इसमें शामिल दूसरे एडिटर बार-बार निष्पक्ष सारांशों को हटाते रहे ताकि अपनी राजनीतिक सोच को हकीकत की तरह दिखा सकें। ‘टॉक पेज’ पर एक और दिलचस्प चर्चा फिल्म के बजट को लेकर हुई।
फिल्म के डायरेक्टर ने सीधे कहा था कि बजट 30 करोड़ रुपए है, इसके बावजूद विकिपीडिया के एडिटर्स ने मीडिया की अटकलों पर आधारित रिपोर्टों को ही बजट का आधार मान लिया।
एडिटर ‘EarthDude’ डायरेक्टर के बयान के बाद भी ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट का हवाला देने पर अड़ा रहा, जिसमें दावा किया गया था कि फिल्म का बजट ‘कम से कम’ 50 करोड़ रुपए है।
रिपोर्ट की अविश्वसनीयता के बावजूद, ‘EarthDude’ ने कहा, “डायरेक्टर ने क्या कहा इससे फर्क नहीं पड़ता। मायने रखता है कि भरोसेमंद सोर्स क्या कहता है। जब तक कोई भरोसेमंद सोर्स यह न लिख दे कि बजट 30 करोड़ है, तब तक हम 50 करोड़ रुपए ही लिखेंगे।”
जब एक एडिटर ने अमर उजाला की रिपोर्ट दिखाई, जिसमें साफ-साफ 30 करोड़ रुपए का बजट लिखा था और यह भी कहा कि अमर उजाला फिल्मों और सिनेमा पर भरोसेमंद स्रोत है, तब भी कोई ‘सर्वसम्मति’ नहीं बनी।
इस खबर को लिखे जाने तक विकिपीडिया के पेज पर ‘द बंगाल फाइल्स’ का बजट 50 करोड़ रुपए लिखा है, जो डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री द्वारा बताए गए बजट से 67% ज्यादा है।
‘टॉक पेज’ का विश्लेषण करते हुए हमने पाया कि कुछ विकिपीडिया संपादकों ने साजिशन फिल्म की समीक्षाओं को ‘ज्यादातर नकारात्मक’ दिखाने की कोशिश की। जबकि हकीकत यह थी कि 4 समीक्षाएँ बेहद सकारात्मक थीं और 7 समीक्षाएँ निष्पक्ष थीं।
लोकप्रिय न्यूज वेबसाइट ‘मनीकंट्रोल’ को ‘भरोसेमंद नहीं’ कहा गया जबकि लेफ्ट झुकाव वाले पोर्टल ‘स्क्रॉल’ की नकारात्मक समीक्षा को फिल्म की ‘रिसेप्शन’ में शामिल किया गया।
एक एडिटर ने सवाल उठाया, “मुझे समझ नहीं आता कि मनीकंट्रोल की समीक्षा हटाने और स्क्रॉल की समीक्षा रखने का क्या औचित्य है।”
दुर्भावनापूर्ण संपादन करने वाले विकिपीडिया संपादक अमर उजाला और DNA इंडिया की सकारात्मक समीक्षाओं को ‘फ्रिंज सोर्स’ कहकर खारिज करने की कोशिश कर रहे थे। जबकि DNA इंडिया को खुद विकिपीडिया ने भारतीय फिल्मों और सिनेमा के लिए ‘भरोसेमंद स्रोत’ माना हुआ है।
दिलचस्प यह भी है कि बदनाम संपादक ‘EarthDude’ ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि पहले सकारात्मक समीक्षाएँ, फिर तटस्थ और उसके बाद नकारात्मक समीक्षाएँ लिखी जाएँ।
यहाँ तक कि विकिपीडिया के अपने ‘फीचर्ड आर्टिकल्स’ और ‘गुड आर्टिकल्स’ में यही परंपरा अपनाई जाती है। लेकिन इस वक्त ‘द बंगाल फाइल्स’ के पेज पर नकारात्मक समीक्षाएं ‘रिसेप्शन’ सेक्शन के शुरुआत में ही लिखी हैं।
ऑपइंडिया के डॉजियर खोली थी विकिपीडिया की पोल
सितंबर 2024 में ऑपइंडिया ने विकिपीडिया का पर्दाफाश करने वाला डॉजियर जारी किया था। इस 186 पन्नों के डॉजियर में इस तथाकथित ‘फ्री इनसाइक्लोपीडिया’ के बारे में कई खुलासे किए गए।
इसमें विकिपीडिया की गैर-निष्पक्षता, एक सख्त नियंत्रित इकोसिस्टम, ‘अनाम फंडिंग’, भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी संगठनों को समर्थन, प्रकाशक की तरह काम करना और भारतीय कानूनों के दायरे में ना आना जैसी बातें उजागर की गई थीं।
‘द बंगाल फाइल्स’ के बारे में तोड़-मरोड़कर जारी देने को लेकर भी हम खासतौर पर विकिपीडिया के तथाकथित ‘भरोसेमंद स्रोतों’ की सच्चाई पर ध्यान दिलाना चाहते हैं।
डॉजियर के पेज 4 पर साफ लिखा है-
“विकिपीडिया की ‘एनपीओवी’ (न्यूट्रल प्वॉइंट ऑफ व्यू) गाइडलाइन्स का मतलब यह नहीं है कि हर तरह के विचारों को बराबर या न्यायपूर्ण जगह मिलेगी। इसका नतीजा सिर्फ इतना है कि जो भी विवरण तथाकथित ‘भरोसेमंद स्रोत’ में लिखा है, वही विकी आर्टिकल में डाला जाएगा।
समस्या यह है कि जिन ‘भरोसेमंद स्रोतों’ की लिस्ट है, वह खुद पक्षपात से ग्रस्त है। विकिपीडिया के एडिटर और एडमिनिस्ट्रेटर, जिनके पास असीमित ताकत है, वे ‘राइट विंग’ (गैर-लेफ्ट) स्रोतों को ‘डिप्रिकेटेड’ या ‘ब्लैकलिस्ट’ कर देते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि ऐसे स्रोतों को किसी भी विकिपीडिया आर्टिकल में रेफरेंस के तौर पर इस्तेमाल ही नहीं किया जा सकता।”
हमारे लंबे शोध के दौरान पता चला कि ज्यादातर गैर-लेफ्ट स्रोतों पर विकिपीडिया में बैन है।
डॉसियर (पेज 139) में लिखा है- “डिप्रिकेटेड और ब्लैकलिस्टेड स्रोतों की लिस्ट खुद दिखाती है कि विकिपीडिया के आर्टिकल्स पक्षपात से भरे होंगे। क्योंकि जिन स्रोतों को भरोसेमंद माना गया है, और जिन्हें नहीं, उनका फैसला खुद लेफ्ट पक्षपात से प्रेरित है।”
इत्तेफाक देखिए, कतर से फंडेड इस्लामिस्ट पोर्टल अल जजीरा और लगातार फेक न्यूज फैलाने वाला बीबीसी विकिपीडिया पर ‘भरोसेमंद स्रोत’ माने जाते हैं।
भारत का सरकारी प्रसारक दूरदर्शन इस लिस्ट में शामिल नहीं है। ऑपइंडिया और स्वराज्य जैसे गैर-लेफ्ट प्रकाशनों पर बैन और ब्लैकलिस्ट है। वहीं ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ को ‘भरोसेमंद’ माना गया है।
हमारे शोध में यह भी सामने आया कि ‘द वायर’ की फेक न्यूज, जिसने भारत के पूर्वोत्तर में हिंसा को हवा दी थी, उसे विकिपीडिया पेज पर राजनीति से प्रेरित एडिटर्स ने जोड़ा ही नहीं।
डॉजियर के (पेज 144) में कहा गया है, “लेफ्ट मीडिया द्वारा फैलाई गई फेक न्यूज और उसके नतीजे पर ज्यादातर रिपोर्ट गैर-लेफ्ट मीडिया में मिलती है। लेकिन चूंकि इन्हें विकिपीडिया पर ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है, इसलिए जानकारी जानबूझकर दबा दी जाती है। इसका नतीजा यह है कि पूरी तस्वीर लेफ्ट की तरफ झुकी हुई और पक्षपाती बन जाती है।”
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)
(नोट: लेख के पिछले संस्करण में Wikipedia पर ‘द बंगाल फाइल्स’ से जुड़ी जानकारी संपादित करने वाले एडिटर की पहचान ‘कंप्यूटरएक्ट’ बताई गई थी, जिसे अब सही जानकारी के साथ अपडेट कर दिया गया है।)
ओडिशा हाई कोर्ट ने भगवान जगन्नाथ की पवित्र ‘अमृतमनोही भूमि’ को अतिक्रमणकारियों के पक्ष में देने से साफ इनकार कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ लंबे समय से कब्जा किए रहने या पहचान पत्र होने से कोई व्यक्ति इस जमीन का मालिक नहीं बन सकता।
यह फैसला जस्टिस संजीव कुमार पाणिग्रही की बेंच ने दिया। बेंच ने कटक सदर इलाके में रह रहे मजदूर परिवारों की याचिका खारिज कर दी, जो बीते 50 सालों से इस जमीन पर रह रहे थे और अब उसका मालिकाना हक माँग रहे थे।
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब 12 जनवरी 2024 को कटक सदर के अतिरिक्त तहसीलदार ने अतिक्रमण हटाने का नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता एक मजदूर परिवार हैं, जो दशकों से इस जमीन पर रह रहे हैं।
यह जमीन भगवान श्री जगन्नाथ के नाम पर ‘अमृतमनोही’ के रूप में दर्ज है और श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA), पुरी के अधीन आती है। जब बेदखली का नोटिस आया तो लोगों ने मंदिर प्रशासन से जमीन खरीदने की अनुमति माँगी और दावा किया कि वे लंबे समय से वहाँ रह रहे हैं, उनका पता सभी पहचान पत्रों में दर्ज है और वे संपत्ति कर भी दे रहे हैं।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि मंदिर की ‘अमृतमनोही’ जमीन न तो आम सरकारी जमीन है और न ही इसे सामान्य नियमों के तहत बेचा या निपटाया जा सकता है। यह जमीन धार्मिक और सार्वजनिक महत्व की है। इस पर कब्जा करने वालों को सिर्फ इसलिए मालिकाना हक नहीं दिया जा सकता क्योंकि वे लंबे समय से वहाँ रह रहे हैं।
कोर्ट ने मंदिर प्रशासन के फैसले को सही ठहराया और कहा कि अतिक्रमण हटाने का आदेश वैध है। जस्टिस पाणिग्रही ने यह भी साफ किया कि पहचान पत्र, बिजली बिल, राशन कार्ड आदि सिर्फ निवास का प्रमाण होते हैं, न कि जमीन के कानूनी मालिक होने का।
याचिकाकर्ताओं ने ‘श्री जगन्नाथ महाप्रभु बीजे पुरींका ज़मीनी बिकरी संबंधीय समान नीति’ (एकरूप नीति) का हवाला दिया था, लेकिन कोर्ट ने कहा कि यह नीति सिर्फ वैध या अनुमति प्राप्त कब्जे के मामलों में लागू होती है, अतिक्रमण के मामलों में नहीं।
कोर्ट ने आगे कहा कि यह नीति ‘कानूनी प्रक्रिया के तहत‘ लंबे समय से कब्जे को नियमित करने के लिए है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी आकर जमीन पर कब्जा करे और सालों बाद मालिकाना हक माँगने लगे।