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नेपाल में सोशल मीडिया पर बैन के खिलाफ संसद में घुसे प्रदर्शनकारी: बांग्लादेश-श्रीलंका की तरह का दिख रहा पैटर्न, जमकर हो रहा बवाल

क्या श्रीलंका और बांग्लादेश की चुनी हुई सरकार को जिस तरह से साजिश के तहत गिराया गया था, क्या वही नेपाल के साथ हो रहा है? श्रीलंका और बांग्लादेश में जिस तरह संसद पर कब्जा किया गया और अराजकता फैलाया गया, नेपाल में भी कुछ ऐसा ही दिख रहा है।

नेपाल की संसद में घुसे प्रदर्शनकारी

नेपाल में सोशल मीडिया इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, फेसबुक आदि पर बैन लगाए जाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ युवा विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। जेन जी यानी 18 से 30 साल के युवा सोमवार (8 सितंबर 2025) को संसद में घुस गए। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए आँसू गैस के गोले दागे और पानी का बौछार किया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ भी चलाई गईं। इसमें अब तक 14 प्रदर्शनकारियों की मौत की खबर है।

नेपाल पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शन में 12 हजार से ज्यादा युवा शामिल हैं। संसद के गेट नंबर1 और गेट नंबर 2 पर प्रदर्शनकारियों ने कब्जा कर लिया। इसके बाद राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री समेत तमाम वीवीआईपी के घरों के आसपास के इलाके में कर्फ्यू लगा दिया गया।

‘नेपो किड’ और ‘नेपो बेबीज’ जैसे हैशटैग हिट हुए

भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाने के सरकार के फैसले के खिलाफ जेन जेड के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन डिजिटल स्पेस पर भी हो रहा है।

हाल के दिनों में, ‘नेपो किड’ और ‘नेपो बेबीज़’ जैसे हैशटैग ऑनलाइन ट्रेंड कर रहे हैं, और सरकार द्वारा अपंजीकृत प्लेटफॉर्म्स को ब्लॉक करने के फैसले के बाद इसमें और तेजी आई है।

काठमांडू जिला प्रशासन कार्यालय के अनुसार, ‘हामी नेपाल’ ने राजधानी में रैली का आयोजन किया था, जिसके लिए पूर्व अनुमति ली गई थी। समूह के अध्यक्ष सुधन गुरुंग ने कहा कि यह विरोध प्रदर्शन सरकारी कार्रवाइयों और भ्रष्टाचार के विरोध में था और देश भर में इसी तरह के प्रदर्शन हो रहे हैं।

आयोजक विरोध प्रदर्शन के मार्गों और सुरक्षा सुझावों की जानकारी साझा करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने छात्रों से भी अपनी वर्दी पहनकर और किताबें लेकर प्रदर्शन में शामिल होने का आग्रह किया।

नेपाल सरकार ने क्यों लगाया था सोशल मीडिया पर बैन

नेपाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सोशल मीडिया पर बैन लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने ही सोशल मीडिया साइट्स को रजिस्ट्रेशन कराने के आदेश दिए थे। इसके लिए 7 दिन का समय दिया था। लेकिन इन साइट्स ने रजिस्ट्रेशन नहीं कराया। इसके बाद ओली सरकार ने 3 सितंबर को फेसबुक, व्हाट्सएप यूट्यूब समेत कई सोशल मीडिया साइट्स पर बैन लगा दिया था। इन प्लेटफॉर्म को नेपाल की सूचना प्रोद्योगिकी मंत्रालय में रजिस्ट्रेशन करना था। मंत्रालय ने 28 अगस्त को आदेश जारी किया था। इसके लिए 7 दिन का समय दिया गया था। ये समय 2 सितंबर को खत्म हो गया।

क्यों नहीं हो पाया 26 कंपनियों का रजिस्ट्रेशन

दरअसल हर कंपनी को नेपाल में लोकल ऑफिस रखना और कंटेंट को लेकर लोकल अधिकारी नियुक्त करना जरूरी था, ताकि जरूरत पड़ने पर कंटेंट में तुरंत सुधार कराया जा सके। इसके अलावा यूजर्स का डेटा शेयर करना भी जरूरी कर दिया गया था। कंपनियों को ये नियम सख्त लग रहे थे और इसमें खर्च भी ज्यादा था। हालाँकि भारत और यूरोपीय देशों में ये नियम लागू हैं।

अमेरिका के हस्तक्षेप का नेपाल में दिख रहा असर

ये सब तब हो रहा है जब अमेरिका का हस्तक्षेप वहाँ बढ़ा है। दरअसल सोशल मीडिया पर बैन हटाने से ज्यादा अब प्रदर्शनकारियों की माँग प्रधानमंत्री ओली को हटाने पर केन्द्रित हो गई है। ओली चीन के करीबी माने जाते हैं। लेकिन हाल के दिनों में अमेरिका का नेपाल में जिस तरह से हस्तक्षेप बढ़ा, उसका एहसास लिपुलेख मामले में भी हुआ है। नेपाल ने भारत और चीन के बीच व्यापारिक रास्ते के रूप में लिपुलेख दर्रे के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे ‘अपना क्षेत्र’ कहा। जबकि लिपुलेख पर दावा करने के पीछे न तो नेपाल के पास कोई आधार है और न ही औचित्य है।

अमेरिकी मदद से चल रही करोड़ों की परियोजनाएँ

इनदिनों नेपाल में अमेरिकी वित्तीय और राजनयिक सहायता बढ़ गई है। अमेरिका ने नेपाल में USAID की मदद से चल रही प्रमुख विकास कार्यों को कुछ दिनों के लिए निलंबित कर प्रेशर बनाया। इस दौरान मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (MCC) की करोड़ों डॉलर की परियोजनाएँ वैसे ही जारी रही। इस मदद को भी अमेरिका ने शर्तें लगा कर कूटनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया।

एनएमबी बैंक के साथ मिलकर, नेपाल ने अप्रैल 2025 में अमेरिका से संबद्ध संगठनों इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन (आईएफसी), ब्रिटिश इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट (बीआईआई) और मेटलाइफ के साथ 60 मिलियन डॉलर का ऐतिहासिक ग्रीन बॉन्ड समझौता किया। इस समझौते से नेपाल में निजी क्षेत्र का विकास होगा। साथ ही ग्रीन टेक्नोलॉजी को बढ़ावा मिलेगा।

नेपाल में अमेरिका की दिलचस्पी ये बताता है कि अपने हित में ‘क्षेत्रीय संतुलन’ को बनाने के लिए अमेरिका लगातार नेपाल में अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है। लिपुलेख पर नेपाल के किए दावों को अमेरिका की शह मिली है। उसे आर्थिक मदद देकर लुभाया जा रहा है। नेपाली पीएमओली चीन समर्थक माने जाते रहे हैं, ऐसे में उन्हें हटाने की तैयारी चल रही है, ऐसा लगता है।

₹72 हजार करोड़ का जो ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ देश की सुरक्षा के लिए जरूरी, उसे उजाड़ना चाहती हैं सोनिया गाँधी: क्यों कॉन्ग्रेस को राष्ट्रहित के हर कार्य में दिखता है खतरा?

कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने द हिंदू (8 सितंबर 2025) में अपने लेख ‘द मेकिंग ऑफ एन इकोलॉजिकल डिजास्टर इन द निकोबार’ में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को ‘पूरी तरह बेकार 72,000 करोड़ की खर्चीली योजना’ बताया। उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट ‘जनजातीय समुदायों के लिए अस्तित्व का खतरा’ है और ‘दुनिया की अनोखी वनस्पति और जीव-जंतुओं की विविधता को तबाह कर देगा।’

सोनिया ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि वह ‘आदिवासियों के अधिकारों को कुचल रही है’ और ‘कानूनी प्रक्रिया की धज्जियाँ उड़ा रही है।’

सोनिया गाँधी का ये तरीका पुरानी कॉन्ग्रेस की स्टाइल है: हर विकास को आपदा बताना और हर बड़े प्रोजेक्ट को संविधान के खिलाफ दिखाना। लेकिन अगर गौर से देखें, तो उनकी बातें एकतरफा, डराने वाली और राजनीति से भरी हुई हैं।

सोनिया गाँधी के लेख का स्क्रीनशॉट

सुनामी के समय कॉन्ग्रेस ने आदिवासियों को छोड़ दिया था अकेला

सोनिया गाँधी कहती हैं कि ये प्रोजेक्ट निकोबारी और शोम्पेन आदिवासियों को उनकी जमीन से पूरी तरह हटा देगा। लेकिन प्रोजेक्ट के लिए चुने गए इलाकों को बहुत सोच-समझकर तय किया गया है, ताकि आदिवासी बस्तियों को कम से कम नुकसान हो। ये कहना कि सब उजड़ जाएँगे, बढ़ा-चढ़ाकर बात है।

गौर करने वाली बात ये है कि 2004 की सुनामी में निकोबारी लोगों के पुराने गाँव तबाह हुए थे। उस वक्त कॉन्ग्रेस की सरकार थी, लेकिन उसने गाँवों को दोबारा बसाने या आदिवासियों को आधुनिक सुविधाएँ देने के लिए कुछ खास नहीं किया। अब जब सरकार सड़क, बिजली और कनेक्टिविटी की बात करती है, तो कॉन्ग्रेस इसे ‘बड़ा खतरा’ बताती है।

सोनिया गाँधी ने दे रही गलत जानकारी

सोनिया कहती हैं कि सरकार ने कानूनी प्रक्रिया और नियमों को नजरअंदाज किया और सामाजिक प्रभाव की जाँच में खामियाँ हैं। लेकिन वो ये नहीं बतातीं कि इस प्रोजेक्ट को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, पर्यावरण मंत्रालय की हाई पावर्ड कमेटी और नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट ने मंजूरी दी है। NCSCM की जमीनी जाँच में पाया गया कि प्रोजेक्ट का इलाका CRZ 1B में है जहाँ बंदरगाह बनाना जायज है न कि CRZ 1A में, जहाँ निर्माण नहीं हो सकता। ये नियम तोड़ना नहीं, बल्कि नियमों का पालन है।

सोनिया गाँधी ने पेड़ लगाने को बताया बकवास, वैसे ये नियम पूरी दुनिया में

सोनिया गाँधी ने जंगल कटाई की भरपाई के लिए पेड़ लगाने को ‘पर्यावरण और इंसानियत की भयानक तबाही’ कहा। लेकिन वो ये नहीं बतातीं कि ये वन संरक्षण कानून के तहत जरूरी है, और इसकी सख्त निगरानी होती है। इसे पूरी तरह खारिज करना उन नियमों को नजरअंदाज करना है, जिन्हें भारत और सोनिया की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस सरकारों ने दशकों तक माना।

सोनिया गाँधी की खतरनाक चुप्पी

सोनिया गाँधी ये बात छिपा जाती हैं कि भारत का 25% कार्गो विदेशी बंदरगाहों से होकर जाता है। इसमें कोलंबो में चीन निर्मित टर्मिनल भी है, भारत का 40% कारोबार संभालता है। वो ये भी नहीं कहतीं कि गलाथिया बे की 18-20 मीटर गहराई और पूर्व-पश्चिम शिपिंग रास्ते पर इसकी जगह भारत को सिंगापुर जैसा ट्रांसशिपमेंट हब बनाने का सौ साल में एक बार मिलने वाला मौका देती है। इससे हम बीजिंग से जुड़े बंदरगाहों पर निर्भरता खत्म कर सकते हैं। लेकिन कॉन्ग्रेस के लिए ये रणनीतिक बात जैसे है ही नहीं।

कॉन्ग्रेस का ‘पर्यावरण चिंता’ का डर

ये कॉन्ग्रेस का पुराना तरीका है। पहले भी कॉन्ग्रेस सरकारों ने अंडमान-निकोबार में हवाई पट्टियाँ, रडार और बंदरगाहों के विस्तार को नाजुक पर्यावरण का हवाला देकर रोका। नतीजा? ये द्वीप रणनीतिक और आर्थिक तौर पर पिछड़ गए। सोनिया का लेख उसी पुरानी चाल का नया हिस्सा है, जिसमें पर्यावरण का डर दिखाकर बड़े बदलाव वाले प्रोजेक्ट को रोका जाता है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट की सच्चाई

साल 2024 में नरेंद्र मोदी सरकार ने गलाथिया बे को ‘प्रमुख बंदरगाह’ घोषित किया। 44,000 करोड़ रुपए का ये प्रोजेक्ट शिपिंग, बंदरगाह और जलमार्ग मंत्रालय के तहत बनेगा और इसे केंद्र से पैसा मिलेगा। इसे चार चरणों में बनाया जाएगा। पहला चरण 2028 तक पूरा होगा, जो 40 लाख TEU (कंटेनर) संभालेगा। 2058 तक ये बंदरगाह 1.6 करोड़ TEU तक संभाल सकता है।

ये सिर्फ एक और बंदरगाह बनाने की बात नहीं है, बल्कि ये भारत की समुद्री कमजोरी को ठीक करने का मौका है। भारत के पूर्वी तट के ज्यादातर बंदरगाहों की गहराई 8-12 मीटर है, जो बड़े जहाजों के लिए कम है। दुनिया के बड़े बंदरगाह 12-20 मीटर गहरे हैं, जो 1.65 लाख टन से ज्यादा के जहाज संभाल सकते हैं। इसीलिए भारत का 25% कार्गो कोलंबो, सिंगापुर और क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों से जाता है। इससे हर साल 1,500 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान और अर्थव्यवस्था को 3,000-4,500 करोड़ का झटका लगता है।

गलाथिया बे की 18-20 मीटर की प्राकृतिक गहराई और पूर्व-पश्चिम समुद्री रास्ते के पास इसकी जगह इसे इस निर्भरता को खत्म करने के लिए बिल्कुल सही बनाती है। रणनीतिक तौर पर ये भारत को बांग्लादेश और म्यांमार के कार्गो के लिए सिंगापुर से मुकाबला करने की ताकत देता है, जहाँ अभी 70% से ज्यादा कार्गो विदेशी बंदरगाहों से जाता है।

सोनिया ने राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल पर साधी चुप्पी

सोनिया गाँधी ने राष्ट्रीय सुरक्षा की बात को सावधानी से छिपाया। भारत का 40% से ज्यादा ट्रांसशिपमेंट कोलंबो से होता है, जहाँ चीन एक टर्मिनल चलाता है और उसने वहाँ अरबों रुपये लगाए हैं। श्रीलंका बीजिंग के कर्ज में डूबता जा रहा है और वहाँ चीनी जासूसी जहाज भी रुकते हैं। इससे भारत की कमजोरी साफ दिखती है। ऐसे में गलाथिया बे का विरोध करना पर्यावरण की चिंता नहीं, बल्कि रणनीतिक भूल है।

सोनिया गाँधी ने कहा कि ‘शोम्पेन और निकोबारी आदिवासियों का अस्तित्व दाँव पर है’ और ‘भारत की आने वाली पीढ़ियाँ इस बड़े पैमाने की तबाही को नहीं झेल सकतीं।’

लेकिन सच इसके उलट है: भारत अब विदेशी बंदरगाहों और चीन के दबदबे को बंधक बनकर नहीं रह सकता। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर्यावरण को नष्ट करने का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को मज़बूत करने, नौकरियाँ पैदा करने और भारत को समुद्री ताकत बनाने का प्रोजेक्ट है।

सोनिया का लेख पर्यावरण बचाने की गुहार कम, राजनीतिक चाल ज्यादा है। हर बड़े कदम को ‘आपदा’ बताकर कॉन्ग्रेस नया विजन नहीं, बल्कि बदलाव का डर दिखाती है। असली आपदा होगी अगर ऐसा डर भारत के रणनीतिक भविष्य को पटरी से उतार दे।

यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखा है। यहाँ क्लिक कर मूल लेख पढ़ सकते हैं।

केवल फिल्म नहीं है ‘द बंगाल फाइल्स’, उस भयावह सत्य से कराती है साक्षात्कार जिसे ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की चादर में छिपाया: इसे देखिए, सोचिए और सच का सामना कीजिए

‘द बंगाल फाइल्स’ वो फिल्म है जो हमारे उस बनावटी विश्वास को चकनाचूर कर देती है कि हम एक शांतिपूर्ण, धर्मनिरपेक्ष और सभ्य समाज में जी रहे हैं। ये फिल्म न सिर्फ एक कहानी सुनाती है, बल्कि आपको उस खूनी बँटवारे के दर्दनाक सच से रू-ब-रू कराती है, जिसे हमारे इतिहासकारों और बंगाल के बुद्धिजीवियों ने हमारी यादों से जैसे मिटा सा दिया है। ये फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं करती, ये आपको सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे साथ क्या हुआ था और आज भी क्या हो रहा है।

जब कोई शानदार फिल्म खत्म होती है, तो लोग तालियाँ बजाते हैं, खुशी से झूम उठते हैं। लेकिन मैं ‘द बंगाल फाइल्स’ देखने के बाद चुप क्यों बैठा रहा? मैंने बाकी दर्शकों के साथ तालियाँ क्यों नहीं बजाईं? ये सवाल मेरे मन में बार-बार घूम रहा था। इसका जवाब ये नहीं कि फिल्म अच्छी नहीं थी। बल्कि ये फिल्म सिर्फ एक फिल्म नहीं थी। इसने मुझे भारत के उस खूनी बँटवारे के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया, जिसे हमारे सरकारी इतिहासकारों और बंगाल के बुद्धिजीवियों ने हमसे छुपाया। ये फिल्म आपको झकझोरती है, आपके सामने सवाल खड़े करती है कि हमारे साथ क्या हुआ था और आज भी क्या हो रहा है।

हमारे नेताओं ने बँटवारे के उस भयानक इतिहास को छुपाने का फैसला क्यों लिया? हमारे वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों ने इस काले अध्याय को सफेद करने की कोशिश क्यों की? क्या किसी गहरे जख्म पर सिर्फ पट्टी बाँध देने से वो ठीक हो जाता है? या वो और सड़ता है, गैंग्रीन बन जाता है? यही सवाल फिल्म में एक जवान अधिकारी अपने सीनियर से पूछता है। वो गुस्से में सवाल करता है कि आखिर हर अपराध, हर समस्या को हिंदू-मुस्लिम का रंग क्यों दे दिया जाता है? ये सवाल सिर्फ फिल्म का नहीं, हम सबके मन का है।

द बंगाल फाइल्स की कहानी और स्क्रीनप्ले

‘द बंगाल फाइल्स’ की कहानी और स्क्रीनप्ले ‘द कश्मीर फाइल्स’ से भी एक कदम आगे है। इस फिल्म में ‘द कश्मीर फाइल्स’ के मुख्य किरदार को फिर से लाना एक शानदार आइडिया था। इससे कहानी में एक गहरा जुड़ाव और सिलसिला बनता है। ये दिखाता है कि परसों भारत का बँटवारा हुआ, कल कश्मीर की बारी थी और आज बंगाल की। और सबसे दुख की बात? बंगाल आज भी वही हालात से गुजर रहा है, जो 1946 में थे। कट्टर मजहबी उग्रवाद का डर कोई एक बार की घटना नहीं, ये एक सिलसिला है, जो आज भी चल रहा है।

फिल्म की कहानी 15 अगस्त, 1947 से पहले के उन भयानक महीनों और आज के बंगाल की अल्पसंख्यक-प्रधान राजनीति के बीच बार-बार आती-जाती है। इन दोनों दौर को जोड़ने वाली कड़ी है भारती बनर्जी का किरदार, जिसे पल्लवी जोशी ने इतने शानदार और दिल को छू लेने वाले अंदाज में निभाया है कि वो कई पुरस्कारों की हकदार हैं। लेकिन शायद वो पुरस्कार न जीत पाएँ, क्योंकि पुरस्कार देने वाली लॉबियाँ वही लोग चलाते हैं, जो अकादमिक जगत और पहले मीडिया को कंट्रोल करते थे। फिल्म के आखिर में आपको एहसास होता है कि भारती बनर्जी असल में उस आहत भारतमाता का प्रतीक है, जो बँटवारे के दर्द को आज भी झेल रही है।

इतिहास के वो किरदार और सच

फिल्म में गोपाल पाठा और हिंदू महासभा के उन बहादुर स्वतंत्रता सेनानियों की बात होती है, जिनके बारे में हममें से ज्यादातर को कुछ पता ही नहीं। आम आदमी को इनके बारे में कभी बताया ही नहीं गया। गाँधी जी को हम आदर्शवादी के रूप में जानते हैं, लेकिन फिल्म में वो कोलकाता और नोआखाली के हिंसक दिनों में खोए हुए, भ्रमित से दिखते हैं।

वो उन महिलाओं को ‘सौम्य सलाह’ देते हैं, जिनका अपहरण हो रहा था, जिनके साथ बलात्कार हो रहा था। थके हुए कॉन्ग्रेस नेता, जो जल्दी आजादी के लालच में हजारों साल पुराने देश के बँटवारे को स्वीकार कर लेते हैं, वो भी आपको परेशान करते हैं। 1946 में हिंदू समुदाय का बिखरा हुआ, डर से भरा जवाब आपको सोचने पर मजबूर करता है।

अगर आपने इतिहास का ये हिस्सा पढ़ा है, तो ये फिल्म आपको और गहरे से जोड़ती है। लेकिन स्क्रीन पर इसे देखना? ये आपके दिल और दिमाग पर हथौड़े की तरह चोट करता है। आपने अपने जीवन में ऐसी क्रूरता नहीं देखी। और आपके दादा-परदादा, जिन्होंने ये सब झेला, उन्होंने ज्यादातर अपनी कहानियाँ आपको बताई ही नहीं।

संवाद जो दिल को छूते हैं

फिल्म के कई संवाद इतने दमदार हैं कि वो यादगार बन सकते हैं। जैसे द कश्मीर फाइल्स का वो मशहूर संवाद था – “सरकार उनकी है, पर सिस्टम हमारा है।” इस फिल्म में हिंदू-मुस्लिम संबंधों और ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की उस बनावटी शांति के बारे में इतने साफ और बेबाक ढंग से बात की गई है, जैसा मैंने पहले कम ही सुना।

हम इन मुद्दों पर बात होने पर घबरा जाते हैं, बेचैन हो जाते हैं। लेकिन सच का सामना करना जरूरी है। जिन नेताओं को अपनी वोट बैंक की राजनीति के उजागर होने का डर है, वो इस फिल्म को बैन करने की कोशिश करेंगे। बंगाल के धर्मनिरपेक्ष नेता, जिनके समर्थक कहते हैं, ‘पसंद नहीं तो मत देखो,’ अब चुप हो जाते हैं, क्योंकि उनकी अंतरात्मा को ठेस पहुँचती है।

अभिनय और किरदार

ऐसी फिल्मों के लिए अच्छे अभिनेता ढूँढना आसान नहीं। इसलिए विवेक अग्निहोत्री ने अपने पुराने, अनुभवी अभिनेताओं के साथ-साथ नए चेहरों को मौका दिया। नए अभिनेताओं का फायदा ये है कि वो अपने किरदारों में पूरी तरह ढल जाते हैं, वो असल लगते हैं। दर्शन कुमार का कृष्ण पंडित का किरदार, जो जिंदगी भर अन्याय सहता है और आखिर में ‘गुलामी’ की बेड़ियाँ तोड़ देता है, फिल्म को एक नई जान देता है। उसकी वो बेबसी, गुस्सा, वो दर्द, आपको भीतर तक हिलाता है।

मिथुन चक्रवर्ती, अनुपम खेर, राजेश खेरा, मोहन कपूर, नमाशी चक्रवर्ती, शाश्वत चटर्जी सबने अपने किरदारों को इतने शानदार तरीके से निभाया है कि हर किरदार को नया रंग मिलता है। युवा भारती मुखर्जी बनी सिमरत कौर खूबसूरत और दमदार लगती हैं। उनका किरदार सबसे मुश्किल है और आप उनके दर्द को महसूस करते हैं। हाँ, काश उनके किरदार में थोड़ा और गहराई और जोश होता।

संगीत और सिनेमैटोग्राफी

‘द बंगाल फाइल्स’ का बैकग्राउंड म्यूजिक आपको सिहरन देता है। ये फिल्म को और ऊपर ले जाता है। मशहूर बांग्ला गानों का इस्तेमाल इतने भावपूर्ण ढंग से किया गया है कि आपकी भावनाएँ और गहरी हो जाती हैं। विवेक अग्निहोत्री ने उस पुराने जमाने का माहौल बनाने के लिए बड़े-बड़े सेट्स बनाए, कोई कसर नहीं छोड़ी। सिनेमैटोग्राफी उस दौर और उस मूड को इतने अच्छे से पकड़ती है कि आप खुद को उसी वक्त में खड़ा पाते हैं।

क्यों असहज करती है ये फिल्म?

ये फिल्म आपके उस नाजुक, सभ्य आत्म-छवि को तोड़ देती है, जिसमें आप मानते हैं कि हम एक शांतिपूर्ण समाज में धर्मनिरपेक्षता और अहिंसा की छतरी के नीचे जी रहे हैं। ये सारी बनावटी धारणाएँ चकनाचूर हो जाती हैं। आपके सामने टूटे हुए शीशे बिखर जाते हैं और ये आपको असहज करते हैं। लेकिन ये असहज होना जरूरी है।

अगर हम नहीं चाहते कि इतिहास फिर से मजाक बनकर दोहराए या कोई त्रासदी हमारे सामने आए, तो हमें सच देखना होगा। जब तक हम सच का सामना नहीं करेंगे, चाहे वो कितना भी असहज हो और सभी पक्ष मिलकर वास्तविक इतिहास को स्वीकार कर सुलह की कोशिश नहीं करेंगे, हम एक शांत और खुशहाल समाज नहीं बना सकते।

दुनिया भर में देशों ने ऐसा किया है। यहूदी नरसंहार पर बनी फिल्मों से दंगे नहीं हुए, बल्कि समाज और संवेदनशील हुआ। अमेरिका में अश्वेतों और मूल निवासियों को गलत दिखाने से शांति नहीं आई, उनकी क्रूरता को स्वीकार करने से लोग संवेदनशील हुए और समाधान ढूँढे जा रहे हैं।

विवेक अग्निहोत्री को दोष मत दीजिए। दोष दीजिए उन झूठी कहानियों को, जो हमें सिखाई गईं। वो तो बस हमें आईना दिखा रहे हैं, ताकि हमारी आत्मा शुद्ध हो और हम सच को अपनाकर आगे बढ़ सकें। ‘द बंगाल फाइल्स‘ सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक जागरूकता है। इसे देखिए, सोचिए और सच का सामना कीजिए।

यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। मूल लेख पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

कर्नाटक से बिहार तक कॉन्ग्रेस ने किसानों को बताई औकात: खरगे ने फसल बर्बादी की पीड़ा को बताया पब्लिसिटी स्टंट, MP तारिक अनवर ने पीठ पर सवार हो बाढ़ का लिया जायजा

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसके आधार पर बीजेपी उन्हें ‘किसान विरोधी’ करार दे रही है। वहीं एक और वीडियो कॉन्ग्रेस सांसद तारिक अनवर का सामने आया है, जिसमें वह किसानों के पीठ पर चढ़ कर उनकी दुर्दशा देख रहे हैं और बाढ़ का जायजा ले रहे हैं।

ये दो घटनाएँ कॉन्ग्रेस की सोच को दर्शाती है। चलिए पहले बात कर लेते हैं अध्यक्ष खरगे की। कर्नाटक के बाढ़ प्रभावित कलबुर्गी में अपने घर पहुँचे मल्लिकार्जुन खरगे ने किसान से कहा कि सिर्फ पब्लिसिटी के लिए यहाँ मत आओ, जाकर मोदी- शाह से पूछा। हुआ यूं कि खरगे प्रेस कॉन्ग्रेस कर रहे थे। उसी दौरान एक किसान ने उनसे फसल नुकसान खासकर अरहर दाल को लेकर कुछ बोलने की कोशिश की। इस पर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने उसे रोकते हुए कहा कि सिर्फ पब्लिसिटी के लिए मत आओ।

दरअसल, खरगे का यह वीडियो वायरल हो गया है। इसमें खरगे किसान से पूछ रहे हैं कि तुम्हारा कितने एकड़ में बोया है? इस पर किसान कहता है, चार एकड़। खरगे उसे जवाब देते हैं कि उनका 40 एकड़ है। खरगे बोले, “मेरा तुमसे ज्यादा बदतर है। तुम आकर मुझे बता सकते हो, लेकिन मेरा तुमसे भी खराब है।”

वीडियो में आगे वह कहते हैं, प्रचार के लिए यहाँ मत आओ, मुझे इसके बारे में सब पता है। मूँग, अरहर, उड़द सभी फसलें बर्बाद हो गई हैं। आप तो कम से कम इसे झेल सकते हैं। हम इसे नहीं झेल सकते क्योंकि मेरा नुकसान बड़ा है। जाकर मोदी-शाह से पूछा।”

इस पर बीजेपी ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को जमकर लताड़ा है। बीजेपी ने वीडियो पोस्ट कर कहा है कि किसान खरगे के पास गए, उन्हें वहाँ से जाने के लिए कहा गया और बोला गया कि प्रचार के लिए आना बंद करो। आखिर कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी को किसानों से इतनी नफरत क्यों है?

इसी बीच एक और वीडियो सामने आ गया है। ये कटिहार के कॉन्ग्रेस सांसद तारिक अनवर का है। बिहार के बाढ़ग्रस्त अपने संसदीय क्षेत्र का उन्होंने दौरा किया । सांसद बाढ़ग्रस्त किसानों का हाल-चाल लेने पहुँचे थे। खेतों में पानी- कीचड़ के बीच संभलते हुए पगडंडी पर चलना उनके लिए काफी मुश्किल हो रहा था। फिर क्या था वो एक किसान की पीठ पर बैठ कर बाढ़ का जायजा लेने लगे।

सांसद अनवर के चेहरे पर मुस्कान देखा जा सकता है। दो सिपाही उनके पीछे-पीछे चल रहे हैं। तीन लोग संभालने में लगे हैं। सांसद का यह वीडियो अब वायरल हो रहा है। ये घटना उस वक्त की है, जब तारिक अनवर मनिहारी के धुरयाही पंचायत पहुँचे थे।

वीडियो में देखा जा सकता है कि सांसद एक व्यक्ति की पीठ पर चढ़े हैं और दो लोग उन्हें संभालने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि गिर न जाएँ। इस पर सफाई देते हुए स्थानीय कॉन्ग्रेस नेताओं का कहना है कि उनकी तबीयत खराब हो गई थी, इसलिए ग्रामीणों ने उन्हें गोद में उठा लिया।

TMC कार्यकर्ता ने कोलकाता में दोस्त के साथ 20 साल की युवती का किया गैंगरेप: बर्थडे पार्टी के बहाने पीड़िता को घर से उठाया, पूरी रात बंधक बनाकर की हैवानियत

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के दक्षिणी इलाके हरिदेवपुर में 20 साल की एक युवती के साथ गैंगरेप की घटना सामने आई है। पुलिस के मुताबिक, इस घिनौने वारदात में शामिल आरोपितों का नाम चंदन मलिक और देबांशु बिस्वास है।

दोनों की तस्वीरें अब सार्वजनिक कर दी गई हैं ताकि लोग उन्हें पहचान सकें और उनकी गिरफ्तारी में मदद मिल सके। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आरोपित चंदन का आपराधिक बैकग्राउंड भी है। वहीं, बीजेपी का दावा है कि दूसरा आरोपित देबांशु, तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) का कार्यकर्ता है।

बता दें कि इससे पहले कोलकाता लॉ कालेज में 25 जून 2025 को छात्रा के साथ रेप करने वाला मुख्य आरोपित मनोजित भी TMC का ही कार्यकर्ता था।

क्या है पूरा मामला?

पीड़ित युवती हरिदेवपुर थाना क्षेत्र की रहने वाली है। उसने अपनी शिकायत में बताया कि कुछ महीने पहले उसकी मुलाकात चंदन मलिक नाम के एक युवक से हुई थी। चंदन ने खुद को दक्षिण कोलकाता में एक बड़ी दुर्गा पूजा समिति का प्रमुख बताया था। चंदन ने ही युवती को देबांशु से मिलवाया था। दोनों ने युवती को पूजा समिति में शामिल करने का वादा किया था। इसी सिलसिले में उनकी अक्सर बात होती थी।

पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य आरोपित चंदन मलिक ने युवती को एक जन्मदिन की पार्टी में बुलाया था। जब उसने आने से इनकार किया, तो शनिवार (6 सितंबर 2025) की रात को चंदन और देबांशु उसे जबरन उसके घर से उठा ले गए। फिर वे उसे मालंचा इलाके में ले गए और वहाँ कई बार उसके साथ दुष्कर्म किया गया। पीड़िता को आरोपितों ने पूरी रात बंधक बनाकर रखा था और अगले दिन वह किसी तरह बचकर निकल पाई।

घटना के बाद युवती किसी तरह घर लौटी और अपने परिवार को पूरी बात बताई। इसके बाद परिवार ने तुरंत थाने जाकर शिकायत दर्ज करवाई। पुलिस ने मेडिकल जाँच करवाई और घटनास्थल की छानबीन भी शुरू कर दी है।

चंदन मलिक इलाके में पहले से ही एक बदनाम और दबंग किस्म का इंसान माना जाता है। वह इलाके के लोगों के साथ अक्सर मारपीट करता था। वह एक स्थानीय पूजा समिति से भी जुडा हआ है और उसकी क्राइम हिस्ट्री भी है। दोनों ही आरोपित फिलहाल फरार हैं।

TMC का कार्यकर्ता है आरोपित देबांशु

महिला के रेप के आरोपित देबांशु के राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) से जुड़े होने के आरोप भी लग रह हैं। बीजेपी नेता केया घोष ने X पर एक पोस्ट कर देबांशु के TMC कार्यकर्ता होने का दावा किया है।

केया ने X पर अपने पोस्ट में लिखा, “कोलकाता में एक और गैंगरेप और जैसी की उम्मीद थी। एक आरोपित TMC से है। पहले मनोजित और अब देबांशु…TMC के माँ, माटी और मानुष मॉडल के उदाहरण हैं।”

सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट भी सामने आए हैं जिनमें दावा किया जा रहा है कि देबांशु ममता बनर्जी की पार्टी TMC का कार्यकर्ता है।

देबांशु ममता के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार के भूमि सुधार विभाग में राजस्व निरीक्षक के पद पर तैनात है। उसके पड़ोसियों का कहना है कि उसे पिता की मृत्यु के बाद यह नौकरी मिली थी।

खुले में पेशाब करने से रोका तो अमेरिकी शख्स ने हरियाणा के युवक को मारी गोली, डंकी रूट से US गया था कपिल: जानें कितना खतरनाक है घने जंगल, पहाड़ों वाला यह रास्ता

हरियाणा के जींद के एक 26 साल के युवक की अमेरिका के कैलिफॉर्निया में गोली मारकर हत्या कर दी गई। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि उसने एक अमेरिकन को खुले में पेशाब करने से रोका था। बराह कलां गाँव का रहने वाला कपिल करीब ढ़ाई साल पहले डंकी रूट से अमेरिका गया था।

शनिवार रात (6 सिंतबर 2025) को कपिल ने सार्वजनिक स्थान पर पेशाब करने से एक अमेरिकी मूल के व्यक्ति को टोका था। इसको लेकर दोनों में बहस हुई। अमेरिकी मूल के व्यक्ति ने पिस्टल निकाल कर कपिल पर गोलियाँ चला दी। आसपास मौजूद लोगों ने पुलिस को सूचना दी। पुलिस उसे लेकर नजदीक के अस्पताल गई, जहाँ डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। हत्या की खबर से पूरे गाँव में मातम पसरा हुआ है। परिजन उसके शव को लाने की तैयारी कर रहे हैं।

कपिल अपने परिवार का अकेला बेटा था। पिता ईश्वर सिंह के मुताबिक, उन्हें अपने बेटे को अमेरिका भेजने में 45 लाख रुपए खर्च हुए। वह पनामा के घने जंगलों को पार करते हुए, मेक्सिको की दीवार फाँद कर अमेरिका पहुँचा था। इसके बाद वह अमेरिका में गिरफ्तार हो गया। उस पर केस चल रहा था। कपिल के पिता किसान हैं और वह अपने चाचा रमेश सिंह के घर पर रह कर जींद में पढ़ाई-लिखाई करता था। चाचा के मुताबिक उन्होंने 2022 में काफी मुश्किल से उसे डंकी रूट से अमेरिका भेजा था।

क्या है डंकी रूट ?

डंकी पंजाबी भाषा में इस्तेमाल होता है, जिसका अर्थ है- एक जगह से दूसरी जगह पर उछल कर जाना। लेकिन अब डंकी शब्द का अर्थ बदल गया है। ‘डंकी रूट’ नाम उस रास्ते को दे दिया गया है, जिससे कोई भी व्यक्ति अवैध तरीके से भारत छोड़ कर दूसरे देश में प्रवेश करता है। यह शब्द हालिया समय में अमेरिका जाने के अवैध रास्ते का नाम हो गया है। इस नाम से रील्स बनती हैं, वीडियो बनते हैं, फिल्म तक बनाई गई है।

डंकी रूट के जरिए भारतीयों को कई एजेंट विदेश भेजने का वादा करते हैं। जो लोग डंकी का रास्ता चुनते हैं, सबसे पहले उनका पासपोर्ट और वीजा तैयार करवाया जाता है। डंकी का काम करने वाले एजेंट पैसा लेकर किसी यूरोपियन या फिर लैटिन अमेरिका के किसी देश का वीजा तैयार करवाते हैं। अधिकांश मौकों पर यह टूरिस्ट वीजा होता है। इसी के सहारे डंकी वालों को भारत से निकाला जाता है। इनको नेपाल, दुबई और किसी अन्य देश में कुछ दिन यात्रा करवा कर इनकी एक यात्रा की पूरी कहानी तैयार करवाई जाती है।

इसके बाद डंकी रूट का सहारा लेने वाले की लैटिन अमेरिकी देश पहुँचते हैं। इन देशों में भारतीय डंकी एजेंटों के सहायक होते हैं, जो डंकी रूट लेने वालों को रास्ता बताते हैं और यहाँ अवैध तरीके से उनकी मदद करते हैं। कई बार यह लोग आपराधिक गैंग से जुड़े होते हैं। यह लोग इन्हें अमेरिका सीमा तक की यात्रा करवाते हैं। यह यात्रा जंगल, नदी और पहाड़ों से होकर गुजरती है। 40-50 किलोमीटर तक पैदल चलना भी पड़ता है। अमेरिका में घुसने के लिए सीमा लांघनी पड़ती है।

लैटिन अमेरिकी देश तक हवाई यात्रा करते हैं

अमेरिका में अवैध रूप से घुसने वाले लोग सबसे पहले किसी लैटिन अमेरिकी देश में हवाई यात्रा के जरिए पहुँचते हैं। यह देश ब्राजील, वेनेज़ुएला, बोलिविया, पेरू, कोलंबिया, निकारागुआ समेत कोई भी हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति ब्राजील पहुँचा है तो उसे यहाँ से सीमा पर करके कोलंबिया पहुँचना होगा। इसके लिए कभी कभार मानव तस्करी करने वाले गाड़ी उपलब्ध करवाते हैं। फिर उस व्यक्ति को पनामा में घुसाया जाता है। पनामा में अधिकांश लोगों को चुपके से जंगल पार करना होता है।

घने जंगल, पहाड़ों को पार कर घुसते हैं

इसके बाद निकारागुआ और ग्वाटेमाला होते हुए यह लोग मेक्सिको पहुँचते हैं। मेक्सिको और अमेरिका आपस में सीमा साझा करते हैं। मेक्सिको की सुरक्षा एजेंसियों से बचते हुए यह यहाँ इकट्ठा होते हैं। अमेरिका और मेक्सिको की सीमा पर वर्तमान में ऊँची लोहे की बाड़ लगी हुई है। इसे पार करने के लिए रस्सियों का सहारा लिया जाता है। डंकी रूट लेने वाले लोग अमेरिकी सीमा में घुसना एक उपलब्धि की तरह होता है।

इस बीच इन्हें कई बार पहाड़, नदी तक पार करने होते हैं। डंकी रूट से गए एक व्यक्ति ने बताया, “हमने 17-18 पहाड़ियाँ पार कीं। अगर कोई फिसल जाता, तो उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। अगर कोई घायल हो जाता, तो उसे मरने के लिए छोड़ दिया जाता। हमने लाशें देखीं।” एक और व्यक्ति ने बताया कि उन्हें नाव की 10-15 घंटे तक की यात्रा करनी पड़ी।”

शरणार्थी बनना चाहते हैं डंकी रूट से आए लोग

अमेरिका से वापस भेजे गए भारतीय बताते हैं कि डंकी रूट के सहारे जो लोग घुसने में कामयाब हो जाते हैं, वह शरणार्थी का दर्जा पाने का प्रयास करते हैं। सीमा पार करते समय अगर किसी शरणार्थी को अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियाँ पकड़ लेती हैं, तो वह दावा करते हैं कि भारत में उनके साथ उत्पीड़न हो रहा है और वह खाने-पीने तक को मोहताज है। इसलिए शरण लेने के लिए अमेरिका पहुँचे हैं।

माँ भारती के सच्चे उपासक, लोगों की धड़कन: PM मोदी का भूपेन हजारिका की जयंती पर विशेष लेख, लिखा- कालजयी नदी की तरह बहती रही भूपेन दा की आवाज

भारतीय संस्कृति और संगीत से लगाव रखने वालों के लिए आज 8 सितंबर का दिन बहुत खास है। और विशेषकर इस दिन के साथ असम के मेरे भाइयों और बहनों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। आज भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका की जन्म जयंती है। वे भारत की सबसे असाधारण और सबसे भावुक आवाज़ों में से एक थे। ये बहुत सुखद है कि इस वर्ष उनके जन्म शताब्दी वर्ष का आरंभ हो रहा है। यह भारतीय कला-जगत और जन-चेतना की दिशा में उनके महान योगदानों को फिर से याद करने का समय है।

भूपेन दा ने हमें संगीत से कहीं अधिक दिया। उनके संगीत में ऐसी भावनाएं थीं जो धुन से भी आगे जाती थीं। वे केवल एक गायक नहीं थे, वे लोगों की धड़कन थे। कई पीढ़ियां उनके गीत सुनते हुए बड़ी हुईं। उनके गीतों में हमेशा करुणा, सामाजिक न्याय, एकता और गहरी आत्मीयता की गूंज है।

भूपेन दा के रूप में असम से एक ऐसी आवाज़ निकली जो किसी कालजयी नदी की तरह बहती रही। भूपेन दा सशरीर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज आज भी हमारे बीच है। वो आवाज आज भी सीमाओं और संस्कृतियों से परे है। उसमें मानवता का स्पर्श है।

भूपेन दा ने दुनिया का भ्रमण किया, समाज के हर वर्ग के लोगों से मिले, लेकिन वे असम में अपनी जड़ों से हमेशा जुड़े रहे। असम की समृद्ध मौखिक परंपराएं, लोकधुनें और सामुदायिक कहानी कहने के तरीकों ने उनके बचपन को गढ़ा। यही अनुभव उनकी कलात्मक भाषा की नींव बने। वे असम की आदिवासी पहचान और लोगों के सरोकार को हर समय साथ लेकर चले।

बहुत छोटी उम्र से उनकी प्रतिभा लोगों को नजर आने लगी। केवल पांच वर्ष की उम्र में उन्होंने सार्वजनिक मंच पर गाया। वहां लक्ष्मीनाथ बेझबरुआ जैसे असमिया साहित्य के अग्रदूत ने उनके कौशल को पहचाना। किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने अपना पहला गीत रिकॉर्ड कर लिया।

लेकिन संगीत उनके व्यक्तित्व का सिर्फ एक पहलू था। भूपेन दा भीतर से एक बौद्धिक व्यक्तित्व थे। जिज्ञासु, साफ बोलने वाले, दुनिया को समझने की अटूट चाह रखने वाले। ज्योति प्रसाद अग्रवाला और विष्णु प्रसाद रभा जैसे सांस्कृतिक दिग्गजों ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला, और उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया।

सीखने की यही लगन उन्हें कॉटन कॉलेज, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय तक ले गई। वो बीएचयू में राजनीति शास्त्र के छात्र थे, लेकिन उनका अधिकतर समय संगीत साधना में बीतता था। बनारस ने उन्हें पूरी तरह संगीत की तरफ मोड़ दिया। काशी का सांसद होने के नाते मैं उनकी जीवन यात्रा से एक जुड़ाव महसूस करता हूं, और मुझे बहुत गर्व होता है।

काशी से आगे बढ़ी जीवन यात्रा में फिर उन्होंने अमेरिका में कुछ समय बिताया। वहां उन्होंने अपने समय के नामचीन विद्वानों, विचारकों और संगीतकारों से संवाद किया। वे पॉल रोबसन से मिले, जो दिग्गज कलाकार और सिविल राइट्स नेता थे। रोबसन का गीत “Ol’ Man River” उनके कालजयी गीत ‘बिश्टीरनो परोरे’ की प्रेरणा बना। अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला एलेनॉर रूजवेल्ट ने भारतीय लोकसंगीत प्रस्तुतियों के लिए उन्हें गोल्ड मेडल भी दिया।

भूपेन हजारिका, संगीत के साथ ही मां भारती के भी सच्चे उपासक थे। भूपेन दा के पास अमेरिका में रहने का विकल्प था, लेकिन वे भारत लौट आए और संगीत साधना में डूब गए। रेडियो से लेकर रंगमंच तक, फिल्मों से लेकर एजुकेशनल डॉक्यूमेंट्री तक, हर माध्यम में वे पारंगत थे। जहां भी गए, नई प्रतिभाओं को समर्थन दिया।

भूपेन दा की रचनाएं काव्यात्मक सौंदर्य से भरी रहीं, और साथ-साथ उन्होंने सामाजिक संदेश भी दिए। गरीबों को न्याय, ग्रामीण विकास, आम नागरिक की ताकत, ऐसे अनेक विषय उन्होंने उठाए। उनके गीतों ने नाविकों, चाय बागान के मजदूरों, महिलाओं, किसानों की आकांक्षाओं को आवाज़ दी। उनकी रचनाएं लोगों को पुरानी स्मृतियों में ले जाती थीं, साथ ही, उन्होंने आधुनिकता को देखने का एक सशक्त नजरिया भी दिया। बहुत से लोग, खासकर सामाजिक रूप से वंचित तबकों के लोग, उनके संगीत से शक्ति और आशा पाते रहे…और आज भी पा रहे हैं।

भूपेन दा की जीवन यात्रा में ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना का स्पष्ट प्रभाव दिखता है। उनकी रचनाओं ने भाषा और क्षेत्र की सीमाएं तोड़कर एकजुट किया। उन्होंने असमिया, बांग्ला और हिन्दी फिल्मों के लिए संगीत रचा। उनकी आवाज में जो पीड़ा थी, वो बरबस हम सभी का ध्यान खींच लेती थी। ‘दिल हूम हूम करे’ में जो पीड़ा बहती है, वो सीधे दिल की गहराइयों को छू लेती है। और जब वे पूछते हैं, ‘गंगा बहती है क्यूं’, तो ऐसा लगता है मानो हर आत्मा को झकझोर कर जवाब मांग रहे हों।

उन्होंने पूरे भारत के सामने असम को सुनाया, दिखाया, महसूस कराया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आधुनिक असम की सांस्कृतिक पहचान को गढ़ने में उनका बड़ा योगदान रहा। असम के भीतर और दुनिया भर के असमिया प्रवासियों, दोनों के लिए वो असम की आवाज बने।

भूपेन दा राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, फिर भी जनसेवा की दुनिया से जुड़े रहे। 1967 में वे असम के नौबोइचा से निर्दलीय विधायक चुने गए। यह दिखाता है कि लोगों को उन पर कितना गहरा विश्वास था। उन्होंने राजनीति को अपना करियर नहीं बनाया, लेकिन हमेशा लोगों की सेवा में जुटे रहे।

भारत की जनता और भारत सरकार ने उनके योगदान का सम्मान किया। उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण, दादासाहेब फाल्के अवार्ड समेत कई सम्मान मिले। 2019 में हमारे कार्यकाल के दौरान उन्हें भारत रत्न मिला। यह मेरे लिए और एनडीए सरकार के लिए भी सम्मान की बात थी। दुनिया भर में, खासकर असम और उत्तर-पूर्व के लोगों ने, इस अवसर पर खुशी जताई। यह उन सिद्धांतों का सम्मान था, जिन्हें भूपेन दा दिल से मानते थे। वो कहते थे कि सच्चाई से निकला संगीत किसी एक दायरे में सिमट कर नहीं रहता। एक गीत लोगों के सपनों को पंख लगा सकता है, और दुनिया भर के दिलों को छू सकता है।

मुझे 2011 का वह समय याद है जब भूपेन दा का निधन हुआ। मैंने टीवी पर देखा, उनके अंतिम संस्कार में लाखों लोग पहुंचे। हर आंख नम थी। जीवन की तरह, मृत्यु में भी उन्होंने लोगों को साथ ला दिया। इसलिए उन्हें जलुकबाड़ी की पहाड़ी पर ब्रह्मपुत्र की ओर देखते हुए अंतिम विदाई दी गई, वही नदी जो उनके संगीत, उनके प्रतीकों और उनकी स्मृतियों की जीवनरेखा रही है। अब ये देखना बहुत सुखद है कि असम सरकार भूपेन हजारिका कल्चरल ट्रस्ट के कार्यों को बढ़ावा दे रही है। यह ट्रस्ट युवा पीढ़ी को भूपेन दा की जीवन यात्रा से जोड़ने में जुटा है।

भूपेन दा की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने के लिए देश के सबसे बड़े पुल को भूपेन हजारिका सेतु नाम दिया गया। 2017 में जब मुझे इस सेतु के उद्घाटन का अवसर मिला, तो मैंने महसूस किया कि असम और अरुणाचल…इन दो राज्यों को जोड़ने वाले, उनके बीच की दूरी कम करने वाले इस सेतु के लिए भूपेन दा का नाम सबसे उपयुक्त है।

भूपेन हजारिका का जीवन हमें करुणा की शक्ति का एहसास कराता है। लोगों को सुनने और अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की सीख देता है। उनके गीत आज भी बच्चों और बुजुर्गों, दोनों की ज़ुबान पर हैं। उनका संगीत हमें माननीय और साहसी बनना सिखाता है। वह हमें अपनी नदियों, अपने मजदूरों, अपने चाय बागान के कामगारों, अपनी नारी शक्ति और अपनी युवा शक्ति को याद रखने को कहता है। वह हमें विविधता में एकता पर भरोसा करने के लिए प्रेरित करता है।

भारत भूपेन हजारिका जैसे रत्न से धन्य है। जब हम उनके शताब्दी वर्ष का आरंभ कर रहे हैं, तो आइए यह संकल्प लें कि उनके संदेश को दूर-दूर तक पहुंचाएंगे। यह संकल्प हमें संगीत, कला और संस्कृति के लिए और काम करने की प्रेरणा दे, नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करे, भारत में सृजनात्मकता और कलात्मक उत्कृष्टता को बढ़ावा दे। मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।

(यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने निजी ब्लॉग पर लिखा है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

बरेली में रेहान ने बिट्टू बनकर की हिंदू महिला से दोस्ती, निकाह और धर्मांतरण का बनाया दबाव: नहीं मानी पीड़िता तो काटे कान-उँगलियाँ, बेटी को बीच रास्ते से उठाने की कोशिश

उत्तर प्रदेश के बरेली के थाना किला क्षेत्र में एक महिला ने आरोप लगाया है कि रेहान नामक शख्स ने अपना नाम बिट्टू बताकर पहले उससे दोस्ती की और बाद में निकाह और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने लगा। मना करने पर महिला पर जानलेवा हमला कर उसके कान और उँगलियाँ काट दी। आरोपित ने महिला की चार साल की बच्ची को अगवा करने की कोशिश भी की।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़िता ने बताया कि करीब 6-7 महीने पहले वह कोहरापीर पुलिया स्थित रेहान की दुकान पर मिक्सी ठीक कराने गई थी। इस दौरान उसने अपना नाम बिट्टू बताया था। यहाँ उसने महिला उसका नंबर ले लिया और फिर लगातार फोन कर बातें करने लगा। यह बातचीत धीरे-धीरे प्रेम संबंधों में बदलने लगी।

दोनों के बीच प्रेम संबंध के कुछ दिन बाद महिला को पता चला कि वह मुस्लिम है और उसका नाम रेहान है, तो उसने आरोपित से दूरी बनाने की कोशिश शुरू कर दी। रेहान के इस काले कारनामे में साथ देने के लिए पूरा परिवार उसके साथ आ गया।

रेहान की अम्मी, बहन-बहनोई ने महिला को धोखे से घर बुला लिया। इसके बाद सभी ने मिलकर उस पर दबाव बनाया कि वह धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बन जाए और रेहान से निकाह करे। मना करने पर पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी गई।

शनिवार (6 सितंबर) को पीड़िता अपनी चार साल की बेटी के साथ बाजार जा रही थी, तभी रेहान ने पीछे से आकर उस पर लोहे की रॉड और धारदार हथियार से हमला कर दिया। रेहान ने उसका कान और उसकी उँगलियाँ भी काट दी।

लहूलुहान होकर महिला सड़क पर गिर गई, इस बीच आरोपित ने उसकी मासूम बच्ची को भी उठाकर ले जाने की कोशिश की, लेकिन बच्ची की चीख सुनकर आसपास के लोगों ने उसे छुड़ा लिया।

महिला का कहना है कि वह दो दिन तक पुलिस थाने के चक्कर काटती रही, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। अंत में मामले की जानकारी मिलने के बाद हिंदू संगठनों ने थाने पहुँचकर मामले की शिकायत की, जिसके बाद पुलिस ने रेहान सहित कुल 7 लोगों पर पर मुकदमा दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। मुख्य आरोपित रेहान फिलहाल फरार बताया जा रहा है।

छत्तीसगढ़ में 50 हिंदुओं के धर्मांतरण की साजिश, गरीब-बीमार लोगों को निशाना बना रहे पादरी समेत 8 गिरफ्तार: महिला ने पति पर कराई FIR, कहा- जबरन ईसाई बनाना चाहता है

छत्तीसगढ़ के बालोद में धर्मांतरण का मामला सामने आया है। रविवार (7 सितंबर 2025) को गुंडरदेही धमतरी रोड पर एक घर में ईसाईयों की प्रार्थना सभा चल रही थी। इसमें हिन्दुओं का धर्मांतरण किया जा रहा था। पूछताछ के बाद पास्टर समेत 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। वहीं एक और मामले में पत्नी ने अपने पति पर ईसाइयत स्वीकार करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया। पुलिस ने मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।

40-50 हिन्दुओं के धर्मांतरण की कोशिश

बालोद के गुंडरदेही धमतरी मेन रोड पर पंचराम नाम के व्यक्ति के घर पर ईसाईयों की प्रार्थना सभा चल रही थी। हिन्दू संगठनों का कहना है कि प्रार्थना सभा की आड़ में 40-50 हिन्दुओं का धर्मांतरण कराया जा रहा था। इसकी खबर मिलने के बाद संगठन के लोग घटनास्थल पर पहुँच गए और जमकर बवाल किया। पुलिस के साथ उनकी बहस भी हुई। पुलिस करीब 22 लोगों को थाने लेकर आई और पूछताछ के बाद पास्टर समेत 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

गरीब- बीमार लोग टारगेट पर- वीएचपी नेता

हिन्दू संगठनों का कहना है कि बीमार और गरीब हिन्दुओं को चमत्कार दिखा कर फुसलाया जाता है। उन्हें आर्थिक मदद करने का भरोसा दिया जाता है और धर्मांतरण के लिए बरगलाया जाता है। विश्व हिन्दू परिषद के जिलाध्यक्ष बलराम गुप्ता का कहना है कि यहाँ धर्मांतरण का रैकेट चल रहा है। उन्होंने कहा कि जिस घर में रविवार को प्रार्थना हो रही थी, वहाँ पादरी को बैठने के लिए खास आसन बनाया गया था। लोगों को हर तरीके से प्रभावित करने की कोशिश हो रही थी। उन्होंने कहा कि पुलिस धर्मांतरण को रोकने के लिए सख्त एक्शन ले, वरना संगठन धर्मांतरण के खिलाफ आंदोलन करेगा।

धर्मांतरण के लिए पति ने डाला दबाव- महिला

वहीं एक और मामले में एक महिला ने अपने पति पर जबरन ईसाइयत स्वीकार करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया। सिविल लाइन के भारतीय नगर में रहने वाली महिला अपने बेटे के साथ थाने पहुँची और पति के खिलाफ मामला दर्ज करवाया। महिला का कहना है कि उसका पति पूरे परिवार को ईसाईयों के प्रार्थना सभा में ले जाना चाहता है। मना करने पर घर पर ही ईसाईयों की तरह प्रार्थना करने का दबाव डालता है। वह चाहता है कि पूरा परिवार ईसाई बने। पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है और पूरे मामले की जाँच करने की बात कही है।

कहीं गणेश प्रतिमा पर थूका, कहीं मस्जिद से बरसाए पत्थर: कर्नाटक में गणपति विसर्जन के दौरान इस्लामी कट्टरपंथियों का बवाल, पुलिस ने 21 लोगों को किया गिरफ्तार

कर्नाटक के मांड्या में रविवार (7 सितंबर 2025) को गणपति विसर्जन के दौरान जमकर बवाल हुआ है। इस दौरान हिंसक झड़प और शोभायात्रा पर पथराव भी हुआ, जिसमें कम-से-कम 8 लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की खबर है। वहीं, कर्नाटक के ही शिवमोग्गा में विसर्जन के दौरान दो मुस्लिम युवकों द्वारा भगवान गणेश की प्रतिमा पर थूके जाने का मामला सामने आया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मांड्या में गणपति के विसर्जन के लिए निकाली जा रही शोभायात्रा पर जब एक मस्जिद के पास पहुँची तो उस पर मस्जिद से पथराव कर दिया गया। इसके बाद शोभायात्रा में शामिल लोग भी भड़क गए और दोनों समुदायों के बीच हालात तनावपूर्ण हो गए। दोनों तरफ से पथराव हुआ और इसमें 8 लोग घायल हो गए।

गणपति विसर्जन करने के लिए जा रहे लोगों ने भगवान गणेश की प्रतिमा पर भी हमला किए जाने का आरोप लगाया है। झड़प के बाद मौके पर भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है और घायलों को अस्पताल में भर्ती करा दिया है। वहीं, पुलिस ने हिंसा और पथराव मामले में कार्रवाई करते हुए 21 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, विवाद के बाद पूरे इलाके में धारा 163 लागू कर दी गई है।

पिछले साल भी मांड्या में हुआ था बवाल

मांड्या जिले में गणपति विसर्जन के दौरान साम्प्रदायिक झड़पें कोई नई बात नहीं हैं। वर्ष 2024 में नागमंगला में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान दो समुदायों के बीच खूनी संघर्ष हुआ था, जिसमें जमकर पथराव और हिंसा देखने को मिली थी। इस दौरान कई दुकानों और वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया था, जिससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया।

हालात बिगड़ने पर पुलिस को धारा 144 लागू करनी पड़ी और अतिरिक्त बल की तैनाती करनी पड़ी। तब 50 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इससे पहले भी गणपति विसर्जन के अवसर पर इसी तरह की झड़पें हो चुकी थीं, जो इस क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव की लगातार मौजूदगी को दर्शाती हैं।

शिवमोग्गा में गणेश प्रतिमा पर थूका

इसके अलावा, शिवमोग्गा जिले के सागर नगर में जय भुवनेश्वरी युवा संघ द्वारा निकाले गए गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान एक घटना ने पूरे इलाके में तनाव फैला दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब जुलूस जन्नत नगर की ओर बढ़ रहा थ तभी दूसरी समुदाय के दो बच्चों ने भगवान गणेश की प्रतिमा पर कथित रूप से थूक दिया।

इस घटना के बाद लोगों में गुस्सा और आक्रोश फैल गया। जुलूस में शामिल भक्तों ने प्रशासन से घटना में शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। इस दौरान पुलिस मौके पर पहुंची और प्रदर्शनकारियों को आश्वासन दिया कि उचित कानूनी कदम उठाए जाएंगे। पुलिस ने लोगों से क्षेत्र में शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील की है।