हिंदू धर्म के लोगों की एंट्री पर प्रतिबंध के बाद चर्चा में आई उत्तर प्रदेश के मेरठ की अब्दुल्ला रेजीडेंसी में अवैध निर्माण पर बुलडोजर चलाया गया है। इससे पहले प्रदेश के ऊर्जा राज्य मंत्री सोमेंद्र तोमर ने कॉलोनी के निर्माण में जाँच की माँग को लेकर मेरठ के जिलाधिकारी को पत्र लिखा था।
300 मीटर अवैध निर्माण ध्वस्त
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंत्री की शिकायत के बाद डीएम के निर्देश पर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट/एसडीएम सदर डॉ. दीक्षा जोशी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जाँच समिति का गठन किया गया था। पुलिस-प्रशासन और आवास विकास परिषद की टीम ने मंगलवार (9 सितंबर 2025) को मौके पर जाकर जाँच की और करीब 300 मीटर अवैध निर्माण को बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया गया है।
प्रशासन की टीम जमीन से जुड़े 8 बिंदुओं पर केंद्रित जाँच कर रही थी जिसमें जमीन की प्रकृति, कब्जा और मानचित्र जैसी चीजें शामिल थी। टीम द्वारा जब इसकी जाँच की गई तो मानचित्र के मुकाबले करीब 300 मीटर जमीन पर कब्जा पाया गया था। जिसके बाद इस पर बनी बाउंड्रीवॉल को गिरा दिया गया।
बताया जा रहा है कि इस कॉलोनी के लिए 22,000 वर्ग मीटर के मानचित्र को ही स्वीकृत किया गया था लेकिन बिल्डर ने 300 मीटर अतिरिक्त जमीन पर कब्जा जमा लिया था। कॉलोनी के निर्माण की जाँच कर रही इस टीम में सीओ सिविल लाइन अभिषेक तिवारी और आवास विकास के एसई राजीव कुमार शामिल हैं। वहीं, अधिकारियों ने जाँच पूरी होने तक कुछ ही कहने से इनकार कर दिया है।
गैंगस्टर की जमीन पर बनी कॉलोनी में हिंदुओं की नो-एंट्री
मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि इस कॉलोनी का निर्माण जेल में बंद गैंगस्टर शारिक की जमीन पर किया गया था। इस कॉलोनी में एक मस्जिद का निर्माण भी करा दिया गया था। मंत्री तोमर ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा था कि अब्दुल्ला रेजीडेंसी पिछले 10 सालों से विकसित की जा रही है, जिसमें केवल मुस्लिम लोगों को बसाने की योजना बनाई गई है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कॉलोनी में बनी मस्जिद का नक्शा वैध तरीके से स्वीकृत हुआ है या नहीं। साथ ही गैंगस्टर शारिक की जमीन शामिल होने की बात पर कहा कि इसकी गहराई से जाँच की जाएगी। तोमर ने कहा कि धार्मिक आधार पर बाँटने का प्रयास किसी भी सूरत में सफल नहीं हो पाएगा।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब्दुल्ला रेजीडेंसी में 90 प्रतिशत प्लॉट मुस्लिम लोगों को बेचे गए हैं। कॉलोनी में कुल 75 प्लॉट हैं, जिनमें सिर्फ 4 प्लॉट हिंदुओं के हैं। इस कॉलोनी के प्रोजेक्ट के दो पार्टनर हैं, मेजर जनरल जावेद इकबाल और महेंद्र गुप्ता। इस आरोपों के बाद ही मंत्री ने जाँच के लिए डीएम को पत्र लिखा था।
नेपाल में सबसे बड़े नागरिक आंदोलन ने सरकार को गिरा दिया है। देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति इस्तीफा दे चुके हैं। अब नेपाल को चलाने के लिए अपने अगले लीडर की जरूरत है। इस पूरे GenZ प्रदर्शन के पीछे दो किरदार सामने आ रहे हैं। पहला है काठमांडू का मेयर बालेन शाह, जिसे प्रदर्शनकारी अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। वहीं, दूसरा नाम प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले हामी नेपाल का फाउंडर सुदन गुरुंग का है।
ये दोनों नाम नेपाल में GenZ प्रदर्शनकारियों के समर्थन में सामने आए हैं। सुदन गुरुंग, जिसने पूरे प्रदर्शन का आयोजित किया। वहीं बालेन शाह, जिसने इन प्रदर्शनकारियों को भड़काया। तो आइए जानते हैं आखिर कौन है बालेन शाह और सुदन गुरुंग।
बालेन शाह की GenZ प्रदर्शन में भूमिका
बालेन शाह एक रैपर और काठमांडू का मेयर है। शाह ने ही नेपाल के युवाओं को बरगलाया और देश में सरकार के विरोध में खड़ा करने का काम किया। यह उसकी सोशल मीडिया पर सक्रियता से साफ नजर आता है। जहाँ युवा उसे अगला प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं।
तो ये शुरू होता हे रविवार (07 सितंबर 2025) से जब बालेन शाह ने फेसबुक पर एक पोस्ट के जरिए GenZ प्रदर्शन का समर्थन किया। पोस्ट में लिखा, “कल स्पष्ट रूप से GenZ का स्वतःस्फूर्त आयोजन है, वे 28 वर्ष से कम आयु के हैं, जिसके कारण मैं अभी भी बड़ा दिखता हूँ। मैं उनकी इच्छाशक्ति, उद्देश्य और सोच को भी समझना चाहता हूँ।”
बालेन शाह के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट
आगे लिखा, “कल होने वाली इस स्वतःस्फूर्त रैली में किसी भी दल, नेता, कार्यकर्ता, सांसद, बहुला, इंजीनियर को अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए होशियार नहीं होना चाहिए। मैं आयु सीमा के कारण नहीं जा सकता लेकिन उन्हें समझना जरूरी है, मेरा पूरा समर्थन है। प्रिय GenZ, मुझे बताइए कि आप कैसा देश देखना चाहते हैं?”
इसके बाद सोमवार (08 सितंबर 2025) को नेपाल की राजधानी काठमांडू समेत 7 से अधिक शहरों में 13 से 28 साल की उम्र के युवा सोशल मीडिया ऐप के बैन के खिलाफ सड़कों पर उतरते हैं। सोशल मीडिया ऐप के खिलाफ शुरू हुआ प्रदर्शन अब पीएम केपी ओली के इस्तीफे की माँग तक पहुँच जाता है। इस हिंसक प्रदर्शन में 19 लोगों की मौत और 300 से ज्यादा लोग घायल हो जाते हैं।
लेकिन यह प्रदर्शन तब भी नहीं थमता बल्कि और अधिक हिंसा की ओर बढ़ जाता है। प्रदर्शन के दूसरे दिन मंगलवार (09 सितंबर 2025) को प्रधानमंत्री केपी ओली और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल तक इस्तीफा दे देते हैं। अब बारी आती है बालेन शाह की। अब बालेन को प्रधानमंत्री बनाने की माँग बढ़ती चली जाती है।
बालेन शाह के फेसबुक पोस्ट पर ‘We want you as PM’ और ‘Please take Lead Balen’ जैसे कमेंट बढ़ने लगते हैं।
बालेन शाह की फेसबुक पोस्ट पर नेपाली युवाओं के कमेंट
इसके बाद नेपाल की स्थानीय मीडिया में भी बालेन शाह को नेपाल का अगला प्रधानमंत्री बनाने की माँग तेज होने लगती हैं। वहीं बालेन शाह भी GenZ प्रदर्शनकारियों को देश की संपत्ति को नुकसान ना पहुँचाने की अपील करते हैं।
बालेन शाह के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट
बालेन शाह ने लिखा, “प्लीज GenZ, देश तुम्हारे हाथ में है। तुम लोग इसे संभाल लोगे। अब, चाहे कितना भी नुकसान हो, तुम हमारे ही रहोगे। अब घर वापस जाओ।”
बालेन शाह के अमेरिका से कनेक्शन
बालेन शाह यूँ तो काठमांडू के मेयर हैं लेकिन अधिकांश मेयर से विपरीत उनकी पहुँच राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैली है। बालेन शाह के अमेरिका से सीधे कनेक्शन सामने आए हैं। टाइम मैगजीन 2023 के टॉप-100 लोगों में बालेन शाह का नाम है। इसके अलावा द न्यूयॉर्क टाइम्स में मीडिया कवरेज भी मिल चुकी है।
इतना ही नहीं बालेन का नेपाल में अमेरिकी दूतावास में आना-जाना लगा रहता है। साल 2022 में पहली बार अमेरिकी राजदूत आर थॉम्पसन से मुलाकात की, जिनकी तस्वीरें खुद राजदूत ने अपने एक्स अकाउंट पर शेयर की।
Great introductory meeting with Mayor of Kathmandu @ShahBalen yesterday. I particularly enjoyed discussing the ways we can work together on cultural preservation! pic.twitter.com/brEDyR7kq4
— U.S. Ambassador Dean R. Thompson (@USAmbNepal) December 2, 2022
इसके बाद साल 2024 में भी बालेन शाह की अमेरिकी राजदूत आर थॉम्पसन से मिलने की खबरें सामने आईं। इस बैठक में अमेरिकी राजदूत ने बालेन शाह को अमेरिका आने का भी न्यौता दिया था।
ओली सरकार के विरोध में बालेन शाह के गाने
बालेन शाह को राजनीति में आने से पहले रैपर के तौर पर जाना जाता था। उनके गाने के बोल अक्सर नेपाल की ओली सरकार की आलोचना को लेकर लिखे जाते रहे हैं। बालेन शाह के ही एक गाने के बोल हैं- “देश की रक्षा करने वाले सब मूर्ख हैं। सारे नेता चोर हैं, देश को लूटकर खा रहे हैं।”
बालेन शाह के गानों ने ही नेपाल के GenZ को सरकार के खिलाफ खड़ा करने का काम किया। खासकर बालेन का गाना ‘बलिदान’ से नेपाल के युवा देश की राजनीति के विरोध में खड़े हुए है। हालिया GenZ प्रदर्शन में भी बालने ने इस गाने को फेसबुक पर शेयर किया।
इस गाने को फेसबुक पर शेयर करते हुए बालेन शाह ने लिखा, “सरकार मुझे बोलने दे।”
मेयर का चुनाव लड़ते हुए बालेन शाह का विवादों में रहा, जब शाह ने काले ब्लेजर पर नेपाल का झंडा लगाते हुए चुनावी अभियान शुरू किया। इस मामले में बालेन के खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत की गई थी। इसके बावजूद शाह की लोकप्रियता युवाओं में बढ़ती गई। युवा भी शाह के सरकार विरोधी एजेंडे में फँसते चले गए, जिसका नतीजा आज नेपाल की सरकार गिराकर सामने आया है।
बालेन शाह भी भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने में आगे रहे हैं। याद हो कि आदिपुरुष फिल्म की रिलीज के समय बालेन शाह ने न सिर्फ इस फिल्म का विरोध किया, बल्कि काठमांडू के सिनेमाघरों में भारतीय फिल्मों की रिलीज तक पर रोक लगा दी थी। हालाँकि नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बालेन को पीछे हटना पड़ा था। अब इस समय GenZ के प्रदर्शनों को भी बालेन शाह खूब भुना रहे हैं।
‘हामी नेपाल’ के सुदन गुरुंग ने ही GenZ प्रदर्शन किया प्लान
नेपाल में GenZ प्रदर्शन में दूसरा नाम 36 साल के सुदन गुरुंग का है। इस पूरे प्रदर्शन का आयोजनकर्ता। खुद को NGO ‘हामी नेपाल’ का फाउंडर बताने वाले सुदन गुरुंग ने ही देश के 28 साल से कम उम्र के युवाओं को प्रदर्शन के लिए एकत्रित किया। यहाँ तक कि युवाओं को प्रदर्शन करना भी गुरुंग ने ही सिखाया।
इंस्टाग्राम पर ‘How to Protest’ वीडियो शेयर कर नेपाल के युवाओं को भड़काया। वीडियो में गुरुंग ‘शांतिप्रिय’ प्रदर्शन की बात कहता है लेकिन साथ में यह भी कहता है कि अगर जरूरत पड़े तो उग्र होना जरूरी है।
नेपाल में प्रदर्शनकारियों ने जो पोस्टर लिए थे उनपर भी हामी नेपाल का ही नाम था। हामी नेपाल ने ही सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक मोबाइलाइजेशन करवाया। हामी नेपाल ने भीड़ इकट्ठा करने के लिए डिस्कोर्ड एप का इस्तेमाल किया जहाँ ग्रुप चैट में प्रदर्शन के सारे निर्देश दिए जा रहे थे। प्रदर्शनकारियों को स्कूल की यूनिफॉर्म पहनकर आने के लिए कहा गया।
इन ग्रुप चैट की छानबीन में पता लगा कि कहीं बांग्लादेश जैसे सत्ता उखाड़ फेंकने की बात की तो कोई हिंसा की ज्यादा से ज्यादा तस्वीरें इंटरनेशनल मीडिया को भेजने की बात कहता दिखा। ग्रुप में पेट्रोल बम बनाने के तरीके भी बताए गए। लोगों से अनुरोध किया जा रहा है कि वो हत्यारा सरकार लिखा हुआ डीपी लगाए।
इन ग्रुप में नेपाल पुलिस और सैन्य बल की तस्वीरों को शार्प शूटर बताकर शेयर किया गया। इस ग्रुप चैट में लगातार हिंसा और नरसंहार तक की बातें हुईं। कुछ-कुछ वैसी ही जैसा बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के समय देखा गया था।
प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाला ‘हामी नेपाल’ का रजिस्ट्रेशन साल 2020 में हुआ, जिसमें सुदन गुरुंग को सोशल एक्टिविस्ट बताया गया। नेपाल में GenZ प्रदर्शन से पहले भी ‘हामी नेपाल’ का नाम बाढ़ राहत कार्य में ही सामने आया है। लेकिन सरकार के खिलाफ इतना बड़ा प्रदर्शन करने में ‘हामी नेपाल’ का हाथ आना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।
हामी नेपाल को विदेशी फंडिंग
सुदन गुरुंग के NGO ‘हामी नेपाल’ को कोका-कोला, वाइबर, गोल्डस्टार और मलबरी होटल्स जैसे ब्रांडों से 20 करोड़ नेपाली रुपए की वित्तीय सहायता मिली है। ये सभी विदेशी ब्रांड्स हैं। NGO ने अपनी वेबसाइट में इसकी जानकारी भी दी है।
ये वही NGO है, जिसने साल 2025 की शुरुआत में भारत के ओडिशा में एक इंजीनियरिंग कॉलेज में नेपाल की छात्रा की मौत के बाद जमकर बवाल काटा था। यहाँ तक कि नेपाल में भी भारत विरोधी भावनाओं को खूब भड़काया था। सुदन गुरुंग, जो खुद को सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में दुनिया के सामने दिखाता है। वो इस पूरे GenZ प्रदर्शन में युवाओं को भड़काने में सबसे आगे रहता है। यहाँ तक की युवाओं को बांग्लादेश और श्रीलंका का उदाहरण देते हुए देश-विरोधी गाइडेंस भी दी जाती है।
नेपाल में क्या खेल खेलने वाले हैं बालेन शाह और सुदन गुरुंग
कुल मिलाकर देखा जाए तो सुदन गुरुंग और बालेन शाह नेपाल में छिड़े हिंसक प्रदर्शन और सरकार गिराने में प्रमुख जिम्मेदार व्यक्तियों के रूप में सामने आए हैं। लेकिन इनकी प्रवृत्ति न सिर्फ भारत विरोधी है, बल्कि मूल रूप से नेपाल विरोधी भी है। सुदन गुरुंग विदेशी पैसों के दम पर नेपाल की सरकार, नेपाल के लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त कर चुका है, तो अब उसका संगठन पश्चिमी संबंधों के हिमायती बालेन शाह का नाम देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री पद के लिए उछाल रहा है।
ऐसे में बालेन शाह और सुदन गुरुंग का ये गठबंधन कहीं न कहीं बड़े खतरे की ओर इशारा कर रहा है। आपको याद हो कि कुछ समय पहले बांग्लादेश में भी इसी तरह लोकतांत्रिक रूप से देश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता को उखाड़ दिया गया था। उनकी जगह पर पश्चिमी देशों के पपेट मोहम्मद यूनुस को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया था। वहाँ भी युवा खून का इस्तेमाल पश्चिमी देशों ने बांग्लादेश को अपनी जकड़ में लेने के लिए किया था। ठीक ऐसा ही काम नेपाल में भी पश्चिमी देश कर रहे हैं, जो NGO की आड़ में अंधाधुंध पैसा झोंक कर नेपाल की सत्ता को गिरा चुके हैं।
आने वाले समय में बालेन-गुरुंग की ये जोड़ी नेपाल को किस दिशा में लेकर जाती है, ये देखने वाली बात होगी। इस पर भारत और नेपाल के लोगों की ही नहीं, चीन-रूस जैसी महाशक्तियों की भी नजर है। चूँकि नेपाल भारत और चीन से सटा हुआ देश है। इस तरह नेपाल में कुछ भी बदलाव होता है, तो इससे प्रभावित भारत और चीन भी होंगे। ऐसे में ये 2 क्षेत्रीय महाशक्तियाँ क्या कदम उठाती हैं, इस पर भी दुनिया की नजर बनी रहेगी।
यूनाइटेड किंगडम या ब्रिटेन में अक्सर इस्लामी अपराधियों के प्रति दया और सहानुभूति का भाव देखा जाता है। फिर चाहे वह पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रूमिंग/बलात्कार गिरोह हो या फिर जिहादी आतंकवादी, ब्रिटिश प्रशासन इन इस्लामी अपराधियों को संरक्षण देती है।
हाल ही में ऐसी ही एक और सहानुभूति का मामला सामने आया है। इसके तहत अलकायदा के दोषी आतंकवादी हारून राशिद असवत को ब्रिटेन की कोर्ट ने रिहा करने का फरमान सुनाया है। ये तब है जब उसे ‘गंभीर सुरक्षा खतरा’ माना गया है।हारून ने कश्मीर में इस्लामी आतंकवाद की ट्रिनंग ली। इशके बाद 7/7 लंदन बम धमाकों की साजिश रची थी।
ब्रिटेन के हाई कोर्ट के जज रॉबर्ट मॉरिस जे ने न केवल असवत की रिहाई को मंजूरी दी, पर साथ ही उसे ‘ऑल द बेस्ट’ कहकर शुभकामनाएँ भी दीं।
जे ने हारून से कहा, “मुझे पता है कि अमेरिका में हिरासत में रहना आपके लिए सुखद नहीं रहा होगा। मैं आपको शुभकामनाएँ देता हूँ। आगे का रास्ता यही है कि आप अपनी दवाएँ लेते रहें, जो सलाह मिले उसका पालन करें और उन गतिविधियों से दूर रहें जिनके कारण आप पहले जेल गए थे। आपने देखा कि उसका अंजाम क्या हुआ और मुझे पूरा विश्वास है कि आप फिर से वहाँ नहीं जाना चाहेंगे।”
हारून असवत और इस्लामी आतंकवाद में उसकी भूमिका
हारून राशिद असवत मूल रूप से बैटली, वेस्ट यॉर्कशायर का रहने वाला है। 1990 के दशक में अबू हमजा के साथ अमेरिका के ओरेगन में आतंकी ट्रेनिंग केंप स्थापित करने की कोशिश की थी। इसके लिए 2015 में अमेरिका में उसे 20 साल की सजा सुनाई गई थी।
इसके बाद 2022 में उसे ब्रिटेन वापस भेजा गया। यहाँ उसे सीजोफ्रेनिया नाम की बीमारी का पता चला। इसके इलाज के लिए उसे मानसिक अस्पताल में रखा गया था। अब उसकी रिहाई को मंजूरी दी गई है।
1999 में एक कार में हारून असवत और नफरती भाषण देने वाला अबू हमजा अल मसरी (फोटो- मेट्रो)
गौरतलब है कि हारून ने पहले ही स्वीकार किया था कि उसने 7 जुलाई 2005 को लंदन में हुए आत्मघाती हमलों की योजना बनाई थी। इसमें 52 निर्दोष लोगों की मौत हो गई थी और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। उसने खुद को सार्वजनिक रूप से ‘आतंकवादी’ कहा था।
हारून और उसके साथी आतंकवादी उआसामा कसीर ने पाकिस्तान में जिहाद की ट्रेनिंग ली थी। अमेरिका में मुकदमे के दौरान असवत ने स्वीकार किया था कि उन्होंने ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा का साथ दिया। असवत और कासिर सीएटल भी गए, जहाँ दोनों एक मस्जिद में दो महीने तक रहे।
इन दोनों ने मस्जिद में रहकर वहाँ के लोगों को हथियारों की जानकारी, AK-47 को असेंबल/डिसअसेंबल करने, साइलेंसर बनाने और ग्रेनेड लॉन्च करने की ट्रेनिंग दी।
अमेरिकी प्रशासन की जाँच में यह भी सामने आया कि सितंबर 2002 में पाकिस्तान के कराची में अलकायदा के एक सेफ हाउस से बरामद दस्तावेजों में असवत का नाम शामिल था। इन दस्तावेजों का इस्तेमाल 9/11 हमलों का मास्टरमाइंड खालिद शेख मोहम्मद इस्तेमाल करता था।
रिपोर्ट्स के अनुसार, लंदन हमलों के आत्मघाती हमलावरों की ओर से की गई 20 कॉल्स एक ऐसे फोन से की गई थीं जो असवत से जुड़ा था। कुछ हफ्तों के बाद हारून को जाम्बिया में गिरफ्तार किया गया। उसके पास से आतंकी मैनुअल और बम बनाने का सामान भी बरामद हुआ था।
हारून ने ये भी माना था कि उसने विदेशी आतंकवादी संगठन को समर्थन दिया और साथ ही उन्हें हमलों से जुड़ी चीजें भी मुहैया करवाई थी। इन दोनों आरोपों के लिए अमेरिका में अधिकतम 10 साल की सजा निर्धारित है।
हालाँकि उसने 20 साल की सजा पूरी नहीं की क्यों कि तब तक ब्रिटेन में उसके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी।
ब्रिटिश जज की जरूरत से अधिक सहानुभूति और कानूनी खामियाँ
हारून की मेडिकल रिपोर्ट बताती है कि ब्रॉडमूर अस्पताल में इलाज के बावजूद उसकी मानसिक स्थिति ‘स्थिर’ होने पर वह हिंसक जिहादी विचारधारा पर ही बात करता रहता है।
इस वर्ष अप्रैल में, जब मेट्रोपोलिटन पुलिस ने हारून और उसके परिवार पर निगरानी के लिए नोटिफिकेशन ऑर्डर की याचिका दायर की, तब जज जे को बताया गया था कि हारून आम लोगों के लिए खतरा है। साथ ही उसकी उनकी मानसिक बीमारी इस्लामी कट्टरता को और अधिक बढ़ाती है।
जज जे ने माना कि हारून अब भी ‘हिंसक कट्टरपंथी वाले आतंकवादी गतिविधियों’ के लिहाज से एक खतरा है, क्योंकि उसने यहूदियों, ईसाइयों और कुछ मुस्लिम समूहों को मारने की धमकी दी है। साथ ही, वह मानसिक रूप से अस्थिर होने के बीवजूद अन्य कमजोर लोगों को प्रभावित कर सकते हैं क्योंकि तब उसका मजहबी उग्रवाद मानसिक बीमारी से और तेज हो जाता है।
हारून के आतंकी इतिहास और भविष्य में आतंकी गतिविधियों से जुड़ने की प्रवृत्ति को जानने के बावजूद जज जे ने हारून से सहानुभूति जताते हुए कहा, “आप शायद अब यह सब पीछे छोड़ना चाहते हैं। अमेरिका की हिरासत में रहना बहुत अच्छा नहीं रहा होगा।”
हारून की मानसिक स्थिति के कारण उसे जेल के बजाय अस्पताल में रखा गया। इसके कारण उसका आतंकवादी जोखिम मूल्यांकन (terrorist risk assessment) नहीं हो सका। अब उसे बिना एंकल टैग मॉनिटरिंग के रिहा किया जा रहा है क्योंकि इस तरह के मानसिक रोगियों पर निगरानी रखने की अनुमति नहीं है।
इस बीच, मेट्रोपॉलिटन पुलिस के आतंकवाद विशेषज्ञ डिटेक्टिव चीफ सुपरिंटेंडेंट गैरेथ रीस ने कोर्ट को बताया, “उसने अफगानिस्तान में अलकायदा के साथ बिताए समय बेहतर बताते हुए फिर से उससे जुड़ने की बात कही है। मेरे अनुभव के अनुसार, यह व्यवहार ब्रिटेन की राष्ट्रीय सुरक्षा और जनता के लिए गंभीर खतरा हो सकता है।”
जज रॉबर्ट जे की इस सहानुभूति भरी टिप्पणी ने ब्रिटेन में आक्रोश पैदा कर दिया है। रिफॉर्म यूके पार्टी के नेता नाइजेल फराज ने जज जे को बर्खास्त करने की माँग की है और कहा, “लोग अब कड़ा न्याय चाहते हैं। हारून का बाकी बचा हुआ जीवन कड़ी सुरक्षा वाली जेल में बिताना चाहिए और जज जे को बर्खास्त कर देना चाहिए।”
शैडो जस्टिस सेक्रेटरी रॉबर्ट जेनरिक ने भी जज जे की टिप्पणी की आलोचना की है। उन्होंने कहा , “ये 7 जुलाई के पीड़ितों का अपमान है। एक हाई कोर्ट के जज का किसी भी दोषी आतंकवादी को शुभकामनाएँ देना या सहानुभूति जताना सही नहीं है। जे को शर्म आनी चाहिए कि वे किसी कट्टरपंथी के साथ दोस्ताना व्यवहार कर रहे हैं।”
ये खबर मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। इसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है। इसका अनुवाद रामांशी मिश्रा ने किया है।
सड़कों पर युवा, संसद या राष्ट्रपति भवन में घुसने की कोशिश… इंटरनेट पर सरकार के भ्रष्टाचार के आरोप और फिर इंटरनेशनल मीडिया में खूब सारे आर्टिकल!! क्या नेपाल में बांग्लादेश और श्रीलंका वाली प्लेबुक अपनाई जा रही है?
नेपाल की राजधानी काठमांडू समेत तमाम शहरों में 8 सितंबर, 2025 को प्रदर्शनकारियों का हुजूम उमड़ पड़ा। मीडिया में चला कि ये लोग सोशल मीडिया पर बैन और भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन करने आए हैं। इस प्रदर्शन में लगभग 20+ लोग मारे भी गए।
लेकिन जैसे ही थोड़ा सा इस प्रदर्शन को हमनें खुरचा तो पता चला कि कहानी यहाँ उतनी सीधी नहीं है जितनी दिखाई पड़ती है। दरअसल, इस पूरे प्रदर्शन को ऑर्गनाइज करवाने वाले ग्रुप का नाम है हामी नेपाल।
इस हामी नेपाल का मुखिया एक युवक है, जिसका नाम है सूदन गुरुंग। हामी नेपाल ने ही इस प्रोटेस्ट के बैनर पोस्टर बनवाए हैं, लोगों को इकट्ठा किया है। सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक मोबीलाइजेशन भी इसी ग्रुप का है।
हामी नेपाल ने भीड़ इकट्ठा करने के लिए डिस्कोर्ड एप का इस्तेमाल किया जहाँ ग्रुप चैट में प्रदर्शन के इंस्ट्रक्शंस दिए जा रहे थे। हमने इन ग्रुप्स में छानबीन की तो यहाँ कोई बांग्लादेश जैसे सत्ता उखाड़ फेंकने की बात कर रहा है तो कोई कह रहा है कि हिंसा की ज्यादा से ज्यादा तस्वीरें इंटरनेशनल मीडिया को भेजो। ग्रुप में पेट्रोल बम बनाने के तरीके भी बताये जा रहे हैं। लोगों से अनुरोध किया जा रहा है कि वो हत्यारा सरकार लिखा हुआ डीपी लगाए। नेपाल पुलिस और सैन्य बल की तस्वीरों को शार्प शूटर बतलाते शेयर किया जा रहा है।
इस ग्रुप चैट में लगातार हिंसा और नरसंहार तक की बातें हुईं। कुछ कुछ वैसी ही जैसा बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के समय देखा गया था। लेकिन इतना बड़ा प्रोटेस्ट कोई लड़कों का ग्रुप आयोजित करवा ले ये संभव नहीं है।
हामी नेपाल के बारे में थोड़ी छानबीन की तो पता चला कि इसे 2015 में बनाया गया था। ये नेपाल में समाजसेवा करने का दावा करता है। इसका असल मुखिया संदर्क रूइट नाम का एक आँख का सर्जन है। उसे हामी नेपाल ने अपना मेंटर बताया है। उसे रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड भी मिल चुका है।
यह शख्स बारबरा फाउंडेशन नाम से NGO चलाता है। ये NGO एक अमेरिकी महिला का स्थापित किया हुआ है, वो काठमांडू में रहा करती थी। ये NGO नेपाल में जातिवाद जैसे कई मुद्दों पर काम करता है।
इतना ही नहीं बल्कि ये NGO पत्रकारों को अवॉर्ड भी देता है। नेपाल में हिंसक प्रदर्शन करवाने वाले हामी नेपाल को ऑफिस स्पेस भी इसी बारबरा फाउंडेशन ने दिया हुआ है।
हामी नेपाल का लिंक अल जजीरा के साथ ही कुछ ऐसे एनजीओ से भी है, जिनके तार ब्रिटेन की सरकार से जुड़ते हैं। नेपाल की इन घटनाओं पर रिपोर्ट करने में सबसे आगे अल जजीरा ही रहा है।
साथ ही साथ जैसे बांग्लादेश में हिंसा के बाद अमेरिकी और पश्चिमी देशों के दूतावास दंगाइयों के साथ खड़े हो गए थे, यहाँ भी कुछ वैसा ही हुआ है। अमेरिकी एंबेसी ने बाकी दूतावासों के साथ वही भाषा लिखी है, जो वह बांग्लादेश में तख्तापलट के समय लिखा करता था।
इसके साथ ही हिंसा के बाद UNHCR, UN, एमनेस्टी इंटरनेशनल दुनिया भर के रिजीम चेंज स्पेशलिस्ट NGO भी एक्टिव हो चुके हैं। सभी हिंसा की बात को दोहरा रहे हैं।
नेपाल में Gen Z Protest वाले Regime Change के पीछे NGO?
प्रदर्शन ऑर्गनाइज करने वाले 'Hami Nepal' और 'Sudan Gurung' के पीछे विदेशी हाथ… रेमन मैग्सेसे विनर Sanduk Ruit के साथ भी ताल्लुक? @journoharshv बता रहे नेपाल में सत्ता परिवर्तन के पीछे की पूरी Exclusive कहानी pic.twitter.com/3MqmP65FLb
इन सब सूचनाओं के आधार पर अब तक आपने कुछ ना कुछ समानताएँ तो निकाल ही ली होंगी।
एक NGO, एक ऐसा चेहरा जिसका समाजसेवा में नाम हो, जिसके नाम पर नोबल या मैग्सेसे जैसा अवॉर्ड हो। उसके बाद भ्रष्टाचार का मुद्दा और आवारा युवाओं की भीड़?
दरअसल, ऐसे रेजीम चेंज ऑपरेशन्स में हिंसा को एंप्लीफाई करके दिखाना, चुनाव प्रक्रिया को गड़बड़ बताना, करप्शन जैसे मुद्दों को लीड बनाना और युवाओं को ढाल की तरह पेश करना, मोडस ऑपरेंडी होती ही है।
अब आने वाले कुछ दिन नेपाल की व्यवस्था के सबसे कठिन टेस्ट होने वाले हैं। जो नेपाल और दिशा तय करेंगी।
सवाल वही है, क्या भारतीय उपमहाद्वीप में एक और बांग्लादेश तैयार हो रहा है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (9 सितंबर 2025) को पंजाब में बाढ़ और भारी बारिश से प्रभावित इलाकों का दौरा किया। उन्होंने पहले हवाई सर्वेक्षण किया ताकि बाढ़ और भूस्खलन से हुए नुकसान का जायजा ले सकें। इसके बाद गुरदासपुर में एक बैठक में राहत और पुनर्वास कार्यों की समीक्षा की।
पीएम मोदी ने पंजाब के लिए 1600 करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता की घोषणा की, जो राज्य के पास पहले से मौजूद 12,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त है। इसमें राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) और पीएम किसान सम्मान निधि की दूसरी किश्त का अग्रिम भुगतान शामिल है।
Conducted an aerial review of the floods in Punjab. Authorities are working round the clock, assisting those impacted. Our thoughts are with the people in this challenging time. pic.twitter.com/NXxbCoHQXS
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि प्रभावित क्षेत्रों को फिर से बसाने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई जाएगी। इसमें पीएम आवास योजना के तहत घरों का पुनर्निर्माण, राष्ट्रीय राजमार्गों की मरम्मत, स्कूलों की बहाली, पीएमएनआरएफ के तहत राहत और पशुपालकों के लिए मिनी किट वितरण शामिल है। जिन किसानों के पास बिजली कनेक्शन नहीं है, उनके लिए विशेष सहायता दी जाएगी। जिन बोरवेल्स में मिट्टी भर गई या जो बह गए, उनके लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत पुनर्वास सहायता दी जाएगी। डीजल से चलने वाले बोर पंपों के लिए MNRE के साथ मिलकर सौर पैनल और प्रति बूँद अधिक फसल योजना के तहत माइक्रो इरिगेशन की सुविधा दी जाएगी।
प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत पंजाब सरकार के विशेष प्रोजेक्ट के लिए बाढ़ से क्षतिग्रस्त ग्रामीण घरों के पुनर्निर्माण के लिए वित्तीय सहायता दी जाएगी। बाढ़ से प्रभावित सरकारी स्कूलों को समग्र शिक्षा अभियान के तहत मदद मिलेगी, बशर्ते राज्य सरकार जरूरी जानकारी दे। जल संचय जन भागीदारी कार्यक्रम के तहत पंजाब में पानी जमा करने वाली संरचनाओं का निर्माण और मरम्मत होगी, जिससे बारिश के पानी का संरक्षण और लंबे समय तक जल स्थिरता सुनिश्चित होगी।
केंद्र सरकार ने नुकसान का आकलन करने के लिए केंद्रीय दलों को पंजाब भेजा है, जिनकी रिपोर्ट के आधार पर और सहायता दी जाएगी। प्रधानमंत्री ने बाढ़ में जान गँवाने वालों के परिजनों से मुलाकात की और संवेदना व्यक्त की। उन्होंने मृतकों के परिवारों के लिए 2 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायल लोगों के लिए 50,000 रुपये की अनुग्रह राशि की घोषणा की। बाढ़ और भूस्खलन से अनाथ हुए बच्चों के लिए पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन योजना के तहत व्यापक सहायता दी जाएगी।
Met families affected by the severe floods in Punjab. We are working with urgency to provide relief and extend all possible support to every person who has suffered due to the floods. We are committed to extending all possible help to everyone, including farmers, whose well-being… pic.twitter.com/JsvMmbw824
प्रधानमंत्री ने NDRF, SDRF, सेना और आपदा मित्र स्वयंसेवकों की तारीफ की, जिन्होंने राहत और बचाव में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर इस मुश्किल समय में पंजाब के लोगों का साथ देंगे।
इससे पहले पीएम मोदी ने हिमाचल प्रदेश का दौरा किया था। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के लिए केंद्र सरकार की तरफ से ₹1500 करोड़ के मदद की घोषणा की थी।
यह रिसर्च सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (CSDS: Centre for the Study of Developing Societies) के इतिहास, विचार, फंडिंग इकोसिस्टम और विदेशी संस्थाओं के साथ सहयोग की जाँच करता है। विश्लेषण की वजह ये है कि विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ के साथ भारत के कथित थिंक टैंक और मीडिया के बीच सीएसडीएस एक गठजोड़ बनाता है, जो वैचारिक रूप से भारत, खासकर बहुसंख्यक हिंदुओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ है। इस रिसर्च में ऐसे कई रहस्योद्घाटन हुए हैं, जिससे पता चलता है कि भारत के राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को प्रभावित करने, भारत के लोकतंत्र में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने और विदेशी शक्तियों के इशारे पर भारत की संप्रभुता को कमजोर करने की कोशिश की गई है। सीएसडीएस और उसके मददगारों ने कैसे दूसरे देशों की विदेश नीति के एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश की है, इसका भी पता चलता है।
CSDS की उत्पत्ति और विचार
सीएसडीएस की स्थापना 1963 में रजनी कोठारी ने की थी। कोठारी के क्रियाकलाप हिन्दू समाज को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित थे। वह देश की धर्मनिरपेक्षता, जातिवाद और बहुसंख्यक विरोधी सोच का व्यक्ति रहा है। यह शोधपत्र सीएसडीएस की जड़ों को एशिया फाउंडेशन जैसी प्रायोजित विदेशी संस्थाओं से जोड़ता है, जो सीआईए का एक मुखौटा है। इससे साफ होता है कि संस्थान की स्थापना के पीछे ‘बाहरी प्रभाव’ था। सीएसडीएस के नेतृत्व में दशकों से ऐसे कार्यों को बढ़ावा मिला, जो भारत के बहुसंख्यक समुदाय को टारगेट करती है। अल्पसंख्यकों के झूठे उत्पीड़न की बात करती है और भारत की संप्रभुता और एकता को कमजोर करने वालों को ‘वैचारिक सोच’ प्रदान करती है।
विदेशी अनुदान का फैला जाल: नकदी, सामंजस्य और सोच
सीएसडीएस का परिचालन और अनुसंधान बजट न केवल भारत सरकार के अनुदानों (मुख्य रूप से इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च, ICSSR) के माध्यम से संचालित होता है, बल्कि विदेशी अनुदान पर इसकी निर्भरता भी लगातार बढ़ती जा रही है। 2016 से सीएसडीएस को FCRA के माध्यम से कम से कम ₹15.6 करोड़ प्राप्त हुए हैं। हालाँकि अधूरे खुलासों के कारण पूरी राशि का पता नहीं चल पाया है। अनुमान है कि ज्ञात स्रोतों से प्राप्त आमदनी से कहीं अधिक धनराशि इन्हें मिली है। सीएसडीएस की फंडिंग के मुख्य स्रोतों की बात करें तो वो निम्नलिखित हैं:
कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग (KAS: Konrad Adenauer Stiftung): जर्मन सरकार द्वारा फंडेड ये फाउंडेशन, सीधे तौर पर सत्तारूढ़ क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) से संबद्ध है। इस फाउंडेशन ने 2016 से 2.6 करोड़ रुपए से अधिक का दान दिया है। केएएस जर्मन विदेश नीति और पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाती है, जो अक्सर टारगेट वाले देशों की राजनीतिक को कमजोर करता है या इसे ‘सुधारने’ के नाम पर सत्ता परिवर्तन को हवा देता है।
अंतर्राष्ट्रीय विकास अनुसंधान केंद्र (IDRC: International Development Research Centre): आईडीआरसी कनाडा की एक क्राउन कॉपोरेशन है, जो पिछले 8 सालों से अपने थिंक टैंक के माध्यम से सीएसडीएस के सालाना बजट का एक तिहाई भाग प्रदान करता आ रहा है। आईडीआरसी कनाडाई विदेश नीति का एक हिस्सा है। ये अलगाववाद को बढ़ावा देता है। खालिस्तानी अलगाववादियों को कनाडा का खुला संरक्षण इसका उदाहरण है।
सीमेनपू फ़ाउंडेशन (Siemenpuu Foundation): फिनलैंड के विदेश मंत्रालय की आर्थिक मदद ये चल रहा यह फिनिश एनजीओ, सीएसडीएस और उसकी ब्रांचों (विशेषकर एसएडीईडी) को मदद करता है। सीमेनपू फाउंडेशन भारत में ‘आदिवासियों के समर्थन’ के आस-पास केंद्रित हैं, लेकिन उनके नेटवर्क और संवाद मंच नक्सल-समर्थित और हिंदू-विरोधी कथित बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को ‘नजरिया’ प्रदान करते हैं। ये अक्सर भारत में उत्पीड़न और बेदखल जैसे मुद्दों को बढ़ावा देती है।
बर्गग्रुएन इंस्टीट्यूट (BI: Berggruen Institute): बीआई का भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी विचार इसकी पत्रिका “नोएमा” के माध्यम से प्रसारित होता है। इसमें भारत को सत्तावादी, सांप्रदायिक और पिछड़ा बताया जाता है और अक्सर अति-वैचारिक और तथ्यात्मक रूप से चुनिंदा लेखकों के लेख छापती है। इन लेखकों में भारत-विरोधी पश्चिमी लॉबी से जुड़े लेखक भी शामिल हैं।
फोर्ड फाउंडेशन, हेनरी लूस फाउंडेशन, ओमिडयार, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (Ford Foundation, Henry Luce Foundation, Omidyar, Open Society Foundations): ये अमेरिकी संस्थाएँ सत्ता परिवर्तन, समाज के कथित सशक्तिकरण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए धन मुहैया कराती हैं। सीएसडीएस को सीधे या अपने सहयोगियों (जैसे “भारतीय मुस्लिम परियोजना”) के माध्यम से मदद करती है। ये लोग भारत और उसकी सरकार से पीड़ित होने के नेरेटिव को बढ़ावा देते हैं।
साइंसेज पीओ/एफएनएसपी (Sciences Po/FNSP): फ्रांस के प्रमुख राजनीति विज्ञान संस्थान ने, एफएनएसपी के माध्यम से, सीएसडीएस को पर्याप्त वित्तीय योगदान दिया है। इसकी फैकल्टी, खास कर क्रिस्टोफ़ जाफ़रलॉट, ने नियमित रूप से हिंदू विरोधी राजनीति और मोदी सरकार की आलोचना करते हुए शोध प्रकाशित किए हैं।
पश्चिमी मीडिया, ‘खोजी’ नेटवर्क और सत्ता-पलट तत्वों की मिलीभगत
शोध में विस्तार से बताया गया है कि कैसे सीएसडीएस और उसका शोध/पॉलिसी इकोसिस्टम—लोकनीति, एसएडीईडी और संबद्ध शिक्षाविद के साथ पश्चिमी मीडिया और ‘खोजी पत्रकारिता’ नेटवर्क (जैसे जीआईजेएन, ओसीसीआरपी, बेलिंगकैट, रिपोर्टर्स कलेक्टिव, आरएसएफ, और अन्य) जुड़े हुए हैं। ये गठजोड़ आकस्मिक नहीं है। नेटवर्क के इस जाल को अमेरिकी विदेश विभाग, एनईडी (सीआईए की सत्ता परिवर्तन कराने वाली कुख्यात शाखा), सोरोस की ओपन सोसाइटी और यूरोपीय सरकारी एजेंसियों का समर्थन है। इन चैनल्स के माध्यम से पश्चिमी खुफिया और राजनीतिक कर्ताधर्ता भारत की मीडिया और शोध विमर्श को तय करते हैं। साथ ही उन लोगों को आर्थिक मदद देते हैं, जो पश्चिमी नीतिगत प्राथमिकताओं और भारत की विफलता की बात करता है।
गठजोड़ बनाता फीडबैक लूप: विदेशी फंड पर निर्भर भारतीय शोधकर्ता भारत के लोकतंत्र, मीडिया और सांप्रदायिक स्थिति को लेकर खौफनाक रिपोर्ट तैयार करते हैं। फिर इन्हें वैश्विक स्तर पर मीडिया के माध्यम से फैलाया जाता है। इसको भारत में ‘कुछ लोग’ सही ठहराते हैं, जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अर्बन नक्सल, अलगाववादियों और कट्टरपंथियों से संपर्क होता है।
बौद्धिक रणनीति: जातिगत सवाल, अल्पसंख्यक उत्पीड़न, हिंदू-विरोध और राष्ट्र-विरोध
सीएसडीएस के शोध, प्रकाशन और ‘सर्वेक्षण’ का उद्देश्य जाति, अल्पसंख्यक उत्पीड़न, हिंदू-विरोध और राष्ट्र-विरोध है। इसके इर्द-गिर्द इनकी रणनीतिक आगे बढ़ती है।
हिंदुओं का विभाजन: सीएसडीएस का शोध हिंदू विभाजन को और बढ़ाने की कोशिश करता है, खासकर दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों को उनकी हिंदू पहचान से अलग करके, और राजनीतिक परिणामों को जातिगत उत्पीड़न और ‘बहुसंख्यक अत्याचार’ के चश्मे से देखकर। इस विभाजन को बनाए रखना और बढ़ाना ‘भारत-विरोधियों’ की रणनीति का अहम हिस्सा है।
दलित-मुस्लिम नरेटिव को प्रोत्साहित करना– सीएसडीएस बार-बार दलित और मुस्लिमों को एक साथ जोड़ने का प्रयास करता है। उसका दावा है कि दलित और मुस्लिम भारत और बहुसंख्यक हिंदुओं द्वारा पीड़ित हैं। इसलिए इनके बीच एकता ‘लोकतंत्र’ के लिए बेहद जरूरी है।
हिन्दुओं और भारत को विभत्स दिखाना- सीएसडीएस के कथित विद्वान, संबद्ध पत्रकार, आशीष नंदी- अनन्या वाजपेयी जैसे सहयोगी, साजिश के तहत हिंदुओं को फासीवादी, कट्टरपंथी और हिंसा फैलाने वाले के रूप में दिखाते हैं। ऐसा ये तब भी करते हैं, जब सबूत इन दावों के उलट होता है (उदाहरण के लिए, गोधरा 2002, दिल्ली हिंदू विरोधी दंगा 2020)। इनके शोध का इस्तेमाल भारतीय राष्ट्रवाद को अवैध ठहराने, बाहरी हस्तक्षेप को सही ठहराने और वैश्विक मीडिया में दुष्प्रचार के लिए किया जाता है।
भारतीय संप्रभुता को कमजोर करना: विदेशी फंडिंग वाला सीएसडीएस का शोध सत्ता विरोधी प्रदर्शन, आंदोलन और सोशल मीडिया पर ऐसे अभियानों का समर्थन करते हैं, जिससे देश की संप्रभुता और एकता कमजोर होती है। ये ऐसे तत्वों की बौद्धिक मदद भी करते हैं। देश में ऐसे बदलाव का समर्थन करते हैं, जिससे विदेशी हित साधा जा सके। ये बदलाव और नीतियाँ अक्सर लोकतांत्रिक निर्वाचित सरकार और बहुसंख्यक के खिलाफ होते हैं।
भारत विरोधी विदेशी संस्थानों के साथ गठजोड़
यह रिसर्च दर्शाता है कि सीएसडीएस का तंत्र न केवल वैचारिक रूप से भारत के खिलाफ है, बल्कि ऐसे संस्थाओं और व्यक्तियों को मदद करता है, जो इस विचार का समर्थन करते हैं और उसे संरक्षण देते हैं।
अमेरिकी डीप स्टेट के साथ जुड़ाव: सीएसडीएस के कई साझेदारों और आर्थिक मददगारों (एनईडी, आईडीआरसी, ओपन सोसाइटी, फोर्ड फाउंडेशन) की लैटिन अमेरिका, पूर्वी यूरोप और एशिया में सत्ता परिवर्तन अभियानों में सक्रिय रूप से जुड़े होने के प्रमाण मौजूद हैं।
खालिस्तान समर्थक, पाकिस्तान समर्थक, इस्लामवादी और वामपंथी समूहों से संबंध: आईडीआरसी से जुड़े लोग और मदद पाने वाले लोगों ने किसान विरोध प्रदर्शनों, सीएए, दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों में हिस्सा लिया। सीएसडीएस या उसके सहयोगी गैर सरकारी संगठनों के अहम सदस्य नियमित रूप से अर्बन नक्सलियों, खालिस्तानी समर्थकों और भारत विरोधी लॉबी के साथ आंदोलनकारी समूहों में दिखाई देते रहे हैं।
चीन का प्रभाव: भारत विरोधी सक्रियता के लिए जाने जाने वाले कथित शिक्षाविदों और पत्रकारों (यहाँ तक कि एक पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री) की मेजबानी, वित्त पोषण या उनके साथ संबद्धता के माध्यम से, न सिर्फ पश्चिमी देशों से बल्कि चीन से वित्त पोषण होने वाले चैनल (बर्गग्रुएन इंस्टीट्यूट के माध्यम से) से संबंध इनकी तटस्थता के किसी भी दिखावे को और अधिक कमजोर कर देते हैं।
एक जैसा पैटर्न और मोटिवेशन
एक व्यवस्थित पैटर्न उभरता है: विदेशी संस्थाएँ और सरकारें, कथित भारतीय थिंक टैंकों और कार्यकर्ताओं के साथ सहयोग करती हैं। ये मिलकर भारत की सरकार, बहुसंख्यक समुदाय और राष्ट्र-निर्माण परियोजनाओं की आलोचना करते हैं। ये लोग संयुक्त रूप से वैश्विक स्तर पर नकारात्मक नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं, ताकि भारत की नीतिगत दबाव डाल सकें। इसके अलावा आंतरिक सामाजिक विभाजन और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने का प्रयास करते हैं।
रिसर्च में कहा गया है कि इस समन्वित अभियान का उद्देश्य भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुँचाना, वैश्विक स्थिति को कमज़ोर करना और बुद्धिजीवियों, मीडिया और अन्य लोगों के माध्यम से सत्ता को प्रभावित करना है।
इसके अलावा, हिंदू विरोधी हिंसा, धर्मांतरण और भारतीय हितों को वैश्विक स्तर पर निशाना बनाने पर इन संगठनों की चुप्पी, जबकि किसी भी कथित या मनगढ़ंत अल्पसंख्यक मुद्दे पर ओवर एक्टिव होना, इनके पूर्वाग्रह को उजागर करता है।
This is the full spider web, or the mindmap of the network around CSDS. You can download the high resolution picture (6 MB size) of this mindmap by clicking here.
सीएसडीएस के इर्द-गिर्द फैले नेटवर्क का पूरा मकड़-जाल या माइंडमैप ऊपर दिया गया है। आप इस माइंडमैप का हाई रेजोल्यूशन चित्र (6 MB की फाइल है) यहाँ क्लिक करके डाउनलोड कर सकते हैं।
सीएसडीएस और इसके सहयोगी गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया प्लेटफॉर्म और वित्तपोषकों का गठजोड़ भारत की संप्रभुता, सांस्कृतिक अखंडता और लोकतांत्रिक वैधता के लिए एक समन्वित वैचारिक चुनौती के रूप में काम करता है। विदेशी फंड व्यवस्थित रूप से अपने शोध, आउटरीच और सक्रियता को सरकारों और वैश्विक व्यवस्था परिवर्तन तथा सामाजिक इंजीनियरिंग में निवेश करने वाले अरबपति फाउंडेशनों से संचालित होते हैं। सीएसडीएस का केस स्टडी यह उजागर करता है कि कैसे “नागरिक समाज” और “शैक्षणिक” संस्थानों को लोकतांत्रिक राज्यों के खिलाफ नैरेटिव युद्ध के औजारों में बदला जा सकता है। भारत को अपनी स्वायत्तता और राष्ट्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए, ऐसे संगठनों के एजेंडे, वित्तीय स्रोतों और संबंधों की कड़ी जाँच, नियामक निगरानी और सार्वजनिक जवाबदेही के अधीन होना चाहिए।
रिसर्च टीम:
प्रमुख शोधकर्ता: नूपुर जे शर्मा
शोधकर्ता: आशीष नौटियाल, दिव्यांश तिवारी, प्रारब्ध राय, ध्रुव मिश्रा, रोहित कुमार पांडे, चंदन कुमार
ग्राफिक्स: प्रशांत वशिष्ठ, रोहित आर्य, रितिका चंदोला
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक के बाद एक बेइज्जती हो रही है। भारत के खिलाफ उनके बिना सोचे-समझे टैरिफ वाले बयान पर अभी बवाल थमा भी नहीं है कि हाउस ओवरसाइट कमेटी ने 2003 में ट्रंप द्वारा जेफरी एप्सटीन को लिखा गया एक कथित अश्लील पत्र सबके सामने ला दिया।
सोमवार (9 सितंबर) को कमेटी के लोगों ने बताया कि उन्हें एक बर्थडे बुक मिली, जिसमें ट्रंप के हस्ताक्षर वाला पत्र है। इसमें एक और पत्र भी था, जिसमें एप्सटीन के किसी दोस्त ने एक औरत के बारे में भद्दा मजाक किया था, जिसमें ट्रंप का नाम था।
डेमोक्रेट्स ने X पर ट्रंप का वो पत्र शेयर किया और कहा, “हमें ट्रंप का वो बर्थडे नोट मिला, जिसके बारे में वो कहते थे कि वो है ही नहीं। ट्रंप इसमें एक ‘शानदार रहस्य’ की बात करते हैं, जो उन्होंने एप्सटीन के साथ बाँटा था। वो क्या छिपा रहे हैं? फाइलें बाहर लाओ!”
??HERE IT IS: We got Trump’s birthday note to Jeffrey Epstein that the President said doesn’t exist.
Trump talks about a “wonderful secret” the two of them shared. What is he hiding? Release the files! pic.twitter.com/k2Mq8Hu3LY
इस साल जुलाई में वॉल स्ट्रीट जर्नल ने इस बर्थडे बुक और पत्र के बारे में बताया था। पत्र में टाइप किया हुआ टेक्स्ट था, जो एक नंगी औरत की लाइनिंग वाली आर्ट से घिरा था। पत्र में लिखा था, “हैप्पी बर्थडे, और हर दिन एक नया शानदार रहस्य हो।” हस्ताक्षर में ‘डोनाल्ड’ लिखा था, जो कमर के नीचे था और ऐसा लगता था जैसे प्यूबिक हेयर की नकल हो।
ट्रंप ने कहा कि उन्होंने न तो ये पत्र लिखा और न ही उसमें कोई औरत की आकृति बनाई। इतना ही नहीं, उन्होंने वॉल स्ट्रीट जर्नल और उन पत्रकारों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा ठोक दिया, जिन्होंने 2003 में एप्सटीन के 50वें जन्मदिन के लिए दी गई चिट्ठियों की कहानी लिखी थी, जिसमें ट्रंप का पत्र भी था। इस मुकदमे में कम से कम 20 बिलियन डॉलर माँगे गए। ट्रंप ने इस पत्र को ‘जाली’ बताया।
ट्रुथ सोशल पर ट्रंप ने पोस्ट किया कि उन्होंने वॉल स्ट्रीट जर्नल के खिलाफ बड़ा मुकदमा दायर किया है। “ब्रेकिंग न्यूज: हमने उन सबके खिलाफ बड़ा मुकदमा ठोका है, जो उस झूठी, गंदी, बदनाम करने वाली, फेक न्यूज को छापने में शामिल थे, जो उस बेकार अखबार में छपी, जिसे वॉल स्ट्रीट जर्नल कहते हैं। ये बड़ा कानूनी कदम उन तथाकथित लेखकों, अब पूरी तरह बदनाम हो चुके WSJ, और इसके मालिकों और सहयोगियों के खिलाफ है, जिसमें रूपर्ट मर्डोक और रॉबर्ट थॉमसन सबसे ऊपर हैं…”
वहीं, व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने सोमवार को कहा कि ये बर्थडे कार्ड की कहानी ‘झूठी’ है और ये ‘फेक न्यूज’ डेमोक्रेट्स के ‘एप्सटीन धोखे’ को बढ़ाने के लिए है।
उन्होंने X पर लिखा, “वॉल स्ट्रीट जर्नल का ताजा लेख दिखाता है कि ये पूरी ‘बर्थडे कार्ड’ कहानी झूठी है। जैसा मैं कहती आई हूँ, साफ है कि ट्रंप ने ये चित्र नहीं बनाया और न ही इस पर हस्ताक्षर किए। ट्रंप की कानूनी टीम जोर-शोर से मुकदमा लड़ेगी। और ये ‘रिपोर्टर’ @joe_palazzolo ने जिसने ये गंदी कहानी लिखी, उसने टिप्पणी के लिए उसी वक्त संपर्क किया जब उसने अपनी कहानी छापी, हमें जवाब देने का समय ही नहीं दिया। ये डेमोक्रेट्स के एप्सटीन धोखे को बढ़ाने के लिए फेक न्यूज है!”
The latest piece published by the Wall Street Journal PROVES this entire “Birthday Card” story is false.
As I have said all along, it’s very clear President Trump did not draw this picture, and he did not sign it.
President Trump’s legal team will continue to aggressively…
खास बात ये है कि एप्सटीन की फाइलें, जो उसकी गलत हरकतों की जाँच से जुड़े सीलबंद दस्तावेज हैं, उसने ट्रंप के समर्थकों समेत पूरे अमेरिका का ध्यान खींचा है।
इस साल जनवरी में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद, अटॉर्नी जनरल बॉन्डी ने कहा था कि एप्सटीन के सारे दस्तावेज, जिनमें कई लोग एक ‘क्लाइंट लिस्ट’ मानते थे, जिसमें एप्सटीन के यौन तस्करी के रैकेट के बड़े लोग शामिल थे, सबके सामने लाए जाएँगे। लेकिन जनवरी में पद संभालने के बाद ट्रंप ने पलटी मार ली और अब एप्सटीन फाइलों और इन मामलों की जाँच को डेमोक्रेट्स का फैलाया धोखा बताते हैं।
जेफरी एप्सटीन कौन था?
जेफरी एप्सटीन एक अमेरिकी फाइनेंसर था, जिसे फ्लोरिडा की अदालत ने नाबालिग को वेश्यावृत्ति के लिए उकसाने और वेश्या माँगने के लिए दोषी ठहराया था। उसने 13 महीने जेल में बिताए और जुलाई 2019 में फ्लोरिडा और न्यूयॉर्क में नाबालिगों की यौन तस्करी के आरोप में फिर से पकड़ा गया। एक महीने बाद अगस्त में मुकदमे के दौरान उसकी मौत हो गई।
एप्सटीन फाइलें जाँच के दस्तावेज हैं, जिनमें एप्सटीन की गलत हरकतों की जाँच के दौरान फेडरल एजेंसियों ने फाइलें, रिकॉर्ड, वीडियो और संपर्क जमा किए थे। इनमें एप्सटीन के प्राइवेट प्लेन के फ्लाइट लॉग, कॉन्टैक्ट लिस्ट, हिसाब-किताब के रिकॉर्ड और यहाँ तक कि गलत व्यवहार के वीडियो सबूत भी होने की बात कही जाती है।
IIT गाँधीनगर एक बार फिर से विवादों में आ गया है। इस बार सवाल वहाँ पर शिक्षकों की नियुक्तियों को लेकर उठे हैं। ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ यानी हितों के टकराव के आरोपों के साथ संस्थान से जवाब माँगा जा रहा है। हालाँकि अब तक संस्थान की ओर से अब तक इस पर किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई है।
जानकारी के अनुसार, संस्थान में 14 उन दंपतियों के बारे में पता चला है जो अलग-अलग और ऊँचे पदों पर कार्यरत हैं। कुछ शिक्षक और कर्मचारी ऐसे भी हैं जो पिता और पुत्री दोनों ही IIT गाँधीनगर में कार्यरत हैं। इसके अलावा इंटरनल कंप्लेंट कमिटी जैसे कुछ अहम पदों पर भी परिवार के ही सदस्य पदस्थ हैं।
ताजा मामला संस्थान के एक लेक्चरर से जुड़ा है। शिक्षक ने अपनी PhD छात्रा को ही संस्थान में नौकरी दिलाई और बाद में उससे शादी भी की। अब इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। शिकायत में पूछा गया है कि किस आधार पर स्कॉलर की नियुक्ति हुई है? साथ ही यदि संस्थान को इस तरह की नियुक्ति की जानकारी थी तो इसे रोका क्यों नहीं गया?
एक अन्य मामले में IIT गाँधीनगर के एक अन्य वरिष्ठ शिक्षक की कोरियाई पत्नी पहले संस्थान में विजिटिंग फैकल्टी थीं। अब उन्हें असिस्टेंट टीचिंग प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति मिल गई है।
A Korean/American citizen was just another English and Korean "tutor" in the USA.
But she is then made an "Assistant Teaching Professor" at Humanities Dept, IIT Gandhinagar.
Her husband? He was working–still works–in a top position at IIT Gandhinagar.
इन दोनों मामलों के बाहर आने के बाद संस्थान में नियुक्तियों को लेकर तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं।
लोगों के सवाल हैं कि ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ और ‘नेपोटिज्म’ यानी भाई-भतीजावाद जैसी स्थितियों से बचने के लिए संस्थान में क्या कोई नीति बनाई गई है? क्या नियुक्ति से पहले कोई जाँच की जाती है जिससे ऐसी समस्याएँ न उत्पन्न हों?
सवाल यह भी है कि यदि इंटरनल कंप्लेंट कमिटी में कोई शिक्षक हो और उसके पति-पत्नी के खिलाफ कोई शिकायत आए तो वह निष्पक्ष कैसे रह सकता है? और क्या टैक्सपेयर्स के पैसों से चलने वाला संस्थान ऐसी व्यवस्था को उचित ठहरा सकता है?
ऑपइंडिया से बातचीत में लेखक और कॉलमिस्ट हर्षिल मेहता कहते हैं, “संस्थान में लगभग 14 दंपति अलग-अलग पदों पर काम करते हैं। मुझे ऐसी कोई नीति नहीं दिखती जिसमें इसे लेकर कोई स्पष्टता नियम हों। अगर ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ की कोई नीति है तो IIT गाँधीनगर को उसे सार्वजनिक करना चाहिए। सवाल यह भी है कि क्या IIT गाँधीनगर कोई फैमिली रीयूनियन प्रोग्राम चला रहा है? अगर ऐसा है तो उसे आधिकारिक नीति के रूप में घोषित कर देना चाहिए।”
IIT Gandhinagar has so many appointments with conflict of interest and favouritism.
If husband is working as a professor, then on what basis his Korean wife is appointed as a visiting faculty?
I have identified 14 couples (husband-wife, father-daughter) from the same family…
वे कहते हैं, “संस्थान में शिक्षक प्राची थारेजा इंटरनल कंप्लेंट कमिटी में हैं। क्या संस्थान को पता है कि उनके पति भी वहीं नौकरी करते हैं? अगर उनके पति के खिलाफ कोई शिकायत आती है तो उस मामले में प्राची हितों के टकराव के साथ कैसे निर्णय लेंगी? बड़ी-बड़ी कंपनियों में भी हितों के टकराव से बचने के लिए नीतियाँ होती हैं। IIT गांधीनगर में ऐसी नीति कहाँ है?”
हर्षिल ने आगे कहा, “अगर ऐसा नहीं है तो फिर ऐसी गतिविधियों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं, यह शिक्षण संस्थान को स्पष्ट करना चाहिए।”
उन्होंने संस्थान के डायरेक्टर और पूर्व डायरेक्टर सुधीर जैन, जिनके कार्यकाल में ये नियुक्तियाँ हुईं, साथ ही अन्य अधिकारियों पर भी सवाल उठाए और सरकार और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से हस्तक्षेप की माँग की है। अब देखना यह है कि आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बाढ़ प्रभावित उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में 48 ट्रकों से भरे राहत सामान को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। ट्रक में बाढ़ पीड़ितों के लिए 19 हजार किट भरकर भेजे गए। इसके साथ सीएम ने हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को 5-5 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की भी घोषणा की।
आदरणीय प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी की 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' की अवधारणा के अनुरूप संकट की घड़ी में हम सब एकजुट होकर साथ खड़े हैं।
उत्तर प्रदेश की 25 करोड़ जनता की ओर से पंजाब, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखण्ड राज्य के बाढ़ पीड़ितों हेतु राहत सामग्री के वाहनों को माँ… pic.twitter.com/B1ReKn7qmn
दरअसल, सोमवार (08 सितंबर 2025) को सीएम योगी आदित्यनाथ सहारनपुर पहुँचे। यहाँ तीनों राज्यों के लिए राहत सामग्री से भरे 48 ट्रक रवाना किए। इस दौरान सीएम ने कहा कि पड़ोसी राज्यों की मदद के लिए यूपी सरकार हर समय तैयार है। सीएम ने श्रेष्ठ भारत को बढ़ावा देते हुए कहा कि यूपी के 25 करोड़ जनता की तरफ से बाढ़ पीड़ित भाई-बहनों के लिए भेजी गई सामग्री मानवीय संवेदना की कड़ी है।
मुख्यमंत्री ने कहा, “उत्तर प्रदेश में बाढ़ सबसे बड़ी पीड़ा रही है लेकिन इस बार निचले स्तर पर ही जलभराव हुआ है। वो भी सिर्फ सहारनपुर, बागपत, गौतमबुद्धनगर या उन जिलों में जहाँ से यमुना जा रही है। गंगा जी के मुहाने पर बिजनौर से लेकर बलिया तक हर जिले में पुख्ता व्यवस्था की गई है। बाणगंगा और हिंडन नदियों में ओवरफ्लो होने के कारण हुई हानि के बाद सरकार ने तुरंत राहत सामग्री पहुँचाने का काम किया।”
इसके साथ CM योगी ने आपदा राहत उपाय पर बात करते हुए कहा, “यूपी में जिन किसानों की फसल बाढ़ की चपेट में आई है, उनका सर्वे शुरू कर दिया गया है। जल्द ही सर्वे की रिपोर्ट मिल जाएगी और पीड़ित किसानों को मुआवजा राशि दी जाएगी। बारिश के मौसम में जानवर या सांप के काटने से सदस्यों को खोने वाले परिवारों को ₹4 लाख मुआवजा दिया जाएगा।”
CM योगी ने बताया, “आपदा से नष्ट हुए घरों के पुनर्निर्माण के लिए धनराशि उपलब्ध कराई जाती है और नदी कटाव से प्रभावित परिवारों को नए घर बनाने के लिए जमीन के पट्टे और वित्तीय सहायता दी जाती है। बाढ़ प्रभावित गाँवों में भोजन, बच्चों के लिए दूध, पशुओं के लिए चारा और राहत शिविरों तक सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था की जाती है।”
इसके अलावा CM योगी आदित्यनाथ ने प्राकृतिक आपदा के दौरान जनता से सतर्क रहने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि घर के आसपास इकट्ठे हुए पानी से डायरिया समेत अन्य बीमारियों हो सकती है और कहा कि पीने के लिए केवल उबला हुआ पानी ही इस्तेमाल करें।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (9 सितंबर 2025) को हिमाचल प्रदेश में बाढ़ और भारी बारिश से प्रभावित इलाकों का दौरा किया। उन्होंने सबसे पहले हवाई सर्वेक्षण किया ताकि बाढ़ और भूस्खलन से हुए नुकसान का जायजा ले सकें। इसके बाद काँगड़ा में एक बैठक में राहत और पुनर्वास के कामों की समीक्षा की।
इस दौरान पीएम मोदी ने हिमाचल के लिए 1500 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता की घोषणा की। इस राशि में राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) और पीएम किसान सम्मान निधि की दूसरी किश्त का अग्रिम भुगतान शामिल है।
हवाई सर्वेक्षण के जरिए हिमाचल प्रदेश में बाढ़ और लैंडस्लाइड की स्थिति का जायजा लिया। इस कठिन समय में हम प्रदेश के अपने भाई-बहनों के साथ पूरी मजबूती से खड़े हैं। इसके साथ ही प्रभावित लोगों की मदद के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। pic.twitter.com/PS0klVwo5c
प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रभावित इलाकों को फिर से बसाने के लिए हरसंभव मदद की जाएगी। उन्होंने पीएम आवास योजना के तहत घरों के पुनर्निर्माण, राष्ट्रीय राजमार्गों की मरम्मत, स्कूलों की बहाली और पशुपालकों के लिए मिनी किट जैसी योजनाओं पर जोर दिया। जिन किसानों के पास बिजली कनेक्शन नहीं है, उनके लिए विशेष मदद का ऐलान भी किया गया।
पीएम मोदी ने कहा कि बाढ़ से क्षतिग्रस्त घरों की सही जानकारी के लिए जियोटैगिंग की जाएगी, ताकि सहायता जल्दी और सही लोगों तक पहुँचे। स्कूलों में पढ़ाई सुचारू रखने के लिए समग्र शिक्षा अभियान के तहत क्षति की जानकारी जियोटैगिंग से ली जाएगी। इसके अलावा, भूजल स्तर बढ़ाने और पानी के बेहतर प्रबंधन के लिए रिचार्ज संरचनाओं का निर्माण होगा, जिससे बारिश का पानी जमा किया जा सके।
प्रधानमंत्री ने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने मृतकों के परिवारों के लिए 2 लाख रुपए और गंभीर रूप से घायल लोगों के लिए 50,000 रुपए की अनुग्रह राशि की घोषणा की। केंद्र सरकार ने नुकसान का जायजा लेने के लिए केंद्रीय दलों को भेजा है, जिनकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की सहायता दी जाएगी।
हिमाचल प्रदेश में भारी बाढ़ और लैंडस्लाइड से प्रभावित कुछ लोगों से बातचीत की। उनकी पीड़ा के साथ ही त्रासदी से हुआ नुकसान मन को व्यथित करने वाला है। खराब मौसम का संकट झेल रहे हर व्यक्ति तक राहत और सहायता पहुंचे, इसके लिए हम पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। pic.twitter.com/KfpyriuLwq
प्रधानमंत्री ने NDRF, SDRF, सेना और आपदा मित्र स्वयंसेवकों की तारीफ की, जिन्होंने राहत और बचाव कार्य में दिन-रात मेहनत की। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर इस मुश्किल समय में हिमाचल के लोगों का साथ देंगे। केंद्र सरकार ने आपदा प्रबंधन नियमों के तहत सभी तरह की सहायता देने का वादा किया है।
प्रधानमंत्री ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार हर कदम पर हिमाचल की मदद करेगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की माँगों और केंद्रीय दलों की रिपोर्ट के आधार पर और मदद दी जाएगी।