Home Blog Page 228

भारत में शादी और विदेश में तलाक… हिंदुओं में नहीं चलेगा ये सब: गुजरात HC ने कहा- HMA के तहत हुए विवाह विदेशी कानून से नहीं हो सकते समाप्त

गुजरात हाई कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाया है जिसमें कहा गया है कि अगर किसी शादी को भारत में हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act – HMA) के तहत पंजीकृत किया गया है, तो उसे केवल भारतीय कोर्ट ही खत्म कर सकती है। विदेशी कोर्ट द्वारा दिया गया तलाक भारत में मान्य नहीं होगा, भले ही पति-पत्नी ने विदेश की नागरिकता क्यों न ले ली हो।

कोर्ट ने यह बात गुजरात के रहने वाले एक महिला-पुरुष की याचिका पर सुनवाई के दौरान कही। मामले में गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस एवाई कोगजे और जस्टिस एनएस संजय गौड़ा की पीठ ने जोर देते हुए कहा कि नागरिकता या निवास स्थान में बदलाव होने से हिंदू विवाह अधिनियम के तहत मिले अधिकार और उपचार अप्रभावित रहते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे विवाहों को लेकर अधिकार क्षेत्र पूरी तरह से भारतीय कोर्ट के पास है।

क्या है मामला?

जुलाई 2008 में अहमदाबाद में एक दंपति ने हिंदू रीति-रिवाजों से शादी की। शादी के बाद दोनों ऑस्ट्रेलिया चले गए। पति ने बाद में वहाँ की नागरिकता ले ली। 2014 में दोनों के बीच अनबन शुरू हुई। पति भारत लौट आया और पत्नी ऑस्ट्रेलिया में बेटे के साथ रुक गई।

2015 में पत्नी ने भी ऑस्ट्रेलियाई नागरिकता ले ली और बाद में भारत लौट आई। मार्च 2016 में पति ने ऑस्ट्रेलिया की फेडरल सर्किट कोर्ट में तलाक और बेटे की कस्टडी की अर्जी दी। इसके बाद नवंबर 2016 में तलाक मंजूर हो गया।

बाद में पत्नी ने ऑस्ट्रेलियाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी और भारत में मुकदमे दायर किए। इनमें एक तलाक को अमान्य घोषित करने के लिए और दूसरा वापस पति के साथ रहने  के लिए दायर की गई थी।

मार्च 2023 में फैमिली कोर्ट ने पत्नी के दोनों मुकदमे खारिज कर दिए और कहा कि चूँकि ऑस्ट्रेलिया की कोर्ट तलाक दे चुकी है, इसलिए पत्नी का भारत में मुकदमा दाखिल करने का कोई आधार नहीं है। अंत में पत्नी ने इस फैसले को गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी।

गुजरात हाई कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने कहा कि अगर किसी शादी को भारत में HMA के तहत पंजीकृत किया गया है, तो उसका समापन यानी तलाक भी केवल उसी कानून के तहत हो सकता है। कोर्ट ने कहा, “सिर्फ इसलिए कि दोनों ने विदेशी नागरिकता ले ली है, इसका मतलब यह नहीं कि विदेशी कानून से उनकी शादी खत्म हो सकती है।”

कोर्ट ने बताया कि पत्नी ने ऑस्ट्रेलियाई कोर्ट में पहले ही कहा था कि उस कोर्ट को इस तलाक का फैसला करने का अधिकार नहीं है। हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने बिना किसी गंभीर विचार के विदेशी कोर्ट के फैसले को सही मान लिया, जो पूरी तरह गलत था। जबकि मामले के मेरिट पर सुनवाई होनी चाहिए थी।

अंत में गुजरात हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के दोनों आदेश रद्द किए, पत्नी की अपीलें स्वीकार कीं और फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि अब वह दोनों मुकदमों की मेरिट पर सुनवाई करे।

निष्कर्ष

अगर शादी भारत में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत हुई है, तो उसका तलाक भी भारतीय कानून के अनुसार ही मान्य होगा। विदेश की नागरिकता या विदेश में दिया गया तलाक, भारतीय कोर्ट में स्वतः मान्य नहीं होगा। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि विदेशी कोर्ट के अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) पर सवाल उठाना पूरी तरह वैध है।

नहीं सुधर रही कॉन्ग्रेस, पीएम मोदी के अपमान के बाद बीड़ी से की बिहार की तुलना: BJP ने कहा- उजागर हो रहा असली चरित्र; बवाल के बाद डिलीट किया पोस्ट

महात्मा और बिच्छू की कहानी तो आपने सुनी होगी, एक महात्मा पानी से बिच्छू को निकालने की कोशिश करते हैं लेकिन बिच्छू बार-बार डंक मारता रहता है। लोग कहते हैं कि इसे पानी में ही छोड़ दीजिए तो वह कहते हैं कि डंक मारना बिच्छू की फितरत है। महात्मा कहते हैं, “मेरी फितरत बचाने की है।” वे उसे बाहर निकाल ले आते हैं।

अब आते हैं, अपनी खबर पर, बिहार में कॉन्ग्रेस के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को माँ की गाली दी गई। इसके बाद खूब बवाल हुआ तो लगा कि कॉन्ग्रेस अब आगे इससे कुछ सीख लेगी। अब उसके मंचों से ऐसी बातें नहीं कही जाएँगी। लेकिन लगता है कि कॉन्ग्रेस भी बिच्छू की तरह ही अपनी आदत से मजबूर है।

कॉन्ग्रेस अब पीएम मोदी के अपमान से और 4 कदम आगे बढ़ गई है, पार्टी की केरल इकाई ने X हैंडल से एक पोस्ट किया गया। इस पोस्ट में पूरे बिहार का ही अपमान कर दिया गया। केरल कॉन्ग्रेस ने बिहार की तुलना बीड़ी से करते हुए लिखा, “बीड़ी और बिहार ‘बी’ से शुरू होता है। अब इसे पाप नहीं माना जा सकता है।” कॉन्ग्रेस ने इसे बीड़ी पर कम किए गए GST से जोड़ा था।

केरल कॉन्ग्रेस का पोस्ट

BJP-JDU ने कॉन्ग्रेस को आड़े हाथों लिया

जाहिर है कि यह पूरे बिहार का अपमान था। तो तुरंत हंगामा शुरू हो गया। बीजेपी और जेडीयू ने इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस को आड़े हाथों ले लिया है। बिहार के उप-मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता सम्राट चौधरी ने इसे कॉन्ग्रेस का असली चरित्र बताया है।

सम्राट ने X पर एक पोस्ट में लिखा, “पहले हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की पूजनीय माता जी का अपमान और अब पूरे बिहार का अपमान, यही है कॉन्ग्रेस का असली चरित्र, जो बार-बार देश के सामने उजागर हो रहा है।”

वहीं, राज्यसभा सांसद और जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा भी कॉन्ग्रेस पर भड़क गए। उन्होंने लिखा, “कॉन्ग्रेस की एक और अत्यंत शर्मनाक हरकत! आपको बता दें कि B से सिर्फ बीड़ी नहीं, बुद्धि भी होती है, जो आपके पास नहीं है! B से बजट भी होता है, जिसमें बिहार को विशेष सहायता मिलने पर आपको मिर्ची लगती है।”

उन्होंने आगे लिखा, “यकीन मानिए, बिहार की महान जनता कॉन्ग्रेस द्वारा बार-बार किये जा रहे अपमान का करारा जवाब आगामी विधानसभा चुनाव में देगी—बीड़ी के धुएं से नहीं, वोट की चोट से।”

कॉन्ग्रेस ने डिलीट किया पोस्ट

बिहार में अगले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं तो जाहिर है कि कॉन्ग्रेस को वोट बैंक की चिंता थी क्योंकि मान-अपमान की चिंता कॉन्ग्रेस कितना करती हैं यह खुद में भी एक सवाल हैं। वोट के डर से केरल कॉन्ग्रेस ने यह पोस्ट डिलीट कर दिया हैं।

साथ ही, कॉन्ग्रेस ने अपने इस पोस्ट के लिए माफी माँग ली है। कॉन्ग्रेस ने लिखा, “GST दरों को लेकर मोदी के चुनावी हथकंडे पर हमारे तंज को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। अगर आपको ठेस पहुँची हो तो क्षमा करें।” कॉन्ग्रेस के इस कथित माफीनामे को पढ़ेंगे तो समझ आएगा कि यह माफी को भी एक चुनावी स्टंट बना दिया है।

कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दलों के लिए वैसे भी बिहार और बिहारियों को अपमानित करना अब कोई नई बात नहीं है। कॉन्ग्रेस नेता चरणजीत सिंह चन्नी से रेवंत रेड्डी तक और उनकी सहयोगी DMK के एमके स्टालिन तक बिहार के लोगों को लेकर अपमानजनक और विवादित टिप्पणियाँ कर चुके हैं।

पथराव, आगजनी, तोड़फोड़ और हमला: कर्नाटक में ऐसे 60 आपराधिक केसों को सिद्धारमैया सरकार ने लिया वापस, 11 मामलों में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता थे ‘आरोपित’

कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार ने गुरुवार (04 सितंबर 2025) को कैबिनेट की बैठक में राजनीतिक कार्यकर्ताओं, एक्टिविस्ट और आम जनता के खिलाफ दर्ज 60 आपराधिक मामलों को वापस लेने का फैसला लिया। इनमें 11 मामले उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से जुड़े हैं।

साल 2019 में चित्तपुर में हुए पथराव की घटना के बाद डीके शिवकुमार और उनके समर्थकों के खिलाफ यह मुकदमे किए गए थे, जिसमें हिंदू कार्यकर्ताओं की सूचना पर मवेशियों को जब्त करने के बाद पुलिस ने कार्रवाई की थी।

इसके अलावा एक हाई प्रोफाइल मामला साल 2019 का है, जिसमें उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के समर्थकों के खिलाफ दर्ज केस वापस लिया गया है। इन पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की गिरफ्तारी के बाद कनकपुरा में बसों और सरकारी दफ्तरों पर पथराव करने का मामला दर्ज किया गया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये मामले कर्नाटक के गृह मंत्री डॉ. जी परमेश्वर और विधानसभा में सरकार के मुख्य सचेतक अशोक पट्टन द्वारा प्रस्तुत याचिकाओं के आधार पर वापस लिए गए थे।

डीके शिवकुमार के भाई के समर्थकों के खिलाफ मामले भी लिए वापस

इसमें शिवकुमार के भाई, बेंगलुरु ग्रामीण के पूर्व सांसद डीके सुरेश के समर्थक के खिलाफ मुकदमे भी वापस लिए गए हैं। इन्होंने साल 2012 में डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण समारोह से सुरेश को बाहर रखे जाने के विरोध में तत्कालीन मुख्यमंत्री का घेराव किया था।

ये मामले कर्नाटक के गृह मंत्री डॉ. जी परमेश्वर और विधानसभा में सरकार के मुख्य सचेतक अशोक पट्टन द्वारा प्रस्तुत याचिकाओं के आधार पर वापस लिए गए थे।

पूर्व मुख्यमंत्री के आवास के बाहर पथराव मामले में 4 मुकदमे वापस

वापस लिए गए चार मामले 2023 में शिवमोग्गा ज़िले के शिकारीपुरा में तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार द्वारा घोषित अनुसूचित जाति के सदस्यों के लिए आंतरिक आरक्षण के विरोध में हुए विरोध प्रदर्शनों से संबंधित थे।

प्रदर्शनकारियों पर पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के कस्बे स्थित आवास की घेराबंदी करने की कोशिश के दौरान पथराव और अधिकारियों पर हमला करने का आरोप था।

गैर-कानूनी तरीके से वापस लिए गए फैसले

कर्नाटक सरकार ने 60 मामलों को वापस लेने का फैसला राजनीतिक प्रभाव के कारण लिया है। यह फैसला राज्य के गृह मंत्रालय, DGP और IGP, अभियोजन एवं सरकारी मुकदमेबाजी निदेशक (Director of Prosecutions and Government Litigation) और विधि विभाग (Law Department) सहित प्रमुख विभागों की सलाह के विरुद्ध लिया गया है।

Deccan Herald की रिपोर्ट के मुताबिक, तीनों ऑथरिटी की राय के अनुसार, ये 60 मामले वापसी के लिए उपयुक्त नहीं थे और इसमें कोई सार्वजनिक हित भी शामिल नहीं था। यह फैसला कानूनी और प्रशासनिक रूप से अस्वीकार्य है।

ऑक्सफोर्ड में पेरियार सम्मेलन के नाम पर बनाया जा रहा भारत विरोधी माहौल

मेरे एक प्रोफेसर ने एक दिन मुझे एक गहरी दर्शनात्मक शिक्षा दी। उन्होंने एक लकड़ी का छोटा टुकड़ा और एक लोहे का छोटा टुकड़ा लिया। फिर उन्होंने बारी-बारी से दोनों को पानी से भरी बाल्टी में डाला। स्वाभाविक रूप से लोहे का टुकड़ा पानी में डूब गया, जबकि लकड़ी का टुकड़ा पानी की सतह पर तैरने लगा।

इसके बाद प्रोफेसर ने मुझसे पूछा कि लोहा क्यों डूबा और लकड़ी क्यों नहीं डूबी। मेरे तर्कसंगत दिमाग ने तुरंत जवाब दिया कि लकड़ी का घनत्व पानी से कम है, इसलिए वह तैर रही है, जबकि लोहे की घनत्व पानी से अधिक है, इसलिए वह डूब गया।

फिर उन्होंने एक और प्रश्न पूछा, लोहे को ऐसा क्या करना चाहिए कि वह पानी में न डूबे। मैंने काफी देर तक सोचा, लेकिन कोई उत्तर नहीं दे पाया। तब उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि लोहे को डूबने से बचने के लिए लकड़ी के साथ जुड़ जाना चाहिए। जब लोहा लकड़ी के साथ जुड़ जाएगा, तो लकड़ी अपने कम घनत्व के कारण उसे अपनी पहचान देगी और वह लोहा भी पानी में नहीं डूबेगा।

आज ठीक यही दृश्य हमें भारत की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देखने को मिल रहा है। एक लोहे का टुकड़ा, एक लकड़ी के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहा है ताकि वह तैर सके।

ऑक्सफोर्ड में पेरियार सम्मेलन – मकसद और सच्चाई

4 सितंबर 2025 को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के सेंट एंटनी कॉलेज में पेरियार के ‘सेल्फ रेस्पेक्ट मूवमेंट’ पर एक कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। ऑक्सफोर्ड जैसे संस्थान में आए दिन कई कार्यक्रम होते रहते हैं। ठीक उसी तरह यह भी एक छोटा कार्यक्रम था जिसमें मुश्किल से 100-200 लोग मौजूद थे।

लेकिन इस सम्मेलन का असली मकसद इसकी भव्यता नहीं, बल्कि इसका स्थान था। ऑक्सफोर्ड का नाम इस कार्यक्रम को वैधता प्रदान करता है। इस सम्मेलन के पीछे की चालाकी यही है कि पेरियार के विचारों और यहाँ मौजूद वक्ताओं के विचारों पर ऑक्सफोर्ड की मुहर लग सके। यह आयोजन ऑक्सफोर्ड की प्रतिष्ठा का इस्तेमाल कर अपने एजेंडे को सही साबित करने का प्रयास थी।

आयोजक और उनकी सोच

इस कार्यक्रम का आयोजन फैजल देवजी ने किया। फैजल देवजी के विचार न केवल भारत के प्रति, बल्कि भारत के राष्ट्रनायकों के प्रति भी अपमानजनक रहे हैं। उनकी एक पुस्तक The Impossible Indian है, जिसमें उन्होंने महात्मा गाँधी के विचारों का विच्छेदन करने की कोशिश की है।

इस पुस्तक में उन्होंने गाँधी के बारे में यह तक लिखा है कि गाँधी किसी भी मामले में अपने समकालीन लेनिन, हिटलर और माओ से कम हिंसक नहीं थे। गाँधी, जिन्हें पूरी दुनिया अहिंसा का प्रतीक मानती है, उन्हें हिंसक बताना फैजल देवजी की उसी सोच को उजागर करता है।

फैजल देवजी स्वयं को एक अकादमिक विद्वान बताते हैं, लेकिन वे उसी इकोसिस्टम का हिस्सा हैं जिसकी पूरी ऊर्जा इस बात को साबित करने में लगी रहती है कि प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में भारत का लोकतंत्र खत्म हो रहा है। उनके कई लेख इस सोच को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।

मुख्य अतिथि – एम.के. स्टालिन

इस सम्मेलन के मुख्य अतिथि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन थे। यह चुनाव बिल्कुल स्वाभाविक है क्योंकि स्टालिन के पिता करुणानिधि ने अपनी पूरी राजनीति पेरियार के विचारों पर आधारित की थी। स्टालिन स्वयं अपनी राजनीति में पेरियार का नाम और विचार लगातार इस्तेमाल करते रहे हैं। यहां तक कि स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन ने तो सनातन धर्म की तुलना डेंगू और मलेरिया के मच्छर से करते हुए इसे जड़ से मिटा देने की बात तक कही। इसलिए स्टालिन का इस कार्यक्रम में शामिल होना कोई नई बात नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक विरासत का ही विस्तार है।

एक और वक्ता – अर्जुन अप्पूदाराई

इस सम्मेलन में एक और वक्ता थे अर्जुन अप्पूदाराई। आमतौर पर उनका नाम आम जनता ने नहीं सुना होगा, लेकिन अकादमिक जगत में यह जाना-पहचाना नाम है।

अप्पूदाराई ने कई लेख लिखे हैं जिनमें उन्होंने भारत और उसकी नीतियों के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाया है। एक लेख में उन्होंने लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी के दौर में भारत का राष्ट्रवाद अब ‘एडवांस स्टेज जेनोसाइडलिज्म’ का रूप ले चुका है।

एक अन्य लेख में उन्होंने कश्मीर को लेकर कहा कि मोदी सरकार के कदम सनकी राजनीति और मुस्लिम विरोधी नीतियों के प्रतीक हैं। गूगल पर उनके और भी अनेक ऐसे लेख मिल जाएंगे जो भारत विरोधी विचारों को उजागर करते हैं।

भारत विरोधी जुगनुओं की जमात

विष्णु विराट का एक शेर है –
जुगनुओं ने शराब पी ली है,
अब ये सूरज को गालियाँ देंगे

इस सम्मेलन में भी ऐसे ही ‘जुगनू’ इकट्ठा हुए हैं। ये लोग भारत और उसकी संस्कृति को गालियाँ देंगे और उन गालियों को ऑक्सफोर्ड का नाम देकर वैधता प्रदान करेंगे।

विडंबना यह है कि ये सब लोग पेरियार का महिमामंडन कर रहे हैं। वही पेरियार जिसने यहूदियों और ब्राह्मणों को कीड़े-मकोड़े जैसा माना था।

पेरियार चाहता था कि ब्राह्मणों का नरसंहार भी उसी तरह किया जाए जैसे हिटलर ने यहूदियों का किया था। यदि पेरियार के इन विचारों के बारे में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की यहूदी सोसाइटी को पता चल जाए, तो क्या वे इस कार्यक्रम को होने देती?

पेरियार के नकारात्मक विचार

पेरियार के अपमानजनक विचार सिर्फ यहूदियों तक सीमित नहीं थे। उन्होंने महात्मा गाँधी के बारे में भी वैसा ही दृष्टिकोण रखा जैसा फैजल देवजी रखते हैं।

पेरियार ने कहा था कि गाँधी की फोटो वाले सभी नोटों को जला देना चाहिए। इतना ही नहीं, पेरियार ने भारत का राष्ट्रीय ध्वज जलाया, हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ीं और ब्रिटिश शासन का समर्थन किया।

जो भी व्यक्ति भारत को थोड़ा-बहुत भी जानता हो, वह पेरियार और उसके विचारों को नकारात्मक ही मानेगा।

भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी पेरियार को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने उस समय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री कामराज को पत्र लिखकर कहा था कि पेरियार जैसे पागल व्यक्ति को सार्वजनिक जीवन से निकाल देना चाहिए और ऐसे लोगों की जगह पागलखाने में है।

नैरेटिव वॉर का एक हिस्सा

यह सम्मेलन पेरियार के विभाजनकारी और नकारात्मक विचारों को उभारने का प्रयास है। इसे एक अलग-थलग घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

यह एक सुनियोजित अभियान का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य भारत की छवि को विकृत करना और समाज को बांटना है। ऑक्सफोर्ड का मंच तो बस एक मुखौटा है। असली लड़ाई इससे कहीं बड़े स्तर पर लड़ी जा रही है।

आज का यह ‘नैरेटिव वॉर’ भारत के सामाजिक और राजनीतिक ढाँचे को तोड़ने की कोशिश है। इसलिए भारतीय समाज को इसे पहचानना होगा और इसका मुकाबला उसी मजबूती और आत्मविश्वास से करना होगा जैसे हमारे पूर्वजों ने बाहरी आक्रमणों का सामना किया था।

कॉन्ग्रेस की हिंदू विरोधी साजिश, उमंग सिंघार ने जनजातीय समुदाय को बताया हिंदुओं से अलग; BJP ने कहा- सोनिया गाँधी को खुश करने के लिए ‘क्रॉस’ लटकाने का पाप

मध्य प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष और कॉन्ग्रेस नेता उमंग सिंघार ने विवादित बयान दिया है। सिंघार ने कहा कि जनजातीय समाज हिंदू नहीं है। अब इस बयान पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई। बीजेपी ने भी इस बयान पर कॉन्ग्रेस को घेरा है।

दरअसल, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने छिंदवाड़ा में मध्य प्रदेश जनजातीय समाज विकास परिषद की बैठक के दौरान यह बयान दिया। उन्होंने कहा, “मैं गर्व से कहता हूँ कि हम जनजातीय हैं, हिंदू नहीं। मैं यह बात कई सालों से कहता आ रहा हूँ।”

उमंग सिंघार ने आगे कहा, “शबरी, जिन्होंने भगवान राम को बचा हुआ बेर खिलाया था, वह भी जानजातीय समुदाय से थे। जो आदिकाल से वास कर रहे हैं, वही जनजातीय हैं। हमें हमारे समाज को अपनी पहचान दिलानी होगी। चाहे सरकार कोई भी हो, उसे जनजातीय समाज का मान-सम्मान बनाए रखना होगा।”

सीएम मोहन यादव ने कॉन्ग्रेस पर साधा निशाना

सिंघार के इस बयान पर प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि कॉन्ग्रेस हमेशा हिंदू और हिंदुत्व के विरोध में ही काम करती है। सीएम ने कहा, “राहुल गाँधी ने हिंदुत्व का मजाक बनाया। अब उमंग सिंघार कह रहे हैं आदिवासियों में हिंदुत्व नहीं है।”

सीएम ने आगे कहा, “कमाल हो गया, शर्म आती है। ऐसा नहीं होना चाहिए। राजनीति जरूर करो लेकिन हिंदुत्व पर प्रश्न उठाना, ये जनता माफ नहीं करेगी।”

आदिवासियों के गले में क्रॉस लटकाने का पाप मत करो: BJP नेता

उमंग सिंघार के ‘जनजातीय समाज हिंदू नहीं’ वाले बयान को लेकर बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा, “जनजातीय समाज के गले में क्रॉस लटकाने और सोनिया गाँधी को खुश करने के लिए उमंग जी पाप मत करो। हिंदुस्तान आपसे नाराज हो जाएगा। जनजातीय हमारी सभ्यता के ध्वजवाहक हैं।”

बीजेपी विधायक ने आगे कहा, “आजादी की लड़ाई में लोहा लेने वाला आदिवासी समाज, जय जोहार का जयकारा लगाने वाला समाज, बड़े देव को पूजने वाला आदिवासी समाज हमारी आत्मा है।”

मध्य प्रदेश में जनजातीय समाज धर्मांतरण को मजबूर

मध्य प्रदेश में जनजातीय समाज धर्म परिवर्तन की समस्या से जूझ रहा है, जहाँ मुख्य रूप से ईसाई मिशनरी सामाजिक सेवाओं, शिक्षा और आर्थिक सहायता के बहाने धर्मांतरण को बढ़ावा देते हैं। ऐसे कई मामले अब तक सामने आए हैं।

दमोह जिले के हटा ब्लॉक के सूरजपुरा गाँव में ईसाई मिशनरियों ने गाँव के कई लोगों को बहकाकर धर्म परिवर्तन करवा दिया। यहाँ गाँव के कई परिवारों ने धर्म बदलकर ईसाई नाम रख लिए थे, जिसके बाद गाँव के अन्य लोगों ने इनका विरोध किया था।

इससे सटे छतरपुर जिले के भारतीपुरा गाँव में भी ऐसा ही मामला सामने आया था। यहाँ भील समाज के लोगों को पैसों का लालच देकर ईसाई धर्म में परिवर्तित किया गया। गाँव के 8 परिवारों ने धर्म परिवर्तन कर लिया।

गुना जिले में दो ईसाई दंपति रुठियाई क्षेत्र में प्रार्थना सभाएँ आयोजित कर लोगों का ब्रेनवॉश करते पकड़े गए। यहाँ लोगों को धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जा रहा था। हिंदू संगठन की पुलिस शिकायत के बाद मामला उजागर हुआ था।

NIRF रैंकिंग 2025: IIT मद्रास को लगातार 7वीं बार ओवरऑल कैटेगिरी में मिला पहला स्थान, 9वें नंंबर पर पहुँची JNU…कॉलेज कैटेगिरी में DU के हिंदू कॉलेज ने मारी बाजी

भारत सरकार ने देश के शीर्ष शिक्षण संस्थानों की नेशनल इंस्टिट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) रैंकिंग 2025 जारी कर दी है। इस बार भी ओवरऑल कैटेगरी में टॉप पर इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) मद्रास का नाम है। IIT मद्रास लगातार 7 वर्षों से पहले स्थान पर अपना दबदबा बनाए हुए है।

ओवरऑल रैंकिंग में 9वें नंबर पर रही JNU

इस साल 17 कैटेगरी में सर्वोच्च शिक्षण संस्थानों की रैंकिंग जारी की गई है। इन सस्थानों में यूनिवर्सिटी, कॉलेज, रिसर्च इंस्टिट्यूशन, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, फार्मेसी, मेडिकल जैसी कई कैटेगरी शामिल हैं। ओवरऑल कैटेगरी में IIS बेंगलुरु दूसरे स्थान पर है। वहीं, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी को 9वाँ और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी को 10वाँ स्थान मिला है।

NIRF रैंकिंग

टॉप 10 कॉलेज की सूची

NIRF ने भारत के टॉप कालेजों की भी लिस्ट जारी की है। इस साल भी दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के हिंदू कॉलेज ने पहला स्थान हासिल किया है। पिछले साल भी हिंदू कॉलेज ने मिरांडा हाउस को पीछे छोड़कर पहला स्थान पाया था।

NIRF 2025 के अनुसार भारत के टॉप 10 कॉलेजों की सूची इस प्रकार है:

1. हिंदू कॉलेज (दिल्ली)
2. मिरांडा हाउस (दिल्ली)
3. हंसराज कॉलेज (दिल्ली)
4. किरोड़ीमल कॉलेज (दिल्ली)
5. सेंट स्टीफंस कॉलेज (दिल्ली)
6. रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कॉलेज (कोलकाता)
7. आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज (दिल्ली)
8. सेंट जेवियर्स कॉलेज (कोलकाता)
9. पीएसजीआर कृष्णामल कॉलेज फॉर वुमन (कोयंबटूर)
10. पीएसजी कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड साइंस (कोयंबटूर)

क्या बोलीं हिंदू कॉलेज और मिरांडा हाउस कॉलेज की प्रिंसिपल?

सूची जारी होने के बाद हिंदू कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ अंजू श्रीवास्तव ने कहा, “लगातार दूसरे साल नंबर वन पर आना एक बड़ी उपलब्धि है। इस तरह की रैंकिंग हमारे प्रयासों को संतुष्टि देती है। हम एक्सीलेंस इन एजुकेशन पर काम कर रहे हैं, इसी का नतीजा है कि हम इस मुकाम पर है। हमें उम्मीद है कि अगले साल भी हम अपने प्रयासों से नंबर वन के ताज को बरकरार रखेंगे।”

वही, मिरांडा हाउस कॉलेज की प्रिंसिपल प्रो बिजयालक्ष्मी नंदा ने कहा, “हम लगातार सात साल तक पहले पायदान पर रहे हैं। बीते साल नंबर वन कॉलेज का ताज हिंदू कॉलेज को मिला। इस साल भी हिंदू कॉलेज पहले नंबर कायम है। कॉलेज में नियुक्तियां कर हम फिर से नंबर होने का प्रयास करेंगे। वैसे भी लगातार एक रैंक पर बने रहना किसी चुनौती से कम नहीं होता। दूसरे स्थान पर आना भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं है।”  

शिक्षा मंत्री ने क्या कहा?

इसे लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि पिछले 10 साल में NIRF रैंकिंग सिस्टम को काफी मजबूत किया गया है, अब इसे और ज्यादा संस्थानों से जोड़ने की जरूरत है। NAAC एक्रीडिटेशन और रैंकिंग सिस्टम में भी बदलाव किए जाएँगे।

उन्होंने कहा,  “देश में एक ‘वन नेशन, वन डेटा पोर्टल’ बनाया जाएगा, जिसे दिसंबर 2025 तक पब्लिक डोमेन में लाया जाएगा। इसके बाद 2-3 महीने में इसमें जरूरी संशोधन करके अंतिम रूप दिया जाएगा।”

शिक्षा मंत्री ने कहा कि अब हमें स्टार्टअप्स और एंटरप्रेन्योरशिप को भी शिक्षा व्यवस्था में प्राथमिकता देनी होगी। देश एक बड़ी छलांग के मुहाने पर खड़ा है और अगले 25 वर्षों के लिए हमें मजबूत रास्ता तय करना होगा।

उन्होंने कहा, “दुनिया की बड़ी कंपनियाँ अब भारत में निवेश कर रही हैं, उन्हें भारत के ज्ञान और बाजार की ताकत दिखानी होगी। GST में बड़े बदलाव हुए हैं, आने वाले समय में सर्कुलर इकोनॉमी पर इसका क्या असर होगा, इस पर बिजनेस स्कूल्स रिसर्च करेंगे।”

बच्चों को खेल-खेल में कराएँ स्वदेशी की पहचान… स्कूल में ‘स्वदेशी वीक’ मनाएँ: शिक्षक दिवस पर PM मोदी ने टीचरों को दिया ‘होमवर्क’, बोले- विकसित भारत के लिए ये शुरुआत जरूरी

शिक्षक दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं को शुभकामनाएँ दी हैं। पीएम ने शिक्षकों के समर्पण और परिश्रम की प्रशंसा की। प्रधानमंत्री ने पूर्व राष्ट्रपति और शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती पर उनको याद किया। इससे पहले गुरुवार (04 सितंबर 2025) को पीएम मोदी ने शिक्षकों को संबोधित कर होमवर्क भी दिया था।

पीएम मोदी ने 5 सितंबर 2025 को शिक्षक दिवस के अवसर पर एक्स पर पोस्ट कर लिखा, “सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! शिक्षकों का बच्चों के मन को संवारने के प्रति समर्पण ही मजबूत और उज्ज्वल भविष्य की नींव है। उनकी प्रतिबद्धता और करुणा सचमुच उल्लेखनीय है। हम डॉ. एस. राधाकृष्णन के जीवन और विचारों को भी उनकी जयंती पर याद करते हैं, जो एक महान विद्वान और शिक्षक थे।”

इससे पहले शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर गुरुवार (04 सितंबर 2025) को पीएम नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित 45 शिक्षक-शिक्षिकाओं से मुलाकात भी की। इस दौरान पीएम ने शिक्षकों को होमवर्क दिया कि वे स्कूलों में स्वदेशी वस्तुओं को बच्चों के बीच गतिविधि और प्रोजेक्ट शुरू कर प्रचार करें।

स्कूलों में Make in India प्रोजक्ट्स और एक्टिविटी

पीएम मोदी ने कहा कि लोकल फॉ वोकल अभियान में शिक्षकों की अहम भूमिका हो सकती है। स्कूलों में इससे संबंधित गतिविधियाँ और प्रोजेक्ट्स बनवाएँ। इसमें बच्चों को Make in India वस्तुओं की पहचान करा सकते हैं। खेल-खेल में स्वदेशी वस्तुओं को घर से कम कराएँ।

पीएम ने कहा, “मान लीजिए दस क्लास हैं, हर क्लास सुबह एक-आधा घंटा प्लेकार्ड लेकर के गाँव में जुलूस निकाले, स्वदेशी अपनाओ। दूसरे दिन दूसरी क्लास, तीसरे दिन तीसरी क्लास। तो लगातार गाँव में वातावरण बना रहेगा, स्वदेशी… स्वदेशी… स्वदेशी।”

इसके अलावा स्कूलों में स्वदेशी के महत्व पर उत्सव मनाया जाए और आर्ट-क्राफ्ट क्लास में स्वदेशी सामग्री से साज-सज्जा का सामान बनाया जाए। पीएम ने कहा कि इससे बच्चों में बचपन से ही स्वदेशी की भावना बढ़ेगी।

स्वदेशी उत्सव मनाकर बच्चों को जोड़ें

पीएम ने कहा कि स्कूलों में स्वदेशी डे, स्वदेशी वीक और लोकल प्रोडक्ट डे मनाए जाने चाहिए। इसे अभियान के रूप में जोड़कर समाज को नए रंग-रूप में सजने के लिए योगदान दें। इसके तहत बच्चे परिवार से लोकल वस्तु लाकर उनकी कहानी बताएँ, जिससे एक वातावरण भी बन सकता है।

पीएम ने कहा कि लोकल मैन्युफैक्चरर्स को बच्चों से मिलवाएँ। पीएम ने कहा, “कुल मिलाकर मेड इन इंडिया को हमें अपने जीवन का आधार बनाना है, अपना दायित्व समझकर आगे बढ़ाना है और इससे युवाओं में देशभक्ति, आत्मविश्वास और डिग्निटी ऑफ लेबर के मूल्य को बढ़ाकर जीवन का हिस्सा बनाना है।”

प्रधानमंत्री का शिक्षकों को होमवर्क

पीएम मोदी ने कहा, “मुझे विश्वास है कि आप सभी एक शिक्षक के रूप में राष्ट्र निर्माण के इस बड़े मिशन को कर्तव्य भाव से जोड़ेंगे और इस देश को सामर्थ्यवान बनाने के काम को आप भी अपने कंधे पर उठाएँगे तो निश्चित ही हमें परिणाम मिलेगा।”

पीएम ने आगे कहा, “जो काम आप लोग हमेशा करते हैं, वो काम आज मैं कर रहा हूँ। आप लोग काम करते हैं होमवर्क देने का तो आज होमवर्क मैंने दिया है। मुझे पूरा विश्वास है कि आप उसको पूरा करेंगे।”

कश्मीर में 4056 कब्रों में से 93% पाकिस्तानी आतंकियों की, SYSF की रिपोर्ट ने खोली ‘आतंकिस्तान’ के खूनी-खेल की पोल: सेना विरोधी प्रोपेगेंडा का सच आया सामने

पिछले तीन दशकों से कश्मीर की कब्रगाहें सिर्फ शोक और मातम का स्थान नहीं रहीं बल्कि इन्हें एक तरह से सूचना युद्ध का हथियार भी बनाया गया है। पश्चिमी एनजीओ, अलगाववादी लॉबी और पाकिस्तान की प्रोपेगेंडा मशीन लगातार एक ही कहानी दुनिया के सामने पेश करती रही कि कश्मीर की अनचिह्नित कब्रें भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा किए गए सामूहिक अत्याचार का ‘सबूत’ हैं।

एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स ऑफ डिसअपीयर्ड पर्सन्स (APDP) और इंटरनेशनल पीपल्स ट्रिब्यूनल ऑन ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस इन कश्मीर (IPTK) की 2009 में आई रिपोर्ट Buried Evidence में यहाँ तक दावा किया कि इन कब्रों में ‘जबरन गायब किए गए’ लोगों के शव हैं।

कम्युनिटी ह्यूमन राइट्स एंड एडवोकेसी सेंटर (CHRAC), एमनेस्टी इंटरनेशनल, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाएँ भी बार-बार ‘अंतरराष्ट्रीय जाँच’ की माँग करती रहीं हैं और यह इशारा देती रहीं कि भारतीय सेना और सुरक्षा बल इन गुमशुदगियों के लिए जिम्मेदार हैं।

हालाँकि, अब ‘सेव यूथ, सेव फ्यूचर’ (SYSF) फाउंडेशन की Unraveling the Truth: A Critical Study of Unmarked and Unidentified Graves in Kashmir Valley (2025) नामक रिपोर्ट ने इन तमाम दावों को झूठा साबित कर दिया है। कई सालों तक चले फील्डवर्क के बाद SYSF ने बारामूला, कुपवाड़ा, बांदीपोरा और गंदेरबल जिलों में 373 कब्रिस्तानों का सर्वे किया और अपनी रिपोर्ट में कुल 4,056 कब्रें दर्ज की हैं।

इस रिपोर्ट के नतीजे साफ बताते हैं कि दशकों से फैलाया जा रहा प्रोपेगेंडा पूरी तरह गलत है, इनमें:
– 2,493 कब्रें विदेशी आतंकियों की हैं इनमें ज्यादातर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और LoC के पास से भेजे गए घुसपैठिए हैं।
– 1,208 कब्रें स्थानीय आतंकियों की हैं यानी कश्मीरी युवक जिन्हें आतंकवाद में भर्ती किया गया।
– 70 कब्रें 1947 के कबायली हमलावरों की हैं।
– 276 कब्रें अनचिह्नित (unmarked) हैं

इसका मतलब यह हुआ कि कुल कब्रों में से 93.2% की पहचान हो चुकी है और दस्तावेज मौजूद हैं। यह दावा कि यहाँ ‘निर्दोष नागरिकों की सामूहिक कब्रें’ हैं, पूरी तरह झूठा हैं और असलियत यह है कि ये कब्रें ज्यादातर आतंकवादियों की हैं, जिन्हें सुरक्षा बलों ने काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशनों में मारा।

आँकड़े जो तोड़ते हैं मिथक

SYSF की रिपोर्ट साफ कहती है, “कब्रों की एक बड़ी संख्या में ऐसे लोग दफन हैं जिनकी पहचान नहीं हो पाई और इनमें से ज्यादातर विदेशी आतंकवादी थे जो LoC पार करके घुसे और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए।”

यह एक लाइन ही उस पुराने प्रचार को ध्वस्त कर देती है, जिसमें दशकों से कहा जा रहा था कि यहाँ ‘निर्दोष नागरिकों का जनसंहार’ हुआ है। असलियत यह है कि ये लोग किसी ‘राज्य नीति के शिकार’ नहीं थे बल्कि हथियार उठाने वाले आतंकवादी थे, जो मुठभेड़ों में मारे गए हैं। इनमें से कई लावारिस हैं क्योंकि रावलपिंडी बैठे उनके आकाओं ने मानने से ही इंकार कर दिया कि ये कभी अस्तित्व में थे।

स्टडी में आगे दावा किया गया है, “पहचान ना हो पाने वाले शवों को दफनाना एक व्यावहारिक मजबूरी थी, ना कि किसी तरह की छिपाने की सरकारी साजिश।” मतलब साफ है कि जो आतंकी बिना किसी पहचान पत्र के पकड़े गए या मारे गए, उन्हें गाँव वाले या मस्जिद कमेटियाँ जल्दी से दफना देती थीं।

जब 93.2% कब्रों की पहचान साफ तौर पर आतंकियों और घुसपैठियों के रूप में हो चुकी है, तो यह हंगामा करना कि ‘हजारों कश्मीरी गायब हैं’ का कोई मतलब नहीं बचता है।

कब्रों के पीछे पाकिस्तान का हाथ

SYSF की रिपोर्ट कब्रों को सीधे पाकिस्तान के प्रॉक्सी युद्ध से जोड़ती है। सोवियत सेना के अफगानिस्तान से जाने के बाद 1989 में ISI ने अपनी जिहादी मशीनरी को कश्मीर में भेजना शुरू किया था। पाकिस्तान ने कश्मीरी और पाकिस्तानी आतंकियों को Loc के पार लॉजिस्टिक सपोर्ट, पैसा, हथियार पहुँचाने में हर तरह की मदद दी थी।

हिजबुल मुजाहिद्दीन, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों ने घाटी को जंग का मैदान बना दिया। विदेशी आतंकी बिना किसी दस्तावेज के आते थे और मारे जाने पर ‘अनजान आतंकवादी’ के तौर पर दफना दिए जाते थे।

रिपोर्ट साफ लिखती है कि कश्मीर में स्थानीय राजनीतिक असहमति से लेकर पार सीमा जिहादी आतंकवाद के बदलाव ने ही संघर्ष की पूरी तस्वीर को बदल दिया है। असल में ये कब्रिस्तान पाकिस्तान के उस खूनी खेल की गवाही हैं, जिन पर उसकी छाप दिखती है।

कैसे प्रोपेगेंडा ने पूरी बहस को हाइजैक किया

कथित ‘ह्यूमन राइट्स’ इंडस्ट्री ने इन कब्रों को आधार बनाकर भारत के खिलाफ कहानी गढ़ी। APDP, IPTK और एमनेस्टी ने दावा किया कि इनमें ‘गायब हुए नागरिक’ दफन हैं। लेकिन SYSF ने इनकी कार्यप्रणाली की सच्चाई सामने ले दी है।

रिपोर्ट साफ कहती है, “फॉरेंसिक जाँच जैसे DNA टेस्टिंग ना होने के चलते इन रिपोर्टों ने मृतकों की अलग-अलग श्रेणियों को एक ही माना और स्थानीय नागरिक, स्थानीय आतंकी और विदेशी आतंकी के बीच कोई साफ-साफ अंतर नहीं किया।”

यही असली धोखा था। आतंकियों और आम नागरिकों को मिलाकर पहले की रिपोर्टों ने आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए और भारत को ‘जनसंहार करने वाले देश’ के तौर पर पेश किया। SYSF ने इसकी आलोचना करते हुए कहा, “इन शुरुआती जांचों में कई सीमाएँ थीं… और इन्हें बनाने वालों की वैचारिक सोच ने ही इन्हें प्रभावित किया।”

यहाँ तक कि जम्मू-कश्मीर राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) ने भी 2011 की अपनी जाँच में कहा था कि इन कब्रों में से कई विदेशी आतंकियों की थीं, जो मुठभेड़ों में मारे गए। फिर भी प्रोपेगेंडा मशीन ने इस सच्चाई को नजरअंदाज कर दिया क्योंकि मकसद सच नहीं बल्कि भारत को बदनाम करना था।

भुला दिए गए असली पीड़ित

जिन वैश्विक रिपोर्टों में ‘अनचिह्नित कब्रों’ को लेकर इतना शोर मचाया, उन्होंने 1989-90 में हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर लगभग चुप्पी साध ली थी। उन्होंने उन मुसलमानों के नरसंहारों को भी कम करके आँका जिन्होंने आतंकियों का विरोध किया था, जैसे वंधामा (1998), चित्तीसिंहपोरा (2000) और नादीमार्ग (2003)।

SYSF रिपोर्ट मानती है कि आतंकियों ने कश्मीर में बर्बर हिंसा फैलाई थी। रिपोर्ट कहती है, “आतंकी संगठनों ने लोगों को जबरन गायब किया, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की टार्गेटेड हत्याएँ कीं, अल्पसंख्यक समुदायों (खासकर कश्मीरी पंडित और उदारवादी मुसलमानों) को डराया-धमकाया और विरोध की हर आवाज को व्यवस्थित रूप से कुचल दिया।”

यहाँ उनकी कब्र भी हैं लेकिन एमनेस्टी की चमकदार रिपोर्टों में उनका जिक्र नहीं है। इस दोहरे रवैये की भी अपनी एक कहानी है।

जवाबदेही: भारत बनाम पाकिस्तान

आलोचक अक्सर 3 घटनाओं का जिक्र करते हैं, पठरीबल (2000), माछिल (2010) और अम्शीपोरा (2020) जहाँ निर्दोष नागरिक कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए। SYSF की रिपोर्ट में इनका सच भी नहीं छिपाया गया है। रिपोर्ट बताती है कि CBI ने पठरीबल को ‘नृशंस हत्या’ कहा, माछिल में पाँच जवानों को सजा मिली और अम्शीपोरा मामले में अफसर का कोर्ट-मार्शल हुआ।

यानी भारत ने गलती होने पर अपने ही लोगों को सजा दी। यही जवाबदेही है।

अब पाकिस्तान से तुलना कीजिए। SYSF बताती है कि बलूचिस्तान में ‘सामूहिक कब्रें’ मिली हैं, जहाँ लोगों को जबरन गायब किए जाने की घटनाओं की भरमार है। लेकिन हर बार जाँच रोक दी जाती है।

फर्क साफ है कि भारत अपनी गलतियों की जांच करता है, पाकिस्तान उन्हें संस्थागत प्रणाली का हिस्सा बना देता है।

प्रोपेगेंडा का क्या होता है फायदा

तो फिर यह नैरेटिव क्यों चलता रहा कि अनचिह्नित कब्रें ही भारत के अत्याचार की गवाही हैं? क्योंकि यह प्रोपेगेंडा का सबसे बड़ा हथियार था।

SYSF ने दावा किया है, “आतंकी और अलगाववादी नेटवर्क ने इन कब्रों की तस्वीरों का इस्तेमाल प्रचार के लिए किया। बिना पुख्ता सबूतों के बड़े-बड़े आरोप लगाए गए।”

पश्चिमी एनजीओ सुर्खियाँ बटोरने के लिए इन्हें दोहराते रहे। पाकिस्तानी डिप्लोमैट इस रिपोर्ट्स को UN में दिखाते रहे और अलगाववादी इनसे गुस्साए कश्मीरी युवाओं को और भड़काते रहे। इन कब्रों को मानसिक हथियार बना दिया गया।

अब सच सामने है कि ये कब्रें ज्यादातर पाकिस्तान से भेजे गए आतंकियों की हैं।

वैश्विक संदर्भ: बोस्निया या रवांडा नहीं है कश्मीर

सबसे खतरनाक चाल यह रही कि कश्मीर की कब्रों की तुलना बोस्निया के ‘जनसंहार’ वाली कब्रों से की गई। SYSF रिपोर्ट साफ बताती है, “जैसा ईरान, बोस्निया या रवांडा में हुआ, जहाँ राज्य दमन कारण था, वैसा कश्मीर में नहीं है।”

रिपोर्ट दावा करती है कि यहाँ कब्रें सीमा-पार आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन की वजह से बनीं, ना कि किसी एथनिक क्लीनजिंग की वजह से। इन दोनों को बराबरी पर रखना ही बेईमानी है।

क्यों अहम है यह रिपोर्ट

SYSF रिपोर्ट कोई भी सच्चाई नहीं छिपाती है। यह रिपोर्ट बताती है कि कहीं-कहीं गलतियाँ हुईं, अपने गायब लोगों की तलाश कर रहे परिवारों की बात करती है और जरूरत पड़े तो डीएनए टेस्टिंग की माँग भी करती है। असल मायने यह हैं कि रिपोर्ट ने कब्रों का सही संदर्भ सामने लाती है जिसमें आतंकवाद, पाकिस्तान का प्रॉक्सी वॉर और सुरक्षा बलों के ऑपरेशनल हालात शामिल हैं।

यह एक महत्वपूर्ण स्थानीय प्रयास है, जिससे दशकों से झूठ फैलाने वाली रिपोर्टों का सच सामने लाया जा सके। 93.2% कब्रों को दस्तावेजों के साथ दर्ज करके SYSF ने इस प्रोपेगेंडा की जड़ ही काट दी।

कब्रें बताती हैं असली कहानी

इस रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों ने प्रोपेगेंडा को पूरा तरह ध्वस्त कर दिया है, अब-
– 93.2% कब्रों की पहचान हो चुकी है।
– इनमें से ज्यादातर कब्रें विदेशी और स्थानीय आतंकियों की हैं, जो मुठभेड़ों में मारे गए।
– अब केवल 276 कब्रें अनचिह्नित हैं, जो कुल कब्रों का सिर्फ 6.8% है।

SYSF का निष्कर्ष है कि ये कब्रें किसी सुनियोजित भारतीय अत्याचार का सबूत नहीं हैं, बल्कि ‘एक मौजूदा और जारी संघर्ष की जटिल हकीकत हैं, जिसमें ऑपरेशनल जरूरतें और मानवीय त्रासदी दोनों शामिल हैं’।

एमनेस्टी, ह्यूमन राइट्स वॉच और अलगाववादी समूहों के गढ़े हुए झूठ की अब इन आँकड़ों के सामने पोल खुल गई है। ये कब्रें भारत की क्रूरता का नहीं बल्कि पाकिस्तान की ‘जिहादी आतंकवाद की राजनीति’ का सबूत हैं।

कश्मीरियों को सच जानने का हक है कि इन कब्रिस्तानों में दफन लोग भारत के शिकार नहीं थे बल्कि रावलपिंडी की चाल के मोहरे थे। भारतीय सेना ने इस खूनी खेल नहीं खेला बल्कि उसने इसे संभालने की कोशिश की। पाकिस्तान से निर्यात किया गया आतंकवाद ही उनके परिजनों की मौत और घाटी की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। भारतीय सुरक्षा बलों ने इसे नियंत्रित करने की कोशिश की और इसी के चलते आज कश्मीरी खुली हवा में साँस ले रहे हैं।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

सोनिया गाँधी नहीं थी भारतीय नागरिक, फिर भी बन गईं वोटर: कॉन्ग्रेस नेता पर FIR की माँग को लेकर दिल्ली की अदालत में दायर की गई याचिका

कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी के खिलाफ दिल्ली की एक अदालत में FIR दर्ज करने की माँग की गई है। इस संबंध में याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि सोनिया गाँधी का नाम भारतीय नागरिक बनने से तीन साल पहले तक मतदाता सूची में जुड़ा था।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, शिकायतकर्ता एडवोकेट विकास त्रिपाठी ने दिल्ली की राउज एवेन्यु कोर्ट में एक याचिका दायर की है। मामले में सीनियर एडवोकेट अनिल सोनी और पवन नारंग ने ACJM वैभव चौरसिया के समक्ष दलील दी। नारंग ने कहा कि सोनिया गाँधी का नाम 1980 में नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल किया गया था।

उन्होंने बताया कि 1982 में सोनिया गाँधी का नाम मतदाता सूची से हटा लिया था। नारंग ने आगे कहा कि सोनिया गाँधी मूलरूप से इटली की नागरिक हैं, 30 अप्रैल 1983 में भारत की नागरिक बनी थीं, इसका अर्थ है कि कुछ फर्जी दस्तावेज जमा किए गए थे जो कि संगीन अपराध का मामला है।

नारंग ने कहा कि इस मामले में दिल्ली पुलिस से भी शिकायत की गई थी लेकिन कोई कार्ऱवाई नहीं हुई, जिसके चलते उन्हें कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह मामला राजनीति नहीं बल्कि कानून के दायरे में आता है, जिसके लिए पुलिस की जाँच जरूरी है।

गुरुवार (4 सितंबर 2025) को कोर्ट में ACJM वैभव चौरसिया ने मामले में कुछ देर सुनवाई की। ACJM ने पाया कि शिकायतकर्ता ने मामले में पर्याप्त दस्तावेज उपलब्ध किए हैं। इसके आधार पर मामले में सुनवाई की अगली तारीख 10 सितंबर 2025 तय कर दी है।

बीजेपी नेता ने सोनिया गाँधी पर उठाया सवाल

इससे पहले बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने एक प्रेस वार्ता में सवाल उठाया था कि इटली में जन्मीं सोनिया गाँधी का नाम 1980 में मतदाता सूची में जुड़ गया था जबकि वह 1983 में भारतीय नागरिक बनी थीं।

वहीं, बीजेपी नेता अमित मालवीय ने भी एक्स पर 1980 की मतदाता सूची की कॉपी शेयर की थी, जिसमें नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र के सफदरजंग रोड स्थित पोलिंग स्टेशन नंबर 145 की मतदाता सूची में इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, संजय गाँधी, सोनिया गाँधी और मेनका गाँधी का नाम शामिल था।

अमित मालवीय ने कहा था कि भारत की मतदाता सूची के साथ सोनिया गाँधी का रिश्ता चुनावी कानूनों के घोर उल्लंघनों से भरा पड़ा है, शायद यही कारण है कि राहुल गाँधी अयोग्य और अवैध मतदाताओं को नियमित करने के पक्षधर हैं और SIR का विरोध करते हैं।

दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों में हाईकोर्ट ने क्यों नहीं दी उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य को बेल: तीन आधार बने अहम वजह

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2020 में हुए पूर्वोत्तर दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों को लेकर साजिशकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम समेत कई लोगों को बेल देने से मना कर दिया। 2 सितंबर को हाईकोर्ट के फैसले के तीन अहम वजह बताए गए। अपराध की गंभीरता, खुद को पाक साफ साबित करने में असमर्थता और मुकदमे में देरी के आधार पर बेल नहीं दी जा सकती।

बचाव पक्ष ने दावा किया कि खालिद और इमाम शांतिपूर्ण विरोध में शामिल थे

बहस के दौरान, उमर खालिद और शरजील इमाम दोनों के बचाव पक्ष ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष तर्क दिया कि वे केवल शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में शामिल थे। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि वे उस जगह पर मौजूद थे, जहाँ दंगे भड़के थे। ये भी साबित नहीं हो रहा है कि ये लोग उन बैठकों में शामिल थे, जहाँ हिंसा की साजिश रची गई थी।

उमर खालिद को लेकर बचाव पक्ष ने ये भी दावा किया कि 17 फरवरी 2020 के अमरावती भाषण में उन्होंने ‘शांतिपूर्ण गांधीवादी तरीकों से विरोध’ का आह्वान किया था। हिंसा के लिए कोई उकसावे वाली बात नहीं कही गई थी। शरजील इमाम के वकीलों ने जोर देकर कहा कि उन्हें पहले ही पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। मुख्य दंगों से कई हफ्ते पहले, 28 जनवरी 2020 से वह हिरासत में था। इसलिए दंगों की योजना बनाने या अंजाम देने से उसे नहीं जोड़ा जा सकता। उन्होंने गवाहों की विश्वसनीयता को भी चुनौती दी और उनके बयानों को ‘मनगढ़ंत, जबरदस्ती से लिया गया और दोहराया गया’ बताया।

बचाव पक्ष ने आगे तर्क दिया कि अगर कुछ बातों को मान भी लिया जाए, तो यह केवल यूएपीए की धारा 13 के अंतर्गत आएगी, न कि अध्याय IV के गंभीर आतंकवादी अपराधों के अंतर्गत, जिनके लिए धारा 43डी(5) के तहत सख्त प्रतिबंध लागू होते हैं। उन्होंने कई उदाहरणों का हवाला देते कहा कि जब कारावास लंबा हो और मुकदमे का कोई अंत नजर न आए, तो बेल दी जा सकती है।

अभियोजन पक्ष की दलीलें

सॉलिसिटर जनरल और विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor) ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह न तो आकस्मिक थी और न ही स्वतःस्फूर्त। बल्कि दंगे ‘सुनियोजित और रणनीतिक रूप से अमेरिका के राष्ट्रपति की राजकीय यात्रा के समय रची गई थी।”

उन्होंने दिसंबर 2019 में नागरिक संशोधन विधेयक (सीएबी) पारित होने के बाद इमाम और खालिद द्वारा कई व्हाट्सएप ग्रुप बनाने की बात भी कही। इनमें विरोध करने के लिए पर्चे बाँटने, चक्का जाम करने और हिंसा फैलाने का आह्वान किया गया था। साथ ही उन भाषणों का भी जिक्र किया गया, जिनमें हिंसा की बात कही गई थी।

सरकार के मुताबिक, खालिद एक ‘देशद्रोही’ था, जिसने इमाम को विश्वविद्यालयों और मुस्लिम बहुल इलाकों में लोगों को संगठित करने का निर्देश दिया था। 13 दिसंबर 2019 को इमाम के अपने पर्चे में साफ तौर पर मुसलमानों के मताधिकार से वंचित करने की बात कही थी। उसने चक्का जाम करने का आह्वान करते हुए कहा था, “हजारों मुस्लिम युवा दिल्ली को जाम करने के लिए तैयार हैं। इससे अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान हमारे मुद्दों की ओर आएगा।”

सरकार ने कई गवाहों का हवाला देते हुए कहा कि खालिद और इमाम ने सरकार को ‘मुस्लिम विरोधी’ करार दिया और प्रदर्शनकारियों से सरकार को झुकाने के लिए ‘खून बहाने’ का आग्रह किया।

न्यायालय की अहम टिप्पणियाँ

अपने फैसले में, न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति शैलिंदर कौर की खंडपीठ ने कहा कि खालिद और इमाम के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही थे। फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि “प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि दिसंबर 2019 की शुरुआत में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के बाद, आरोपितों ने सबसे पहले कार्रवाई की, व्हाट्सएप ग्रुप बना कर और पर्चे बाँटकर… आवश्यक आपूर्ति बाधित करने सहित”।

इसके अलावा, फैसले में कहा गया कि बेल की अर्जी देने वालों ने कथित ‘भड़काऊ और उत्तेजक भाषण’ दिए, जो ‘कथित साजिश में उनकी भूमिका’ की ओर इशारा करते हैं।

दंगों से पहले हिरासत में होने के इमाम के दावे और दंगा स्थलों से खालिद की अनुपस्थिति को लेकर भी टिप्पणी की गई। अदालत ने कहा, “केवल अनुपस्थिति उनकी भूमिका को कम करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती है, क्योंकि उन पर घटनाओं की योजना बनाने और उसे तैयार करने में मुख्य साजिशकर्ता होने का आरोप लगाया गया है।”

फैसले में यूएपीए की धारा 43डी(5) का भी हवाला दिया गया, जिसमें याद दिलाया गया कि एक बार प्रथम दृष्टया आरोप सही लगने पर जमानत पर रोक लग जाती है।

फोरम शॉपिंग और जमानत में देरी में कपिल सिब्बल की भूमिका

दिल्ली उच्च न्यायालय में खालिद की टीम ने तर्क दिया कि उनकी लंबी कैद अक्टूबर 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा बेल देने से इनकार करने के बाद विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सर्वोच्च न्यायालय में हुई देरी के कारण हुई। उन्होंने दावा किया कि बार-बार स्थगन और अंततः फरवरी 2023 में एसएलपी वापस लेना कार्यवाही की धीमी गति और परिस्थितियों में बदलाव के कारण हुआ था। उस समय, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा था कि अब खालिद निचली अदालत में अपनी किस्मत आज़माएँगे।

बचाव पक्ष ने ये साबित करने की कोशिश की कि खालिद देरी के लिए जिम्मेदार नहीं थे, बल्कि अदालती रवैये का शिकार हुए। मुकदमा अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए जमानत दी जानी चाहिए।

जानबूझकर देरी करने में लगा रहा बचाव पक्ष

अभियोजन पक्ष ने तारीखों और तथ्यों के आधार पर बचाव पक्ष के तर्क को खारिज कर दिया। विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने कहा कि 2023-24 में चौदह में से सात बार सुनवाई बचाव पक्ष के कारण रुकी। अमित प्रसाद ने कहा कि खालिद पक्ष रणनीतिक रूप से स्थगन की माँग करके व्यवस्था का दुरुपयोग कर रहा था।

यह भी बताया गया कि अक्टूबर 2022 में उच्च न्यायालय द्वारा उसकी ज़मानत याचिका खारिज करने के बाद, खालिद ने अप्रैल 2023 में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से पहले लगभग छह महीने तक इंतज़ार किया। सवाल यह भी उठा कि अगर वह वास्तव में देरी से व्यथित था, तो इतना लंबा इंतज़ार क्यों किया?

एसएलपी ने कहा कि वापस लेना देरी के कारण नहीं, बल्कि फोरम शॉपिंग के कारण था। अक्टूबर 2022 से फरवरी 2024 तक, खालिद के वकील कपिल सिब्बल ने बार-बार स्थगन की माँग की और फिर जब यह स्पष्ट हो गया कि न्यायिक माहौल उनके मुवक्किल के पक्ष में नहीं है, तो उन्होंने अपना फैसला वापस ले लिया। इसके अलावा, खालिद के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत याचिका वापस लेने के पीछे ‘परिस्थितियों में बदलाव’ को एक कारण बताया।

परिस्थितियों में यह तथाकथित बदलाव दो घटनाओं के साथ हुआ। पहला, न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस के पद छोड़ने के बाद पीठ में बदलाव हुआ। मामला न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी के बैंच में चला गया। खालिद के वकीलों ने इसका विरोध किया और बार-बार मामलों को डी-टैग और पुनः सूचीबद्ध करने की माँग की।

दूसरा, जनवरी 2024 में यूएपीए के तहत गुरविंदर सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कानून में बदलाव आया। इसमें साफ किया गया कि ऐसे मामलों में, ‘जेल सामान्य है और बेल अपवाद।’

अदालत की अहम टिप्पणियाँ

2 सितंबर 2025 के अपने फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उमर खालिद की ज़मानत पर फिर से विचार किया। पीठ ने याद दिलाया कि अक्टूबर 2022 में उच्च न्यायालय ने उनकी ज़मानत याचिका खारिज कर दी थी, जहाँ अदालत ने, सामग्री की जाँच के बाद, उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला पाया था। न्यायाधीशों ने जोर देकर कहा कि उनके समक्ष प्रस्तुत तर्क पहले भी उठाए जा चुके हैं और उन पर पहले भी विचार किया जा चुका है और पहले का निष्कर्ष अभी भी सही है।

फैसले में यह भी उल्लेख किया गया है कि खालिद ने सर्वोच्च न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की थी, जिसे बाद में उनके वकील के अनुरोध पर ‘परिस्थितियों में बदलाव’ के आधार पर वापस ले लिया गया था। इस वापसी के बाद, उन्होंने निचली अदालत में एक नई ज़मानत याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने फिर से देरी और कानून में कथित बदलावों को आधार बनाया।

हालाँकि फैसले में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया था कि विशेष अनुमति याचिका वापस लेने का पहले के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन इसके तर्क ने इस प्रभाव को स्पष्ट कर दिया। एक बार फिर यह पुष्टि करते हुए कि खालिद के खिलाफ मामला प्रथम दृष्टया सही था, उच्च न्यायालय ने संकेत दिया कि मंच बदलने या परिस्थितियों में कथित बदलावों का हवाला देकर उसके पहले के फैसले के सार को पलटा नहीं जा सकता।

जेल से बाहर सह-आरोपी द्वारा की गई देरी

ज़मानत की माँग करते हुए, बचाव पक्ष ने बार-बार अनुच्छेद 21 और शीघ्र सुनवाई के अधिकार का हवाला दिया। उन्होंने केए नजीब और अन्य फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि मुकदमे के निष्कर्ष के बिना पाँच साल की कैद अत्यधिक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आरोप अभी तय नहीं हुए हैं और 700 गवाहों से पूछताछ होनी है। बचाव पक्ष ने दलील दी, “निकट भविष्य में मुकदमे के समाप्त होने की कोई संभावना नहीं है, इसलिए खालिद को बेल दी जानी चाहिए “

हालाँकि, अभियोजन पक्ष ने अपना विरोध जताया और मुकदमे के रिकॉर्ड का हवाला दिया। तस्लीम अहमद के फैसले में यह कहा गया कि 5 अगस्त 2023 को, धारा 207 सीआरपीसी के तहत अनुपालन पूरा हो गया था और निचली अदालत ने 11 सितंबर 2023 से आरोपों पर दिन-प्रतिदिन सुनवाई का आदेश दिया था। लेकिन जब वह दिन आया, तो ज़मानत पर बाहर आरोपी देवांगना कलिता, नताशा नरवाल और अन्य ने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि जाँच अभी भी जारी है।

ट्रायल कोर्ट में कहा गया था कि, “आरोपों पर बहस शुरू करने के लिए पर्याप्त समय दिए जाने के बावजूद, समय पर कोई स्थगन आवेदन दायर नहीं किया गया। अभियुक्तगण बाद में मुकदमे में देरी के आधार पर ज़मानत का दावा करेंगे।” एक हफ़्ते के भीतर, 18 सितंबर 2023 को, मीरान हैदर, अतहर खान, खालिद सैफी, फैजान खान, इशरत जहाँ, शरजील इमाम, सफूरा ज़रगर, सलीम मलिक, शिफा-उर-रहमान, शादाब अहमद और गुलफिशा फातिमा सहित एक ग्रुप ने भी स्थगन की माँग की। इसका मतलब यह था कि अभियोजन पक्ष आरोपों पर बहस करने के लिए तैयार था, फिर भी बचाव पक्ष ने जानबूझकर प्रक्रिया को अवरुद्ध कर दिया।

अभियोजन पक्ष ने जोर देकर कहा कि उमर खालिद और ताहिर हुसैन सहित कुछ अभियुक्तों ने वास्तव में कहा था कि वे 18 सितंबर 2023 को आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। लेकिन देवांगना और नताशा द्वारा दायर आवेदनों ने प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया।

मई 2024 में खालिद की ज़मानत खारिज करने वाले सत्र न्यायालय और सितंबर 2025 में दिल्ली उच्च न्यायालय, दोनों ने ही कहा कि देरी की कहानी खोखली थी। उसी दिन आए तस्लीम अहमद मामले के फैसले ने ट्रायल कोर्ट के आदेश पत्रों को फिर से प्रस्तुत करके इस मुद्दे को संदेह से परे कर दिया। 11 सितंबर 2023 और 18 सितंबर 2023 को, देवांगना कलिता और नताशा नरवाल सहित अन्य ने आरोपों पर बहस को रोकने पर आपत्ति जताई। जनवरी से अगस्त 2024 तक, “ज़मानत पाने वाले अभियुक्त इस आधार पर आरोपों पर बहस शुरू नहीं होने दे रहे थे कि जाँच पूरी नहीं हुई है।” 4 अक्टूबर 2024 को, ट्रायल कोर्ट ने कहा, “सहमति से तय कार्यक्रम के बावजूद, कोई भी वकील तैयार नहीं है… किसी भी देरी को अदालत गंभीरता से लेगी।”

इसलिए उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि बेल पर रहे अभियुक्तों ने ही देरी कराई। तस्लीम अहमद के मामले में, न्यायालय ने कहा, “रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से पता चलता है कि कुछ अभियुक्तों को ज़मानत मिल गई है और कुछ जेल में हैं। जिन अभियुक्तों को ज़मानत मिल गई है, वे इस आधार पर आरोप-पत्र पर बहस में देरी करने की कोशिश कर रहे हैं कि जाँच अभी लंबित है। जमानत पर बाहर आए अभियुक्तों द्वारा जेल में बंद अभियुक्तों की कीमत पर आरोप-पत्र पर बहस में देरी की जा रही है। न्यायालय द्वारा अभियुक्तों के वकीलों को आपस में यह तय करने का निर्देश देने के बावजूद कि अभियुक्तों द्वारा आरोप-पत्र पर बहस कैसे और किस क्रम में आगे बढ़ाई जाएगी, इसको लेकर कोई आम सहमति नहीं दिखती।”

Source: Delhi High Court

ये पूरा घटनाक्रम जानबूझकर किए गए देरी के पैटर्न को उजागर करता है। बेल पर रिहा लोगों ने जाँच पर सवाल उठाते हुए आवेदन दायर करके कार्यवाही में देरी की। उमर खालिद जैसे जेल में बंद लोगों ने उसी देरी को बेल के लिए आधार बनाने की कोशिश की। उच्च न्यायालय ने सभी दलीलें खारिज करते हुए और कहा कि धारा 43डी(5) के तहत प्रतिबंध बरकरार है क्योंकि आरोप प्रथम दृष्टया सत्य थे।

दस्तावेज- उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य की ज़मानत याचिकाओं पर फैसला।

तस्लीम अहमद की ज़मानत याचिका पर फैसला।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)